भारतीय संविधान में सहकारी समितियों की स्थिति
17 अगस्त 2026 · Raj Study संपादकीय टीम
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संविधान में सहकारी समितियां लोकतांत्रिक, स्वायत्त आर्थिक उद्यम के रूप में मान्यता प्राप्त।
क्या हुआ
भारतीय संविधान सहकारी समितियों को विकेंद्रीकृत आर्थिक लोकतांत्रिकरण के उपकरण के रूप में बढ़ावा देने के लिए भारतीय राज्य को संवैधानिक रूप से बाध्य करता है। 97वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम (2011) ने अनुच्छेद 19(1)(c) को संशोधित किया, जिससे सहकारी समितियां बनाने का अधिकार मौलिक अधिकार बन गया। अनुच्छेद 43B (राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत) राज्य को सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देने का आदेश देते हैं। संविधान के भाग IXB को 2011 संशोधन के माध्यम से शामिल किया गया। हालांकि, 'Union of India v. Rajendra N. Shah' (2021) में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भाग IXB बहु-राज्य सहकारी समितियों तक ही सीमित है। बहु-राज्य सहकारी समितियां 2002 के बहु-राज्य सहकारी समितियां अधिनियम के तहत संघ सूची के अंतर्गत आती हैं।
मुख्य तथ्य
- 197वें संवैधानिक संशोधन (2011) ने सहकारी समितियां बनाने को मौलिक अधिकार बनाया।
- 2अनुच्छेद 43B राज्य को सहकारी समितियों के स्वायत्त और लोकतांत्रिक संचालन को बढ़ावा देने का आदेश देते हैं।
- 3भाग IXB 2011 में जोड़ा गया लेकिन केवल बहु-राज्य सहकारी समितियों पर लागू होता है।
- 4एकल-राज्य सहकारी समितियां राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के तहत राज्य विषय हैं।
परीक्षा में ऐसे पूछा जा सकता है
भारतीय संविधान के अंतर्गत सहकारी समितियों की संवैधानिक स्थिति, मौलिक अधिकार, और केंद्र-राज्य वितरण।
स्थायी GK: भारतीय संविधान का भाग IV राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत हैं जो राज्य को सहकारी समितियां बढ़ावा देने का आदेश देते हैं।