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राष्ट्रीय

भारत में औद्योगिक दुर्घटनाएं: प्रणालीगत जोखिम उपेक्षा और सुरक्षा विफलताएं

17 अप्रैल 2026 · Raj Study संपादकीय टीम

क्या हुआ

द हिंदू का संपादकीय 'क्रीपिंग रिस्क' की अवधारणा को उजागर करता है — जहां औद्योगिक आपदाएं अचानक नहीं होतीं, बल्कि लंबे समय से उपेक्षित सुरक्षा चेतावनियों, टाली गई मरम्मत और नियामक लापरवाही का परिणाम होती हैं। भारत ने कई बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाएं देखी हैं — 1984 भोपाल गैस त्रासदी (यूनियन कार्बाइड, MIC गैस रिसाव, 3,000+ तत्काल मौतें), 2020 विशाखापत्तनम LG पॉलिमर्स गैस रिसाव (स्टाइरीन गैस, 12 मौतें) और गुजरात-राजस्थान के रासायनिक क्षेत्रों में बार-बार होती घटनाएं। प्रमुख प्रणालीगत समस्याओं में शामिल हैं: (1) कारखाना अधिनियम, 1948 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का कमजोर प्रवर्तन; (2) राज्य स्तर पर कम कर्मचारियों वाले कारखाना निरीक्षणालय; (3) अनिवार्य तृतीय-पक्ष सुरक्षा ऑडिट का अभाव; (4) खतरनाक रसायन नियम, 1989 का अपर्याप्त क्रियान्वयन। NDMA और राज्य SDMAs को औद्योगिक खतरा मानचित्रण को आपदा तैयारी योजनाओं में शामिल करना चाहिए। RAS अभ्यर्थियों के लिए यह राजस्थान के RIICO औद्योगिक क्षेत्रों, कोटा-जोधपुर के रासायनिक उद्योगों और राज्य स्तरीय कारखाना निरीक्षण तंत्र की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है।

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