राजस्थान के संभाग व जिला प्रशासन (41 जिले, 7 संभाग)
Rajasthan Divisions & Districts: 41 Districts, 7 Divisions
राजस्थान के संभागों-जिलों के पुनर्गठन की पूरी कहानी से लेकर जिलाधीश, उपखण्ड अधिकारी, तहसीलदार और राज्य पुलिस के ढांचे तक- स्थानीय प्रशासन को समझने के लिए एक संपूर्ण गाइड।
संभागीय आयुक्त प्रणाली एवं पुनर्गठन
बड़े राज्यों में सचिवालय और जिलों के बीच तालमेल बिठाने के लिए बनी संभागीय आयुक्त व्यवस्था तथा राजस्थान के जिलों-संभागों के उतार-चढ़ाव भरे सफर की पूरी कहानी।
🏛️संभागीय आयुक्त: अवधारणा
- बड़े राज्यों में सचिवालय और जिला प्रशासन के बीच तालमेल, निगरानी व मार्गदर्शन के लिए संभागों की व्यवस्था बनाई जाती है, जिसका प्रमुख संभागीय आयुक्त कहलाता है।
- भारत में यह पद सबसे पहले सन् 1829 में बनाया गया था, ताकि जिला कलेक्टरों के कामकाज पर निगरानी रखी जा सके और उन्हें दिशा दी जा सके।
⚖️राजस्थान में संभागीय व्यवस्था की शुरुआत व समाप्ति
- एकीकरण के बाद मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के कार्यकाल में राजस्थान में 25 जिले बने थे, और 1949 में सचिवालय व जिलों के बीच सेतु बनाने के लिए जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर व बीकानेर- इन पाँच संभागों में संभागीय आयुक्त तैनात किए गए, हर संभाग में औसतन 4-5 जिले रखे गए।
- 1 नवम्बर, 1956 को राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर अजमेर-मेरवाड़ा को राजस्थान में मिलाकर अजमेर को 26वाँ जिला बनाया गया, और इसे जयपुर संभाग के अंतर्गत रखा गया जबकि आयुक्त कार्यालय जयपुर में ही रहा।
- संभागीय आयुक्तों के अधिकार अक्सर राजस्व मंडल व जिला कलेक्टरों के कार्यों से टकराते थे, जिससे अनावश्यक टकराव पैदा होता था; इसी कारण मोहनलाल सुखाड़िया सरकार ने अप्रैल 1962 में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया।
🔁व्यवस्था का पुनरुद्धार व विस्तार
- लगभग 25 साल के मिले-जुले अनुभव के बाद हरिदेव जोशी सरकार ने 26 जनवरी, 1987 से संभागीय आयुक्त व्यवस्था फिर लागू की और अजमेर को नया संभाग बनाया, जिससे कुल 6 संभाग (जयपुर, अजमेर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, बीकानेर) अस्तित्व में आए।
- 4 जून, 2005 की अधिसूचना से भरतपुर को सातवाँ संभाग बनाया गया, जिसमें जयपुर संभाग से भरतपुर व धौलपुर तथा कोटा संभाग से करौली व सवाई माधोपुर जिले शामिल किए गए; इस तरह 32 जिलों को सात संभागों में बाँट दिया गया।
- 1956 से 2008 के बीच छह और जिले एक-एक करके बनाए गए- धौलपुर (1982), बारां, दौसा व राजसमंद (1991), हनुमानगढ़ (1994), करौली (1997) और अंत में प्रतापगढ़ (2008)- जिससे 2023 के बड़े पुनर्गठन से पहले राज्य 26 से 33 जिलों तक पहुँचा।
🆕2023 का बड़ा पुनर्गठन: 19 नए जिले, 3 नए संभाग
- नए जिलों पर सुझाव देने के लिए 2014 में परमेश चन्द्र समिति और फिर मार्च 2022 में राम लुभाया समिति बनाई गई; इन्हीं सिफारिशों के आधार पर मुख्यमंत्री गहलोत ने 17 मार्च, 2023 को तीन नए संभागों व 19 नए जिलों के गठन की घोषणा की।
- 7 अगस्त, 2023 की अधिसूचना से जयपुर जिले को 4 भागों तथा जोधपुर जिले को 3 भागों में बाँटते हुए कुल 19 नए जिले तथा सीकर, बाँसवाड़ा व पाली संभाग अस्तित्व में आए, जिससे राज्य में 10 संभाग व 50 जिले हो गए।
↩️2024 में समीक्षा और वर्तमान स्वरूप
- दिसंबर 2023 के चुनावों के बाद बनी भजनलाल सरकार ने नए जिलों की समीक्षा शुरू की; ललित के. पँवार समिति और उपमुख्यमंत्री प्रेमचन्द बैरवा की मंत्रिमंडलीय उपसमिति की रिपोर्टों के आधार पर मंत्रिमंडल ने 28.12.2024 को 9 नए जिलों (जयपुर ग्रामीण, दूदू, जोधपुर ग्रामीण, अनूपगढ़, गंगापुरसिटी, केकड़ी, शाहपुरा, नीम का थाना, साँचौर) तथा सीकर, बाँसवाड़ा व पाली संभागों को समाप्त करने का निर्णय लिया, जिसकी अधिसूचना 29.12.2024 को जारी हुई।
- इस फैसले के बाद अब राज्य में 41 जिले व 7 संभाग रह गए हैं; जोधपुर संभाग में सबसे अधिक 8 जिले हैं जबकि कोटा व बीकानेर संभागों में सबसे कम, यानी 4-4 जिले हैं। जनसंख्या में जयपुर संभाग सबसे आगे है और क्षेत्रफल में जोधपुर संभाग सबसे बड़ा है।
🕒संभाग-जिला पुनर्गठन टाइमलाइन
- 19495 संभाग बने (जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, बीकानेर)
- 1956अजमेर 26वाँ जिला बना, जयपुर संभाग में शामिल
- 1962संभागीय आयुक्त व्यवस्था समाप्त
- 1987व्यवस्था पुनर्जीवित; अजमेर छठा संभाग बना
- 2005भरतपुर सातवाँ संभाग बना (32 जिले)
- 2008प्रतापगढ़ 33वाँ जिला बना
- 202319 नए जिले व 3 नए संभाग: 10 संभाग, 50 जिले
- 20249 जिले व 3 संभाग समाप्त: 7 संभाग, 41 जिले
जिला प्रशासन: अवधारणा एवं ढांचा
जिला भारतीय प्रशासन की सबसे पुरानी और सबसे भरोसेमंद इकाई है- मौर्यकाल के 'विषय' से आज के आधुनिक जिले तक का सफर और इसका संगठनात्मक खाका।
📜जिले की अवधारणा एवं ऐतिहासिक विकास
- प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्यों को छोटी इकाइयों- जिलों- में बाँटा जाता है; भारत में यह परंपरा मौर्यकाल तक जाती है, जब जिले को 'विषय/राजुक' कहा जाता था और उसका मुखिया 'विषयपति/राजुका' होता था, गुप्तकाल व हर्ष के समय भी इसे 'विषय' ही कहा गया।
- मुगलकाल में राज्य सूबों, सरकारों और परगनों में बँटा था; 'सरकार' आज के जिले जैसी थी, जिसका मुखिया 'आमिल'/'अमाल गुजार'/'करोड़ी-फौजदारी' कहलाता था। आधुनिक जिला प्रशासन व जिलाधीश पद का असली विकास ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में हुआ, जब 1772 में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने 'कलेक्टर' का पद बनाया।
- 1949 में नवगठित राजस्थान में 25 जिले बने; इसके कुछ समय बाद अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र भी राज्य में मिलाकर 26वाँ जिला बनाया गया (जैसा ऊपर बताया गया), और उसके बाद भी राज्य में नए जिले बनते रहे। सुविधा के लिए जिले को उपखंडों में और उपखंड को तहसीलों-उपतहसीलों में बाँटा गया है।
🎯जिला प्रशासन के उद्देश्य
- जिला प्रशासन के चार प्रमुख उद्देश्य हैं- जिले में कानून-व्यवस्था लागू करना, सरकार का भू-राजस्व एकत्रित करना, नगरीय व ग्रामीण जनता का कल्याण करना, तथा समय-समय पर लोकसभा, विधानसभा एवं स्थानीय निकायों के चुनाव करवाना।
🏗️जिला प्रशासन का संगठनात्मक ढांचा
- जिला प्रशासन का पूरा ढाँचा जिला कलेक्टर के अधीन पाँच मुख्य शाखाओं में बँटा है- शांति एवं कानून व्यवस्था, भू-अभिलेख, नागरिक सुविधाएँ, जनता व सरकार के बीच की कड़ी, तथा राजकोषीय कार्य। शांति व्यवस्था शाखा में पुलिस अधीक्षक से लेकर आरक्षी तक की श्रृंखला होती है, जबकि भू-अभिलेख शाखा अपर जिला कलेक्टर से पटवारी तक चलती है।
- नागरिक सुविधाएँ शाखा में CMHO, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला नियोजन अधिकारी, जिला आपूर्ति अधिकारी व जिला वन अधिकारी जैसे विभागीय अधिकारी काम करते हैं, जबकि जिला मुख्यालय पर जनसंपर्क अधिकारी जनता व सरकार के बीच सेतु का काम करता है और कोषाधिकारी से लेकर उपकोषाधिकारी तक की श्रृंखला राजकोषीय कार्यों को संभालती है। समूचा पदानुक्रम है: जिलाधीश → अतिरिक्त जिलाधीश → उपखण्ड अधिकारी → तहसीलदार → नायब तहसीलदार → पटवारी।
💡जिलों से जुड़े रोचक तथ्य
- भारत के संविधान में 'जिला' शब्द मुख्यतः अनुच्छेद 233 में- जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में- तथा अनुच्छेद 234-237 व अनुच्छेद 243ZD (जिला योजना समिति) में भी प्रयुक्त हुआ है।
- उदयपुर जिला मुख्यालय पर स्थित उपखंड व तहसील दोनों का नाम 'उदयपुर' नहीं, बल्कि 'गिरवा' है, जबकि राजसमंद जिला मुख्यालय को 'राजनगर' के नाम से भी जाना जाता है।
जिलाधीश: भूमिकाएं एवं कार्य
जिलाधीश को राज्य सरकार की आँख, कान व हाथ कहा जाता है- भू-राजस्व से लेकर संकट प्रबंधन तक, यह एक अकेला पद कितनी भूमिकाएँ निभाता है, जानिए।
🪪जिलाधीश: परिचय एवं पदनाम
- जिलाधीश जिला-स्तरीय प्रशासन का प्रमुख होता है और वर्तमान में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का सदस्य होता है; पंजाब, कर्नाटक, हरियाणा, असम व झारखंड जैसे राज्यों में इसे 'उपायुक्त' कहा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल व बिहार में 'जिला दण्डनायक (DM)' कहा जाता है।
- जिलाधीश को जिले की 'लघु राज्य सरकार' कहा जाता है और वह राज्य सरकार की आँख, कान व बाँहों की तरह काम करता है; राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी ने उसे 'संस्थागत करिश्मा' (Institutional Charisma) की उपमा दी, और उसे 'जिला प्रशासन की धुरी' भी कहा जाता है।
🌾भू-राजस्व अधिकारी के रूप में
- भू-राजस्व अधिकारी के रूप में वह राजस्व वसूली, कृषि सांख्यिकी तैयार करना, बाढ़-ओले-अकाल से हुई फसल क्षति का आकलन, राहत कार्यों की सिफारिश व निगरानी, कृषि ऋण वितरण, चकबंदी, जमींदारी व बँधुआ मजदूरी उन्मूलन तथा भूमि सुधार जैसे काम करवाता है।
- वह जिला राजकोष व सभी कोषालयों का नियंत्रण-निरीक्षण करता है, भू-सर्वेक्षण, नक्शा निर्माण, सैटलमेंट व भू-अभिलेखों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, तथा उपखंड अधिकारी, तहसीलदार, कानूनगो व पटवारी पर नियंत्रण रखते हुए राजस्व विवादों की अपीलें भी सुनता है।
🚨जिला मजिस्ट्रेट एवं संकटकालीन प्रशासक के रूप में
- जिला मजिस्ट्रेट के रूप में वह अधीनस्थ न्यायालयों व जेल प्रशासन का पर्यवेक्षण करता है, पुलिस अधीक्षक के माध्यम से कानून-व्यवस्था बनाए रखता है, धारा 144 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, BNSS 2023 की धारा 163) के तहत शांति भंग के मामलों की सुनवाई करता है, तथा हथियार, विस्फोटक व नशीले पदार्थों की तस्करी पर नियंत्रण रखता है।
- संकट के समय जिलाधीश की भूमिका एक 'मसीहा' जैसी हो जाती है- बाढ़, भूकम्प, अकाल, महामारी, दंगों या युद्ध में वह घायलों के उपचार, विस्थापितों के पुनर्स्थापन व मुआवजे की व्यवस्था करता है; युद्धकाल में भारतीय रक्षा नियमों के तहत उसे कई विशेष नियंत्रणकारी शक्तियाँ भी मिल जाती हैं।
🤝विकास अधिकारी एवं समन्वयक के रूप में
- 2 अक्टूबर, 1952 से शुरू हुए सामुदायिक विकास कार्यक्रम के बाद जिलाधीश का पद तेजी से विकासोन्मुख बनता गया; वह जिला परिषद् व जिला आयोजना समिति के माध्यम से विकास योजनाएँ बनवाता है और उनके क्रियान्वयन पर निगरानी रखता है। 1985 में बनी जी.वी.के. राव समिति ने कलेक्टर के विकास व नियामकीय पदों को अलग करने की सिफारिश की थी।
- बढ़ते विभागीय विशिष्टीकरण के चलते समन्वय स्थापित करना जिलाधीश का अहम काम बन गया है- राज्य सरकार, विभिन्न विभागों, स्वयंसेवी संस्थाओं व स्थानीय निकायों के बीच। वह जिला औद्योगिक केन्द्र, जिला बैंकर्स समन्वय समिति व जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जैसे कई निकायों में पदेन अध्यक्ष होता है; जिला परिषद् का अपना अलग मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सामान्यतः RAS/ग्रामीण विकास सेवा का अधिकारी) होता है, जो जिलाधीश के समग्र मार्गदर्शन में कार्य करता है।
📋नियुक्ति एवं सेवा शर्तें
- जिला कलेक्टर पद पर नियुक्ति दो तरीकों से होती है- या तो सीधे नवचयनित IAS अधिकारी को दी जाती है, या राज्य प्रशासनिक सेवा (RAS) के वरिष्ठ अधिकारी को, जो IAS में पदोन्नत हो चुका हो; राजस्थान में RAS अधिकारियों को पहली बार अगस्त 2009 में अशोक गहलोत सरकार ने कलेक्टर बनाया।
- नियुक्ति व स्थानांतरण राज्य सरकार करती है; बड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही में केन्द्र सरकार/UPSC की भूमिका भी जरूरी होती है, हालांकि निलम्बन राज्य सरकार स्वयं भी कर सकती है (जिसकी समीक्षा केन्द्र सरकार करती है)। वेतन-भत्ते केन्द्र तय करता है पर राज्य सरकार उनका भुगतान करती है। संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत IAS अधिकारियों को बिना जाँच बर्खास्त नहीं किया जा सकता, और उनका कार्यकाल भी निर्धारित नहीं होता।
📊जिलाधीश की चार प्रमुख भूमिकाएँ: एक नजर में
| भूमिका | प्रमुख कार्य |
|---|---|
| भू-राजस्व अधिकारी | राजस्व वसूली, भू-अभिलेख व नक्शे, फसल क्षति का आकलन, राहत कार्य |
| जिला मजिस्ट्रेट | कानून-व्यवस्था, धारा 144/BNSS धारा 163, न्यायालय व जेल पर्यवेक्षण |
| संकटकालीन प्रशासक | आपदा में राहत, पुनर्स्थापन व मुआवजा ('मसीहा' की भूमिका) |
| विकास अधिकारी एवं समन्वयक | जिला परिषद् व जिला आयोजना समिति के माध्यम से विकास योजनाएँ व निगरानी |
उपखण्ड, तहसील एवं प्रशासनिक इकाइयाँ
जिलाधीश के नीचे की कड़ी- उपखण्ड अधिकारी से तहसीलदार तक- और राज्य के 41 जिलों को बाँटने वाली प्रशासनिक इकाइयों की पूरी गिनती।
🧭उपखण्ड अधिकारी (SDO)
- राजस्थान के हर जिले को उपखंडों में बाँटा गया है और हर उपखंड का दायित्व एक SDO पर होता है, जो जिलाधीश के निर्देशन में लगभग सभी महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक काम संभालता है; भू-राजस्व अधिकारी के तौर पर वह भू-अभिलेख व नक्शे तैयार करवाता है, सरकारी भूमि पर अतिक्रमण रोकता है, राजस्व तय-वसूल करवाता है, सीमांकन करवाता है और पटवारी-कानूनगो पर नियंत्रण रखता है।
- न्यायिक अधिकारी के रूप में SDO भूमि, सीमा, चरागाह, भू-अभिलेख, उत्तराधिकार व सम्पत्ति-विभाजन जैसे विवादों में प्रारंभिक अपील, पुनरीक्षण व पुनरवलोकन की अर्द्ध-न्यायिक शक्तियाँ रखता है; उपखंड दण्डनायक (SDM) के रूप में वह अपने उपखंड में कानून-व्यवस्था बनाए रखता है, थानों का निरीक्षण करता है और धारा 144 (अब BNSS 2023 की धारा 163) लागू कर सकता है, साथ ही प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर उचित मूल्य की दुकानों व विकास कार्यक्रमों की निगरानी भी करता है।
📑तहसीलदार एवं तहसील प्रशासन
- उपखंड के नीचे राजस्व प्रशासन की सबसे छोटी इकाई तहसील है, जिसका प्रमुख तहसीलदार होता है; वह राजस्व मंडल द्वारा नियुक्त व नियंत्रित होता है, राजस्थान तहसीलदार सेवा का सदस्य होता है, और अधीनस्थ सेवा में होते हुए भी एक राजपत्रित अधिकारी होता है, जिसके नीचे नायब तहसीलदार, कानूनगो व पटवारी काम करते हैं।
- तहसीलदार भू-अभिलेखों का संधारण करता है, राजस्व वसूली की निगरानी रखता है, और द्वितीय श्रेणी कार्यपालक दण्डनायक के रूप में काश्तकारी, सीमा-विवाद, उत्तराधिकार व अतिक्रमण जैसे मामलों की प्रारंभिक सुनवाई कर दंड भी दे सकता है; इसके अलावा वह जन्म-मृत्यु पंजीयन, जनगणना, उचित मूल्य दुकानों के नियंत्रण, चुनाव व्यवस्था तथा प्रमाण-पत्र जारी करने जैसे कई विविध कार्य भी करता है।
🔢राज्य की प्रशासनिक इकाइयों की गिनती
- 29 दिसंबर, 2024 की अधिसूचना के बाद बने ढांचे के अनुसार राज्य के 41 जिलों में कुल मिलाकर 330 उपखंड, 426 तहसीलें, 297 उपतहसीलें और 368 पंचायत समितियाँ हैं।
- इसी ढांचे में कुल 11,151 ग्राम पंचायतें, 10 नगर निगम, 51 नगरपरिषदें व 248 नगरपालिकाएँ हैं, यानी राज्यभर में 309 शहरी निकाय (कुल नगर) मौजूद हैं।
🔗राजस्व-प्रशासन पदानुक्रम
- मुख्य सचिव
- संभागीय आयुक्त
- जिलाधीश
- अतिरिक्त जिलाधीश
- उपखण्ड अधिकारी (SDO)
- तहसीलदार
- नायब तहसीलदार
- कानूनगो
- पटवारी
राजस्थान पुलिस प्रशासन
गृह विभाग के अधीन काम करने वाली राजस्थान पुलिस का ढांचा, इतिहास, सुधार और महिला सुरक्षा से जुड़ी पहलें- एक नजर में।
🏢पुलिस प्रशासन का ढांचा
- भारतीय संविधान में पुलिस राज्य सूची का विषय है; राजस्थान में पुलिस विभाग गृह विभाग का अंग है, जिसके प्रभारी गृहमंत्री होते हैं और सचिवालय स्तर पर गृह सचिव इसका कार्यकारी मुखिया होता है, जबकि राज्य में पुलिस का सर्वोच्च अधिकारी पुलिस महानिदेशक (DGP) होता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह निर्णय (2006) व उसके 2018 के अनुवर्ती निर्देशों के अनुसार UPSC द्वारा तैयार वरिष्ठ IPS अधिकारियों के पैनल से चुना जाता है और जिसका कार्यकाल न्यूनतम दो वर्ष निश्चित होता है; पुलिस मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
- जिला स्तर पर पुलिस का दायित्व IPS अधिकारी- जिला पुलिस अधीक्षक (SP)- पर होता है, जिसकी सहायता अतिरिक्त SP, उप अधीक्षक, वृत्ताधिकारी व थानाधिकारी (SHO) करते हैं; कुछ जिलों को मिलाकर बनी पुलिस रेंज का मुखिया पुलिस महानिरीक्षक (IGP) होता है, जिसका सामान्य प्रशासन में दर्जा संभागीय आयुक्त के बराबर माना जाता है। हर जिला आगे वृत्तों (Circles) में, वृत्त थानों में, और थाना पुलिस चौकियों में बँटा है।
📜राजस्थान पुलिस का इतिहास एवं गठन
- राजस्थान पुलिस का गठन 1948 में हुआ; राजप्रमुख ने विभिन्न रियासतों के पुलिस बलों को एकीकृत कर 16 अप्रैल, 1949 को 'राजस्थान पुलिस (एकीकरण) अध्यादेश, 1949' जारी किया, इसी कारण 16 अप्रैल को राजस्थान पुलिस दिवस मनाया जाता है; 7 अप्रैल, 1949 को श्री आर. बनर्जी राज्य के पहले पुलिस महानिरीक्षक (IGP) बने।
- प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में राजस्थान पुलिस को पहला ध्वज प्रदान किया; 38 साल बाद, 17 अप्रैल 1992 को तत्कालीन राज्यपाल डॉ. एम. चेन्ना रेड्डी ने नया ध्वज दिया, जिस पर 'सेवार्थ कटिबद्धता' का आदर्श वाक्य अंकित है।
📊वर्तमान ढांचा एवं 2023 का सुधार
- 11 अगस्त, 2023 को DGP ने आदेश जारी कर 3 नई पुलिस रेंज व 10 नए पुलिस जिले बनाए; अब राज्य में 9 पुलिस रेंज (GRP रेंज सहित), 2 पुलिस आयुक्तालय (जयपुर व जोधपुर), 56 पुलिस जिले व 2 GRP जिले हैं, जिनमें जयपुर व जोधपुर रेंज में सबसे अधिक 8-8 पुलिस जिले हैं।
- राज्यभर में 263 पुलिस वृत्त, 1,052 पुलिस थाने व 1,323 पुलिस चौकियाँ काम करती हैं; नए पुलिस कानून के तहत जयपुर व जोधपुर में 1 जनवरी, 2011 से पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है, जहाँ पुलिस मुखिया को 'पुलिस कमिश्नर' कहा जाता है और उसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ भी हासिल हैं- जयपुर के पहले कमिश्नर बी.एल. सोनी और जोधपुर के भूपेन्द्र कुमार दक थे।
🎖️बटालियन एवं प्रशिक्षण संस्थान
- राजस्थान सशस्त्र दल का गठन 19 अगस्त, 1950 को हुआ; वर्तमान में राज्य में पुलिस की 21 सशस्त्र बटालियनें व राजस्थान सशस्त्र कॉन्स्टेबलरी (RAC) की 14 बटालियनें हैं, जिनमें से 8वीं, 11वीं व 12वीं बटालियन केन्द्र सरकार की इंडिया रिजर्व बटालियन के रूप में नई दिल्ली में VIP सुरक्षा में तैनात हैं।
- 'मेवाड़ भील कोर' की स्थापना जनवरी 1841 में मेवाड़ महाराणा सरदार सिंह ने खैरवाड़ा (उदयपुर) में मेवाड़ के पहाड़ी क्षेत्रों में शांति के लिए की थी, जिसका पहला कमांडर विलियम हंटर था और जिसे 1950 में राजस्थान पुलिस को सौंप दिया गया; राजस्थान पुलिस अकादमी जयपुर में 1975 में स्थापित हुई, जो चित्तौड़गढ़ किले (1949) व किशनगढ़ में रहे पुलिस प्रशिक्षण स्कूल के क्रमोन्नयन से बनी।
🛡️महिला सुरक्षा एवं पुलिस सुधार
- राज्य का पहला महिला पुलिस थाना 8 मार्च, 1989 को जयपुर में स्थापित हुआ; आज हर जिले में महिला पुलिस थाने, महिला व बाल डेस्क तथा महिला सलाह व सुरक्षा केन्द्र काम कर रहे हैं, जबकि जयपुर के जयपुरिया अस्पताल में शुरू हुआ One Stop Crisis Centre for Women (OSCCW) अब तक 28 जिलों में पहुँच चुका है।
- अंग्रेजों के जमाने का 146 साल पुराना पुलिस कानून बदलकर विधानसभा ने 21 सितंबर, 2007 को नया पुलिस अधिनियम पारित किया, जो 19 मई, 2008 से लागू हुआ और जिसका जोर पुलिस को सामुदायिक पुलिस बनाने पर है; गृहमंत्री की अध्यक्षता में राज्य पुलिस आयोग का गठन 5 मई, 2013 को किया गया।