राज्य न्यायपालिका — उच्च न्यायालय
State Judiciary — The High Court
राज्य की न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे उच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्तियों से लेकर राजस्थान उच्च न्यायालय की दिलचस्प यात्रा और जिला स्तर की अदालतों तक — पूरी न्यायपालिका को एक जगह समझें।
संवैधानिक आधार व साझा उच्च न्यायालय
भारत के प्रत्येक राज्य की न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर उच्च न्यायालय होता है -- जानिए इसका संवैधानिक आधार और कैसे कुछ उच्च न्यायालय एक से अधिक राज्यों की सेवा करते हैं।
📜संवैधानिक आधार
- राज्य की संपूर्ण न्यायपालिका उच्च न्यायालय और उसके अधीनस्थ न्यायालयों को मिलाकर बनती है, और यह राज्य की न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर स्थित होता है।
- संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालय से संबंधित प्रावधान हैं, जबकि अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों के प्रावधान दिए गए हैं।
- अनुच्छेद 214 के तहत हर राज्य में न्यायिक व्यवस्था के शीर्ष पर अपना उच्च न्यायालय होना अनिवार्य है।
🤝साझा (संयुक्त) उच्च न्यायालय
- 7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 231 के अनुसार संसद विधि बनाकर दो या अधिक राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय गठित कर सकती है, बशर्ते सभी संबंधित राज्य इस पर सहमत हों।
- पंजाब, हरियाणा व चण्डीगढ़ का साझा उच्च न्यायालय चण्डीगढ़ में है, जबकि गुवाहाटी उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम व नागालैण्ड -- चार राज्यों में फैला है।
- मणिपुर, मेघालय व त्रिपुरा पहले गुवाहाटी उच्च न्यायालय के अधीन थे, पर 2013 में इन तीनों को अलग स्वतंत्र उच्च न्यायालय मिल गए; 1 जनवरी 2019 को आंध्रप्रदेश का अपना उच्च न्यायालय नई राजधानी अमरावती में स्थापित हुआ।
- वर्तमान में देश में कुल 25 उच्च न्यायालय कार्यरत हैं -- 19 का क्षेत्राधिकार एक ही राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश तक सीमित है, और शेष 6 का क्षेत्राधिकार दो या अधिक राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों में फैला है।
🗺️प्रमुख साझा उच्च न्यायालय
- बॉम्बे हाईकोर्ट महाराष्ट्र, गोवा, दादरा-नागर हवेली एवं दमन-दीव को सेवा देता है, तो कलकत्ता हाईकोर्ट पश्चिम बंगाल के साथ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को भी कवर करता है।
- केरल हाईकोर्ट (कोच्चि) केरल व लक्षद्वीप को, तथा मद्रास हाईकोर्ट (चेन्नई) तमिलनाडु व पुडुचेरी को अपने क्षेत्राधिकार में रखता है।
गठन, नियुक्ति व न्यायाधीशों का कार्यकाल
उच्च न्यायालय में न्यायाधीश कैसे बनते हैं, कितने समय तक पद पर रहते हैं और उन्हें किन नियमों का पालन करना होता है -- इन संवैधानिक प्रावधानों को यहाँ सरल भाषा में समझें।
🖋️गठन, नियुक्ति व कॉलेजियम
- अनुच्छेद 216 के अनुसार उच्च न्यायालय एक मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा आवश्यकतानुसार नियुक्त अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनता है; न्यायाधीशों की संख्या तय करने की शक्ति भी राष्ट्रपति के पास है।
- अनुच्छेद 217(1) के तहत सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर व मुहर सहित वारण्ट के जरिए करते हैं; मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद होती है, जबकि अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति को इन दोनों के साथ-साथ उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी सलाह लेनी होती है।
- वर्तमान में यह नियुक्तियाँ कॉलेजियम प्रणाली से होती हैं -- सर्वोच्च न्यायालय का कॉलेजियम (मुख्य न्यायाधीश व 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश) नाम सुझाता है, और उन्हीं में से राज्यपाल व संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं।
🎓योग्यताएँ
- अनुच्छेद 217(2) के अनुसार उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए, और या तो भारत में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद पर रह चुका हो, या लगातार कम से कम 10 वर्ष तक किसी एक या अधिक उच्च न्यायालयों में अधिवक्ता रहा हो।
⏳कार्यकाल, त्यागपत्र व पदमुक्ति
- अनुच्छेद 217(1) के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सहित हर न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बना रहता है; यह सेवानिवृत्ति आयु मूल रूप से 60 वर्ष थी, जिसे 15वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1963 द्वारा अनुच्छेद 217 में संशोधन कर 62 वर्ष किया गया।
- कोई भी न्यायाधीश स्वयं हस्ताक्षरित त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपकर सेवानिवृत्ति से पहले पद छोड़ सकता है [अनुच्छेद 217(1)(क)]; समय-पूर्व पदमुक्ति केवल अक्षमता या कदाचार सिद्ध होने पर, संसद द्वारा अनुच्छेद 124(4) की प्रक्रिया से महाभियोग पारित होने के बाद राष्ट्रपति के आदेश से ही संभव है [अनुच्छेद 217(1)(ख)] -- यह वही प्रक्रिया है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने में अपनाई जाती है।
- इस तरह किसी न्यायाधीश का पद तीन ही तरीकों से रिक्त होता है -- स्वयं त्यागपत्र देने पर, महाभियोग के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाए जाने पर, या राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत या किसी अन्य उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित किए जाने पर।
🖊️शपथ, सेवानिवृत्ति के बाद प्रतिबंध व वेतन
- अनुच्छेद 219 के अनुसार नियुक्त न्यायाधीश को पदग्रहण से पहले राज्यपाल (या उनके नामित व्यक्ति) के समक्ष संविधान की तीसरी अनुसूची के प्रारूप में शपथ लेकर हस्ताक्षर करने होते हैं।
- अनुच्छेद 220 के तहत सेवानिवृत्त न्यायाधीश उसी उच्च न्यायालय या उसके अधीनस्थ न्यायालयों में वकालत नहीं कर सकता (हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय या अन्य उच्च न्यायालयों में कर सकता है), और न ही सरकार के अधीन कोई लाभ का पद स्वीकार कर सकता है।
- अनुच्छेद 221 के तहत न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते संविधान में तय हैं, जिन्हें संसद समय-समय पर संशोधित कर सकती है, पर इन पर राज्य विधायिका में मतदान नहीं हो सकता; वर्तमान में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को मासिक 2,50,000 रुपये तथा अन्य न्यायाधीशों को 2,25,000 रुपये वेतन मिलता है।
⚡कॉलेजियम बनाम NJAC
- संसद ने कॉलेजियम प्रणाली को हटाकर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाने हेतु 99वाँ संविधान संशोधन पारित किया, संविधान में अनुच्छेद 124A जोड़ा और 13 अप्रैल 2015 से NJAC अधिनियम भी लागू कर दिया।
- लेकिन 16 अक्टूबर 2015 को सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने इस संशोधन को रद्द कर NJAC के गठन को निरस्त कर दिया, जिससे सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ आज भी पहले की तरह कॉलेजियम प्रणाली से ही होती हैं।
🏛️राज्यपाल के कार्यवाहक की भूमिका
- यदि राज्य में राज्यपाल का पद अचानक रिक्त हो जाए या राज्यपाल किसी कारण अपने कर्तव्यों का निर्वहन न कर पाएं, तो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश (उनके न होने पर सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश) कार्यवाहक राज्यपाल के रूप में कार्य करता है।
उच्च न्यायालय की शक्तियाँ व क्षेत्राधिकार
उच्च न्यायालय के पास किस तरह के मामलों की सुनवाई की शक्ति है -- मूल क्षेत्राधिकार से लेकर रिट व अभिलेख न्यायालय की भूमिका तक।
🔍प्रारंभिक (मूल) क्षेत्राधिकार
- अनुच्छेद 225 के तहत पूर्व प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों -- बॉम्बे, कलकत्ता व मद्रास -- को प्रारंभिक व अपीलीय दोनों क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं, जबकि अधिकांश अन्य उच्च न्यायालयों को केवल चुनिंदा मामलों में प्रारंभिक क्षेत्राधिकार और शेष में अपीलीय क्षेत्राधिकार मिलता है।
- चूँकि प्रारंभिक क्षेत्राधिकार वाले मामलों की सुनवाई केवल सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय ही कर सकते हैं, पीड़ित पक्ष सीधे उच्च न्यायालय पहुँच सकता है -- जैसे मूल अधिकारों के उल्लंघन (अनुच्छेद 226), संसद/विधानसभा सदस्यों के निर्वाचन विवाद, या राजस्व-संग्रहण से जुड़े मामले।
🔁अपीलीय क्षेत्राधिकार
- अपीलीय क्षेत्राधिकार के तहत हर उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों तथा अपने ही पूर्व फैसलों के विरुद्ध सिविल व आपराधिक -- दोनों प्रकार के मामलों में अपील सुनने का अधिकार है।
📋रिट क्षेत्राधिकार
- अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को -- सर्वोच्च न्यायालय के विपरीत -- मूल अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ अन्य उद्देश्यों के लिए भी रिट जारी करने की शक्ति मिली है, जिसके तहत 5 प्रकार की रिट जारी की जा सकती हैं।
- परमादेश (Mandamus) किसी लोक अधिकारी को अपने कर्तव्य के पालन हेतु आदेश देती है, और अधीनस्थ न्यायालय या निगम के अधिकारी के विरुद्ध भी जारी हो सकती है; बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) गैरकानूनी हिरासत में रखे व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करवाकर दैहिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) की रक्षा करती है।
- प्रतिषेध (Prohibition) अधीनस्थ न्यायालय को अपनी अधिकारिता से बाहर काम न करने का आदेश देती है; उत्प्रेषण लेख (Certiorari) लंबित मुकदमे को उच्चतर न्यायालय में स्थानांतरित करवाकर उसके अभिलेखों की समीक्षा कराती है; अधिकार पृच्छा (Quo Warranto) किसी अवैध रूप से पद पर बैठे व्यक्ति को हटाने के लिए जारी होती है।
🗄️अभिलेख न्यायालय व अवमानना शक्ति
- अनुच्छेद 215 के तहत हर उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय (Court of Records) है -- इसके फैसले व कार्यवाही सभी अधीनस्थ न्यायालयों में साक्ष्य माने जाते हैं, इन पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, और उसे अपनी अवमानना पर दंड देने की शक्ति भी है।
🎛️अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण
- अनुच्छेद 235 के तहत उच्च न्यायालय को अपने अधीन जिला व अन्य अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण-निरीक्षण तथा न्यायिक सेवा के अधिकारियों की पोस्टिंग, तबादले, पदोन्नति व अवकाश स्वीकृति जैसी शक्तियाँ मिली हैं।
- अनुच्छेद 233 के अनुसार जिला न्यायाधीश की नियुक्ति के समय राज्यपाल को संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श लेना अनिवार्य है; प्रशासनिक अधीक्षण का दायित्व मुख्य न्यायाधीश के निर्देशन में उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार पर होता है (अनुच्छेद 227)।
राजस्थान उच्च न्यायालय — इतिहास व स्थापना
एकीकरण से पहले बिखरी हुई कई रियासती अदालतों से लेकर आज के एकीकृत राजस्थान उच्च न्यायालय तक -- जोधपुर व जयपुर पीठों की दिलचस्प यात्रा।
🗺️गठन की पृष्ठभूमि
- राजस्थान के एकीकरण से पहले जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा व उदयपुर रियासतों में अपने-अपने स्वतंत्र उच्च व अधीनस्थ न्यायालय काम करते थे।
- राजधानी व उच्च न्यायालय के स्थान पर सुझाव देने हेतु 30 मार्च 1949 को भारत सरकार ने पेप्सू राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव श्री बी.आर. पटेल की अध्यक्षता में लेफ्टिनेंट कर्नल टी.सी. पुरी व श्री एस.पी. सिन्हा की तीन-सदस्यीय समिति बनाई; समिति ने 27 मार्च 1949 को अपनी रिपोर्ट में जयपुर को राजधानी तथा जोधपुर को उच्च न्यायालय की सीट के रूप में सुझाया।
- उस समय राज्य में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर व अलवर में उच्च न्यायालय काम कर रहे थे, जिनमें कुल 20 न्यायाधीश थे।
🎉स्थापना व उद्घाटन
- मार्च 1949 में राजस्थान उच्च न्यायालय अध्यादेश, 1949 के जरिए इन सभी अलग-अलग उच्च न्यायालयों को समाप्त कर पूरे राज्य के लिए एक ही उच्च न्यायालय बनाया गया, जिसकी प्रधान पीठ जोधपुर में रखी गई।
- राजप्रमुख ने 25 अगस्त 1949 के आदेश से 29 अगस्त 1949 को जोधपुर में उच्च न्यायालय का उद्घाटन तथा जयपुर व उदयपुर में इसकी खण्डपीठें (बेंच) स्थापित करने की घोषणा की; उद्घाटन समारोह में राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय ने कमलकान्त वर्मा (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद व उदयपुर) को पहले मुख्य न्यायाधीश तथा 11 अन्य न्यायाधीशों को शपथ दिलाई।
👥प्रथम न्यायाधीश मंडल
- प्रथम मुख्य न्यायाधीश कमलकान्त वर्मा के साथ शुरुआती न्यायाधीशों में जयपुर से कँवर लाल बाफना व मोहम्मद इब्राहिम, जोधपुर से लाला नवल किशोर व कुँवर अमर सिंह जसोल, उदयपुर से जवान सिंह राणावत व शार्दुल सिंह मेहता शामिल थे।
- शेष सदस्यों में बूँदी से दुर्गाशंकर दवे, बीकानेर से त्रिलोचन दत्त, अलवर से आनंद नारायण कौल, भरतपुर से के.के. शर्मा तथा कोटा से खेमचंद गुप्ता शामिल थे -- इस तरह हर बड़ी रियासत का प्रतिनिधित्व नई अदालत में सुनिश्चित किया गया।
🔄बेंचों का उतार-चढ़ाव व नियम 1952
- 3 सितम्बर 1949 को राजप्रमुख ने पहले के आदेश में संशोधन कर कोटा व बीकानेर में भी उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित करने का आदेश दिया।
- 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर राजस्थान 'बी' श्रेणी राज्य बना, तब न्यायाधीशों की संख्या घटाकर 7 कर दी गई और नई योग्यता शर्तें लागू हुईं, जिसके चलते मुख्य न्यायाधीश कमलकान्त वर्मा व कुछ अन्य न्यायाधीशों को इस्तीफा देना पड़ा; रिक्त पदों पर राष्ट्रपति ने प्रसिद्ध वकील इंद्रनाथ मोदी व डी.एम. भण्डारी को नियुक्त किया।
- 8 मई 1950 की अधिसूचना से उदयपुर, कोटा व बीकानेर की बेंचें 22 मई 1950 से समाप्त कर दी गईं; 1952 में अध्यादेश की धारा 46 व अनुच्छेद 225 के तहत 'Rules of the High Court of Rajasthan, 1952' बनाए गए, जो 1 अक्टूबर 1952 से लागू हुए।
🏗️जयपुर बेंच — विलोपन व पुनर्स्थापना
- राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद केन्द्र सरकार ने राजधानी व उच्च न्यायालय की स्थिति पर सुझाव हेतु जुलाई 1957 में पी. सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में समिति (सदस्य: बी.के. गुप्ता व वी. विश्वनाथन) बनाई; इसने 26 फरवरी 1958 की रिपोर्ट में जयपुर को राजधानी व जोधपुर को उच्च न्यायालय की सीट बनाए रखने की सलाह देते हुए जयपुर बेंच समाप्त करने की सिफारिश की, जो उसी वर्ष लागू हुई।
- जयपुर बेंच के समाप्त होने से जयपुर व पूर्वी राजस्थान में गहरा असंतोष फैला, जिसे शांत करने हेतु राष्ट्रपति ने 8 दिसम्बर 1976 को जयपुर में स्थायी बेंच बहाल करने का आदेश दिया; यह स्थायी बेंच 31 जनवरी 1977 से कार्य करने लगी।
- आज जयपुर बेंच का क्षेत्राधिकार जयपुर, अजमेर, ब्यावर, कोटपूतली-बहरोड़, डीग, खैरथल-तिजारा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बूँदी, झालावाड़, बारां, झुंझुनूँ, सवाई माधोपुर, टोंक, करौली, सीकर व दौसा -- कुल 19 जिलों में फैला है, जबकि शेष 22 जिले जोधपुर की प्रधान पीठ के अधीन आते हैं।
📈न्यायाधीशों की बढ़ती संख्या व उल्लेखनीय तथ्य
- गठन के समय मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 12 न्यायाधीश थे, जिनकी संख्या समय-समय पर बढ़ती गई; केन्द्र सरकार ने हाल ही में स्वीकृत संख्या 40 से बढ़ाकर 50 (मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दी है।
- राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश कमलकान्त वर्मा थे, जबकि न्यायाधीश कैलाशनाथ वांचू मुख्य न्यायाधीश के पद पर सबसे लंबे समय तक रहे।
जिला स्तरीय न्याय व्यवस्था व विधिक संस्थाएँ
जिला स्तर पर आम नागरिक तक न्याय कैसे पहुँचता है -- दीवानी, फौजदारी व राजस्व न्यायालयों की सीढ़ी से लेकर लोक अदालत व विशेष न्यायाधिकरणों तक।
🏢जिला स्तरीय ढाँचा
- संविधान के अनुच्छेद 233 से 237 राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित हैं; जिला न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल उच्च न्यायालय के परामर्श से करते हैं, जबकि उनसे कनिष्ठ न्यायाधीशों की नियुक्ति में उच्च न्यायालय के साथ राज्य लोक सेवा आयोग से भी सलाह ली जाती है।
- जिला स्तर पर सबसे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी जिला एवं सत्र न्यायाधीश होता है; हर जिले में न्याय सुलभ कराने के लिए दीवानी, फौजदारी व राजस्व -- तीन प्रकार के न्यायालय काम करते हैं।
📄दीवानी न्यायालय
- संपत्ति (चल-अचल) से जुड़े विवाद दीवानी विवाद कहलाते हैं; 25,000 रुपये तक मूल्य के मामले कनिष्ठ सिविल न्यायालय (मुंसिफ मजिस्ट्रेट) में, 25,001 से 50,000 रुपये तक वरिष्ठ सिविल न्यायालय में, और 50,001 रुपये या अधिक के मामले सीधे जिला सिविल न्यायालय में दायर होते हैं।
- कनिष्ठ न्यायालय के फैसले के विरुद्ध वरिष्ठ सिविल न्यायालय में तथा वरिष्ठ के विरुद्ध जिला सिविल न्यायालय में अपील होती है -- यह जिला स्तर पर दीवानी मामलों का सर्वोच्च मंच है; इनसे असंतुष्ट पक्ष उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।
- सिविल न्यायालय मुख्यतः उधार वसूली, अचल संपत्ति विवाद, किराए के मकान खाली कराने, इकरारनामे की पालना व गोद लेने जैसे मामले सुलझाते हैं।
🚨फौजदारी न्यायालय
- चोरी, मारपीट, शांतिभंग व हत्या जैसे मामले फौजदारी विवाद कहलाते हैं; सामान्य मामले न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग के यहाँ, गंभीर मामले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष तथा हत्या जैसे अति-गंभीर मामले सीधे जिला सत्र न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत होते हैं।
- कोई भी फौजदारी मामला थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने से शुरू होता है; पुलिस जाँच व सबूत जुटाने के बाद लोक अभियोजक न्यायालय में चालान प्रस्तुत करता है, और न्यायालय दोनों पक्षों को सुनकर सजा, जुर्माना या दोनों दे सकता है, या आरोप सिद्ध न होने पर आरोपी को बरी कर सकता है।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट के फैसले के विरुद्ध मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट में, और सत्र न्यायालय के फैसले के विरुद्ध क्रमशः उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में अपील होती है।
🌾राजस्व न्यायालय
- कृषि भूमि से जुड़े विवाद -- उत्तराधिकार, नामान्तरण, खातेदारी, लगान -- क्षेत्राधिकार के अनुसार नायब तहसीलदार, तहसीलदार या सहायक कलेक्टर के समक्ष दायर होते हैं।
- तहसीलदार के फैसले की अपील सहायक कलेक्टर/उपखण्ड अधिकारी के यहाँ होती है, फिर जिला कलेक्टर अंतिम निर्णय देता है; इससे आगे संभागीय आयुक्त, राजस्व अपीलीय अधिकारी, राजस्व मण्डल अजमेर व अंततः उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
📊राजस्व मण्डल, अजमेर
- राजस्व मामलों के शीर्ष न्यायालय के रूप में राजस्व मण्डल की स्थापना 1 नवम्बर 1949 को राजप्रमुख के अध्यादेश से हुई; 1956 में इसे राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 के तहत नई वैधानिक नींव मिली।
- यह मुख्यालय अजमेर से तथा एक सर्किट बेंच जयपुर से काम करता है, इसे अपील, पुनर्विचार व रैफरेंस -- तीनों अधिकार प्राप्त हैं; इसके प्रथम अध्यक्ष बृजचन्द्र शर्मा थे और वर्तमान में अध्यक्ष मुख्य सचिव स्तर का आईएएस अधिकारी होता है, जिनकी सहायता के लिए 20 सदस्य होते हैं।
- न्यायिक कार्य के अलावा राजस्व मण्डल भू-अभिलेख व राजस्व-ग्राम घोषणा जैसे प्रशासनिक कार्य भी करता है, और हर पाँचवें वर्ष कृषि व पशु गणना भी आयोजित करता है -- 2019 में 20वीं पशु गणना पूरी हुई थी।
🤝लोक अदालत व ग्राम न्यायालय
- बढ़ते लंबित मुकदमों के बीच लोक अदालतें आपसी राजीनामे से त्वरित न्याय देने के लिए बनी हैं; विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 इन्हें वैधानिक मान्यता देता है, इनके फैसलों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- देश की प्रथम लोक अदालत गुजरात में लगी थी, राजस्थान में इनकी शुरुआत सन् 2000 में कोटा से हुई; प्रत्येक जिला मुख्यालय पर स्थायी लोक अदालत (धारा 22बी) शिक्षा, बिजली, पानी, बैंकिंग जैसी लोक-उपयोगी सेवाओं के 1 करोड़ रुपये तक के विवाद सुनती है, जबकि राष्ट्रीय लोक अदालत पूरे देश में और मेगा लोक अदालत पूरे राज्य में एक ही दिन आयोजित होती है।
- गाँवों में सस्ता व त्वरित न्याय पहुँचाने हेतु संसद ने ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 पारित किया, जो 2 अक्टूबर 2009 से लागू हुआ; राजस्थान का पहला ग्राम न्यायालय 27 नवम्बर 2010 को जयपुर जिले के बस्सी में शुरू हुआ; उल्लेखनीय है कि देश का पहला पारिवारिक न्यायालय भी जयपुर में ही स्थापित हुआ था।
⚡विशेष न्यायालय व अधिकरण
- लंबित मुकदमों के त्वरित निपटारे हेतु वर्ष 2000 में फास्ट ट्रैक न्यायालय शुरू किए गए; लैंगिक अपराधों से बालकों के संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के तहत बच्चों से जुड़े अपराधों की शीघ्र सुनवाई के लिए पॉक्सो न्यायालय बने, राजस्थान में इनकी स्थापना अगस्त 2018 में हुई।
- राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण 1 जुलाई 1976 को बना (जोधपुर चलपीठ 1996 में जुड़ी), जिसके आदेशों को केवल उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है; केन्द्रीय प्रशासनिक अपीलीय न्यायाधिकरण (CAT) जयपुर व जोधपुर में केन्द्रीय कर्मचारियों के विवाद सुलझाता है।
- राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SALSA) की स्थापना 7 अप्रैल 1988 को जयपुर में हुई (राष्ट्रीय स्तर पर नई दिल्ली में NALSA है); राजस्थान कर बोर्ड 1 अक्टूबर 1995 को अजमेर में (जयपुर में भी एक बेंच के साथ) वैट/जीएसटी विवादों के शीघ्र निपटारे हेतु बना।