पंचायतीराज संस्थाएँ एवं शहरी स्थानीय स्वशासन
Panchayati Raj & Urban Local Self-Government
गाँव की ग्राम सभा से लेकर शहर के नगर निगम तक - जानिए कैसे 73वें व 74वें संविधान संशोधन ने राजस्थान के स्थानीय स्वशासन को उसका आधुनिक, निर्वाचित स्वरूप दिया।
पंचायती राज की नींव और यात्रा
गाँव के स्वशासन की यह परंपरा वेदों के जमाने से चली आ रही है और महात्मा गांधी के सपनों से होते हुए आधुनिक संवैधानिक ढाँचे तक पहुँची है।
🏺प्राचीन व औपनिवेशिक जड़ें
- प्राचीन भारत में गाँव के प्रशासन की सबसे छोटी इकाई का मुखिया 'ग्रामणी' कहलाता था, जबकि ऋग्वेद में 'समिति' नामक राजनीतिक संस्था का उल्लेख मिलता है।
- बौद्धकाल में गाँव का मुखिया 'ग्रामयोजक' कहलाता था जिसे ग्रामसभा चुनती थी, और मौर्यकाल में यही जिम्मेदारी 'ग्रामिक' नामक अधिकारी निभाता था; दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य में पंचायतों को 'ऊर' कहा जाता था और साहित्यिक स्रोतों में ग्राम पंचायत का सबसे पहला उल्लेख वहीं मिलता है।
- आधुनिक भारत में स्थानीय स्वशासन की नींव गवर्नर जनरल लॉर्ड रिपन (1880-1884) ने 1882 में जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत व न्याय पंचायत का प्रस्ताव पारित कर रखी, इसीलिए उन्हें 'आधुनिक भारत में स्थानीय स्वशासन का पिता' कहा जाता है और उनकी योजना को 'स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा' का दर्जा मिला।
- 1919 के मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने स्थानीय स्वशासन को पहली बार वैधानिक स्वरूप प्रदान किया।
🕊️गांधीजी व बलवंतराय मेहता समिति
- महात्मा गांधी ने 'ग्राम स्वराज्य' की कल्पना की और अपनी पुस्तक 'माई पिक्चर ऑफ फ्री इंडिया' में ग्राम पंचायतों को गाँवों के सर्वांगीण विकास का सबसे कारगर माध्यम बताया; उनकी इस सोच के अनुरूप संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 40 के तहत पंचायतों की स्थापना का निर्देश जोड़ा गया।
- जनसहभागिता व सत्ता के लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण पर सलाह देने के लिए जनवरी 1957 में बलवंतराय मेहता समिति बनाई गई, जिसने 24 नवंबर 1957 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अपनाने की सिफारिश की।
🎉राष्ट्रीय शुभारंभ व राजस्थान में शुरुआत
- बलवंतराय मेहता समिति की सिफारिशों पर अमल करते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से देश में पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ किया; उस समय राज्य के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के प्रबल समर्थक थे, और नौ दिन बाद 11 अक्टूबर 1959 को आंध्रप्रदेश में भी यह व्यवस्था लागू हो गई।
- राजस्थान में इससे पहले ही राजस्थान पंचायत अधिनियम, 1953 के तहत ग्राम पंचायतें बन चुकी थीं और फरवरी 1954 में उनके पहले चुनाव हो चुके थे; बीकानेर रियासत ने तो स्वतंत्रता से भी पहले, 1928 में ही, ग्राम पंचायत अधिनियम पारित कर पंचायतों को वैधानिक दर्जा दे दिया था, और जोधपुर, भरतपुर, सिरोही, उदयपुर व करौली रियासतों ने भी अपने-अपने कानून बनाए।
- बलवंतराय मेहता समिति की त्रिस्तरीय सिफारिशों को अमल में लाने के लिए राजस्थान विधानसभा ने राजस्थान पंचायत समिति एवं जिला परिषद अधिनियम, 1959 पारित किया, जिसके तहत राज्य में पंचायत समितियों व जिला परिषदों के चुनाव 1959-60 में हुए।
🧭पंचायती राज सुधार हेतु गठित समितियाँ
- केंद्र सरकार ने समय-समय पर कई समितियाँ बनाईं - 1961 में ईश्वरन समिति, 1963 में आर.आर. दिवाकर के नेतृत्व में ग्रामसभा अध्ययन दल और के. संथानम की वित्त-सिफारिश समिति, तथा 1966 में ए.पी. जैन समिति।
- जनता पार्टी सरकार ने 1977 में अशोक मेहता समिति बनाई जिसने जिला व मंडल स्तर पर द्वि-स्तरीय ढाँचे का सुझाव दिया, जबकि 1985 की जी.वी.के. राव समिति ने जिला परिषद को विकेन्द्रीकरण में केंद्रीय भूमिका देने और ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय शक्तियाँ देने की वकालत की।
- 1986 की एल.एम. सिंघवी समिति ने पंचायतों को शासन के तीसरे स्तर के रूप में संवैधानिक मान्यता देने का सुझाव दिया, और 1988 की पी.के. थुंगन समिति ने भी यही सिफारिश दोहराई; इन्हीं सुझावों के आधार पर राजीव गांधी सरकार का 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास होकर भी राज्यसभा में अटक गया था।
- राजस्थान में भी पंचायती राज को सुधारने के लिए 1963 में हरिश्चन्द्र शर्मा समिति व सादिक अली अध्ययन दल, 1973 में गिरधारीलाल व्यास समिति, 1990 में हरलाल सिंह खर्रा समिति तथा 2009 में गुलाबचंद कटारिया समिति बनाई गई।
73वाँ संविधान संशोधन और पंचायती राज ढाँचा
1992 के इस संशोधन ने सदियों पुरानी पंचायत परंपरा को संविधान के भीतर एक स्थायी, निर्वाचित तीसरे स्तर की सरकार में बदल दिया।
🖋️संशोधन की पृष्ठभूमि व पारण
- पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने 16 सितंबर 1991 को पंचायती राज संबंधी संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया, जिसकी जाँच के लिए बनी संयुक्त प्रवर समिति के अध्यक्ष राजस्थान के सांसद नाथूराम मिर्धा थे।
- समिति की सिफारिशों के आधार पर संशोधित विधेयक 22 दिसंबर 1992 को लोकसभा से और अगले दिन राज्यसभा से पारित हुआ; 17 राज्यों के अनुमोदन के बाद राष्ट्रपति ने 20 अप्रैल 1993 को इसे स्वीकृति दी और यह 24 अप्रैल 1993 से देशभर में लागू हो गया (कुछ पहाड़ी व जनजातीय क्षेत्रों को छोड़कर)।
- इस संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 243 से 243ण तक (कुल 16 अनुच्छेद) जोड़कर एक नया भाग IX 'पंचायत' बनाया और साथ ही 11वीं अनुसूची जोड़ी, जिसमें पंचायतों को सौंपे जा सकने वाले 29 विषय सूचीबद्ध हैं - इस तरह पंचायती राज को सरकार के तीसरे स्तर के रूप में संवैधानिक मान्यता मिल गई।
🔺त्रिस्तरीय ढाँचा व ग्राम सभा
- अनुच्छेद 243क के अनुसार हर ग्राम पंचायत क्षेत्र में एक ग्राम सभा होगी, जिसके सदस्य उस क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज सभी लोग होते हैं; अनुच्छेद 243ख हर राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती व जिला स्तर पर त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था अनिवार्य करता है, पर 20 लाख तक की आबादी वाले राज्यों को मध्यवर्ती स्तर से छूट दी गई है।
- मध्यवर्ती स्तर की यह पंचायत अलग-अलग राज्यों में अलग नामों से जानी जाती है - आंध्रप्रदेश में मंडल प्रजा परिषद्, गुजरात व कर्नाटक में तालुका पंचायत तथा राजस्थान, महाराष्ट्र व ओडिशा में पंचायत समिति।
- राजस्थान में यह मध्यवर्ती इकाई पंचायत समिति कहलाती है और ग्राम पंचायत तथा जिला परिषद के बीच की कड़ी का काम करती है, जबकि जिला स्तर की इकाई को जिला परिषद कहा जाता है, जो ग्रामीण जनता को जरूरी सेवाएँ मुहैया कराती है।
🗳️चुनाव, आरक्षण व कार्यकाल
- अनुच्छेद 243ग के तहत ग्राम व मध्यवर्ती स्तर के सभी सदस्य प्रत्यक्ष मतदान से चुने जाते हैं, जबकि जिला पंचायत के सदस्य राज्य विधानमंडल की बनाई विधि के अनुसार निर्वाचित होते हैं; अनुच्छेद 243घ सभी पंचायतों में अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए उनकी आबादी के अनुपात में सीट आरक्षण अनिवार्य करता है।
- मूल प्रावधान में सभी वर्गों में हर पद पर 1/3 (33.33%) स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित थे, जिन्हें चक्रानुक्रम से अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में आवंटित किया जाता है; केंद्र सरकार ने 27 अगस्त 2009 को इसे बढ़ाकर 50% करने की मंजूरी दी, जिसके बाद राजस्थान में भी पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आधे पद आरक्षित हो गए।
- अनुच्छेद 243ङ के अनुसार हर पंचायत का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष का होता है और नए चुनाव इसकी समाप्ति से पहले पूरे कराने जरूरी हैं; किसी संस्था के विघटन पर उसके 6 महीने के भीतर चुनाव होने चाहिए, हालाँकि यदि शेष कार्यकाल 6 महीने से कम बचा हो तो अलग से चुनाव कराने की जरूरत नहीं।
- अनुच्छेद 243च के तहत कोई भी व्यक्ति जो 21 वर्ष की आयु पूरी न कर चुका हो, या राज्य विधानमंडल के चुनाव हेतु प्रचलित किसी कानून से अयोग्य घोषित हो, पंचायत का सदस्य नहीं बन सकता।
⚖️शक्तियाँ, वित्त आयोग व निर्वाचन आयोग
- अनुच्छेद 243छ राज्य विधानमंडल को विधि बनाकर पंचायतों को आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय की योजनाएँ बनाने तथा 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों को क्रियान्वित करने की शक्ति देने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 243ज उन्हें कर, फीस व टोल लगाने-वसूलने तथा राज्य की संचित निधि से अनुदान पाने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 243ट के तहत हर राज्य में एक पृथक राज्य निर्वाचन आयोग बनता है जो पंचायत चुनाव समय पर व निष्पक्ष तरीके से कराता है; राज्यपाल इसके प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करता है, पर उसे कार्यकाल की समाप्ति से पहले केवल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया से यानी संसद में महाभियोग पास कराकर राष्ट्रपति ही हटा सकता है।
- अनुच्छेद 243झ के अनुसार हर राज्य का राज्यपाल हर 5 वर्ष में एक राज्य वित्त आयोग बनाता है जो पंचायतों के वित्तीय संसाधनों को बढ़ाने व राज्य की संचित निधि से अनुदान देने पर सुझाव देकर अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है।
- अनुच्छेद 243यड महानगर क्षेत्रों के लिए महानगर योजना समिति की व्यवस्था करता है, अनुच्छेद 243ठ राष्ट्रपति को अधिसूचना द्वारा संघ शासित क्षेत्रों में यह प्रावधान लागू करने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 243ड इसे अनुसूचित/जनजातीय क्षेत्रों तथा नागालैंड, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर व दार्जिलिंग की पहाड़ियों जैसे कुछ क्षेत्रों में लागू होने से छूट देता है।
राजस्थान में पंचायती राज: संरचना व कार्यप्रणाली
73वें संशोधन को धरातल पर उतारने के लिए राजस्थान ने अपना खुद का विस्तृत कानूनी व प्रशासनिक ढाँचा खड़ा किया, जो आज भी गाँव-गाँव में सक्रिय है।
📘राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994
- 73वें संशोधन को क्रियान्वित करने के लिए राजस्थान विधानसभा ने 9 अप्रैल 1994 को नया 'राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994' पारित किया, जो 23 अप्रैल 1994 से लागू हुआ; उस समय राज्य के मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत और राज्यपाल बलिराम भगत थे।
- इस अधिनियम के साथ संबद्ध 'राजस्थान पंचायती राज नियम, 1996' 30 दिसंबर 1996 से लागू किए गए; राज्य निर्वाचन आयोग का गठन जुलाई 1994 में हुआ और इसने 72वें/73वें संशोधन के तहत राज्य के पहले पंचायती राज चुनाव 1995 में संपन्न कराए।
- अप्रैल 2026 के अंत तक राज्य में 368 पंचायत समितियाँ, 11151 ग्राम पंचायतें व 41 जिला परिषदें कार्यरत थीं; सरकार ने अधिसूचना जारी कर इनकी संख्या बढ़ाकर 457 पंचायत समितियाँ व 14403 ग्राम पंचायतें कर दी है, पर परिसीमन व चुनाव पूरे होने के बाद ही यह नई संरचना अस्तित्व में आएगी।
💺त्रिस्तरीय संस्थाएँ: सदस्य, चुनाव व वेतन
- गाँव स्तर पर ग्राम पंचायत का प्रधान सरपंच कहलाता है (मासिक मानदेय ₹4800), खंड स्तर पर पंचायत समिति का प्रधान (₹8400) और जिला स्तर पर जिला परिषद का जिला प्रमुख (₹12000) कहलाता है; इनकी शपथ क्रमशः मतदान दल के पीठासीन अधिकारी, उपखंड अधिकारी व जिलाधीश दिलाते हैं।
- ग्राम स्तर पर सरपंच का चुनाव सीधे ग्राम सभा के सभी वयस्क मतदाता करते हैं, जबकि खंड व जिला स्तर पर प्रधान व जिला प्रमुख को उनके संबंधित निर्वाचित सदस्य ही अपने में से बहुमत से चुनते हैं; प्रशासनिक कामकाज क्रमशः ग्राम विकास अधिकारी (VDO), खंड विकास अधिकारी (BDO) व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) संभालते हैं।
- न्यूनतम सदस्य संख्या ग्राम स्तर पर 5 पंच (30.10.2019 से लागू), खंड स्तर पर 15 सदस्य व जिला स्तर पर 17 सदस्य निर्धारित है, जो आबादी बढ़ने पर तय अनुपात में बढ़ती जाती है; बैठकें ग्राम पंचायत में हर 15 दिन में, पंचायत समिति में हर माह और जिला परिषद में हर तीन माह में कम से कम एक बार होना अनिवार्य है।
- पदेन सदस्यों के रूप में बेहतर समन्वय हेतु हर सरपंच को पंचायत समिति का और हर प्रधान को जिला परिषद का सदस्य बनाया गया है; तीनों स्तरों पर सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है और उम्मीदवार के घर स्वच्छ, कार्यशील शौचालय का होना भी अनिवार्य शर्त है।
🗣️ग्राम सभा व वार्ड सभा
- किसी ग्राम पंचायत क्षेत्र के सभी पंजीकृत वयस्क मतदाताओं के समूह को ग्राम सभा कहा जाता है, जबकि इसकी सबसे छोटी इकाई वार्ड सभा है, जिसमें केवल उस वार्ड के मतदाता शामिल होते हैं और इसकी अध्यक्षता वार्ड पंच करता है।
- ग्राम सभा की साल में चार निश्चित बैठकें - 26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त व 2 अक्टूबर को - ग्राम पंचायत मुख्यालय पर होती हैं, जबकि वार्ड सभा की कम से कम दो बैठकें (हर 6 माह में एक) जरूरी हैं; दोनों में गणपूर्ति (कोरम) कुल सदस्यों के 10% के बराबर तय है।
- ग्राम सभा वार्ड सभा द्वारा अनुमोदित विकास योजनाओं को मंजूरी देती है, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लाभार्थी चुनती है, कमजोर वर्गों को दिए भूखंडों की सामाजिक संपरीक्षा करती है और मनरेगा के तहत सामाजिक अंकेक्षण समिति का चयन भी करती है।
- पंचायती राज अधिनियम की धारा 8ई वार्ड सभा व ग्राम सभा को पंचायत के कार्यों के सामाजिक अंकेक्षण का अधिकार देती है, और मनरेगा के कार्यों की सामाजिक जाँच भी इसी सभा के जरिए होती है।
⚠️हटाना, निलंबन व अविश्वास प्रस्ताव
- अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कुल निर्वाचित सदस्यों के कम से कम 1/3 के हस्ताक्षर चाहिए और इसे पारित होने के लिए 3/4 बहुमत जरूरी है; यह प्रस्ताव संस्था के गठन के 2 वर्ष पूरे होने से पहले नहीं लाया जा सकता, और एक बार असफल होने पर उसी पदाधिकारी के विरुद्ध अगले 1 वर्ष तक दोबारा प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।
- राज्य सरकार लिखित आदेश व सुनवाई का मौका देकर किसी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य को हटा सकती है, जिसके बाद वह अगले 5 वर्ष तक दोबारा चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है; निलंबन का प्रस्ताव पंच के मामले में सिर्फ वार्ड सभा और सरपंच के मामले में सिर्फ ग्राम सभा की सिफारिश पर ही लाया जा सकता है।
- किसी सदस्य की सदस्यता तब समाप्त मानी जाती है जब वह लगातार तीन बैठकों से बिना पूर्व सूचना अनुपस्थित रहे, या चुनाव के 3 महीने के भीतर शपथ न ले, या धारा 19 में गिनाई गई अयोग्यताओं में से किसी का शिकार हो जाए, त्यागपत्र दे दे या उसका निधन हो जाए।
📊सशक्तीकरण, PESA व सांख्यिकी
- अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती प्रावधान विस्तारित करने वाला 'पेसा' (PESA) अधिनियम, भूरिया समिति की 1995 की रिपोर्ट के आधार पर 24 दिसंबर 1996 को मूल रूप से नौ राज्यों (राजस्थान सहित) में लागू हुआ; तेलंगाना बनने के बाद यह संख्या बढ़कर दस राज्य हो गई।
- 'जिला ग्रामीण विकास अभिकरण' (DRDA) का 2003 में जिला परिषद में विलय कर दिया गया और वर्ष 2000 के संशोधन के बाद जिला परिषद का जिला प्रमुख ही इसका अध्यक्ष बना; अब यह जिला परिषद के ग्रामीण विकास प्रकोष्ठ के रूप में काम करता है, जबकि ई-गवर्नेंस मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने वेब पोर्टल 'ई-ग्राम स्वराज' शुरू किया है।
- पंचायत सशक्तीकरण अभियान की जगह 2018-19 से 'राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान' (60% केंद्रांश व 40% राज्यांश के वित्तपोषण से) चलाया जा रहा है; उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली ग्राम पंचायतों को हर वर्ष 24 अप्रैल (राष्ट्रीय पंचायत दिवस) पर दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण पुरस्कार व ग्राम ऊर्जा स्वराज विशेष पंचायत पुरस्कार जैसे सम्मान दिए जाते हैं।
- जिलेवार आंकड़ों में जयपुर जिले में सर्वाधिक 20 पंचायत समितियाँ और उदयपुर में सर्वाधिक 493 ग्राम पंचायतें हैं, जबकि खैरथल-तिजारा जिले में सबसे कम 4 पंचायत समितियाँ व 152 ग्राम पंचायतें हैं; चूरू जिले के अमरापुरा गाँव को अगस्त 2008 में संयुक्त राष्ट्र ने भारत का पहला 'मिलेनियम विलेज' चुना, वहीं भीलवाड़ा की मांडल ग्राम पंचायत राज्य की पहली ऐसी पंचायत है जहाँ बिजली के तार भूमिगत बिछाए गए।
74वाँ संविधान संशोधन और शहरी स्थानीय निकाय
जिस तरह गाँवों को पंचायतों के जरिए स्वशासन मिला, उसी तरह 1992 के इस संशोधन ने शहरों को नगर पंचायत, नगर परिषद व नगर निगम के रूप में संवैधानिक स्वशासन दिया।
🏺ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व संशोधन
- मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त के दरबार में आए यूनानी दूत मैगस्थनीज ने अपनी पुस्तक 'इण्डिका' में बताया कि पाटलिपुत्र नगर का प्रबंधन छह समितियाँ (हर एक में 5 सदस्य) मिलकर करती थीं और सबसे बड़ा अधिकारी 'नागरिक' कहलाता था; आधुनिक भारत में शहरी स्वशासन की शुरुआत सितंबर 1688 में मद्रास में नगर निगम की स्थापना से मानी जाती है।
- 1935 के भारत सरकार अधिनियम से मिली प्रांतीय स्वायत्तता ने स्थानीय निकायों को मजबूत करने की दिशा में गति दी, और भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में स्थानीय शासन को राज्य सूची का विषय बनाया गया; पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने 1991 में नगरपालिका विधेयक पेश किया जो 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में 22-23 दिसंबर 1992 को दोनों सदनों से पारित हुआ और 1 जून 1993 से लागू हुआ।
- इस संशोधन ने संविधान में नया भाग IXक 'नगरपालिकाएँ' जोड़ा, जिसमें अनुच्छेद 243त से 243यछ तक (243P-243ZG) कुल 18 अनुच्छेद शामिल हैं, और साथ ही 12वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें नगरपालिकाओं द्वारा संभाले जा सकने वाले 18 विषय दिए गए हैं।
🏗️नगर निकायों के प्रकार व संरचना
- 74वें संशोधन ने देशभर में तीन तरह के नगर निकाय बनाए - ग्राम से नगर बनने की संक्रमण अवस्था वाले क्षेत्रों के लिए नगर पंचायत, छोटे-मंझोले शहरों के लिए नगर परिषद और बड़े शहरों के लिए नगर निगम; किसी क्षेत्र को राज्यपाल यदि 'औद्योगिक नगरी' घोषित कर दे तो वहाँ नगरपालिका गठित नहीं होती।
- निकाय की सभी सीटें 'वार्ड' नामक क्षेत्रों से सीधे मतदान द्वारा भरी जाती हैं; तीन लाख या अधिक आबादी वाले निकायों में एक या अधिक वार्डों को मिलाकर वार्ड समितियाँ बनाई जाती हैं, जिनके अध्यक्ष का चुनाव सदस्य वार्ड-प्रतिनिधि आपस में करते हैं।
⚖️आरक्षण, कार्यकाल व शक्तियाँ
- हर निकाय में SC/ST के लिए आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित होती हैं, जिनका एक-तिहाई हिस्सा उन्हीं वर्गों की महिलाओं के लिए होता है; इसके अलावा कुल प्रत्यक्ष निर्वाचित सीटों का कम से कम एक-तिहाई भाग (SC/ST महिलाओं की सीटों सहित) सामान्यतः महिलाओं के लिए आरक्षित रहता है, और सभी आरक्षित सीटें चक्रानुक्रम से बदलती रहती हैं।
- हर नगरपालिका का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष का होता है और उससे पहले सरकार उचित आधार पर उसे भंग भी कर सकती है; विघटन की स्थिति में 6 माह के भीतर चुनाव कराना जरूरी है, और अगर शेष अवधि 6 माह से कम बचे तो अलग चुनाव कराने की जरूरत नहीं।
- अनुच्छेद 243ब राज्य विधानमंडल को कानून बनाकर नगर निकायों को स्वशासन की इकाई के रूप में कार्य करने की शक्तियाँ देने का अधिकार देता है, अनुच्छेद 243भ उन्हें कर लगाने का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 243म वही राज्य वित्त आयोग जो पंचायतों के लिए बना है, नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करने का दायित्व देता है; अनुच्छेद 243यक इनके चुनाव भी उसी राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपता है जो पंचायत चुनाव कराता है।
📋12वीं अनुसूची के 18 कार्य
- 12वीं अनुसूची नगर निकायों को नगरीय योजना, भूमि उपयोग व भवन विनियमन, आर्थिक-सामाजिक विकास योजना तथा सड़कों-पुलों जैसे बुनियादी ढाँचे से जुड़े कार्य सौंपती है, साथ ही घरेलू-औद्योगिक जलप्रदाय, लोक स्वास्थ्य-स्वच्छता-कूड़ा प्रबंधन व अग्निशमन सेवाएँ भी इसी सूची में हैं।
- सूची में नगरीय वानिकी व पर्यावरण संरक्षण, दुर्बल व विकलांग वर्गों के हितों की रक्षा, गंदी बस्तियों का सुधार, नगरीय गरीबी उन्मूलन, पार्क-उद्यान जैसी सुविधाएँ, तथा सांस्कृतिक-शैक्षणिक गतिविधियों का संवर्धन भी शामिल है।
- शेष विषयों में शव-दफन व श्मशान (विद्युत शवदाहगृह सहित), पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने हेतु कांजी हाउस, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, सड़क प्रकाश-पार्किंग-बस स्टॉप जैसी सार्वजनिक सुविधाएँ, तथा वधशालाओं व चर्मशोधनशालाओं का विनियमन शामिल हैं - इस तरह कुल 18 विषय नगर निकायों को सौंपे गए हैं।
राजस्थान में नगरीय स्वशासन
माउंट आबू की सबसे पहली नगरपालिका से लेकर जयपुर-जोधपुर जैसे महानगरों तक, राजस्थान के शहरी निकायों की कहानी डेढ़ सदी से ज्यादा लंबी है।
🕰️ऐतिहासिक विकास
- राजस्थान की पहली नगरपालिका 1864 में माउंट आबू में बनी, इसके बाद अजमेर (1866), ब्यावर (1867) व जयपुर (1869) में नगरपालिकाएँ स्थापित हुईं; स्वतंत्रता के समय राज्य में 7 जिला बोर्ड, उदयपुर में एक नगर निगम व 136 कस्बों में नगरपालिकाएँ काम कर रही थीं।
- एकरूपता लाने के लिए राज्य ने पहले उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 अपनाया, फिर 1951 में अपना राजस्थान नगरपालिका अधिनियम-1951 लागू किया, जिसे 1959 में एक नए 'राजस्थान नगरपालिका अधिनियम-1959' से बदल दिया गया।
- 74वां संविधान संशोधन 1 जून 1993 से देशभर में लागू हुआ; इसकी अनुपालना में राजस्थान में 9 अगस्त 1994 की अधिसूचना के जरिए शहरी स्वशासन संस्थाओं की औपचारिक स्थापना की गई।
🏢निकायों की श्रेणियाँ व वर्तमान संख्या
- 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में नगर निगम बनता है, जिसका अध्यक्ष महापौर (मेयर) और प्रशासनिक अधिकारी आयुक्त कहलाता है; एक से पाँच लाख आबादी वाले शहरों में नगर परिषद बनती है जिसका अध्यक्ष सभापति व अधिशासी अधिकारी (EO) होता है, और एक लाख तक आबादी वाले कस्बों में नगरपालिका होती है।
- अप्रैल 2026 तक राज्य में कुल 309 नगर निकाय थे - 10 नगर निगम (जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर, उदयपुर, भरतपुर, भीलवाड़ा, पाली व अलवर), 51 नगर परिषदें और 248 नगरपालिकाएँ।
- राज्य सरकार ने जयपुर व जोधपुर - अपने दो सबसे बड़े शहरों - को महानगर घोषित कर रखा है; प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद चुना जाता है और सभी निर्वाचित पार्षद मिलकर अध्यक्ष व उपाध्यक्ष चुनते हैं।
🔁चुनाव नियम, राइट टू रिकॉल व योग्यता
- अध्यक्ष का चुनाव 2014 से (वसुंधरा राजे सरकार के प्रावधान अनुसार) निर्वाचित पार्षद अपने में से अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं - दिसंबर 2018 में एक संक्षिप्त अवधि के लिए इसे प्रत्यक्ष चुनाव में बदला गया था, पर बाद में फिर अप्रत्यक्ष प्रणाली बहाल कर दी गई; उपाध्यक्ष का चुनाव हमेशा से पार्षदों द्वारा बहुमत से अपने में से होता आया है।
- 22 मार्च 2011 को राज्य विधानसभा ने नगरपालिका अधिनियम में 'राइट टू रिकॉल' का संशोधन जोड़ा - इसके तहत निकाय प्रमुख को हटाने के लिए पहले 3/4 पार्षदों से अविश्वास प्रस्ताव पास कराना होता है और फिर जनमत संग्रह में बहुमत मिलने पर ही वह पद से हटता है; यह प्रस्ताव पदग्रहण के 2 वर्ष पूरे होने के बाद ही लाया जा सकता है, और उपाध्यक्ष को हटाने के लिए जनमत संग्रह जरूरी नहीं।
- पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने शहरी निकाय चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम 10वीं पास होना अनिवार्य किया था, पर कांग्रेस सरकार ने 11 फरवरी 2019 को इस शर्त को हटा दिया - अब पार्षद या अध्यक्ष पद के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता आवश्यक नहीं है, बस उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और उस क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज होना जरूरी है।
🏗️नगर विकास न्यास व विकास प्राधिकरण
- शहरों के सुनियोजित विकास के लिए राज्य में 12 नगर विकास न्यास (UIT) काम करते हैं - अलवर, भीलवाड़ा, श्रीगंगानगर, माउंट आबू, जैसलमेर, पाली, सीकर, बाड़मेर, बालोतरा, चित्तौड़गढ़, दौसा-बांदीकुई व सवाई माधोपुर में; इनका अध्यक्ष राज्य सरकार मनोनीत करती है और इनका काम नई बस्तियाँ बसाना, वहाँ सड़क-बिजली-पानी पहुँचाना तथा पार्क व उपवन विकसित करना है।
- बड़े शहरों के लिए अलग विकास प्राधिकरण बनाए गए - जयपुर विकास प्राधिकरण (1982), जोधपुर विकास प्राधिकरण (30 अगस्त 2008), अजमेर विकास प्राधिकरण (अजमेर नगर विकास न्यास को क्रमोन्नत कर 25 सितंबर 2013 को), उदयपुर व कोटा (दोनों 2023) तथा बीकानेर व भरतपुर - इस तरह राज्य में अब कुल 7 विकास प्राधिकरण हैं।
- अजमेर की नसीराबाद छावनी राज्य की एकमात्र सैनिक छावनी है जहाँ रक्षा मंत्रालय के अधीन एक छावनी मंडल (Cantonment Board) काम करता है, जिसका अध्यक्ष सेना का स्टेशन कमांडिंग ऑफिसर होता है; इसके साथ ही नसीराबाद के शहरी हिस्से के लिए एक अलग नगरपालिका भी बनी हुई है।
- भिवाड़ी में नगर सुधार न्यास की जगह 17 फरवरी 2018 को भिवाड़ी इंटिग्रेटेड डेवलपमेंट अथॉरिटी (BIDA) का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय भिवाड़ी में ही है।
🗓️निर्वाचन इतिहास व अन्य तथ्य
- नगर निकायों के 14वें चुनाव 2019-20 में चरणबद्ध ढंग से हुए - पहले 49 निकायों में नवंबर 2019, फिर 50 निकायों में नवंबर-दिसंबर 2020 और शेष 90 निकायों में जनवरी-फरवरी 2021 में मतदान हुआ; 15वें चुनाव 2025 में प्रस्तावित थे पर परिसीमन पूरा न होने से टाल दिए गए और सभी निकायों में सरकार ने प्रशासक नियुक्त कर दिए।
- राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के 11वें चुनाव 2020-21 में हुए, जबकि 12वें चुनाव 2025-26 के लिए प्रस्तावित थे परंतु स्थगित होकर अब 2026 की अंतिम तिमाही में होने की संभावना है; 73वें संशोधन के बाद से ये चुनाव क्रमशः 1995, 2000, 2005, 2010, 2015 व 2020-21 में हुए हैं।
- बिहार देश का पहला राज्य था जिसने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया; राजस्थान में यह वृद्धि राज्यपाल के 11 अप्रैल 2008 के अध्यादेश से हुई, जिसे विधानसभा ने 25 जून 2008 को कानूनी रूप दिया।
- जयपुर में 25 मार्च 1989 को बना इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान 1999 में राज्य ग्रामीण विकास संस्थान से मिलकर 'इंदिरा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान' बना, जो जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को प्रशिक्षण देता है; इसी तरह 2019 से ग्राम स्तर के 'अटल सेवा केन्द्र' का नाम बदलकर 'राजीव गांधी सेवा केन्द्र' कर दिया गया।