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राजस्थान GK

राजस्थान लोक सेवा आयोग व अन्य आयोग/लोकायुक्त

RPSC, Election/HR/Information Commissions, Lokayukta, Finance & Women's Commissions

RPSC की स्थापना से लेकर निर्वाचन, मानवाधिकार, सूचना, वित्त व महिला आयोगों तथा लोकायुक्त तक - राजस्थान के सभी प्रमुख संवैधानिक व सांविधिक निगरानी निकायों की पूरी तस्वीर एक ही जगह।

38 टॉपिक48 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC)

Rajasthan Public Service Commission (RPSC)

1949 के एक राजकीय अध्यादेश से लेकर आज के 11-सदस्यीय निकाय तक, RPSC राजस्थान का संवैधानिक भर्ती प्राधिकरण है - हर राज्य सरकारी नियुक्ति के पीछे मेरिट प्रणाली का प्रहरी।

🏰स्थापना की पृष्ठभूमि

  • हर स्तर की सरकार को अपना कामकाज ठीक से चलाने के लिए पर्याप्त योग्य लोक सेवकों की जरूरत होती है, इसीलिए भर्ती-पदोन्नति जैसे विषयों पर सलाह देने के लिए लोक सेवा आयोग बनाए गए; संविधान के भाग 14 (अनुच्छेद 315-323) में संघ व राज्य आयोगों से जुड़े ये नियम दिए गए हैं।
  • स्वतंत्रता से पहले केवल जोधपुर, जयपुर और बीकानेर रियासतों की अपनी सिविल सेवाएँ व आयोग थे, जो क्रमशः 1939, 1940 और 1946 में शुरू हुए थे; राजस्थान के एकीकरण के बाद नई राज्य सरकार ने इन सभी रियासती आयोगों को भंग कर दिया।
  • 16 अगस्त 1949 को राजप्रमुख के अध्यादेश (20 अगस्त को अधिसूचित) से एकीकृत राजस्थान लोक सेवा आयोग बनाने का प्रावधान हुआ; इसके पहले अध्यक्ष व सदस्यों की अधिसूचना 22 दिसंबर 1949 को जारी हुई, जिसमें सर एस.के. घोष संस्थापक अध्यक्ष बने।
  • 28 जुलाई 1950 को एस.सी. त्रिपाठी (IAS) अध्यक्ष तथा देवीशंकर त्रिपाठी व एन.आर. चंडोरकर सदस्य नियुक्त हुए; इसके बाद श्रीमती कांता कथूरिया RPSC की पहली महिला सदस्य बनीं, उनके बाद कमला भील व प्रकाशवती शर्मा का स्थान रहा।

📜संवैधानिक ढाँचा (अनुच्छेद 315-323)

  • अनुच्छेद 315(1) हर राज्य (और संघ) के लिए एक-एक PSC का प्रावधान करता है, जबकि 315(2) के तहत दो या अधिक राज्य संसद से उनके लिए संयुक्त आयोग बनाने का अनुरोध कर सकते हैं; अनुच्छेद 316 नियुक्ति-कार्यकाल तथा 317 बर्खास्तगी-निलंबन से जुड़ा है।
  • अनुच्छेद 318 राज्यपाल को आयोग की कर्मचारी संख्या व सेवा शर्तें तय करने की शक्ति देता है, अनुच्छेद 319 पद छोड़ने के बाद पूर्व अध्यक्ष/सदस्य पर प्रतिबंध लगाता है, और अनुच्छेद 320-321 आयोग के कर्तव्यों तथा उनके विस्तार से जुड़े हैं।
  • अनुच्छेद 322 आयोग के समस्त व्यय को संचित निधि (UPSC के लिए भारत की, राज्य PSC के लिए संबंधित राज्य की) पर भारित करता है, और अनुच्छेद 323 राज्यपाल को वार्षिक रिपोर्ट देने तथा उसे विधानमंडल के समक्ष रखने की अनिवार्यता तय करता है।

📈समय के साथ सदस्य संख्या में वृद्धि

  • 1951 में RPSC के कामकाज को नियंत्रित करने वाले दो नियम बने - सेवा शर्तें नियम और कार्यों की सीमा नियम; 1956 में राज्य पुनर्गठन के बाद सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर आयोग को अजमेर स्थानांतरित किया गया।
  • सदस्य संख्या लगातार बढ़ती गई: 1968 में दो से तीन, 1973 में चार, 1981 में पाँच, 2011 में सात (अध्यक्ष सहित कुल आठ), और जुलाई 2025 के मंत्रिमंडल निर्णय से दस सदस्य - यानी अध्यक्ष सहित कुल संख्या ग्यारह हो गई।

🎯मूल दायित्व व सलाहकारी भूमिका

  • RPSC का मूल काम राज्य प्रशासन के लिए योग्य अधिकारी-कर्मचारी चुनना, उनकी पदोन्नति देखना और सेवा शर्तों पर सरकार को सलाह देना है; संविधान इसे मेरिट प्रणाली के 'वॉच डॉग' के रूप में देखता है, जिसका सरोकार केवल भर्ती व सलाह से है, वेतन-प्रशिक्षण-वर्गीकरण से नहीं।
  • आयोग के सुझाव सलाहकारी हैं, बाध्यकारी नहीं - सरकार उन्हें मानने या ठुकराने के लिए स्वतंत्र है, पर उसे विधानमंडल को अस्वीकृति का कारण बताना होता है, और वह आयोग की सलाह लेने के तरीके को नियंत्रित करने वाले नियम भी बना सकती है।

👤नियुक्ति, कार्यकाल व हटाया जाना (अनुच्छेद 316-317)

  • राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर अध्यक्ष व सदस्यों को नियुक्त करते हैं; परंपरा के अनुसार वरिष्ठतम सदस्य अध्यक्ष बनता है, पर राज्यपाल किसी को भी चुन सकते हैं, और जहाँ संभव हो आधे सदस्यों को कम से कम दस वर्ष का सरकारी सेवा अनुभव होना जरूरी है।
  • सदस्य छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक पद पर रहते हैं (UPSC में यह आयु 65 वर्ष है); कोई सदस्य उसी पद पर दोबारा नियुक्त नहीं हो सकता पर बाद में अध्यक्ष बन सकता है, और दोनों राज्यपाल को हस्ताक्षरित पत्र देकर त्यागपत्र दे सकते हैं।
  • हटाए जाने के लिए अनुच्छेद 145 के तहत उच्चतम न्यायालय की जाँच में सिद्ध कदाचार जरूरी है; जाँच के दौरान राज्यपाल आरोपी को निलंबित कर सकते हैं, और राष्ट्रपति दिवालिया होने, अन्य सवेतन कार्य करने या मानसिक-शारीरिक दुर्बलता पर भी किसी को हटा सकते हैं।

💰सेवा शर्तें, सेवानिवृत्ति के बाद प्रतिबंध व व्यय

  • राज्यपाल सदस्यों की सेवा शर्तें तय करते हैं, जिन्हें नियुक्ति के बाद उनके लिए नुकसानदायक तरीके से नहीं बदला जा सकता; कार्यकाल खत्म होने पर अध्यक्ष व सदस्य उसी आयोग में सेवा विस्तार या किसी अन्य केंद्रीय/राज्य पद पर नहीं जा सकते।
  • फिर भी पूर्व अध्यक्ष UPSC या किसी अन्य राज्य के आयोग का अध्यक्ष/सदस्य बन सकता है, और पूर्व सदस्य उसी या अन्य राज्य के आयोग का अध्यक्ष या UPSC सदस्य बन सकता है; RPSC का समस्त व्यय राजस्थान की संचित निधि पर भारित होता है।

🗂️सचिवालय व छह-अंगीय संरचना

  • आयोग का सचिव - या तो IAS अधिकारी या आंतरिक रूप से पदोन्नत व्यक्ति, राज्यपाल की मंजूरी से नियुक्त - इसका व्यावहारिक कार्यपालक प्रमुख होता है; सचिव के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई केवल अध्यक्ष कर सकते हैं, और उसका सामान्य पाँच वर्ष का कार्यकाल व्यवहार में शायद ही लागू होता है।
  • आयोग का कामकाज छह भागों में बँटा है: प्रशासनिक (संस्थापन व निरीक्षण), भर्ती (परीक्षा आवेदन, रिकॉर्ड, साक्षात्कार, विभागीय पदोन्नति), परीक्षा, लेखा, विधि, तथा शोध (जो वार्षिक रिपोर्ट भी तैयार करता है)।

📋कार्य एवं कर्तव्य (अनुच्छेद 320, 323)

  • अनुच्छेद 320 के तहत आयोग परीक्षाओं के जरिए सभी राज्य सेवाओं के रिक्त-नवसृजित पदों पर भर्ती करता है, और सरकार को हर पदोन्नति से पहले उससे सलाह लेनी होती है (320(3)); विभागीय पदोन्नति समितियाँ, जिनमें एक RPSC सदस्य शामिल होता है, आमतौर पर जयपुर के शासन सचिवालय में मिलती हैं।
  • आयोग अनुशासनात्मक कार्रवाई, सेवाओं के बीच स्थानांतरण, पदस्थापन व मुकदमेबाजी खर्च पर भी सलाह देता है; अनुच्छेद 323 के तहत वह राज्यपाल को वार्षिक रिपोर्ट भेजता है, जिसे न मानी गई सलाह के कारण बताने वाले ज्ञापन सहित विधानमंडल के सामने रखा जाता है।

🏅अध्यक्षों की तालिका

  • सर एस.के. घोष संस्थापक अध्यक्ष थे (22.12.1949-25.1.1950), जबकि डी.एस. तिवारी (8.8.1951-17.1.1958) सबसे लंबे कार्यकाल वाले RPSC अध्यक्ष रहे हैं।
  • संजय कुमार श्रोत्रिय (38वें, 1 अगस्त 2024 तक) और कार्यवाहक कैलाश चंद मीणा (39वें) के बाद उत्कल रंजन साहू ने 12 जून 2025 को अध्यक्ष पद संभाला; कार्यवाहकों को गिनने पर वे 40वें कहलाते हैं, पर उन्हें हटाकर गिनने पर वास्तव में 32वें अध्यक्ष हैं।

🎓UPSC, अखिल भारतीय सेवाएँ व प्रशिक्षण संस्थान

  • 1923 में 'ली कमीशन' ने सबसे पहले संघ लोक सेवा आयोग बनाने की सिफारिश की थी; UPSC IAS, IPS व IFS अधिकारियों का चयन करता है, इसके बाद केंद्र उन्हें राज्य कैडर देकर पदस्थ करता है, जबकि स्थानांतरण, गोपनीय रिपोर्ट व वेतन संबंधित राज्य देखता है।
  • जयपुर स्थित HCMRIPA, राज्य की शीर्ष सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्था, 1957 में जोधपुर में शुरू हुई, 1963 में जयपुर आई, 1969 में प्रशासक-सांसद हरिश्चन्द्र माथुर के नाम पर हुई और अर्धवार्षिक पत्रिका 'प्रशासनिका' निकालती है; राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण भी जयपुर में ही है।
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राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग

Rajasthan State Election Commission

73वें/74वें संविधान संशोधनों से जन्मा यह एक-सदस्यीय निकाय 1994 से राज्य के हर पंचायत व नगर निकाय चुनाव कराता आ रहा है, और इसे हटाना लगभग उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जितना ही कठिन है।

🗳️संवैधानिक आधार व गठन

  • 1992 के 73वें व 74वें संविधान संशोधन अधिनियमों ने हर राज्य को पंचायतों व शहरी निकायों के निष्पक्ष, समयबद्ध चुनाव के लिए अलग राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) बनाने को कहा; पंचायत चुनाव व मतदाता सूचियाँ अनुच्छेद 243K के तहत, शहरी निकाय चुनाव अनुच्छेद 243ZA के तहत आते हैं, और इसका प्रमुख राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है।
  • राजस्थान SEC का गठन 1 जुलाई 1994 को राज्यपाल द्वारा श्री अमरसिंह राठौड़ को पहला आयुक्त नियुक्त करके किया गया; यह एक सदस्यीय संवैधानिक निकाय है जिसका अपना एक सचिव भी होता है।
  • राज्य विधानमंडल, संविधान के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, पंचायत चुनावों (अनुच्छेद 243K(4)) तथा शहरी निकाय चुनावों (अनुच्छेद 243ZB) के लिए कानून व नियम बना सकता है।

आयुक्त का कार्यकाल व हटाया जाना

  • राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह पर राज्यपाल करते हैं, और वे पद ग्रहण से पाँच वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक कार्यरत रहते हैं; वे राज्यपाल को हस्ताक्षरित पत्र देकर समय से पहले भी त्यागपत्र दे सकते हैं।
  • आयुक्त को केवल उसी आधार व उसी तरीके से हटाया जा सकता है जिस तरह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है - संसद द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित होने पर राष्ट्रपति द्वारा - जिससे यह पद राज्य सरकार के दबाव से काफी हद तक सुरक्षित रहता है।

🛡️अधिकार एवं कार्य

  • हर पंचायत व शहरी निकाय चुनाव से पहले आयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत मतदाता सूचियाँ अद्यतन करता है, जरूरी मतदान अधिकारी नियुक्त करता है, और शांतिपूर्ण चुनाव के लिए राज्यपाल से अतिरिक्त कर्मचारी माँग सकता है।
  • हिंसा, बूथ कब्जा या मतपेटी लूट होने पर वह जाँच कर पुनर्मतदान का आदेश दे सकता है; वह आकाशवाणी पर दलों को प्रचार समय देता है, पूरी चुनाव प्रक्रिया का निर्देशन-नियंत्रण करता है, और चुनाव चिह्न विवाद निपटाता है।
  • यह स्थानीय स्वशासन चुनावों में प्रत्याशियों की योग्यता भी जाँचता है और अयोग्य को अयोग्य घोषित कर सकता है, विवादित व्यवस्था पर जाँच अधिकारी नियुक्त कर सकता है, और खास परिस्थितियों में चुनाव स्थगित या पुनर्मतदान करा सकता है।

🗄️सचिवालय

  • राज्य कैडर के एक IAS अधिकारी को राज्य सरकार सचिव नियुक्त करती है, जो आयुक्त को सभी चुनाव कार्यों की निगरानी में मदद करता है; उपसचिव व सहायक सचिव पद राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारियों से भरे जाते हैं, और अन्य कर्मचारी भी राज्य सरकार नियुक्त करती है।

📜राजस्थान के राज्य निर्वाचन आयुक्त

  • अमरसिंह राठौड़ (1994 से पहले आयुक्त) के बाद क्रमशः नेकराम भसीन, इंद्रजीत खन्ना, ए.के. पाण्डे, रामलुभाया, प्रेमसिंह मेहरा व मधुकर गुप्ता आयुक्त बने।
  • श्री राजेश्वर सिंह 29 सितंबर 2025 से राजस्थान के राज्य निर्वाचन आयुक्त हैं, जो इस पद पर रहने वाले आठवें व्यक्ति हैं।

🏘️पंचायतीराज चुनावों का इतिहास

  • राज्य में पंचायत चुनावों के पहले पाँच दौर - 1960, 1965, 1978, 1981-82 व 1988 में - पंचायतीराज विभाग ने कराए, इसके बाद नवगठित राज्य निर्वाचन आयोग ने 1995 में छठे दौर से यह जिम्मेदारी संभाली।
  • SEC के तहत आगे के दौर हुए: 2000 (7वाँ), जनवरी-फरवरी 2005 (8वाँ), 2010 (9वाँ), 2015 (10वाँ) व 2020-2021 (11वाँ)।

🏙️नगर निकाय चुनावों का इतिहास

  • 74वें संशोधन के बाद राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 1959 में बड़े संशोधन हुए और राजस्थान नगरपालिका (निर्वाचन) नियम 1994 बने; नगर निकाय चुनाव पहली बार 1960 में स्वायत्त शासन विभाग ने कराए, फिर चुनाव विभाग ने 1963, 1970, 1972, 1974, 1976, 1982 व 1986 में कराए।
  • नवंबर 1994 से यह चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग करा रहा है, जिसके तहत 1999-2000, 2004-05, 2009-10, 2014-15 में तथा 14वें दौर के रूप में 2020-21 में आम व उपचुनाव हुए।
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मानवाधिकार व सूचना आयोग

Human Rights & Information Commissions

राष्ट्रीय कानूनों से जन्मी दो प्रहरी संस्थाएँ - एक मानव गरिमा की रक्षक, दूसरी नागरिकों के जानने के अधिकार की - दोनों जयपुर में स्थित और दोनों की शक्ति मूलतः सिफारिशी।

🕊️RSHRC – वैश्विक जड़ों से राज्य गठन तक

  • संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक-सामाजिक परिषद ने 1946 में एलोनोर रूजवेल्ट की अध्यक्षता में एक मानवाधिकार आयोग बनाया, जिसने मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा तैयार की, जो 10 दिसंबर 1948 को अपनाई गई - यह तारीख अब हर साल अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाई जाती है; संयुक्त राष्ट्र ने बाद में 1995-2004 को 'मानवाधिकार दशक' भी घोषित किया।
  • भारत के मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (28 सितंबर 1993 से लागू) से 10 अक्टूबर 1993 को न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बना, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है; राज्य स्तर पर राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग 18 जनवरी 1999 को एक अध्यक्ष व चार सदस्यों के साथ अधिसूचित हुआ और मार्च 2000 से कार्यशील हुआ, इसका कार्यालय सचिवालय, जयपुर में है।
  • 2006 के संशोधन ने RSHRC के सदस्यों की संख्या (अध्यक्ष के अलावा) चार से घटाकर दो कर दी।

👨‍⚖️RSHRC – गठन, नियुक्ति व हटाया जाना

  • 2019 संशोधन के बाद अध्यक्ष कोई भी सेवारत या सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश हो सकता है, केवल पूर्व मुख्य न्यायाधीश ही जरूरी नहीं; दो सदस्य होते हैं - एक वर्तमान/पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश या कम से कम सात वर्ष अनुभव वाला जिला न्यायाधीश, तथा दूसरा मानवाधिकार विशेषज्ञता वाला व्यक्ति जिसे राज्यपाल चुनते हैं।
  • नियुक्ति एक चयन समिति की सिफारिश पर राज्यपाल के हस्ताक्षरित वारंट से होती है - समिति में मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधानसभा अध्यक्ष, गृहमंत्री व विपक्ष के नेता, तथा जहाँ विधान परिषद हो वहाँ उसके सभापति व विपक्ष के नेता शामिल होते हैं; समिति में कोई पद रिक्त होने से नियुक्ति अमान्य नहीं होती।
  • अध्यक्ष या सदस्य कभी भी राज्यपाल को हस्ताक्षरित पत्र देकर त्यागपत्र दे सकते हैं; राष्ट्रपति द्वारा हटाने के लिए उच्चतम न्यायालय की जाँच में कदाचार या अक्षमता, या दिवालियापन, अन्य सवेतन रोजगार, दुर्बलता, विकृत चित्त या नैतिक पतन वाले अपराध में दोषसिद्धि जैसे आधार जरूरी हैं।

⏱️RSHRC – कार्यकाल, स्टाफ व अधिकारिता

  • कार्यकाल तीन वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो - 2019 संशोधन ने इसे पाँच वर्ष से घटाया और अध्यक्ष को भी पुनर्नियुक्ति योग्य बना दिया; सेवानिवृत्ति के बाद अध्यक्ष व सदस्य राज्य या केंद्र में किसी लाभ के पद पर नहीं जा सकते।
  • राज्य सरकार के सचिव के पद से नीचे का न होने वाला सचिव आयोग का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होता है; जाँच का नेतृत्व महानिरीक्षक रैंक से नीचे का न होने वाला पुलिस अधिकारी सहायक स्टाफ सहित करता है; आयोग केवल राज्य व समवर्ती सूची के मामलों की जाँच कर सकता है, और शिकायत घटना के एक वर्ष के भीतर दर्ज होनी चाहिए।
  • 2019 संशोधन केंद्र को दिल्ली के अलावा किसी केंद्रशासित प्रदेश की जिम्मेदारी किसी राज्य आयोग को सौंपने की अनुमति देता है, दिल्ली के मामले NHRC के पास ही रहते हैं; राज्य आयोग की वार्षिक रिपोर्ट राज्य सरकार को जाती है, जिसे विधानमंडल के समक्ष रखा जाता है।

🔍RSHRC – कार्य एवं अन्वेषण शक्तियाँ

  • आयोग शिकायत, स्वप्रेरणा या न्यायालय के आदेश पर मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच करता है, अदालत की अनुमति से लंबित मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जेलों में जाकर सुधार सुझा सकता है, कानूनी सुरक्षा उपायों व आतंकवाद जैसे कारकों की समीक्षा करता है, अंतरराष्ट्रीय संधियों का अध्ययन करता है, और शोध-जागरूकता को बढ़ावा देता है।
  • जाँच करते समय आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ हैं - गवाह बुलाना, दस्तावेज माँगना, शपथपत्र लेना व अभिलेख माँगना; इसकी कार्यवाही IPC/BNS के तहत न्यायिक मानी जाती है, और CrPC के तहत यह एक सिविल न्यायालय माना जाता है।
  • इसकी भूमिका पूरी तरह सिफारिशी है - यह किसी को दंड या पीड़ित को मुआवजा खुद नहीं दे सकता, पर सरकार को सलाह पर की गई कार्रवाई की जानकारी एक महीने के भीतर आयोग को देनी होती है।

🎗️RSHRC – अध्यक्ष

  • न्यायमूर्ति कांता भटनागर 23 मार्च 2000 को RSHRC की पहली अध्यक्ष बनीं; वर्तमान, छठे अध्यक्ष जस्टिस गंगाराम मूलचंदानी हैं, जिनकी नियुक्ति जून 2024 में हुई, इससे पहले एच.आर. कुड़ी (एन.के. जैन की सेवानिवृत्ति के बाद) व जस्टिस महेश चंद्र शर्मा (दिसंबर 2019-जनवरी 2021, जस्टिस प्रकाश टाँटिया के जल्दी इस्तीफे के बाद) कार्यवाहक रहे।
  • राष्ट्रीय स्तर पर, सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस वी. रामासुब्रह्मण्यम ने दिसंबर 2024 में जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा के स्थान पर NHRC अध्यक्ष का पद संभाला।

ℹ️राज्य सूचना आयोग – गठन व संरचना

  • केंद्रीय सूचना आयोग की तर्ज पर बना राज्य सूचना आयोग RTI अधिनियम 2005 की धारा 15 के तहत गजट अधिसूचना से बना एक वैधानिक, स्वायत्त निकाय है, जिसमें एक राज्य मुख्य सूचना आयुक्त व अधिकतम दस अन्य सूचना आयुक्त होते हैं।
  • आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति (मुख्यमंत्री अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, तथा मुख्यमंत्री द्वारा मनोनीत एक कैबिनेट मंत्री) की सिफारिश पर राज्यपाल करते हैं; वे विधि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, समाजसेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क या प्रशासन में ज्ञान रखने वाले प्रतिष्ठित व्यक्ति होने चाहिए, और वे विधायक, लाभ के पद धारक या राजनीतिक रूप से संबद्ध नहीं हो सकते।
  • सामान्य निगरानी मुख्य सूचना आयुक्त के पास होती है, अन्य आयुक्त उसमें सहायता करते हैं; राजस्थान के आयोग का मुख्यालय जयपुर में है, जो गजट अधिसूचना से तय किया गया स्थान है।

📅राज्य सूचना आयोग – कार्यकाल, वेतन व हटाया जाना

  • पहले आयुक्त पाँच वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक कार्यरत रहते थे; RTI संशोधन अधिनियम, 2019 (25 जुलाई 2019) ने यह निश्चित कार्यकाल हटा दिया - अब कार्यकाल व वेतन-भत्ते केंद्र सरकार तय करती है, जबकि पहले मुख्य आयुक्त का वेतन राज्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य का मुख्य सचिव के बराबर होता था।
  • पद की शपथ राज्यपाल या उनके नामित व्यक्ति के समक्ष ली जाती है, और त्यागपत्र राज्यपाल को हस्ताक्षरित पत्र से दिया जाता है; कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने के लिए उच्चतम न्यायालय की जाँच (राज्यपाल के आदेश पर) में कदाचार या अक्षमता, या दिवालियापन, नैतिक पतन वाली दोषसिद्धि, अन्य सवेतन कार्य, या शारीरिक-मानसिक अक्षमता जैसे आधार जरूरी हैं।
  • राजस्थान का राज्य सूचना आयोग 18 अप्रैल 2006 को बना, उसी दिन श्री एम.डी. कोरानी ने राज्य के पहले मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में शपथ ली; इसका कार्यालय जयपुर में है।

राज्य सूचना आयोग – शक्तियाँ एवं कार्य

  • RTI अधिनियम की धारा 18 आयोग के कार्य बताती है: लोक सूचना अधिकारी नियुक्त न होने जैसी शिकायतें प्राप्त करना, या सूचना से इनकार, देरी, अधिक शुल्क या अपूर्ण/भ्रामक सूचना जैसी अपीलों की सुनवाई करना; यह स्वयं भी स्वप्रेरणा से जाँच शुरू कर सकता है।
  • जाँच के दौरान आयोग को सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ हैं - सम्मन जारी कर उपस्थिति सुनिश्चित करना, दस्तावेजों का प्रकटीकरण/निरीक्षण कराना, शपथपत्र पर साक्ष्य लेना, और लोक अभिलेख माँगना।

📢राजस्थान में अन्य पारदर्शिता कानून

  • राजस्थान ने 12 अक्टूबर 2005 को परिपत्र से RTI नियम बनाए, जो 13 अक्टूबर 2005 से लागू हुए; राजस्थान लोक सेवाओं का प्रदाय की गारण्टी अधिनियम, 2011 (14 नवंबर 2011 से लागू, शुरुआत में 15 विभागों की 108 सेवाएँ) सेवा न देने या देरी पर जुर्माना लगाता है, और समय-सीमा गणना में अवकाश के दिन नहीं गिने जाते।
  • राजस्थान जन सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 मई 2012 में लागू हुआ; RTI मामलों के त्वरित निपटारे के लिए मुख्य सूचना आयुक्त डी.बी. गुप्ता ने 4 अप्रैल 2022 को RTI पोर्टल 2.0 लॉन्च किया, और जन सूचना पोर्टल का उद्घाटन 20 अगस्त 2019 को हुआ।
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राजस्थान का लोकायुक्त

Lokayukta of Rajasthan

1973 से मंत्रियों व अधिकारियों के लिए एक सलाहकारी भ्रष्टाचार-विरोधी प्रहरी, जिसकी सिफारिशों में स्वयं कोई दंडात्मक शक्ति नहीं, पर जिसकी रिपोर्ट राज्यपाल के माध्यम से विधानसभा तक पहुँचती है।

⚖️कानूनी आधार, भूमिका व नियुक्ति

  • भारतीय प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) ने राज्य स्तर पर लोकायुक्त नियुक्त करने की सबसे पहली सिफारिश की थी; राजस्थान लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम, 1973, 3 फरवरी 1973 से प्रभावी हुआ, राष्ट्रपति ने इसे 26 मार्च 1973 को मंजूरी दी।
  • यह सांविधिक, सलाहकारी संस्था मंत्रियों व लोकसेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार या बेईमानी के आरोपों की जाँच करती है, पर केवल सिफारिश कर सकती है - खुद कोई दंड नहीं दे सकती।
  • लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व विपक्ष के नेता (या न होने पर विधानसभा द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि) से परामर्श कर करते हैं; उपलोकायुक्त की नियुक्ति लोकायुक्त से परामर्श कर होती है, और दोनों राज्यपाल के समक्ष पद व गोपनीयता की शपथ लेते हैं।

📏कार्यकाल, वेतन व हटाया जाना

  • सामान्य कार्यकाल पद ग्रहण से पाँच वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो - उपलोकायुक्त के लिए भी यही है; राज्य की भाजपा सरकार ने 2018 में इसे बढ़ाकर आठ वर्ष कर दिया था, पर कांग्रेस सरकार ने 7 मार्च 2019 के अध्यादेश से इसे पुनः पाँच वर्ष कर दिया।
  • हटाया जाना अनुच्छेद 311 की भावना व अधिनियम की धारा 6 के अनुसार होता है - राज्यपाल कदाचार या अक्षमता के आरोप पर सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत/सेवानिवृत्त न्यायाधीश या राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से जाँच कराते हैं, और हटाना तभी होता है जब उसी सत्र में कुल सदस्यता के बहुमत व उपस्थित-मतदान करने वालों के दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित हो।
  • लोकायुक्त का वेतन-पेंशन उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बराबर, और उपलोकायुक्त का उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होता है; दोनों राज्यपाल को हस्ताक्षरित पत्र देकर समय से पहले भी त्यागपत्र दे सकते हैं, और नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तें उनके नुकसान के लिए नहीं बदली जा सकतीं।

🚫क्षेत्राधिकार व अपवर्जित पद

  • लोकायुक्त का क्षेत्राधिकार राजस्थान के लगभग सभी लोकसेवकों - मंत्री, अधिकारी, प्रमुख, प्रधान, सरपंच, अध्यक्ष व सचिव - पर है, पर राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय न्यायाधीश व अन्य न्यायालय अधिकारी, महालेखाकार, RPSC अध्यक्ष/सदस्य, राज्य के निर्वाचन आयुक्तों, विधानसभा सचिवालय स्टाफ, तथा ग्राम पंचायत सरपंच-पंच को इससे छूट है।
  • प्रशासनिक अधिकारियों, मुख्यमंत्री, विधायकों या पार्षदों के भ्रष्टाचार की शिकायत सीधे लोकायुक्त के पास दर्ज कराई जा सकती है, जो शिकायत तथ्यपरक पाए जाने पर गहन जाँच करता है; लोकायुक्त बिना किसी लिखित शिकायत के स्वप्रेरणा (Suomoto) से भी संज्ञान ले सकता है।

🥇प्रथम, सबसे लंबे कार्यकाल वाले व वर्तमान पदाधिकारी

  • श्री आई.डी. दुआ, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, 24 अगस्त 1973 को राजस्थान के पहले लोकायुक्त बने, और श्री के.पी.यू. मेनन 5 जून 1973 को पहले उपलोकायुक्त बने।
  • न्यायमूर्ति एस.एस. कोठारी (25 मार्च 2013-7 मार्च 2019) सबसे लंबे कार्यकाल वाले लोकायुक्त हैं; 2018 में आठ वर्ष की गई अवधि को अध्यादेश से पुनः पाँच वर्ष किए जाने पर उनके करीब छह वर्षों के कार्यकाल को तुरंत इस्तीफे के साथ छोटा करना पड़ा।
  • वर्तमान लोकायुक्त श्री प्रताप कृष्ण लोहरा हैं, जो राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश तथा राज्य के 13वें लोकायुक्त हैं, जिनकी नियुक्ति 9 मार्च 2021 को हुई।

📝शिकायत प्रक्रिया व सुरक्षा उपाय

  • शिकायत घटना के पाँच वर्ष के भीतर दर्ज होनी चाहिए; जानबूझकर या दुर्भावनापूर्वक झूठी शिकायत करने पर तीन वर्ष तक की कैद व जुर्माना हो सकता है, और शिकायत में आरोपी अधिकारी व शिकायतकर्ता दोनों का पूरा विवरण स्पष्ट होना चाहिए।
  • शिकायत स्वयं उपस्थित होकर या डाक से कार्यालय सचिव को भेजी जा सकती है; शिकायतकर्ता अक्षम हो या मृत्यु हो जाए तो कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से शिकायत दर्ज करा सकता है। आरोप सही पाए जाने पर संबंधित दस्तावेज जब्त किए जाते हैं और आरोपी को सुनवाई का मौका मिलता है, पर जाँच के तथ्य सार्वजनिक नहीं किए जाते।
  • लोकायुक्त का अपना अलग सचिवालय व प्रशासनिक कार्यालय है, निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने हेतु इसे बाहरी नियंत्रण से मुक्त रखा गया है, और इसकी वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल के माध्यम से विधानसभा तक पहुँचती है; राजस्थान में इसका मुख्यालय जयपुर में है।

🗺️भारत भर में लोकायुक्त संस्थाएँ

  • लोकायुक्त की संगठनात्मक संरचना राज्य-दर-राज्य अलग है - राजस्थान, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र में लोकायुक्त के साथ उपलोकायुक्त भी है, जबकि बिहार, उत्तरप्रदेश व हिमाचल प्रदेश में केवल लोकायुक्त का प्रावधान है; पंजाब व उड़ीसा में इसे 'लोकपाल' कहा जाता है।
  • उड़ीसा पहला राज्य था जिसने मुख्यमंत्री को भी लोकायुक्त के दायरे में रखा, और वहाँ का लोकायुक्त कार्यालयों का निरीक्षण व दस्तावेज जब्त कर सकता है, कार्यवाही गोपनीय रखता है, और शिकायत दर्ज कराने पर कोई शुल्क नहीं लगता; कर्नाटक का लोकायुक्त देश की सबसे सशक्त संस्थाओं में गिना जाता है।
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वित्त आयोग व महिला आयोग

Finance Commission & Women's Commission

राजस्थान की स्थानीय शासन व्यवस्था को वित्तीय रूप से सुदृढ़ और महिलाओं की शिकायतों को सुना हुआ रखने वाली दो और संवैधानिक-सांविधिक संस्थाएँ - एक राज्य व स्थानीय निकायों के बीच बजट संतुलित करती है, दूसरी महिला अधिकारों की रक्षक है।

💵राज्य वित्त आयोग – संवैधानिक आधार

  • 73वें संशोधन ने पंचायतों के लिए अनुच्छेद 243-I और 74वें ने शहरी निकायों के लिए अनुच्छेद 243-Y जोड़ा, जिससे राज्यपाल हर पाँच वर्ष में एक राज्य वित्त आयोग बनाते हैं - लोक मामलों का अनुभवी एक अध्यक्ष व अधिकतम चार सदस्य - जो इनकी वित्तीय स्थिति का आकलन करता है।
  • आयोग यह सिफारिश करता है कि राज्य के करों, शुल्कों, पथकरों व फीसों के शुद्ध आगम राज्य व पंचायतों/शहरी निकायों के बीच कैसे बाँटे जाएँ, कौन-से कर उन्हें समनुदिष्ट किए जा सकते हैं, संचित निधि से सहायता अनुदान के सिद्धांत क्या हों, तथा राज्यपाल द्वारा सौंपे गए अन्य विषयों पर भी सलाह देता है।
  • राज्यपाल हर सिफारिश को की गई कार्रवाई के स्पष्टीकरण सहित राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं (अनुच्छेद 243-I(4)); यही आयोग अनुच्छेद 243-Y के तहत शहरी निकायों के वित्त की भी समीक्षा करता है।

🕰️राज्य वित्त आयोग – अध्यक्ष समयरेखा

  • राजस्थान के वित्त आयोगों की अध्यक्षता क्रमशः कृष्ण कुमार गोयल (पहला), हीरालाल देवपुरा (दूसरा, मई 1999), माणिकचंद सुराणा (तीसरा, 15 सितंबर 2005), बी.डी. कल्ला (चौथा, 13 अप्रैल 2011) व ज्योति किरण (पाँचवाँ) ने की।
  • छठे वित्त आयोग (13 अप्रैल 2021 को प्रद्युम्न सिंह की अध्यक्षता में गठित, सदस्य अशोक लाहोटी व लक्ष्मण सिंह रावत) की सिफारिशें 2020-25 के लिए थीं; सातवें वित्त आयोग (1 अगस्त 2025 को अरुण चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित, सदस्य सचिव नरेश कुमार ठकराल) की सिफारिशें 2025-30 के लिए हैं।

👩राज्य महिला आयोग – गठन व उद्देश्य

  • राजस्थान राज्य महिला आयोग का गठन 15 मई 1999 को जयपुर में लिंगीय भेदभाव समाप्त कर महिलाओं के संवैधानिक हितों की रक्षा हेतु किया गया; 23 अप्रैल 1999 को लाए गए विधेयक से राजस्थान राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1999 बना।
  • राजस्थान की कोई भी महिला जो शारीरिक, आर्थिक, मानसिक, सामाजिक या राजनीतिक रूप से पीड़ित हो, स्वयं उपस्थित होकर या डाक से शिकायत दर्ज करा सकती है; आयोग निष्पक्ष जाँच कर दोनों पक्षों की सुनवाई या संबंधित विभाग को निर्देश देकर राहत दिलाता है।

🧩राज्य महिला आयोग – गठन व नियुक्ति

  • राज्य सरकार गजट अधिसूचना से आयोग का गठन करती है (धारा 3(1)); इसमें एक अध्यक्ष व सदस्य सचिव सहित अधिकतम चार सदस्य होते हैं (धारा 3(2)), जिनमें एक SC/ST व एक OBC वर्ग की महिला अनिवार्य रूप से शामिल होती है।
  • अध्यक्ष महिलाओं के मुद्दों के प्रति समर्पित एक प्रख्यात व्यक्ति होनी चाहिए, अन्य सदस्य संबंधित अनुभव वाली सक्षम व प्रतिष्ठित महिलाएँ होती हैं, और सरकार द्वारा नियुक्त सदस्य सचिव आयोग द्वारा सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग करता है।

⚖️राज्य महिला आयोग – कार्यकाल, हटाया जाना व शक्तियाँ

  • अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष है (धारा 4(1)) और वे हस्ताक्षरित पत्र देकर त्यागपत्र दे सकते हैं (धारा 4(2)(i)); राज्य सरकार धारा 8 के तहत दिवालियापन, नैतिक पतन वाली दोषसिद्धि, विकृत चित्त, अक्षमता, लगातार तीन बैठकों से अनुपस्थिति या पद के दुरुपयोग जैसे आधार पर उन्हें हटा सकती है - पर सुनवाई का उचित अवसर देकर ही।
  • जाँच के लिए आयोग को सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ हैं और अनुचित व्यवहार पाए जाने पर अभियोजन की सिफारिश कर सकता है; बैठकों की गणपूर्ति अध्यक्ष सहित तीन सदस्य है, बैठकें हर दो माह में कम से कम एक बार जरूरी हैं, और सरकार को सिफारिशों पर तीन माह में निर्णय लेना होता है (धारा 12)।
  • केरल के बाद राजस्थान देश का दूसरा राज्य है जहाँ राज्य महिला आयोग को स्वयं अभियोजन चलाने का अधिकार प्राप्त है।

📋राज्य महिला आयोग – अध्यक्ष

  • पहली अध्यक्ष श्रीमती कांता कथूरिया थीं (1999-2002), इसके बाद प्रो. पवन सुराणा (2003-06), श्रीमती तारा भंडारी (2006-09), और कार्यवाहक अध्यक्षों मीरा महर्षि व डॉ. सरिता सिंह के बाद प्रो. लाडकुमारी जैन (2011-14) रहीं।
  • बाद की अध्यक्षों में श्रीमती सुमन शर्मा (2015-18) व श्रीमती रेहाना रियाज़ चिश्ती (2022 से फरवरी 2025) शामिल हैं।