संविधान निर्माण में राजस्थान का योगदान
Rajasthan's Contribution to Constitution-making
जानिए कैसे बिखरी हुई राजस्थानी रियासतों के सपूतों ने भारत की संविधान सभा में अपनी आवाज़ बुलंद की और नए भारत के संविधान को आकार देने में मदद की।
संविधान सभा का जन्म
किसी भी लोकतंत्र की नींव उसका संविधान होता है — जानिए कि भारत के लिए यह सर्वोच्च दस्तावेज़ बनाने वाली संविधान सभा किन दशकों की मांग और मोल-तोल से होकर अस्तित्व में आई।
📖संविधान का अर्थ
- संविधान किसी राष्ट्र का सर्वोच्च कानून होता है, जो नागरिकों के आपसी संबंधों तथा नागरिकों और सरकार के बीच के रिश्तों को तय करता है।
- व्यावहारिक रूप में यह लिखित नियमों का एक समूह है जिससे शासन चलता है, और साथ ही यह देश के मूल मूल्यों व आदर्शों को भी दर्शाता है।
- संवैधानिक कानून देश के हर अन्य कानून से ऊपर होता है — बाकी सभी कानून इसी के दायरे में रहकर बनते हैं।
⏳मांग जो दशकों में परवान चढ़ी (1895-1940)
- भारत का अपना संविधान लिखने वाली संस्था का विचार सबसे पहले 1895 के 'स्वराज्य विधेयक' में मिलता है, जो बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से तैयार हुआ था।
- 1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस मांग को पहली बार अपनी औपचारिक नीति बनाया, और 1936 के लखनऊ अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया कि बाहर से थोपा गया कोई भी संविधान भारत को स्वीकार नहीं होगा।
- 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत का संविधान वयस्क मताधिकार से चुनी गई सभा बनाएगी, जिसमें कोई बाहरी दखल नहीं होगा — इस मांग को अंततः वायसराय लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 के 'अगस्त प्रस्ताव' के जरिए स्वीकार किया।
🧭कैबिनेट मिशन योजना, 1946
- दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में बनी लेबर सरकार ने लॉर्ड पैथिक लॉरेंस की अगुआई वाला तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत भेजा, जिसमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए.वी. एलेक्जेंडर भी शामिल थे।
- 16 मई 1946 को इसके प्रस्ताव सामने आए, जिनमें स्वतंत्र भारत के लिए संविधान सभा बनाने के सिद्धांतों का विस्तार से जिक्र था, और सभा की कुल सदस्य संख्या 389 तय की गई।
- इन 389 सीटों में से 292 सीटें ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए सदस्यों को, 4 सीटें मुख्य आयुक्त प्रांतों को मिलीं, जबकि 93 सीटों पर देशी रियासतों के शासकों ने प्रतिनिधि मनोनीत किए, न कि जनता ने चुना।
- प्रांतीय विधानसभाओं वाली 296 सीटों पर जुलाई-अगस्त 1946 में राजनीतिक दलों के आधार पर अप्रत्यक्ष चुनाव कराए गए।
🧩सभा का स्वरूप और अंतिम आकार
- इस तरह संविधान सभा एक मिश्रित निकाय बनी — आंशिक रूप से निर्वाचित (11 ब्रिटिश प्रांतों से चुने सदस्य) और आंशिक रूप से मनोनीत (देशी रियासतों से मनोनीत सदस्य)।
- 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना के तहत पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा बनने पर कई प्रांतीय प्रतिनिधि उस नई सभा में चले गए, जिससे मूल सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।
एकीकरण से पहले राजस्थान और उसके सदस्य
जब यह सभा बन रही थी, तब आज का राजस्थान एक नहीं बल्कि कई छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था — जानिए किन-किन रियासतों और लोगों ने इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में हिस्सा लिया।
🧵टुकड़ों में बंटी धरती
- स्वतंत्र भारत के लिए संविधान सभा बनते समय आज का राजस्थान अभी एकीकृत नहीं हुआ था और अनेक अलग-अलग रियासतों में बंटा हुआ था।
- केवल अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अधीन था, जिसे एक मुख्य आयुक्त संभालता था, जबकि बाकी क्षेत्र अपनी-अपनी रियासतों के अधीन था।
- सभा में राजस्थान की उपस्थिति दो तरह के सदस्यों से बनी — एक, जो यहीं की रियासतों के मूल निवासी थे, और दूसरे, जो बाहर के राज्यों के थे लेकिन यहां की रियासतों में प्रशासनिक पदों पर कार्यरत थे।
🏳️राजस्थान की रियासतों के प्रतिनिधि
- ग्यारह सदस्य राजस्थान की रियासतों के मूल निवासी थे — मुकुट बिहारी लाल भार्गव (अजमेर-मेरवाड़ा), माणिक्य लाल वर्मा और बलवंत सिंह मेहता (उदयपुर), जयनारायण व्यास (जोधपुर), रामचंद्र उपाध्याय (अलवर), दलेल सिंह (कोटा), गोकुल लाल असावा (शाहपुरा/भीलवाड़ा), जसवंत सिंह (बीकानेर), राजबहादुर (भरतपुर), हीरालाल शास्त्री (जयपुर) और सरदार सिंह (खेतड़ी)।
🧳बाहर से चुने गए राजस्थान मूल के सदस्य
- राजस्थान मूल के कुछ सदस्य दूसरे प्रांतों से चुने गए थे — प्रभुदयाल हिम्मतसिंह पश्चिम बंगाल से और बनारसीदास झुनझुनवाला बिहार से।
- पदमपत सिंघानिया संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से और इंडियन एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका मद्रास प्रांत से संविधान सभा के सदस्य चुने गए।
राजस्थान की रियासतों से आए सदस्यों की कहानियाँ
इन ग्यारह सदस्यों में से हर एक की अपनी अलग कहानी है — किसी ने पत्रकारिता से शुरुआत की तो किसी ने वकालत से, लेकिन सभी ने सभा की बहसों में राजस्थान की आवाज़ बुलंद की।
⚖️राजबहादुर (भरतपुर)
- भरतपुर के स्वतंत्रता सेनानी और वकील राजबहादुर को भरतपुर की ओर से सभा में मनोनीत किया गया था, और बाद में उन्होंने नेपाल में भारत के राजदूत के रूप में भी सेवा दी।
- सभा में उन्होंने भिखारीपन पर रोक, उच्च न्यायालय की फीस संरचना, संपत्ति के अधिग्रहण, खतरनाक पदार्थों के लिए सटीक कानूनी शब्दावली और सिनेमेटोग्राफ फिल्मों के महत्व जैसे विषयों पर मुखर होकर अपनी बात रखी।
🐫जसवंत सिंह (बीकानेर)
- ठाकुर जसवंत सिंह बीकानेर रियासत के प्रतिनिधि थे, जिससे इस रियासत की भारत के संविधान-निर्माण में सीधी भागीदारी रही।
- इससे पहले वे महाराजा सार्दुल सिंह के शासनकाल में बीकानेर के प्रधानमंत्री रह चुके थे।
🌾माणिक्य लाल वर्मा (उदयपुर)
- 4 दिसंबर 1897 को बिजौलिया (भीलवाड़ा) में जन्मे माणिक्य लाल वर्मा ने 1941 में मेवाड़ प्रजामंडल के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की, और बाद में मेवाड़ (उदयपुर) की ओर से सभा के सदस्य बने।
- सभा में उन्होंने राज्यों को केंद्र से अधिक आर्थिक मदद दिलाने, राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने और सिरोही की आबू-दिलवाड़ा तहसील को दोबारा राजस्थान में मिलाने की मांग उठाई, साथ ही दलितों, आदिवासियों व पिछड़े वर्गों के अधिकारों का मुद्दा भी उठाया।
📚मुकुट बिहारी लाल भार्गव (अजमेर-मेरवाड़ा)
- 30 जनवरी 1903 को उदयपुर रियासत में जन्मे और पेशे से वकील मुकुट बिहारी लाल भार्गव अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत से सभा के लिए चुने गए थे।
- उन्होंने अजमेर-मेरवाड़ा जैसे मुख्य आयुक्त प्रांतों को क्या दर्जा मिलना चाहिए, इस सवाल पर सक्रियता से भाग लेकर उपयोगी सुझाव दिए।
📰जयनारायण व्यास (जोधपुर)
- 18 फरवरी 1899 को जोधपुर में जन्मे जयनारायण व्यास 1927 में 'तरुण राजस्थान' के प्रधान संपादक और 1936 में 'अखंड भारत' के प्रकाशक रहे, इसके बाद वे जोधपुर से सभा के सदस्य बने।
- सभा में उन्होंने राज्यों की स्वायत्तता, पूर्व रियासती शासकों के अधिकार, संघीय ढांचे, रियासतों के एकीकरण, नागरिक अधिकारों और राज्यों की सीमाओं जैसे विषयों पर मुखर होकर अपनी राय रखी।
✍️बलवंत सिंह मेहता (उदयपुर)
- 8 फरवरी 1900 को उदयपुर में जन्मे बलवंत सिंह मेहता 1938 में मेवाड़ प्रजामंडल के पहले अध्यक्ष बने और 1943 में उदयपुर में वनवासी छात्रावास की स्थापना की।
- 1948 में संयुक्त राजस्थान के प्रतिनिधि के रूप में चुने गए बलवंत सिंह मेहता मूल संविधान पर हस्ताक्षर करने वाले पहले राजस्थानी सदस्य बने, और उन्होंने स्थानीय स्वशासन की अवधारणा का समर्थन किया।
🏹रामचंद्र उपाध्याय (अलवर)
- जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी और वकील रामचंद्र उपाध्याय ने संविधान सभा में अलवर रियासत का प्रतिनिधित्व किया।
🖋️दलेल सिंह (कोटा)
- 18 मार्च 1909 को जन्मे लेफ्टिनेंट कर्नल दलेल सिंह कोटा के महाराव भीमसिंह के निजी सचिव थे और कानून की गहरी समझ रखते थे।
- उन्होंने संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों में स्थान पाया।
🎓गोकुल लाल असावा (शाहपुरा)
- शाहपुरा में प्रारंभिक शिक्षा पाने के बाद गोकुल लाल असावा ने कोटा के हार्वर्ड कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों में भाग लेने के कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया।
- बाद में वे शाहपुरा (भीलवाड़ा) से संविधान सभा के प्रतिनिधि बने।
🌱हीरालाल शास्त्री (जयपुर)
- 24 नवंबर 1899 को जयपुर के जोबनेर में जन्मे हीरालाल शास्त्री ने अर्जुनलाल सेठी के संपर्क में आने के बाद सरकारी नौकरी छोड़ दी, और टोंक जिले की निवाई तहसील के वनस्थली गांव में 'जीवन कुटीर' नामक संस्था स्थापित की।
- जयपुर के प्रतिनिधि के रूप में सभा में उन्होंने ग्रामीण विकास, पंचायतीराज, विकेंद्रीकरण और सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार की वकालत की; वे अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के प्रधान रहे और आगे चलकर राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री बने।
👑सरदार सिंह (खेतड़ी)
- खेतड़ी के शासक सरदार सिंह संविधान सभा के सदस्य रहे और बाद में अस्थायी संसद (1950-52) तथा राज्यसभा (1952-56) के सदस्य भी रहे।
- भारत सरकार ने उन्हें 1958 से 1961 के बीच लाओस में राजदूत बनाकर भेजा; उनका निधन 30 अक्टूबर 1985 को हुआ।
बाहर से आए प्रशासक और अन्य योगदानकर्ता
राजस्थान की रियासतों में सेवा दे रहे कई बाहरी विद्वान अधिकारी भी संविधान सभा का हिस्सा बने, तो कुछ अन्य उल्लेखनीय चेहरों का भी इस क्षेत्र से नाता रहा।
🖊️सी.एस. वेंकटाचारी (जोधपुर)
- मूल रूप से कर्नाटक के आईसीएस अधिकारी सी.एस. वेंकटाचारी को 1949 में जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने अपना प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किया, और बाद में वे जयपुर के राजप्रमुख राजा मानसिंह के भी प्रशासनिक अधिकारी बने।
- उन्होंने 6 जनवरी से 25 अप्रैल 1951 तक थोड़े समय के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में भी काम किया।
🌐सरदार के.एम. पन्निकर (बीकानेर)
- मूल रूप से केरल के निवासी और ऑक्सफोर्ड में शिक्षित के.एम. पन्निकर ने अलीगढ़ और कलकत्ता विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया, इसके बाद पटियाला के विदेश मंत्री और फिर बीकानेर के प्रधानमंत्री रहे।
- 28 अप्रैल 1947 को वे बीकानेर के प्रतिनिधि के रूप में संविधान सभा में शामिल हुए, और आजादी के बाद भारत ने उन्हें चीन, मिस्र व फ्रांस में राजदूत बनाकर भेजा।
🌾सर टी. विजयराघवाचार्य (उदयपुर)
- मूल रूप से तमिलनाडु के आईसीएस अधिकारी सर टी. विजयराघवाचार्य आगे चलकर मेवाड़ के प्रधानमंत्री बने और सभा में मेवाड़ रियासत का प्रतिनिधित्व किया।
- बिजौलिया किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने बातचीत के लिए अपने राजस्व मंत्री डॉ. मोहन सिंह मेहता को भेजा, जिसके फलस्वरूप हुए समझौते में लगान की दरें घटाई गईं, कई अतिरिक्त कर (लाग-बाग) खत्म हुए और बेगार प्रथा भी समाप्त कर दी गई।
🏅वी.टी. कृष्णमाचारी (जयपुर)
- आईसीएस सेवा में रहे वी.टी. कृष्णमाचारी जयपुर रियासत के प्रधानमंत्री बने, फिर जयपुर के प्रतिनिधि के रूप में संविधान सभा में शामिल हुए और आगे चलकर सभा के उपाध्यक्ष भी रहे।
- डी.पी. खेतान के निधन के बाद उन्हें संविधान की प्रारूप समिति में जगह मिली, केंद्र-राज्य संबंधों पर उनके कई उपयोगी सुझाव संविधान में शामिल हुए, और 1961 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए।
🕊️गोकुल भाई भट्ट (सिरोही)
- 'राजस्थान के गांधी' के नाम से मशहूर सिरोही के गोकुलभाई भट्ट बंबई स्टेट्स के प्रतिनिधि के रूप में संविधान सभा में पहुंचे।
- सभा में उन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण, स्थानीय लोकतंत्र और मजबूत पंचायतों की जोरदार वकालत की।
🧾एन.बी. खरे (अलवर)
- एन.बी. खरे जुलाई 1947 में अलवर रियासत से संविधान सभा के लिए चुने गए थे, लेकिन अगले ही वर्ष 1948 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
आंकड़े, स्मारक और विरासत
संविधान सभा में राज्यवार गणित से लेकर आज जयपुर में बने कॉन्स्टीट्यूशन क्लब और मूल संविधान में उकेरी कला तक — इस विरासत के कुछ दिलचस्प पहलू।
🔢31 दिसंबर 1947 तक राज्यवार सदस्य संख्या
- 31 दिसंबर 1947 तक सभा में ब्रिटिश भारत की कुल सदस्य संख्या 229 थी, जिसमें सबसे अधिक सदस्य संयुक्त प्रांत से (55), उसके बाद मद्रास (49) और बिहार (36) से थे।
- बंबई, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के पास करीब बीस-बीस सीटें थीं, जबकि अजमेर-मेरवाड़ा, दिल्ली और कूर्ग जैसी छोटी इकाइयों के पास मात्र एक-एक सदस्य था।
🧮देशी रियासतों में राजस्थान की हिस्सेदारी
- 31 दिसंबर 1947 तक देशी रियासतों के पास कुल 70 सीटें थीं, जिनमें राजस्थान की रियासतों की भी अच्छी हिस्सेदारी थी — अकेले जयपुर के पास 3 सीटें थीं, जोधपुर और उदयपुर के पास 2-2, तथा अलवर, बीकानेर और कोटा के पास 1-1।
- पूर्वी राजपूताना की कुछ छोटी रियासतों ने अलग-अलग प्रतिनिधित्व की बजाय अपनी ताकत को मिलाकर 3 साझा सीटों में समेटा।
🏢कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ राजस्थान
- राजस्थान विधानसभा देश की पहली ऐसी विधानसभा बनी जहां नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया की तर्ज पर कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ राजस्थान की स्थापना की गई।
- जयपुर स्थित यह क्लब 8 मार्च 2025 को शुरू किया गया।
🎨मूल संविधान की सचित्र कला
- भारत के संविधान की मूल प्रति में देश के गौरवशाली इतिहास, परंपरा और संस्कृति को दर्शाते 22 चित्र हैं, जिन्हें मुख्य रूप से चित्रकार नंदलाल बोस ने बनाया था।
- राजस्थान के चित्रकार कृपाल सिंह शेखावत का भी इसमें उल्लेखनीय योगदान रहा, जिन्होंने संविधान के कुछ पन्नों का अलंकरण किया।