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राजस्थान GK

उपभोक्ता संरक्षण

Consumer Protection

बाज़ार के 'राजा' कहलाने वाले उपभोक्ता के अधिकार, 2019 के नए कानून की खूबियाँ, तीन-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र और राजस्थान में इसका असली ढांचा — सब एक जगह।

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उपभोक्ता और उसके अधिकार

The Consumer and Their Rights

बाजार में उपभोक्ता को भले ही 'राजा' कहा जाए, पर छल-कपट और मिलावट का शिकार वही सबसे ज्यादा होता है — यहाँ जानिए उपभोक्ता कौन है, उसके साथ किस तरह अन्याय होता है, और दुनिया भर में उसे कौन-कौन से अधिकार मिले हैं।

🙋उपभोक्ता कौन है?

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(7) के तहत, जो कोई मूल्य चुकाकर वस्तु खरीदता है या सेवा लेता है — या केवल उसका उपयोग भर करता है — वह उपभोक्ता माना जाता है।
  • पुनर्विक्रय या व्यापार के मकसद से खरीदारी करने वाला उपभोक्ता नहीं गिना जाता, लेकिन स्वरोजगार से आजीविका कमाने के लिए खरीदी गई वस्तु या सेवा (जैसे बेरोजगार व्यक्ति का कंप्यूटर, टाइपराइटर या फैक्स मशीन खरीदना) उपभोक्ता की परिभाषा में आती है।
  • किराया देकर सफर करने वाला रेल या बस यात्री, और फीस देकर इलाज कराने वाला मरीज़ उपभोक्ता हैं, जबकि मुफ्त इलाज पाने वाले मरीज़, घरेलू नौकर जैसी निजी अनुबंध की सेवाएँ, और पूरी तरह नि:शुल्क सेवाएँ इस परिभाषा से बाहर हैं।

⚠️उपभोक्ता का शोषण और संरक्षण की जरूरत

  • बाजार का 'राजा' होने के बावजूद उपभोक्ता को चोर-बाज़ारी, मिलावट, कृत्रिम अभाव, गलत माप-तौल, झूठे वादों, भ्रामक विज्ञापनों, नकली माल और मुनाफ़ाखोरी जैसे तरीकों से लगातार ठगा जाता रहा है।
  • जागरूकता की कमी के चलते उपभोक्ता अक्सर पूरा दाम चुकाकर भी घटिया या मिलावटी सामान पा जाता है — यहाँ तक कि जीवन-रक्षक दवाओं और एक्सपायर हो चुके पैक्ड खाद्य पदार्थों की बिक्री जैसी समस्याओं ने ही कानून बनाने की जरूरत पैदा की।
  • उपभोक्ता संरक्षण असल में एक सामाजिक आंदोलन है, जो व्यापार की अनैतिक प्रवृत्तियों का विरोध कर उपभोक्ता के अधिकारों, हितों और कल्याण को सामाजिक, नैतिक व कानूनी उपायों से मजबूत करता है।

🌍विश्व उपभोक्ता दिवस और अंतरराष्ट्रीय अधिकार

  • हर साल 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है — इसी तारीख को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने कांग्रेस को संदेश भेजकर चार उपभोक्ता अधिकारों (सुरक्षा, सूचना, सुनवाई और पसंद) की घोषणा की थी, जिनमें बाद में 'मूल्य का अधिकार' जोड़कर पाँच कर दिया गया।
  • 1960 में लंदन में स्थापित उपभोक्ता संघों के अंतरराष्ट्रीय संगठन (IOCU, अब Consumers International) ने इनमें तीन और अधिकार — उपचार, उपभोक्ता शिक्षा और स्वस्थ वातावरण — जोड़े, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य उपभोक्ता अधिकार अब कुल सात हो गए।
  • भारत का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986 की धारा 6 और 2019 की धारा 2(9)) इनमें से केवल छह अधिकार ही मान्य करता है; सातवाँ, यानी 'स्वस्थ वातावरण का अधिकार' — जो व्यवसायों से ऐसी निर्माण प्रक्रिया, तकनीक और पैकेजिंग अपनाने की अपेक्षा करता है जिससे जल, थल, वायु व ध्वनि प्रदूषित न हो — अभी भारतीय कानून में शामिल नहीं है।

⚖️भारत में उपभोक्ता के छह अधिकार

  • 1986 के अधिनियम में दिए गए छह अधिकार 2019 के नए अधिनियम में भी ज्यों के त्यों बरकरार रखे गए हैं — सुरक्षा, सूचना, प्रतिस्पर्धी मूल्य पर चुनाव, सुनवाई, क्षतिपूर्ति और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार।
  • सुरक्षा का अधिकार उपभोक्ता को शरीर या संपत्ति को नुकसान पहुँचा सकने वाली वस्तुओं-सेवाओं से बचाता है, चुनाव का अधिकार उसे बाज़ार में मौजूद अलग-अलग ब्रांड, गुणवत्ता, आकार व कीमत में से पसंद चुनने देता है, और सुनवाई का अधिकार उसे उचित मंच पर शोषण के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने व प्रतितोष पाने का मौका देता है।
  • सूचना पाने का अधिकार उपभोक्ता को वस्तु की किस्म, मात्रा, शुद्धता, मानक व मूल्य जैसी जानकारी देता है ताकि वह सोच-समझकर खरीदारी कर सके; उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार उसे जरूरी ज्ञान हासिल करने देता है; और उपचार का अधिकार तब क्षतिपूर्ति दिलाता है जब वस्तु या सेवा वादे के मुताबिक काम न करे।
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019

The Consumer Protection Act, 2019

1986 के पुराने कानून से लेकर डिजिटल दौर के 2019 के अधिनियम तक — जानिए कैसे बदला भारत में उपभोक्ता न्याय का ढाँचा।

🕰️1986 से 2019 तक का सफर

  • संसद ने व्यापारियों-उत्पादकों के शोषण से उपभोक्ताओं को बचाने, शिकायतों का त्वरित निपटारा करने और सस्ता-सरल न्याय देने के लिए 24 दिसंबर 1986 को पहला उपभोक्ता संरक्षण कानून पारित किया, जो 15 अप्रैल 1987 से जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू हुआ और जिसने तीन स्तरों पर अर्ध-न्यायिक ढाँचा (राष्ट्रीय आयोग, राज्य आयोग, जिला मंच) खड़ा किया।
  • नया उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम राज्यसभा से 6 अगस्त 2019 को (लोकसभा पहले ही 30 जुलाई 2019 को पारित कर चुकी थी) पारित हुआ, राष्ट्रपति ने 9 अगस्त 2019 को इसे मंजूरी देकर अधिसूचित किया, और यह 20 जुलाई 2020 से पुराने 1986 के कानून की जगह पूरे देश में लागू हुआ।

🎯नए अधिनियम के उद्देश्य

  • नए कानून का मुख्य मकसद है उपभोक्ता शिकायतों को तेज़, सरल और तय समय-सीमा में निपटाने के लिए कारगर प्रशासन व प्राधिकरण खड़े करना, उपभोक्ता हितों की रक्षा करना, और 1986 के अधिनियम की कमियों को आज के दौर के हिसाब से दुरुस्त करना।
  • इसका एक अन्य मकसद उन व्यापारियों या सेवा प्रदाताओं को उचित दंड देना भी है, जो उपभोक्ताओं को वाजिब दाम पर मनचाही वस्तु या सेवा मिलने में रुकावट डालते हैं।

नए अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

  • नए अधिनियम में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) के गठन का प्रावधान जोड़ा गया, और अब यह कानून ई-कॉमर्स कंपनियों तथा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बेचने वाली कंपनियों पर भी लागू होता है।
  • शिकायतें अब ऑनलाइन भी दर्ज कराई जा सकती हैं — इसके लिए सरकार ने e-Dakhil पोर्टल शुरू किया है, जिससे पीड़ित उपभोक्ता घर बैठे राष्ट्रीय, राज्य या जिला आयोग में शिकायत दाखिल कर सकता है; साथ ही जिला उपभोक्ता मंच का नाम बदलकर 'जिला आयोग' कर दिया गया है और उसका आर्थिक क्षेत्राधिकार भी बढ़ाया गया है।
  • अब विवादों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी हो सकती है, और राष्ट्रीय, राज्य व जिला — तीनों आयोगों में अध्यक्ष या कम से कम एक सदस्य के तौर पर महिला की उपस्थिति अनिवार्य कर दी गई है।

📖धारा 2 की अहम परिभाषाएँ

  • धारा 2 अधिनियम में इस्तेमाल हुए तमाम शब्दों को परिभाषित करती है, जैसे शिकायतकर्ता, शिकायत, उपभोक्ता विवाद, दोष, कमी, माल और सेवा — ये परिभाषाएँ ही आगे पूरे अधिनियम की व्याख्या का आधार बनती हैं।
  • इसी धारा में ई-कॉमर्स, प्रतिबंधित व्यापार व्यवहार और गैर-वाजिब व्यापार व्यवहार, उत्पाद निर्माणकर्ता व उत्पाद विक्रेता जैसे नए-पुराने शब्द भी परिभाषित हैं, साथ ही राष्ट्रीय आयोग व राज्य आयोग को क्रमशः राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग व राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के रूप में परिभाषित किया गया है।

🗂️अधिनियम की धारा-संरचना

  • धारा 10-27 केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण से जुड़ी हैं; धारा 28-73 उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोगों — जिला (धारा 28-41), राज्य (धारा 42-52) और राष्ट्रीय (धारा 53-73) — की स्थापना, संरचना, नियुक्ति व क्षेत्राधिकार तय करती हैं।
  • धारा 74-81 मध्यस्थता से, धारा 84-87 उत्पाद दायित्व से, और धारा 88-93 अपराध व दंड से जुड़ी हैं; बाकी प्रकीर्ण प्रावधान केंद्र व राज्य सरकार को नियम बनाने की, तथा राष्ट्रीय आयोग व CCPA को विनियम बनाने की शक्ति देते हैं।
  • धारा 8-9 जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषदों का प्रावधान करती हैं, जबकि धारा 69 परिसीमा अवधि और धारा 68 आदेशों की अंतिमता तय करती है।
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उपभोक्ता संरक्षण परिषदें व केंद्रीय प्राधिकरण

Consumer Protection Councils and the Central Authority

सलाह देने वाली तीन स्तरीय परिषदों से लेकर कार्रवाई करने वाले नए CCPA तक — जानिए उपभोक्ता हितों की निगरानी कौन-कौन सी संस्थाएँ करती हैं।

🇮🇳केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् (CCPC)

  • धारा 3(1) के तहत केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् का गठन करती है — यह देश की सर्वोच्च सलाहकार परिषद् है, जिसमें उपभोक्ता संरक्षण नियम 2020 (15 जुलाई 2020 को जारी, 20 जुलाई 2020 से प्रभावी) के तहत अध्यक्ष-उपाध्यक्ष समेत अधिकतम 36 सदस्य हो सकते हैं।
  • इसका अध्यक्ष उपभोक्ता मामलों के विभाग का प्रभारी केंद्रीय मंत्री होता है और उपाध्यक्ष खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्रालय का राज्यमंत्री; इसमें 2 सांसद (एक लोकसभा, एक राज्यसभा से), पाँच क्षेत्रों से रोटेशन पर आने वाले राज्य मंत्री, CCPA का मुख्य आयुक्त और राष्ट्रीय आयोग का रजिस्ट्रार भी सदस्य होते हैं।
  • परिषद् व इसके सदस्यों का कार्यकाल तीन साल है, और साल में कम से कम एक बैठक अनिवार्य है; धारा 5 के तहत इसका काम उपभोक्ता हितों को बढ़ावा देना व सरकार को सलाह देना है।

🏢राज्य व जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद्

  • धारा 6(1) के तहत हर राज्य सरकार को अपनी राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद् बनानी होती है — यह राज्य स्तर की सबसे बड़ी सलाहकार परिषद् है, जिसका अध्यक्ष राज्य के उपभोक्ता मामलों का प्रभारी मंत्री होता है, कार्यकाल तीन साल का और साल में कम से कम दो बैठकें अनिवार्य हैं; राजस्थान में यह परिषद् गठित हो चुकी है।
  • धारा 8(1) के अनुसार हर जिले में भी एक जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद् बनानी होती है, जिसका अध्यक्ष जिलाधीश होता है, कार्यकाल तीन साल का है, और साल में कम से कम दो बैठकें जरूरी हैं; धारा 9 के तहत इसका काम जिले में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा व संवर्द्धन करना है।

🛡️केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA)

  • CCPA पूरी तरह नई संस्था है, जो 1986 के अधिनियम में नहीं थी — धारा 10(1) के तहत केंद्र सरकार इसे अधिसूचना से स्थापित करती है ताकि उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन, गैर-वाजिब व्यापार व्यवहार और भ्रामक विज्ञापनों को नियंत्रित किया जा सके तथा उपभोक्ता अधिकारों को बढ़ावा, संरक्षण व प्रभावी क्रियान्वयन मिल सके।
  • इसमें एक मुख्य आयुक्त व केंद्र सरकार द्वारा तय संख्या में अन्य आयुक्त होते हैं, सभी केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त; ड्राफ्ट नियमों के मुताबिक इसमें मुख्य आयुक्त के अलावा 5 केंद्रीय आयुक्त और 5 क्षेत्रीय आयुक्त पूर्णकालिक तौर पर नियुक्त होंगे।
  • इसका मुख्यालय दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में है, और केंद्र सरकार अन्य स्थानों पर इसके क्षेत्रीय कार्यालय अधिसूचित कर सकती है; इसके आदेश के खिलाफ आदेश की तारीख से 30 दिन के भीतर राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है।
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त्रिस्तरीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग

The Three-Tier Consumer Disputes Redressal System

जिला से राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक — तीन पायदानों की यह न्याय-व्यवस्था कैसे बँटी है, कौन बैठता है और कितने दिनों में फैसला आता है, यहाँ एक नज़र में जानिए।

💰गठन व आर्थिक क्षेत्राधिकार

  • 2019 के अधिनियम में भी 1986 जैसी ही त्रिस्तरीय अर्ध-न्यायिक व्यवस्था कायम रखी गई है — जिला आयोग (धारा 28-41) राज्य सरकार द्वारा, राज्य आयोग (धारा 42-52) राज्य सरकार द्वारा, और राष्ट्रीय आयोग (धारा 53-73) केंद्र सरकार द्वारा गठित होता है।
  • जिला आयोग अपने जिले में उठे 50 लाख रुपये तक के विवाद सुनता है; राज्य आयोग 50 लाख से 2 करोड़ रुपये तक के विवाद तथा जिला आयोग के फैसलों के खिलाफ अपीलें सुनता है; राष्ट्रीय आयोग 2 करोड़ से अधिक के विवाद, राज्य आयोग के फैसलों के खिलाफ अपीलें, और CCPA के आदेशों के खिलाफ अपीलें सुनता है।

👩‍⚖️अध्यक्ष, सदस्य व पात्रता

  • राष्ट्रीय आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है (मुख्य न्यायाधीश की सलाह से केंद्र सरकार नियुक्त करती है); राज्य आयोग का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का, और जिला आयोग का अध्यक्ष जिला व सेशन जज स्तर का होता है — राज्य व जिला दोनों स्तर पर नियुक्ति चयन समिति की सिफारिश पर राज्य सरकार करती है।
  • सदस्य संख्या राष्ट्रीय आयोग में 4 से 11, राज्य आयोग में 4 से 10 (5 न्यायिक, 5 गैर-न्यायिक), और जिला आयोग में कम से कम 2 है; तीनों स्तरों पर अध्यक्ष या कम से कम एक सदस्य महिला होना अनिवार्य है।
  • 2023 के संशोधन के बाद अब राज्य आयोग के सदस्य के लिए 10 वर्ष और जिला आयोग के सदस्य के लिए भी 10 वर्ष का अनुभव चाहिए (पहले क्रमशः 20 और 15 वर्ष था); राष्ट्रीय आयोग के सदस्य के लिए न्यूनतम आयु 40 वर्ष व 25 साल का अनुभव जरूरी है, और किसी भी स्तर पर न्यायिक पृष्ठभूमि वाले सदस्य आधे से ज्यादा नहीं हो सकते।

🗓️कार्यकाल, पुनर्नियुक्ति व वेतन

  • कार्यकाल इस प्रकार तय है — राष्ट्रीय आयोग: अध्यक्ष 5 वर्ष/70 वर्ष आयु तक, सदस्य 5 वर्ष/67 वर्ष तक; राज्य आयोग: अध्यक्ष 4 वर्ष/67 वर्ष तक, सदस्य 4 वर्ष/65 वर्ष तक; जिला आयोग: अध्यक्ष व सदस्य दोनों 4 वर्ष/65 वर्ष तक — जो भी पहले आए।
  • तय आयु-सीमा के भीतर रहते हुए, चयन समिति की सिफारिश पर तीनों स्तरों पर अध्यक्ष व सदस्यों को एक बार फिर से नियुक्त किया जा सकता है।
  • वेतन-भत्तों में भी न्यायपालिका से समानता रखी गई है — राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष को सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश जितना, राज्य आयोग के अध्यक्ष को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जितना, और जिला आयोग के अध्यक्ष को सुपर टाइम स्केल में जिला न्यायाधीश जितना वेतन-भत्ता मिलता है; सदस्यों को क्रमशः अपर सचिव व उप सचिव स्तर के वेतनमान मिलते हैं।

📅अपील, परिसीमा व अवमानना दंड

  • धारा 69 के तहत तीनों स्तरों पर शिकायत वाद-कारण उत्पन्न होने की तारीख से दो साल के भीतर ही दायर की जा सकती है।
  • अपील की समय-सीमा है — जिला आयोग के आदेश के खिलाफ राज्य आयोग में 45 दिन, राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय आयोग में 30 दिन, और राष्ट्रीय आयोग के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में 30 दिन; भुगतान के आदेश वाली अपील तभी स्वीकार होती है जब तय राशि का 50% या 25,000 रुपये (जो भी कम हो) पहले जमा किया गया हो, और मध्यस्थता से हुए फैसले के खिलाफ अपील का कोई प्रावधान नहीं है।
  • धारा 72 के तहत किसी आयोग के आदेश की अवहेलना करने पर 1 महीने से 3 साल तक की कैद, 25 हजार से 1 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों साथ हो सकते हैं; ऐसे मामलों की सुनवाई में आयोगों को प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट जैसी शक्तियाँ हासिल हैं।
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शिकायत प्रक्रिया व राजस्थान में क्रियान्वयन

Complaint Procedure and Implementation in Rajasthan

शिकायत दर्ज कराने से लेकर आदेश पारित होने तक की पूरी राह, और राजस्थान में यह पूरा तंत्र ज़मीन पर कैसे काम करता है — यहाँ जानिए।

🙋‍♀️शिकायत कौन कर सकता है और कैसे

  • वह उपभोक्ता जिसे वस्तु बेची गई हो या सेवा दी गई हो, कोई भी मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संघ (भले ही पीड़ित उसका सदस्य न हो), समान हित वाले एक या अधिक उपभोक्ता जिला आयोग की अनुमति से, और खुद केंद्र या राज्य सरकार भी — ये सभी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
  • शिकायत के लिए कोई तय प्रारूप नहीं है — इसे जरूरी दस्तावेज़ों के साथ लिखित रूप में जिला आयोग कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से या डाक से जमा किया जा सकता है, या नए अधिनियम के तहत जुड़े इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग प्रावधान से ऑनलाइन भी दाखिल किया जा सकता है, जिससे उपभोक्ता के समय, श्रम व धन तीनों की बचत होती है।
  • शिकायत के साथ तय फीस जमा करानी होती है, और उसमें शिकायतकर्ता व विरोधी पक्षकार का नाम-पता, तथ्यों का ब्यौरा, समर्थन में सबूत, माँगी गई राहत और शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर होना जरूरी है।

🧑‍⚖️जिला आयोग की कार्यवाही

  • हर सुनवाई अध्यक्ष व कम से कम एक सदस्य की मौजूदगी में होती है; शिकायत मिलने के 21 दिन के भीतर उसे स्वीकार या अस्वीकार करना होता है, वरना वह अपने आप स्वीकृत मान ली जाती है; आयोग चाहे तो पक्षकारों को मध्यस्थता के लिए राज़ी होने को कह सकता है और सहमति मिलते ही 5 दिन में मामला मध्यस्थता को भेज देता है।
  • स्वीकृति के 21 दिन में विरोधी पक्षकार को शिकायत की प्रति भेजी जाती है, जिसे 30 दिन (15 दिन तक बढ़ाए जा सकने वाले) में जवाब देना होता है; अगर वस्तु के दोष के लिए प्रयोगशाला जाँच जरूरी हो तो नमूना भेजा जाता है और 45 दिन में रिपोर्ट माँगी जाती है; जवाब न मिलने पर आयोग सिर्फ शिकायतकर्ता के सबूतों के आधार पर एकपक्षीय आदेश दे सकता है।
  • सुनवाई में जिला आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ हासिल हैं, और इसकी कार्यवाही को न्यायिक/दांडिक कार्यवाही ही माना जाता है; अंतिम आदेश (धारा 39) में दोष सुधारने, वस्तु बदलने, ब्याज सहित मूल्य लौटाने, क्षतिपूर्ति या उत्पाद-दायित्व राशि देने का निर्देश दिया जा सकता है, जिस पर अध्यक्ष व संबंधित सदस्य दोनों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

⏱️निपटारे की समय-सीमा

  • जिन मामलों में प्रयोगशाला जाँच की जरूरत नहीं होती, उन्हें विरोधी पक्षकार को नोटिस मिलने के 3 महीने के भीतर निपटाया जाता है; जिनमें जाँच जरूरी है, उन्हें 5 महीने के भीतर निपटाने की कोशिश की जाती है।
  • राज्य आयोग भी जिला आयोग जैसी ही प्रक्रिया अपनाता है, और राज्य या राष्ट्रीय आयोग में दाखिल अपील को स्वीकृति के 90 दिन के भीतर निपटाने का प्रयास किया जाता है।

🐫राजस्थान में उपभोक्ता आयोग

  • राजस्थान राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग का मुख्यालय जयपुर में है, और जोधपुर, कोटा, उदयपुर, बीकानेर, अजमेर व भरतपुर में इसकी कुल 6 सर्किट बेंच काम करती हैं — अजमेर व भरतपुर की बेंच 18 मई 2012 को शुरू हुई थीं।
  • राजस्थान में अब तक कुल 37 जिला उपभोक्ता आयोग बन चुके हैं — जयपुर में 4, जोधपुर में 2 और बाकी हर जिले में एक-एक; राज्य की उपभोक्ता हेल्पलाइन 1800-180-6030 है, जबकि व्हाट्सएप हेल्पलाइन नंबर 7230086030 है।