राजस्थान की महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ
Rajasthan's Landmark Historical Events: A Timeline
पाषाण युग की बस्तियों से लेकर आधुनिक राजस्थान के गठन तक — तिथिवार यात्रा जो हर बड़े मोड़, संधि, साके और उपलब्धि को क्रमबद्ध ढंग से सामने रखती है।
प्रागैतिहासिक बस्तियाँ एवं आरंभिक राजपूत सत्ताओं का उदय
मानव की सबसे पहली बस्तियों से लेकर दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक — राजस्थान की धरती पर सभ्यता, राजवंश और सत्ता-संतुलन की सबसे पुरानी परतों की झलक।
🪨पाषाण व ताम्रपाषाण युग की बस्तियाँ
- राजस्थान में मानव की सबसे पुरानी बस्तियाँ लगभग एक लाख वर्ष पूर्व पुरापाषाण (प्राचीन पाषाण) युग में बसीं, इसके बाद लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व मध्यपाषाण और 10 हजार वर्ष पूर्व नवपाषाण युग की बस्तियाँ सामने आईं।
- भीलवाड़ा के निकट बागोर संस्कृति लगभग 4480 ई.पू. से 300 ई.पू. तक तीन चरणों में फली-फूली, जो इस क्षेत्र की सबसे लंबी मध्यपाषाण-ताम्रपाषाण कालानुक्रम शृंखलाओं में से एक है।
- ताँबे से समृद्ध गणेश्वर संस्कृति (लगभग 2500-1200 ई.पू.) और प्रसिद्ध कालीबंगा सभ्यता (लगभग 2300-1750 ई.पू.) राजस्थान को व्यापक हड़प्पा एवं पूर्व-हड़प्पा सांस्कृतिक जगत से सीधे जोड़ती हैं।
- वर्तमान उदयपुर के निकट केंद्रित आहड़ संस्कृति लगभग 1800 से 1200 ई.पू. के बीच फली-फूली और अपने विशिष्ट काले-लाल मृद्भांडों के लिए जानी जाती है।
🏺अन्य ताम्रपाषाणकालीन एवं प्राचीन संस्कृतियाँ
- राजस्थान के प्राचीन कालक्रम में कई छोटी क्षेत्रीय संस्कृतियाँ भी शामिल रहीं — गिलुंड (लगभग 700-300 ई.पू.), भरतपुर के निकट नोह (लगभग 1200-900 ई.पू.) और सुनारी (लगभग 1200 ई.पू.-200 ई.पू.)।
- तिलवाड़ा, बैराठ, नगरी, रैढ़, नलियासर, नगर, रंगमहल और भीनमाल जैसे बाद के स्थल मिलकर लगभग 500 ई.पू. से लेकर लगभग 900 ई. तक के काल को समेटे हुए हैं।
- लगभग 300 से 100 ई.पू. के बीच फली-फूली बैराठ अपने मौर्यकालीन बौद्ध अवशेषों के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है, वहीं भीनमाल आगे चलकर प्रारंभिक मध्यकाल में विद्या और सत्ता के एक बड़े केंद्र के रूप में उभरा।
⚔️यवन आक्रमण, संवत् एवं गुर्जर-प्रतिहार-गुहिल वंश
- लगभग 187 ई.पू. में यवन (यूनानी) राजा डेमेट्रियस ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, और लगभग 150 ई.पू. में मालव जनजातियाँ राजस्थान-मालवा क्षेत्र में आ बसीं।
- आज भी प्रचलित दो प्रमुख कालगणनाएँ इसी काल से जुड़ी हैं — विक्रम संवत् की शुरुआत 57 ई.पू. में हुई, जबकि शक संवत् की शुरुआत 78 ई. में हुई।
- 566 ई. में गुहिल ने मेवाड़ के गुहिल वंश की स्थापना की, वहीं उत्तर की ओर गुर्जर-प्रतिहार सत्ता का चरम मिहिर भोज के काल में देखने को मिला, जो 836 ई. में सिंहासन पर बैठे।
- लगभग 728 ई. में (कुछ स्रोतों के अनुसार 734 ई. में) बप्पा रावल ने मौर्य शासक मानमोरी से चित्तौड़ का राज्य और दुर्ग छीन लिया — इसे प्रायः मेवाड़ की सिसोदिया सत्ता की वास्तविक शुरुआत माना जाता है।
🏰चौहान वंश का उदय एवं अजमेर-जैसलमेर की स्थापना
- लगभग 736 ई. में गुर्जर सत्ता के कमजोर पड़ने के साथ राजस्थान में चौहान शासन की नींव पड़ी, और 973 ई. तक यह वंश प्रतिहारों के आधिपत्य से पूर्णतः स्वतंत्र हो गया।
- 1113 ई. में चौहान अजयराज ने अजयमेरु (अजमेर) नगर की स्थापना की; एक पीढ़ी बाद अर्णोराज ने मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय के स्थल पर वहीं अनासागर झील का निर्माण करवाया।
- राव जैसल ने जैसलमेर की स्थापना की और 12 जुलाई 1155 ई. को इसके पहाड़ी दुर्ग की नींव रखी, जिससे भाटी राजपूतों को पश्चिमी मरुभूमि में एक सुदृढ़ नया गढ़ मिला।
🛡️पृथ्वीराज चौहान तृतीय, तराइन के युद्ध व दिल्ली सल्तनत की स्थापना
- मई 1166 ई. में जन्मे पृथ्वीराज चौहान तृतीय 1177 ई. में अजमेर की गद्दी पर बैठे और आगे चलकर जयानक द्वारा 1190 ई. में अजमेर में रचित महाकाव्य 'पृथ्वीराज विजय' के नायक बने।
- तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में पृथ्वीराज ने थानेसर के निकट मुहम्मद गौरी को पराजित किया, किंतु अगले वर्ष तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में वे स्वयं पराजित होकर बंदी बना लिए गए।
- 1194 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर पर पुनः अधिकार कर वहाँ मुस्लिम सूबेदार नियुक्त कर उसकी स्वतंत्रता समाप्त कर दी, जबकि ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती इससे मात्र एक वर्ष पहले, 1195 ई. में, नगर में आ चुके थे।
- 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक के राज्यारोहण के साथ दिल्ली सल्तनत की औपचारिक स्थापना हुई, और 1210 ई. तक सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने जालौर को जीतकर सल्तनत का नियंत्रण राजस्थान में और गहरा कर दिया।
सल्तनत काल के साके एवं मेवाड़-मारवाड़ का उत्कर्ष
दिल्ली सल्तनत के विस्तार के साथ राजस्थान के दुर्गों ने साके और जौहर की सबसे मार्मिक गाथाएँ रचीं, जबकि महाराणा कुंभा और राठौड़ शासकों ने मेवाड़-मारवाड़ को नई ऊँचाई पर पहुँचाया।
⚔️रणथम्भौर व चित्तौड़ के प्रथम साके (1301-03 ई.)
- राजस्थान का प्रथम साका माना जाने वाला रणथम्भौर 1301 ई. में गिरा, जब अलाउद्दीन खिलजी ने पराक्रमी राव हम्मीरदेव चौहान को पराजित किया और दुर्ग की रानियों-वीरांगनाओं ने जौहर किया।
- उसी विजय से उत्साहित होकर और रानी पद्मिनी को पाने की चर्चित इच्छा से प्रेरित होकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और 28 जनवरी 1303 ई. को उसे जीत लिया — इसे चित्तौड़ का प्रथम साका कहा जाता है — और अपने पुत्र खिज्र खाँ को वहाँ का शासक नियुक्त किया।
🗡️सिवाना व जालौर के साके (1308-1312 ई.)
- 1308 ई. में सिवाना के प्रथम साके में वीर सातलदेव और सोम (सोमेश्वर) ने अलाउद्दीन खिलजी के प्रचंड आक्रमण का सामना करते हुए प्राण त्याग दिए और दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया; विजयी सुल्तान ने दुर्ग का नाम बदलकर खैराबाद रख दिया।
- 1311-12 ई. में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्रमण किया, जहाँ शासक कान्हड़दे सोनगरा चौहान और उनके पुत्र वीरमदेव के बलिदान की गाथा कालजयी बन गई, जिसे कवि पद्मनाभ ने अपनी रचनाओं 'कान्हड़दे प्रबन्ध' और 'वीरमदेव सोनगरा की वात' में अमर कर दिया।
🏜️जैसलमेर के प्रथम व द्वितीय साके (1312-1331 ई.)
- जैसलमेर का प्रथम साका 1312-13 ई. में हुआ, जब अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना के साथ दुर्ग को घेर लिया; भाटी शासक रावल मूलराज, कुँवर रतनसी सहित अनगिनत योद्धा असिधारा व्रत निभाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और स्त्रियों ने जौहर किया — इसका वर्णन 'तारीख-ए-मासूमी' में मिलता है।
- जैसलमेर का द्वितीय साका 1331 ई. में हुआ, जब दिल्ली सल्तनत के फिरोजशाह तुगलक के विरुद्ध युद्ध में रावल दूदा, उनके भाई तिलोकसी व कई राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए और दुर्ग की स्त्रियों ने पुनः जौहर किया।
🏰गागरोन के दो साके (1423 व 1444 ई.)
- गागरोन का प्रथम साका 1423 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान होशंगशाह (अलपखाँ गौरी) ने अचलदास खींची के शासनकाल में दुर्ग पर आक्रमण किया।
- इसका द्वितीय साका 1444 ई. में हुआ, जब सुल्तान महमूद खिलजी ने अचलदास खींची के पुत्र पाल्हणसी के अधीन गागरोन को घेरकर जीत लिया और उसका नाम मुस्तफाबाद रख दिया — इसका विस्तृत वर्णन 'मआसिरे महमूदशाही' में मिलता है।
👑महाराणा कुंभा की उपलब्धियाँ
- 1433 ई. में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे महाराणा कुंभा ने 1437 ई. में सारंगपुर के युद्ध में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को हराया और 1443 ई. में कुंभलगढ़ के निकट उसे फिर से पीछे धकेल दिया।
- उनका भव्य विजय स्तंभ 1448 ई. में पूर्ण हुआ, और उन्होंने कुंभलगढ़ दुर्ग (1458 ई.) तथा माउंट आबू के अचलगढ़ दुर्ग (1452 ई.), दोनों की प्रतिष्ठा करवाई।
- फिर भी 1456 ई. में मालवा व गुजरात के सुल्तानों ने चंपानेर की संधि की, जिसमें उन्होंने कुंभा पर संयुक्त आक्रमण कर उसका राज्य आपस में बाँटने पर सहमति जताई।
🐎राठौड़ वंश का विस्तार — जोधपुर व बीकानेर की स्थापना
- 1458 ई. में मंडोर में राज्याभिषेक करवाने वाले राव जोधा ने 12 मई 1459 ई. को मेहरानगढ़ दुर्ग बनवाया और उसके तले जोधपुर नगर की स्थापना की।
- राव जोधा के पुत्र बीका ने 30 दिसंबर 1465 ई. को अपने चाचा कांधल के साथ जांगलू क्षेत्र को जीतने के लिए प्रस्थान किया और बीकानेर नामक नए राज्य की स्थापना की; नगर और उसका दुर्ग 1488 ई. में पूर्ण हुए।
💥महाराणा सांगा व खानवा का युद्ध
- 12 अप्रैल 1482 ई. को जन्मे और 1509 ई. में राज्याभिषिक्त हुए महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) ने 1517 ई. में खातोली गाँव के निकट दिल्ली सुल्तान इब्राहीम लोदी को पराजित किया।
- किंतु 17 मार्च 1527 ई. को खानवा के युद्ध में सांगा बाबर से पराजित हो गए — भारत का यह पहला युद्ध था जिसमें बारूद और तोपों का प्रयोग हुआ — इसमें डूंगरपुर के रावल उदयसिंह, रतनसिंह चूंडावत और हसनखाँ मेवाती जैसे योद्धा मारे गए।
मेवाड़-मुगल संघर्ष एवं गठबंधन
एक ओर मेवाड़ ने मुगलों के विरुद्ध अद्वितीय प्रतिरोध की मिसाल कायम की, तो दूसरी ओर आमेर जैसे राज्यों ने वैवाहिक गठबंधनों से मुगल दरबार में अपना कद ऊँचा किया।
🔥चित्तौड़ का द्वितीय व तृतीय साका
- चित्तौड़ का द्वितीय साका तब हुआ जब गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने 1534 ई. में दुर्ग पर पुनः आक्रमण किया; 8 मार्च 1535 ई. को राजमाता कर्मवती व सैकड़ों स्त्रियों ने जौहर किया, जबकि रावत बाघसिंह, राणा सज्जा और सिंहा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
- चित्तौड़ का तीसरा और अंतिम साका 1567-68 ई. में हुआ, जब अकबर ने राणा उदयसिंह के शासनकाल में दुर्ग को घेर लिया; जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया के नेतृत्व में हुए प्रतिरोध और पत्ता की पत्नी फूलकँवर के नेतृत्व में हुए जौहर को आज भी याद किया जाता है — अंततः 25 फरवरी 1568 ई. को अकबर ने दुर्ग जीत लिया।
💍आमेर के मुगलों से वैवाहिक संबंध
- आमेर के भारमल ने 20 जनवरी 1562 ई. को सांगानेर में अकबर की अधीनता स्वीकार की, और कुछ ही सप्ताह बाद 6 फरवरी 1562 ई. को अकबर ने उनकी पुत्री हरखाबाई से विवाह किया, जो आगे चलकर साम्राज्ञी मरियम-उज़-ज़मानी के नाम से प्रसिद्ध हुईं और जिनकी कोख से सम्राट जहाँगीर का जन्म हुआ।
- 4 दिसंबर 1589 ई. को आमेर की गद्दी पर बैठे मानसिंह अकबर के सबसे विश्वसनीय सेनापतियों में से एक बने और हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप को पराजित करने वाली मुगल सेना का नेतृत्व किया।
🗡️महाराणा प्रताप व हल्दीघाटी का युद्ध
- 9 मई 1540 ई. को जन्मे महाराणा प्रतापसिंह ने 1 मार्च 1572 ई. को गोगुंदा में राज्याभिषेक करवाया और मुगलों की अधीनता के बजाय प्रतिरोध का मार्ग चुना।
- हल्दीघाटी का युद्ध 18/21 जून 1576 ई. को प्रताप और मुगल सेनापति मानसिंह कछवाहा के बीच लड़ा गया, जिसमें मानसिंह विजयी रहे, फिर भी प्रताप बच निकलकर अपना प्रतिरोध जारी रखने में सफल रहे।
- 1586 ई. तक प्रताप ने चित्तौड़गढ़ और मंडलगढ़ को छोड़कर लगभग पूरे मेवाड़ पर पुनः अधिकार कर लिया था, और वे अपराजित भावना के साथ 19 जनवरी 1597 ई. को स्वर्गवासी हुए।
🌊राजसमंद व जयसमंद झीलें तथा श्रीनाथजी की स्थापना
- महाराणा राजसिंह ने 1 जनवरी 1662 ई. को राजसमुद्र (राजसमंद) झील की नींव खुदवानी आरंभ करवाई, जिसका नामकरण 1676 ई. में हुआ।
- जयसमंद झील, जिसकी नींव 1687 ई. में रखी गई थी, महाराणा जयसिंह के काल में 1691 ई. में पूर्ण हुई।
- श्रीनाथजी की प्रतिमा को चौपासनी (जोधपुर) से बनास नदी के तट पर स्थित सिहाड़ गाँव — आज का नाथद्वारा — लाया गया और वहाँ 10 फरवरी 1672 ई. को स्थापित किया गया।
⚔️शाहजहाँ-औरंगजेब काल के संघर्ष
- 16 अप्रैल 1658 ई. को धरमत के युद्ध में औरंगजेब की सेना ने दारा की शाही सेना को पराजित कर उसके सिंहासन तक पहुँचने का मार्ग खोल दिया; उसने 30 मई 1658 ई. को सामूगढ़ में और मार्च 1659 ई. में अजमेर के निकट दौराई में दारा को पुनः पराजित किया।
- 1665 ई. में पुरन्दर की संधि हुई, जिसके तहत आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह ने शिवाजी को औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करने पर विवश कर दिया।
- 4 अप्रैल 1679 ई. को औरंगजेब ने हिंदुओं पर जज़िया पुनः लगाने का आदेश दिया, और उसी वर्ष 7 फरवरी को जोधपुर के विरुद्ध सेना भेजी — यहीं से शिशु महाराजा अजीतसिंह को पुनर्स्थापित करने के लिए राठौड़ों के लंबे संघर्ष की शुरुआत हुई।
🐎दुर्गादास राठौड़ व अजीतसिंह का संघर्ष
- कुँवर अजीतसिंह का जन्म 19 फरवरी 1679 ई. को लाहौर में महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की रानी के यहाँ हुआ; दुर्गादास राठौड़ इस शिशु राजकुमार को 23 जुलाई 1679 ई. को गुपचुप जोधपुर ले आए तथा 2 अगस्त को उनका राज्याभिषेक संस्कार करवाया, यद्यपि औरंगजेब की सेना ने शीघ्र ही नगर पर पुनः अधिकार कर लिया।
- 13 अगस्त 1638 ई. को जन्मे दुर्गादास ने राठौड़ों के हित में दशकों तक संघर्ष किया; औरंगजेब की मृत्यु के तुरंत बाद 19 मार्च 1707 ई. को महाराजा अजीतसिंह अंततः स्थायी रूप से जोधपुर दुर्ग में प्रविष्ट हुए।
- 1708 ई. का देबारी समझौता — जोधपुर के अजीतसिंह, आमेर के सवाई जयसिंह और मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय के बीच — निरंतर मुगल दबाव के विरुद्ध तीनों राजवंशों को एकजुट करने के उद्देश्य से किया गया था।
जाट-मराठा उभार एवं अंग्रेजों से संधियाँ
मुगल सत्ता के कमजोर पड़ते ही जाट सरदारों और मराठा सरदारों ने राजस्थान की राजनीति में गहरी पैठ बनाई, अंततः राजपूत राज्यों ने एक-एक कर अंग्रेजों से संधियाँ कर सुरक्षा तलाशी।
🌾जाट सत्ता का उत्कर्ष — चूड़ामन व बदनसिंह
- 1713 ई. में जहांदरशाह और फर्रुखसियर के बीच हुए युद्ध में दोनों पक्षों को लूटने के बाद चूड़ामन जाट को 'राव' की उपाधि देकर शाही मार्गों की चौकसी का दायित्व सौंपा गया; उनका निधन अक्टूबर 1721 ई. में हुआ।
- बदनसिंह ने 17 मार्च 1722 ई. को डीग की जमींदारी का औपचारिक कार्यभार संभाला, और उसी वर्ष मुगल सेना द्वारा थून दुर्ग की घेराबंदी व विजय के बाद 2 दिसंबर 1722 ई. को उन्हें जाट राज्य का विधिवत मुखिया बनाया गया।
🏙️जयपुर की स्थापना व मराठा दबाव
- सवाई जयसिंह ने 18 नवंबर 1727 ई. को जयपुर नगर की नींव रखी, जो शीघ्र ही एक सुनियोजित राजधानी के रूप में आमेर को पीछे छोड़ने वाली थी।
- अपने रुतबे के बावजूद फरवरी 1733 ई. में मंदसौर के निकट मराठों के विरुद्ध असफल रहने पर सवाई जयसिंह को उन्हें चौथ (राजस्व का चौथाई भाग) देना स्वीकार करना पड़ा; उनका निधन 21 सितंबर 1743 ई. को हुआ।
🌳खेजड़ली बलिदान व हुरड़ा सम्मेलन
- विक्रम संवत् 1787 (1730 ई.) में जोधपुर के निकट खेजड़ली गाँव में अमृता देवी के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुषों ने हरे पेड़ों की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए — इस घटना की स्मृति में हर वर्ष 12 सितंबर को खेजड़ली दिवस मनाया जाता है।
- 17 जुलाई 1734 ई. को राजस्थान के राजपूत शासक मराठों का सम्मिलित रूप से मुकाबला करने हेतु एक अहदनामा (लिखित समझौता) तैयार करने के लिए मेवाड़ की सीमा पर हुरड़ा में एकत्र हुए, और कुछ ही दिन बाद 28 जुलाई को सवाई जयसिंह ने अश्वमेध यज्ञ किया।
🏹भरतपुर के जाट शासक सूरजमल
- भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने जाट सैन्य शक्ति के चरम पर 12 जून 1761 ई. को आगरा नगर व दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
- सूरजमल ने 25 दिसंबर 1763 ई. को दिल्ली के निकट मुगल सेनापति नजीबुद्दौला से युद्ध किया; उनकी मृत्यु के बाद 1776 ई. में मिर्जा नजफ खाँ ने जाट राज्य के अधिकांश केंद्रीय क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, यद्यपि भरतपुर परगना बाद में लौटा दिया गया।
📃सांभर की संधि, सहायक संधियाँ व कृष्णाकुमारी विवाद
- 1790 ई. में पाटन और मेड़ता में सिंधिया की सेना द्वारा मारवाड़-जयपुर की संयुक्त सेना को करारी शिकस्त देने के बाद मारवाड़ शासक विजयसिंह को सांभर की संधि के तहत पूर्ण समर्पण करना पड़ा।
- भरतपुर के रणजीत सिंह 29 सितंबर 1803 ई. को लॉर्ड वेलेजली से सहायक संधि करने वाले राजस्थान के पहले शासक बने; अगले एक वर्ष में अलवर, जयपुर, जोधपुर और धौलपुर ने भी इसका अनुसरण किया।
- महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णाकुमारी के विवाह को लेकर उठे विवाद ने जयपुर और जोधपुर के बीच गिंगोली के युद्ध (13 मार्च 1807 ई.) को जन्म दिया; यह विवाद तभी थमा जब सलाहकारों की राय पर भीमसिंह ने 21 जुलाई 1810 ई. को स्वयं अपनी पुत्री को विष देकर उसका अंत किया।
🤝1818 की संधियाँ व कर्नल टॉड का आगमन
- 1818 ई. के दौरान राजपूत राज्यों ने एक के बाद एक अंग्रेजों से मित्रता व संरक्षण की संधियाँ कीं — जोधपुर (6 जनवरी), उदयपुर/मेवाड़ (13 जनवरी), बीकानेर (9 मार्च), जयपुर (2 अप्रैल) और जैसलमेर (12 दिसंबर)।
- कर्नल जेम्स टॉड 8 मार्च 1818 ई. को मेवाड़ व हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट के रूप में उदयपुर पहुँचे, और अंग्रेजों ने 28 जुलाई 1818 ई. को अजमेर पर औपचारिक अधिकार कर लिया।
औपनिवेशिक सुधार, स्वतंत्रता संग्राम व राजस्थान निर्माण
अंग्रेजी शासन के सामाजिक सुधारों से लेकर 1857 के विद्रोह, प्रजामंडल आंदोलन और अंततः वृहद् राजस्थान के निर्माण तक — आधुनिक राजस्थान की यात्रा की पूरी कहानी।
⚖️सामाजिक सुधार व 1857 का विद्रोह
- गवर्नर जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 4 दिसंबर 1829 ई. को सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया, और अप्रैल 1853 ई. में मेवाड़ भील कोर के कमांडेंट जे.सी. बुक ने खैरवाड़ा में डाकन (डायन-हत्या) प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया।
- भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 10 मई 1857 ई. को मेरठ से आरंभ हुआ; राजस्थान में एरिनपुरा (21 मई) और नसीराबाद छावनी (28 मई) में सैनिकों ने विद्रोह किया।
- कोटा के विद्रोहियों ने मेहराबखाँ और जयदयाल के नेतृत्व में 15 अक्टूबर 1857 ई. को अंग्रेजी रेजीडेंसी पर हमला किया और उसके बाद प्रजा की इच्छा के अनुसार लगभग छह माह तक स्वतंत्र शासन चलाया।
🚂रेल, शिक्षा व आधुनिक संस्थाएँ (1858-1888)
- 15 अगस्त 1861 ई. को मेवाड़ में सती प्रथा और जीते-जी समाधि लेने की प्रथा गैर-कानूनी घोषित की गई, और उसी दौर में 21 अक्टूबर 1875 ई. को अजमेर में मेयो कॉलेज का संचालन आरंभ हुआ।
- जयपुर की पहली रेल लाइन अप्रैल 1874 ई. में आगरा फोर्ट व बांदीकुई के बीच खुली, और 1876 ई. में शासक सवाई रामसिंह द्वितीय ने राजकुमार अलबर्ट एडवर्ड के स्वागत में नगर को गुलाबी रंग से रंगवाया — यहीं से जयपुर 'गुलाबी नगर' कहलाने लगा।
- 1 जनवरी 1877 ई. को दिल्ली दरबार में, जिसमें 75 भारतीय शासक उपस्थित हुए, महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया।
🌾किसान आंदोलन — बिजौलिया व मानगढ़
- बिजौलिया किसान आंदोलन 1897 ई. में आरंभ हुआ और विजयसिंह पथिक के नेतृत्व (1916 ई. से) में जारी रहते हुए 14 जून 1929 ई. को अंततः समाप्त हुआ, जब किसानों को उनकी भूमि लौटा दी गई।
- बाँसवाड़ा में राज्य के दमन के बाद गोविंद गुरु के नेतृत्व में उपजा भील आंदोलन 17 नवंबर 1913 ई. को मानगढ़ पहाड़ी पर हिंसक टकराव में बदल गया, जहाँ मेवाड़ भील कोर व वेलेजली राइफल्स ने लगभग 1500 भीलों की हत्या कर गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर लिया — इस घटना ने भीलों में राजनैतिक चेतना जगाई।
✊प्रजामंडल आंदोलन का उदय
- जयपुर प्रजामंडल की स्थापना 1931 ई. में कर्पूरचंद पाटनी की अध्यक्षता में हुई, इसके बाद 24 अप्रैल 1938 ई. को बलवंतसिंह की अध्यक्षता में मेवाड़ प्रजामंडल बना, जिसका प्रथम अधिवेशन जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में 8-9 मई 1938 ई. को हुआ।
- 21 अगस्त 1942 ई. को मेवाड़ प्रजामंडल ने महाराणा के समक्ष 'भारत छोड़ो आंदोलन' का प्रस्ताव रखा और अंग्रेजों से संबंध विच्छेद करने का आग्रह किया, जो रियासतों में इस आंदोलन के बढ़ते उग्र स्वरूप को दर्शाता है।
🕯️सागरमल गोपा का बलिदान व स्वतंत्रता की पूर्व संध्या
- स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा को 1941 ई. में जैसलमेर रियासत ने गिरफ्तार किया; जेल में अमानवीय यातनाओं के बाद 3 अप्रैल 1946 ई. को उन्हें आग लगा दी गई, जिससे अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई — इसे उस दौर की सबसे मार्मिक घटनाओं में गिना जाता है।
- 5 जुलाई 1947 ई. को सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में रियासती सचिवालय की स्थापना हुई, जिसने भारत की देशी रियासतों के एकीकरण की बातचीत शुरू की और स्वतंत्रता से कुछ ही सप्ताह पहले राजस्थान के अपने एकीकरण की भूमिका तैयार की।
🗺️मत्स्य संघ, राजस्थान संघ व वृहद् राजस्थान
- 18 मार्च 1948 ई. को अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली रियासतों को मिलाकर 'मत्स्य संघ' बनाया गया, जिसका राजप्रमुख धौलपुर के शासक को तथा राजधानी अलवर को बनाया गया।
- 25 मार्च 1948 ई. को कोटा, बूँदी, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, शाहपुरा, झालावाड़, टोंक व किशनगढ़ रियासतों को मिलाकर 'राजस्थान संघ' का गठन किया गया; 18 अप्रैल 1948 ई. को उदयपुर के इसमें शामिल होने से बना 'संयुक्त राजस्थान' प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा उद्घाटित किया गया।
- 30 मार्च 1949 ई. को जयपुर, जोधपुर, बीकानेर व जैसलमेर के संयुक्त राजस्थान में विलय से 'वृहद् राजस्थान' बना, और 15 मई 1949 ई. को मत्स्य संघ के इसमें मिलने से 'संयुक्त वृहत्तर राजस्थान' अस्तित्व में आया।
🏛️राजस्थान का अंतिम एकीकरण व प्रारंभिक मुख्यमंत्री
- सिरोही राज्य (आबूरोड व देलवाड़ा तहसीलों को छोड़कर, जो बम्बई राज्य में मिलाई गईं) 26 जनवरी 1950 ई. को राजस्थान में मिला, और 1 नवंबर 1956 ई. को अजमेर, आबू व सुनेल टप्पा भी अंततः जुड़ गए — जबकि सिरोंज मध्यप्रदेश में चला गया — जिससे राजस्थान को उसका वर्तमान स्वरूप मिला और राजप्रमुख पद समाप्त कर दिया गया।
- हीरालाल शास्त्री ने जयपुर में राजस्थान के प्रथम मंत्रिमंडल का नेतृत्व किया, इसके बाद 29 मार्च 1952 ई. को उद्घाटित 160 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा के चुनावों के बाद 3 मार्च 1952 ई. को टीकाराम पालीवाल राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।
🗳️पंचायती राज, भूमि सुधार व आधुनिक मुख्यमंत्री
- राजस्थान में जागीरदारी प्रथा की समाप्ति की शुरुआत 16 जून 1954 ई. को हुई, जब सीकर व खेतड़ी की जागीरों को सबसे पहले पुनर्ग्रहीत किया गया।
- प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 ई. को नागौर में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण (पंचायती राज) का उद्घाटन किया, जिसे राजस्थान पंचायत समिति व जिला परिषद् अधिनियम, 1959 के माध्यम से औपचारिक कानूनी रूप मिला।
- 8 दिसंबर 2003 ई. को वसुंधरा राजे ने राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, वहीं अशोक गहलोत तीन अलग-अलग बार इस पद पर रहे, उनकी सबसे हालिया शपथ 17 दिसंबर 2018 ई. को हुई।
🏆आधुनिक राजस्थान की उपलब्धियाँ व घटनाएँ
- यूनेस्को ने 1 अगस्त 2010 ई. को जयपुर के जंतर-मंतर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया, जो नगर की खगोलीय विरासत की दशकों की पहचान का शिखर रहा।
- 13 जनवरी 2014 ई. को जैसलमेर के थईआत गाँव में डायनासोर के पदचिह्न मिले, जिसने इस क्षेत्र की लंबी भूवैज्ञानिक गाथा में एक प्रागैतिहासिक कड़ी जोड़ दी।
- 13 मई 2008 ई. को जयपुर में सिलसिलेवार नौ बम विस्फोट हुए, और 31 जनवरी 2020 ई. को देश का पहला कोरोना संक्रमित रोगी मिला — इक्कीसवीं सदी के राजस्थान के इतिहास के दो बिल्कुल भिन्न पड़ाव।