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राजस्थान GK

राजस्थान की रियासतें एवं ब्रिटिश संधियाँ

Princely States & British Treaties

मराठा उत्पात से त्रस्त राजपूताना की रियासतों के ब्रिटिश शरण अपनाने से लेकर 1803 की पहली संधियों, 1817-18 की अधीनस्थ पार्थक्य नीति, और 1867-82 की प्रत्यर्पण व नमक संधियों तक — राजस्थान पर ब्रिटिश आधिपत्य की पूरी कहानी।

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पृष्ठभूमि: मराठा उत्पात और राजपूताना का ब्रिटिश शरण की ओर रुख़

Prelude: Maratha Turmoil and Rajputana's Turn to the British

किसी भी संधि पर हस्ताक्षर होने से पहले राजस्थान के शासक दशकों तक मराठा धाड़ों और पिंडारी लुटेरों से जूझते रहे — इसी उथल-पुथल ने अंततः उन्हें क्षितिज पर उभरती एक नई शक्ति की ओर देखने को मजबूर किया।

🏴ईस्ट इंडिया कंपनी का उदय

  • एशिया में मुनाफे की तलाश में उतरे अंग्रेज सौदागरों का यह विशुद्ध व्यापारिक उद्यम 1757 के प्लासी युद्ध के बाद राजनीतिक रूप ले बैठा, जब ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल की सत्ताधारी शक्ति बन गई — यही आगे चलकर पूरे भारत पर उसके वर्चस्व की पहली सीढ़ी साबित हुई।
  • इतिहासकार परवर्ती मुगल-मराठा कालखंड को मध्य भारत में राजनीतिक अव्यवस्था और दिशाहीनता का दौर मानते हैं — एक ऐसा शून्य जिसका लाभ बाहरी शक्तियों ने बिना देर किए उठाया।

🐎राजस्थान में मराठों की धाड़ें

  • धन बटोरने की नीयत से मराठों ने सबसे पहले 1711 में मेवाड़ के रास्ते राजस्थान में प्रवेश किया और 1726 में कोटा-बूँदी पर धावा बोला; 1728 आते-आते त्रस्त डूँगरपुर-बाँसवाड़ा के शासकों ने राहत पाने के लिए उन्हें खिराज देना ही मंजूर कर लिया।
  • उनका पहला असली राजनीतिक हस्तक्षेप बूँदी में 22 अप्रैल 1734 को हुआ, जब पदच्युत शासक बुद्धसिंह ने मराठा ताकत के बल पर दलेल सिंह को गद्दी से उतार फेंका; 1742 तक वे मारवाड़ में भी घुस आए और सोजत, रायपुर व जैतारण से चौथ वसूलने लगे, जबकि अमीर खाँ पिण्डारी के धाड़ैत भी राजपूताने भर में लूटपाट मचाते रहे।

🏳️हुरड़ा सम्मेलन (1734)

  • मराठा आक्रमणों से चिंतित जयपुर के सवाई जयसिंह ने 17 जुलाई 1734 को मेवाड़ के हुरड़ा (भीलवाड़ा) में जोधपुर, उदयपुर, कोटा, किशनगढ़, नागौर व बीकानेर के शासकों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया, पर आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते यह सम्मेलन वांछित एकता नहीं दिला सका।

🛡️राजपूताना का ब्रिटिश शरण की ओर झुकाव

  • मराठा व पिंडारी लूटमार से बुरी तरह त्रस्त राजपूताना के शासकों को इस उथल-पुथल से निकलने का सबसे बेहतर रास्ता अंग्रेजी शरण ही नजर आने लगा — यही सोच अगली एक सदी तक क्षेत्र की राजनीति की दिशा तय करने वाली थी।
  • वारेन हेस्टिंग्ज 1772 में बंगाल के प्रथम गवर्नर जनरल बने; तीन दशक बाद 1791 में अंबाजी इंगले की मदद से मेवाड़ के महाराणा ने डूँगरपुर, बाँसवाड़ा व प्रतापगढ़ पर अपना नियंत्रण जमा लिया।

🤝वैलेजली और सहायक संधि प्रणाली

  • 1798 में गवर्नर जनरल बनकर आए लॉर्ड वैलेजली को 'सहायक संधि' प्रणाली का जनक माना जाता है — इसका पहला प्रयोग उसी वर्ष हैदराबाद के निजाम पर किया गया और बाद में यह पूरे भारत, राजपूताना सहित, तक फैलाई गई।

⚔️राजपूत प्रयास और आंग्ल-मराठा युद्ध (1776-1805)

  • किसी राजपूत राज्य द्वारा अंग्रेजी गठबंधन का सबसे पहला प्रयास 1776 में हुआ, जब जयपुर के महाराजा पृथ्वीसिंह ने अपना वकील कलकत्ता भेजा; इसके बाद 1781 में जोधपुर के विजयसिंह और 1786 में जयपुर के प्रतापसिंह ने भी मराठों के विरुद्ध अंग्रेजी मदद पाने की कोशिश की।
  • 1802 में अमीर खाँ पिण्डारी ने नाथद्वारा पर कब्जा जमाया, इसी वर्ष पेशवा ने बेसिन की संधि के जरिए अंग्रेजी अधीनता स्वीकार की; अगस्त 1803 के युद्ध में मराठों की करारी हार के बाद दौलतराव सिंधिया की सुर्जी अर्जनगाँव संधि (30 दिसंबर 1803) से जयपुर व जोधपुर अंग्रेजी प्रभाव में आ गए, हालाँकि मेवाड़ का उसी वर्ष जयपुर के जरिए संधि करने का प्रयास असफल रहा।
  • नवंबर 1803 में लॉर्ड लेक ने राजस्थान की उत्तर-पूर्वी सीमा पर लासवाड़ी के युद्ध में सिंधिया को बुरी तरह हराया, और द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-04) में मराठों की व्यापक हार के बाद वैलेजली ने सिंधिया की ताकत को स्थायी रूप से सीमित करने के लिए राजपूत राज्यों से संधियाँ करने पर जोर दिया।

💡मेटकॉफ का परिसंघ विचार (1811)

  • 1811 में सेटन के स्थान पर दिल्ली का रेजीडेंट बने चार्ल्स मेटकॉफ ने गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो को सुझाव दिया कि मराठों, अमीर खाँ और पिंडारियों की विध्वंसक धाड़ों को हमेशा के लिए रोकने हेतु ब्रिटिश संरक्षण में राजपूत राज्यों का एक परिसंघ खड़ा किया जाए।

🏰ब्रिटिश आधिपत्य की दहलीज़ पर राजस्थान की रियासतें

  • 19वीं सदी के आरंभ में राजस्थान में 20 रियासतें थीं — 17 राजपूत, 2 जाट और एक मुस्लिम रियासत — यही वह राजनीतिक परिदृश्य था जिस पर जल्द ही ब्रिटिश आधिपत्य की मुहर लगने वाली थी।
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प्रारंभिक सहायक संधियाँ (1803-05)

The Earliest Subsidiary Treaties (1803-05)

लॉर्ड हेस्टिंग्ज के व्यापक 1817-18 अभियान से पहले ही भरतपुर, अलवर, जयपुर, जोधपुर, धौलपुर और प्रतापगढ़ जैसी कुछ रियासतें सहायक संधि की राह आजमा चुकी थीं — नतीजे मिले-जुले और अक्सर अल्पकालिक ही रहे।

🏹भरतपुर — राजस्थान की प्रथम सहायक संधि

  • राजस्थान की सबसे पहली सहायक संधि लॉर्ड वैलेजली ने भरतपुर के महाराजा रणजीत सिंह के साथ 29 सितंबर 1803 को की, जिसकी पुष्टि 22 अक्टूबर 1803 को हुई।
  • 1804 में रणजीत सिंह द्वारा भगोड़े यशवंतराव होल्कर को शरण देने और उसे सौंपने से इनकार करने पर लॉर्ड लेक की सेना ने भरतपुर पर घेरा डाला, पर सफलता नहीं मिली; अंततः 10 अप्रैल 1805 को एक नई संधि हुई।

📃अलवर — पहली विस्तृत संधि

  • अलवर के बख्तावर सिंह ने 14 नवंबर 1803 को अंग्रेजों से संधि की (पुष्टि 19 दिसंबर 1803), जिसमें अलवर के पृथक अस्तित्व की मान्यता तथा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन शामिल था।
  • अलवर कंपनी के साथ विस्तृत रक्षात्मक-आक्रामक संधि करने वाली राजपूताने की पहली रियासत बनी; 1806 में गवर्नर जनरल जॉर्ज बार्लो ने अधिकतर राजपूत संधियाँ रद्द कर दीं, पर अलवर व भरतपुर की संधियाँ बची रहीं।

⛓️जयपुर व जोधपुर की अल्पकालिक संधियाँ

  • जयपुर के महाराजा जगतसिंह द्वितीय ने 12 दिसंबर 1803 को संधि की, पर बार्लो ने 1805 में इसे रद्द कर दिया; जोधपुर की 22 दिसंबर 1803 की संधि, जिसकी पुष्टि 15 जनवरी 1804 को हुई थी, मानसिंह द्वारा जनवरी 1804 में ही अंग्रेज-विरोधी होल्कर के साथ अलग समझौता कर लेने से चंद हफ्तों में ही बेअसर हो गई।

🖋️धौलपुर व प्रतापगढ़

  • धौलपुर के महाराजा कीरतसिंह ने 1804 में अंग्रेजों से संधि की, जो आगे चलकर धौलपुर-अंग्रेज संबंधों का स्थायी आधार बनी, वहीं प्रतापगढ़ के सरदार ने 25 नवंबर 1804 को संधि की — इस दौर में संधियों का बार-बार बनना-टूटना दर्शाता है कि अंग्रेज उस समय राजपूत सहयोग पर कितने निर्भर थे।
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1817-18: लॉर्ड हेस्टिंग्ज और अधीनस्थ पार्थक्य की नीति

1817-18: Lord Hastings and the Policy of Subordinate Isolation

मुश्किल से डेढ़ साल के भीतर लगभग हर राजपूत रियासत ने ब्रिटिश संरक्षण की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए — यही वह व्यापक अभियान था जिसने राजपूताना में ब्रिटिश आधिपत्य को स्थायी रूप से जमा दिया।

👔लॉर्ड हेस्टिंग्ज और नई नीति

  • 1813 से 1823 तक गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने पुरानी 'घेरे की नीति' के स्थान पर 'अधीनस्थ पार्थक्य की नीति' अपनाई, जिसके तहत देशी रियासतों को संधि करने पर विवश किया गया ताकि उन पर ब्रिटिश सर्वोच्चता महज नाम की नहीं, बल्कि वास्तविक बने।
  • इन संधियों को अंतिम रूप देने का दायित्व दिल्ली के रेजीडेंट चार्ल्स मेटकॉफ को सौंपा गया, और जॉन माल्कम, कर्नल जेम्स टॉड तथा जी.एच. ओझा जैसे इतिहासकार मराठा आक्रमणों व उनकी चौथ माँगों को ही राजपूत शासकों के ब्रिटिश शर्तें मानने के पीछे की मुख्य वजह बताते हैं।

⚔️मंदसौर की संधि (1818)

  • 6 जनवरी 1818 को तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान मालवा में महिदपुर के युद्ध के बाद सर थॉमस हिसलोप ने मल्हार राव होल्कर-II के साथ मंदसौर की संधि की, जिसमें होल्कर को राजपूत राज्यों पर अपना नियंत्रण छोड़ना पड़ा — इससे राजपूताने में ब्रिटिश संधियों की राह की आखिरी बड़ी बाधा भी हट गई।

🏴‍☠️अमीर खाँ और टोंक का जन्म

  • पिंडारियों के प्रमुख नेता अमीर खाँ ने नवंबर 1817 में अंग्रेजों से सुलह कर ली; बदले में 9 नवंबर 1817 को उसे टोंक व रामपुरा का स्वतंत्र नवाब मान लिया गया, बशर्ते वह लूटमार व युद्ध का रास्ता हमेशा के लिए छोड़ दे।

🥇करौली — नई नीति की पहली संधि

  • करौली के शासक हरबक्षपाल सिंह 9/15 नवंबर 1817 को राजपूताने में हेस्टिंग्ज की अधीनस्थ पार्थक्य नीति के सबसे पहले शिकार बने — यही पूरे 1817-18 अभियान की शुरुआती संधि थी।

📑कोटा की संधि और उसकी विवादित पूरक धाराएँ

  • कोटा प्रशासक झाला जालिम सिंह ने राज्य की ओर से 26 दिसंबर 1817 को एक असाधारण रूप से विस्तृत, ग्यारह धाराओं वाली संधि की, जिसकी अंतिम धारा में केवल हस्ताक्षरकर्ताओं के नाम दर्ज थे।
  • 20 फरवरी 1818 को (स्वीकृति 7 मार्च 1818) जालिम सिंह ने दो पूरक धाराएँ जुड़वा दीं — एक महाराव उम्मेदसिंह के वंश के लिए वंशानुगत उत्तराधिकार सुनिश्चित करने वाली, और दूसरी, कहीं अधिक चौंकाने वाली, राज्य की सम्पूर्ण प्रशासनिक सत्ता उनके अपने परिवार में रखने वाली — इन शर्तों को अंततः 1838 में झालावाड़ की अलग संधि बनने पर पलट दिया गया।

🕉️जोधपुर की संधि और मानसिंह का संन्यास

  • जोधपुर की संधि 6 जनवरी 1818 को हुई — महाराजा मानसिंह की ओर से युवराज छत्रसिंह, बिशनराम व्यास और अभयराम व्यास तथा कंपनी की ओर से चार्ल्स मेटकॉफ ने हस्ताक्षर किए — गवर्नर जनरल ने 16 जनवरी 1818 को इसे मंजूरी दी, जिसमें एक लाख आठ हजार रुपये वार्षिक खिराज तय हुआ।
  • कंपनी ने 1835 में 'जोधपुर लीजन' गठित की; 1818 की संधि से गहरी नाराजगी रखते हुए मानसिंह स्वयं अंततः सांसारिक शासन त्यागकर संन्यास ले बैठे।

🖋️मेवाड़ की संधि और कर्नल जेम्स टॉड

  • 13 जनवरी 1818 को मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह के प्रतिनिधि ठाकुर अजीतसिंह ने सर चार्ल्स मेटकॉफ के साथ संधि पर हस्ताक्षर किए; उदयपुर ने अपनी वार्षिक आय का 25% खिराज देना स्वीकार किया, जो पाँच वर्ष बाद घटकर 3/8 रह जाना था, और लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने 22 जनवरी 1818 को इसकी पुष्टि की।
  • कर्नल जेम्स टॉड मेवाड़ के प्रथम पॉलिटिकल एजेंट बने, जिनका मुख्यालय पहले 1818 में नीमच रखा गया और बाद में उदयपुर स्थानांतरित हुआ; 1821 में बूँदी के शासक बिशनसिंह की मृत्यु होने पर टॉड ने उनके अल्पवयस्क पुत्र रामसिंह के संरक्षक की भूमिका भी निभाई।

🏇बूँदी व बीकानेर की संधियाँ

  • बूँदी के महाराव विष्णुसिंह ने 10 फरवरी 1818 को संधि की, जिसमें 80,000 रुपये वार्षिक खिराज देना स्वीकार किया गया।
  • बीकानेर की संधि 9 मार्च 1818 को हुई — महाराजा सूरतसिंह की ओर से ओझा काशीनाथ और गवर्नर जनरल की ओर से मेटकॉफ — जिसकी पुष्टि हेस्टिंग्ज ने 21 मार्च 1818 को घाघरा नदी के पातारसा घाट पर की; बीकानेर ने चूँकि मराठों को भी कभी खिराज नहीं दिया था, इसलिए उसे कंपनी को भी खिराज देने से छूट मिल गई।

✍️किशनगढ़, जयपुर, प्रतापगढ़, डूँगरपुर व जैसलमेर की संधियाँ

  • किशनगढ़ के महाराजा कल्याणसिंह ने 26 मार्च 1818 को संधि की (एक स्रोत के अनुसार 7 अप्रैल 1818 को उसे खिराज से मुक्त कर दिया गया), जबकि जयपुर के जगतसिंह द्वितीय ने 2 अप्रैल 1818 को संधि की, जिसे गवर्नर जनरल के सचिव टी.जे. एडम ने 15 अप्रैल 1818 को स्वीकृति दी।
  • जॉन माल्कम ने प्रतापगढ़ के महारावल सामंतसिंह के साथ 5 अक्टूबर 1818 को और डूँगरपुर के महारावल जसवंतसिंह द्वितीय के साथ 11 दिसंबर 1818 को संधि की — बाद वाली संधि में मकरानी व सिंधी भाड़े के सैनिकों की भर्ती पर रोक भी शामिल थी — जबकि जैसलमेर के महारावल मूलराज द्वितीय ने 12 दिसंबर 1818 को संधि की, जिसमें असाधारण रूप से खिराज का कोई प्रावधान ही नहीं था।

🏁बाँसवाड़ा, सिरोही (अंतिम संधि) और झालावाड़ (अंतिम रियासत)

  • बाँसवाड़ा के महारावल उम्मेदसिंह ने 25 दिसंबर 1818 को संधि की ('वीर विनोद' ग्रंथ इसे 16 सितंबर 1818 बताता है); जोधपुर द्वारा दावा किए जाने के कारण सिरोही के राव शिवसिंह की संधि विलंबित रही और अंततः 11 सितंबर 1823 को एलेक्जेंडर स्पीयर्स के जरिए संपन्न हुई — इस तरह सिरोही अधीनस्थ पार्थक्य संधि करने वाली आखिरी रियासत बनी।
  • 1838 में कोटा के 17 परगनों को अलग करके बनाई गई झालावाड़ रियासत ने अपने शासक झाला मदनसिंह के नेतृत्व में 10 अप्रैल 1838 को कंपनी से संधि की — इस तरह यह उस समय तक अस्तित्व में आने वाली राजस्थान की अंतिम रियासत बनी।

🏯अजमेर का हस्तांतरण और सभी संधियों की साझा शर्तें

  • 25 जून 1818 की संधि के तहत दौलतराव सिंधिया ने अजमेर जिला — जिसका वार्षिक मूल्य 505,484 रुपये आँका गया था — अंग्रेजों को सौंप दिया; अजमेर के प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक विल्डर ने 28 जुलाई 1818 को जिले के अंतिम मराठा गवर्नर बापू सिंधिया से औपचारिक रूप से कार्यभार ग्रहण किया।
  • इन लगभग सभी संधियों में एक जैसी बुनियादी शर्त दोहराई गई: अंग्रेज हर रियासत को बाहरी आक्रमण से बचाएँगे और एक पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त करेंगे जो आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा, वहीं रियासत अपनी विदेश नीति और आवश्यकता पड़ने पर अपने सैन्य साधन अंग्रेजों को सौंप देगी — हाँ, वार्षिक खिराज की धारा हर राज्य में अलग-अलग थी।
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राजपूताना में ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र

British Administrative Machinery in Rajputana

संधियाँ हो जाने के बाद अंग्रेजों के सामने अपने नए प्रभाव क्षेत्र को चलाने की चुनौती थी — इसके लिए उन्होंने रेजीडेंट, एजेंट, सैन्य टुकड़ियों और दरबारों का एक बहुस्तरीय ढाँचा खड़ा किया जो सौ से अधिक वर्षों तक अजमेर व माउंट आबू से राजपूताना को संचालित करता रहा।

🗺️AGG प्रणाली और इसके क्षेत्राधिकार

  • 1817-18 की संधियों के बाद अंग्रेजों ने राजस्थान की रियासतों पर प्रभावी निगरानी हेतु 1832 में अजमेर में एजेंट टू गवर्नर जनरल (AGG) की स्थापना की — बड़ी रियासतों में रेजीडेंट और छोटी रियासतों में पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त होता था।
  • काम पाँच क्षेत्रीय प्रभागों में बँटा था: मेवाड़ रेजीडेन्सी (उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़); पश्चिमी राजपूताना रेजीडेन्सी (जोधपुर, जैसलमेर, पालनपुर, दांता); जयपुर रेजीडेन्सी (जयपुर, अलवर, टोंक, शाहपुरा, किशनगढ़); पूर्वी राजपूताना स्टेट्स एजेंसी (भरतपुर, बूँदी, कोटा, झालावाड़, करौली, धौलपुर); और बीकानेर-सिरोही के लिए एक अलग रेजीडेंट राजपूताना।

🎖️ऑक्टरलोनी और राजपूताना रेजीडेन्सी

  • कंपनी ने 1818 में 'राजपूताना रेजीडेन्सी' का गठन किया और ब्रिगेडियर जनरल डेविड ऑक्टरलोनी को इसका पहला 'रेजीडेंट फॉर राजपूताना' नियुक्त किया।

👑दरबार और AGG का मौसमी मुख्यालय

  • राजस्थान के शासकों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता की छाप छोड़ने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1832 में और वायसराय लॉर्ड मेयो ने 1870 में अजमेर दरबार आयोजित किया; उसी मार्च 1832 में AGG का कार्यालय औपचारिक रूप से अजमेर में स्थापित हुआ, जो दौलतबाग से फूस के बँगले और फिर मेयो कॉलेज के दुर्गादास हाउस में स्थानांतरित होता रहा।
  • AGG वर्ष के छह महीने अजमेर में और छह महीने ठंडे माउंट आबू में बिताता था, और 1856 से इसका कार्यालय स्थायी रूप से माउंट आबू में स्थानांतरित हो गया।

🏢एक ब्रिटिश प्रांत के रूप में अजमेर-मेरवाड़ा

  • अजमेर-मेरवाड़ा 1836 तक बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन रहा; 1 अप्रैल 1871 को अजमेर मेरवाड़ा-केकड़ी एक स्वतंत्र प्रांत बना, जिसका पहला चीफ कमिश्नर रिचर्ड हटैन कीटिंग और पहला सुपरिंटेंडेंट निक्सन था।
  • इस प्रांत की अधिकारी शृंखला हीरानंद रूपचंद शिवदासानी (कुल अंतिम चीफ कमिश्नर, जबकि जॉर्ज वॉन बेर्ले गिलन अंतिम ब्रिटिश चीफ कमिश्नर) और सुपरिंटेंडेंट चार्ल्स जॉर्ज डिक्सन पर जाकर समाप्त हुई; फ्रांसिस बॉयले एस. विल्डर दूसरे सुपरिंटेंडेंट रहे थे।

📋एजेंट टू गवर्नर जनरल की सूची

  • अब्राहम लॉकेट मार्च 1832 से 29 नवंबर 1833 तक प्रथम AGG रहे; 1857 की क्रांति के समय यह पद जॉर्ज सेंट पैट्रिक लॉरेन्स के पास था; राजपूताना के अंतिम AGG जॉन चीप ब्रुक थे।

🪖अंग्रेजों द्वारा गठित स्थानीय सैन्य टुकड़ियाँ

  • अशांत इलाकों पर नियंत्रण के लिए अंग्रेजों ने शेखावाटी में शेखावाटी ब्रिगेड (1835), मेरवाड़ा में मेरवाड़ा बटालियन, ऐरनपुरा में जोधपुर लीजियन (1835), और खेरवाड़ा में 1841 में मेवाड़ भील कोर की स्थापना की — अंतिम टुकड़ी विशेष रूप से महाराणा सरदार सिंह के काल में भीलों की अशांति को दबाने के लिए बनाई गई थी।

ब्रिटिश हस्तक्षेप के टकराव-बिंदु

  • मेवाड़ में महाराणा व सामंतों के विवादों में 1827 में कैप्टन कॉब तथा 1840 व 1845 में पॉलिटिकल एजेंट रॉबिन्सन ने मध्यस्थता की; भरतपुर में 1823 में रणधीर सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने दुर्जनशाल के बजाय बलदेव सिंह को शासक बनाया, और 1826 में अलवर से नीमराणा को अलग कर उसका शासक बलवंतसिंह को बनाया।
  • जयपुर में 1839 में मेजर लुडलो की अध्यक्षता में गठित रीजेंसी कौंसिल ने 1851 तक शासन चलाया, वहीं महाराजा रामसिंह द्वितीय के काल में रूपा बदरण प्रकरण हिंसक हो उठा — कर्नल ऑलिविज घायल हुए और ब्लेक नामक अधिकारी मारा गया; कोटा में जालिम सिंह के वंशज मदनसिंह ने अपनी जान को खतरा बताकर 1836 में 'कोटा कन्टिन्जेंट' नामक अंग्रेजी सेना वहाँ तैनात करवाई।
  • लावा, जो पहले टोंक रियासत का आश्रित ठिकाना था, को अंग्रेजों ने 1867 में औपचारिक रूप से एक पृथक ठिकाने के रूप में मान्यता दी।

🧂साँभर नमक और मेवाड़ की अफीम पर ब्रिटिश नियंत्रण

  • अंग्रेजों ने 27 जनवरी 1835 को राजपूताने के प्रमुख नमक उत्पादक क्षेत्र साँभर झील तथा मेवाड़ के अफीम उत्पादक इलाकों पर कब्जा कर लिया; बाद में महारानी विक्टोरिया ने अफीम व्यापार को विनियमित करने की सलाह हेतु थॉमस ब्रेसी की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय शाही आयोग बनाकर राजस्थान भेजा।

📉1817-18 की संधियों के परिणाम

  • इन संधियों ने राजपूताने पर भारी आर्थिक बोझ डाला — स्वदेशी उद्योग, हस्तशिल्प और व्यापार क्षीण होने लगे, ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा, और खिराज, उस पर ब्याज तथा अन्य ब्रिटिश-थोपे गए खर्चों के बोझ तले रियासतों की आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी।

🆓वार्षिक खिराज से मुक्त रियासतें

  • बीकानेर, जैसलमेर, करौली, किशनगढ़ और अलवर — इन सभी को अंग्रेजों की वार्षिक खिराज माँग से छूट मिली, क्योंकि इनमें से किसी ने भी मराठों को कभी खिराज नहीं दिया था।

💥राजस्थान की रियासतों की तोप सलामी

  • समय-समय पर संशोधित तोप-सलामी क्रम में मेवाड़ (उदयपुर) सबसे ऊपर 19 तोपों (स्थानीय 21) के साथ रहा; जयपुर व जोधपुर 17 तोपों (स्थानीय 19) के साथ, और बीकानेर भी 17 तोपों (स्थानीय 19) के साथ; भरतपुर, करौली, बूँदी, टोंक व कोटा को 17 तोपें मिलीं; किशनगढ़, जैसलमेर, सिरोही, बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, प्रतापगढ़ व धौलपुर को 15 तोपें; अलवर को 15 तोपें (स्थानीय 17); झालावाड़ को 13; और शाहपुरा को केवल 9 तोपों की सलामी मिलती थी।

🕵️2019 की एक झलक: माउंट आबू की तोपें

  • यह याद दिलाने के लिए कि उपनिवेशकालीन ये उपकरण आज भी मौजूद हैं — 2 फरवरी 2019 को माउंट आबू के राजभवन में रखी नौ ब्रिटिशकालीन तोपों में से सात तोपें चोरी हो गई थीं।
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प्रत्यर्पण एवं नमक संधियाँ (1867-1882)

Extradition & Salt Treaties (1867-1882)

पहली अधीनस्थ पार्थक्य संधियों के लगभग आधी सदी बाद, 1860 से 1880 के दशकों में हुई नई संधियों की एक लहर ने राजस्थान की रियासतों को अंग्रेजी कानून व राजस्व हितों से और कसकर बाँध दिया — इस बार भगोड़ों के प्रत्यर्पण और नमक व्यापार को लेकर।

🏔️मेवाड़ क्षेत्र: उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़

  • उदयपुर ने महाराणा शंभूसिंह के अधीन 16 दिसंबर 1868 को प्रत्यर्पण संधि और महाराणा सज्जनसिंह के अधीन 12 फरवरी 1879 को नमक संधि की; डूँगरपुर (महारावल उदयसिंह, 7 मार्च 1869), बाँसवाड़ा (महारावल लक्ष्मणसिंह, 24 दिसंबर 1868) और प्रतापगढ़ (राजा उदयसिंह, 22 दिसंबर 1868) — तीनों ने प्रत्यर्पण संधि की, पर तीनों में से किसी ने अलग नमक संधि नहीं की।

🐫मारवाड़ व पश्चिम: जोधपुर, जैसलमेर, सिरोही, बीकानेर

  • जोधपुर ने महाराजा तख्तसिंह के अधीन 6 अगस्त 1868 को प्रत्यर्पण संधि और महाराजा जसवंतसिंह के अधीन 18 जनवरी 1879 को नमक संधि की; जैसलमेर के महारावल बैरीसाल सिंह ने 10 मई 1870 को प्रत्यर्पण संधि की, इसके बाद (महाराजा बैरीसाल के नाम से) 31 मार्च 1879 को नमक संधि की।
  • सिरोही को इस लहर की सबसे पहली प्रत्यर्पण संधि (राव उम्मेदसिंह, 9 अक्टूबर 1867) करने का गौरव प्राप्त है, साथ ही केसरी सिंह के अधीन 21 जनवरी 1879 को नमक संधि भी हुई; बीकानेर के महाराजा सरदारसिंह ने 3 फरवरी 1869 को प्रत्यर्पण संधि और महाराजा डूँगरसिंह ने 24 जनवरी 1879 को नमक संधि की।

🦚जयपुर, किशनगढ़ व लावा

  • जयपुर के महाराजा रामसिंह ने 13 जुलाई 1868 को प्रत्यर्पण संधि और 31 जनवरी 1879 को नमक संधि की; किशनगढ़ के महाराजा पृथ्वीसिंह ने 27 नवंबर 1868 को प्रत्यर्पण संधि और (महाराज पृथ्वीसिंह बहादुर के नाम से) 1 फरवरी 1879 को नमक संधि की।
  • छोटी रियासत लावा ने कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं की, पर उसके ठाकुर दीरतसिंह ने 17 जनवरी 1879 को नमक संधि पर हस्ताक्षर किए।

🏯हाड़ौती व पूर्व: बूँदी, कोटा, झालावाड़, भरतपुर, करौली, धौलपुर, अलवर, टोंक, शाहपुरा

  • बूँदी (महाराव राजा रामसिंह बहादुर) ने 1 फरवरी 1869 को प्रत्यर्पण संधि और काफी बाद में 18 जनवरी 1882 को नमक संधि की; कोटा की महाराव शत्रुशाल सिंह के अधीन प्रत्यर्पण संधि (6 फरवरी 1869) के बाद महाराजा रामसिंह द्वितीय के अधीन 16 जून 1882 को नमक संधि हुई — यह पूरी शृंखला की अंतिम नमक संधि थी।
  • झालावाड़ (महाराज राणा पृथ्वीसिंह, प्रत्यर्पण 28 मार्च 1868; महाराजा राणा जालिम सिंह-II, नमक 14 सितंबर 1881), भरतपुर (महाराजा जसवंतसिंह, दोनों संधियाँ, 24 दिसंबर 1867 व 23 जनवरी 1879), करौली (महाराजा मदनपाल, प्रत्यर्पण 27 नवंबर 1868; महाराजा भँवरपाल, नमक 23 जनवरी 1882), और धौलपुर (महाराजा भगवंतसिंह, प्रत्यर्पण 14 जनवरी 1868; महाराजा निहालसिंह, नमक उसी तारीख 1879 को) — सभी ने दोनों संधियाँ पूरी कीं।
  • अलवर (महाराव राजा स्योदान सिंह, प्रत्यर्पण 12 अक्टूबर 1867; महाराव राजा मंगल सिंह, नमक 17 अप्रैल 1879) और टोंक (मोहम्मद इब्राहीम खाँ बहादुर, प्रत्यर्पण 28 जनवरी 1869; मोहम्मद उबदुल्ला खाँ, नमक 9 जनवरी 1882) — दोनों ने दोनों संधियाँ पूरी कीं, जबकि शाहपुरा की प्रत्यर्पण संधि दर्ज नहीं है, पर इसके राजा धीरज ने 16 मार्च 1882 को नमक संधि की।

🔚इस शृंखला की प्रथम व अंतिम संधियाँ

  • अंग्रेजों ने इस लहर की पहली प्रत्यर्पण संधि सिरोही (9 अक्टूबर 1867) के साथ और अंतिम जैसलमेर (10 मई 1870) के साथ की; नमक संधियों में धौलपुर के साथ पहली और कोटा के साथ 16 जून 1882 को अंतिम संधि हुई — इसी के साथ दशकों तक चली यह संधि-प्रक्रिया अपने अंत को पहुँची।