भरतपुर, धौलपुर, करौली, टोंक व झुंझुनूँ रियासत तथा परमार वंश
Bharatpur, Dholpur, Karauli, Tonk & Jhunjhunu States and the Paramara Dynasty
जाट राजवंश के गढ़ भरतपुर से लेकर करौली के यदुवंशी, टोंक के पिंडारी-नवाब और आबू-मालवा के परमार शासकों तक — पांच रियासतों व एक प्राचीन वंश की कहानी एक साथ।
भरतपुर: जाट राजवंश
एक विद्रोही मुखिया के संघर्ष से लेकर उस दुर्ग तक जिसे अंग्रेज कभी नहीं जीत सके — जानिए कैसे भरतपुर के जाटों ने राजस्थान की सबसे प्रतिरोधी रियासतों में से एक खड़ी की।
🌾राजाराम जाट और जाट पहचान
- भरतपुर कस्बे का नाम भगवान राम के छोटे भाई भरत के नाम पर पड़ा माना जाता है, और जाट वंश के कुल चिह्न पर लक्ष्मणजी का नाम अंकित होता था।
- लक्ष्मणजी को भरतपुर के जाट राजवंश के कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है।
- राजस्थान की रियासतों में भरतपुर व धौलपुर ही जाटों के अधीन थीं, और इस वंश-परंपरा का मूल स्रोत राजाराम जाट था, जिसने मुगल बादशाह के विरुद्ध विद्रोह किया और इसी विद्रोह में उसकी मृत्यु हो गई।
- राजाराम के विद्रोहियों ने आगरा के निकट सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे को लूटा, और इतिहासकार निकोलाओ मनूची के अनुसार जाटों ने मकबरे को खोदकर बादशाह की हड्डियां जला दीं।
⚔️चूड़ामन जाट (1695-1721 ई.)
- राजाराम के बाद उसका पुत्र चूड़ामन जाटों का मुखिया बना; मुगल बादशाह फर्रुखशियर के वजीर अब्दुल्ला खाँ ने चूड़ामन को भरतपुर के निकट एक छोटी जागीर देकर 'राहदार खाँ' की उपाधि प्रदान की।
- चूड़ामन ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति बढ़ाई, भरतपुर में जाट राज्य की नींव डाली और वर्तमान डीग जिले में थून के दुर्ग का निर्माण करवाया।
- जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने 1715 ई. में चूड़ामन के विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया, और 1721 ई. तक उसके भतीजे बदनसिंह को अपनी ओर मिलाकर थून के किले पर अधिकार कर लिया।
- घिर जाने और पराजित होने पर चूड़ामन जाट ने 1721 ई. में विष पीकर आत्महत्या कर ली।
🏗️बदनसिंह (1722-1755 ई.)
- चूड़ामन के बाद उसका पुत्र मोहकम सिंह कुछ समय के लिए जाट विद्रोहियों का नेता रहा, फिर नेतृत्व बदनसिंह के हाथों में आ गया।
- 17 मार्च 1722 ई. को बदनसिंह ने भरतपुर रियासत की औपचारिक स्थापना कर जाट राजवंश की नींव रखी, और सवाई जयसिंह द्वारा प्रदत्त 'ब्रजराज' की उपाधि धारण की।
- उसने 1730 ई. में मेवात क्षेत्र के मेवों का दमन किया, खेमकरण को पराजित कर भरतपुर दुर्ग पर अधिकार किया और भरतपुर शहर की नींव रखी।
- बदनसिंह ने 1755 ई. में भरतपुर का शासन अपने पुत्र सूरजमल को सौंप दिया, यद्यपि राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी के इतिहास ग्रंथ के अनुसार सूरजमल का वास्तविक शासनकाल 1756-1763 ई. माना गया है।
👑महाराजा सूरजमल (1755-1764 ई.)
- फरवरी 1707 ई. में जन्मे सूरजमल, जिन्हें सुजानसिंह भी कहा जाता था, 'जाटों के प्लेटो/अफलातून' के रूप में विख्यात हुए; उनके शासनकाल में डीग के प्रसिद्ध महल बने, और डीग/भरतपुर के दुर्ग-निर्माण को आगे बढ़ाया गया।
- उन्होंने सवाई ईश्वरसिंह को जयपुर की गद्दी दिलाने में सहायता की, और 1754 ई. में कुम्हेर पर मराठा सरदार मल्हारराव होल्कर के आक्रमण को विफल कर दिया।
- 1760 ई. में उन्होंने अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों का साथ दिया, यद्यपि पानीपत के युद्ध से पूर्व मराठों ने उनकी युद्ध-नीति सम्बन्धी सलाह ठुकरा दी; उनका शासनकाल जाट साम्राज्य के स्वर्णकाल के रूप में स्मरण किया जाता है।
- 15 जनवरी 1764 ई. को नजीबुद्दौला खाँ के विरुद्ध युद्ध में सूरजमल का देहांत हो गया; इतिहासकार कालिकारंजन कानूनगो ने उनके बल, साहस, चतुराई, निष्ठा और अदम्य भावना की प्रशंसा की, और उनका युग पुरोहित मंगलसिंह रचित 'सुजान संवत् विलास' में वर्णित है।
🗡️महाराजा जवाहरसिंह (1764-1768 ई.)
- सूरजमल के बाद उनका पुत्र जवाहरसिंह भरतपुर का राजा बना, जिसने अंग्रेज सेनानायक शिमरु व रेने मादे को अपनी सेवा में नियुक्त किया।
- 1766 ई. में उसने होल्कर को पराजित कर धौलपुर पर अधिकार किया, और अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने हेतु मराठों की सहायता से नजीबुद्दौला खाँ के विरुद्ध युद्ध किया।
- 27 अगस्त 1768 ई. को जवाहरसिंह के देहांत के बाद उनके भाई रतनसिंह राजा बने, परंतु मात्र सात माह ही शासन कर पाए।
🛡️महाराजा केहरसिंह (1769-1777 ई.)
- रतनसिंह के देहांत के बाद जवाहरसिंह के पुत्र केहरसिंह (केसरीसिंह) अवयस्क अवस्था में ही राजा बने, और उनके चाचा नवलसिंह को शासन का मुख्तार बनाया गया।
- मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के अमीर नजफ़खाँ ने उनके शासनकाल में भरतपुर पर अधिकार कर लिया, किंतु सूरजमल की विधवा राजमाता किशोरी देवी के निवेदन पर केसरीसिंह को पुनः राजगद्दी सौंप दी।
🏰महाराजा रणजीतसिंह (1777-1805 ई.)
- रणजीतसिंह 8 अप्रैल 1777 ई. को भरतपुर के शासक बने (राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी इसे 1775 ई. मानती है), और मुगल बादशाह शाहआलम ने भरतपुर यात्रा के दौरान उन्हें डीग का किला भेंट में दिया।
- 1804 ई. में लॉर्ड लेक के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने आगरा दुर्ग पर आक्रमण किया, जिससे मराठा सरदार होल्कर भागकर रणजीतसिंह की शरण में आ गया।
- लॉर्ड लेक ने 1804-05 ई. के दौरान भरतपुर के लोहागढ़ दुर्ग पर पांच बार आक्रमण किए, परंतु दुर्ग को कभी नहीं जीत सका, जिस कारण अप्रैल 1805 ई. में अंग्रेजों को रणजीतसिंह से संधि करनी पड़ी।
⚖️रणधीरसिंह से बलवंतसिंह तक (1805-1853 ई.)
- रणधीरसिंह 7 दिसंबर 1805 ई. को शासक बने, 1814 ई. में फतेहपुर सीकरी में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स से मिले, और 1818 ई. की संधि के तहत अंग्रेजों ने भरतपुर का खिराज (कर) माफ कर दिया।
- उनके बाद छोटे भाई बलदेवसिंह शासक बने, जिन्होंने राजपूताना रेजिडेंट डेविड आक्टरलोनी को अपने दरबार में आमंत्रित किया; बलदेवसिंह के बाद उनके भतीजे दुर्जनशाल ने सिंहासन पर अवैध अधिकार कर वास्तविक उत्तराधिकारी बलवंतसिंह को कैद कर लिया।
- अंग्रेज सेनापति जनरल केम्बरमेयर ने भरतपुर पर चढ़ाई कर दुर्जनशाल से दुर्ग छीना और 1826 ई. में बलवंतसिंह को सिंहासन पर बैठाया; उसी वर्ष अंग्रेजों ने पहली बार लोहागढ़ किले पर अधिकार किया।
- बलवंतसिंह के शासनकाल (1826-1853 ई.) में अव्यवस्था व बदइंतजामी के कारण महारानी (उनकी माता) एवं दीवान बैजनाथ को भरतपुर से निष्कासित कर दिया गया।
🎖️महाराजा जसवंतसिंह (1853-1893 ई.)
- जसवंतसिंह का विवाह पटियाला के महाराजा नरेन्द्रसिंह की पुत्री से हुआ था, और उनकी अवयस्कता के काल में ही 1857 ई. का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ।
- 1 जनवरी 1877 ई. को अंग्रेज सरकार ने उन्हें GCSI (ग्रांड कमांडर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया) की उपाधि से सम्मानित किया।
📜रामसिंह (1893-1900 ई.)
- रामसिंह 1893 ई. में अपने पिता जसवंतसिंह के बाद भरतपुर के शासक बने, और 1897 ई. में पूर्वी राजपूताना राज्यों के पॉलिटिकल एजेंट का कार्यालय धौलपुर से भरतपुर स्थानांतरित कर दिया गया।
- 1900 ई. में माउंट आबू में एक नौकर की हत्या करने पर सरकार ने रामसिंह को अपदस्थ कर उनके स्थान पर उनके अवयस्क पुत्र किशनसिंह को राजगद्दी पर बैठा दिया।
🇮🇳किशनसिंह (1900-1929 ई.)
- 1919 ई. में किशनसिंह ने राज्य की सेना का पुनर्गठन किया और उर्दू के स्थान पर हिन्दी को राजभाषा बनाया।
- उन्होंने 1925 ई. में पुष्कर में आयोजित अखिल भारतीय जाट महासभा को संबोधित किया और 1927 ई. में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन करवाया।
- उत्तरदायी शासन की मांग स्वीकार करने पर उन्हें राजगद्दी छोड़ने के लिए बाध्य किया गया, और 1929 ई. में अंग्रेज सरकार ने उनके अपने ही राज्य में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी; 27 मार्च 1929 ई. को दिल्ली में उनका निधन हो गया।
🏳️बृजेन्द्रसिंह (1929-1947 ई.)
- किशनसिंह के पुत्र बृजेन्द्रसिंह 14 अप्रैल 1929 ई. को शासक बने और भरतपुर के जाट वंश के अंतिम शासक सिद्ध हुए।
- उनके शासनकाल में 4 मार्च 1938 ई. को भरतपुर प्रजामण्डल का गठन हुआ, जिसे राज्य सरकार ने अवैध घोषित कर दिया।
- 1947 ई. में स्वतंत्रता व विभाजन के समय जहां राजपूताना की अधिकांश रियासतें शांत रहीं, वहीं भरतपुर में व्यापक हिंसा हुई; बृजेन्द्रसिंह ने 31 जुलाई 1947 ई. को भारत में विलय के अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए।
- 18 मार्च 1948 ई. को भरतपुर राज्य का मत्स्य संघ में विलय कर दिया गया।
धौलपुर: तोमर कस्बे से रियासत तक
एक तोमर सरदार द्वारा बसाया गया सीमांत कस्बा, जो लोदी, मेवाड़, मुगल, भदौरिया व मराठा शासन से गुजरने के बाद अंततः अंग्रेजों द्वारा एक स्वतंत्र धौलपुर रियासत के रूप में उभरा।
🌱उद्भव: धवलदेव का कस्बा और गोहद के जाट
- दिल्ली के तोमर शासक धवलदेव (धोला) ने धवलपुरी (धौलाडेरा) नामक कस्बा बसाया, जो आगे चलकर वर्तमान धौलपुर बना; पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में यह उन्हीं के अधीन था।
- धौलपुर पर आगे शासन करने वाले जाट वंश का उद्भव गोहद गांव से माना जाता है, जहां मराठा सरदार बाजीराव पेशवा के सहयोगी हकीम जाट निवास करते थे, जिनके वंश में आगे लोकेन्द्र सिंह हुए।
🏇सल्तनत से जाटों तक: मध्यकालीन धौलपुर
- दिल्ली सुल्तान सिकंदर लोदी ने 1504 ई. में धौलपुर पर अधिकार कर कमरुद्दीन को वहां का शासक बनाया; 1517 ई. में महाराणा सांगा ने इब्राहीम लोदी को हराकर धौलपुर व बयाना मेवाड़ के अधीन कर लिए, किंतु 1527 ई. में खानवा के युद्ध में सांगा की हार के बाद ये क्षेत्र बाबर के अधिकार में चले गए।
- बाद में शेरशाह सूरी ने यहां शेरगढ़ दुर्ग बनवाया, जहाँगीर ने धौलपुर की जागीर अमीर फतेहाबाद खाँ व महावत खाँ को दी, और 1617 ई. में उनके मनसबदार सलेह खाँ ने धौलपुर के निकट तालाब-ए-शाही झील राजकुमार शाहजहाँ के शिकार स्थल के रूप में बनवाई।
- बहादुरशाह के शासनकाल में भदौरिया वंश के कल्याणसिंह ने धौलपुर पर अधिकार कर लिया; 1761 ई. में भरतपुर के महाराजा सूरजमल द्वारा इसे जीते जाने से 1791 ई. तक यह क्षेत्र कभी भरतपुर के जाटों तो कभी मराठों के अधिकार में रहा।
🏰कीर्तिसिंह और धौलपुर रियासत की स्थापना
- 2 दिसंबर 1779 ई. को अंग्रेजों ने गोहद के शासक लोकेन्द्रसिंह को ग्वालियर दुर्ग सौंपा, परंतु शीघ्र ही मराठों ने उसे पुनः छीन लिया।
- 17 जनवरी 1804 ई. को अंग्रेजों ने गोहद व ग्वालियर पर अधिकार कर लोकेन्द्रसिंह के पुत्र कीर्तिसिंह को गोहद का शासक बनाया; बाद में उन्हें धौलपुर, बाड़ी व राजाखेड़ा परगने देकर एक स्वतंत्र रियासत धौलपुर बना दी गई, और 1836 ई. में कीर्तिसिंह का निधन हो गया।
🛕राणा भगवंतसिंह व राणा निहालसिंह (1836-1901 ई.)
- कीर्तिसिंह के पुत्र भगवंतसिंह धौलपुर के सिंहासन पर बैठे, और उन्हीं के शासनकाल में 1857 ई. का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ।
- उनके पौत्र निहालसिंह 1873 ई. में शासक बने, और राज्य का संचालन सर दिनकर राव तथा बाद में पॉलिटिकल एजेंट मेजर डेन्ही की देख-रेख में हुआ।
- 1901 ई. में निहालसिंह के निधन के बाद उनके पुत्र रामसिंह शासक बने, और रामसिंह के बाद उनके छोटे भाई उदयभानसिंह 1911 ई. में धौलपुर के शासक बने।
🎩उदयभान सिंह (1911-1948 ई.)
- उदयभान सिंह 1931 ई. में लंदन में हुए प्रथम गोलमेज सम्मेलन में नरेन्द्र मण्डल के सदस्य के रूप में सम्मिलित हुए, जहां बीकानेर के महाराजा गंगासिंह व अलवर के महाराजा जयसिंह जैसे राजस्थानी शासक भी उपस्थित थे।
- उन्होंने बाद में नरेन्द्र मण्डल के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, परंतु पटियाला के महाराजा भूपिन्दर सिंह से पराजित हो गए।
- 18 मार्च 1948 ई. को धौलपुर का मत्स्य संघ में विलय हुआ, और उदयभान सिंह को इसका राजप्रमुख बनाया गया।
करौली: यदुवंशी रियासत
करौली के यादव शासकों की यात्रा जानिए — विजयपाल की 11वीं सदी की स्थापना से लेकर दुर्ग-निर्माण, मंदिर-संरक्षण और अंग्रेजों के साथ अग्रणी संधि तक।
🦚करौली की यदुवंशी जड़ें
- स्वतंत्रता के समय करौली में यदुवंशी (यादव) शासकों का राज था, जो स्वयं को चन्द्रवंशी क्षत्रिय एवं भगवान श्रीकृष्ण के वंशज मानते थे।
- महाजनपद काल में इस क्षेत्र का कुछ भाग मत्स्य जनपद का, तो कुछ भाग सूरसेन जनपद का हिस्सा था, जिसकी राजधानी मथुरा थी।
🏹विजयपाल व तिमनपाल
- 10वीं सदी के उत्तरार्ध में मथुरा पर शासन करने वाले यादव शासक विजयपाल ने 1040 ई. में करौली के यादव वंश की नींव रखी।
- उन्होंने मथुरा छोड़कर बयाना (वर्तमान भरतपुर) को अपनी राजधानी बनाया और वहां विजयमंदिरगढ़ दुर्ग बनवाया; उनके पुत्र तिमनपाल ने बयाना से 23 किमी दूर, वर्तमान करौली जिले में, तिमनगढ़ (तवनगढ़) का नया दुर्ग बनवाया।
🏯धर्मपाल प्रथम व अर्जुनपाल
- तवनपाल के पुत्र धर्मपाल ने धौलाडेरा में धौलगढ़ दुर्ग बनवाया, जिसके निकट आगे धौलपुर शहर बसा, और उनके पुत्र कँवरपाल ने गोलारी में एक किला बनवाया।
- कँवरपाल के वंशज अर्जुनपाल 1327 ई. में करौली की गद्दी पर बैठे, मियाँ मक्खन को पराजित कर मंडरायल दुर्ग जीता, और 1348 ई. में कल्याणपुर नगर बसाकर वहां कल्याणपुरीजी का मंदिर बनवाया — यही बस्ती आज करौली कहलाती है।
- उन्होंने अंजनी माता मंदिर व गढ़कोट दुर्ग का भी निर्माण करवाया।
🕌धर्मपाल द्वितीय व गोपालपाल
- धर्मपाल द्वितीय ने 1650 ई. (कुछ ग्रंथों में 1707 ई.) में करौली को अपनी राजधानी बनाया।
- अकबर के समकालीन गोपालपाल ने मांचलपुर दुर्ग के महलों, बहादुरगढ़ किले, करौली की शहरपनाह, गोपाल मंदिर, नया कल्याण मंदिर व मदनमोहनजी मंदिर का निर्माण करवाया; ध्यान रहे कि पुराने कल्याणजी मंदिर का निर्माण विजयपाल के समय ही आरंभ हो गया था, जिसके नाम पर अर्जुनपाल के समय कस्बे का नाम कल्याणपुरी पड़ा था।
- अकबर ने उन्हें 'देव बहादुर' की उपाधि दी, और 1753 ई. में उन्हें मुगल बादशाह मुहम्मदशाह से 'माही मरातिब' का खिताब भी प्राप्त हुआ।
🤝हरबख्शपाल व राव मदनपाल
- हरबख्शपाल ने 1812 ई. में नवाब मुहम्मदशाह को मांची के युद्ध में पराजित किया, और 9 नवंबर 1817 ई. को करौली ने अंग्रेजों से अधीनस्थ पार्थक्य (सब्सिडियरी) की संधि की — इस प्रकार वह ऐसी संधि करने वाली राजस्थान की पहली रियासत बनी; उनके बाद क्रमशः प्रतापपाल, नरसिंहपाल व राव मदनपाल शासक बने।
- 1857 ई. के विद्रोह में राव मदनपाल ने कोटा महाराजा की सहायता हेतु अपनी सेना भेजी, जिसके लिए अंग्रेजों ने बाद में उन्हें 'ग्रांड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया' की उपाधि प्रदान की।
- मदनपाल के आमंत्रण पर ही स्वामी दयानन्द सरस्वती की राजस्थान में पहली यात्रा 1865 ई. में हुई थी।
🏁भोमपाल व गणेशपाल: अंतिम वर्ष
- भोमपाल के शासनकाल में 1939 ई. में करौली प्रजामण्डल की स्थापना हुई।
- करौली के अंतिम शासक गणेशपाल ने 1945 ई. में राज्य में एक नया संविधान लागू किया, और 18 मार्च 1948 ई. को, उनके ही शासनकाल में, करौली का मत्स्य संघ में विलय हो गया।
टोंक व झुंझुनूँ
एक पिंडारी सेनानायक के लिए बनाई गई नवाबी रियासत, तो दूसरा एक जाट योद्धा के नाम पर बसा शेखावाटी का हृदय-स्थल — राजस्थान की दो बिल्कुल भिन्न कहानियां।
🏞️टोंक का उद्भव
- रसिया की टेकरी की तलहटी में बसा टोंक प्रारम्भ में टूँकड़ा के नाम से जाना जाता था; यहां पहले मालव जाति निवास करती थी, जिसने मालव नगर (नगरफोर्ट) को अपनी राजधानी बनाया था।
- कविराज श्यामलदास कृत 'वीर विनोद' के अनुसार वि.सं. 1003 की माघ कृष्णा (24 दिसंबर 946 ई.) को दिल्ली के शासक खनवाद के मातहत रामसिंह ने टोंक बसाकर उसका नाम टूँकड़ा रखा; एक अन्य मान्यता के अनुसार अकबर के समय जयपुर शासक मानसिंह द्वारा ब्राह्मण भोला को दिए गए टोकरा परगने के 12 गांवों के नाम पर यह नामकरण हुआ।
- बाद में राव डूँगरसी के पुत्र राव जोगाजी ने यहां भोमगढ़ (भूमगढ़) दुर्ग का निर्माण करवाया।
🕌अमीर खाँ पिंडारी और नवाबी रियासत की स्थापना
- टोंक वर्षों तक विभिन्न हाथों में रहा — जयपुर के शासक सवाई माधोसिंह ने इसे 1750 ई. में मल्हारराव होल्कर को सौंपा, और मराठों ने बाद में इसे 1806 ई. में सेनानायक अमीर खाँ पिंडारी को सौंप दिया।
- 15 नवंबर 1817 ई. को अंग्रेजों व अमीर खाँ पिंडारी के मध्य हुई संधि से टोंक रियासत अस्तित्व में आई, जिसका पहला नवाब उसे बनाया गया; इस रियासत में राजपूताना एजेंसी के तीन जिले (टोंक, रामपुरा/अलीगढ़, निम्बाहेड़ा) और सेंट्रल इंडिया एजेंसी के तीन जिले (छबड़ा, पिराणा, सिरोंज) शामिल थे।
- अमीर खाँ पिंडारी ने सुनहरी कोठी, जामा मस्जिद व दीवान-ए-खास का निर्माण करवाया; उनका जीवन-वृत्तांत मुंशी बिसावन लाल सांडा रचित 'अमीरनामा' में वर्णित है।
📿टोंक के परवर्ती नवाब
- नवाब वजीरुद्दौला खाँ के शासनकाल में 1857 ई. का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ, जब क्रांतिकारियों ने नवाब को उनके ही दुर्ग में कैद कर शहर पर अधिकार कर लिया।
- मोहम्मद अली खाँ के समय फारसी के स्थान पर उर्दू को सरकारी कामकाज की भाषा बनाया गया, स्टाम्प ड्यूटी अनिवार्य की गई, और नवाबी सिक्का 'चँवरशाही' प्रचलन में आया।
- हाफिज सआदत अली खाँ ने बनास नदी पर पुल व सआदत अस्पताल बनवाया, 23 मई 1939 ई. को मजलिस-ए-आम का गठन किया, और घण्टाघर व म्युनिसिपल टाउन हॉल का निर्माण करवाया; सुनहरी कोठी की दूसरी मंजिल तथा उसकी व जामा मस्जिद की नायाब सोने की नक्काशी व चित्रकारी नवाब मोहम्मद इब्राहीम अली खाँ ने करवाई, जिसके कारण इस भवन का नाम 'सुनहरी कोठी' (स्वर्ण भवन) पड़ा।
- फारुख अली खाँ भारत की स्वतंत्रता के समय टोंक के नवाब थे, और 25 मार्च 1948 ई. को, उनके ही शासनकाल में, टोंक रियासत का राजस्थान संघ में विलय हुआ।
🐫झुंझुनूँ: शेखावाटी का हृदय
- झुंझुनूँ राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र का प्रमुख भाग है, और इसका नाम जाट योद्धा झुझार सिंह के नाम पर पड़ा है।
- यहां 1450 ई. में मोहम्मद खाँ व उसके पुत्र शम्स खाँ ने मुस्लिम शासन की नींव रखी; इसका अंतिम मुस्लिम शासक रोहिल्ला खाँ, बीकानेर के शासक शार्दूल सिंह (सार्दुल सिंह) का मातहत था।
परमार वंश
माउंट आबू के पौराणिक अग्निकुण्ड से लेकर धारा नगरी में राजा भोज के विद्वत्सभा तक — परमारों की उन अनेक शाखाओं से मिलिए जिन्होंने राजस्थान व मालवा पर शासन किया।
🔥उत्पत्ति व किंवदंती
- 'परमार' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'शत्रु को मारने वाला' होता है, और चंदबरदाई ने अपने ग्रंथ 'पृथ्वीराज रासो' में इस वंश की पौराणिक उत्पत्ति माउंट आबू के अग्निकुण्ड से बताई है।
- उदयपुर प्रशस्ति, पिंगल सूत्रवृत्ति एवं तेजपाल अभिलेख जैसे स्रोत परमारों को वंश से 'ब्रह्म क्षत्रकुलीन' बताते हैं।
⛰️आबू के परमार
- धूमराज को आबू में परमार शासन का मूल पुरुष (संस्थापक) माना जाता है, यद्यपि औपचारिक वंशावली उत्पलराज से आरंभ होती है; उनकी राजधानी चन्द्रावती थी।
- 'मरुमण्डल का महाराजा' कहलाने वाले सिंधुराज आबू के परमार वंश के एक प्रतापी शासक थे, और 1002 ई. के एक दानपत्र से पता चलता है कि आगे धरणीवराह ने आबू पर अधिकार कर लिया था।
- महीपाल के पुत्र धन्धुक ने गुजरात के सोलंकी शासक भीमदेव से युद्ध किया, और उनकी विधवा पुत्री ने बाद में बसंतगढ़ में सूर्य मंदिर बनवाया तथा सरस्वती बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाया।
- देलवाड़ा (सिरोही) स्थित विमलशाही मंदिर, जो भगवान आदिनाथ को समर्पित है, 1031 ई. में भीमदेव के आबू दण्डपति विमलशाह द्वारा बनवाया गया था।
🛕धारावर्ष व सोमसिंह: देलवाड़ा के मंदिर
- आबू के परमारों में सर्वाधिक प्रतापी धारावर्ष (1163-1219 ई.) गुजरात के चार सोलंकी शासकों — कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज व भीमदेव द्वितीय — के समकालीन थे, और उनके दरबारी कवि सोमेश्वर ने 'कीर्ति कौमुदी' ग्रंथ की रचना की।
- अचलेश्वर के मंदाकिनी कुण्ड पर स्थापित उनकी मूर्ति और आर-पार छिद्रित तीन भैंसे आज भी उनके पराक्रम की कथा कहते हैं; उनके छोटे भाई प्रहलादन ने पालनपुर नगर बसाया और 'पार्थ पराक्रम व्यायोग' नाटक की रचना की।
- सोमसिंह के मंत्री तेजपाल ने देलवाड़ा में भगवान नेमीनाथ का जैन मंदिर बनवाया, जो लूणवसहि अथवा वास्तुपाल-तेजपाल मंदिर के नाम से विख्यात है।
- लगभग 1311 ई. में जालौर के चौहान शासक राव लूम्बा ने परमारों से चन्द्रावती छीन ली।
📖मालवा के मुंज
- मालवा के परमारों का मूल स्थान आबू था, और वे उज्जैन या धारा नगरी से शासन करते थे; उनके प्रारंभिक शासकों में उपेन्द्र, बैरीसिंह प्रथम व सियक प्रथम सम्मिलित थे।
- मेरुतंग की 'प्रबंध चिंतामणि' तथा पद्मगुप्त के 'नवसाहसांक चरित' के अनुसार सियक द्वितीय ने, अपना कोई पुत्र न होने से, मुंज परमार को दत्तक पुत्र बनाया।
- मुंज ने 'अमोघवर्ष', 'पृथ्वीवल्लभ', 'वाक्पतिराज', 'श्रीवल्लभ' व 'कवि वृष' की उपाधियां धारण कीं, और कल्याणी के चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को सात बार युद्ध में परास्त किया।
- मुंज के बाद सिंधुराज और तत्पश्चात विख्यात राजा भोज मालवा के सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक बने।
📚राजा भोज: मालवा के विद्वान शासक
- भोज ने उज्जैन के स्थान पर धारा नगरी को अपनी राजधानी बनाया, जहां उन्होंने सरस्वती कंठाभरण (भोजशाला) नामक पाठशाला बनवाई और वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित करवाई, जो आज ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिह्न है।
- उन्होंने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया — जिसे 1429 ई. में राणा मोकल ने जीर्णोद्धार कर मोकलजी मंदिर भी कहलाया — तथा भोजपुर नगर व विशाल भोजसर तालाब का निर्माण करवाया।
- विद्वता के कारण 'कविराज' कहलाने वाले भोज के दरबार में अबुल-फजल के आइन-ए-अकबरी के अनुसार लगभग 500 विद्वान रहते थे, जिनमें राजशेखर, मेरुतुंग, बल्लाल, वररुचि, मानतुंग, सुबंधु, अमर, माघ व धनपाल सम्मिलित थे, और उन्होंने स्वयं सरस्वती कंठाभरण, समरांगण सूत्रधार व राजमर्तण्ड जैसे ग्रंथों की रचना की।
- उनकी मृत्यु पर प्रसिद्ध हुई कहावत — 'अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती' — का अर्थ है कि धारा नगरी में विद्या और विद्वान दोनों निराश्रित हो गए।
🗿जालौर व किराडू के परमार
- 1087 ई. के जालौर शिलालेख में जालौर के सात परमार शासकों — वाक्पतिराज, चन्दन, देवराज, अपराजित, विजल, धारावर्ष एवं विसल — का उल्लेख मिलता है।
- कभी आबू के सिंधुराज की राजधानी रहा किराडू आगे परमारों की एक शाखा के अधीन आया, जिसमें कृष्णराज, सोच्छराज, उदयराज व सोमेश्वर सम्मिलित थे, जैसा वहां प्राप्त अभिलेख से पता चलता है; 1161 ई. में इसी सोमेश्वर ने जैसलमेर व जोधपुर के कई किलों पर नियंत्रण स्थापित किया।
🌾वागड़ के परमार
- राजस्थान का दक्षिणी भाग (वर्तमान डूँगरपुर-बाँसवाड़ा क्षेत्र) वागड़ या वाग्वर कहलाता है, जो 10वीं से 12वीं सदी तक परमारों के अधीन रहा और आर्थूणा (उत्थूनक) से शासित होता था।
- इस शाखा के प्रमुख शासकों में धनिक, कंकदेव, सत्यराज, मण्डलीक, चामुण्डराज व संभवतः अंतिम शासक विजयराज सम्मिलित थे; चामुण्डराज ने 1079 ई. में अर्थूणा में मण्डलेश्वर मंदिर बनवाया।
- लगभग 1179 ई. में गुहिल नरेश सामन्तसिंह ने वागड़ पर अधिकार कर वहां परमार शासन को समाप्त कर दिया।