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राजस्थान GK

जैसलमेर राज्य का इतिहास

History of Jaisalmer State

भाटी वंश के भटनेर से जैसलमेर तक के सफर, इसके साकों, स्वर्णिम दुर्ग और 1949 में राजस्थान में विलय तक की पूरी कहानी।

35 टॉपिक36 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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भाटी राजवंश की उत्पत्ति और पहचान

Origins & Identity of the Bhati Dynasty

जैसलमेर के अस्तित्व में आने से बहुत पहले, यदुवंश की एक शाखा भाटी वंश मरुभूमि की सरहदों पर दुर्ग बसा चुकी थी — यहीं से इनकी गाथा और राजसी पहचान आरम्भ होती है।

🌱भाटी वंश की उत्पत्ति

  • जैसलमेर की स्थापना करने वाला वंश भाटी वंश था, जो प्राचीन यदुवंश की एक शाखा है; उत्तरी सीमा की रखवाली करने के कारण इन्हें 'उत्तर भड़ किवाड़' यानी उत्तर भारत के द्वारपाल/प्रहरी की उपाधि मिली।
  • इस वंश की कड़ी यदुवंशी शासक बाळदा (बालबंध) के पुत्र भाटी से जुड़ती है; भाटी को ही इस नाम वाली शाखा का संस्थापक माना जाता है, और पीढ़ियों के प्रवास के बाद जैसलमेर ही इस वंश का अंतिम बसाव-स्थल बना।
  • 1157 ई. के लोद्रवा शिलालेख में भाटी शासकों के नाम सुरक्षित मिलते हैं, जबकि ख्यातों और वंशावलियों के अनुसार राज और गज को भाटी वंश का वास्तविक प्रवर्तक माना जाता है।

🛡️वंश की पहचान

  • भाटी वंश चंद्रवंश (श्रीकृष्ण के वंशज) और यदु कुल से सम्बन्ध रखता है; इनके कुलदेवता लक्ष्मीनाथजी तथा कुलदेवी स्वांगिया माता हैं।
  • इनका राजचिह्न 'उत्तर भड़ किवाड़' के साथ 'छत्राला यादवपति' को दर्शाता है, जिसमें दो हिरणों के बीच एक शुभ सुगन चिड़िया तथा भाला थामे हाथ अंकित है, जिसके भाले का अग्रभाग हल्का मुड़ा हुआ है।
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भटनेर से लोद्रवा तक — प्रारंभिक राजधानियाँ

From Bhatner to Lodrva — the Early Capitals

जैसलमेर की सुनहरी प्राचीर बनने से सदियों पहले, भाटियों ने अपनी राजधानी पाँच बार मरुभूमि में बदली — हर नया दुर्ग अस्तित्व, महत्वाकांक्षा और त्रासदी की एक नई गाथा था।

🏯भूपत व भटनेर

  • भाटी के पुत्र भूपत ने लगभग 285 ई. में भटनेर दुर्ग (आज का हनुमानगढ़) बनवाया और उसे वंश की पहली राजधानी बनाया।

📜मांडन राव व राव सूरसेन

  • लगभग 599 ई. में मांडन राव ने मारोठ नगर बसाया और उसके किले की नींव रखी; इसी समय से शासकों ने 'राजा' की उपाधि छोड़कर 'राव' की उपाधि अपनानी शुरू की।
  • उनके पुत्र राव सूरसेन ने राजधानी मारोठ स्थानांतरित की और इस अवसर पर 'भाटिक संवत्' नामक नए कालगणना युग की शुरुआत की।

🗡️केहर व तणु

  • केहर ने केहरोर दुर्ग बनवाया और तनोट में भी एक दुर्ग की नींव रखी; उनके उत्तराधिकारी तणु ने लगभग 787 ई. में तनोट दुर्ग का निर्माण पूर्ण कर वहीं राजधानी बना दी।

🛕तनोट माता मंदिर

  • राजा तणु ने ही तनोट माता का मंदिर बनवाया था; इस देवी को 'थार की वैष्णोदेवी' और हाल के इतिहास में 'भारतीय सैनिकों की कुलदेवी' के रूप में पूजा जाता है।

🔥विजयराज व तनोट का साका

  • इतिहास में 'विजयराज चूड़ाला' के नाम से प्रसिद्ध विजयराज को 1176 ई. के धनावा शिलालेख में 'महाराजा' की उपाधि दी गई थी।
  • वराहों नामक आक्रमणकारी समूह के हमले में तनोट का भीषण साका हुआ; इसमें विजयराज के शिशु पुत्र देवराज अकेले बच पाए, जिन्हें उनकी धाय माँ ने अपनी स्वामिभक्ति से बचा लिया।

🏰रावल देवराज

  • यही बचाया गया बालक बड़ा होकर 852 ई. में अपने मामा जजा भाटी की मदद से देरावर (देरावल) नामक दुर्ग-नगर की स्थापना करते हैं, और बाद में लाखा फुलाणी की सहायता से पिता के पुराने शत्रुओं को परास्त कर एक विशाल राज्य खड़ा करते हैं।
  • देरावर 873 ई. तक भाटियों की नयी राजधानी रही, जब देवराज ने अपनी राजगद्दी लोद्रवा स्थानांतरित कर दी; योगी रत्नू ने ही उन्हें 'रावल' की उपाधि प्रदान की, जिसे उनके उत्तराधिकारी सदियों तक धारण करते रहे।

🗺️भाटी राजवंश की छह राजधानियाँ

  • क्रमवार देखें तो भाटी राजगद्दी छह राजधानियों से होकर गुजरी: भूपत के समय भटनेर, राव सूरसेन के समय मारोठ, तणु के समय तनोट, रावल देवराज के समय देरावर, फिर लोद्रवा (देवराज के ही समय), और अंत में रावल जैसल के समय जैसलमेर।
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जैसलमेर की स्थापना और सल्तनतकालीन साके

The Founding of Jaisalmer & the Sultanate-era Sakas

1155 ई. में एक पहाड़ी पर बसा दुर्ग जल्द ही राजस्थान के दो सबसे भीषण घेरों का साक्षी बना, क्योंकि दिल्ली सल्तनत की नज़रें बार-बार इस मरु दुर्ग पर टिकीं।

⛰️रावल जैसल व जैसलमेर की स्थापना

  • 12 जुलाई, 1155 ई. को रावल जैसल ने त्रिकूट पहाड़ी पर एक दुर्ग की नींव रखी और अपने नाम पर बसे इस नगर को अपनी राजधानी बनाया — इसी कारण जैसलमेर की उत्पत्ति 12वीं शताब्दी में मानी जाती है।

🟡शालिवाहन व पीले पत्थर का दुर्ग

  • जैसल के उत्तराधिकारी शालिवाहन ने निर्माण-कार्य आगे बढ़ाया और लगभग 1187 ई. में उसे पूर्ण किया।
  • बना हुआ यह दुर्ग पूरी तरह पीले बलुआ पत्थर से निर्मित है, और उल्लेखनीय रूप से इसके निर्माण में कहीं भी चूने का उपयोग नहीं किया गया।

👑पुण्यपाल

  • पुण्यपाल 1304 ई. में जैसलमेर की गद्दी पर बैठे; कहा जाता है कि चित्तौड़ के रावल रतनसिंह की सुविख्यात रानी पद्मिनी स्वयं उनकी पुत्री थीं।

🕉️जैन आचार्यों का आगमन

  • रावल जैसल के वंशज रावल करण के शासनकाल में जैन आचार्य मुनि जिन प्रबोध सूरि जैसलमेर पधारे, और बाद में करण के पुत्र जैतसिंह प्रथम के समय एक अन्य प्रतिष्ठित मुनि जिनचंद्र सूरि भी यहाँ आए।

🔥रावल जैतसिंह व मूलराज प्रथम — प्रथम साका

  • लगभग 1308 ई. में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनानायक कमालुद्दीन गुर्ग व मलिक काफूर को जैसलमेर पर आक्रमण हेतु भेजा; इसी संघर्ष में रावल जैतसिंह की मृत्यु हुई।
  • उनके पुत्र मूलराज के नेतृत्व में पुरुषों ने केसरिया किया जबकि राजपूत महिलाओं ने जौहर किया — इसे जैसलमेर का प्रथम साका कहा जाता है; लगभग 1312-13 ई. तक दुर्ग अलाउद्दीन के अधिकार में चला गया, जिसका उल्लेख फारसी ग्रन्थ 'तारीख-ए-मासूमी' में मिलता है।

⚰️रावल दूदा — द्वितीय साका

  • रावल दूदा के शासनकाल (1319-1331 ई.) में फिरोजशाह तुगलक के नेतृत्व में दिल्ली की सेना ने जैसलमेर दुर्ग पर धावा बोला; इस युद्ध में स्वयं दूदा, उनके भाई त्रिलोकसी, दीवान मेहता जसवंत सिंह तथा अन्य कई राजपूत मारे गए — इसे जैसलमेर का द्वितीय साका कहा जाता है।
  • यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास है: फिरोजशाह तुगलक स्वयं सुल्तान के रूप में 1351 ई. में ही सत्तासीन हुए, यानी दूदा की मृत्यु के काफी बाद; उस समय दिल्ली के वास्तविक शासक मुहम्मद बिन तुगलक थे — संभवतः आक्रमणकारी सेना का नेतृत्व भावी सुल्तान फिरोजशाह ने सिंहासन पर बैठने से पहले किया हो, इसीलिए ख्यातों में यह युद्ध उन्हीं के नाम से याद किया जाता है।
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मुगल आधिपत्य के दौर में भाटी शासक

Bhati Rulers under Mughal Suzerainty

मुगलों के उदय के साथ जैसलमेर के शासकों ने गठबंधन और स्वायत्तता के बीच संतुलन साधा — अपनी राजनीतिक निष्ठाओं को नया रूप देते हुए भी उन्होंने जलाशयों और मंदिरों का निर्माण जारी रखा।

💧रावल घड़सी/घटसिंह

  • रावल घड़सी (1343-1361 ई.) को जैसलमेर में घड़सीसर जलाशय बनवाने के लिए याद किया जाता है, जो आज भी नगर की सेवा करता है।

🛕रावल लक्ष्मण

  • रावल लक्ष्मण (1396-1436 ई.) ने दुर्ग के भीतर भगवान लक्ष्मीनाथ (विष्णु) का मंदिर बनवाया; यह देवता राज्य की पहचान से इतना जुड़ा था कि लक्ष्मीनाथ को ही जैसलमेर का वास्तविक शासक माना जाता था, और रावल मात्र उनके प्रतिनिधि के रूप में राज करते थे।

रावल बैरसिंह

  • रावल बैरसिंह (1436-1447 ई.) ने 1441 ई. में रत्नेश्वर महादेव का शिव मंदिर बनवाया और बुलीसर व राणीसर नामक दो कुएँ भी खुदवाए।
  • उन्हें अपने राज्य में जोधपुर के भावी संस्थापक राव जोधा को शरण देने के लिए भी याद किया जाता है।

🏹रावल जैतसिंह द्वितीय

  • रावल जैतसिंह द्वितीय (1506-1528 ई.) के शासनकाल में बीकानेर के राठौड़ शासक राव लूणकरण ने जैसलमेर पर आक्रमण किया; जैतसिंह द्वितीय ने शांतिनाथ जैन मंदिर का निर्माण भी करवाया।

🌊रावल लूणकरण — अर्द्ध साका

  • दिल्ली में बाबर के शासनकाल के समकालीन रावल लूणकरण (1528-1550 ई.) ने 'जैत बंध' पूर्ण करवाया — जो मध्यकालीन भारतीय बंध-निर्माण तकनीक का सबसे पुराना जीवित उदाहरण है — और इसके पास 'बड़ा बाग' नामक उद्यान लगवाया, जहाँ आज भाटी शासकों की छतरियाँ स्थित हैं।
  • उनकी पुत्री उमादे, जो बाद में 'रूठी रानी' के नाम से जानी गईं, जोधपुर के शासक मालदेव से ब्याही गईं; जब कंधार के अपदस्थ शासक अमीर अली खाँ ने धोखे से लूणकरण पर आक्रमण किया, तो राजपूतों ने केसरिया कर विजय पाई और जौहर नहीं हुआ — इसीलिए 1550 ई. की इस घटना को जैसलमेर का 'अर्द्ध साका' कहा जाता है, और लूणकरण के ज्येष्ठ पुत्र मालदेव ने ही अमीर अली खाँ का वध कर दुर्ग पर अधिकार बनाए रखा।

✒️रावल हरराज — अकबर की अधीनता व साहित्य का स्वर्णयुग

  • रावल हरराज (1561-1577 ई.) जैसलमेर के पहले शासक थे जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार की, यह उन्होंने 1570 ई. में अकबर के नागौर दरबार में किया, अपने पुत्र सुल्तानसिंह को अकबर की सेवा में भेजा, और स्वयं अपनी पुत्री का विवाह भी मुगल सम्राट से करवाया।
  • उन्होंने जीवणी व डावी (बायाँ व दायाँ) नामक सामन्तों की श्रेणियाँ स्थापित कर सामन्ती ढाँचे की नींव रखी, और उनका शासनकाल जैसलमेर के साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग माना जाता है — उन्होंने स्वयं 'पिंगल शिरोमणि' नामक काव्यशास्त्र ग्रन्थ रचा, जबकि समकालीन कवि कुशललाभ व डूँगरसी रतनू भी इसी दौर में लिखते रहे, और प्रसिद्ध 'ढोला मारू रा दूहा' भी इसी काल की रचना है।
  • उनकी पुत्री चम्पादे का विवाह बीकानेर के कवि-शासक पृथ्वीराज (पीथल) से हुआ, और हरराज ने स्वयं मालिया महल तथा खाबड़ियों की हवेली का निर्माण करवाया।

🚪रावल भीम

  • रावल भीम (1577-1613 ई.) का उल्लेख मुगल ग्रन्थ 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' में भी मिलता है; उन्होंने जैसलमेर दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया और गणेश पोल व सूर्य पोल द्वार बनवाए।
  • उनकी महारानी ने घड़सीसर तालाब के तट पर नीलकण्ठ महादेव का मंदिर बनवाया।

🏷️महारावल कल्याण — नई राजपदवी

  • महारावल कल्याण (1613-1627 ई.) के समय से जैसलमेर के शासक पुरानी 'रावल' उपाधि की जगह 'महारावल' की उपाधि धारण करने लगे — यह परिवर्तन सेठ थारूशाह के देरासर स्थित स्तम्भ लेख में दर्ज है।

🧱महारावल मनोहरदास व 99 बुर्ज

  • महारावल मनोहरदास (1627-1650 ई.) ने जैसलमेर दुर्ग की 99 बुर्जों वाली प्राचीर को अंतिम स्वरूप दिया, जो आज भी विद्यमान है।

🪙महारावल सबलसिंह की मुद्रा

  • महारावल सबलसिंह (1650-1660 ई.) ने 1659 ई. में जैसलमेर की अपनी स्वतंत्र ताँबे की मुद्रा 'डोडिया' का प्रचलन शुरू करवाया।
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उत्तरकालीन शासक, ब्रिटिश संबंध और जैसलमेर का विलय

Later Rulers, Colonial Ties & the Merger of Jaisalmer

झील-निर्माताओं और संधि-कर्ताओं से लेकर राज्य के अंतिम शासक तक, भाटी शासन की अंतिम तीन शताब्दियों में महल, अकाल, अंग्रेजों से सम्बन्ध और अंततः स्वतंत्र भारत के राजस्थान में विलय — सब कुछ एक साथ बुना गया।

💦महारावल अमरसिंह के जल-कार्य

  • महारावल अमरसिंह (1660-1701 ई.) ने अमर सागर झील और उससे सटा राणी बाग बनवाया, तथा 'अमरकाश' नामक नाले के जरिए सिंधु नदी का पानी जैसलमेर तक पहुँचाया।

🏛️महारावल अखैसिंह — मंदिर, महल व नई टकसाल

  • महारावल अखैसिंह (1722-1761 ई.) ने 1761 ई. में जैसलमेर दुर्ग स्थित रणछोड़जी मंदिर को पूर्ण कर उसकी प्रतिष्ठा करवाई, और उनके समय अखैपोल (घूँघट), अखैविलास महल तथा राड़ विलास महल भी बने।
  • 1756 ई. में उन्होंने एक स्वतंत्र राजकीय टकसाल स्थापित की और मुहम्मदशाही तथा अखैशाही सिक्कों का प्रचलन शुरू करवाया।

⛓️महारावल मूलराज द्वितीय

  • महारावल मूलराज द्वितीय (1761-1819 ई.) को उनके अपने ही पुत्र कुँवर रायसिंह ने 'छब्बा निवास' में बंदी बना लिया था; फिर भी 1779 ई. में उन्होंने अपने पूरे परिवार सहित नाथद्वारा की यात्रा की, जो किसी भी जैसलमेर महारावल द्वारा की गई ऐसी पहली यात्रा थी, और बाद में उन्होंने गिरधारीजी का भव्य मंदिर तथा अपने गुरु हरियायजी की बैठक भी बनवाई।
  • 1772 ई. में उन्होंने किशनगढ़ की राजकुमारी रूपकँवर से विवाह किया और पुष्टि मार्ग की दीक्षा ली; 1797 ई. में गोरखनाथ व अम्बिका देवी के मंदिर बनवाए गए, और 1818 ई. में उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ संधि की।

👑महारावल गजसिंह

  • महारावल गजसिंह (1820-1846 ई.) की गद्दी उनके दीवान सालिमसिंह की देन थी, जिन्होंने पर्याप्त समर्थन जुटाकर मार्च 1820 में उनका औपचारिक राजतिलक करवाया; उनके शासनकाल में ही लगभग 1828 ई. में पालीवालों का सामूहिक पलायन भी हुआ।
  • उन्होंने बासणपी के युद्ध में बीकानेर की सेना को हराया, गजविलास व सर्वोत्तम विलास महल बनवाए, तथा 1840 ई. में गजरूप सागर का निर्माण करवाया।

📯महारावल रणजीतसिंह व 1857

  • रणजीतसिंह के पिता केसरीसिंह के संरक्षणकाल में मेहता अजीतसिंह ने 'जैसलमेर की ख्यात' ग्रन्थ रचा; रणजीतसिंह (1846-1864 ई.) स्वयं 1857 की क्रान्ति के दौर में शासक रहे और उन्होंने अंग्रेजों को पूर्ण सहयोग दिया, तथा उनके ही काल में जैसलमेर की पाषाण शिल्पकला को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली।
  • उनके समय सिक्कों पर राजचिह्न के रूप में छत्र व शुभ चिड़िया अंकित होने लगी, और मोहम्मद शाह के नाम की जगह महारानी विक्टोरिया का नाम आने लगा; उनके दरबारी कवि गोकुलनाथ भट्ट ने 'रणजीत रत्नमाला' रचा, 26 जून 1857 को जोधपुर से जैसलमेर होते हुए सिंध तक सीधा डाक मार्ग स्थापित हुआ, तथा गुलाब सागर सरोवर बनाकर उसका नाम रानी गुलाब कँवर के नाम पर रखा गया।

🧂महारावल बैरीशाल

  • महारावल बैरीशाल (1864-1891 ई.) ने 1879 ई. में ब्रिटिश सरकार के साथ नमक संधि की और कवि रतनू शिवदान को राजकीय कवि मानकर 'कविराज' की उपाधि दी।
  • उन्होंने कच्छ निवासी मेहता जगजीवन को जैसलमेर का दीवान नियुक्त किया — राज्य के इतिहास में पहली बार कोई बाहरी व्यक्ति इस पद पर आसीन हुआ — और 1888 ई. में जैसलमेर शहर में पहला ब्रिटिश डाकखाना खुला।

🎓महारावल शालिवाहन द्वितीय

  • महारावल शालिवाहन द्वितीय (1891-1914 ई.) को शिक्षा हेतु मेयो कॉलेज, अजमेर भेजा गया, जहाँ अजमेर के प्रसिद्ध विद्वान व समाज-सुधारक दीवान हरविलास शारदा उनके संरक्षक बने; उनके शासनकाल में अखिल भारतीय श्वेताम्बर जैन महासभा का आयोजन भी हुआ।

🕯️महारावल जवाहरसिंह — युद्ध, अकाल व बलिदान

  • भाटी वंश के अंतिम शासक महारावल जवाहरसिंह (1914-1949 ई.) ने प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की, जिसके फलस्वरूप युद्ध की समाप्ति पर वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने स्वयं जैसलमेर आकर उनका आभार व्यक्त किया; उनके काल में 1939-40 ई. का भयंकर 'छप्पनिया अकाल' भी पड़ा, और 1941 ई. में नगर में नगरपालिका स्थापित हुई।
  • उनके समय मोहनगढ़ दुर्ग, जवाहर विलास भवन तथा जवाहर निवास अतिथि गृह बने, और 1933 ई. में जवाहरलाल प्रिंटिंग प्रेस स्थापित हुई; फिर भी राज्य ने 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया।
  • उनके शासनकाल की सबसे दुखद घटनाओं में से एक में, स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा को जेल में क्रूर यातनाएँ देकर 3 अप्रैल, 1946 को आग लगा दी गई, जिससे अगले ही दिन उनकी मृत्यु हो गई।

🇮🇳महारावल गिरधरसिंह व विलय

  • महारावल गिरधरसिंह (1949-1950 ई.) के समय 30 मार्च, 1949 ई. को जैसलमेर का राजस्थान में विलय हुआ, जिसके साथ भाटी शासन की लगभग आठ शताब्दियाँ स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे में सम्मिलित हो गईं।

📚जैसलमेर से जुड़े विशिष्ट तथ्य

  • जैसलमेर राजपूताना की एकमात्र ऐसी रियासत थी, जहाँ उत्तराधिकारियों पर कभी 'शुल्क' (उत्तराधिकार कर) नहीं लगाया गया।
  • इसका जैन ज्ञान भण्डार यहाँ के ग्रन्थ-संकलन के लिए विश्व-विख्यात है, महाकाव्य 'ढोला-मारू रा दूहा' विक्रम संवत् 1616 में यहीं जैन कवि कुशललाभ ने रचा, और इस क्षेत्र में 'झीड़े' नामक अपनी विशिष्ट काव्य-शैली भी विकसित हुई।
  • लोक-रंगमंच में जैसलमेर की रम्मत परंपरा में 'राजा भर्तृहरि' और ख्याल परंपरा में 'मूमल-महेन्द्र' सबसे प्रसिद्ध हैं; इसकी सबसे प्राचीन चित्रित पांडुलिपियाँ, 'दसवैकालिका सूत्र चूर्णि' व 'औधनिर्युक्ति वृत्ति', 1060 ई. में नागपाल के वंशज आनंद के लिए पाहिल नामक कलाकार द्वारा चित्रित की गई थीं, और विख्यात मांड-सारंगी वादक 'आरबा' के नाम पर आरबा संगीत घराना बना।
  • इस क्षेत्र की मुख्य बोली थारी या घाटी है; मुगलकालीन इतिहासकार मीर मासूमी (नवाब अमीर मोहम्मद मासूम) का रावल भीम से घनिष्ठ संबंध था, उन्होंने जैसलमेर नगर के बाहर 'फकीरों का तकिया' नामक इमारत बनवाई, और 'तारीख-ए-मासूमी' ग्रन्थ की रचना की, जिसमें जैसलमेर पर हुए सल्तनतकालीन आक्रमणों का भी उल्लेख मिलता है।