चौहान वंश का इतिहास
History of the Chauhan Dynasty
अग्निकुंड की किंवदंती से लेकर पृथ्वीराज तृतीय के पतन तक, और रणथम्भौर, जालौर, सिरोही व हाड़ौती में फैली इसकी शाखाओं तक — चौहान वंश की पूरी गाथा एक जगह।
उत्पत्ति और शाकंभरी-अजमेर के चौहान
पृथ्वीराज तृतीय का नाम किंवदंती बनने से बहुत पहले, चौहान शासकों की कई पीढ़ियाँ साँभर झील के निकट एक छोटी रियासत से उठकर पूरे सपादलक्ष पर शासन करने तक पहुँचीं — यह कथा मिथकों, अभिलेखों और वंश की उत्पत्ति को लेकर परस्पर विरोधी मतों से बुनी हुई है।
🔥उत्पत्ति के सिद्धांत
- चौहानों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में गहरा मतभेद रहा है — चंदबरदाई, मुहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिश्रण उन्हें माउंट आबू में किसी ऋषि के अग्निकुंड से उत्पन्न मानते हैं, जबकि अचलेश्वर मंदिर के एक लेख में उन्हें चंद्रवंशी (चंद्र वंश का वंशज) बताया गया है।
- एक अन्य मत के अनुसार जयानक की पृथ्वीराज विजय, नयनचंद्रसूरि की हम्मीर महाकाव्य, जोधराज की हम्मीर रासो तथा इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं।
- डॉ. दशरथ शर्मा ने बिजौलिया शिलालेख की अलग व्याख्या करते हुए चौहानों को मूलतः ब्राह्मणवंशीय बताया, वहीं ब्रिटिश काल के लेखकों कर्नल जेम्स टॉड, स्मिथ और विलियम क्रूक ने इस वंश को विदेशी मूल का माना।
🗺️मूल स्थान: शाकंभरी व सपादलक्ष
- बिजौलिया शिलालेख व हम्मीर महाकाव्य जैसे वंशावली स्रोतों के अनुसार चौहानों का आरंभिक राज्य साँभर के आसपास था, जिसे शाकम्भरी या सपादलक्ष कहा जाता था और जिसकी राजधानी अहिछत्रपुर थी।
- सीकर के हर्षनाथ अभिलेख में चौहानों की प्राचीन मातृभूमि को 'अनन्तगोचर प्रदेश' (वर्तमान सीकर के निकटवर्ती इलाके) के नाम से पुकारा गया है, जबकि हम्मीर महाकाव्य व सुर्जन चरित पुष्कर व उसके आसपास के क्षेत्र को चौहानों की जन्मभूमि मानते हैं।
🏗️वंश की स्थापना: वासुदेव व अजयपाल
- वासुदेव चाहमान (चौहान) को चौहान वंश का आदिपुरुष माना जाता है, जिसने लगभग 551 ई. में सपादलक्ष क्षेत्र में चौहान शासन स्थापित कर अहिछत्रपुर (नागौर) को अपनी राजधानी बनाया; बिजौलिया शिलालेख में उन्हें साँभर झील का 'प्रवर्तक' भी बताया गया है।
- सपादलक्ष के चौहान शासक अजयपाल ने 7वीं सदी में साँभर कस्बा बसाया तथा तारागढ़ पहाड़ी पर अजयमेरु दुर्ग का निर्माण करवाया — यही तथ्य राजस्थान पुलिस कांस्टेबल परीक्षा (2022) की आधिकारिक अंतिम उत्तर कुंजी में भी दोहराया गया है।
- बिजौलिया शिलालेख के अनुसार वासुदेव के वंशज 'सामन्त' का जन्म वत्स गोत्रीय विप्रवंश (ब्राह्मण कुल) में हुआ बताया गया है, तथा सीकर के निकट हर्षनाथ की पहाड़ी पर स्थित चौहानों का आराध्य हर्षनाथ मंदिर उनके शासक गूवक प्रथम ने बनवाया था।
🛕शाकंभरी के प्रारंभिक शासक
- गूवक प्रथम के पौत्र गूवक द्वितीय के उत्तराधिकारी चन्दनराज की रानी रुद्राणी पुष्कर में प्रतिदिन एक हजार दीपक जलाकर शिव की आराधना करती थीं; हर्षनाथ लेख के अनुसार उनकी योगिक शक्तियों के कारण उन्हें 'आत्मप्रभा' भी कहा जाता था।
- शासक सिंहराज के भाई लक्ष्मण चौहान ने नाडोल जाकर वहाँ एक पृथक चौहान शाखा की स्थापना की, जबकि सिंहराज के उत्तराधिकारी विग्रहराज द्वितीय ने कुलदेवी आशापुरा देवी का मंदिर बनवाया।
- जयानक रचित पृथ्वीराज विजय में शासक गोविंदराज तृतीय को 'वैरीघट्ट' (शत्रुसंहारक) कहा गया है, तथा उसी ग्रंथ में पृथ्वीराज प्रथम की प्रशंसा करते हुए लिखा गया है कि उन्होंने पुष्कर पर आक्रमण करने वाले 700 चालुक्यों का वध किया था।
🪙अजयराज (1105-1133 ई.)
- पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज — जिनकी अजमेर शाखा सपादलक्ष के चौहानों में ही गिनी जाती है — ने लगभग 1105 ई. में राजगद्दी संभाली और 1113 ई. में अजयमेरु (वर्तमान अजमेर) नगर की स्थापना कर साँभर की जगह उसे अपनी राजधानी बनाया।
- अजयराज ने चाँदी व ताँबे के 'अजयप्रिय द्रम्म' नामक सिक्के चलाये, जिन पर उनकी रानी सोमलवती (सोमल देवी) का नाम भी अंकित है; पृथ्वीराज विजय के अनुसार उन्होंने पृथ्वी को चाँदी की मुद्राओं से भर दिया था और गजनी ('गजन मतंग') के मुस्लिम आक्रान्ताओं को भी पराजित किया।
- डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने अजयराज के शासनकाल को चौहानों का 'साम्राज्य निर्माण काल' कहा है।
⚔️अर्णोराज (1133-1155 ई.)
- अजयराज के सिंहासन त्यागने के बाद उनके पुत्र अर्णोराज 1133 ई. में शासक बने; गुजरात के चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज ने अपनी पुत्री कंचनदेवी का विवाह उनसे किया, और अर्णोराज ने मालवा के परमार शासक नरवर्मा को पराजित कर उपरमाल क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिया।
- गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल ने माउंट आबू के निकट अर्णोराज को पराजित किया, फिर भी उन्होंने पुष्कर में वराह मंदिर व अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया; देवबोध व धर्मघोष उनके दरबार के प्रकाण्ड विद्वान थे।
- पृथ्वीराज विजय के अनुसार अर्णोराज के पुत्र जगदेव ने 1155 ई. में स्वयं अपने पिता की हत्या कर दी, जिससे वे चौहान शासकों में एकमात्र पितृहन्ता (पिता की हत्या करने वाले) बने।
📜विग्रहराज चतुर्थ / बीसलदेव (1158-1163 ई.)
- 1158 ई. में जग्गदेव के स्थान पर उनके भाई विग्रहराज चतुर्थ अजमेर के शासक बने और उन्होंने दिल्ली (ढिल्लिका) के तोमर शासक तथा गजनी के अमीर खुशरूशाह, दोनों को पराजित किया — इस प्रकार दिल्ली के तोमरों को हराकर उस पर अधिकार करने वाले वे पहले चौहान शासक बने; उनके ही राज्यकाल में दिल्ली शिवालिक स्तम्भ अभिलेख उत्कीर्ण कराया गया।
- विद्वानों के आश्रयदाता होने के कारण 'कवि बान्धव' कहलाने वाले विग्रहराज चतुर्थ ने अपने मंत्री पद्मनाथ से एक साहित्य सम्मेलन आयोजित करवाया जिसकी अध्यक्षता राजकवि सोमदेव ने की, तथा अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला बनवाई जिस पर हरिकेलि नाटक की पंक्तियाँ खुदी थीं — बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे अढ़ाई दिन के झोंपड़े में बदल दिया।
- उन्होंने टोडारायसिंह के पास बीसलपुर बाँध बनवाया व बीसलपुर कस्बा बसाया, एकादशी के दिन पशुवध पर रोक लगाई, और कुमारपाल चालुक्य को हराकर मेवाड़, मारवाड़, नाडोल, जालौर व चित्तौड़ जीत लिए — उनका शासनकाल चौहानों का ऐसा स्वर्णकाल माना जाता है कि जयानक ने लिखा कि उनकी मृत्यु के बाद 'कविबान्धव' की उपाधि धारण करने योग्य कोई नहीं रहा।
- विद्वान किलहोर्न ने विग्रहराज चतुर्थ की विद्वता की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे उन गिने-चुने हिन्दू शासकों में से थे जो कालिदास और भवभूति की होड़ कर सकते थे।
🕉️विग्रहराज के उत्तराधिकारी
- विग्रहराज के बाद गांगेय कुछ समय के लिए शासक बने, फिर पृथ्वीराज द्वितीय ने गद्दी संभाली, जिन्होंने मेनाल में सुहवेश्वर शिव मंदिर बनवाया।
- पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान मृत्यु के बाद उनके चाचा सोमेश्वर (अर्णोराज के पुत्र) राजा बने, उन्होंने कर्पूरी देवी से विवाह किया, अजमेर पर 1177 ई. तक शासन किया और 'प्रताप लंकेश्वर' की उपाधि धारण की।
पृथ्वीराज तृतीय — तराइन और दिल्ली का पतन
अंतिम प्रतापी चौहान सम्राट ने एक शानदार दरबार व सशक्त सेना खड़ी की और उत्तर भारत में एक के बाद एक युद्ध जीते — फिर भी तराइन में सब कुछ गँवा बैठे, एक ऐसी हार में जिसने उपमहाद्वीप का भविष्य ही बदल दिया।
👑परिवार, राज्याभिषेक व उपाधियाँ
- 1166 ई. (ज्येष्ठ, वि.सं. 1223) में सोमेश्वर व कर्पूरी देवी — दिल्ली के तोमर शासक अनंगपाल की पुत्री — के घर जन्मे पृथ्वीराज तृतीय मात्र 11 वर्ष की आयु में राजा बने, तथा उनकी माता उनकी संरक्षक बनीं।
- उनके दरबार में प्रधानमंत्री कदम्बदास, सेनाध्यक्ष भुवनमल तथा उनके आजीवन मित्र व राजकवि चन्दबरदाई शामिल थे; वे 'दलपुंगल' (विश्वविजेता) व 'रायपिथौरा' की उपाधियाँ धारण करते थे।
📚दरबार, विद्वान व अजमेर
- पृथ्वीराज तृतीय के दरबार में जयानक (पृथ्वीराज विजय के रचयिता), चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो), वागीश्वर जनार्दन पृथ्वीभट्ट, विद्यापति गौड़ व विश्वरूप जैसे विद्वान थे, तथा मंत्री पद्मनाथ शास्त्रार्थ व वाद-विवाद के आयोजन का दायित्व संभालते थे।
- उन्हीं के शासनकाल में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती मुहम्मद गौरी के साथ अजमेर आये, और आज भी अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में पृथ्वीराज का एक स्मारक स्थित है।
🏇अभियान व विजय
- 1182 ई. में पृथ्वीराज ने भरतपुर-मथुरा व अलवर के आसपास भण्डानकों के विद्रोह को कुचल दिया — इस घटना का उल्लेख कवि जिनपति सूरि ने अपनी रचना में किया है — तथा उसी वर्ष तुमुल के युद्ध (उरई) में महोबा के चंदेल शासक परमार्दि देव को हराया, जिसमें चंदेल सेनानायक आल्हा व ऊदल मारे गए।
- चंदेल राज्य के एक बड़े भू-भाग को अपने राज्य में मिलाकर अपने सामन्त पंजुनराय को उसका प्रशासक बनाने के बाद, पृथ्वीराज ने 1184 ई. में नागौर के युद्ध में गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय को पराजित किया।
- पृथ्वीराज तृतीय कन्नौज के शासक जयचंद गहड़वाल की पुत्री संयोगिता को उसके स्वयंवर से उठा ले जाकर उससे विवाह करने के लिए भी जाने जाते हैं।
⚔️तराइन के दो युद्ध
- तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में पृथ्वीराज तृतीय ने मुहम्मद गौरी को पराजित किया और उसके बाद भटिंडा किले के किलेदार मलिक जियाउद्दीन को भी हराया — फिर भी यह विजय राजपूतों की राजनीतिक एकता के लिए महँगी साबित हुई।
- गौरी के पुनः आक्रमण के समय मंत्री कदम्बदास ने पृथ्वीराज को चालुक्यों की सहायता न करने की सलाह दी थी; तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान तृतीय को निर्णायक रूप से पराजित किया, जो राजपूतों की राजनीतिक प्रतिष्ठा के लिए विध्वंसक सिद्ध हुआ।
🕯️परिणाम व पृथ्वीराज तृतीय का अंत
- दूसरी हार के बाद गौरी ने अजमेर पर अधिकार कर पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज को भारी कर के बदले वहाँ का शासक बनाया; शीघ्र ही पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने गोविंदराज को पदच्युत कर स्वयं सत्ता संभाली, दिल्ली में पिथौरागढ़ (किला रायपिथौरा) बनवाया और तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा — इसी युद्ध के साथ भारत में स्थायी मुस्लिम शासन की शुरुआत हुई, जिसके संस्थापक मुहम्मद गौरी बने।
- पृथ्वीराज की मृत्यु का विवरण स्रोतों में अलग-अलग मिलता है: चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो के अनुसार गौरी ने गजनी में उन्हें अंधा कर दिया, जिसके बाद पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण से गौरी को मारा और स्वयं आत्महत्या कर ली; अकेला ग्रंथ 'विरुद्ध-विधि-विध्वंस' दावा करता है कि उनकी मृत्यु तराइन के रणक्षेत्र में ही हुई थी, जबकि इतिहासकार यूफी व हसन निजामी उनकी हत्या अजमेर में होना मानते हैं।
- पृथ्वीराज चौहान तृतीय को लोक-स्मृति में भारत का 'अंतिम हिन्दू सम्राट' कहा जाता है।
रणथम्भौर के चौहान — हम्मीर देव का शौर्य
पृथ्वीराज तृतीय के ही वंश की एक शाखा ने रणथम्भौर के लगभग अजेय दुर्ग में एक सदी से अधिक समय तक अपना अस्तित्व बनाए रखा और बारी-बारी से तीन दिल्ली सुल्तानों को चुनौती दी, जब तक कि इसके सबसे महान शासक हम्मीर देव ने अंतिम बलिदान नहीं दिया।
🏯रणथम्भौर शाखा की स्थापना
- प्राचीन काल में रतःपुर (रण की घाटी में बसा नगर) कहलाने वाले रणथम्भौर पर 1194 ई. में पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविंदराज ने चौहान वंश की एक नई शाखा स्थापित की; उनके उत्तराधिकारी वल्हण, प्रल्हादन एवं वीर नारायण थे।
- वीर नारायण ने सुल्तान इल्तुतमिश के रणथंभौर पर हुए आक्रमण को विफल कर दिया था, परंतु बाद में इल्तुतमिश ने दिल्ली में उनका वध करवा दिया; बाद में दुर्ग पुनः इसी वंश के वाग्भट्ट के अधिकार में आया, जिसके बाद उनके पुत्र जैत्रसिंह (जयसिम्हा) ने वहाँ की बागडोर संभाली।
📖हम्मीर देव का राज्यारोहण व उनके ग्रंथकार
- जैत्रसिंह के तीसरे पुत्र हम्मीर देव चौहान 1282 ई. में रणथम्भौर के सर्वाधिक प्रतापी एवं अंततः अंतिम शासक बने।
- उनका जीवन कई ग्रंथों में वर्णित है — जोधराज की हम्मीर रासो, चन्द्रशेखर की हम्मीर हठ, व्यास भाँडउ की हम्मीरायण, तथा नयनचन्द्र सूरि की सुर्जन चरित व हम्मीर महाकाव्य।
🛡️सुल्तान जलालुद्दीन के अभियान
- हम्मीर देव को अपने अधीन करने की कोशिश में सुल्तान जलालुद्दीन ने 1290 ई. में निकटवर्ती झाँइन दुर्ग पर अधिकार किया, जिसे 'रणथम्भौर दुर्ग की कुंजी' कहा जाता है, परन्तु 1291 ई. में रणथम्भौर दुर्ग पर उसका सीधा आक्रमण असफल रहा।
- इस असफलता के बाद जलालुद्दीन ने प्रसिद्ध रूप से कहा कि वह ऐसे रणथम्भौर दुर्ग जैसे 10 दुर्गों को भी किसी मुसलमान के एक बाल के बराबर महत्त्व नहीं देता — इस प्रसंग का उल्लेख अमीर खुसरो की कृति 'मिफ्ता-उल-फुतूह' में भी मिलता है।
🔱अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण
- 1296 ई. में अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या करवाकर अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना; हम्मीर महाकाव्य के अनुसार उसने रणथम्भौर पर इसलिए आक्रमण किया क्योंकि हम्मीर देव ने उसके विद्रोही सरदारों — मीर मुहम्मद शाह, इल्चक, कमरू व बर्क — को शरण दी थी।
- 1299 ई. में सेनानायक उलूग खाँ व नुसरत खाँ ने अलाउद्दीन के लिए झाँइन दुर्ग पर अधिकार कर लिया; इसके बाद हुए संघर्ष में हम्मीर के अधिकारी भीमसिंह मारे गए, जिसका बदला राजपूतों ने मुगल सेनापति नुसरत खाँ को मंजनीक के पत्थर से मारकर लिया — इसे हिन्दुवाट का युद्ध कहा जाता है।
🔥रणथम्भौर का युद्ध व साका
- अलाउद्दीन खिलजी ने अंततः हम्मीर देव को पराजित कर 11 जुलाई, 1301 ई. को रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया — यह राजपूताने का पहला दर्ज साका था, जिसमें हम्मीर देव ने केसरिया धारण किया और रानी रंगदेवी के नेतृत्व में राजपूत स्त्रियों ने पद्मला तालाब में जल जौहर किया।
- हम्मीर के अपने ही सेनापति रणमल व रतिपाल के विश्वासघात ने अलाउद्दीन की जीत को संभव बनाया; इस युद्ध में उपस्थित इतिहासकार अमीर खुसरो ने कहा कि 'कुफ्र का घर इस्लाम का घर हो गया है', जिसके बाद दुर्ग का प्रभार उलूग खाँ को सौंप दिया गया।
🏛️हम्मीर देव की विरासत
- हम्मीर देव ने अपने जीवनकाल में 17 युद्ध लड़े और 16 में विजय पाई; उनके दरबारी कवि विजयादित्य थे और गुरु राघवदेव थे।
- अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के शासनकाल की स्मृति में उन्होंने रणथम्भौर दुर्ग में बत्तीस खम्भों की छतरी बनवाई, जिसे 'न्याय की छतरी' भी कहा जाता है।
जालौर, नाडोल व सिरोही के चौहान
अजमेर व रणथम्भौर से परे, चौहानों की अन्य शाखाओं ने मारवाड़ के दुर्गों और दक्षिणी पहाड़ों में अपनी अलग नियति गढ़ी — कुछ ने दिल्ली सल्तनत से अंतिम साँस तक संघर्ष किया, तो कुछ आधुनिक राजस्थान तक जीवित रहीं।
🏯जालौर के सोनगरा चौहान
- जालौर — प्राचीन नाम जाबालिपुर या जालहुर, दुर्ग का नाम सुवर्णगिरि (सोनगढ़) — कभी प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम की राजधानी था, जब तक कि सोनगरा चौहान शासक कीर्तिपाल (नाडोल के अल्हण के पुत्र) ने 1181 ई. में परमारों को हराकर वहाँ चौहान शासन स्थापित नहीं किया; सुण्डा पर्वत अभिलेख उन्हें 'राजेश्वर' कहता है और मुहणोत नैणसी री ख्यात उन्हें 'महान राजा' बताती है।
- कीर्तिपाल के उत्तराधिकारी समरसिंह ने अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह गुजरात के भीमदेव द्वितीय से किया, परन्तु समरसिंह के पुत्र उदयसिंह सबसे शक्तिशाली सोनगरा शासक बने, जिन्होंने 1228 ई. में दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश तथा 1254 ई. में नसीरुद्दीन महमूद के आक्रमण को विफल कर दिया।
- उदयसिंह के उत्तराधिकारी चाचिंगदेव (1257-1282 ई.) — जिन्होंने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की और जिन्हें किसी सुल्तान के आक्रमण का सामना नहीं करना पड़ा — तथा सामन्तसिंह (1282-1305 ई.), जिन्होंने फिरोजशाह तुगलक की भेजी सेना को साँचौर से ही खदेड़ दिया, ने दशकों तक जालौर को सुरक्षित रखा।
⚔️अलाउद्दीन के विरुद्ध कान्हड़देव का प्रतिरोध
- 1305 ई. में अपने पिता सामन्त सिंह द्वारा शासक बनाए गए कान्हड़देव चौहान ने गुजरात अभियान पर जा रही अलाउद्दीन खिलजी की सेना (सेनापति उलूग खाँ व नुसरत खाँ) को अपने राज्य से नहीं गुजरने दिया, और बाद में सेनानायक जैता देवड़ा से गुजरात के सोमनाथ मंदिर को लूटकर लौट रही उसी सेना पर आक्रमण करवाया।
- इसी अवज्ञा के कारण अलाउद्दीन खिलजी का क्रोध जालौर पर टूटा, जिसमें उस समय बयाना के सूबेदार उलूग खाँ ने अभियान का नेतृत्व किया।
🩸सिवाणा व जालौर के युद्ध
- सिवाणा (जुलाई 1308 ई.) में अलाउद्दीन ने एक विश्वासघाती सैनिक भावले परमार को लालच देकर दुर्ग के जल स्रोत में गौ-रक्त मिलवा दिया; अधिपति वीर सातलदेव के नेतृत्व में राजपूत योद्धा केसरिया बाना पहनकर वीरगति को प्राप्त हुए जबकि दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया — इसके बाद अलाउद्दीन ने सिवाणा का नाम बदलकर 'खैराबाद' रखा और वहाँ सेनापति मलिक कमालुद्दीन गुर्ग को नियुक्त किया।
- जालौर (1311 ई.) में, कान्हड़देव द्वारा मेड़ता के निकट अलाउद्दीन के सेनापति शम्स खाँ को बंदी बनाए जाने के बाद, अलाउद्दीन ने पुनः मलिक कमालुद्दीन गुर्ग को भेजा; कान्हड़देव के अपने दहिया सरदार बीका (सेजवाल विक्रम) ने स्वर्ण के लालच में विश्वासघात कर सेना को दुर्ग में प्रवेश दिलाया — कान्हड़देव व उनके पुत्र वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए, और कान्हड़-दे-प्रबन्ध के अनुसार बाद में इस विश्वासघाती को हिराद ने मार डाला।
- जालौर दुर्ग पर अंततः 1311-12 ई. में अलाउद्दीन का अधिकार हो गया, और उसने नगर का नाम बदलकर 'जलालाबाद' रख दिया; सिवाणा दुर्ग को 'जालौर दुर्ग की कुंजी' कहा जाता है।
🕌जालौर पतन के बाद
- अलाउद्दीन ने जालौर में अलाई/तोपखाना मस्जिद बनवाई, वहीं युद्ध से बच निकले कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा सुल्तान की सेवा में चले गए और बाद में उन्हें चित्तौड़ दुर्ग का भार सौंपा गया।
- इस युद्ध का विवरण पद्मनाभ के ग्रन्थ 'कान्हड़दे प्रबन्ध' व 'वीरमदेव सोनगरा की वात' में मिलता है; फारसी इतिहासकार फरिश्ता इसका कारण कान्हड़देव द्वारा दिल्ली दरबार में सुल्तान को दी गई चुनौती बताते हैं, जबकि मुहणोत नैणसी री ख्यात व कान्हड़दे-प्रबंध इसका कारण सुल्तान की पुत्री फिरोजा व राजकुमार वीरमदेव के प्रेम-संबंध को मानते हैं।
🛕नाडोल के चौहान
- शाकंभरी से निकलने वाली चौहानों की सबसे प्राचीन शाखा नाडोल की स्थापना शासक वाक्पतिराज के दूसरे पुत्र लक्ष्मण (लाखणसी) ने की थी; उन्होंने 981 ई. में नाडोल में आशापुरा मंदिर तथा अपने बड़े पुत्र आसाराव की स्मृति में आयेड़ा तालाब बनवाया।
- इसके बाद नाडोल के शासकों की एक लंबी शृंखला रही — सोही (जिन्होंने भीनमाल जीता), बलीराज (जिन्होंने मालवा के मुंज को हराया), विग्रहपाल, महेन्द्र, अणहिल्ल, बाला प्रसाद, जेन्द्रराज, पृथ्वीपाल तथा आल्हण देव, जिन्होंने जैन धर्म के प्रभाव में कुछ विशेष व्रत-दिनों पर जीव-हिंसा पर प्रतिबंध लगाया।
- 12वीं सदी में जालौर में चौहान शासन की नींव डालने वाले कीर्तिपाल ने पहले किराडू के शासक आमल का वध किया और काकायंदा में मुस्लिमों को हराया, फिर जाबालिपुर (जालौर) को अपनी राजधानी बनाया; 13वीं सदी के प्रारंभ तक जालौर के चौहानों ने नाडोल को अपने राज्य में मिला लिया था।
⛰️सिरोही के चौहान: स्थापना से स्वर्णकाल तक
- कभी अर्बुद (अर्बुदांचल) कहलाने वाले इस क्षेत्र में, जालौर के चौहानों की देवड़ा शाखा के राव लुम्बा ने 1311 ई. में आबू व चन्द्रावती को परमारों से छीनकर एक स्वतंत्र सिरोही राज्य की स्थापना की, तथा बाद में 1320 ई. में माउंट आबू के अचलेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
- लुम्बा के वंशज शिवभान ने 1405 ई. में शिवपुरी (जो बाद में पुरानी सिरोही कहलाई) बसाई, और उनके उत्तराधिकारी सहस्त्रमल ने 1425 ई. में वर्तमान सिरोही नगर बसाया — इस पर विजय के उपलक्ष्य में मेवाड़ महाराणा कुंभा ने बाद में अचलगढ़ दुर्ग (1452 ई.) के साथ-साथ बसन्तगढ़ दुर्ग व कुंभ स्वामी मंदिर भी बनवाया।
- बाद में लाखा देवड़ा ने मेवाड़ के शासक उदा से आबू वापस जीता और सिरोही में कालिका माता की मूर्ति स्थापित करवाई; उनके उत्तराधिकारी जगमाल ने 1474 ई. में बहलोल लोदी के आक्रमण के समय मेवाड़ महाराणा रायमल का साथ दिया, तथा 'उड़णा अखैराज' के नाम से प्रसिद्ध अखैराज ने 1527 ई. के खानवा युद्ध में राणा साँगा का साथ दिया।
🤝सिरोही के परवर्ती शासक व विलय
- सिरोही के सुरताण देवड़ा (1571-1610 ई.) ने 1575 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की और दसाणी के युद्ध में प्रताप के भाई जगमाल को पराजित किया; अखैराज द्वितीय की रानी रतन कँवर ने रतन बावड़ी बनवाई, और महाराव मानसिंह (1705-1749 ई.) के समय सिरोही की मानसाही तलवारें पूरे देश में प्रसिद्ध हो गईं।
- शिवसिंह (1817-1862 ई.) ने 1823 ई. में अंग्रेजों से संधि की; केसरीसिंह के शासनकाल (1875-1925 ई.) में सिरोही ने महारानी विक्टोरिया की 'केसर हिन्द' उपाधि का उत्सव केसर विलास बाग बनवाकर मनाया, अंग्रेजों से नमक समझौता किया, और 1889 ई. में इसके शासकों को 'महाराव' की उपाधि मिली।
- सिरोही रियासत (आबू-दिलवाड़ा को छोड़कर) का जनवरी 1950 ई. में राजस्थान में विलय हुआ, तथा 1 नवम्बर 1956 ई. को आबू-दिलवाड़ा भी राजस्थान में मिला दिया गया।
हाड़ौती के चौहान — बूँदी, कोटा व झालावाड़
बूँदी, कोटा, झालावाड़ व बाराँ के हाड़ौती क्षेत्र में हाड़ा चौहान वंश ने पाँच सदियों तक दुर्ग, झीलें व भित्ति-चित्रित महल बनाए — मुगल उत्तराधिकार युद्धों, मराठा आक्रमणों व अंग्रेजी रेजीडेंसी से गुजरते हुए, अंततः स्वतंत्र राजस्थान में विलीन होकर।
🏹हाड़ौती व बूँदी की नींव
- बूँदी, कोटा, झालावाड़ व बाराँ को मिलाकर बना क्षेत्र सम्मिलित रूप से हाड़ौती कहलाता है; दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश राजपूत घरानों के विपरीत, हाड़ा शासकों ने अकबर से कोई वैवाहिक संबंध बनाए बिना ही उससे विशेष अनुग्रह प्राप्त किया।
- लगभग 1241 ई. में हाड़ा चौहान राव देवा — जो नाडोल के चौहानों के ही वंशज थे — ने मीणा शासक जैता को हराकर बूँदी घाटी में चौहान शासन की स्थापना की; नगर का नाम स्थानीय मीणा प्रमुख बूँदा मीणा के नाम पर पड़ा, और कुंभाकालीन रणकपुर अभिलेख में इसे 'वृन्दावती' कहा गया है।
🐎प्रारंभिक बूँदी शासक
- समरसिंह व उनके पुत्र जैत्रसिंह ने अकेलगढ़ के युद्ध (1264 ई.) में भील प्रमुख कोटिया को हराकर कोटा को बूँदी राज्य में मिलाया, और जैत्रसिंह ने वहाँ एक दुर्ग व गुलाब महल बनवाया; नापूजी (नरपाल) 1304 ई. में अलाउद्दीन खिलजी से लड़ते हुए मारे गए, और उनके उत्तराधिकारी हल्लू बाद में संन्यास लेकर बनारस चले गए, राज्य अपने पुत्र वीरसिंह को सौंपकर।
- वीरसिंह (बरसिंह हाड़ा) ने मेवाड़ महाराणा क्षेत्रसिंह के आक्रमण के बावजूद 1354 ई. में बूँदी में भित्ति-चित्रों के लिए प्रसिद्ध तारागढ़ किला बनवाया; बाद में जब महाराणा लाखा ने बूँदी के दुर्ग को मिट्टी में मिलाने की शपथ ली, तो असली दुर्ग की रक्षा के लिए एक नकली दुर्ग बनाया गया, जिसकी रक्षा करते हुए कुंभा हाड़ा ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
🕌बूँदी और मुगल दरबार
- राव नारायणदास (लगभग 1503 ई. से) ने खानवा के युद्ध में महाराणा साँगा की सहायता की; बाद के सूरजमल शिकार के दौरान मेवाड़ महाराणा रतनसिंह के साथ आपसी तलवार-द्वंद्व में मारे गए, और उनके बाद क्रमशः सुरताण सिंह व सुर्जन सिंह शासक बने।
- राव सुर्जन सिंह (1554-1585 ई.) ने कोटा को पठानों के 25 वर्षों के अधिकार से मुक्त कराया, रणथम्भौर दुर्ग पुनः जीता, और आमेर के शासक भगवन्तदास की मध्यस्थता से बिना किसी वैवाहिक संबंध के मार्च 1569 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की, जिसके बदले उन्हें 'रावराजा' की उपाधि व पाँच हजार का मनसब मिला; उन्होंने द्वारिकापुरी में रणछोड़जी मंदिर बनवाया और 1585 ई. में बनारस में उनका निधन हुआ।
- उनके उत्तराधिकारी राव भोज ने अपने पुत्र हृदयनारायण को कोटा की जागीर दी; राव रतनसिंह (1607-1631 ई.) को जहाँगीर से 'सर बुलन्दराय' व 'रामराजा' की उपाधियाँ मिलीं, उन्होंने अपने दुराचारी पुत्र गोपीनाथ के हत्यारे ब्राह्मणों को दंड नहीं दिया, और 1631 ई. में बुरहानपुर में उनका निधन हुआ — जिसके बाद शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) की सहायता के बदले शाहजहाँ ने रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा का पृथक, स्वतंत्र शासक बना दिया।
🤺बूँदी: उत्तराधिकार संघर्ष से विलय तक
- औरंगजेब के उत्तराधिकार युद्ध में राव शत्रुशाल सामूगढ़ के युद्ध में मुगल सेना की ओर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; राव भावसिंह ने खातौली के युद्ध में मुगल सेना को हराया और बाद में औरंगजेब ने उन्हें बागी शुजा के विरुद्ध भेजा; राव अनिरुद्ध ने चौरासी खम्भों की छतरी बनवाई और उनकी रानी नाथावती ने रानीजी की बावड़ी बनवाई, जबकि उनके पुत्र जोधसिंह 1706 ई. में गणगौर के अवसर पर बूँदी के जैतसागर तालाब में डूब गए।
- महाराव बुद्धसिंह (1695-1733 ई.) के बाद हुए उत्तराधिकार संघर्ष में मराठों ने उनका साथ दिया जबकि कोटा के भीमसिंह ने उन्हें हराया; बादशाह फर्रुखशियर ने तो बूँदी का नाम बदलकर 'फर्रुखाबाद' रख उसे कोटा को सौंप दिया, और कोटा की सेना ने मार्च 1713 ई. में बूँदी को कोटा राज्य में मिला लिया, हालाँकि कोटा के दीवान ने 1720 ई. में बुद्धसिंह को पुनः राज्य लौटा दिया।
- बाद में जयपुर के सवाई जयसिंह ने बुद्धसिंह के पुत्र की हत्या कर दलेलसिंह को शासक बना दिया; बुद्धसिंह की रानी ने मराठा सरदार मल्हारराव होल्कर को आमंत्रित किया, जिससे 12 अप्रैल 1734 ई. को राजस्थान में मराठों का सर्वप्रथम प्रवेश हुआ, और उनके पुत्र उम्मेदसिंह को गद्दी वापस मिली — जो 'श्रीजी' (1748-1771 ई.) के नाम से शासक बने और तारागढ़ किले में चित्रशाला बनवाई।
- विष्णुसिंह ने 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी से सुरक्षा हेतु संधि की; रामसिंह हाड़ा ने 1857 की क्रांति के दौरान शासन किया, और उनके बाद रघुवीर सिंह (जिनके समय लॉर्ड कर्जन आये), ईश्वरी सिंह तथा अंततः बहादुरसिंह — बूँदी के अंतिम आधिकारिक शासक — के बाद 25 मार्च 1948 ई. को राज्य का राजस्थान संघ में विलय हो गया।
🏇कोटा की स्थापना व प्रारंभिक उत्कर्ष
- कभी बूँदी राज्य का ही एक भाग रहे और भील प्रमुख कोटिया के नाम पर नामित कोटा 1631 ई. में माधोसिंह के अधीन एक पृथक राज्य बना, जिन्हें शाहजहाँ से 'बाद रफ्तार' नामक घोड़ा मिला; उनके पुत्र मुकुन्दसिंह ने अबली मीणी का महल व मुकुन्दरा किला बनवाया, 'मसादती' नामक कर वसूला, और धरमत के युद्ध (1658 ई.) में दाराशिकोह की ओर से लड़ते हुए वीरगति पाई।
- जगतसिंह को औरंगजेब ने बागी शुजा के विरुद्ध खजुहा के युद्ध में भेजा, वहीं 1684 ई. में शासक नियुक्त हुए किशोरसिंह प्रथम के समय 1689 ई. में चाँदखेड़ी का जैन मंदिर बना, उन्होंने किशोर सागर तालाब बनवाया, और 'छाली' नामक पुनर्विवाह कर वसूला।
👑कोटा का उत्कर्ष व झाला वर्चस्व
- रामसिंह प्रथम ने आवाँ के निकट (1696 ई.) अपने भाई को हराकर कोटा की गद्दी पाई, फिर जाजऊ के युद्ध (1707 ई.) में आजम की ओर से लड़ते हुए वीरगति पाई, तथा कोटा में रावठाँ तालाब, रामपुरा बाजार व परकोटा बनवाया; उनके उत्तराधिकारी भीमसिंह प्रथम ने 1713 ई. में बूँदी पर आक्रमण कर उसकी तोपें छीनीं, कृष्णदास नाम अपनाया, फर्रुखशियर से शेरगढ़ व गागरोन किले प्राप्त किए, 1720 ई. के पण्ढार युद्ध में वीरगति पाई, और कोटा को उसके सर्वाधिक विस्तार तक पहुँचाया।
- परवर्ती महाराव दुर्जनशाल (1747 ई. में राजमहल के युद्ध में पराजित) व शत्रुशाल प्रथम (1761 ई. में भटवाड़ा में जयपुर के माधोसिंह पर विजयी) क्रमशः अपने झाला परिवार के दीवानों पर अधिकाधिक निर्भर हुए, जिसकी पराकाष्ठा झाला जालिमसिंह में हुई, जिन्होंने महाराव उम्मेदसिंह (1770-1819 ई.) के समय वास्तविक शासन संभाला और अंग्रेजों के साथ 1817-18 ई. की गुपचुप संशोधित संधि में अपने वंश के लिए वंशानुगत मुख्यमंत्री पद सुरक्षित किया; उन्होंने 1791 ई. में झालावाड़ नगर भी बसाया।
- मांगरोल (1821 ई.) में जालिमसिंह से हार के बाद — जहाँ कर्नल टॉड ने जालिमसिंह का साथ दिया था — किशोरसिंह द्वितीय ने कुछ समय के लिए कोटा राज्य श्रीनाथजी को समर्पित किया, फिर लौट आये; उनके उत्तराधिकारी रामसिंह द्वितीय ने 1857 की क्रांति के दौर में शासन किया, जिसमें मेजर बर्टन की हत्या के कारण कोटा की तोपों की सलामी संख्या 17 से घटाकर 13 कर दी गई, और बाद में महाराव शत्रुशाल द्वितीय, उम्मेदसिंह द्वितीय व भीमसिंह द्वितीय ने हाड़ौती संघ का प्रस्ताव रखा, इससे पहले कि मार्च 1948 ई. में कोटा का राजस्थान संघ में विलय हुआ, जिसमें भीमसिंह द्वितीय इसके राजप्रमुख बने।
🌾झालावाड़ रियासत का उदय व विलय
- झालावाड़ क्षेत्र दिलावर खाँ के स्वतंत्र शासन (1401 ई.), बूँदी के राव सुरजन हाड़ा (जिन्होंने लगभग 1562 ई. में स्थानीय सरदार डोकर व केसर खाँ को हराया) तथा बाद में मुगलों, मल्हार राव पंवार, जयपुर व कोटा के शासन से गुजरा, फिर उसे कोटा से अलग कर झाला मदनसिंह को सौंपा गया, जो 1838 ई. में नवगठित रियासत के पहले शासक बने — राजधानी झालरापाटन के साथ, यह क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा बनाई गई सबसे नवीनतम रियासत थी।
- पृथ्वीसिंह (1845-1875 ई.) के शासनकाल में तांत्या टोपे की सेनाओं ने अस्थायी रूप से झालावाड़ पर अधिकार किया और अंग्रेजों की सहायता के बदले राज्य को 1862 ई. में गोद लेने का अधिकार मिला; उनके उत्तराधिकारी जालिमसिंह द्वितीय के समय 1896 ई. में रियासत को दो भागों में बाँट दिया गया, एक भाग कोटा में मिला दिया गया और दूसरे पर फतहपुर के भवानीसिंह को शासक बनाया गया।
- पुनर्गठित झालावाड़ इसके बाद भवानीसिंह (डाक व्यवस्था तथा नगरपालिका, 1899-1929 ई.), राजेन्द्र सिंह (उच्च न्यायालय, बिजली, सेना व पुलिस, 1929-1943 ई.) और अंततः हरिश्चन्द्र के शासन से गुजरा, जिनके समय लोकप्रिय शासन की स्थापना हुई, इसके बाद एकीकरण के दूसरे चरण में झालावाड़ राजस्थान संघ में विलीन हो गया।