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राजस्थान GK
कछवाहों का इतिहास
History of the Kachhwahas
दौसा की एक छोटी जागीर से जयपुर के भव्य राजप्रासादों तक — कछवाहा वंश की यात्रा, जिसने मुगलों से गठबंधन कर हवामहल, जंतर-मंतर और गुलाबी नगरी जैसी अनूठी विरासतें रचीं।
30 टॉपिक34 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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आमेर की स्थापना और प्रारंभिक शासक
Origins and the Founding of Amer
जानिए कैसे भगवान राम के पुत्र कुश के वंशजों ने नरवर से दौसा होते हुए आमेर तक अपना राज्य स्थापित किया।
🌳वंश की उत्पत्ति
- कछवाहा राजपूतों का शासन राजस्थान के पूर्वी भाग में रहा, और वे स्वयं को भगवान राम के पुत्र कुश की संतान मानते हुए कुशवाहा/कछवाहा कहलाए।
- इतिहासकारों में वंश-मूल पर मतभेद है — सूर्यमल्ल मिश्रण इन्हें रघुवंशी शासक कूर्म की संतति मानते हैं, जबकि डॉ. ओझा एक कछवाहा नामक पुरुष को मूल पुरुष बताते हैं।
- कुछ विद्वानों के अनुसार इस वंश का नाम इसकी कुलदेवी कछवाहिनी से जुड़ा है।
🛤️नरवर से दौसा तक
- किंवदंती है कि कुश के एक वंशज ने सोम नदी तट पर रोहिताश दुर्ग बनवाया था; राजा नल ने 295 ई. में राजधानी नरवर स्थानांतरित की।
- नरवर के शासक सोढ़ासिंह के पुत्र दुलहराय ने लगभग 1007 ई. में दौसा के बड़गूजरों को हराकर उस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया (कुछ स्रोत यह घटना 1137 ई. की मानते हैं)।
👑दुलहराय — वंश के संस्थापक
- बचपन में तेजकरण नाम से जाने जाने वाले दुलहराय ने दौसा पर कब्जा कर उसे कछवाहा वंश की पहली राजधानी बनाया।
- उसने भाण्डारेज व माची के मीणाओं को परास्त कर माची के निकट रामगढ़ दुर्ग बनवाया, और वहीं कुलदेवी जमुवाय माता का मंदिर स्थापित कर जमुवारामगढ़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
- ग्वालियर के युद्ध में लड़ते हुए दुलहराय की मृत्यु हुई।
🏯काकिलदेव — आमेर के प्रतिष्ठाता
- दुलहराय के बाद 1035 ई. में (जयपुर ख्यात के अनुसार 1037 ई., RBSE के अनुसार 1207 ई.) काकिलदेव दौसा का शासक बना और उसने राजधानी आमेर स्थानांतरित की।
- उसने आमेर (तत्कालीन अम्बिकापुर) कस्बा बसाया और वहाँ कुलदेवता अम्बिकेश्वर महादेव का मंदिर बनवाया।
📜आमेर के क्रमिक शासक
- काकिलदेव के बाद हूण, जानड़देव, प्रजूनदेव/पजवन (जो पृथ्वीराज चौहान तृतीय के सामंत के रूप में तराइन के दूसरे युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए), मलसी, बीजलदेव व राजदेव क्रमशः आमेर की गद्दी पर बैठे।
- राजदेव ने 1237 ई. में आमेर के कदमी महल बनवाए, जहाँ कछवाहा शासकों का राजतिलक होता था; उसके बाद कील्हण, कुन्तल, झोणसी, उदयकरण, नृसिंह, उद्धरण और चन्द्रसेन आमेर के शासक बने।
⚔️पृथ्वीराज (1503-1527 ई.)
- चन्द्रसेन के पुत्र पृथ्वीराज 18 जनवरी 1503 ई. को आमेर के शासक बने और अपने राज्य को 12 भागों में बाँटकर 'बारह कोटड़ी सामंती व्यवस्था' की नींव रखी।
- उनके समय रामानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी ने गलताजी में कनफटे नाथों को शास्त्रार्थ में हराकर वहाँ रामानंदी संप्रदाय की स्थापना की।
- मेवाड़ के महाराणा साँगा ने अपनी बहन का विवाह पृथ्वीराज से किया; बाद में पृथ्वीराज साँगा की ओर से खानवा के युद्ध में लड़ते हुए मारे गए।
- पृथ्वीराज के बाद पूर्णमल, भीमसिंह, रतनसिंह और साँगा कछवाहा क्रमशः शासक बने; साँगा कछवाहा ने साँगानेर कस्बा बसाया और दौसा के निकट बसवा गाँव में उनका देहान्त हुआ।
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भारमल से मिर्जा राजा जयसिंह तक — मुगलों से मैत्री
From Bharmal to Mirza Raja Jaisingh — Alliance with the Mughals
जानिए कैसे आमेर के कछवाहा शासकों ने मुगल दरबार में सर्वोच्च पद हासिल किए और वैवाहिक संबंधों से एक नई कूटनीति गढ़ी।
🕊️राजा भारमल — मुगल अधीनता स्वीकारने वाले प्रथम राजपूत
- साँगा कछवाहा की निःसंतान मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई भारमल जून 1547 ई. में आमेर के शासक बने। दिसम्बर 1556 ई. में मजनूँ खाँ ने दिल्ली में उनकी अकबर से पहली भेंट करवाई, और जनवरी 1562 ई. में साँभर में भारमल ने अपने पुत्र भगवंतदास व पौत्र मानसिंह सहित अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
- भारमल ने साँभर में अपनी पुत्री हरखाबाई (जो इतिहास में जोधाबाई के नाम से प्रसिद्ध हुईं, और बीकानेर के वंशवृक्ष में मानमति नाम से दर्ज हैं) का विवाह अकबर से करवाकर राजपूताने में सर्वप्रथम मुगलों से वैवाहिक संबंध जोड़े।
- भारमल ने चित्तौड़गढ़ अभियान (1567-68 ई.) में अकबर की सेना का साथ दिया और बूँदी के सुरजन हाड़ा को मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में सहयोग किया; बदले में अकबर ने उन्हें पाँच हजारी मनसब तथा 'अमीर-उल-उमरा' व 'राजा' की उपाधियाँ दीं।
- अकबर व राजस्थानी राजाओं के बीच बनी इस मित्रता व वैवाहिक संबंधों की नीति को 'राजपूत नीति' कहा गया; हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) के बाद अकबर ने भारमल के पुत्र जगन्नाथ कछवाहा को उदयपुर का प्रशासन सौंपा।
🕌राजा भगवन्तदास
- भारमल के बाद भगवन्तदास 1573 ई. में आमेर के शासक बने और पुत्र मानसिंह के साथ अकबर की सेवा में आगरा गए; सितम्बर 1573 ई. में महाराणा प्रताप को मनाने भेजे गए तीसरे शिष्टमंडल में भी वे शामिल थे।
- 1585 ई. में भगवन्तदास ने अपनी पुत्री मानबाई का विवाह शहजादे सलीम (आगे चलकर जहाँगीर) से किया; अकबर ने 1582 ई. में उन्हें पंजाब का सूबेदार बनाया, और उनके निर्देश पर लाहौर में एक मस्जिद भी बनी। 1589 ई. में लाहौर में ही उनका निधन हुआ।
⚔️राजा मानसिंह प्रथम — अकबर के नवरत्न
- 2 दिसम्बर 1550 ई. को मौजमाबाद में जन्मे मानसिंह मात्र 12 वर्ष की आयु में मुगल सेवा में गए; 1589 ई. में आमेर के शासक बने और अकबर के 'नवरत्नों' में गिने गए। अकबर ने उन्हें 'फर्जन्द' की उपाधि दी और वे 'मिर्जा राजा' की उपाधि पाने वाले प्रथम शासक बने।
- अकबर ने केवल मानसिंह और कोका अजीज को सात हजारी मनसब दिया; 1569 ई. में सुर्जन हाड़ा के विरुद्ध उनका पहला अभियान रहा, और सरनाल के युद्ध ने उन्हें विशेष ख्याति दिलाई। 18 जून 1576 ई. को हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के विरुद्ध मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह ने ही किया था।
- मानसिंह ने उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अफगानों व रोशनियाओं को दबाया, 1585 ई. में काबुल के सूबेदार बने, और 1587-94 ई. के बीच बिहार में पूरनमल, संग्रामसिंह व गणपत जैसे विद्रोही सरदारों को हराकर वहाँ के सूबेदार रहे।
- 1594 ई. में उन्हें बंगाल की सूबेदारी मिली, जहाँ उन्होंने अकबरपुर (राजमहल) बसाकर उसे राजधानी बनाया और ईसा खाँ व केदार राय जैसे शक्तिशाली सरदारों को नियंत्रित किया; बंगाल के राजा केदार को हराने के बाद 1604 ई. में शिलामाता की मूर्ति आमेर लाए। इलिचपुर (महाराष्ट्र) में 17 जुलाई 1614 ई. को उनका देहान्त हुआ।
🎨मानसिंह की विरासत — मंदिर, कला व साहित्य
- मानसिंह ने 1592 ई. में हिन्दू-मुगल स्थापत्य शैलियों का मिश्रण दर्शाने वाले आमेर दुर्ग का निर्माण करवाया, साथ ही वृन्दावन में गोविंद देवजी का मंदिर और आमेर में शिलादेवी (कछवाहों की इष्ट देवी) का मंदिर भी बनवाया।
- जगत शिरोमणि मंदिर मानसिंह की पत्नी कनकावती ने अपने पुत्र जगतसिंह की स्मृति में बनवाया; इसकी मूर्ति मानसिंह चित्तौड़ के उस मीरा मंदिर से लाए थे, जहाँ मीराबाई स्वयं पूजा करती थीं।
- मानसिंह के दरबार में रायमुरारी दास, पुण्डरीक विट्ठल, नरोत्तम और जगन्नाथ जैसे कवि थे; उन्होंने ही जयपुर की प्रसिद्ध ब्ल्यू पॉटरी लाहौर से लाकर और जयपुर रियासत का पचरंगा (पाँच रंगों वाला) झण्डा बनाकर सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया।
🛡️मिर्जा राजा जयसिंह — तीन बादशाहों के सेनापति
- मानसिंह के बाद भावसिंह (1614-1621 ई., अत्यधिक मदिरापान से मृत्यु) और फिर मात्र 11 वर्ष की आयु में जयसिंह आमेर के शासक बने, जिन्होंने जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब — तीन मुगल बादशाहों की सेवा करते हुए 46 वर्ष तक शासन किया, जो कछवाहा शासकों में सबसे लंबा कार्यकाल है।
- शाहजहाँ ने उन्हें उजबेग विद्रोह दबाने (1629), खानेजहाँ लोदी के विद्रोह के दमन (1630) और बीजापुर-गोलकुण्डा अभियान (1636) के सेनानायक के रूप में भेजा; 1637 ई. में उन्हें 'मिर्जा राजा' की उपाधि मिली।
- 1665 ई. में उन्होंने शिवाजी के साथ पुरन्दर की संधि करवाई, जिसमें शिवाजी ने औरंगजेब की अधीनता मान ली; अगले वर्ष जब शिवाजी आगरा में नजरबंद कर दिए गए, तो वे वहाँ से बच निकले।
- उनका बीजापुर अभियान असफल रहा और 2 जुलाई 1667 ई. को बुरहानपुर में उनका देहान्त हो गया; जयगढ़ दुर्ग व औरंगाबाद का जयसिंहपुरा उनकी वास्तुकला के प्रमुख उदाहरण हैं, और उन्होंने कवि बिहारी को हर दोहे पर एक स्वर्ण अशर्फी भेंट कर साहित्य को संरक्षण दिया।
⏳रामसिंह प्रथम और बिशनसिंह — संक्षिप्त कार्यकाल
- मिर्जा राजा जयसिंह के बाद उनके पुत्र रामसिंह प्रथम (1667-1689 ई.) शासक बने; औरंगजेब ने आगरा किले में शिवाजी की निगरानी की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी, पर शिवाजी के भाग निकलने पर उनका मनसब जब्त कर लिया गया। काबुल में 1689 ई. में उनका निधन हुआ।
- रामसिंह के पौत्र बिशनसिंह (1689-1700 ई.) — जिनके पिता कृष्णसिंह की मृत्यु पहले ही दक्षिण में हो चुकी थी — गद्दी पर बैठे; शहजादा मुअज्जम के साथ काबुल के पठान विद्रोह को दबाने गए बिशनसिंह की वहीं 1700 ई. में मृत्यु हो गई।
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सवाई जयसिंह द्वितीय और जयपुर की स्थापना
Sawai Jaisingh II and the Founding of Jaipur
आमेर की गद्दी के उत्तराधिकार संघर्ष से लेकर जयपुर नगर और विश्वप्रसिद्ध जंतर-मंतर की स्थापना तक — एक विद्वान शासक की कहानी।
⚔️आमेर की गद्दी के लिए संघर्ष
- बिशनसिंह के पुत्र जयसिंह (मूल नाम विजयसिंह, औरंगजेब द्वारा बदला गया और 'सवाई' की उपाधि भी उन्हीं से मिली) आमेर के शासक बने; औरंगजेब के पुत्रों के उत्तराधिकार युद्ध में वे मुहम्मद आजम के साथ थे, जबकि उनके भाई विजयसिंह ने मुअज्जम का पक्ष लिया।
- जाजऊ के युद्ध (2 जून 1707 ई.) में मुहम्मद आजम की हार के बाद मुअज्जम बहादुरशाह के नाम से दिल्ली का शासक बना और अपने पक्षधर विजयसिंह को आमेर का शासक बना दिया, यहाँ तक कि आमेर का नाम बदलकर मोमिनाबाद/इस्लामाबाद कर दिया गया।
- जुलाई 1708 ई. में सवाई जयसिंह, मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय और मारवाड़ के अजीतसिंह के बीच हुए देबारी समझौते के बल पर सवाई जयसिंह ने आमेर पर पुनः अपना शासन स्थापित किया; 1 जून 1710 ई. को बादशाह बहादुरशाह ने भी उन्हें औपचारिक रूप से आमेर का राजा स्वीकार कर लिया।
🏇मुगल सेवा और मालवा की सूबेदारी
- सवाई जयसिंह उन गिने-चुने राजपूत शासकों में थे जिन्होंने लगातार सात मुगल बादशाहों — औरंगजेब से मुहम्मदशाह तक — की सेवा की; बादशाह फर्रुखशियर ने 1713 ई. में उन्हें सात हजारी मनसब देकर मालवा का सूबेदार नियुक्त किया, और बाद में मुहम्मदशाह ने उन्हें 1729 व 1732 ई. में दो बार और यह पद सौंपा।
- 1715 ई. में भरतपुर के चूड़ामन जाट से संधि कर उन्होंने थून के किले पर अधिकार जमाया, जिससे प्रसन्न होकर फर्रुखशियर ने उन्हें 'राजाधिराज' की उपाधि दी; 1722 ई. में चूड़ामन के भतीजे बदनसिंह को अपने पक्ष में मिलाकर उन्होंने जाट विद्रोह फिर से दबाया, जिसके बदले मुहम्मदशाह ने उन्हें 'राजराजेश्वर श्रीराजाधिराज' और बदनसिंह को 'ब्रजराज' की उपाधि दी।
🤝बूँदी विवाद और हुरड़ा सम्मेलन
- 1733 ई. में बूँदी पर अधिकार के लिए सवाई जयसिंह ने भवानीसिंह की हत्या करवाकर दलेलसिंह को शासक बनाया, जिससे क्रुद्ध होकर बुद्धसिंह की रानी (जयसिंह की अपनी बहन) ने मराठा सरदारों मल्हार राव होल्कर व राणोजी सिंधिया को बूँदी आमंत्रित किया — पर मराठों के लौटते ही जयसिंह ने फिर दलेलसिंह को गद्दी पर बिठा दिया।
- मराठा शक्ति को संयुक्त रूप से रोकने के उद्देश्य से मेवाड़ महाराणा जगतसिंह द्वितीय की अध्यक्षता में 17 जुलाई 1734 ई. को हुरड़ा (भीलवाड़ा) में एक सम्मेलन बुलाया गया, जिसमें जयपुर, मेवाड़, बीकानेर, कोटा, बूँदी व नागौर के शासकों ने भाग लिया — यद्यपि यह गठबंधन बाद में टूट गया और राजपूताना 1818 ई. में ही अंग्रेजों से संधि कर मराठा-पिंडारी उत्पात से मुक्त हो सका।
- सवाई जयसिंह ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए 18 मई 1741 ई. को धौलपुर में पेशवा बालाजी बाजीराव के साथ मुगल-पेशवा समझौता करवाया; इनकी अंतिम लड़ाई गंगवाना का युद्ध था, और 21 सितम्बर 1743 ई. को रक्त विकार से उनका निधन हो गया।
🏙️जयपुर नगर की स्थापना
- 1727 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयनगर (वर्तमान जयपुर) की स्थापना कर उसे कछवाहा वंश की चौथी राजधानी बनाया — इससे पहले दौसा, जमुवारामगढ़ और आमेर क्रमशः वंश की पहली, दूसरी व तीसरी राजधानियाँ रह चुकी थीं।
- जयपुर नगर का नक्शा बंगाल निवासी पंडित विद्याधर भट्टाचार्य ने तैयार किया, जो चीन के कैंटन व इराक के बगदाद नगरों के मिश्रित प्रभाव को दर्शाता है; अपने रंग के कारण जयपुर आगे चलकर 'गुलाबी नगरी' के नाम से भी जाना गया।
- परकोटे से घिरे इस नियोजित नगर में सात प्रवेश द्वार बनाए गए — ध्रुवपोल, सूरजपोल, चाँदपोल, घाटगेट, सांगानेरी गेट, नया गेट व अजमेरी गेट।
🔭जंतर-मंतर और खगोल विज्ञान
- 1734 ई. में सवाई जयसिंह ने जयपुर में जंतर-मंतर नामक वेधशाला बनवाई, जो देश की सबसे बड़ी वेधशाला है और जिसमें सम्राट यंत्र (विशाल सूर्य घड़ी), जयप्रकाश यंत्र व रामयंत्र जैसे उपकरण प्रमुख हैं; कुल मिलाकर उन्होंने जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस व मथुरा में पाँच वेधशालाएँ बनवाईं।
- 1725 ई. में उन्होंने नक्षत्रों की शुद्ध सारणी 'जीज मुहम्मद शाही' तैयार करवाई और स्वयं 'जयसिंह कारिका' नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की; क्लाड बोडियर व फादर पेड्रो द सिल्वा जैसे यूरोपीय खगोलशास्त्री उनके निमंत्रण पर जयपुर आए थे।
- 1 अगस्त 2010 ई. को यूनेस्को ने जयपुर के जंतर-मंतर को विश्व विरासत सूची में शामिल किया — राजस्थान की यह पहली सांस्कृतिक धरोहर बनी; इसके बाद 2013 में आमेर दुर्ग और 2019 में जयपुर का परकोटा भी इस सूची में जुड़े।
📖साहित्य, कला व निर्माण
- सवाई जयसिंह ने साहित्यकारों के निवास हेतु ब्रह्मपुरी बनवाई; उनके दरबार में पुण्डरीक रत्नाकर, सुधाकर पुण्डरीक, ब्रजनाथ भट्ट और श्रीकृष्ण भट्ट (उपाधि 'कवि कालनिधि') जैसे विद्वानों ने अनेक ग्रन्थ रचे।
- उन्होंने जयगढ़ दुर्ग को पूर्ण करवाया और मराठों से सुरक्षा हेतु 1734 ई. में नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़) दुर्ग बनवाया; जयगढ़ में एशिया की सबसे बड़ी तोप जयबाण भी उन्होंने बनवाई थी।
- 1720 ई. में उन्होंने जजिया कर समाप्त किया और सती प्रथा को रोकने तथा विधवा विवाह को मान्यता देने के लिए नियम बनाए, इस दृष्टि से वे पहले राजपूत हिन्दू शासक थे; 1740 ई. में उन्होंने अश्वमेध यज्ञ भी सम्पन्न करवाया — जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में उनके योगदान की सराहना की है।
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जयपुर के परवर्ती महाराजा
Later Maharajas of Jaipur
सवाई ईश्वरीसिंह से लेकर अंतिम शासक सवाई मानसिंह द्वितीय तक — हवामहल, अल्बर्ट हॉल और गुलाबी नगरी की कहानी।
⚔️सवाई ईश्वरीसिंह (1743-1750 ई.)
- सवाई जयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र ईश्वरीसिंह 1743 ई. में गद्दी पर बैठे, पर 1708 ई. के समझौते के कारण उत्तराधिकार संघर्ष तुरंत शुरू हो गया; राजमहल (टोंक) के युद्ध (1 मार्च 1747 ई.) में ईश्वरीसिंह ने मुगलों व मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर के साथ मिलकर सवाई माधोसिंह व मेवाड़-कोटा की संयुक्त सेना को हराया।
- इस विजय की याद में ईश्वरीसिंह ने त्रिपोलिया बाजार में ईसरलाट (सरगासूली) मीनार बनवाई, जिसे जयपुर का विजयस्तम्भ कहा जाता है; परन्तु अगस्त 1748 ई. में बगरू के युद्ध में माधोसिंह ने उन्हें पराजित कर दिया, और अंततः 1750 ई. में ईश्वरीसिंह ने इसी मीनार से कूदकर आत्महत्या कर ली।
🏰सवाई माधोसिंह प्रथम (1750-1768 ई.)
- ईश्वरीसिंह के सौतेले भाई माधोसिंह 10 जनवरी 1751 ई. को जयपुर के शासक बने; जनवरी 1759 ई. में मुगल सम्राट अहमदशाह ने उन्हें रणथम्भौर का किला सौंपा, यद्यपि नवम्बर 1761 ई. में भटवाड़ा के युद्ध में कोटा के शत्रुशाल से उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
- 1763 ई. में उन्होंने मोती डूँगरी के महल बनवाए और सवाईमाधोपुर कस्बा बसाया; 1767 ई. में भरतपुर के जवाहरसिंह को मावण्डा गाँव के निकट हराया। 4 मार्च 1768 ई. को उनके निधन के बाद पुत्र पृथ्वीसिंह शासक बने।
🌬️सवाई प्रतापसिंह और हवामहल
- पृथ्वीसिंह की निःसंतान मृत्यु पर उनके भाई प्रतापसिंह 16 अप्रैल 1778 ई. को शासक बने; तूँगा के युद्ध (1787 ई.) में जोधपुर के साथ मिलकर मराठा महादजी सिंधिया को हराया, पर पाटन के युद्ध (1790 ई.) में सिंधिया ने जयपुर-जोधपुर की संयुक्त सेना को पराजित कर दिया।
- प्रतापसिंह ने 1799 ई. में भगवान विष्णु को समर्पित पाँच मंजिला हवामहल बनवाया, जिसका आकार भगवान कृष्ण के मुकुट जैसा है और जिसमें 953 खिड़कियाँ हैं; इसके वास्तुकार लालचंद उस्ता थे, और इसकी पाँच मंजिलों के नाम शरद मंदिर, रतन मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर व हवा मंदिर हैं।
- स्वयं 'ब्रजनिधि' उपनाम से ढूँढाड़ी व ब्रजभाषा में काव्य रचने वाले प्रतापसिंह एक संगीताचार्य भी थे; उनके दरबार में 22-22 कवियों, ज्योतिषियों, संगीतज्ञों व विषय-विशेषज्ञों की मंडली 'गंधर्व बाईसी' के नाम से प्रसिद्ध थी।
📜जगतसिंह द्वितीय और जयसिंह तृतीय
- प्रतापसिंह के बाद जगतसिंह द्वितीय 2 अगस्त 1803 ई. को शासक बने; उनके समय कृष्णा कुमारी विवाद को लेकर जोधपुर के मानसिंह से गिंगोली के युद्ध (1807 ई.) में उनकी जीत हुई। 12 दिसम्बर 1818 ई. को उन्होंने अंग्रेज सरकार से आश्रित पार्थक्य की संधि कर ली।
- जगतसिंह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी न होने पर विवाद उठा; इसी बीच 25 अप्रैल 1819 ई. को कुँवर जयसिंह का जन्म हुआ और उसी दिन उन्हें गद्दी पर बिठाया गया, जबकि अल्पवयस्क होने के कारण शासन उनकी माता व एक पासवान ने संभाला।
🌸सवाई रामसिंह द्वितीय — जयपुर का स्वर्ण युग
- जयसिंह तृतीय की मृत्यु के बाद रामसिंह द्वितीय मात्र 16 माह की आयु में शासक बने, और मेजर जॉन लुडलो ने प्रशासन संभालते हुए सती प्रथा, दास प्रथा, कन्या वध व दहेज जैसी कुरीतियों पर रोक लगाई; 1857 ई. में अंग्रेजों की सहायता के लिए उन्हें 'सितार-ए-हिन्द' की उपाधि मिली।
- 1876 ई. में लॉर्ड नॉर्थब्रुक व प्रिंस अल्बर्ट की जयपुर यात्रा की स्मृति में अल्बर्ट हॉल (राजस्थान का प्रथम संग्रहालय) बनवाया गया, जिसका आकार पिरामिड-सा है; अल्बर्ट एडवर्ड के आगमन पर रामसिंह द्वितीय ने जयपुर की सभी इमारतों को गुलाबी रंग करवाया, जिससे यह 'गुलाबी नगरी' कहलाई।
- रामसिंह द्वितीय के काल को जयपुर की उन्नति का स्वर्ण युग कहा जाता है; उन्होंने ब्ल्यू पॉटरी को संरक्षण दिया और सिल्वर मिंट, रामप्रकाश थियेटर, मेडिकल कॉलेज, महाराजा कॉलेज (राजस्थान का सबसे पुराना डिग्री कॉलेज) व मद्रसा-ए-हुनरी (कला विद्यालय) जैसी संस्थाएँ स्थापित कीं।
🎓सवाई माधोसिंह द्वितीय
- रामसिंह द्वितीय के निःसंतान निधन पर उनके दत्तक पुत्र कायमसिंह 19 सितम्बर 1880 ई. को सवाई माधोसिंह द्वितीय के नाम से शासक बने; 1902 ई. में इंग्लैंड में सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक में शामिल होने वे चाँदी के दो विशाल जलपात्र लेकर गए थे।
- उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए मदनमोहन मालवीय को पाँच लाख रुपये दिए और 1882 ई. में चुंगी कर समाप्त किया; उनके शासनकाल में जयपुर का अल्बर्ट हॉल संग्रहालय पूर्ण हुआ और शहर में मुबारक महल का निर्माण हुआ।
🏁सवाई मानसिंह द्वितीय — अंतिम शासक
- माधोसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र मोर मुकुट सिंह 7 सितम्बर 1922 ई. को केवल 11 वर्ष की आयु में सवाई मानसिंह द्वितीय के नाम से जयपुर के महाराजा बने; एक कुशल पोलो खिलाड़ी होने के कारण उन्होंने रामबाग पोलो ग्राउंड बनवाया, और अपनी रानी गायत्री देवी के निवास हेतु मोती डूँगरी पर तख्त-ए-शाही महल बनवाए।
- 30 मार्च 1949 ई. को जयपुर का वृहत राजस्थान में विलय हुआ और उन्हें राजस्थान का पहला राजप्रमुख बनाया गया; वे कछवाहा वंश के अंतिम शासक थे और 24 जून 1970 ई. को लंदन में पोलो खेलते हुए उनका निधन हुआ।
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अलवर और शेखावाटी — कछवाहा वंश की शाखाएँ
Alwar and Shekhawati — Branches of the Kachhwaha Dynasty
जयपुर के अतिरिक्त कछवाहा वंश की दो और प्रमुख शाखाओं — अलवर रियासत और शेखावाटी क्षेत्र — के इतिहास पर एक नज़र।
🏇अलवर राज्य की स्थापना
- माचेड़ी के जागीरदार मुहब्बतसिंह के पुत्र प्रतापसिंह नरूका ने भरतपुर के जवाहरसिंह को हराकर जयपुर महाराजा माधोसिंह से प्रसन्नतापूर्वक 'राव राजा' की उपाधि व राजगढ़ में किला बनाने की अनुमति पाई; 1770-74 ई. के बीच उन्होंने राजगढ़, टहला, मालखेड़ा, बलदेवगढ़, अजबगढ़ व प्रतापगढ़ जैसे कई दुर्ग बनवाए।
- 25 नवम्बर 1775 ई. को प्रतापसिंह नरूका ने भरतपुर राज्य से अलवर छीनकर उसे अपनी राजधानी बनाया; बादशाह शाहआलम ने उन्हें 'राव राजा' व 'माही मरातिब' की उपाधियाँ दीं। अलवर राज्य की स्थापना व युद्धों का वर्णन जीवन जाचक रचित 'प्रताप रासो' में मिलता है।
🤝बख्तावरसिंह से बन्नेसिंह तक
- प्रतापसिंह के पुत्र बख्तावरसिंह (1790-1815 ई.) ने 1800 ई. में गोविंदगढ़ कस्बा बसाया और 1803 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी से सहायक संधि की; लासवाड़ी के युद्ध (1803 ई.) में अंग्रेजों की मदद के बदले उन्हें राठ का किला उपहार में मिला।
- निःसंतान बख्तावरसिंह के बाद उनके भतीजे विनयसिंह (बन्नेसिंह) और पासवान-पुत्र बलवंतसिंह को संयुक्त रूप से गद्दी सौंपी गई — राजस्थान के इतिहास में एक ही रियासत पर एक साथ दो शासकों के बैठने की यह इकलौती घटना मानी जाती है। बाद में बलवंतसिंह को नीमराणा-तिजारा की जागीर देकर विनयसिंह ने अकेले शासन संभाला।
- विनयसिंह ने रघुनाथगढ़ व बजरंगगढ़ के किले तथा रूपारेल नदी पर सिलीसेढ़ झील का निर्माण करवाया; 1857 ई. की क्रांति के दौरान वे ही अलवर के शासक थे और उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया।
⚖️शिवदानसिंह से जयसिंह तक
- विनयसिंह के बाद शिवदानसिंह (1857-1874 ई.) और फिर मंगलसिंह (1874-1892 ई.) — जो अजमेर के मेयो कॉलेज में दाखिला लेने वाले पहले विद्यार्थी थे — अलवर के शासक बने; मंगलसिंह को 1888 ई. में ब्रिटिश सरकार ने 'महाराजा' की उपाधि दी।
- मंगलसिंह के बाद जयसिंह (1892-1933 ई.) शासक बने, जिन्होंने 1907 ई. में उर्दू के स्थान पर हिन्दी को राजभाषा घोषित किया, पर 1925 ई. के नीमूचाणा किसान आंदोलन में उनके आदेश पर किसानों पर गोली चलाई गई — महात्मा गांधी ने इसे जलियाँवाला बाग से भी दोगुना भयावह बताया था।
🏳️तेजसिंह और मत्स्य संघ में विलय
- 1933 ई. के तिजारा दंगों के बाद जयसिंह को हटा दिया गया, और अंततः महाराव राजा तेजसिंह (1937-1948 ई.) अलवर के शासक बने; 18 मार्च 1948 ई. को अलवर रियासत का मत्स्य संघ में विलय हुआ और तेजसिंह को इसका उपराजप्रमुख बनाया गया।
🐫शेखावाटी का कछवाहा वंश
- सीकर, झुंझुनूँ व खेतड़ी के क्षेत्र को 'शेखावाटी' कहा जाता है, जिसका नाम राव शेखा से पड़ा; 1449 ई. में उन्होंने अमरसर को अपनी राजधानी बनाई और आज जयपुर के कछवाहा वंश की 'शेखावत' उपशाखा के संस्थापक माने जाते हैं।
- 1488 ई. में रलावता में राव शेखा का देहान्त हुआ, जहाँ उनकी छतरी आज भी विद्यमान है; उनके बाद रायमल, सूजा व लूणकरण क्रमशः अमरसर के शासक बने, और आगे चलकर खण्डेला की गद्दी पर बैठे राजा बहादुरसिंह शेखावत ने औरंगजेब की धर्म-विरोधी नीतियों का प्रतिरोध किया।