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राजस्थान GK

बीकानेर का इतिहास - राव बीका से गंगासिंह तक

History of Bikaner

राव बीका द्वारा 15वीं सदी में जांगलदेश की विजय से लेकर महाराजा गंगासिंह की वर्साय संधि में उपस्थिति और सादुल सिंह के ऐतिहासिक विलय तक — बीकानेर गढ़ने वाले राठौड़ वंश की यात्रा।

23 टॉपिक31 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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जांगलदेश में राठौड़ों का उदय

Rise of the Rathores in Jangaldesh

जांगलदेश कहलाने वाले इस रेतीले भू-भाग में राठौड़ वंश की दूसरी बड़ी सत्ता का उदय हुआ -- एक पाँचवें पुत्र की कहानी जिसने अपना अलग राज्य गढ़ा, और उन पुत्रों की जिन्होंने उसे बचाए रखने के लिए संघर्ष किया।

🏜️बीकानेर एक नज़र में

  • बीकानेर राजस्थान में राठौड़ सत्ता का दूसरा बड़ा केंद्र बनकर उभरा; इसका प्राचीन नाम जांगलदेश था, जिसके उत्तर में महाभारतकालीन कुरु व मद्र प्रदेश स्थित थे।
  • जांगलदेश के स्वामी होने के नाते बीकानेर के शासक 'जांगलधर बादशाह' कहलाते थे, और राज्य के प्रतीक चिह्न पर स्वयं 'जय जांगलधर बादशाह' अंकित रहता था।
  • राठौड़ों के आने से पहले यह भूमि जोहिया, चौहान, सांखला (परमार), भाटी व जाट जातियों के हाथों में रह चुकी थी।
  • राजपूत राज्यों में विशिष्ट रूप से बीकानेर ने कभी मराठों को कर अदा नहीं किया।

⚔️राव बीका

  • जोधपुर के राव जोधा के पाँचवें पुत्र बीका (माता: सांखला रानी नौरंगदे) ने करणी माता के आशीर्वाद से यह क्षेत्र जीता और 1465 ई. में जांगलदेश पर राठौड़ शासन की नींव रखी -- और इस भूमि को अपना ही नाम दिया, बीकानेर।
  • उसने 1485 ई. में रातीघाटी में बीकानेर के दुर्ग की नींव रखी, जो 1488 ई. में बनकर पूर्ण हुआ, और उसी वर्ष 12 अप्रैल को बीकानेर नगर बसाया।
  • पूंगल के शासक शेखा की पुत्री रंगकुँवरी से उसके विवाह से उत्तराधिकारी राव लूणकरण का जन्म हुआ, जो 12 जनवरी 1470 को हुआ।
  • बीका ने देशनोक में करणी माता के मूल मंदिर का निर्माण करवाया (जिसे बाद में महाराजा सूरतसिंह ने विस्तार दिया) और कोड़मदेसर में भैरव मंदिर बनवाया; उसकी मृत्यु के बाद पुत्र नरा शासक बना, जिसकी मृत्यु 13 जनवरी 1505 को हुई।

🏹राव लूणकरण

  • नरा के छोटे भाई लूणकरण ने 23 जनवरी 1505 को गद्दी संभाली और आगे चलकर नागौर के मुहम्मद खाँ व जैसलमेर के रावल जैतसी सहित कई प्रतिद्वंद्वियों को पराजित किया।
  • उसने बीकानेर में लक्ष्मीनारायणजी का मंदिर बनवाया और लूणकरणसर झील खुदवाई।
  • 31 मार्च 1526 को नारनौल के नवाब अबीमीरा से युद्ध करते हुए लूणकरण वीरगति को प्राप्त हुआ; बीठू सूजा रचित 'राव जैतसी रो छंद' तथा संस्कृत ग्रंथ 'कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनकं' दोनों उसे 'कलियुग का कर्ण' कहते हैं।

🛡️राव जैतसिंह

  • लूणकरण के ज्येष्ठ पुत्र जैतसिंह (जैतसी) ने पिता की मृत्यु के बाद बीकानेर की बागडोर संभाली, और अपने पुत्र कल्याणमल को खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ने भेजा।
  • जब बाबर के पुत्र कामरान ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया, तब जैतसी ने उसे 26 अक्टूबर 1534 को पराजित कर वापस प्राप्त किया -- यह प्रसंग 'राव जैतसी रो छंद' में सुरक्षित है।
  • 26 फरवरी 1542 को साहेबा (पाहोबा) के युद्ध में जोधपुर के राव मालदेव से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुआ, जिसके बाद मालदेव ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया।
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दिल्ली और जोधपुर के बीच: मुगलों से जुड़ाव

Between Delhi and Jodhpur: Bikaner Joins the Mughals

जैसे ही शेरशाह सूरी के उदय ने राजपूताने की राजनीति बदल दी, बीकानेर के शासकों ने प्रतिरोध की बजाय गठबंधन का मार्ग चुना -- यह बदलाव राणा सांगा के रणक्षेत्र से अकबर के दरबार तक ले गया, और अपने पीछे छोड़ गया भव्य जूनागढ़ दुर्ग।

👑राव कल्याणमल

  • जैतसी के ज्येष्ठ पुत्र कल्याणमल ब्यावर के निकट सुमेल-गिरि के युद्ध में मालदेव की शेरशाह सूरी के हाथों हुई पराजय के तुरंत बाद 5 जनवरी 1544 को शासक बने, जहाँ कल्याणमल स्वयं शेरशाह की ओर से लड़े थे; इसी दौरान मुगल दरबार के बैराम खाँ कुछ समय के लिए बीकानेर में शरण लिए रहे।
  • इससे पहले युवावस्था में वे खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ चुके थे।
  • 1570 ई. में कल्याणमल व उनके पुत्र रायसिंह ने अकबर के नागौर दरबार में उपस्थित होकर मुगल अधीनता स्वीकार की और मुगलों से वैवाहिक संबंध जोड़ने वाले बीकानेर के पहले शासक बने -- राजपूताने में यह मिसाल सबसे पहले आमेर के भारमल ने 1562 ई. में कायम की थी।
  • 24 जनवरी 1574 को उनका देहांत हुआ, उनके पीछे दो पुत्र रहे -- रायसिंह और कवि-राजकुमार पृथ्वीराज राठौड़।

🖋️पृथ्वीराज राठौड़

  • कल्याणमल के छोटे पुत्र पृथ्वीराज अकबर के दरबारी कवि रहे, जिन्हें अकबर ने गागरोन की जागीर प्रदान की।
  • 1580 ई. में उन्होंने डिंगल भाषा के प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ 'वेलि क्रिसन रुक्मणी री' की रचना की, जिसे कवि दुरसा आढ़ा ने 'पाँचवाँ वेद' व '19वाँ पुराण' कहकर सराहा।
  • कन्हैयालाल सेठिया की पुस्तक 'पाथल और पीथल' में 'पाथल' शब्द महाराणा प्रताप का और 'पीथल' शब्द स्वयं पृथ्वीराज राठौड़ का बोध कराता है।

🗡️महाराजा रायसिंह

  • अकबर व जहाँगीर दोनों की सेवा करते हुए रायसिंह ने कठौली की लड़ाई (1573 ई.) में गुजरात के इब्राहीम मिर्जा हुसैन को शाही सेना के नेतृत्व में पराजित किया, तथा काबुल, कंधार और बलोचिस्तान में भी अभियान चलाए।
  • उसने सिवाणा में राव चन्द्रसेन के विद्रोह को कुचला (1574 ई.) और सिरोही के सुरताण देवड़ा को हराकर आबू पर अधिकार किया (1577 ई.), बाद में 1583 ई. में देवड़ा से लिया गया आधा राज्य अकबर को लौटा दिया।
  • अकबर ने उन्हें जूनागढ़ (गुजरात), नूरपुर व शमसाबाद की जागीरें तथा 'राय' की उपाधि दी; जहाँगीर ने आगे चलकर उन्हें पाँच हजार का मनसब देकर दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया।
  • मुंशी देवी प्रसाद द्वारा 'राजपूताने का कर्ण' कहे गए तथा 'रायसिंह महोत्सव' व 'ज्योतिष रत्नाकर' के रचयिता के रूप में स्मरणीय रायसिंह का 22 जनवरी 1612 को बुरहानपुर में देहांत हुआ।

🏯जूनागढ़ दुर्ग

  • बीकानेर के प्रतिष्ठित जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण रायसिंह ने 17 फरवरी 1589 से 17 जनवरी 1594 के मध्य करवाया; इसकी दीवारों में दरबारी कवि व जैन मुनि जैता द्वारा रचित संस्कृत प्रशस्ति उत्कीर्ण है।
  • इसके बाहरी प्रवेश द्वार पर जयमल मेड़तिया और फत्ता सिसोदिया की गजारूढ़ पाषाण प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जिन्हें रायसिंह आगरा के किले से लेकर आए थे।
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सत्रहवीं सदी के उत्तराधिकारी

Seventeenth-Century Successors

छोटे शासनकाल, कठिन परिश्रम से अर्जित निष्ठा और कला-साहित्य का विकास -- यही बीकानेर की सत्रहवीं सदी की पहचान है, जो एक पिता के पक्षपात के कारण मारे गए राजकुमार से लेकर अनूपसिंह के अधीन चित्रकला के स्वर्णकाल तक फैली है।

⚖️महाराजा दलपतसिंह

  • यद्यपि रायसिंह अपनी प्रिय रानी गंगा के प्रति विशेष स्नेह के कारण उनके पुत्र सूरसिंह को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, तथापि बादशाह जहाँगीर ने 28 मार्च 1612 को दलपतसिंह को शासक नियुक्त किया।
  • अगले ही वर्ष, 1613 ई. में, जहाँगीर ने उन्हें मृत्युदंड दे दिया।

🐴महाराजा सूरसिंह

  • सूरसिंह दलपतसिंह के बाद शासक बने और उन्होंने खुर्रम (1622 ई.), जुझार सिंह बुंदेला (1628 ई.) तथा खानेजहाँ लोदी (1629-30 ई.) के विद्रोहों को दबाने में मुगल सेना की सहायता की।
  • उन्होंने बीकानेर में सूरसागर तालाब का निर्माण करवाया।

📖महाराजा कर्णसिंह

  • कर्णसिंह 1631 ई. में बीकानेर की गद्दी पर बैठे, वे पहले शाहजहाँ और बाद में औरंगजेब के समकालीन रहे।
  • उन्होंने जाखणियाँ गाँव के सीमा विवाद को लेकर नागौर के अमरसिंह के विरुद्ध 'मतीरे की राड़' नामक संघर्ष में विजय प्राप्त की, जिसे 1644 ई. (बाँकीदास के अनुसार 1642 ई.) बताया जाता है।
  • चिंतामणि भट्ट के ग्रंथ 'शुकसमति' में उन्हें 'जांगलधर बादशाह' कहा गया है; उनके दरबार से 'साहित्य कल्पद्रुम' (स्वयं कर्णसिंह रचित), 'कर्णभूषण' व 'काव्य डाकिनी' (पंडित गंगानंद मैथिल), 'कर्णवतंस' (होसिक भट्ट), तथा 'कर्ण संतोष' व 'वृत्तासवली' (कवि मुद्गल) जैसे ग्रंथ भी निकले।

🎨महाराजा अनूपसिंह

  • कर्णसिंह से अप्रसन्न होकर औरंगजेब ने 1670 ई. में, कर्णसिंह के जीवित रहते ही, बीकानेर का राज्याधिकार अनूपसिंह को सौंप दिया और उन्हें मराठों के विरुद्ध भेजा; अनूपसिंह ने आगे चलकर बीजापुर (1685-86 ई.) और गोलकुंडा (1687 ई.) की लड़ाइयों में भाग लिया और 'माही मरातिब' व 'महाराजा' की उपाधियाँ प्राप्त कीं।
  • उन्होंने चौतानी में अनोप सागर कुआँ तथा जूनागढ़ दुर्ग में तैंतीस करोड़ देवताओं का मंदिर बनवाया, वहीं अनूप संस्कृत पुस्तकालय (सादुल निवास) की स्थापना की, और 1678 ई. में अनूपगढ़ दुर्ग बनवाया।
  • उनका शासनकाल बीकानेर चित्रकला के स्वर्णकाल के रूप में स्मरण किया जाता है; संगीताचार्य भावभट्ट (जनार्दन भट्ट के पुत्र) और अधिकारी नाजर आनंदराम (जिन्होंने गीता का गद्य-पद्य दोनों में अनुवाद किया) जैसे विद्वान उनके दरबार में फले-फूले, साथ ही अनूपसिंह द्वारा स्वयं रचित 'अनूप विवेक', 'अनूपोदय' व 'अनूपरत्नाकर' जैसे ग्रंथ भी सामने आए।
  • कर्नल पाउलेट ने कहा था कि अनूपसिंह के भाई पद्मसिंह का बीकानेर की जनता के हृदय में वही स्थान था जो इंग्लैंड की जनता में रिचर्ड दी लायनहार्टेड (सिंह हृदय रिचर्ड) का था।
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दो शताब्दियों में सुदृढ़ीकरण

Consolidation Through Two Centuries

18वीं और 19वीं शताब्दी में बीकानेर के शासकों की एक श्रृंखला ने दुर्ग व मंदिर बनवाए, पड़ोसी राज्यों से युद्ध झेले, क्रूर प्रथाओं पर रोक लगाई, और धीरे-धीरे अंग्रेजों के निकट आते गए -- जिसने राज्य के आधुनिक कायाकल्प की नींव रखी।

🕌स्वरूपसिंह से जोरावरसिंह तक

  • अनूपसिंह के बाद स्वरूपसिंह ने 1698 से 1700 ई. तक शासन किया, उसके बाद उनके भाई सुजानसिंह शासक बने, जिनके काल में मथैरण जोगीदास ने 'वरसलपुर विजय' की रचना की।
  • 16 दिसम्बर 1735 को सुजानसिंह की मृत्यु के बाद जोरावरसिंह ने 1736 से 1746 ई. तक शासन किया; उनकी राजमाता सिसोदिनी ने बीकानेर में चतुर्भुज का मंदिर बनवाया, और उनके काल में 'वैद्यकसागर' व 'पूजा पद्धति' ग्रंथों की रचना हुई।

🏰महाराजा गजसिंह

  • जोरावरसिंह के भाई आनंदसिंह के छोटे पुत्र गजसिंह गद्दी पर बैठे; चारण कवि गाडण गोपीनाथ ने उनके सम्मान में 'गजसिंहजी रौ रूपक' की रचना की।
  • उन्होंने 1757 ई. में नौहरगढ़ दुर्ग की नींव रखी (जो 1760 ई. में पूर्ण हुआ), और 1752 ई. में बादशाह अहमदशाह से 'श्री राजराजेश्वर महाराजाधिराज महाराजशिरोमणि' की भव्य उपाधि तथा 'माही मरातिब' सम्मान प्राप्त किया।
  • 25 मार्च 1787 को गजसिंह की मृत्यु के बाद रायसिंह द्वितीय ने मात्र तीन सप्ताह (4-25 अप्रैल 1787) शासन किया; उनके विश्वासपात्र सेवक मंडलावत संग्रामसिंह ने भक्तिवश रायसिंह की चिता में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए।
  • इसके बाद प्रतापसिंह ने 6 मई 1787 से अल्प समय के लिए गद्दी संभाली।

🏛️महाराजा सूरतसिंह

  • सूरतसिंह 21 अक्टूबर 1787 को शासक बने; जयपुर की सहायता करने पर भाड़े के सैनिक जॉर्ज थॉमस (राजपूताने में 'जाझ फिरंगी' के नाम से प्रसिद्ध) ने उन पर आक्रमण किया, जिससे बाद में उन्होंने संधि कर ली।
  • उन्होंने सूरतगढ़ (गाँव सोड़ल, 1799 ई.) व फतहगढ़ (बीगोर) का निर्माण करवाया; 1805 ई. में सेनापति अमरचंद सुरुणा के नेतृत्व में उन्होंने भटनेर पर अधिकार कर उसका नाम हनुमानगढ़ रख दिया, क्योंकि विजय मंगलवार के दिन प्राप्त हुई थी।
  • 1807 ई. के गिंगोली युद्ध (कृष्णाकुमारी विवाद का हिस्सा) में उन्होंने जयपुर के जगतसिंह द्वितीय का साथ दिया, और 21 मार्च 1818 को उनके दूत ओझा काशीनाथ ने अंग्रेज प्रतिनिधि चार्ल्स मेटकॉफ से संधि की।
  • उन्होंने वर्तमान करणी माता मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया; उनके पुत्र मोतीसिंह की पत्नी दीपकुँवरी उनके साथ सती हुई -- बीकानेर राजपरिवार में यह अंतिम सती घटना थी, जिसकी स्मृति में आज भी प्रतिवर्ष देवीकुंड मेला लगता है।

📜महाराजा रतनसिंह

  • सूरतसिंह के पुत्र रतनसिंह 5 अप्रैल 1828 को शासक बने; 1829 ई. में बासणपी गाँव में जैसलमेर से युद्ध में बीकानेर की पराजय हुई, फिर भी बादशाह अकबर द्वितीय ने उन्हें 'माही मरातिब' की उपाधि से सम्मानित किया।
  • 1844 ई. में रियासत ने कन्या-वध पर रोक की 'आण' (शपथ) जारी की, और अंग्रेजों के दबाव के बावजूद रतनसिंह ने क्रांतिकारी जवाहरजी को उन्हें सौंपने से इनकार कर दिया।
  • उन्होंने बीकानेर में राजरतन बिहारी मंदिर बनवाया (1846-54 ई.); उनके काल के इतिहासकारों में बीठू भोमा ('रतन विलास'), सागरदान करणीदानोत ('रतनरूपक') तथा दरबारी कवि दयालदास (जिन्होंने 'बीकानेर रा राठौड़ री ख्यात' लिखी) शामिल हैं।

🚫महाराजा सरदारसिंह

  • सरदारसिंह 19 अगस्त 1851 को शासक बने और उन्होंने प्रजा हित में कई कानून बनाए -- दिवालिया कानून, कुछ करों की समाप्ति, तथा फिजूलखर्ची रोकने संबंधी नियम।
  • 1854 ई. में उन्होंने बीकानेर में सती प्रथा तथा जीवित समाधि प्रथा दोनों पर रोक लगाने वाले पहले शासक होने का श्रेय अर्जित किया।
  • 1857 ई. की क्रांति के समय वे राजपूताने के एकमात्र शासक थे जिन्होंने विद्रोह दबाने में अंग्रेजों की सहायता के लिए अपनी सेना राज्य से बाहर भेजी; बाद में महारानी विक्टोरिया के भारत आगमन पर बीकानेर ने अपने सिक्कों को उनके सम्मान में पुनः ढाला, जिससे पहले के शाहआलम द्वितीय के अंकन का स्थान लिया।
  • उन्होंने रसिक शिरोमणि का मंदिर बनवाया और सरदारशहर कस्बे (वर्तमान चूरू जिले में) की स्थापना की; 1868 ई. में सुजानगढ़ में एक अंग्रेजी एजेंसी स्थापित की गई।

🐫महाराजा डूँगरसिंह

  • निःसंतान सरदारसिंह की मृत्यु के बाद उनके वंशज डूँगरसिंह 11 अगस्त 1872 को शासक बने; उन्होंने 1878 ई. के दूसरे अफगान युद्ध में अंग्रेजों की सहायता के लिए 800 ऊँट भेजे, और 1879 ई. में उनके साथ नमक समझौता किया।
  • क्षेत्र का प्रसिद्ध नमकीन बीकानेरी भुजिया इनके शासनकाल में ही आरंभ हुआ, और इन्होंने 1884 ई. में बीकानेर में डाकखाना खोला।
  • उनके निर्माण कार्यों में शिवबाड़ी स्थित लालेश्वर शिव मंदिर (1880 ई.) तथा बीकानेर किले का व्यापक जीर्णोद्धार शामिल है -- जिसमें सोहन बुर्ज, चिनी बुर्ज, सरदार निवास, गणपत निवास व लाल निवास सम्मिलित हैं।
  • उन्होंने अपने नाम पर डूँगरगढ़ कस्बा बसाया और वहाँ गिरधर, बद्रीनारायण, गोपाल, गणेश, सूर्य व गुलाबेश्वर सहित कई मंदिरों का निर्माण करवाया।
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महाराजा गंगासिंह और रियासती बीकानेर का अंत

Maharaja Gangasingh and the End of Princely Bikaner

बीकानेर के सबसे प्रतिष्ठित शासक ने राज्य को विश्व मंच पर पहुँचाया -- बॉक्सर-युगीन चीन से लेकर वर्साय की संधि तक -- और अंततः अंतिम महाराजा ने राजस्थान की रियासतों में सबसे पहले, शांतिपूर्वक, राज्य को स्वतंत्र भारत में मिला दिया।

🎓गंगासिंह: राज्यारोहण व प्रारंभिक जीवन

  • डूँगरसिंह के छोटे भाई गंगासिंह 31 अगस्त 1887 को बीकानेर के 21वें शासक बने; मेयो कॉलेज के पंडित रामचंद्र दुबे उनके शिक्षक नियुक्त हुए जबकि मि. इजर्टन (सर ब्रायन इजर्टन) ने उन्हें शासन-कला सिखाई, और अल्पवय होने के कारण अंग्रेजों ने कर्नल थॉर्नटन की अध्यक्षता में एक रेजीडेंट काउंसिल बनाई।
  • उन्होंने 1898 ई. में देवली की छावनी में कुछ समय सैन्य शिक्षा प्राप्त की।
  • उनके शासनकाल में 1896 ई. में पलाना में कोयले का पता चला, जिसका खनन 1898 ई. में शुरू हुआ, तथा 'गंगा रिसाला' नामक ऊँट-सवार सैन्य टुकड़ी का गठन किया गया।
  • 1899-1900 ई. के भीषण अकाल ('छप्पनिया अकाल') के दौरान उन्होंने राहत कार्य के रूप में गजनेर झील बनवाई, और अंग्रेजों ने उन्हें केसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक प्रदान किया।

🌍विश्व मंच पर गंगासिंह

  • 1900 ई. में उन्होंने स्वयं गंगा रिसाला का नेतृत्व करते हुए चीन के बॉक्सर विद्रोह को दबाने में सहायता की, जिसके लिए उन्हें चाइना वार मेडल व KCIE दोनों प्राप्त हुए।
  • उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18 ई.) में भाग लिया, 27 अप्रैल 1918 को दिल्ली के वॉर कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए, और भारत की ओर से उन शांति-वार्ताओं में प्रतिनिधित्व किया जिनके परिणामस्वरूप 28 जून 1919 को पेरिस में वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर हुए।
  • ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ सिविल लॉ की उपाधि से सम्मानित किया, और बाद में वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के चांसलर भी बने।
  • वे 'जनरल' का सर्वोच्च मानद पद पाने वाले एकमात्र भारतीय शासक थे, और उन्होंने 20वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में भारत के राजनीतिक भविष्य पर प्रभावशाली 'रोम नोट' की रचना की।

📢चैम्बर ऑफ प्रिंसेस व राजनीतिक संघर्ष

  • 8 फरवरी 1921 को ब्रिटिश सरकार व भारतीय रियासतों के बीच संबंधों के प्रबंधन हेतु चैम्बर ऑफ प्रिंसेस (नरेन्द्र मण्डल) की स्थापना हुई, जिसके प्रथम चांसलर (1921-26) गंगासिंह बने; वे तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले राजस्थान के एकमात्र शासक भी थे।
  • बीकानेर की जनता में व्याप्त असंतोष को उजागर करने वाले एक पैम्फलेट के कारण उन्हें दूसरा गोलमेज सम्मेलन समाप्त होने से पहले ही ब्रिटेन से भारत लौटना पड़ा।
  • उस पैम्फलेट, 'बीकानेर एक दिग्दर्शन', ने उनकी दमनकारी नीतियों की आलोचना की, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक सुरक्षा कानून लागू हुआ और स्वामी गोपालदास, चंदनमल बहड़, सत्यनारायण सर्राफ व खूबचंद सर्राफ को तथाकथित 'बीकानेर षड्यंत्र केस' में गिरफ्तार किया गया; रघुवर दयाल ने 22 जुलाई 1942 को बीकानेर प्रजा परिषद् की स्थापना की।
  • गद्दी पर 50 वर्ष पूरे होने पर 'गंगा गोल्डन जुबली म्युजियम' बनवाया गया, जिसका उद्घाटन लॉर्ड लिनलिथगो ने किया; 2 फरवरी 1943 को बम्बई में गंगासिंह का निधन हो गया।

🎖️गंगासिंह के निर्माण व सम्मान

  • उन्होंने गंगा निवास पब्लिक पार्क (जिसका उद्घाटन वायसराय लॉर्ड हार्डिंज ने किया) के साथ-साथ एक दरबार हॉल, रामदेव पीर का मंदिर, तथा विक्रम निवास दरबार हॉल का निर्माण करवाया, इसके अलावा अपने पिता लालसिंह की स्मृति में लालगढ़ महल भी बनवाया।
  • विक्टोरिया मेमोरियल क्लब (1901 ई.) महारानी विक्टोरिया के सम्मान में बनवाया गया; लॉर्ड कर्जन ने 1902 ई. में इसका तथा कर्जन बाग का उद्घाटन किया, जबकि लेडी कर्जन ने जनाना अस्पताल की नींव रखी।
  • 1921 से 1927 ई. के बीच उन्होंने गंग नहर का निर्माण करवाया, जो पंजाब के फिरोजपुर के निकट हुसैनीवाला में सतलज नदी से निकाली गई है।
  • उनके अनेक सम्मानों में KCB (नाइट कमांडर ऑफ द बाथ), 'केसर-ए-हिंद' उपाधि, 1914 का स्टार तथा ब्रिटिश वॉर व विक्ट्री मेडल्स, मिस्र सुल्तान द्वारा प्रदत्त ग्रांड कॉर्डन ऑफ द ऑर्डर ऑफ द नाइल, तथा जी.सी.सी.ओ. (नाइट ग्रांड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर) शामिल थे।

🏅गंगासिंह के प्रमुख कार्य व सम्मान — एक दृष्टि में

कार्य / सम्मानवर्षविवरण
गजनेर झील1899-1900छप्पनिया अकाल राहत कार्य
गंगा रिसाला व चीन अभियान1900बॉक्सर विद्रोह दमन; चाइना वार मेडल व KCIE प्राप्त
वर्साय संधि28 जून 1919भारत का प्रतिनिधित्व, पेरिस में हस्ताक्षर
चैम्बर ऑफ प्रिंसेस1921-1926प्रथम चांसलर
गंग नहर1921-1927सतलज नदी (हुसैनीवाला, फिरोजपुर) से निर्मित
लालगढ़ पैलेस—पिता लालसिंह की स्मृति में निर्मित
'रोम नोट'—भारत के राजनीतिक भविष्य पर प्रभावशाली रचना
गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियमगद्दी पर 50 वर्ष पूर्ण होने परलॉर्ड लिनलिथगो द्वारा उद्घाटन

🕊️महाराजा सादुल सिंह व राज्य का विलय

  • सादुल (शार्दूल) सिंह, बीकानेर के अंतिम शासक, 1943 ई. में गंगासिंह के बाद गद्दी पर बैठे और उन्होंने 'नोता' (विवाह निमंत्रण कर) व 'तख्तनशीनी की भांछ' (उत्तराधिकारी कर) जैसे कर समाप्त किए।
  • वे भारतीय संघ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले राजस्थान के प्रथम शासक थे, जिससे बीकानेर स्वतंत्र भारत में औपचारिक रूप से विलय करने वाली प्रथम देशी रियासत बनी।
  • बीकानेर का विलय 30 मार्च 1949 को वृहत राजस्थान में हुआ; सादुल सिंह का निधन 25 सितम्बर 1950 को हुआ, जिसके बाद डॉ. करणी सिंह राजपरिवार के मुखिया बने।
  • करणी सिंह की पुत्री राज्यश्री कुमारी को 1968 ई. में निशानेबाजी के लिए अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

📜बीकानेर के शासक — एक दृष्टि में

शासकशासनकालप्रमुख कार्य
राव बीका1465 ई. सेबीकानेर दुर्ग व नगर की स्थापना (1488)
राव नरा— 1505 ई.मृत्यु 13 जनवरी 1505
राव लूणकरण1505-1526लक्ष्मीनारायणजी मंदिर, लूणकरणसर झील
राव जैतसिंह (जैतसी)1526-1542कामरान से बीकानेर पुनः प्राप्त (1534)
राव कल्याणमल1544-1574अकबर की अधीनता स्वीकार (1570)
महाराजा रायसिंह1574-1612जूनागढ़ दुर्ग (1589-94)
महाराजा दलपतसिंह1612-1613जहाँगीर द्वारा नियुक्त
महाराजा सूरसिंह1613-1631सूरसागर तालाब
महाराजा कर्णसिंह1631-1670मतीरे की राड़ में विजय (1644)
महाराजा अनूपसिंह1670-1698बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल
महाराजा स्वरूपसिंह1698-1700—
महाराजा सुजानसिंह1700-1735'वरसलपुर विजय' की रचना (मथैरण जोगीदास)
महाराजा जोरावरसिंह1736-1746चतुर्भुज मंदिर
महाराजा गजसिंह1746-1787नौहरगढ़ दुर्ग (1757-60)
महाराजा रायसिंह द्वितीय1787 (3 सप्ताह)—
महाराजा प्रतापसिंह1787—
महाराजा सूरतसिंह1787-1828भटनेर विजय, हनुमानगढ़ नामकरण (1805)
महाराजा रतनसिंह1828-1851राजरतन बिहारी मंदिर
महाराजा सरदारसिंह1851-1872सती व जीवित समाधि प्रथा पर रोक (1854)
महाराजा डूँगरसिंह1872-1887बीकानेरी भुजिया, प्रथम डाकखाना (1884)
महाराजा गंगासिंह1887-1943गंग नहर, वर्साय संधि, चैम्बर ऑफ प्रिंसेस
महाराजा सादुल सिंह1943-1949भारतीय संघ में सर्वप्रथम विलय (30 मार्च 1949)