जोधपुर राज्य का इतिहास
History of Jodhpur State
राव सीहा से हनुवन्तसिंह तक — मारवाड़ के राठौड़ों की गाथा, जिसमें राव जोधा का जोधपुर बसाना, मालदेव-चन्द्रसेन का प्रतिरोध, दुर्गादास का बलिदान, खेजड़ली का त्याग और अंततः राजस्थान में विलय शामिल है।
राठौड़ों की उत्पत्ति और जोधपुर की स्थापना
मारवाड़ की गाथा एक ऐसे योद्धा कुल से शुरू होती है जिसने रेगिस्तान की धरती पर राजपूताना की सबसे विशाल रियासत खड़ी की — और अंततः विशाल मेहरानगढ़ दुर्ग की छाया में जोधपुर नगर की स्थापना हुई।
📜राठौड़ और उनकी मातृभूमि
- जिस तरह दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में गुहिल व प्रतिहार और पूर्वी भाग में कछवाहा शासकों का बोलबाला था, उसी तरह उत्तर-पश्चिमी मारवाड़ पर राठौड़ों का राज चला — और क्षेत्रफल के लिहाज से यह राजपूताना की सबसे विशाल रियासत बन गई।
- 'राठौड़' नाम को आमतौर पर संस्कृत के शब्द 'राष्ट्रकूट' से विकसित माना जाता है।
- राठौड़ों की वंशावली को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहा है — भाटों के ग्रंथ उन्हें हिरण्यकश्यप की संतान बताते हैं, दयालदास की ख्यात सूर्यवंशी ब्राह्मण भक्राव का वंशज मानती है, जबकि नैणसी, पृथ्वीराज रासो और टॉड-रेऊ जैसे अधिकांश आधुनिक इतिहासकार कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद को उनका मूल पुरुष मानते हैं।
- मारवाड़ और बीकानेर — इनकी दो सबसे प्रसिद्ध शाखाओं — के अलावा राठौड़ों का शासन हस्तिकुण्डी, धनोप और वागड़ जैसे क्षेत्रों तक भी फैला रहा।
🗡️राव सीहा: मूल पुरुष
- राव सीहा को जोधपुर के राठौड़ वंश का मूल पुरुष माना जाता है; कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद का वंशज बताया है।
- पाली के निकट बीठू गाँव के एक शिलालेख के अनुसार राव सीहा 9 अक्टूबर 1273 ई. को सिंध के मुस्लिम आक्रमणकारियों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
🏰पाली से मंडोर तक: आस्थान से धूहड़ तक
- राव सीहा के उत्तराधिकारी राव आस्थान ने सत्ता का केंद्र पाली से गूँदोच गाँव स्थानांतरित किया, पर 1291 ई. में जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण से पाली की रक्षा करते हुए वे भी वीरगति को प्राप्त हुए।
- उनके उत्तराधिकारी धूहड़ ने मंडोर को प्रतिहारों से छीन लिया, पर 1309 ई. में उन्हीं से चलते संघर्ष में उनकी भी वीरगति हुई; इसके बाद गद्दी क्रमशः रायमल, कनकपाल, जालणसी, छाड़ा, तीड़ा, मझीनाथ और वीरमदेव से होते हुए राव चूँडा तक पहुँची।
👑राव चूँडा (1394-1423 ई.): मंडोर के स्वामी
- राव वीरमदेव के दूसरे पुत्र चूँडा का पालन-पोषण चारण आल्हा कलाऊ के संरक्षण में हुआ, और आगे चलकर उन्हें मंडोर का किला ही प्रतिहारों से दहेज में मिल गया।
- मंडोर को राजधानी बनाकर उन्होंने खाटू, डीडवाना, साँभर, अजमेर और नाडोल तक राठौड़ सत्ता का विस्तार किया; उनकी पत्नी चाँद कँवर ने जोधपुर की 'चाँद बावड़ी' बनवाई, जिसे पश्चिमी राजस्थान की सबसे प्राचीन बावड़ी माना जाता है।
- चूँडा का शासन विश्वासघात में समाप्त हुआ — 15 मार्च 1423 ई. को पूँगल के भाटियों ने छल से उनकी हत्या कर दी।
⚖️राव रणमल (1427-1438 ई.): महत्वाकांक्षा की कीमत
- अपने भाई कान्हा को उत्तराधिकारी बनाए जाने से आहत रणमल मेवाड़ के महाराणा लाखा के पास चित्तौड़ चले गए, और चतुराई से अपनी बहन हंसाबाई का विवाह लाखा से इस शर्त पर करवाया कि हंसाबाई का पुत्र ही मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनेगा।
- लाखा के पुत्र मोकल की सहायता से रणमल ने 1427 ई. में मंडोर पुनः जीत लिया — पर मेवाड़ के मामलों में उनका बढ़ता दखल उन्हें भारी पड़ा; 1438 ई. में महाराणा कुंभा ने उनकी प्रेमिका भारमली के जरिए ही उनकी हत्या करवा दी।
🏯राव जोधा (1438-1489 ई.): जोधपुर के संस्थापक
- 1 अप्रैल 1416 ई. को जन्मे रणमल के पुत्र जोधा जब अपने पिता की हत्या के समय काहुनी गाँव में शरण में थे, उन्होंने 1453 ई. में मंडोर पुनः जीता और 1458 ई. में विधिवत राज्याभिषेक करवाया।
- 12 मई 1459 ई. को उन्होंने मेहरानगढ़ (मयूरध्वजगढ़ या गढ़चिंतामणि) दुर्ग का निर्माण शुरू करवाया, और उसी वर्ष मंडोर से छह मील दक्षिण जोधपुर नगर बसाकर उसे अपनी नई राजधानी बनाया — इसी कारण वे जोधपुर के संस्थापक कहलाए।
🌟राव जोधा की चिरस्थायी विरासत
- जोधा ने राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची माता का मंदिर बनवाया, 1460 ई. में चामुण्डा माता की मूर्ति प्रतिष्ठित करवाई, और सोजत को केंद्र मानकर महाराणा कुंभा के साथ 1453 ई. की आँवल-बाँवल संधि से मेवाड़-मारवाड़ की सीमा तय की।
- उनके पुत्र बीका ने स्वतंत्र बीकानेर राज्य की स्थापना की, जबकि एक अन्य पुत्र दूदा ने राठौड़ों की मेड़तिया शाखा शुरू की; गौरीशंकर ओझा व गोपीनाथ शर्मा जैसे इतिहासकार जोधा को ही मारवाड़ का वास्तविक संस्थापक और उसका पहला सचमुच प्रतापी शासक मानते हैं।
- उन्होंने दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी की सेना को भी पराजित किया, और करीब 50 वर्षों तक शासन करने के बाद 6 अप्रैल 1489 ई. को जोधपुर में उनका निधन हुआ।
🎪राव सातल, गींदोली और राव सूजा
- जोधा के बड़े पुत्रों के पहले ही न रहने या अन्यत्र बस जाने पर (नींबा का निधन हो चुका था, बीका स्वतंत्र बीकानेर के शासक बन चुके थे) सातल गद्दी पर बैठे; उन्होंने पोकरण के निकट सातलमेर बसाया और 1492 ई. के कोसाणा युद्ध में अजमेर की सेना को हराया।
- मारवाड़ के प्रसिद्ध घुड़ला उत्सव की शुरुआत सातल के काल में हुई — पराजित अजमेर सेनापति घुड़ले खाँ की पुत्री गींदोली ने सातल की अनुमति से यह परंपरा शुरू की।
- निःसंतान सातल की मृत्यु पर सूजा उत्तराधिकारी बने; बाद में राव बीका ने राज्य की पवित्र वस्तुएँ — जोधा की ढाल-तलवार, राजसिंहासन और अठारह भुजाओं वाली नागणेची की मूर्ति समेत — वापस पाने के लिए सूजा के विरुद्ध युद्ध छेड़ा।
राव गांगा से चन्द्रसेन तक: मारवाड़ का स्वर्णकाल और प्रतिरोध
राव मालदेव के काल में मारवाड़ का क्षेत्रफल और प्रतिष्ठा दोनों शिखर पर पहुँचे, और उसके बाद उनके पुत्र चन्द्रसेन ने मुगल सत्ता के विरुद्ध दशकों तक अकेले संघर्ष जारी रखा।
🩸राव गांगा (1515-1531 ई.): गद्दी पर त्रासदी
- सूजा के स्वर्गीय ज्येष्ठ पुत्र बाघा के पुत्र गांगा ने खानवा के युद्ध में राणा साँगा की सहायता हेतु अपने पुत्र मालदेव के नेतृत्व में 4000 सैनिक भेजे, और 1529 ई. के सेवकी युद्ध में स्वयं वीरतापूर्ण विजय प्राप्त की।
- उनका शासन पितृहत्या में समाप्त हुआ — उनके ही पुत्र मालदेव ने उन्हें झरोखे से धक्का देकर मार डाला (अधिकांश स्रोतों में 1531 ई., कुछ में 1532 ई.), जिस कारण मालदेव को कठोर उपनाम 'पितृहन्ता' मिला।
- उनकी सिसोदिया रानी उत्तमदे, जो राणा साँगा की पुत्री थीं, ने जोधपुर का पद्मसर तालाब बनवाया, जबकि एक अन्य रानी नानकदेवी ने अचलेश्वर महादेव का मंदिर बनवाया।
👑राव मालदेव (1531-1562 ई.): एक साम्राज्य के निर्माता
- मालदेव 21 मई 1531 ई. को गद्दी पर बैठे (अलग-अलग स्रोतों में तिथि में मामूली अंतर है); हुमायूँ के साथ जोगीतीर्थ वार्ता में वे सहायता के बदले बीकानेर सौंपने तक को तैयार थे, और 1532 ई. में बहादुरशाह के आक्रमण के समय मेवाड़ के राणा विक्रमादित्य की सहायता भी की।
- 1536 ई. में उनका विवाह जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे से हुआ; इस विवाह से असंतुष्ट उमादे 'रूठी रानी' कहलाईं और जोधपुर के बजाय अजमेर के ताराागढ़ दुर्ग में ही अपना जीवन बिताया।
- फारसी इतिहासकारों ने उन्हें 'हिन्दुस्तान का हशमत वाला शासक' कहा, वहीं मारवाड़ की खयातों और भाट परंपरा में वे '52 युद्धों के विजेता' के रूप में विख्यात हुए, जिन्होंने 1530 के दशक से 1540 के प्रारंभ तक भाद्राजूण, नागौर, मेड़ता, अजमेर, सिवाणा, जालौर और बीकानेर जैसे क्षेत्र एक के बाद एक जीते।
⚔️गिरि-सुमेल का युद्ध (1544 ई.): मालदेव बनाम शेरशाह सूरी
- 5 जनवरी 1544 ई. को ब्यावर के निकट जैतारण में लड़े इस युद्ध में मालदेव के सेनापति जैता-कूँपा शेरशाह के सेनापति जलाल जलवानी के सामने थे; मालदेव स्वयं बिना लड़े युद्धक्षेत्र से हट गए और सिवाणा दुर्ग में शरण ली, जिसे लंबे समय से मारवाड़ के शासकों की अंतिम शरणस्थली माना जाता रहा है।
- जीतने के बावजूद शेरशाह ने स्वीकार किया था, 'एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता'; उन्होंने जोधपुर दुर्ग पर कब्जा कर वहाँ अपने नाम की मस्जिद बनवाई और खवास खाँ को उसका प्रबंधक नियुक्त किया — इस युद्ध में बीकानेर के कल्याणमल और मेड़ता के वीरमदेव शेरशाह के साथ थे।
🏛️मालदेव का उत्तरार्ध शासन, निर्माण कार्य और दरबार
- मई 1545 ई. में कालिंजर में शेरशाह की मृत्यु के बाद मालदेव ने तेजी से जोधपुर पुनः जीत लिया; 1557 ई. में उन्होंने हरमाड़ा युद्ध में मेवाड़ के राणा उदयसिंह को हराया और जयमल से मेड़ता भी वापस छीना, जहाँ मालकोट दुर्ग बनवाया। 7 नवम्बर 1562 ई. को उनका निधन हुआ; उनकी छतरी मंडोर उद्यान, जोधपुर में स्थित है।
- उन्होंने रानीसर तालाब की किलेबंदी करवाई, पोकरण, मालकोट और सोजत के किले बनवाए, ताराागढ़ के बीठली किले में रहटों से जल पहुँचाने की व्यवस्था करवाई, और जोधपुर शहर व मेहरानगढ़ की बाहरी परकोटा दीवार पूर्ण करवाई; उनकी रानी स्वरूप-दे-झाली ने 'स्वरूप सागर' नामक तालाब बनवाया, जिसे 'बहूजी का तालाब' भी कहा जाता है।
- उनके दरबारी कवि महात्मा नरसेन और समकालीनों ने 'आसिया के दोहे' व 'ईसरदास के सोरठे' जैसे ग्रंथ रचे; 'अकबरनामा' और 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' दोनों में मालदेव की सेना व राज्य को अधिकांश समकालीन शासकों से बड़ा बताया गया है, और मुस्लिम इतिहासकारों ने शेरशाह के साथ उनके युद्ध को 'धर्मयुद्ध' तक कहा।
🛡️राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.): मारवाड़ का भुला-बिसरा नायक
- विश्वेश्वरनाथ रेऊ और रामसिंह सोलंकी जैसे इतिहासकारों ने उन्हें 'मारवाड़ का महाराणा प्रताप' कहा, वहीं मुहणोत नैणसी ने उन्हें 'मारवाड़ का भुला-बिसरा नायक' की उपाधि दी — 30 जुलाई 1541 ई. को जन्मे मालदेव के सबसे छोटे पुत्र चन्द्रसेन को अपनी माँ रानी स्वरूपदे के आग्रह पर बड़े भाइयों राम व उदयसिंह की जगह उत्तराधिकारी बनाया गया।
- उत्तराधिकार के संघर्ष में उन्होंने अपने बड़े भाइयों को लोहावट और नाडोल में हराया, 31 दिसंबर 1562 ई. को अकबर के समकालीन शासक के रूप में औपचारिक रूप से गद्दी संभाली, और धन जुटाने के लिए पोकरण भाटियों को सौंप दिया।
🔥मुगलों के विरुद्ध चन्द्रसेन का लंबा प्रतिरोध
- 1564 ई. में भाई राम के अकबर के दरबार चले जाने पर मुगल सेना ने हुसैन कुली खाँ के नेतृत्व में इसी फूट का लाभ उठाकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया, जिससे चन्द्रसेन भाद्राजूण भाग गए और संघर्ष जारी रखा; दोनों पक्षों की फिर 1565 ई. के राणीसर युद्ध में टक्कर हुई।
- राजस्थान की राजनीतिक स्थिति भाँपकर मुगल वर्चस्व स्थापित करने के मकसद से हुए अकबर के 1570 ई. के नागौर दरबार में जैसलमेर के हरराय, बीकानेर के कल्याणमल-रायसिंह और स्वयं चन्द्रसेन के भाई उदयसिंह ने मुगल अधीनता स्वीकार कर ली; चन्द्रसेन भी पहले वहाँ पहुँचे, पर अपने पुत्र रायसिंह को छोड़कर चुपचाप भाद्राजूण लौट गए — इससे नाराज अकबर ने उनके पीछे सेना भेजी और आगे चलकर 30 अक्टूबर 1572 ई. को उनकी जगह रायसिंह को ही जोधपुर का प्रशासक नियुक्त कर दिया।
- जोधपुर के पतन के बाद सिवाणा उनका केंद्र बना, और अंततः सिरोही, डूँगरपुर व बाँसवाड़ा की पहाड़ियों में शरण लेते हुए 11 जनवरी 1581 ई. को उनका निधन हुआ — उन्होंने कभी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की। अकबर को चुनौती देने वाले राजस्थान के पहले राजपूत शासक, उन्होंने राणा उदयसिंह से भी पहले छापामार युद्धनीति अपनाई, हालांकि महाजन वर्ग की लूट के कारण वे अपनी ही प्रजा में अलोकप्रिय हो गए — कवि दुरसा आढ़ा ने बाद में उनके प्रतिरोध को सीधे महाराणा प्रताप से जोड़ा।
मुगल छत्रछाया में जोधपुर: सेवा, विद्वता और बलिदान
चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद जोधपुर के राठौड़ों ने अलग रास्ता अपनाया — मुगल दरबार से वैवाहिक व सैन्य संबंध जोड़कर उपाधियाँ, मनसब और कला-संरक्षण प्राप्त किया, हालांकि एक राजकुमार ने विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।
🤝मोटा राजा उदयसिंह (1583-1595 ई.): पहला वैवाहिक संबंध
- जोधपुर पर तीन वर्षों (1581-83 ई.) तक सीधे मुगल (खालसा) शासन के बाद अकबर ने चन्द्रसेन के बड़े भाई उदयसिंह को शासक बनाया; उनके भारी शरीर के कारण उन्हें 'मोटा राजा' कहा जाने लगा।
- 1587 ई. में वे मुगल अधीनता स्वीकार कर मुगल राजगद्दी से वैवाहिक संबंध जोड़ने वाले जोधपुर के पहले शासक बने — उन्होंने अपनी पुत्री मानीबाई, जो आगे चलकर जगत गुसाईं कहलाईं, का विवाह शहजादे सलीम (जहाँगीर) से करवाया; वही आगे चलकर खुर्रम यानी भावी शाहजहाँ की माँ बनीं।
- उनके पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में किशनगढ़ की स्थापना की, जो जोधपुर और बीकानेर के बाद राठौड़ सत्ता का तीसरा केंद्र बना — एक ऐसी रियासत जिसने आगे चलकर, विशेषकर चित्रकला में, अपनी अलग पहचान बनाई।
🎖️सवाई राजा सूरसिंह (1595-1619 ई.)
- पिता के उत्तराधिकारी के रूप में सूरसिंह को 1595 ई. में लाहौर में अकबर से टीका और 2000 जात/2000 सवार का मनसब मिला, और अगले जनवरी में जोधपुर में उनका औपचारिक राज्याभिषेक हुआ; दक्षिण अभियानों में उनकी वीरता से प्रभावित होकर 1603 ई. में अकबर ने उन्हें 'सवाई राजा' की उपाधि दी।
- वे 1615 ई. में गोगुन्दा में शहजादे खुर्रम व महाराणा अमरसिंह की मुलाकात के समय मौजूद थे, जिसके लिए जहाँगीर ने उनका मनसब बढ़ाकर 5000 जात/3000 सवार कर दिया; उन्होंने जोधपुर का सूरसागर तालाब, रामेश्वर महादेव मंदिर, सूरजकुण्ड बावड़ी और किले का प्रसिद्ध मोती महल बनवाया।
🏵️महाराजा गजसिंह प्रथम (1619-1638 ई.)
- 5 अक्टूबर 1619 ई. को बुरहानपुर में खानखाना के पुत्र दाराब खाँ द्वारा राज्याभिषिक्त गजसिंह को दक्षिण अभियानों और शहजादे खुर्रम के विरुद्ध खड़े होने के इनाम स्वरूप 1621 ई. में 'दलथंभन' की उपाधि मिली।
- 6 मई 1638 ई. को आगरा में उनका निधन हुआ, और यमुना के तट पर अंतिम संस्कार हुआ जहाँ आज भी उनकी छतरी है; उनके दरबारी कवि हेमकवि व केशवदास गाड़ण ने डिंगल भाषा में क्रमशः 'गुणभाषा' व 'गजगुणरूपक' नामक ग्रंथ रचे।
🗡️अमरसिंह राठौड़: शौर्य और त्रासदी
- गजसिंह के ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह को छोटे भाई जसवंत सिंह की जगह उत्तराधिकारी न बनाए जाने पर — कहा जाता है कि इसके पीछे गजसिंह की प्रियतमा अनारां बेगम का प्रभाव था, जिनकी बनवाई 'अनारां बेरी' बावड़ी आज भी जोधपुर में है — वे 1628 ई. में शाहजहाँ के दरबार चले गए; शाहजहाँ ने उन्हें 'राव' की पदवी और नागौर की जागीर दी।
- सिलवा व जाखणियाँ गाँवों को लेकर 1644 ई. के 'मतीरे की राड़' संघर्ष में बीकानेर के कर्णसिंह से उनकी हार हुई; उसी वर्ष जब एक शाही अधिकारी ने उन्हें अपमानित करते हुए ताना कसा, अमरसिंह ने उसे कटार से मार डाला, और बदले में अन्य दरबारियों ने घेरकर 25 जुलाई 1644 ई. को उन्हें भी मार डाला।
⚔️महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638-1678 ई.): सेवा, युद्ध और विद्वता
- 26 दिसंबर 1626 ई. को बुरहानपुर में जन्मे जसवंत सिंह का 1638 ई. में राजतिलक हुआ और शाहजहाँ के अधीन वे लगातार आगे बढ़ते गए, अंततः 1655 ई. में 'महाराजा' की उपाधि और कंधार अभियान के बाद 6000/6000 का मनसब पाया।
- उत्तराधिकार युद्ध में उन्होंने दाराशिकोह का साथ दिया, पर धरमत (16 अप्रैल 1658 ई.) और सामूगढ़ (30 मई 1658 ई.) के युद्धों में औरंगजेब से हार गए; इसके बाद मिर्जा राजा जयसिंह की सलाह पर वे औरंगजेब की सेवा में आ गए और खजवा (जनवरी 1659 ई.) व दौराई (मार्च 1659 ई.) के युद्धों में विजयी पक्ष में लड़े।
- 1662 ई. में मराठों के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता हेतु दक्षिण भेजे गए जसवंत सिंह की कूटनीति से 1667 ई. में मुगल-मराठा संधि हुई; वे उन गिने-चुने राजपूताना शासकों में शामिल थे जिन्हें 7000 का मनसब मिला, और उनके जीवनकाल में औरंगजेब हिन्दुओं पर जजिया कर लगाने की हिम्मत कभी नहीं जुटा सका।
🕊️जसवंत सिंह की मृत्यु और उसके परिणाम
- 1673 ई. में काबुल भेजे गए जसवंत सिंह का 28 नवम्बर 1678 ई. को वर्तमान अफगानिस्तान के जमरुद में निधन हुआ; समाचार सुनकर औरंगजेब ने कथित रूप से कहा, 'आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया' — यह विवरण 'तवारीख मोहम्मदशाही' में मिलता है।
- उस समय कोई जीवित पुत्र न होने पर — उनकी दो गर्भवती रानियों जसकुँवरी व नरूकी की तब तक संतान नहीं हुई थी — औरंगजेब ने जोधपुर को खालसा घोषित कर दिया; जसकुँवरी से जल्द ही जन्मे पुत्र अजीतसिंह ने आगे चलकर दुर्गादास राठौड़ की स्वामिभक्ति से मारवाड़ पुनः प्राप्त की, जबकि नरूकी के पुत्र दलथमण का बचपन में ही निधन हो गया।
- उनकी रानियों ने भी जोधपुर पर अपनी छाप छोड़ी — अतिरंगदे ने 'जानसागर' तालाब बनवाया, और जसवंतदे ने 1663 ई. में कल्याण सागर तालाब सहित 'राई का बाग' बनवाया; जसवंत सिंह ने स्वयं काबुल से अनार के पौधे मंगवाकर कागा में लगवाए, जिस कारण आज भी जोधपुर के अनार प्रसिद्ध हैं।
अजीतसिंह, दुर्गादास और मारवाड़ का स्वतंत्रता संघर्ष
औरंगजेब की नाक के नीचे से बाहर निकाला गया एक नवजात राजकुमार, अपने ही पुत्र की बलि देकर उसे बचाने वाली एक धाय, और अपने राजा के लिए तीन दशक जंगलों में बिताने वाला एक सेनानी — मारवाड़ का सबसे नाटकीय प्रसंग यहीं खुलता है।
👶शिशु अजीतसिंह का बचाव
- 1679 ई. में लाहौर से लौटते समय जन्मे अजीतसिंह को औरंगजेब ने जोधपुर देने के बहाने दिल्ली बुलाया; इसके बजाय, 26 मई 1679 ई. को बादशाह ने जोधपुर जसवंत सिंह के बड़े भाई अमरसिंह के पौत्र इंद्रसिंह को दे दिया।
- बादशाह की नीयत पर संदेह करते हुए दुर्गादास राठौड़ और चांपावत सोनिंग गुपचुप अजीतसिंह को दिल्ली से मारवाड़ की ओर ले गए — शिशु की धाय गोराधाय ने अपने ही पुत्र 'मोहम्मदीराज' को उसकी जगह रखकर उसकी जान बचाई, यह बलिदान आज भी उन्हें 'मारवाड़ की पन्नाधाय' का दर्जा दिलाता है; यह दल 23 जुलाई 1679 ई. को मारवाड़ पहुँचा।
🦸दुर्गादास राठौड़: मारवाड़ के उद्धारक
- 13 अगस्त 1638 ई. को सालवा गाँव में जन्मे दुर्गादास को बचपन में ही पिता आसकरण ने माँ सहित त्याग दिया था, और वे छोटे से गाँव 'लूनवाँ' में पले-बढ़े; बाद में वे जसवंत सिंह की सेवा में आए, जिन्होंने भविष्यवाणी की थी कि दुर्गादास ही आगे चलकर 'मारवाड़ का उद्धारक' बनेंगे।
🏕️निर्वासन, शाहजादा अकबर का विद्रोह और जोधपुर की पुनर्प्राप्ति
- पहले मेवाड़ के महाराणा राजसिंह की शरण में रहे — जिनके अजीतसिंह को शरण देने और कुछ अन्य कारणों से औरंगजेब ने 3 सितम्बर 1679 ई. को मेवाड़ पर आक्रमण किया — अजीतसिंह ने करीब 1681 ई. से सिरोही के निकट कालिंद्री गाँव में मुकुंददास खींची जैसे सरदारों के संरक्षण में वेश बदलकर वर्षों गुप्तवास किया।
- इसी बीच महाराणा जयसिंह और दुर्गादास के उकसावे में आकर औरंगजेब के अपने पुत्र अकबर ने 1 जनवरी 1681 ई. को पिता के विरुद्ध स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया और समर्थन के बदले अजीतसिंह को जोधपुर की गद्दी देने का वादा किया; जब यह विद्रोह असफल रहा और अकबर 1687 ई. में दक्षिण होते हुए फारस भाग गए, तब दुर्गादास ने उनके बच्चों की जिम्मेदारी संभाली और आगे चलकर 1695-98 ई. के बीच उन्हें औरंगजेब को सौंप दिया।
- अजीतसिंह को अंततः 23 मार्च 1687 ई. को सभी राठौड़ों के सामने लाया गया, और उसी अक्टूबर दुर्गादास स्वयं भी उनकी सेवा में लौट आए; 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद अजीतसिंह ने मार्च 1707 ई. में जोधपुर दुर्ग पर कब्जा किया, और — बहादुरशाह की सेना द्वारा इसे थोड़े समय के लिए पुनः लेने के बाद — जयपुर व मेवाड़ की संयुक्त सहायता से 4 जुलाई 1708 ई. को इसे निर्णायक रूप से पुनः जीत लिया, यह सब 1708 ई. के त्रिपक्षीय देबारी समझौते के बाद हुआ जिसने उनकी गद्दी, जयपुर के उत्तराधिकार और मेवाड़-आमेर विवाह को तय किया।
🌊दुर्गादास के अंतिम वर्ष और विरासत
- दुर्गादास ने अपने अंतिम दिन उज्जैन में बिताए और वहीं 22 नवम्बर 1718 ई. को उनका निधन हुआ; उनकी छतरी क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है।
- उन्हें मारवाड़ का 'अणबिंदिया मोती' और उसका उद्धारक माना जाता है; कर्नल जेम्स टॉड ने प्रसिद्ध रूप से उन्हें 'राठौड़ों का यूलीसैस' कहा।
🏯अजीतसिंह का उत्तरार्ध शासन, निर्माण कार्य और मृत्यु
- बादशाह फर्रुखशियर ने अजीतसिंह को 'राजेश्वर' की उपाधि दी और 1715 ई. में उनकी पुत्री इन्द्रकुँवरी से हिन्दू व मुस्लिम दोनों रीतियों से विवाह किया; बादशाह की बाद की हत्या में संदिग्ध भूमिका के कारण अजीतसिंह को कठोर उपनाम 'दामाद कुश' मिला, वहीं इतिहासकार गौरीशंकर ओझा ने उन्हें 'कान का कच्चा' कहा।
- जोधपुर दुर्ग में उन्होंने फतहमहल और दौलतखाने के राजमहल-ख्वाबगाह महल, घनश्याम मंदिर, और मंडोर में जसवंतसिंह प्रथम का देवल व एक थंबा महल बनवाया; उन्होंने 1719 ई. में किले में कई चाँदी की मूर्तियाँ भी स्थापित करवाईं, और स्वयं 'गुणसागर' व 'भाव निर्मोही' जैसी काव्य-रचनाएँ भी लिखीं।
- 23 जून 1724 ई. को उनकी नींद में ही स्वयं उनके पुत्र बख्तसिंह ने उनकी हत्या कर दी, जिससे वे मालदेव के बाद मारवाड़ के दूसरे दर्ज पितृहन्ता बन गए — हालांकि उन्हें 'बादशाह निर्माता' के उपनाम से भी याद किया जाता है।
18वीं-19वीं सदी का जोधपुर: सुधार, बलिदान और विलय की राह
अमृता देवी के वृक्ष-रक्षक शहीदों से लेकर अकाल-राहत के लिए बने उम्मेद भवन पैलेस तक, मारवाड़ की कहानी का यह अंतिम चरण मराठा युद्धों, अंग्रेजी संधि, सामाजिक सुधार और अंततः स्वाधीनता से होकर गुजरता है।
🌳अभयसिंह और खेजड़ली का बलिदान (1724-1749 ई.)
- 7 नवम्बर 1702 ई. को जालौर में जन्मे और मुगल दरबार से 'राजराजेश्वर' की उपाधि पाने वाले अभयसिंह का शासन सबसे अधिक विक्रम संवत् 1787 (28 अगस्त 1730 ई.) की खेजड़ली घटना के लिए याद किया जाता है, जब उनके अधिकारी गिरधारी दास ने खेजड़ली गाँव में पेड़ काटने का आदेश दिया।
- जैसे ही पेड़ों की कटाई शुरू हुई, अमृता देवी विश्नोई ने पेड़ बचाने के लिए 363 स्त्री-पुरुषों के साथ अपने प्राणों की आहुति दे दी — यह पर्यावरण-रक्षा का अद्वितीय बलिदान आज भी हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को विश्व के एकमात्र वृक्ष मेले में स्मरण किया जाता है, और 12 सितम्बर को राष्ट्रीय स्तर पर खेजड़ली दिवस के रूप में मनाया जाता है।
⚡रामसिंह और बख्तसिंह: एक अशांत अंतराल (1749-1752 ई.)
- अभयसिंह की मृत्यु के बाद 23 जुलाई 1749 ई. को रामसिंह शासक बने, पर सरदारों के साथ उनके कठोर व्यवहार ने उन्हें अपने चाचा बख्तसिंह के पास नागौर भेज दिया; मराठा सरदार होल्कर की सहायता से बख्तसिंह ने 21 जून 1751 ई. को रामसिंह को हराकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया।
- बख्तसिंह — जो अजीतसिंह के पुत्र और अभयसिंह के छोटे भाई थे — पर स्वयं अपने पिता की हत्या करवाने का आरोप है; उनकी सबसे स्थायी विरासत नागौर के किले में बनवाया गया आबहवा महल है।
🕉️महाराजा विजयसिंह (1752-1793 ई.): मराठे, संधियाँ और मंदिर
- सितम्बर 1752 ई. में पिता की मृत्यु पर उत्तराधिकारी बने और 30 जनवरी 1753 ई. को जोधपुर में विधिवत राज्याभिषिक्त विजयसिंह ने नागौर के निकट छल से मराठा सेनापति जयप्पा सिंधिया की हत्या करवाई, और मराठा गतिविधियों के विरुद्ध अंग्रेजी सहायता माँगने वाले राजस्थान के पहले शासक बने।
- फरवरी 1756 ई. की संधि, जो सरदार फतहचंद व देवीसिंह महासिंहोत ने मराठों के साथ करवाई, में जोधपुर ने डेढ़ लाख रुपये वार्षिक कर देना स्वीकार किया; 1781 ई. में बादशाह शाहआलम द्वितीय की अनुमति से मारवाड़ में टकसाल खुली, और उनके नाम पर 'विजयशाही' सिक्के चलाए गए।
- वैष्णव धर्म के अनुयायी विजयसिंह ने 1760 ई. में जोधपुर में विशाल गंगश्यामजी मंदिर, बालकृष्ण मंदिर और श्रृंगार चौकी बनवाई — यह वही स्थान है जहाँ परंपरागत रूप से जोधपुर के महाराजाओं का राजतिलक होता था।
⚔️विजयसिंह के मराठा युद्ध और गुलाबराय का प्रभाव
- जयपुर के साथ मिलकर विजयसिंह ने 28 जुलाई 1787 ई. को तूंगा में महादजी सिंधिया की सेना को हराया, पर जयपुर की सेना के पीछे हटने से 20 जून 1790 ई. को पाटन और 10 सितम्बर 1790 ई. को मेड़ता (डंगा) में उन्हें हार का सामना करना पड़ा; इसके बाद दिसंबर 1790 ई. की साँभर संधि से उन्हें अजमेर सूबा सौंपना पड़ा और मराठों को 60 लाख रुपये देने पड़े।
- जाट जाति की पासवान गुलाबराय का विजयसिंह पर इतना प्रभाव था कि इतिहासकार कविराज श्यामलदास ने उन्हें 'जोधपुर की नूरजहाँ' और विजयसिंह को 'जहाँगीर का नमूना' तक कहा; उन्होंने गुलाबसागर तालाब और कुंज बिहारी मंदिर बनवाया, पर उनके आचरण से त्रस्त राठौड़ सरदारों ने 16 अप्रैल 1792 ई. को उनकी हत्या करवा दी।
💔भीमसिंह और कृष्णाकुमारी की त्रासदी (1793-1810 ई.)
- 20 जुलाई 1793 ई. को भीमसिंह विजयसिंह के उत्तराधिकारी बने; मेवाड़ राजकुमारी कृष्णाकुमारी से उनकी 1799 ई. की सगाई विवाह से पहले ही 1803 ई. में उनकी अपनी मृत्यु से अधूरी रह गई।
- पुजारी की भविष्यवाणी के आधार पर चुने गए मानसिंह ने उसी सगाई पर अपना दावा जताया; जब मेवाड़ के महाराणा ने इसके बजाय कृष्णाकुमारी का विवाह जयपुर के जगतसिंह से तय कर दिया, तो युद्ध छिड़ गया — मानसिंह 13 मार्च 1807 ई. के गिंगोली युद्ध में हार गए, पर बाद में अमीर खाँ पिंडारी के साथ मिलकर जयपुर पर आक्रमण कर जोधपुर पुनः प्राप्त कर लिया।
- दोनों दावेदारों की सेनाओं के बीच फँसे महाराणा भीमसिंह ने अंततः संकट खत्म करने के लिए जवानदास को अपनी ही पुत्री को मारने भेजा, पर वे यह कर नहीं सके — अंततः 21 जुलाई 1810 ई. को कृष्णाकुमारी ने स्वयं विष का प्याला पीकर प्राण त्याग दिए।
🕉️महाराजा मानसिंह (1803-1843 ई.): संन्यासी राजा
- जालौर के पुजारी आयस देवनाथ की भविष्यवाणी के कारण शासक बने मानसिंह नाथ सम्प्रदाय के इतने भक्त हो गए कि उन्हें 'संन्यासी राजा' के रूप में याद किया जाता है; उन्होंने आयस देवनाथ को अपना गुरु बनाकर जोधपुर बुलाया और उनके आगमन की स्मृति में महामंदिर बनवाया, जो आज भी इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है।
- उनके राज्याभिषिक्त पुत्र छत्रसिंह ने 1818 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के चार्ल्स मेटकॉफ के साथ संधि की, पर जल्द ही उनका निधन हो गया; कर्नल जेम्स टॉड 1819 ई. में जोधपुर आए, और बढ़ते अंग्रेजी प्रभाव के बीच 7 दिसम्बर 1835 ई. को जोधपुर लीजियन का गठन हुआ।
- बीमार पड़ने पर 4 सितम्बर 1843 ई. को मंडोर में मानसिंह का निधन हुआ; उनके दरबारी कवि बाँकीदास ने 'जोधपुर राज्य की ख्यात' व 'मानजसोमंडन' रचे, वहीं मानसिंह ने स्वयं 'नाथचरित्र' व 'जालंधरचरित' जैसे नाथ-सम्प्रदाय ग्रंथ लिखे।
🏇महाराजा तख्तसिंह (1843-1873 ई.): गोद और 1857 का विद्रोह
- अजीतसिंह के वंशज और ईडर राज्य में अहमदनगर के स्वामी तख्तसिंह को मानसिंह की निःसंतान मृत्यु पर अंग्रेज सरकार की इच्छा से गोद लिया गया; 1 दिसंबर 1843 ई. को पॉलिटिकल एजेंट लुडलो की उपस्थिति में उनका राज्याभिषेक हुआ, और 1850 ई. में उन्होंने राजा की अनुमति के बिना दिए गए सामंती भूमि-दान अवैध घोषित कर दिए।
- 1857 ई. के विद्रोह में तख्तसिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया और मैकमेसन के आदेश पर अजमेर अश्वारोही सेना भेजी; पर कुशलराज व विजयमल मेहता के नेतृत्व में बिथौड़ा भेजी गई उनकी सेना को ठाकुर कुशालसिंह के क्रांतिकारियों ने हरा दिया, जिसमें उनके दो सेनानायक मारे गए।
- 1862 ई. में गोद लेने का अधिकार और 1866 ई. में लॉर्ड लॉरेंस से जीसीआईई पदक पाने वाले तख्तसिंह ने 1870 ई. में अंग्रेजों के साथ नमक की संधि भी की, और जोधपुर दुर्ग में चामुण्डा माता मंदिर तथा बालसमंद-कायलाना के महल बनवाए।
🚂जसवंतसिंह द्वितीय (1873-1895 ई.): रेलवे, सुधार और 'नहीं जान' प्रसंग
- 1 मार्च 1873 ई. को शासक बने और प्रिंस ऑफ वेल्स से जीसीएसआई पाने वाले जसवंतसिंह द्वितीय ने 1878 ई. में राजपूताना-मालवा रेलवे के लिए जमीन दान की; उनके शासनकाल में जोधपुर की पहली जनगणना (1881 ई.), स्वामी दयानंद सरस्वती व आर्य समाज का आगमन (1883 ई.), नगरपालिका (1884 ई.) और बालविवाह प्रतिबंध (1885 ई.) हुए।
- उनके शासन में एक कलुषित प्रसंग जुड़ा — नृत्यांगना नहीं जान, जो स्वामी दयानंद द्वारा सार्वजनिक रूप से महाराजा को उनके साथ रहने पर फटकारे जाने से अपमानित महसूस कर रही थीं, ने बदले की भावना से स्वामीजी के दूध में विष मिला दिया, जिससे 30 अक्टूबर 1883 ई. को अजमेर में उनका निधन हो गया।
🏇सरदारसिंह (1895-1911 ई.): 'पोलो का घर'
- अक्टूबर 1895 ई. में गद्दी संभालने वाले सरदारसिंह के पोलो के शौक ने जोधपुर को 'पोलो का घर' की स्थायी पहचान दी; बॉक्सर विद्रोह में उनकी सेना की सेवा ने मारवाड़ के झंडे को 'चाइना-1900' अंकित करने का सम्मान दिलाया।
- उनके शासनकाल में 1905 ई. में सरदार समंद बाँध बना, हेमावास बाँध का काम शुरू हुआ, 1910 ई. में राजस्थान की पहली वन-संरक्षण योजना बनी, पहली टेलीफोन सेवा शुरू हुई, और असहायों के लिए एडवर्ड रिलीफ फण्ड बना — 20 मार्च 1911 ई. को उनका निधन हुआ।
✈️सुमेरसिंह (1911-1918 ई.): युद्ध, सुधार और असामयिक मृत्यु
- 5 अप्रैल 1911 ई. को उत्तराधिकारी बने सुमेरसिंह ने उसी वर्ष जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक व दिल्ली दरबार में भाग लिया, अक्टूबर 1912 ई. में जोधपुर का चीफ कोर्ट स्थापित किया, और 1913 ई. में मदनमोहन मालवीय के आने पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को बड़ी धनराशि देने का वचन दिया।
- प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की सहायता हेतु वे स्वयं लंदन गए, और उन्हें मिस्र के 'ग्रांड कॉर्डन ऑफ दी ऑर्डर ऑफ दी नाइल' के साथ जीसीबी व लेफ्टिनेंट जनरल के पद से भी सम्मानित किया गया; उन्होंने सरदार म्यूजियम (1917 ई.) और सुमेर कैमल कोर की स्थापना की, इससे पहले कि लगभग 21 वर्ष की आयु में 3 अक्टूबर 1918 ई. को इन्फ्लूएंजा से उनका निधन हो गया।
🏛️उम्मेदसिंह (1918-1947 ई.): स्वतंत्रता से पहले आधुनिकीकरण
- मेयो कॉलेज से शिक्षित उम्मेदसिंह के समय प्रथम विश्वयुद्ध में सहयोग के उपलक्ष्य में 1921 ई. में जोधपुर की सलामी तोपों की संख्या 17 से बढ़ाकर 19 की गई, और वे 1921 ई. में नरेन्द्र मंडल के उद्घाटन में शामिल हुए; उन्होंने विंडम अस्पताल (अब महात्मा गांधी अस्पताल) बनवाया और 1927 ई. में इम्पीरियल बैंक की शाखा खोली।
- उनकी सबसे विख्यात विरासत छीतर पहाड़ी पर बना उम्मेद भवन पैलेस है, जिसे 1929 से 1943 ई. के बीच इंडो-डेको शैली में अकाल-राहत रोजगार परियोजना के रूप में विद्याधर भट्टाचार्य व सर सैमुअल स्विंटन जैकब की डिज़ाइन और इंजीनियर हेनरी वॉगन लैंचेस्टर की देखरेख में बनवाया गया; उन्होंने जयनारायण व्यास को मारवाड़ की ओर से संविधान सभा का प्रतिनिधि नियुक्त किया और 9 जून 1947 ई. को माउंट आबू में उनका निधन हो गया।
🇮🇳हनुवन्तसिंह और राजस्थान में विलय (1947-1949 ई.)
- 21 जून 1947 ई. को शासक बने हनुवन्तसिंह ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना व भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खाँ से बातचीत कर जोधपुर को स्वतंत्र रखने का संक्षिप्त प्रयास किया, इससे पहले कि 14 जनवरी 1949 ई. को जोधपुर वृहत् राजस्थान में विलीन हो गया — उन्हीं के शासनकाल में जोधपुर राज्य का आधुनिक राजस्थान में ऐतिहासिक विलय हुआ।
- महाराजा हनुवन्तसिंह का 26 जनवरी 1952 ई. को एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया।
🎨मारवाड़ की विरासत और किशनगढ़ की शाखा
- मारवाड़ की राठौड़ राजधानियाँ क्रमशः गूंदोज (पाली) से खेड़-महेवा, मंडोर और अंततः जोधपुर तक बदलती रहीं; यहाँ सामंतों को राजवी, सरदार, गिनायत और मुत्सदी श्रेणियों में बाँटा जाता था, और समूचे राठौड़ वंश को आज भी राजस्थान भर में 'रणबंका राठौड़' के उपनाम से याद किया जाता है।
- जोधपुर वन-संरक्षण योजना लागू करने वाली पहली रियासत थी, और साँभर की नमक झील पर जयपुर के साथ इसका साझा अधिकार था; एक संबंधित पर अलग राठौड़ वंश-शाखा भी पास ही फली-फूली — किशनगढ़, जिसे 1609 ई. में उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने स्थापित किया, अपनी विशिष्ट लघुचित्रकला शैली और मूर्तिमान प्रेरणा बणी-ठणी (चित्रकार निहालचंद द्वारा चित्रित, और भारत की 'मोनालिसा' के रूप में विख्यात) के लिए मशहूर हुआ, इससे पहले कि 25 मार्च 1948 ई. को वह भी राजस्थान संघ में विलीन हो गया।