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राजस्थान GK

गुहिल वंश का इतिहास

History of the Guhil Dynasty

गुहादित्य की 6ठी सदी की नींव से लेकर बापा रावल की चित्तौड़ विजय, कुंभा-सांगा-प्रताप के संघर्ष और 1948 के विलय तक — मेवाड़ पर सहस्राब्दी भर शासन करने वाले एक अनूठे राजवंश की पूरी कहानी।

50 टॉपिक62 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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उद्गम और प्रारंभिक गुहिल शासक

Origins and the Early Guhil Rulers

अनिश्चित उत्पत्ति वाले एक नाम से लेकर एक ही भूभाग पर सहस्राब्दी भर शासन करने वाले वंश तक — गुहादित्य की छठी सदी की नींव से बापा रावल की चित्तौड़ विजय और जैत्रसिंह के स्वर्णकाल तक गुहिलों के उत्थान की यात्रा।

🏔️प्राचीन मेवाड़ और उसके आदर्श

  • उदयपुर-मेवाड़ का यह भूभाग प्राचीन काल में शिवि, प्राग्वाट और बाद में मेदपाट नाम से जाना जाता था — यह नाम मेद (मेव/मेर) जाति के इस क्षेत्र पर प्रभुत्व से पड़ा।
  • मेवाड़ में आज के चित्तौड़गढ़, उदयपुर, सलूम्बर, राजसमंद, भीलवाड़ा, डूँगरपुर और प्रतापगढ़ का क्षेत्र आता था, और गुहिल वंश ने 7वीं सदी से स्वतंत्रता तक लगभग निर्बाध शासन किया — इतिहासकार इसे किसी एक वंश के एक ही भूभाग पर सबसे लंबे शासन का अनूठा उदाहरण मानते हैं।
  • शिलालेखों में मेवाड़ के शासकों की वंशावली गुहिल (गुहादित्य) से शुरू होती है, और उनके महाराणा 'हिन्दुआ सूरज' की गरिमामयी उपाधि धारण करते थे; राज्य का आदर्श वाक्य था कि जो धर्म की रक्षा करता है, ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करता है।
  • 13वीं सदी के आरम्भ तक गुहिल शासन में मेवाड़ राजस्थान का सबसे प्रमुख राज्य बन चुका था, और राजपूताने की रियासतों में यह अकेला राज्य था जो अकबर के समय भी मुगलों के अधीन नहीं आया।

🌳गुहिल वंश की शाखाएँ और उत्पत्ति के मत

  • गुहिल कुल की शाखाओं की गणना उदारता से की गई है — कर्नल जेम्स टॉड व मुहणोत नैणसी 24 शाखाएँ गिनाते हैं तो कविराज श्यामलदास 36; इनमें कल्याणपुर के गुहिल तथा चाटसू शाखा (जिससे कवि ईशान भट्ट जुड़े थे) भी शामिल हैं।
  • गुहिलों की उत्पत्ति पर विद्वानों में गहरा मतभेद है — अबुल फजल उन्हें ईरान के नौशेखाँ का वंशज बताते हैं, ओझा उन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं, भण्डारकर व गोपीनाथ शर्मा उन्हें ब्राह्मण वंश का बताते हैं, जबकि टॉड उन्हें वल्लभी के शासकों से जोड़ते हैं।

👑गुहिल (गुहादित्य) — मूल पुरुष

  • मेवाड़ के सुसंगत इतिहास की शुरुआत गुहिल (गुहादित्य) से होती है; सामोली शिलालेख के अनुसार लगभग 566 ई. में उन्होंने वंश की नींव रखी, जबकि किंवदंती उन्हें भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज बताती है, जिनके पिता शिलादित्य व माता पुष्पावती थीं और पालन-पोषण कमलावती ने किया।
  • बाद के अभिलेख — शक्तिकुमार का आहड़ लेख (977 ई.) और कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) — बताते हैं कि गुहिल वास्तव में गुजरात के आनंदपुर से मेवाड़ आकर बसे थे; गुहिल के बाद भोज, महेन्द्र और नाग जैसे अल्पज्ञात शासक हुए, और नागादित्य ने वंश की प्रारम्भिक राजधानी नागदा बसाई।

⚔️बापा रावल — वास्तविक संस्थापक

  • कालभोज, जो बापा या बप्पा रावल के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, गुहिल सत्ता के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं; अपने आराध्य एकलिंगजी के मुख्य पुजारी हारीत ऋषि के आशीर्वाद से उन्होंने 734 ई. में मौर्य शासक मानमोरी को मारकर चित्तौड़ दुर्ग जीता, फिर एकलिंगजी को ही राजा घोषित कर स्वयं को उनका दीवान बताया।
  • स्वयं बापा की पहचान पर भी विद्वानों में मतभेद है — टॉड उन्हें शील मानते हैं, श्यामलदास के अनुसार 'बापा' शील के पौत्र महेन्द्र की एक उपाधि मात्र थी, भण्डारकर खुम्माण को बापा बताते हैं, तो ओझा के मत में बापा कालभोज की ही उपाधि थी; फिर भी अभिलेख उन्हें 'सूर्य के समान तेजस्वी' व वंश का 'मुकुटमणि' कहते हैं।
  • इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने बापा रावल की तुलना चार्ल्स मार्टेल — यूरोप में मुसलमानों को सबसे पहले रोकने वाले फ्रांसीसी सेनापति — से की है; उनके काल के स्वर्ण व ताँबे के सिक्के मिले हैं, जिनमें स्वर्ण सिक्कों का वजन 115 ग्रेन है।
  • नागदा से शासन करते हुए बापा रावल ने 753 ई. में संन्यास लेकर राजगद्दी अपने पुत्र खुमाण को सौंप दी; उनका देहान्त नागदा में हुआ और एकलिंगजी (कैलाशपुरी) से एक मील दूर स्थित उनका समाधि स्थल आज भी 'बापा रावल का मंदिर' कहलाता है।

🛡️खुम्माण से अल्लट तक

  • कई कमजोर उत्तराधिकारियों के बाद खुम्माण तृतीय (877-926 ई.) ने मेवाड़ का गौरव फिर से स्थापित किया; कुंभलगढ़ प्रशस्ति उन्हें अंग, कलिंग, सौराष्ट्र, तैलंग, द्रविड़ व गौड़ तक के विजेता के रूप में दिखाती है, और उनके उत्तराधिकारी भर्तृभट्ट ने राष्ट्रकूट राजकुमारी से विवाह किया।
  • बापा रावल के वंशज अल्लट ने 10वीं सदी में मेवाड़ पर शासन करते हुए आहड़ को दूसरी राजधानी बनाया, मुख्यमंत्री, संधि विग्राहिक व अक्षपटलिक जैसे पदों वाला मेवाड़ का पहला सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र गठित किया, और राष्ट्रकूटों की सहायता से परमारों को हराकर हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह भी किया।
  • अल्लट के काल में ही उदयपुर के निकट जगत ग्राम में अम्बिका माता का मंदिर बना, जिसकी समृद्ध शिल्पकला के कारण इसे 'मेवाड़ का खजुराहो' कहा जाता है।

📉पतन, बाह्य अधीनता और पुनरुत्थान

  • अल्लट के पुत्र नरवाहन का काल नागदा के लकुलीश मंदिर से मिले 971 ई. के लेख से पुष्ट होता है, और उन्होंने चौहान राजकुमारी से विवाह किया, किंतु उनके बाद से ही गुहिल सत्ता का क्षय स्पष्ट दिखने लगा।
  • शक्तिकुमार (977-993 ई.) के समय मालवा के परमार शासक मुंज ने चित्तौड़गढ़ व आहड़ पर सीधा अधिकार जमा लिया, और मुंज के भतीजे भोज परमार ने ही चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण शिव मंदिर बनवाया, जो आगे समिद्धेश्वर मंदिर कहलाया।
  • 11वीं सदी के आरम्भ तक मेवाड़ परमारों के अधीन रहा, फिर चालुक्य राजा सिद्धराज ने परमारों से मालवा व मेवाड़ का बड़ा भाग छीन लिया, और कुछ समय के लिए मेवाड़ पर चौहानों का शासन भी रहा।

🔀रावल-राणा विभाजन और सामंतसिंह

  • गुहिल शासक रणसिंह (कर्णसिंह) ने 1158 ई. में मेवाड़ पर अधिकार कर आहोर की पहाड़ी पर दुर्ग बनवाया, और उनके दो पुत्रों ने मेवाड़ का भावी स्वरूप गढ़ा — पुत्र क्षेमसिंह ने रावल शाखा की नींव रखी, तो दूसरे पुत्र राहप ने सीसोदा गाँव बसाकर वह शाखा शुरू की जो आगे सिसोदिया कहलाई।
  • क्षेमसिंह के पुत्र सामंतसिंह (1172-78 ई.) ने चौहान राजकुमारी से विवाह किया, पर 1177 ई. के आसपास नाडोल के चौहान शासक कीर्तिपाल ने उन्हें मेवाड़ से बेदखल कर दिया; सामंतसिंह ने वागड़ के शासक चोरसीमल को हराकर 1178 ई. के आसपास वहाँ नए गुहिल राज्य (आगे चलकर डूँगरपुर) की नींव रखी, जबकि क्षेमसिंह के छोटे पुत्र कुमारसिंह ने 1179 ई. के लगभग कीर्तिपाल को हराकर मेवाड़ फिर से हासिल कर लिया।

🏆जैत्रसिंह का स्वर्णकाल

  • कुमारसिंह के वंशज रावल जैत्रसिंह (शासनकाल लगभग 1213-1250/53 ई.) ने मेवाड़ की राजधानी नागदा से पहले आहड़ और फिर चित्रकूट (चित्तौड़) स्थानांतरित की, जबकि इसी दौर में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने 1222-1229 ई. के बीच नागदा पर आक्रमण भी किया।
  • 'हम्मीर मद मर्दन' ग्रन्थ के अनुसार जैत्रसिंह ने 1227 ई. के 'भूताला के युद्ध' में इल्तुतमिश को हराया, बाद में 1248 ई. में सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद की सेना को भी परास्त किया, और आबू शिलालेख के अनुसार अन्हिलवाड़ा की ओर बढ़ रही खवास खाँ की सेना को भी रोक दिया।
  • उन्होंने नाडोल के चौहान कीतू द्वारा पूर्व में मेवाड़ हथियाने का बदला नाडोल पर चढ़ाई कर लिया, जिसे नाडोल के उदयसिंह ने अपनी पौत्री रूपादेवी का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह से करवाकर शांत किया; दशरथ शर्मा व गौरीशंकर ओझा जैसे विद्वान जैत्रसिंह को मध्यकालीन मेवाड़ के सर्वाधिक प्रतापी राजाओं में गिनते हैं, जिनकी वीरता की प्रशंसा शत्रुओं ने भी की।

📜तेजसिंह व समरसिंह

  • तेजसिंह (शासनकाल लगभग 1250-1273 ई.) ने दिल्ली के बलबन (लगभग 1253-54) व धौलका के वीरधवल (लगभग 1260) के आक्रमण झेले; उनकी रानी जयतल्ल देवी ने चित्तौड़ में श्याम पार्श्वनाथ मंदिर बनवाया, और विद्वान कमलचन्द ने 1260 ई. में आहड़ में 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' ग्रन्थ रचा।
  • उनके पुत्र समरसिंह (शासनकाल 1273-1302 ई.) के काल के आठ शिलालेख मिले हैं; उन्होंने आचार्य अमितसिंह सूरि की सलाह पर अपने राज्य में जीव-हिंसा पर रोक लगाई, और उनके दरबार में रत्नप्रभ सूरि जैसे विद्वान तथा कर्मसिंह-पद्मसिंह जैसे कुशल शिल्पी रहते थे।
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चित्तौड़ के साके और सिसोदिया वंश का उदय

Sakas of Chittor and the Rise of the Sisodias

जौहर और बलिदान, पुनरुत्थान और स्वर्णकाल — पद्मिनी की अग्नि, हम्मीर की पुनर्विजय, कुंभा के अपराजित शासन और बाबर के विरुद्ध सांगा के अंतिम संघर्ष तक मेवाड़ की यह यात्रा।

👸रावल रतनसिंह और रानी पद्मिनी

  • समरसिंह के दो पुत्रों ने अलग-अलग राहें चुनीं — कुंभकर्ण नेपाल जाकर वहाँ गुहिल वंश की नींव डाल आए, जबकि रतनसिंह मेवाड़ में शासन करने रुके।
  • मलिक मोहम्मद जायसी के 1540 ई. के महाकाव्य 'पद्मावत' के अनुसार रतनसिंह की रानी पद्मिनी सिंहल देश के राजा गंधर्वसेन की पुत्री थीं, जो अपनी असाधारण सुंदरता के लिए विख्यात थीं।

🔥चित्तौड़ का प्रथम साका

  • दिल्ली के अलाउद्दीन खिलजी ने 28 जनवरी 1303 ई. को चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी शुरू की और 26 अगस्त 1303 ई. को दुर्ग जीत लिया; रावल रतनसिंह हजारों योद्धाओं के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, और रानी पद्मिनी ने दुर्ग की 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया — इस रक्षा में पद्मिनी के परिजन गोरा व बादल भी वीरगति को प्राप्त हुए।
  • अलाउद्दीन की महत्त्वाकांक्षा, चित्तौड़ का सामरिक महत्त्व और — 'पद्मावत' के अनुसार — स्वयं पद्मिनी को पाने की लालसा, इस आक्रमण के कारण गिनाए जाते हैं; बाद में अलाउद्दीन ने किला अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपकर उसका नाम खिज्राबाद रखा, जिसने लगभग 1313-15 ई. तक मेवाड़ पर शासन किया, इसके बाद चित्तौड़ मालदेव सोनगरा के पास चला गया।
  • अलाउद्दीन के साथ रहे कवि-इतिहासकार अमीर खुसरो ने इस घेराबंदी का वर्णन 'खजाइन-उल-फुतूह' में किया; दुर्ग के निकट मिले 1310 ई. के एक फारसी अभिलेख में अलाउद्दीन को 'दूसरा सिकन्दर' कहा गया है। रतनसिंह की मृत्यु के साथ ही गुहिलों की रावल शाखा समाप्त हो गई।

🦁सिसोदिया वंश का उदय और हम्मीर

  • पीढ़ियों पहले राहप द्वारा शुरू की गई सीसोदा शाखा — जो नरपति, जसकरण, पृथ्वीमल्ल जैसे उत्तराधिकारियों से होते हुए अरिसिंह तक पहुँची — अब आगे आई; सिसोदिया वंश की कुलदेवी बाणमाता थीं।
  • 1326 ई. में राणा अरिसिंह के पुत्र हम्मीर ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के काल में जैसा (मालदेव सोनगरा के पुत्र) को हराकर चित्तौड़ पुनः जीता और सिसोदिया नाम से गुहिल सत्ता की पुनर्स्थापना की — इसीलिए उन्हें मेवाड़ का मुक्तिदाता कहा जाता है, और उनके समय से ही शासक 'महाराणा' उपाधि धारण करने लगे।
  • हम्मीर ने सिंगोली (बाँसवाड़ा) के युद्ध में मुहम्मद बिन तुगलक की सेना को हराया और चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता मंदिर बनवाया; कुंभा के स्वयं के लेखन में उन्हें 'विषम घाटी पंचानन' — विकट आक्रमणों में सिंह के समान — कहा गया है, उनका देहान्त 1364 ई. में हुआ।

🗡️क्षेत्रसिंह और लाखा

  • हम्मीर के पुत्र क्षेत्रसिंह (खेता) ने मालवा के सुल्तान दिलावर खाँ गौरी को हराया और हाड़ौती के हाड़ा शासकों को दबाया, पर 1382 ई. में बूँदी अभियान के दौरान वे मारे गए।
  • महाराणा लाखा के बड़े पुत्र कुँवर चूँडा ने प्रसिद्ध रूप से अपना उत्तराधिकार त्यागकर राज्य हँसाबाई की भावी संतान को सौंपने की प्रतिज्ञा की — इसी कारण वे 'मेवाड़ के भीष्म पितामह' कहलाए, और आगे से हर राजकीय पट्टे पर उनके भाले के निशान की मुहर लगाने का नियम बना, जिससे चूँडावत शाखा उपजी।
  • लाखा की प्रतिज्ञा थी कि जब तक वे बूँदी के किले को मिट्टी में नहीं मिला देंगे, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।

🏛️महाराणा मोकल

  • लाखा की मृत्यु (1421 ई.) के बाद चूँडा ने स्वयं मोकल को गद्दी पर बैठाया, हालाँकि हँसाबाई के चूँडा पर निराधार संदेह और उनके भाई रणमल के मेवाड़ में बढ़ते प्रभुत्व से व्यथित होकर चूँडा माँडू सुल्तान की सेवा में चले गए।
  • मोकल ने एकलिंगजी मंदिर के चारों ओर परकोटे का निर्माण करवाया, समिद्धेश्वर (त्रिभुवन नारायण) मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, और द्वारिकानाथ मंदिर बनवाया; 1428 ई. में उन्होंने रामपुरा के युद्ध में नागौर के फिरोज खाँ को हराया।
  • 1433 ई. में जीलवाड़ा नामक स्थान पर मोकल की हत्या क्षेत्रसिंह की पासवान रानी के पुत्रों चाचा व मेरा ने महपा पँवार के साथ मिलकर की।

⚔️कुंभा की सैन्य विजयें

  • गद्दी संभालते ही युवा कुंभा के सामने दो तात्कालिक कार्य थे — पिता के हत्यारों चाचा व मेरा को दंड देना, और अपने बड़े-दादा रणमल राठौड़ के प्रभाव पर अंकुश लगाना; 1438 ई. में उन्होंने अपने सरदारों से रणमल की हत्या करवा दी, और मेवाड़ में सुव्यवस्थित रूप से गुरिल्ला युद्ध पद्धति अपनाने वाले पहले शासक बने (आगे चलकर महाराणा प्रताप ने भी यही रणनीति अपनाई)।
  • 1437 ई. में कुंभा ने मालवा पर आक्रमण कर सारंगपुर के निकट सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम को करारी हार दी — इसका तात्कालिक कारण महपा पँवार को सौंपने से मालवा का इनकार था — पराजित सुल्तान को बंदी बनाकर मेवाड़ भी लाया गया, जैसा कुंभलगढ़ प्रशस्ति में दर्ज है; इसी विजय की स्मृति में उन्होंने चित्तौड़ में विशाल विजय स्तम्भ बनवाया।
  • रणमल की मृत्यु के बाद कुंभा की सेना ने उनके पुत्र राव जोधा का पीछा मंडोर तक किया; 1453 ई. में दादी हँसाबाई के आग्रह पर राव जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से करवाकर शांति स्थापित की, और मेवाड़-मारवाड़ की सीमा सोजत पर तय हुई।
  • मेवाड़-गुजरात के लगातार तनाव — जो कुंभा द्वारा नागौर उत्तराधिकार विवाद में शम्स खाँ का पक्ष लेने से और बढ़ा — में गुजरात के कुतुबुद्दीन को नागौर के निकट पराजय मिली; कुंभा को परास्त करने हेतु मालवा के महमूद खिलजी के साथ उसकी 1456 ई. की 'चंपानेर की संधि' भी असफल रही।
  • 'वीर विनोद' के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से अकेले 32 का निर्माण कुंभा ने करवाया; उन्होंने 'मेवाड़ की आँख' कहे जाने वाले कुंभलगढ़ को अपना निवास स्थान बनाया।

🕌कुंभा का सांस्कृतिक पुनरुत्थान

  • राजस्थान का 15वीं सदी का सांस्कृतिक पुनरुत्थान कुंभा के शासनकाल से जुड़ा है: उन्होंने कुंभश्याम मंदिर (1448 ई.) व आदिवराह मंदिर (1459 ई.) बनवाए, एकलिंगजी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और उसकी व्यवस्था हेतु गाँव दान किए; उनके कोषाध्यक्ष के पुत्र भण्डारी वेलका ने जैन-शैली के गुंबद वाला अलंकृत श्रृंगार चँवरी मंदिर बनवाया।
  • व्यापारी धरणक द्वारा बनवाए गए और शिल्पी देपाक के निर्देशन में बने चौमुखा मंदिर सहित रणकपुर के जैन मंदिर (1439 ई.) भी कुंभा के काल के हैं; डॉ. डी.आर. भण्डारकर के अनुसार कुंभा ने मंदिर-निर्माण में सुरक्षा व धार्मिक भावना का सामंजस्य बैठाकर एक नई स्थापत्य चेतना को जन्म दिया।
  • कुंभा की चतुर्विध विरासत — स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला व जलाशय — का शिखर विजय स्तम्भ है, जिसकी मेवाड़ी भाषा की प्रशस्ति अत्रि व उनके पुत्र महेश ने रची; विद्वानों ने इसे 'हिन्दू देवी-देवताओं से सजा व्यवस्थित संग्रहालय' (गोपीनाथ शर्मा), रोम के 'ट्राजन स्तम्भ' (फर्ग्यूसन) व दिल्ली की कुतुबमीनार (टॉड) से भी श्रेष्ठ बताया है।
  • क्रांतिकारी संगठन अभिनव भारत समिति के सदस्य विजय स्तम्भ के नीचे ही मुक्ति संग्राम की शपथ लेते थे; यह डाक टिकट (15 अगस्त 1949 का 1 रुपए का टिकट) पर अंकित होने वाली राजस्थान की पहली इमारत बनी और आज भी राजस्थान पुलिस का प्रतीक चिह्न है।

🎵विद्वान कुंभा — उनका अंत और विरासत

  • एक विपुल लेखक के रूप में कुंभा ने संगीतराज रचा — उनका सबसे बड़ा ग्रन्थ, जो पाँच 'रत्नकोश' खंडों (पाठ्य, नृत्य, गीत, वाद्य, रस) में बँटा है — साथ ही चंडीशतक, गीत गोविंद ('रसिक प्रिया') व संगीत रत्नाकर पर टीकाएँ भी लिखीं; वे प्राकृत, संस्कृत, कर्नाटकी, मेदपाटी व महाराष्ट्री भाषाओं के ज्ञाता थे, वीणावादन में निपुण थे, और नाट्यशास्त्र के ज्ञान के कारण 'नव्यभरत' कहलाए।
  • उनके शिल्पी मंडन ने आवासीय भवनों पर केंद्रित राजवल्लभ मंडन सहित कई स्थापत्य-ग्रन्थ रचे; उनकी पुत्री रमाबाई स्वयं संगीतशास्त्र की ज्ञाता थीं और वागेश्वरी नाम से जानी जाती थीं।
  • जीवन के अंतिम वर्षों में कुंभा उन्माद रोग से ग्रस्त हो गए, और 1468 ई. में उनके ही पुत्र उदा ने कुंभलगढ़ दुर्ग में मामादेव कुंड के निकट उनकी हत्या कर दी; फिर भी इतिहास उन्हें ऐसे शासक के रूप में याद करता है जो कभी कोई बड़ा युद्ध नहीं हारे — टॉड के अनुसार उनमें हम्मीर का बल व लाखा का कला-प्रेम दोनों थे, जबकि हरविलास शारदा ने उन्हें एक साथ महान शासक, सेनाध्यक्ष, निर्माता व विद्वान बताया।

👥उदा और रायमल

  • अपने ही पिता कुंभा की हत्या के लिए मेवाड़ का 'पितृहन्ता शासक' कहलाने वाले महाराणा उदा की मृत्यु माँडू में बिजली गिरने से हुई।
  • कुंभा के दूसरे पुत्र रायमल ने उदा के बाद गद्दी संभाली, चित्तौड़ में अद्भुतनाथ मंदिर बनवाया, और उनकी रानी श्रृंगार देवी ने घोसुण्डी की बावड़ी बनवाई; उनके शासनकाल में माँडू के सुल्तान ग्यासशाह के दो-तीन आक्रमण असफल रहे, और उनके दरबार में गोपाल भट्ट व महेश भट्ट जैसे विद्वान तथा शिल्पी अर्जुन रहते थे।

👑महाराणा सांगा का राज्यारोहण

  • रायमल की ग्यारह रानियों से उन्हें 13 पुत्र हुए; ज्येष्ठ पृथ्वीराज व द्वितीय जयमल के बाद सांगा (जन्म 12 अप्रैल 1482 ई.) थे, जो भाइयों के बीच उत्तराधिकार-युद्ध के बाद 24 मई 1509 ई. को मेवाड़ के शासक बने।
  • 'हिन्दूपत' के नाम से जाने जाने वाले सांगा को 'अंतिम भारतीय हिन्दू सम्राट' के रूप में स्मरण किया जाता है; टॉड ने उन्हें प्रसिद्ध रूप से 'सैनिक का भग्नावशेष, सिपाही का अंश' कहा — उनके शरीर पर लगे अनगिनत घावों की ओर इशारा करते हुए।

🐴सांगा के क्षेत्रीय अभियान

  • सांगा ने 1517 ई. के खातोली (कोटा) युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर उसके पुत्र को बंदी बनाया — यद्यपि इस युद्ध में वे स्वयं लंगड़े हो गए — और 1518 ई. में बाड़ी (धौलपुर) में मियाँ माखन के नेतृत्व वाली लोदी सेना को फिर परास्त किया।
  • 1519 ई. में गागरोन (झालावाड़) में उन्होंने महमूद खिलजी द्वितीय को हराया — और उसे बंदी बनाने की खुशी में चारण हरिदास को अपना पूरा राज्य भेंट कर दिया, जिसे हरिदास ने विनम्रता से ठुकराकर केवल 12 गाँव स्वीकार किए; इसी युद्ध में मेवाड़ ने पहली बार रक्षात्मक से आक्रामक युद्ध-नीति अपनाई, जिससे सांगा को भिलसा व रायसेन क्षेत्र भी मिले।

💥सांगा बनाम बाबर — खानवा का युद्ध

  • दिल्ली के इब्राहिम लोदी को प्रथम पानीपत युद्ध (20 अप्रैल 1526 ई.) में हराकर बाबर ने दिल्ली में मुगल सत्ता की नींव रखी; सांगा ने पहले बयाना (16 फरवरी 1527 ई.) में उसे हराकर गवर्नर मेहँदी ख्वाजा से दुर्ग छीना, पर बढ़त का लाभ तुरंत नहीं उठाया — जिससे बाबर को तैयारी का समय मिल गया, और रायसीन के सिलहदी तँवर के जरिए भेजे शांति-प्रस्ताव के विफल होने पर उसने आगामी युद्ध को जिहाद घोषित कर दिया।
  • खानवा (17 मार्च 1527 ई.) में सांगा की सेना — 7 राजा, 9 राव व 104 सामंत, जिसमें टॉड के अनुसार हसन खाँ मेवाती अकेले मुस्लिम सहयोगी थे — बाबर की तोपों, बंदूकों व 'तुलुगमा' युद्ध-रणनीति के आगे टिक न सकी, और रायसीन के सिलहदी तँवर व नागौर के खानजादा के युद्ध के बीच में ही पाला बदलने से स्थिति और बिगड़ गई; बाबर ने बाद में अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-बाबरी' में खानवा को अपने जीवन का 'काला दाग' बताया।
  • गंभीर रूप से घायल सांगा को पृथ्वीराज ले गए — उनकी जगह सादड़ी के झाला अज्जा ने मोर्चा संभाला — और अंततः एरिच गाँव में उन्हीं के राजपूत साथियों ने उन्हें विष दे दिया; कालपी में 30 जनवरी 1528 ई. को उनका देहान्त हुआ, और उनकी छतरी मांडलगढ़ में है, जिसे जगनेर के अशोक परमार ने बनवाया।

🎼सांगा का परिवार और विरासत

  • सांगा के पुत्र भोजराज ने 1511 ई. में मेड़ता के रतनसिंह की पुत्री मीराबाई — जिन्हें 'राजस्थान की राधा' कहा जाता है — से विवाह किया; भोजराज की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी द्वारा प्रताड़ित किए जाने से क्षुब्ध होकर मीरा ने अंततः मेवाड़ छोड़ दिया, जबकि भोजराज स्वयं खानवा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
  • सांगा के नेतृत्व में लगभग सभी राजपूत जातियाँ विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध एकजुट हुईं, और उनके राज्य की सीमा आगरा के निकट पीलिया खाल तक फैली — इसी एकता व विस्तार ने उन्हें मुगल-पूर्व भारत के अंतिम महान हिन्दू सम्राट का दर्जा दिलाया।
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उदयसिंह और महाराणा प्रताप — मुगलों का प्रतिरोध

Udai Singh and Maharana Pratap — Resistance to the Mughals

चित्तौड़ के द्वितीय-तृतीय जौहर से लेकर हल्दीघाटी और उसके बाद के लंबे छापामार संघर्ष तक — वह दौर जब मेवाड़ ने किसी भी कीमत पर अकबर के साम्राज्य के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया।

🔥विक्रमादित्य और चित्तौड़ का द्वितीय साका

  • सांगा के पुत्र रतनसिंह की बूँदी के सूर्यमल से निजी द्वंद्व में मृत्यु (1531 ई.) के बाद निःसंतान होने के कारण छोटे भाई विक्रमादित्य ने गद्दी संभाली; विधवा मीराबाई के साथ उनके दुर्व्यवहार ने उन्हें मेवाड़ छोड़ने पर मजबूर किया, और 1533 ई. में रानी कर्मावती को गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण को संधि से टालना पड़ा।
  • 1534 ई. में बहादुरशाह के फिर लौटने पर विक्रमादित्य को बूँदी भेज दिया गया और मोर्चा देवलिया के रावत बाघसिंह को सौंपा गया, जो पाडनपोल दरवाजे के बाहर लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; इसके बाद 8 मार्च 1535 ई. को रानी कर्मावती ने 1300 महिलाओं के साथ जौहर किया — यही चित्तौड़ का द्वितीय साका कहलाता है।

🛡️बनवीर की सत्ता-हड़प और पन्नाधाय का बलिदान

  • 1536 ई. में बनवीर — रायमल के कुँवर पृथ्वीराज के अनौरस पुत्र — ने विक्रमादित्य की हत्या कर गद्दी हथिया ली, 1540 ई. तक मेवाड़ पर शासन किया और चित्तौड़गढ़ में नौकोठा (नवलखा) महल बनवाया।
  • शिशु उदयसिंह को बनवीर की तलवार से बचाने के लिए धाय माँ पन्नाधाय ने अपने ही पुत्र चंदन का बलिदान दिया और राजकुमार को कुंभलगढ़ के किलेदार आशा देवपुरा के पास पहुँचा दिया — मेवाड़ लोककथा के सबसे मार्मिक स्वामिभक्ति-प्रसंगों में से एक।

🏙️उदयसिंह और उदयपुर की स्थापना

  • सरदारों ने 1537 ई. में कुंभलगढ़ में उदयसिंह का राज्याभिषेक किया, और 1540 ई. में उन्होंने अपनी पैतृक मेवाड़ गद्दी संभाली; उदयसिंह के शासनकाल में शेरशाह सूरी ने ख्वास खाँ को चित्तौड़ में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया, और 1557 ई. में उदयसिंह ने हाजी खाँ के विरुद्ध हरमाड़ा का युद्ध लड़ा।
  • 1559 ई. में उदयसिंह ने उदयपुर नगर बसाया और उसी वर्ष उदयसागर झील का निर्माण भी शुरू करवाया (पूर्ण 1565 ई.); धाय माँ पन्नाधाय द्वारा पाले गए उदयसिंह ने अपनी नई राजधानी में मोती मगरी के सुंदर महल भी बनवाए।
  • अकबर द्वारा पदच्युत मालवा शासक बाजबहादुर को शरण देकर उदयसिंह ने अनजाने में ही अकबर को चित्तौड़ पर आक्रमण का बहाना दे दिया।

🗡️चित्तौड़ का तृतीय साका — जयमल-फत्ता

  • 1567 ई. में अकबर द्वारा चित्तौड़ घेरे जाने पर सरदारों की सलाह से उदयसिंह ने दुर्ग-रक्षा जयमल मेड़तिया व रावत फत्ता सिसोदिया को सौंपकर गिरवा के जंगलों में शरण ली; दुर्ग निरीक्षण के दौरान जयमल अकबर की बंदूक 'संग्राम' की गोली से घायल हो गए, और उनके भाई कल्लाजी राठौड़ ने उन्हें अपने कंधे पर बिठाकर युद्ध जारी रखा, जिससे वे 'चार हाथ वाले लोकदेवता' के रूप में पूजे जाने लगे।
  • 25 फरवरी 1568 ई. को अकबर ने दुर्ग जीतकर लगभग 30,000 लोगों का कत्लेआम कर दिया — यही चित्तौड़ का तृतीय साका कहलाता है; उससे पहले फत्ता की रानी फूलकँवर के नेतृत्व में दुर्ग की सभी महिलाओं व बच्चों ने जौहर किया था। जयमल-फत्ता की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने बाद में आगरा किले पर उनकी हाथी पर सवार पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करवाईं।
  • उदयसिंह का देहान्त 28 फरवरी 1572 ई. को होली के दिन गोगुन्दा में हुआ, जहाँ उनकी छतरी है; टॉड ने टिप्पणी की कि यदि उदयसिंह सांगा व प्रताप के बीच न होते तो मेवाड़ का इतिहास शायद और भी उज्ज्वल होता।

👑प्रताप का राज्यारोहण व प्रारंभिक चुनौतियाँ

  • जगमाल — जिन्हें पहले उत्तराधिकारी घोषित किया गया था — के बजाय प्रताप के राज्यारोहण को एक तरह की 'राजमहलों की क्रान्ति' कहा जाता है; लोक दोहा 'पग पग भम्या पहार, धरा छोड़ रख्यो धरम...' उनकी आजीवन अडिग निष्ठा को दर्शाता है, और उन्हें मारवाड़ के राव चन्द्रसेन की भावना के अनुयायी के रूप में देखा जाता है।
  • मेवाड़ को राजनीतिक, आर्थिक व सैन्य रूप से सुरक्षित रखने हेतु प्रताप ने इडर, जालौर व सिरोही को मिलाकर अकबर-विरोधी गठबंधन बनाया; अकबर ने अपनी ओर से 1572-73 ई. में चार अलग-अलग समझौता-प्रयास किए, जिन्हें प्रताप ने हर बार अस्वीकार कर दिया।

🐎हल्दीघाटी का युद्ध

  • 18 जून 1576 ई. को गोगुन्दा से 23 किमी उत्तर हल्दीघाटी में लड़े गए इस युद्ध में प्रताप की लगभग 20,000 सेना — हरावल दस्ता हकीम खाँ सूरी के नेतृत्व में, चंदावल दस्ता भील सेनापति राणा पूँजा के नेतृत्व में — का सामना मानसिंह की लगभग 80,000 मुगल सेना से हुआ, यानी 'वीर विनोद' के अनुसार लगभग 4:1 का अनुपात; यह मानसिंह का पहला ही सेनापतित्व था, जो असाधारण रूप से एक हिंदू राजा को इतनी विशाल शाही सेना का नेतृत्व देकर दिया गया था।
  • संस्कृत ग्रन्थ 'अमरकाव्य वंशावली' के अनुसार प्रताप के घोड़े चेतक ने मानसिंह के हाथी मर्दाना की सूँड पर अपने अगले पैर टिका दिए थे; प्रताप के घायल होने पर सादड़ी के झाला बीदा ने उनका राजचिह्न धारण कर युद्ध जारी रखा, जबकि भाई शक्तिसिंह ने बलीचा के निकट मिलकर चेतक की मृत्यु के बाद अपना घोड़ा त्राटक उन्हें सौंपा — वहीं आज 'चेतक का चबूतरा' बना है।
  • मुगलों का प्रताप को बंदी बनाने का उद्देश्य विफल रहा और युद्ध अनिर्णायक रहा — अकबर ने पकड़े गए हाथी रामप्रसाद का नाम बदलकर पीरप्रसाद तक रख दिया; राजप्रशस्ति व राजविलास जैसे राजस्थानी स्रोत प्रताप की विजय का दावा करते हैं, जबकि मुगल सेना के साथ मौजूद इतिहासकार बदायूँनी ने 'तारीख़-ए-बदायूँनी' में युद्ध दर्ज किया और अपने संरक्षक की टिप्पणी भी लिखी कि केवल हिंदू सेनापति होने के कारण ही वे स्वयं युद्ध में शामिल नहीं हुए। डॉ. गोपीनाथ शर्मा इस युद्ध की तिथि 21 जून 1576 ई. मानते हैं।

💰भामाशाह और सतत संघर्ष

  • हल्दीघाटी के बाद प्रताप कोल्यारी गाँव होते हुए कुंभलगढ़ पहुँचे और उसे किलेदार महता नरबद के अधीन अपनी नई राजधानी बनाया; शाहबाज खाँ ने 3 अप्रैल 1578 ई. को कुंभलगढ़ दुर्ग जीत लिया पर महाराणा को नहीं पकड़ सका, और आगे के अभियानों — जिनमें अब्दुर्रहीम खानखाना का 1580 के अंत का अभियान भी शामिल है — के विफल रहने पर 1584 ई. तक कोई बड़ी मुठभेड़ नहीं हुई।
  • व्यापारी भामाशाह ने चूलिया में प्रताप से मिलकर संघर्ष जारी रखने हेतु उन्हें धन भेंट किया; प्रताप ने रामा महासाहनी के स्थान पर उन्हें प्रधान बनाया, और भामाशाह के भाई ताराचन्द भी इस उद्देश्य में जुड़े।

🏹दिवेर, चावंड और मेवाड़ की पुनर्प्राप्ति

  • अक्टूबर 1582 ई. में प्रताप ने मेवाड़ की भूमि मुक्त कराने का अभियान दिवेर (राजसमंद) से शुरू किया — यह वहाँ के चार मुगल छावनियों में सबसे महत्त्वपूर्ण थी — जहाँ उनके पुत्र अमरसिंह ने अकबर के काका व चौकी-प्रमुख सरिया सुल्तान खान को एक ही भाले के वार से मार गिराया, इसमें भामाशाह ने भी साथ दिया; टॉड ने इस विजय को 'मेवाड़ का मैराथन' कहा।
  • दिवेर के बाद प्रताप ने चावंड को अपना निवास और 1585 ई. में औपचारिक नई राजधानी बनाया — यह प्रताप के अपने 12 वर्षों और समग्र मेवाड़ के 28 वर्षों तक राजधानी रही; 5 दिसंबर 1584 को जगन्नाथ कछवाहा के नेतृत्व में भेजा गया अकबर का अंतिम अभियान भी उन्हें डिगा न सका, और प्रताप ने मांडलगढ़ व चित्तौड़गढ़ को छोड़कर शेष सम्पूर्ण मेवाड़ पर अपना शासन पुनर्स्थापित कर लिया।

🕊️प्रताप का देहावसान और चिरस्थायी विरासत

  • 19 जनवरी 1597 ई. को चावंड में धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय प्रताप का देहान्त हुआ; उनकी छतरी बांडोली गाँव में है, और वे एकमात्र ऐसे शासक हैं जिनके जन्म व मृत्यु की तिथियाँ ईस्वी सन् व विक्रम संवत् दोनों में समान पड़ती हैं।
  • मेवाड़ के राजचिह्न में एक ओर भील (पूँजा भील) व दूसरी ओर राजपूत के अंकन की परंपरा प्रताप के शासनकाल से चली आ रही है; उन्होंने बदराका में हरिहर मंदिर व चावंड में चामुण्डा माता मंदिर बनवाया, और 'मेवाड़ केसरी' व 'हिन्दुआ सूरज' की उपाधियाँ धारण कीं।
  • टॉड ने लिखा कि अरावली की कोई घाटी प्रताप के किसी वीर कार्य, उज्ज्वल विजय या उससे भी अधिक कीर्तिमय पराजय से अपवित्र नहीं रही; सर टॉमस रो ने भी लिखा कि मुगल बादशाह ने मेवाड़ के राणा को केवल आपसी समझौते से वश में किया, बल से कभी नहीं — यह प्रताप के उत्तराधिकारियों के प्रति संकेत है, क्योंकि मेवाड़ वास्तव में कभी विजित नहीं हुआ।
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बाद के महाराणा — मुगल संधि से एकीकरण तक

Later Maharanas — From Mughal Treaty to Integration

मुगलों से हुई संधि ने मंदिरों, झीलों, दरबारी उठापटक, औपनिवेशिक संधियों और सामाजिक सुधार के एक लंबे कालखंड की शुरुआत की, जो 1948 में मेवाड़ के संयुक्त राजस्थान में विलय पर जाकर पूर्ण हुआ।

🤝अमरसिंह प्रथम और 1615 ई. की संधि

  • अमरसिंह के शासनकाल में चूँडावत व शक्तावत सरदारों के बीच नेतृत्व को लेकर तीव्र प्रतिस्पर्धा रही; उन्होंने मेवाड़ की सेना को व्यवस्थित करने हेतु हरिदास झाला के अधीन एक अलग सैन्य विभाग गठित किया।
  • 5 फरवरी 1615 ई. को अमरसिंह ने मुगल बादशाह जहाँगीर के साथ लगभग 90 वर्षों के मेवाड़-मुगल संघर्ष को समाप्त करती संधि की: वे स्वयं खुर्रम (जहाँगीर) के दरबार में जाएँगे पर बादशाह कभी उनके दरबार नहीं आएगा, और चित्तौड़ उन्हें लौटाया जाएगा — पर उसके किले की मरम्मत कभी नहीं होगी।
  • चावंड 1615 ई. की इस संधि तक मेवाड़ की राजधानी बना रहा; टॉड ने अमरसिंह को प्रताप के कुल का सुयोग्य वंशधर कहा, और ओझा ने उन्हें 'वीर पिता का वीर पुत्र' कहा। 26 जनवरी 1620 ई. को उनका देहान्त हुआ और आहड़ में अंत्येष्टि हुई, जहाँ उनकी छतरी आहड़ की महासतियों में सबसे पहली है।

🏯महाराणा कर्णसिंह

  • गद्दी संभालने से पहले मुगल दरबार में रह चुके पहले मेवाड़ शासक कर्णसिंह ने 1620 ई. में गद्दी संभाली; जहाँगीर ने उनके राज्याभिषेक पर 'राणा' की उपाधि व खिलअत भेजी, और 1615 ई. की संधि को आकार देने में कर्णसिंह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी।
  • उन्होंने विद्रोही शहजादे खुर्रम को शरण दी, जगमंदिर के महलों का निर्माण शुरू करवाया (जिसे उनके पुत्र ने पूर्ण किया), दिलखुश महल, चन्द्रमहल व उदयपुर के परकोटे का निर्माण करवाया, और मुगल आंतरिक मामलों में सक्रिय दिलचस्पी लेने वाले पहले मेवाड़ महाराणा बने; 1628 ई. में उनका देहान्त हुआ।

🛕महाराणा जगतसिंह प्रथम

  • अप्रैल 1628 ई. में राज्याभिषेक हुए जगतसिंह प्रथम ने पिता का जगमंदिर परियोजना पूर्ण की, उदयपुर के राजमहल में 'चितेरों की ओवरी' (चित्रकारों का कक्ष) बनवाया, और 13 मई 1652 ई. को भव्य जगन्नाथ राय (जगदीश) विष्णु मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई, जिसकी प्रशस्ति कृष्ण भट्ट ने रची।
  • 1615 ई. की संधि की शर्तों की अवहेलना करते हुए उन्होंने चित्तौड़गढ़ किले की मरम्मत करवाई; उनके शासनकाल में ही शाहजहाँ ने प्रतापगढ़ को मेवाड़ से अलग रियासत बनाया। 10 अक्टूबर 1652 ई. को उनका देहान्त हुआ, जिसका विलाप 'राणे जगपत रा मरसिया' में हुआ।

⚖️महाराणा राजसिंह — राजप्रशस्ति और औरंगजेब

  • 1652 ई. में शाहजहाँ द्वारा राणा की उपाधि व 5000 जात-सवार का मनसब पाकर राजसिंह ने एकलिंगजी के लिए रत्नों का तुलादान किया — भारत में इस प्रकार का एकमात्र लिखित दान — और अपने पूर्ववर्ती द्वारा शुरू किए चित्तौड़ किले की मरम्मत का कार्य जारी रखा।
  • औरंगजेब के राज्याभिषेक पर मिले उपहारों में राजसिंह को डूँगरपुर, बाँसवाड़ा व ग्यासपुर के परगने और 6000 का मनसब मिला, पर संबंध बिगड़ते गए — किशनगढ़ की चारुमति (जो पहले औरंगजेब के लिए तय थीं) से राजसिंह के विवाह ने व्यक्तिगत तनाव बढ़ाया, और 1669 ई. में हिन्दू मंदिर तोड़े जाने के विरोध में उन्होंने श्रीनाथजी (नाथद्वारा), द्वारिकाधीश (कांकरोली) व अम्बा माता (उदयपुर) के मंदिर बनवाए।
  • 2 अप्रैल 1679 ई. को राजसिंह ने जजिया कर का औपचारिक विरोध किया, औरंगजेब को लिखित प्रतिवाद भेजा (जिसकी प्रतियाँ उदयपुर, बंगाल व लंदन में सुरक्षित हैं), मारवाड़ के अजीतसिंह के साथ सिसोदिया-राठौड़ गठबंधन बनाकर उन्हें व दुर्गादास राठौड़ को शरण दी — जिससे उदयपुर की लड़ाई (1680 ई.) हुई। ओढ़ा गाँव में विष दिए जाने से 22 अक्टूबर 1680 ई. को उनका देहान्त हुआ; उनके शासनकाल में राजसमंद झील (1676 ई.) व रणछोड़ भट्ट तैलंग रचित 25 शिलाओं पर उत्कीर्ण राजप्रशस्ति भी बनी।

🌹हाड़ी रानी की गाथा

  • राजसिंह के शासनकाल में हाड़ी राजकुमारी सलह कँवर का विवाह सलूंबर के सरदार रतनसिंह से हुआ था; मेवाड़ की ओर से मुगल सेना से युद्ध में जाते समय रतनसिंह द्वारा निशानी माँगने पर उन्होंने अपनी गर्दन काटकर उसे निशानी के रूप में भेज दिया — इसी बलिदान ने उन्हें 'हाड़ी रानी' के नाम से अमर कर दिया।
  • उनके बलिदान को बाद में कवि मेघराज मुकुल ने अपनी कविता 'सेनानी' में अमर किया; राजसिंह स्वयं 'विजय कटकातु' की उपाधि धारण करते थे।

🌊महाराणा जयसिंह और जयसमंद झील

  • राजसिंह के बाद कुरज गाँव में राज्याभिषेक हुए जयसिंह के शासनकाल में 24 जून 1681 ई. को राजसमुद्र की पाल पर दूसरी मेवाड़-मुगल संधि हुई, और शहजादे अकबर के राजपूत-समर्थित विद्रोह का सामना भी करना पड़ा, जिसमें शहजादे ने अस्थायी रूप से स्वयं को सम्राट भी घोषित कर दिया।
  • जयसिंह ने भारत की दूसरी और राजस्थान की सबसे बड़ी कृत्रिम झील जयसमंद बनवाई, जिसमें सात टापू (सबसे बड़ा 'बाबा का भागड़ा', सबसे छोटा 'प्यारी') व दो नहरें हैं; उन्होंने फव्वारे व एक उद्यान-महल भी बनवाया, और 23 सितम्बर 1698 ई. को उनका देहान्त हुआ।

📜महाराणा अमरसिंह द्वितीय और देबारी समझौता

  • 28 सितम्बर 1698 ई. से शासक (औपचारिक राज्याभिषेक 1700 ई.) अमरसिंह द्वितीय ने मारवाड़ के अजीतसिंह व आमेर के सवाई जयसिंह के साथ 1708 ई. का देबारी समझौता किया — जिसमें अजीतसिंह को मारवाड़ व जयसिंह को आमेर का शासक माना गया, और अपनी पुत्री चंद्रकुँवरी का विवाह जयसिंह से कर उनकी संतान को आमेर का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
  • उन्होंने जाजऊ के मुगल उत्तराधिकार-युद्ध में मुअज्जम (बाद में बहादुरशाह प्रथम) का साथ दिया, सामंतों को 'सोलह' व 'बत्तीस' (और आगे 'गोल') श्रेणियों में बाँटा, अमरशाही पगड़ी शैली शुरू की, और अमर विलास (बाड़ी) महल बनवाया।

🎨संग्रामसिंह द्वितीय और दुर्गादास राठौड़

  • 10 दिसम्बर 1710 ई. से शासक (राज्याभिषेक में जयपुर के सवाई जयसिंह भी उपस्थित) संग्रामसिंह द्वितीय को 1713 ई. में फर्रुखशियर से 7000 जात-सवार का मनसब मिला; उनके काल में प्रसिद्ध मेवाड़ शैली चित्र 'कलीला दमना' रचा गया, और उन्होंने सहेलियों की बाड़ी, वैद्यनाथ मंदिर व नाहर मगरी के महल बनवाए।
  • सवाई जयसिंह के साथ मिलकर उन्होंने मराठों के विरुद्ध राजपूत शासकों को संगठित करने हेतु 'हुरड़ा सम्मेलन' की पहली रूपरेखा बनाई, और मारवाड़ से निष्कासित दुर्गादास राठौड़ को शरण देकर उन्हें विजयपुर की जागीर व बाद में रामपुरा का हाकिम पद दिया; दुर्गादास का देहान्त उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर हुआ। इसी शासनकाल में फर्रुखशियर ने जजिया कर भी समाप्त किया।
  • 11 जनवरी 1734 ई. को संग्रामसिंह द्वितीय का देहावसान हुआ; टॉड ने उन्हें बापा रावल की गद्दी का गौरव पूरी तरह बनाए रखने वाला अंतिम राजा कहा।

🏛️जगतसिंह द्वितीय और हुरड़ा सम्मेलन

  • 11 जनवरी 1734 ई. से शासक जगतसिंह द्वितीय के समय नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया, और पेशवा बाजीराव प्रथम ने पहली बार मेवाड़ में प्रवेश कर चौथ वसूली का समझौता किया; उन्होंने पिछोला झील पर जगतनिवास महल (1746 ई.) बनवाया, जिनके दरबारी कवि नेकराम ने 'जगविलास' की रचना की।
  • 17 जुलाई 1734 ई. को उन्होंने हुरड़ा (वर्तमान भीलवाड़ा जिला) में सम्मेलन बुलाया, जिसकी अध्यक्षता स्वयं की और जिसमें जोधपुर, जयपुर, कोटा, बीकानेर आदि के शासक शामिल हुए — एक संयुक्त मराठा-विरोधी मोर्चा बनाते हुए; इसके बावजूद 1 मार्च 1747 ई. को राजमहल (टोंक) के युद्ध में मेवाड़-कोटा-होल्कर की संयुक्त सेना जयपुर के ईश्वरीसिंह से हार गई।
  • टॉड ने जगतसिंह द्वितीय को ऐशोआराम में लिप्त, अस्थिर स्वभाव का व शासन के लिए पूर्णतः अयोग्य बताया; 5 जून 1751 ई. में उनकी मृत्यु के बाद पुत्र प्रतापसिंह शासक बने, और 1754 ई. में प्रतापसिंह की मृत्यु पर उनके पुत्र राजसिंह द्वितीय गद्दी पर बैठे।

💔अरिसिंह से भीमसिंह तक — कृष्णाकुमारी त्रासदी

  • 1761 ई. में राजसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद छोटे भाई अरिसिंह गद्दी पर बैठे, जिनके शासनकाल में कोटा के दीवान झाला जालिम सिंह मेवाड़ आए (जिन्हें 'राजराणा' की उपाधि मिली) और जनवरी 1769 ई. में मेवाड़-मराठा युद्ध हुआ; अरिसिंह ने बागोर के नाथसिंह व सलूंबर के रावत जोधसिंह जैसे सरदारों की हत्या करवाई, और 9 मार्च 1773 ई. को स्वयं बूँदी के शासक अजीतसिंह द्वारा मारे गए। उनके पुत्र हम्मीर सिंह द्वितीय की भी 6 जनवरी 1778 ई. को बंदूक फटने से हुए घाव से मृत्यु हुई।
  • बढ़ते चूँडावत-शक्तावत हस्तक्षेप के बीच भीमसिंह 7 जनवरी 1778 ई. को शासक बने — टॉड बताते हैं कि महाराणा को अपने निजी खर्च तक झाला जालिम सिंह से उधार लेने पड़ते थे। उनकी पुत्री कृष्णाकुमारी, जिनकी सगाई पहले जोधपुर के भीमसिंह से हुई (जिनकी विवाह से पहले मृत्यु हो गई) और फिर जयपुर के जगतसिंह से, एक कटु त्रिपक्षीय प्रतिद्वंद्विता का केंद्र बन गईं, जिसके चलते अमीर खाँ पिंडारी व अजीतसिंह चूँडावत के दबाव में महाराणा भीमसिंह ने 21 जुलाई 1810 ई. को अपनी ही पुत्री को विष देकर मरवा दिया।
  • 13 जनवरी 1818 ई. को भीमसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से अधीनस्थ पार्थक्य संधि की, जिसके बाद फरवरी 1818 ई. में कर्नल जेम्स टॉड पॉलिटिकल एजेंट बनकर उदयपुर आए; 30 मार्च 1828 ई. को भीमसिंह का निधन हुआ। उनकी रानी पद्मेश्वरी ने पिछोला झील पर भीमपद्मेश्वर शिवालय बनवाया, और इसी काल में भोमगढ़ व टोडगढ़ दुर्ग भी बने।

🌿जवानसिंह से स्वरूपसिंह तक — सुधार और भील कोर

  • 1832 ई. में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक से अजमेर में मिलने वाले व जल निवास महल बनवाने वाले जवानसिंह की 1838 ई. में निःसंतान मृत्यु हुई; उनके बाद बागोर के सरदार सिंह शासक बने, जिनके काल में जनवरी 1841 ई. में खैरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर का गठन हुआ।
  • निःसंतान सरदारसिंह द्वारा उत्तराधिकारी घोषित स्वरूपसिंह 15 जुलाई 1842 ई. को शासक बने; उनके काल में 'स्वरूपशाही' सिक्के ढले, कन्यावध (1844 ई.) व डाकन प्रथा (1853 ई.) पर रोक लगी, 15 अगस्त 1861 ई. को सती प्रथा-विरोधी आदेश जारी हुआ, और जीवित समाधि प्रथा पर भी अंकुश लगा। उनकी अपनी मृत्यु पर उनकी दासी ऐंजाबाई का सती होना राजपरिवार में अंतिम ऐसी घटना थी।
  • स्वरूपसिंह ने बिजली से क्षतिग्रस्त विजय स्तम्भ का पुनर्निर्माण करवाया, 1857 के विद्रोह में नीमच से भागे अँग्रेज परिवार को जगमंदिर में शरण दी, और गोवर्धन विलास महल, गोवर्धन सागर तालाब, पशुपतेश्वर महादेव व जगत शिरोमणि मंदिर बनवाए।

🏫शंभुसिंह — रीजेंसी, सुधार और 'हिन्दुआ सूरज'

  • 17 नवम्बर 1861 ई. को अल्पायु में शासक बने शंभुसिंह का प्रारंभिक शासन पॉलिटिकल एजेंट मेजर टेलर की अध्यक्षता वाली रीजेंसी कौंसिल के जरिए चला; उनके काल में सती, दासप्रथा व बाल-क्रय-विक्रय पर रोक लगी, 'शंभुपलटन' नामक नई सेना बनी, शंभुरत्न पाठशाला (1863 ई.) खुली, और 'महकमा खास' प्रशासनिक कार्यालय स्थापित हुआ। वे मेवाड़ के पहले शासक थे जिनके साथ कोई सती नहीं हुई।
  • 1871 ई. में कर्नल ब्रुक द्वारा GCSI उपाधि की पेशकश पर शंभुसिंह ने उत्तर दिया कि मेवाड़ के महाराणा पहले से ही 'हिन्दुआ सूरज' हैं, उन्हें किसी स्टार उपाधि की आवश्यकता नहीं; उनके 1861-74 ई. के शासनकाल में ही ग्रन्थ 'वीर विनोद' रचा गया, जो 16 जुलाई 1874 ई. को उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हुआ।

🇮🇳सज्जनसिंह से भूपालसिंह तक — सम्मान, सुधार और विलय

  • सज्जनसिंह (राज्याभिषेक 1874 ई.) ने उदयपुर आने वाले पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड नार्थब्रुक की मेजबानी की, 'श्री देश हितैषणी' सभा (1877 ई.) बनाई, श्यामलदास की सलाह पर न्यायिक परिषद 'इजलास खास' गठित की, उदयपुर की पहली जनगणना (1881 ई.) करवाई, और GCSI उपाधि इसी शर्त पर स्वीकार की कि वायसराय स्वयं आकर प्रदान करें — जो लॉर्ड रिपन ने 1881 ई. में चित्तौड़ जाकर पूरा किया।
  • उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र व स्वामी दयानन्द सरस्वती को उदयपुर आमंत्रित किया, जहाँ स्वामी जी ने 'सत्यार्थ प्रकाश' रचा, और 23 दिसंबर 1884 ई. को बीमारी से उनका निधन हुआ। उत्तराधिकारी फतहसिंह — केवल एक विवाह करने वाले पहले महाराणा — ने 'मेवाड़ लांसर्स' रिसाला गठित किया, विक्टोरिया हॉल व कॉर्नोट (बाद में फतहसागर) बाँध बनवाया, 1899 के 'छप्पनिया' अकाल तथा प्लेग (1904) व इन्फ्लूएंजा (1918) महामारियों को झेला, और ठाकुर केसरीसिंह बारहठ की कविताओं 'चेतावणी रा चूँगट्या' से प्रभावित होकर दो बार (1903 व 1911) दिल्ली दरबार में शामिल न होते हुए भी प्रथम विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड की सहायता के लिए GCVO पदवी अर्जित की।
  • सिसोदिया वंश के अंतिम शासक भूपालसिंह 25 मई 1930 ई. को गद्दी पर बैठे; 18 अप्रैल 1948 ई. को मेवाड़ का संयुक्त राजस्थान में विलय होकर वृहत् राजस्थान बना, और वे इसके प्रथम महाराजप्रमुख के रूप में आजीवन कार्यरत रहे।
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सहायक शाखाएँ — डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ व शाहपुरा

Cadet Branches — Dungarpur, Banswara, Pratapgarh and Shahpura

मेवाड़ का गुहिल वंश अकेला शासक नहीं था — वागड़ व अन्य क्षेत्रों की सहायक रियासतों ने भी उसी वंशावली को अपने महारावलों व महारावतों के नेतृत्व में आधुनिक राजस्थान में विलय तक आगे बढ़ाया।

🌱वागड़ गुहिल शाखा की स्थापना

  • वागड़ — बाँसवाड़ा, डूँगरपुर व प्रतापगढ़ के कुछ भागों में फैला दक्षिणी क्षेत्र — क्षत्रप, गुर्जर, हूण व हर्ष के शासन से गुजरा, इससे पहले कि उसके परमार शासक (मालवा के वाकपतिराज से डंबरसिंह के जरिए, राजधानी आर्थूणा) मालवा के नरवर्मा की सिद्धराज जयसिंह से 12 वर्षीय युद्ध में हार (नरवर्मा की मृत्यु 1133 ई.) के बाद सोलंकियों के अधीन आ गए।
  • मेवाड़ से बेदखल किए गए सामंतसिंह ने लगभग 1178 ई. में वागड़ में वद्रपटक (बडौदा) राजधानी वाला गुहिल राज्य स्थापित किया; सोलंकी राजा भीमदेव द्वितीय ने उन्हें फिर निकाला, पर उनके वंशज जयंतसिंह ने लगभग 1221 ई. में गुहिल सत्ता पुनर्स्थापित की, और डूँगरसिंह ने बाद में डूँगरपुर कस्बा बसाकर उसे नई राजधानी बनाया।
  • खानवा युद्ध (1527 ई.) में महारावल उदयसिंह की मृत्यु के बाद वागड़ उनके दो पुत्रों में बँट गया — पृथ्वीराज को पश्चिमी भाग डूँगरपुर मिला और जगमाल को पूर्वी भाग बाँसवाड़ा — जिससे 20वीं सदी तक शासन करने वाली दो शाखाएँ बनीं।

🏞️डूँगरपुर के शासक

  • पृथ्वीराज ने 1527 ई. में डूँगरपुर में गुहिल शासन की नींव रखी; उत्तराधिकारी आसकरण ने प्रताप के विरुद्ध बढ़ती मुगल सेना के समय अकबर की अधीनता स्वीकार की, बेणेश्वर शिवालय बनवाया और आसपुर कस्बा बसाया, जबकि महारावल पुंजराज (1609-57 ई.) ने शाहजहाँ से 'माही मरातिब' की उपाधि पाई और गैबसागर की पाल पर गोवर्धन नाथ मंदिर बनवाया।
  • बाद के शासकों ने मुगल व मराठा दबाव के बीच राह निकाली — जसवंत सिंह ने विद्रोही शहजादे अकबर को शरण दी, रामसिंह ने 1728 ई. में पेशवा बाजीराव से संधि की, और शिवसिंह को बाजीराव प्रथम (1735 ई.) व मल्हारराव होल्कर (1746 ई.) दोनों को धन देना पड़ा; अंततः फतहसिंह ने 1805 ई. में दो लाख रुपए देकर डूँगरपुर को मराठा घेरे से मुक्त करवाया।
  • जसवंतसिंह द्वितीय ने 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि की; उदयसिंह द्वितीय ने 1857 के विद्रोह को खैरवाड़ा में दबाने में मदद की और कन्यावध पर रोक लगाई (1869 ई.); विजयसिंह द्वितीय — जिन्हें 1912 में KCIE सम्मान मिला — ने नई परिषदों, अनुशासित सेना व राजकीय बैंक से डूँगरपुर का आधुनिकीकरण किया; और अंतिम शासक लक्ष्मणसिंह, जो भारतीय संविधान सभा के सदस्य भी रहे, ने 25 मार्च 1948 ई. को डूँगरपुर का राजस्थान में विलय किया।

🏯बाँसवाड़ा के शासक

  • जगमाल सिंह ने लगभग 1530 ई. में बाँसवाड़ा में स्वतंत्र गुहिल शासन की नींव रखी, भीलेश्वर महादेव मंदिर व फूल महल बनवाए; उनके वंशज समरसिंह ने 1617 ई. में माँडू में जहाँगीर से मिलकर बाँसवाड़ा को मेवाड़ से स्वतंत्र करवाया, जबकि कुशलसिंह के समय औरंगजेब ने राजसिंह से संघर्ष के दौरान औपचारिक रूप से बाँसवाड़ा को मेवाड़ से अलग कर दिया।
  • 18वीं सदी में मराठा सेनापतियों ने राज्य को बार-बार लूटा; पृथ्वीसिंह ने बाँसवाड़ा को किलेबंद किया और पृथ्वी विलास बाग बसाया, और उत्तराधिकारी उम्मेदसिंह ने पिंडारी आक्रमणों के बीच 1818 ई. में अंग्रेजों से 13 शर्तों वाली संधि स्वीकार की।
  • 1857 के विद्रोह के दौर के शासक लक्ष्मणसिंह ने संकेतिक 'राजराजेश्वरी' लिपि बनाई और मंदिर-मेले से व्यापार बढ़ाया; बाद में पृथ्वीसिंह ने युवराज काल में मानगढ़ पहाड़ी पर गोविन्द गुरु को गिरफ्तार किया, फिर शासक बनने पर स्कूल व कॉटन फैक्ट्री स्थापित की; अंतिम शासक चंद्रवीर सिंह, जिन्होंने 25 मार्च 1948 ई. को बाँसवाड़ा का राजस्थान में विलय करते हुए इसे 'अपने मृत्यु दस्तावेज पर हस्ताक्षर' बताया था, क्रिकेटर हनुवंत सिंह के पिता थे।

🛡️प्रतापगढ़ (देवलिया) रियासत

  • महाराणा कुंभा से नाराज उनके भाई क्षेमसिंह (क्षेमकर्ण) ने चित्तौड़ छोड़कर 1437 ई. में सादड़ी पर अधिकार किया, और सिसोदिया वंश की इस शाखा के शासक 'महारावत' उपाधि धारण करने लगे; उत्तराधिकारी बाघसिंह 1534 ई. में गुजरात के बहादुरशाह से चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, और विक्रमसिंह (बीका) ने बाद में सादड़ी के स्थान पर देवलिया को राजधानी बनाया।
  • 1673 ई. से शासक प्रतापसिंह ने लगभग 1699 ई. में डोडेरिया खेड़ा स्थान पर प्रतापगढ़ कस्बा बसाया; 18वीं सदी के आरम्भ में वंश में शीघ्र-शीघ्र उत्तराधिकार हुए — पृथ्वीसिंह, फिर उनके पौत्र, फिर एक चाचा, और अंततः बड़े भाई गोपालसिंह, जिन्होंने गोपाल महल बनवाया।
  • सामंतसिंह (1774 ई. से) मराठा खिराज न चुका पाने पर अपने 13 वर्षीय पुत्र को होल्कर के पास गिरवी रखने को मजबूर हुए, इससे पहले कि 1804 व 1818 ई. की संधियों से अंग्रेज संरक्षण प्राप्त हुआ; दलपतसिंह की सेना ने 1857 में अंग्रेजों की मदद की, और उत्तराधिकारी उदयसिंह ने 1867 ई. में राजधानी देवलिया से प्रतापगढ़ स्थानांतरित की। इस शाखा के अंतिम शासक सर रामसिंह के समय 25 मार्च 1948 ई. को प्रतापगढ़ का राजस्थान में विलय हुआ।

📚शाहपुरा रियासत और प्रतापगढ़ की साहित्यिक विरासत

  • सूरजमल ने 14 दिसम्बर 1631 ई. को शाहपुरा को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र रियासत की स्थापना की; मेवाड़ के संग्रामसिंह द्वितीय ने बाद में इसे 23 गाँव प्रदान किए (1717 ई.), और शाहपुरा के हुरड़ा स्थल पर ही 1734 ई. का मराठा-विरोधी राजपूत सम्मेलन आयोजित हुआ।
  • रियासती राजस्थान में उत्तरदायी शासन का अग्रणी उदाहरण बना शाहपुरा — महाराजा उम्मेदसिंह द्वितीय ने 1946 ई. में प्रजामण्डल नेता गोकुललाल असावा के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनाई, और महाराजा सुदर्शनदेव ने स्वतंत्रता से पहले ही 14 अगस्त 1947 ई. को पूर्ण उत्तरदायी सरकार बनाई; 25 मार्च 1948 ई. को शाहपुरा आठ अन्य रियासतों के साथ मिलकर राजस्थान संघ में शामिल हुआ, जिसके प्रधानमंत्री गोकुललाल असावा व राजप्रमुख कोटा के महाराव भीमसिंह बने।
  • इसी बीच प्रतापगढ़ के दरबार ने अपनी साहित्यिक परंपरा भी सँजोई — कवि कल्याण ने 'प्रताप प्रशस्ति' रची, और कवि गंगाराम रचित 'हरिभूषण महाकाव्य' (लगभग 1653-55 ई.) राज्य के इतिहास को महारावत हरिसिंह के समय तक दर्ज करता है।

🪙सिक्के और अन्य विशिष्ट तथ्य

  • द्रम्म क्षत्रपकाल का चार आने मूल्य का छोटा चाँदी का सिक्का था, जो इस क्षेत्र में 12वीं शताब्दी तक रुपयों के साथ प्रचलन में रहा; ऐसे सिक्के सरवाणिया में मिले हैं।
  • 'अहाड़ा गुहिलोत' कहलाने वाले व महारावल उपाधिधारी बाँसवाड़ा के सूर्यवंशी शासकों ने अपनी टकसाल में फारसी लेख वाला सालिमशाही रुपया ढाला, जिसे 1904 ई. में कलदार सिक्कों ने प्रतिस्थापित किया; महारावल लक्ष्मणसिंह ने अलग से सोने, चाँदी व ताँबे के 'लक्ष्मणशाही' सिक्के भी जारी किए।
  • इस क्षेत्र के भील समुदायों में 'पोतिया' पगड़ी के स्थान पर सिर पर बाँधा जाने वाला मोटा वस्त्र था।