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राजस्थान GK

गुर्जर-प्रतिहार वंश

The Gurjara-Pratiharas

मारवाड़ के मण्डोर से उठकर कन्नौज तक फैला वह राजवंश, जिसने सदियों तक अरब आक्रमणों को थामे रखा और उत्तर भारत की राजनीति को दिशा दी।

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पहचान, अर्थ एवं ऐतिहासिक प्रमाण

Identity, Meaning & Historical Evidence

गुर्जर-प्रतिहार वास्तव में कौन थे, और उनका नाम ही सदियों से विद्वानों में बहस का विषय क्यों बना हुआ है? अभिलेख, दरबारी काव्य व विदेशी यात्रा-वृत्तान्त मिलकर इसका उत्तर जोड़ते हैं।

🏛️उद्भव एवं नाम का अर्थ

  • गुर्जर-प्रतिहार वंश ने लगभग छठी से बारहवीं सदी तक उत्तर-पश्चिम भारत पर शासन किया, 750-1000 ई. के दौरान राजस्थान व अधिकांश उत्तर भारत पर इनका प्रभुत्व रहा और राजस्थान में यह वंश विशेष रूप से 8वीं से 10वीं सदी के मध्य शक्तिशाली रहा; इतिहासकार आर.सी. मजूमदार के अनुसार इसी पूरी अवधि में इन्होंने अरब आक्रमणकारियों को रोके रखा।
  • मारवाड़ प्रतिहार शक्ति का प्रारंभिक केन्द्र था, जिसे उस समय गुर्जरात्रा (गुर्जर प्रदेश) कहा जाता था — इसी क्षेत्र पर शासन के कारण प्रतिहार 'गुर्जर-प्रतिहार' कहलाए और तत्कालीन मंदिर-निर्माण शैली को भी इसी नाम से जाना गया; जोधपुर के शिलालेख इनके मारवाड़ में उदय को छठी सदी के उत्तरार्द्ध जितना पुराना सिद्ध करते हैं।
  • 'प्रतिहार' शब्द किसी जाति का नहीं बल्कि एक राजपद का सूचक है — प्रतिहार वह विश्वासपात्र रक्षक होता था जो राजा के बैठने के स्थान या महल की मुख्य ड्योढ़ी की निगरानी करता था; स्कन्दपुराण, यशस्तिलकचम्पू व कुवलयमाला जैसे ग्रंथों तथा नीलगुण्ड, राधनपुर, देवली व करहाड़ के शिलालेखों में भी इस वंश को गुर्जर नाम से संबोधित किया गया है।
  • 'गुर्जर' शब्द की उत्पत्ति पर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं: भगवान लाल इन्द्रजी के अनुसार गुजरात में निवास करने के कारण ही लोग गुर्जर कहलाए, जबकि अरब यात्रियों ने इसी शब्द को बिगाड़कर 'जुर्ज' लिखा, जो मुख्यतः गुजरात क्षेत्र के निवासियों के लिए प्रयुक्त हुआ।

🗿गुर्जर पहचान सिद्ध करने वाले अभिलेख

  • अमोघवर्ष का संजन ताम्रपत्र (871 ई.) तथा कर्कराज का बड़ौदा ताम्रपत्र (811-812 ई.) उन प्रमुख अभिलेखों में हैं जो प्रतिहारों को गुर्जर नाम से अभिलिखित करते हैं।
  • सिरूट शिलालेख, चन्देल राजा धंग का खजुराहो शिलालेख (954 ई.) तथा चेदी राजा कर्ण का गोहरवा अभिलेख — ये तीनों भी स्वतंत्र रूप से इस वंश को गुर्जर नाम से संबोधित करते हैं।
  • गुर्जर राजा मथनदेव का राजौरगढ़ अभिलेख (960 ई.) तथा नीलगुण्ड, राधनपुर, देवली व करहाड़ के शिलालेख — इन सबसे मिलकर गुर्जर पहचान से जुड़ा शिलालेखीय प्रमाण एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैला हुआ मिलता है।

📖साहित्यिक एवं विदेशी यात्रा-वृत्तान्त

  • विभिन्न राजदरबारी कवियों व मुनियों ने गुर्जर नाम को अभिलिखित किया: उद्योतन सूरि के प्राकृत ग्रंथ कुवलयमाला (778 ई.) में वत्सराज के राज्य को 'गुर्जर देश' कहा गया; कल्हण की राजतरंगिणी में महान गुर्जर शासक मिहिर भोज का उल्लेख है; कन्नड़ कवि पम्पा के 941 ई. के पम्पभारत में कन्नौज नरेश महिपाल को 'गुर्जर-राज' कहा गया; तथा बाणभट्ट के हर्षचरित में गुर्जरात्रा के उस शासक के लिए यह शब्द प्रयुक्त हुआ है जिसने हर्ष के पिता प्रभाकर वर्धन की नींद हराम कर दी थी।
  • भीनमाल के चावड़ा-गुर्जर राजा व्याघ्रमुख के दरबारी ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त ने भी अपने ग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में उन्हें गुर्जर कहा है।
  • अरब व चीनी यात्रियों का विवरण भी इसकी पुष्टि करता है: चीनी यात्री ह्वेनसांग ने राज्य को 'कू-ची-लो' तथा राजधानी भीनमाल को 'पी-लो-मो-लो' लिखा; अरब लेखकों सुलेमान, अलमसूदी, अल-इदरिसी व अलबरूनी ने 'जुर्ज'/'जूर्ज' शब्द प्रयुक्त किया, जिसमें अलमसूदी ने गुर्जर राजा की उपाधि 'बोरा' बताई; तथा इतिहासकार अल बिला धूरी के फुतूहुल-बुल्दान के अनुसार अलजुर्ज, मण्डोर, बसंतगढ़, भीनमाल, भड़ौच व उज्जैन जैसे गुर्जरात्रा राज्य 725-726 ई. के आसपास अरब आक्रमण का शिकार हुए।
  • इतिहासकार दशरथ शर्मा ने 'राजस्थान थ्रू द एजेज' में निष्कर्ष निकाला कि गुर्जरा, गुर्जर देश, गुर्जर भूमि व गुर्जरात्रा — ये सभी एक ही शब्द के भिन्न-भिन्न रूप हैं, तथा वर्तमान गुजरात व्यापक गुर्जरात्रा क्षेत्र का मात्र दक्षिणी भाग था।

🧑‍🏫इतिहासकारों के मत

  • के.सी. जैन के अनुसार गुर्जरात्रा प्रदेश में वर्तमान राजस्थान व गुजरात दोनों सम्मिलित थे, जबकि के.एम. मुंशी ने अपनी पुस्तक 'द ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश' में मण्डोर व नान्दीपुर (भड़ौच) के गुर्जर प्रतिहार राज्यों का विस्तृत वर्णन किया।
  • गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने प्रतिहार को जाति न मानकर एक विशेष पद बताया और लिखा कि गुर्जरात्रा प्रदेश पर शासन करने वाले क्षत्रिय ही 'गुर्जर' या 'गुर्जरेश्वर' कहलाए — यही मत 'राजस्थान थ्रू द एजेज' तथा 'एनाल्स ऑफ भण्डारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में भी दोहराया गया है।
  • गुहिल, चहमान व चालुक्य जैसे वंश-नामों के विपरीत 'प्रतिहार' किसी वंश-प्रवर्तक का नहीं बल्कि एक पद का सूचक है, इसीलिए प्राचीन अभिलेखों में ब्राह्मण प्रतिहार, क्षत्रिय प्रतिहार व गुर्जर प्रतिहार जैसे भेद मिलते हैं; कवि राजशेखर ने भी 'विद्दशालभंजिका' में अपने शिष्य राजा महेन्द्रपाल को केवल 'प्रतिहार' कहकर संबोधित किया है।
  • 973 ई. की हर्षनाथ प्रशस्ति से पुष्टि होती है कि चौहान राजा सिंहराज प्रतिहारों का सामंत था, तथा इतिहासकार नैणसी ने प्रतिहारों की कुल 26 शाखाओं का उल्लेख किया है, जिनमें मण्डोर शाखा को सबसे प्राचीन माना जाता है।

🗺️साम्राज्य का विस्तार

  • अपने सबसे विस्तृत रूप में प्रतिहार सत्ता राजपूताना के अधिकांश भाग के साथ-साथ गुजरात, काठियावाड़, मध्य भारत तथा सतलज से लेकर बिहार तक के गलियारे पर फैली थी; इनमें मण्डोर, जालौर, राजौरगढ़, कन्नौज, उज्जैन व भड़ौच की शाखाएँ सर्वाधिक प्रसिद्ध रहीं।
  • ग्वालियर अभिलेख में गुर्जर-प्रतिहार शासक स्वयं को श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण का वंशज बताते हैं, और 'गुर्जर प्रतिहार' शब्द प्रतिद्वंद्वी चन्देल वंश के अभिलेखों में भी मिलता है।
  • 'गुर्जर जाति' का सबसे प्राचीन ज्ञात उल्लेख वातापी (बादामी) के चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में मिलता है।

🔥उत्पत्ति संबंधी मत

  • चारण परम्परा के अनुसार, चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में प्रतिहारों की उत्पत्ति आबू पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ के अग्निकुण्ड से बताई है, जबकि वी.ए. स्मिथ व स्टेनफोनो जैसे विद्वानों ने इनकी उत्पत्ति श्रीमाल (भीनमाल) से मानी है।
  • कनिंघम ने प्रतिहारों को शक-कुषाण जाति यू-ची की संतान माना, वहीं डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने गुर्जर प्रतिहारों को पूर्णतः विदेशी मूल का बताया — इस प्रकार इस वंश की वास्तविक उत्पत्ति आज भी विद्वानों के बीच बहस का विषय बनी हुई है।
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मण्डोर शाखा

The Mandor Branch

प्रतिहारों की सबसे प्राचीन शाखा जोधपुर के निकट मण्डोर में जड़ें जमाती है, जहाँ एक ब्राह्मण संस्थापक के क्षत्रिय पुत्रों ने ऐसा राज्य खड़ा किया जो दर्जनों पीढ़ियों तक टिका रहा।

👑हरिश्चंद्र एवं मण्डोर की नींव

  • हरिश्चंद्र, जो राजस्थान में प्रतिहार वंश के संस्थापक थे और संभवतः गुप्त सम्राटों के महाप्रतिहार (प्रमुख द्वारपाल अधिकारी) रह चुके थे, ने छठी सदी के उत्तरार्द्ध में मण्डोर को अपनी राजधानी बनाया; उन्हें 'रोहिलद्धि' नाम से भी जाना जाता है, और उनके पुत्रों ने यह राज्य नागवंशियों से छीना था।
  • हरिश्चंद्र की दो पत्नियाँ थीं: ब्राह्मणी पत्नी द्विजात्मा से उत्पन्न पुत्र 'प्रतिहार-ब्राह्मण' अर्थात् गुर्जर गौड़-ब्राह्मण कहलाए, जबकि क्षत्रिय पत्नी रानी भद्रा से चार पुत्र — भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल व दह (दद्द) — हुए, जिन्होंने मिलकर मण्डोर में गुर्जर प्रतिहार राज्य की स्थापना की।
  • इनमें सबसे बड़े पुत्र रज्जिल का मण्डोर की गद्दी पर राज्याभिषेक हुआ, और उन्हीं से आरंभ होने वाली मण्डोर शाखा गुर्जर प्रतिहारों की सबसे प्राचीन शाखा मानी जाती है।

🪨मण्डोर के अभिलेख

  • बाउक के मण्डोर शिलालेख (837 ई.) में उसने स्वयं को गुर्जर प्रतिहार नागभट्ट के पुत्र रामभद्र का प्रतिहार तथा अपने वंश-गोत्र को भी प्रतिहार अंकित करवाया है।
  • राजा कक्कुक के घटियाला अभिलेख (861 ई.) — जो प्राकृत व संस्कृत दोनों भाषाओं में चार अलग-अलग स्तम्भों पर उत्कीर्ण हैं — मण्डोर वंश के इतिहास का प्रमुख स्रोत हैं; इनसे पुष्टि होती है कि हरिश्चंद्र नामक ब्राह्मण ने इस वंश की स्थापना की थी और रानी भद्रा का क्षत्रिय कुल भी दर्ज है, जबकि एक श्लोक में सम्पूर्ण आर्यावर्त (कन्नौज शाखा सहित) में गुर्जर प्रतिहार राज्य की ख्याति का बखान किया गया है।
  • राज्य का विस्तार क्रमशः त्रावणी, वल्ल व माडा (मण्डोर राज्य के भाग), फिर गुर्जरात्रा (वर्तमान गुजरात तथा उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी व मध्य राजस्थान), और अंततः नर्मदा-तापी दोआब के लाट-देश तक हुआ, जो आगे चलकर सम्पूर्ण आर्यावर्त में फैल गया।

⚔️प्रमुख शासक: रज्जिल से बाउक तक

  • हरिश्चंद्र के चार पुत्रों में सबसे बड़े रज्जिल से मण्डोर की वंशावली आरंभ होती है; उनके पुत्र नरभट्ट को रणकुशलता के कारण पिल्लापल्ली/पिल्लापणी की उपाधि मिली, और नरभट्ट के पुत्र नागभट्ट प्रथम ने राज्य की सीमा पूर्व में बढ़ाई तथा राजधानी मेड़ानक (मेड़ता) स्थानांतरित की।
  • नागभट्ट प्रथम के पुत्र तात ने मण्डोर अपने भाई भोज को सौंपकर संन्यास ले लिया; भोज के पुत्र यशोवर्धन 'मण्डोर शाखा' के प्रथम शासक बने और भागवत धर्म को संरक्षण दिया, जबकि यशोवर्धन के वंशज शीलूक ने त्रुवणी व वल्ल प्रदेश जीते, देवराज भाटी को युद्ध में मारा तथा जोधपुर में सिद्धेश्वर महादेव मंदिर बनवाया।
  • शीलूक की वंश-परम्परा झोट्टा से आगे बढ़ी — जो संगीत-कला में निपुण थे और प्रतिहार शासकों में एकमात्र वीणावादक कहलाए तथा जिन्होंने रावल जाति को दरबार में नियुक्त किया — और झोट्टा के पुत्र मिल्लादित्य से, जिनके पुत्र राजा कक्क ने मुदगिरी (मुंगेर, बिहार) में गौड़ राजा धर्मपाल को परास्त किया तथा व्याकरण, तर्कशास्त्र, ज्योतिष, कला व काव्य में निपुण थे।
  • कक्क के उत्तराधिकारी राजा बाउक एक वीर रणकुशल योद्धा थे, जिन्होंने नंदा वल्ल को मारा और जिनका मण्डोर शिलालेख 837 ई. का है; वे कन्नौज शाखा के नागभट्ट द्वितीय व रामभद्र के समकालीन थे — कक्क की भाटी वंशी रानी पद्मिनी से बाउक तथा दूसरी रानी दुर्लभदेवी से कक्कुक का जन्म हुआ था।

🏔️कक्कुक: आदर्श मण्डोर नरेश

  • बाउक के बाद राजा बने कक्कुक ही घटियाला के दोनों अभिलेखों के नायक हैं; उन्होंने मरु, माड, वल्ल, तृवणी, अज्ज व गुर्जरा जैसे राज्यों में वंश की ख्याति फैलाई, वट्टनानक (वेड़ा-नाणा) के दुर्गम पहाड़ पर नगर बसाया, आभीरों के आक्रमण विफल किए, तथा मण्डोर व रोहिंसकूप में विजय स्तम्भ बनवाए, जहाँ रोहिंसकूप में उन्होंने विष्णुदेव का मंदिर भी बनवाया।
  • कुवलयमाला के रचयिता उद्योतन सूरि ने कक्कुक को 'प्रतिहार राजवंश का कर्ण' कहा है, और कक्कुक स्वयं भी संस्कृत में काव्य रचना करते थे — मण्डोर के प्रतिहारों की कक्कुक तक की एक श्रृंखलाबद्ध वंशावली आज भी उपलब्ध है; उद्योतन सूरि के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों की मातृभाषा गुर्जर अपभ्रंश के साथ-साथ संस्कृत भी थी।
  • मण्डोर शाखा के प्रतिहारों का राज्य विस्तार अनुमानतः जोधपुर से लगभग 40 मील उत्तर-पश्चिम व 60 मील उत्तर-पूर्व में चारों ओर फैला था, जो काठियावाड़ तक जा पहुँचा था।

🏳️मण्डोर शाखा का अंत

  • प्रतिहार हम्मीर के दबाव से तंग आकर मण्डोर दुर्ग पर काबिज इन्दाशाखा के प्रतिहारों ने अंततः 1395 ई. में यह दुर्ग राव वीरम के पुत्र राठौड़ चूँडा को दहेज में दे दिया — इसी घटना के साथ मण्डोर प्रतिहारों के राजनीतिक विस्तार का इतिहास सदा के लिए समाप्त हो गया।

नान्दीपुर (भड़ौच) एवं भीनमाल की शाखाएँ

Nandipur (Bharuch) & Bhinmal Branches

दो अपेक्षाकृत कम चर्चित किन्तु सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शाखाएँ — नर्मदा तट का एक बंदरगाह राज्य तथा आबू पर्वत के निकट का एक विद्वत्तापूर्ण राजधानी नगर — मुख्य प्रतिहार शाखा के साथ-साथ फली-फूलीं।

नान्दीपुर (भड़ौच) की स्थापना

  • हरिश्चंद्र के पुत्र व मण्डोर नरेश रज्जिल के लघु भ्राता दह (दद्द) प्रथम ने मण्डोर व भीनमाल के गुर्जर प्रतिहारों की सहायता से नागवंशियों तथा वनवासी राजा निरिहुलक के प्रदेशों पर अधिकार कर नान्दीपुर (नन्दोद/भड़ौच) राज्य की स्थापना की; नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित यह प्राचीन बंदरगाह नगर परम्परा के अनुसार राजा बलि के यज्ञ-स्थल तथा भृगु ऋषि के आश्रम के रूप में जाना जाता था।
  • दद्द प्रथम का राज्य उत्तर में माही नदी से लेकर दक्षिण में तापी नदी तक फैला था, जिसमें माही काँठा, अनूप प्रदेश (नर्मदा घाटी) व लाट देश (नर्मदा-तापी दोआब) सम्मिलित थे; उनके समय के कलचुरी संवत् 595 ई. के दानपत्र तथा संखेड़ा ताम्रपत्रों में उन्हें नागकुल का नाशक व सूर्य उपासक गुर्जर प्रतिहार नृप बताया गया है।

☀️जयभट्ट प्रथम व दद्द द्वितीय

  • दद्द प्रथम के उत्तराधिकारी व हर्षवर्धन के समकालीन जयभट्ट प्रथम की उपाधि 'वीतराग' थी; संखेड़ा दानपत्रों में उनकी सभी शत्रुओं पर पूर्ण विजय दर्ज है, जबकि उमेता, बलुआ व बेगुमरा शिलालेखों से पता चलता है कि उन्होंने राज्य की सीमा माही नदी तक बढ़ाई और कलचुरियों को भी हराया, जिनके राजा बुद्धराज व वल्मी (वल्लभी) नरेश ने उनकी अधीनता स्वीकार की।
  • 'महाराजा प्रशान्तराग' की उपाधि धारण करने वाले दद्द द्वितीय के शासनकाल में ही चीनी यात्री ह्वेनसांग आया, जिसने भड़ौच बंदरगाह को राज्य की आमदनी का प्रमुख स्रोत बताया; उनके 641 ई. के संखेड़ा ताम्रपत्र (संस्कृत भाषा, ब्राह्मी लिपि) विदेश मंत्री रेव द्वारा जारी किए गए थे, और हर्षवर्धन-पुलकेशिन द्वितीय के नर्मदा घाटी युद्ध के दौरान वल्लभी नरेश ध्रुव सेन द्वितीय को हर्ष से शरण देने के कारण दद्द द्वितीय की गणना महान शासकों में होने लगी।

🔻दद्द तृतीय से जयभट्ट चतुर्थ तक — शाखा का अंतिम काल

  • जयभट्ट द्वितीय के पुत्र दद्द तृतीय ने अपने पराक्रम से पंचमहाशब्द व बहुसहाय की उपाधियाँ धारण कीं, वे शिव उपासक थे और उन्होंने वल्मी नरेश शिलादित्य द्वितीय पर विजय पाई; उनके पुत्र जयभट्ट तृतीय, जिनकी उपाधि 'महासामन्ताधिपति' थी, चालुक्यों के सामंत के रूप में कार्यरत रहे।
  • राजा अहिरोल के पुत्र जयभट्ट चतुर्थ इस शाखा के अंतिम शासक थे; इस शाखा के लिए बार-बार प्रयुक्त सामन्त व महासामन्त जैसे शब्द इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह शाखा कभी भी स्वतंत्र सार्वभौम सत्ता के रूप में नहीं रही।

🕌भीनमाल का गुर्जर प्रतिहार वंश

  • दक्षिण के चालुक्यों व उत्तर भारत के हर्षवर्धन की समकालीन भीनमाल शाखा तब उदित हुई जब रघुवंशी प्रतिहारों ने चावड़ों को पराजित कर भीनमाल राज्य पर अधिकार कर लिया; इसकी राजधानी प्राचीन भीनमाल (वर्तमान जालौर जिले में, जिसके प्राचीन नाम रत्नमाल, पुष्यमाल व श्रीमाल थे) लूनी नदी के पूर्व व आबू पर्वत के उत्तर में स्थित थी, और अरब आक्रमण से चावड़ों के विनष्ट होने के बाद उनका शेष राज्य भी प्रतिहारों के अधीन आ गया।
  • ह्वेनसांग 641 ई. में भीनमाल आया था; उसके अनुसार चावड़ा क्षत्रिय बौद्ध धर्मावलम्बी थे, और उसने राज्य का नाम 'कू-ची-लो' तथा राजधानी का नाम 'पी-लो-मो-लो' बताया; पुलकेशिन द्वितीय के 634 ई. के ऐहोल अभिलेख तथा पुलकेशिन अवनिजनाश्रय के 739 ई. के नौसेरी दानपत्र से स्पष्ट होता है कि लाट व भीनमाल दोनों राज्य गुर्जरात्रा कहलाते थे, और भीनमाल राज्य अरब शासक जुनैद खाँ के लगभग 725 ई. के आक्रमण तक कायम रहा।
  • इस राज्य के उत्तर में मण्डोर का गुर्जर प्रतिहार राज्य, दक्षिण में वल्लभी का मैत्रक राज्य, पूर्व में मंदसौर-उज्जैन का गुर्जर प्रतिहार राज्य तथा पश्चिम में बन्दर्दीव का चावड़ा-गुर्जर राज्य स्थित था; इसमें जालौर, बसंतगढ़, चन्द्रावती व पाली जैसे नगर सम्मिलित थे, और यह अनादरा, बसंतगढ़, बरमन, वासा, मूँगथल व पिंडवाड़ा के सूर्य मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हुआ।
  • अंग्रेज व्यापारी निकोलस डपलेट ने 1611 ई. में भीनमाल की यात्रा की थी, जबकि विद्वान जैक्सन ने छठी सदी में भीनमाल को गुर्जर देश की राजधानी के रूप में प्रमाणित किया।

🔭भीनमाल के विद्वान एवं साहित्य

  • चापवंशी राजा व्याघ्रमुख के दरबारी ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत 628 ई. में भीनमाल में ही लिखा — जिसमें उन्होंने गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसके कारण उन्हें 'भारत का न्यूटन' कहा जाता है — और बाद में गणित का ग्रंथ खण्डखाद्यक भी वहीं रचा।
  • 'राजस्थान के कालिदास' कहे जाने वाले कवि माघ ने भीनमाल में शासक सुप्रभदेव के समय भीनमाल व बसंतगढ़ का वर्णन करते हुए शिशुपाल वध की रचना की; भीनमाल से जुड़े अन्य ग्रंथों में सिद्धर्षि की उपमिति भाव प्रपंच कथा, धनेश्वर की सुरसुन्दरी कहा तथा धनपाल की भविसयत्त कहा उल्लेखनीय हैं।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने चावड़ा राजपूतों को सीथियन (शक) मूल का माना, जबकि 914 ई. के धरणी वराह दानपत्र में उनकी उत्पत्ति भगवान शिव के धनुष से बताई गई है, और एक कलचुरी दानपत्र में भीनमाल पर अरब आक्रमण से चावड़ा शासन के विनाश का उल्लेख मिलता है।
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कन्नौज साम्राज्य — रघुवंशी प्रतिहार

The Kannauj Empire — Raghuvanshi Pratiharas

जालौर से कन्नौज तक फैली इस शाखा ने एक अखिल भारतीय साम्राज्य का रूप लिया, वंश के सर्वाधिक प्रतापी सम्राट दिए, और अंततः अपने ही सामंतों के भार तले धीरे-धीरे बिखर गई।

🛡️उद्भव: नागभट्ट प्रथम

  • भीनमाल, आबू व जालौर पर शासन के बाद यह शाखा — जिसका उद्भव भी मण्डोर से प्रतीत होता है — लगभग 730 ई. में उभरी और रघुवंशी (और राजधानी स्थानांतरण के बाद कन्नौज के) प्रतिहारों के नाम से जानी गई; नागभट्ट प्रथम (730-756 ई.), जिन्हें नागावलोक भी कहा जाता है, ने जालौर में इस शाखा की स्थापना की और वे पहले प्रतिहार शासक थे जिनके समय समस्त प्रमुख राजपूत वंश — गुहिल, चौहान, परमार, चंदेल, चालुक्य, राठौड़ — सामंत के रूप में कार्य करते थे।
  • नागभट्ट प्रथम ने राजस्थान, गुजरात व पंजाब पर आक्रमण करने की कोशिश कर रहे सिंध के अरब शासकों को खदेड़ा, कई राजाओं को अरब आधिपत्य से मुक्त कराया तथा अरब सेना को सिंधु नदी के पश्चिम तक पीछे धकेल दिया; ग्वालियर प्रशस्ति में इस पराक्रम के लिए उन्हें 'नारायण' की उपाधि दी गई है और उन्हें त्रैलोक्य के अद्भुत प्राचीन रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है।
  • उन्होंने चावड़ों से भीनमाल जीतकर उसे अपनी राजधानी बनाया और उज्जैन (अवन्तिका) को दूसरी राजधानी रखा — यद्यपि इनमें से कौन-सी प्रमुख थी, इस पर विद्वानों के मत भिन्न हैं — तथा वर्तमान गुजरात, राजस्थान, मालवा, चम्बल घाटी, हरियाणा व सतलज के दक्षिणी मैदानों तक गुर्जर-प्रतिहार राज्य की स्थापना की; 756 ई. के हंसोट ताम्रपत्र के अनुसार उन्होंने दक्षिण में लाट देश भी जीता।
  • राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग के साथ मिलकर उन्होंने अरब आक्रमणकारी जुनैद खाँ को पराजित किया और इस सफलता पर उज्जैन में 'हिरण्यगर्भ महादान' समारोह आयोजित किया; उन्होंने पड़ोसी शक्तियों — दंतिदुर्ग के राष्ट्रकूट, यशोवर्मन का कन्नौज तथा ललितादित्य का कश्मीर — से युद्ध न कर शांति बनाए रखी, और जालौर दुर्ग का निर्माण करवाया, जिससे उन्हें 'राम का प्रतिहार' व 'इन्द्र के दंभ का नाशक' जैसे उपनाम मिले।

🐘वत्सराज

  • देवशक्ति व रानी भूयिका देवी के पुत्र वत्सराज (783-795 ई.) जालौर से शासन करते थे; ग्वालियर प्रशस्ति में उन्हें अनेक सामंत राजाओं में से 'शक्तिशाली सलाहकारों की गति समाप्त करने वाला' कहा गया है, और उनके दरबारी कवि उद्योतन सूरि ने 778 ई. के कुवलयमाला में उन्हें 'रणहस्तिन' (युद्ध का हाथी अर्थात् योद्धा-राजा) कहा है।
  • उन्होंने कन्नौज नरेश इन्द्रायुध को पराजित किया, गौड़ों की प्रभुसत्ता समाप्त की, तथा बंगाल के धर्मपाल को हराकर मगध, बिहार व पश्चिम बंगाल पर अधिकार कर लिया — इस प्रकार अपने पैतृक राज्य की सीमाएँ उत्तर में हिमालय व पूर्व में बंगाल तक विस्तृत कीं, किंतु कन्नौज के शासन में हस्तक्षेप करने के कारण अंततः उन्हें राष्ट्रकूटों से पराजय झेलनी पड़ी, जिससे उनका राज्य सिमटकर पुनः राजस्थान तक रह गया।
  • वैष्णव (भागवत) धर्म को संरक्षण देने के कारण उन्हें 'जयवराह' की उपाधि प्राप्त थी, उन्होंने भीनमाल में राजसूय यज्ञ कर एक हजार ब्राह्मणों को चाँदी के सिक्के दान दिए, तथा ग्वालियर अभिलेख के अनुसार भण्डी जाति को पराजित कर मध्य राजपूताना पर अधिकार किया; उनके ही शासनकाल में ओसियाँ का महावीर स्वामी जैन मंदिर बना, जो पश्चिमी भारत का सबसे प्राचीन ज्ञात जैन मंदिर है।
  • राष्ट्रकूट शासक ध्रुव प्रथम (जिसे धारावर्ष भी कहा जाता है) ने वत्सराज व धर्मपाल दोनों को पराजित किया, इस प्रकार उत्तर भारत के त्रिपक्षीय संघर्ष में हस्तक्षेप करने वाले वे पहले राष्ट्रकूट शासक बने, और इस विजय की स्मृति में उन्होंने अपने राजचिह्न पर गंगा-यमुना के प्रतीक अंकित करवाए।

⚔️नागभट्ट द्वितीय एवं रामभद्र

  • रानी सुंदर देवी के पुत्र नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.) ने धर्मपाल के सामंत चक्रायुध को युद्ध में मारकर कन्नौज पर अधिकार किया और जालौर के स्थान पर उसे अपनी नई राजधानी बनाया, फिर मुंगेर के युद्ध में स्वयं धर्मपाल को भी परास्त किया — इसके बाद उन्होंने 'परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर' की भव्य उपाधि धारण की, जिसका उल्लेख 815 ई. के बुचकला अभिलेख तथा कर्कराज के बड़ौदा ताम्रपत्र में मिलता है।
  • इन विजयों के बाद आंध्र, कलिंग, विदर्भ व सैंधव के शासकों ने बिना युद्ध किए ही अधीनता स्वीकार कर ली; नागभट्ट द्वितीय ने किरात व तुरुष्क (अरबों) को भी पराजित किया, वत्स देश, आमर्त व मालवा जीते, तथा नर्मदा के दक्षिण का लाट देश राष्ट्रकूटों से पुनः छीन लिया।
  • उन्होंने कन्नौज पर अधिकार हेतु लगभग सौ वर्षों से चले आ रहे प्रतिहार-पाल-राष्ट्रकूट त्रिपक्षीय संघर्ष को समाप्त किया, ग्वालियर प्रशस्ति में उन्हें 'कर्ण' की उपाधि दी गई, और उनके समय प्रतिहार उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली सत्ता बन गए — साम्राज्य अब हिमालय से नर्मदा तक तथा सिंध से उत्तरी बंगाल तक फैला था; उन्होंने 'बलि-प्रबंध' नामक ग्रंथ भी रचा और 833 ई. में उनका देहावसान हुआ (कुछ विद्वानों के अनुसार उन्होंने गंगा में जल समाधि ली)।
  • उनके पुत्र रामभद्र (833-836 ई.) ने मात्र तीन वर्ष शासन किया; उनके अल्पकालीन शासन में बंगाल नरेश देवपाल ने साम्राज्य के पूर्वी बिहार व उड़ीसा क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, और मण्डोर के प्रतिहार भी स्वतंत्र हो गए।

🌅मिहिर भोज प्रथम — साम्राज्य का चरमोत्कर्ष

  • रामभद्र व अप्पा देवी के पुत्र मिहिर भोज प्रथम (836-885 ई.) ने साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा में अपने पिता की लापरवाही देखकर उनकी हत्या कर स्वयं गद्दी संभाली — इसी कारण प्रतिहारों में उन्हें 'पितृहंता' के कठोर उपनाम से याद किया जाता है।
  • उनके शासनकाल में प्रतिहार शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची, साम्राज्य पश्चिम में सिंधु से पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में हिमालय-सतलज से दक्षिण में नर्मदा तक फैला था — जिसमें पूर्वी पंजाब, अधिकांश राजपूताना व उत्तरप्रदेश, मालवा, सौराष्ट्र व ग्वालियर सम्मिलित थे; उनके समय भारत आए अरब यात्री सुलेमान ने उनके कुशल प्रशासन व शक्तिशाली सेना की प्रशंसा की और उन्हें 'बरूआ' कहा।
  • दौलतपुर ताम्रपत्र में उनकी उपाधि 'प्रभास' तथा देवगढ़, आहार व ऊना के अभिलेखों में 'परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर' उत्कीर्ण है; उनके सिक्कों पर नाम के साथ 'श्रीमद् आदिवराह' उपाधि अंकित है, जो हरियाणा में रोहतक, हांसी, हिसार, भिवानी व चरखी दादरी में बड़ी मात्रा में मिले हैं, और नर्मदा तट पर राष्ट्रकूट कृष्ण द्वितीय को हराकर उन्होंने 'मालवा चक्रवर्ती' की उपाधि पाई।
  • इतिहासकार दशरथ शर्मा ने उन्हें 'नवीं सदी का भारत का सबसे महान शासक' कहा; उन्होंने कालिंजर के जयशक्ति को पराजित किया, अपनी सीमाओं की रक्षा हेतु गुणाम्बोधिदेव, हर्षराज गुहिल, कक्कुक व बाउक जैसे योग्य सामंतों की नियुक्ति की, शृंगार प्रकाश व सरस्वती कण्ठाभरण जैसे ग्रंथों के विद्वानों को संरक्षण दिया, तथा ऋषिदेवल व मेघातिथि विद्वानों के परामर्श पर अरबों द्वारा बलपूर्वक मुस्लिम बनाए गए हिन्दुओं को पुनः हिन्दू धर्म में सम्मिलित करवाया।

📚महेन्द्रपाल प्रथम

  • मिहिर भोज व रानी चंद्र भट्टारिका देवी के पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम (893-909 ई.) को अपने पिता से विशाल साम्राज्य विरासत में मिला, जिसे उन्होंने अपने पूरे शासनकाल में अरब आक्रमण से मुक्त रखा — उनके अधीन वर्तमान मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, उत्तरी बंगाल व उड़ीसा जैसे प्रदेश थे; उन्हें महेन्द्रायुध, निर्भयराज व निर्भय नरेन्द्र भी कहा जाता था।
  • उनके गुरु प्रसिद्ध संस्कृत कवि राजशेखर थे (काव्यमीमांसा, कर्पूरमंजरी, विद्दशाल भंजिका, बालरामायण आदि के रचयिता), जिन्होंने उन्हें 'रघुकुलतिलक' व 'महाराष्ट्र चूड़ामणि' जैसी उपाधियाँ दीं, तथा उनके पुत्र महीपाल को 'रघुवंश मुक्तामणि' व आर्यावर्त का 'महाराजाधिराज' कहा।
  • 931 ई. के बंगाल एशियाटिक सोसायटी ताम्रपत्र (जो विनायकपाल द्वारा जारी किया गया था) के अनुसार रानी देहनागा व रानी महादेवी से उनके तीन पुत्र — महीपाल (क्षितिपाल), भोजदेव द्वितीय व विनायकपाल — हुए; इतिहासकार बी.एन. पाठक ने उन्हें 'हिन्दू भारत का अंतिम महान् हिन्दू सम्राट' कहा है।
  • उन्होंने परमभट्टारक, परमभागवत, परमेश्वर व महाराजाधिराज जैसी उपाधियाँ धारण कीं।

🌗उत्तरवर्ती शासक

  • महेन्द्रपाल प्रथम ने कोई उत्तराधिकारी घोषित न किया, अतः उनके तीनों पुत्रों में गद्दी हेतु संघर्ष हुआ: पहले महीपाल ने कन्नौज पर अधिकार किया, किंतु भोजदेव द्वितीय ने अपने ससुर कोक्कलदेव प्रथम कलचुरी के पुत्र सांकिल की सहायता से 910 ई. में उन्हें अपदस्थ कर शासन संभाला; 913 ई. में महीपाल ने अपने सामंतों की मदद से पुनः गद्दी हासिल की और 943 ई. तक शासन किया।
  • विद्वान शासक महीपाल, जिन्हें विनायकपाल व हेरम्भपाल भी कहा जाता था, ने सैनिकों को नकद वेतन देने की परम्परा शुरू की और एक सुव्यवस्थित, अनुशासित सेना खड़ी की; उनके ही शासनकाल में 915 ई. में बगदाद निवासी अलमसूदी कन्नौज आया, हालाँकि उसने राष्ट्रकूट शासक बल्हर (इन्द्र तृतीय) को भारत का सर्वश्रेष्ठ राजा बताया।
  • विनायकपाल देव प्रथम, जिनके समय हरिसेन ने 'वृहत कथाकोश' की रचना की, एक विद्वान, कुशल व जनप्रिय शासक के रूप में स्मरण किए जाते हैं; उनके बाद महेन्द्रपाल देव द्वितीय शासक बने।
  • बयाना के उषा मंदिर के 955 ई. के अभिलेख में एक परवर्ती शासक महीपाल देव द्वितीय के समय रानी चित्रलेखा द्वारा विष्णु मंदिर बनवाने का उल्लेख है; महीपाल देव को बाद में हटाकर विजयपाल देव राजा बने।

📉राज्यपाल एवं कन्नौज का पतन

  • राज्यपाल देव लगभग 990 ई. में राजा बने, तब तक विजयपाल देव के समय ही राज्य के दक्षिणी भाग साम्राज्य से अलग हो चुके थे; राज्यपाल के शासनकाल में राजौरगढ़ के गुर्जर प्रतिहार तथा शाकम्भरी के चौहान भी स्वतंत्र हो गए।
  • राज्यपाल के शासनकाल में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की, जिससे राज्यपाल को सुल्तान की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी; इसके तुरंत बाद कालिंजर के राजा नंदराय (गंड, चंदेल वंश) ने कन्नौज को घेरकर राज्यपाल की हत्या कर दी।
  • लगभग 1093 ई. में राज्यपाल के वंशज यशपाल — इस वंश के अंतिम शासक — के समय गहड़वाल राजा चंद्रदेव (महीचंद्र के पुत्र) ने कन्नौज प्रतिहारों से छीन लिया, जिससे इस वंश की शेष सत्ता पुनः राजस्थान तक सिमट गई; कन्नौज में प्रतिहारों के स्थान पर गहड़वाल वंश स्थापित हो गया।
  • विक्रम संवत् 1200 के आसपास नाडौल के चौहान शासक रायपाल (जिनके शिलालेख वि.सं. 1189-1202 के मिले हैं) ने प्रतिहार शासक सहजपाल से मण्डोर भी छीन लिया।

🏯राजौरगढ़ के गुर्जर प्रतिहार

  • अलवर के राजौरगढ़ से प्राप्त 960 ई. के एक अभिलेख से पता चलता है कि रायपुर (राजौरगढ़) पर गुर्जर प्रतिहार महाराजाधिराज सावट के पुत्र मथनदेव का शासन था — यह कन्नौज प्रतिहारों की एक स्वामिभक्त सामंत शाखा थी, जो अन्य शाखाओं की भाँति राज्यपाल के शासनकाल में अंततः स्वतंत्र हो गई।
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स्थापत्य कला, विरासत एवं पतन के कारण

Art, Legacy & the Reasons for Decline

युद्धों व राजगद्दियों से परे, गुर्जर-प्रतिहारों ने एक विशिष्ट कला-शैली, एक समृद्ध संस्कृत साहित्यिक परम्परा, तथा अंततः साम्राज्यिक अतिविस्तार का एक सचेत करने वाला सबक भी छोड़ा।

🛕मंदिर स्थापत्य

  • 8वीं से 12वीं सदी के बीच गुर्जर-प्रतिहार संरक्षण में ओसियाँ (जोधपुर) में हरिहर मंदिर सहित अनेक हिन्दू व जैन मंदिरों का निर्माण हुआ, साथ ही आउवा का कामेश्वर मंदिर व किराडू का सोमेश्वर मंदिर भी इसी काल की देन हैं।
  • आभानेरी (हर्षत माता मंदिर) व राजौरगढ़ (नीलकण्ठ मंदिर) का कलात्मक वैभव, आहड़ का आदिवराह मंदिर, तथा बरौली का मंदिर परिसर — ये सभी इसी युग से संबंधित हैं, जिसकी प्रमुख स्थापत्य शैली को महामारू शैली कहा जाता है।

✒️साहित्यिक विरासत

  • इस काल की समृद्ध संस्कृत साहित्यिक उपलब्धियों में कुवलयमाला, हरिवंश पुराण, कर्पूरमंजरी व विद्दशालभंजिका जैसे ग्रंथ शामिल हैं — ये ग्रंथ दरबारी इतिवृत्त के रूप में वंश की उपलब्धियों को भी दर्ज करते हैं।

🕉️प्रशासन एवं कुलदेवी

  • गुर्जर-प्रतिहार, पाल व राष्ट्रकूट शासन-व्यवस्था में एक केन्द्रीय राजतंत्रात्मक ढाँचा था, जिसकी पुष्टि अरब यात्री अलमसूदी व सुलेमान भी करते हैं; राज्य को प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिनके अधिकारियों को प्रतिहार अभिलेखों में राजपुरुष (राजस्थानीय राजपुरुष) कहा जाता था।
  • चामुण्डा माता (जोधपुर) व गाजण माता (बालेसर, जोधपुर) प्रतिहारों की कुल देवी के रूप में पूजी जाती थीं; एच.सी. रे के अनुसार मण्डोर ही गुर्जर प्रतिहार सत्ता का प्रारंभिक केन्द्र था, जिनकी वंशावली रज्जिल से शुरू होती है, यद्यपि मण्डोर से प्राप्त सहजपाल चौहान का 1154 ई. का अभिलेख यह पुष्टि करता है कि तब तक वहाँ चौहानों का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

🕰️साम्राज्य के पतन के कारण

  • साम्राज्य के पतन का मूल कारण एक संरचनात्मक कमजोरी थी: प्रतिहार शासकों ने अपने सामंतों को स्वयं की सेना रखने की छूट दे दी, जिससे यही सामंत आगे चलकर इतने शक्तिशाली हो गए कि केन्द्रीय सत्ता को ही चुनौती देने और तोड़ने लगे।
  • विदेशी आक्रमणों के समय छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बँटी यह सत्ता एकजुट न हो सकी और एक-एक कर पराजित होती गई; पालों, अरबों व राष्ट्रकूटों से निरंतर त्रिपक्षीय संघर्ष ने प्रतिहार शक्ति को क्रमशः कमजोर किया, यहाँ तक कि जो सामंत कभी सहयोगी थे वे ही साम्राज्य के विनाश का कारण बन गए — यह कमजोर होने की प्रक्रिया और भी पहले शुरू हो चुकी थी, जब प्रभाकर वर्धन ने दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान तक फैले एक प्रारंभिक गुर्जर-प्रतिहार राज्य को समाप्त कर वर्धन वंश की स्थापना की थी।