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राजस्थान GK

राजपूतों का उदय और उत्पत्ति

Rise & Origin of the Rajputs

हर्षवर्धन के बाद राजस्थान की धरती पर राजपूत वंशों के उदय, उनके अधिवासन और उत्पत्ति को लेकर प्रचलित विभिन्न ऐतिहासिक मतों की रोचक झलक।

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राजपूत अधिवासन एवं राजस्थान का नामकरण

Rajput Settlement & the Naming of Rajasthan

सम्राट हर्षवर्धन के बाद के सत्ता-शून्यकाल में राजपूत वंशों ने राजस्थान की धरती पर कैसे अपनी जड़ें जमाईं, और यह भूमि 'राजपूताना' से 'राजस्थान' कैसे बनी — इसकी पूरी कहानी।

राजपूत काल का उदय

  • सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में सत्ता का शून्य पैदा हुआ, जिसे भरते हुए राजस्थान व आसपास के क्षेत्रों में अनेक राजपूत वंशों ने अपनी स्वतंत्र सत्ताएँ स्थापित कीं — ये समुदाय मुख्यतः गुजरात, पंजाब और गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों से यहाँ आए थे।
  • इतिहासकार हर्षवर्धन के काल (छठी-सातवीं सदी) से बारहवीं सदी तक के इस दौर को 'राजपूत काल' कहते हैं; विद्वान वी.ए. स्मिथ इसे सातवीं सदी के मध्य से बारहवीं सदी के अंत तक फैला 'राजपूत युग' मानते हैं।
  • इन समुदायों ने पहले राजस्थान की परिधि पर अपनी पकड़ बनाई और धीरे-धीरे प्रदेश के भीतरी हिस्सों में भी शासन फैलाया; भारतीय इतिहास में राजपूत वंशों का दबदबा आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक और उत्तर भारत की राजनीति पर उनका प्रभाव मुस्लिम सल्तनत की स्थापना तक बना रहा।
  • तेरहवीं सदी आते-आते पूरा राजस्थान राजपूत आधिपत्य में आ चुका था।

🏛️'राजपूताना' से 'राजस्थान' तक का सफ़र

  • ब्रिटिश शासन के दौरान इस भू-भाग को 'राजपूताना' कहा जाता था, और यह नाम सबसे पहले 1800 ई. में जॉर्ज थॉमस ने प्रयोग में लाया।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूताना का इतिहास लिखते हुए इसे 'राजस्थान' नाम दिया, जो उनकी 1829 ई. में प्रकाशित कृति 'एनाल्स एण्ड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' में मिलता है।
  • स्वतंत्रता के बाद जब यहाँ की रियासतों का एकीकरण हुआ, तो 30 मार्च 1949 को सर्वसम्मति से इस प्रदेश का नाम राजस्थान रखा गया, और 26 जनवरी 1950 को इसे औपचारिक मान्यता मिली।

📍प्रारम्भिक राजपूत समुदाय एवं उनके क्षेत्र

  • राजस्थान में बसने वाले प्रमुख आरंभिक राजपूत वंशों में मारवाड़ में प्रतिहार व राठौड़, साम्भर में चौहान तथा मेवाड़ में गुहिल शामिल थे।
  • इसी तरह भीनमाल एवं आबू क्षेत्र में चावड़ा, आमेर में कछवाहा, जैसलमेर में भाटी तथा वागड़ व आबू क्षेत्र में परमार वंश ने अपना अधिवासन स्थापित किया।
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राजपूतों की उत्पत्ति के सिद्धान्त

Theories on the Origin of the Rajputs

राजपूतों की उत्पत्ति सदियों से इतिहासकारों के बीच बहस का विषय रही है — क्या वे विदेशी मूल के आक्रमणकारी वंशज थे या भारत की प्राचीन क्षत्रिय-ब्राह्मण परम्परा की ही संतान? दोनों पक्षों के तर्क यहाँ प्रस्तुत हैं।

🌍विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त

  • राजपूतों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मुख्यतः दो मत प्रचलित हैं — विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त और स्थानीय/देशीय उत्पत्ति का सिद्धान्त; विदेशी उत्पत्ति का यह विचार सबसे पहले कर्नल जेम्स टॉड ने प्रस्तुत किया था।
  • टॉड ने अपनी कृति 'एनाल्स एण्ड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' में राजपूतों का संबंध शक व सीथियन जातियों से जोड़ा, और उनकी पुस्तक के संपादक डॉ. विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया।
  • डॉ. विंसेंट ए. स्मिथ ने अपनी पुस्तक 'अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' में राजपूतों को शक-यूची-हूण जातियों से जोड़ा, जबकि ए. कनिंघम ने 978 ई. के ब्रोच गुर्जर ताम्रपत्र के आधार पर उन्हें यूची (कुषाण) मूल का माना।
  • डॉ. डी.आर. भण्डारकर और डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने राजपूतों को गुर्जर वंशीय बताया और उन्हें श्वेत हूणों का वंशज माना।

🪔देशीय/स्थानीय उत्पत्ति का सिद्धान्त

  • देशीय उत्पत्ति के समर्थकों में कवि चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो), मुहणोत नैणसी तथा सूर्यमल्ल मिश्रण प्रमुख हैं, जिन्होंने राजपूतों को अग्निकुण्ड से उत्पन्न बताया।
  • डॉ. दशरथ शर्मा ने नाथ अभिलेख (971 ई.), आटपुर लेख (977 ई.), श्रृंगी ऋषि के शिलालेख (1428 ई.) तथा आबू शिलालेख (1285 ई.) के आधार पर राजपूतों को प्राचीन सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी क्षत्रियों से जोड़ा।
  • पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा और सी.वी. वैद्य ने उन्हें वैदिक आर्य/क्षत्रियों की संतान माना, जबकि डॉ. डी.आर. भण्डारकर व डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने बिजौलिया शिलालेख, कायम खाँ रासो, कुंभलगढ़ प्रशस्ति व चाटसू अभिलेख के आधार पर उन्हें ब्राह्मण वंश (भण्डारकर के अनुसार नागर ब्राह्मण) से जोड़ा।
  • डॉ. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने राजपूतों की उत्पत्ति को मिश्रित (एक से अधिक स्रोतों से जुड़ी) माना।
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गुर्जर-प्रतिहारों की उत्पत्ति एवं शाखाएँ

Origin and Branches of the Gurjar-Pratiharas

राजस्थान के सबसे प्रभावशाली प्रारम्भिक राजपूत वंशों में एक — गुर्जर-प्रतिहारों के नामकरण, उनकी उत्पत्ति पर विद्वानों की राय और उनकी विभिन्न शाखाओं की झलक।

🏙️गुर्जरात्रा और नामकरण

  • छठी शताब्दी के आसपास से राजस्थान का दक्षिणी-पश्चिमी भाग 'गुर्जरात्रा' कहलाने लगा था; इस प्रदेश के शासक होने के कारण ही यह वंश गुर्जर-प्रतिहार कहलाया, और गुजरात क्षेत्र में निवास के कारण इन्हें गुर्जर भी कहा गया।
  • हर्ष के काल में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल (जिसे उसने पीलोमोलो या भीलामाला कहा) को गुर्जर/गुर्जरात्रा साम्राज्य की राजधानी बताया, और उद्द्योतन सूरि ने अपनी 778 ई. की रचना 'कुवलयमाला' में गुर्जरात्रा प्रदेश के लिए 'गुर्जर' शब्द का उल्लेख किया।

🎓उत्पत्ति पर विद्वानों के मत

  • मिस्टर जैक्सन (बॉम्बे गजेटियर), डॉ. हार्नली, वी.ए. स्मिथ, ब्यूलर तथा डॉ. डी.आर. भण्डारकर गुर्जर-प्रतिहारों को विदेशी मूल का (भण्डारकर के अनुसार श्वेत हूणों की संतान) मानते हैं, जबकि के.यू.आर. कैनेडी उन्हें ईरानी मूल का बताते हैं और ए. कनिंघम उन्हें शक व यूची जैसी विदेशी जातियों का वंशज मानते हैं।
  • इसके विपरीत, कवि चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो) उन्हें अग्निकुण्ड से उत्पन्न बताते हैं, राजशेखर (विद्दशाल भंजिका) उन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं, तथा डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा और बैजनाथ पुरी उन्हें भारत के प्राचीन क्षत्रिय वंश की ही संतान बताते हैं।
  • मुहणोत नैणसी ने अपने लेखन में प्रतिहारों की 36 शाखाओं का विवरण दिया है।

🌿गुर्जर प्रतिहारों की शाखाएँ

  • गुर्जर प्रतिहार वंश की चार प्रमुख शाखाएँ मण्डोर, जालौर, भड़ौच (भरूच) और राजौरगढ़ में स्थापित हुईं।
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गुहिल एवं राठौड़ वंशों की उत्पत्ति

Origin of the Guhila and Rathore Dynasties

मेवाड़ के गुहिलों और मारवाड़-जोधपुर के राठौड़ों की वंशावली को लेकर इतिहासकारों के परस्पर भिन्न मतों तथा इन कुलों की प्रमुख शाखाओं की जानकारी।

🪶गुहिलों की उत्पत्ति संबंधी मत

  • डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने कुंभलगढ़ शिलालेख के आधार पर गुहिलों को विप्रवंशीय नागर ब्राह्मण कुल का बताया, जबकि डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने बापा के सिक्कों के आधार पर उन्हें सूर्यवंशी क्षत्रियों की संतान माना।
  • अबुल फजल ने उन्हें ईरान के बादशाह नौशेरवाँ (नौशेखाँ आदिल) की संतान बताया, जबकि मुहणोत नैणसी के अनुसार वे मूलतः ब्राह्मण थे और बाद में क्षत्रिय कहलाए।
  • डॉ. स्मिथ उन्हें विदेशियों की संतान मानते हैं; कर्नल जेम्स टॉड व कविराज श्यामलदास ने फारसी तवारीखों के आधार पर उनका संबंध वल्लभीपुर (काठियावाड़) के शासकों से जोड़ा, जबकि डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने जैन ग्रन्थों के आधार पर उन्हें ब्राह्मण वंशीय बताया।

🌙राठौड़ वंश की उत्पत्ति

  • 'राठौड़' शब्द संस्कृत के 'राष्ट्रकूट' शब्द से विकसित हुआ माना जाता है।
  • दयालदास राठौड़ों को सूर्यवंशी व ब्राह्मणवंश के भट्टराव का वंशज बताते हैं, जबकि मुहणोत नैणसी और जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार वे कन्नौज से आए थे; कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें कन्नौज के शासक जयचंद का वंशज माना, तथा राज रत्नाकर ग्रन्थ व कुछ भाट साहित्यकारों ने उन्हें राजा हिरण्यकश्यप की संतान बताया।
  • राठौड़ वंश महाकाव्य तथा कोन्तूर (वि.सं. 917) व खंभात (वि.सं. 987) के शिलालेखों में उन्हें चन्द्रवंशी बताया गया है, यह मानते हुए कि उनकी उत्पत्ति शिवजी के सिर पर विराजमान चन्द्रमा से हुई।

🌳राठौड़ वंश की शाखाएँ

  • राठौड़ वंश की प्रमुख शाखाओं में हस्तिकुण्डी के राठौड़ (हरिवर्मा, विद्धराज, मम्मट, धवल, बालाप्रसाद जैसे शासक) और धनोप के राठौड़ (चच्च, भश्चीन, दन्तिवर्मा, बुद्धराज, गोविन्द आदि) शामिल हैं।
  • वागड़ के राठौड़ (जिन्हें छप्पनिया या वागड़िया राठौड़ भी कहा जाता है) की परम्परा राका व विक्रम जैसे शासकों से जुड़ी है, जबकि सबसे प्रसिद्ध व सबसे विस्तृत शाखा जोधपुर के राठौड़ों की रही, जिनके मूल पुरुष राव सीहा माने जाते हैं।

🧭जोधपुर के राठौड़ों की उत्पत्ति के दो मत

  • एक मत के अनुसार जोधपुर के राठौड़ मूलतः कन्नौज के निवासी थे — इसके समर्थकों में मुहणोत नैणसी, दयालदास सिंढायच, जोधपुर राज्य की ख्यात, पृथ्वीराज रासो, कर्नल जेम्स टॉड और पं. विश्वेश्वर नाथ रेउ शामिल हैं।
  • दूसरे मत के अनुसार, जिसे डॉ. हार्नली व डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा मानते हैं, जोधपुर के राठौड़ बदायूँ के राष्ट्रकूटों (राठौड़ों) के वंशज थे।
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चौहान एवं कछवाहा वंशों की उत्पत्ति

Origin of the Chauhan and Kachhwaha Dynasties

अग्निकुण्ड की पौराणिक कथा से जुड़े चौहानों और भगवान राम के वंश से नाता जोड़ने वाले कछवाहों — दोनों प्रमुख राजपूत कुलों की उत्पत्ति-कथाओं व विद्वत् मतों की झलक।

🔥चौहानों की उत्पत्ति के मत

  • एक प्रचलित कथा के अनुसार महर्षि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर एक यज्ञ किया, जिसके अग्निकुण्ड से चार राजपूत योद्धा — प्रतिहार, सोलंकी, परमार और चौहान — प्रकट हुए; कवि चन्दबरदाई, सूर्यमल्ल मिश्रण और मुहणोत नैणसी इसी अग्निकुण्ड उत्पत्ति के समर्थक हैं।
  • बिजौलिया शिलालेख, डॉ. दशरथ शर्मा, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, डॉ. भण्डारकर तथा कायम खाँ रासो (वत्स गोत्र के आधार पर) चौहानों को ब्राह्मण वंश से जोड़ते हैं, जबकि पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृथ्वीराज विजय, हम्मीर महाकाव्य, हम्मीर रासो और सुर्जन चरित उन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं।
  • आबू के अचलेश्वर मंदिर अभिलेख (1320 ई.) और हाँसी शिलालेख उन्हें चन्द्रवंशी बताते हैं, चौहानों का सेवाड़ी अभिलेख उन्हें इन्द्र देव का वंशज मानता है, डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने उन्हें खज्ज जाति से जोड़ा, जबकि कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक और वी.ए. स्मिथ ने उन्हें विदेशी शक-सीथियन जाति की संतान बताया।

🏹कछवाहों की उत्पत्ति

  • कछवाहा स्वयं को भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज मानते हुए रघुवंशी कहलाना पसंद करते हैं; कुछ विद्वान उन्हें कच्छपघटों से जोड़कर उनका संबंध ग्वालियर, डूबकुण्ड और नरवर (नरबद) से बताते हैं।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार वंश का नाम उनकी कुलदेवी कच्छवाहिनी से पड़ा, जबकि कवि सूर्यमल्ल मिश्रण के अनुसार वे कूर्म नामक एक रघुवंशी शासक के वंशज होने के कारण पहले 'कूर्मवंशी' कहलाए, जो बोलचाल में बदलकर 'कछवाहा' हो गया।
  • डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा का मानना है कि यह नाम किसी पुरुष विशेष के नाम पर पड़ा; अधिकांश विद्वानों की सहमति है कि ढूंढाड़ के कछवाहों का मूल पुरुष मूलतः ग्वालियर क्षेत्र से यहाँ आया था।