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राजस्थान GK

प्रागैतिहासिक स्थल व जनपद काल

Prehistoric Sites & the Janapada Age

पाषाण युग के औजारों से लेकर कालीबंगा, आहड़ व गणेश्वर की ताम्रयुगीन सभ्यताओं और मत्स्य-शिवि-मालव जैसे प्राचीन जनपदों तक — राजस्थान के पुरातात्विक इतिहास की एक रोमांचक यात्रा।

26 टॉपिक30 फ्लैशकार्ड13 MCQ
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पाषाण युग की नींव

Foundations of the Stone Age

मानव सभ्यता की सबसे पुरानी कहानी पत्थर के औजारों से शुरू होती है — राजस्थान की नदी घाटियाँ व पहाड़ी शैलाश्रय आज भी उस दौर के मूक गवाह हैं।

📚इतिहास का दो-भागीय विभाजन

  • अध्ययन की सुविधा के लिए इतिहास को दो भागों में बाँटा जाता है — प्रागैतिहासिक काल, जहाँ जानकारी का एकमात्र आधार उत्खनन में मिले पुरा-अवशेष होते हैं, और ऐतिहासिक काल, जिसके लिए पुरातात्विक सामग्री के साथ-साथ लिखित प्रमाण भी उपलब्ध हैं।
  • प्रागैतिहासिक काल लगभग 2,40,000 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व तक फैला माना जाता है, उसके बाद का समय ऐतिहासिक काल कहलाता है; राजस्थान में पाषाणकालीन संस्कृतियाँ मुख्यतः नदियों व उनकी सहायक धाराओं के किनारे पनपीं।

🔨पुरापाषाण काल

  • पुरापाषाण युग (लगभग 2,40,000-10,000 ईसा पूर्व) में मनुष्य हस्त कुठार, गंडासे व शल्कल जैसे खुरदरे पत्थर के औजार बनाता था; वह आग जलाना सीख चुका था पर पहिये से अपरिचित था।
  • सी.ए. हैकेट ने 1870 में जयपुर व इंद्रगढ़ (बूँदी) से हैण्ड एक्स व क्लीवर खोजे, जबकि ए.सी.एल. कार्लाइल को राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण शुरू करने का श्रेय जाता है; बूढ़ा पुष्कर, होकरा, जायल व भानगढ़ इसी काल के उल्लेखनीय स्थल हैं।
  • भरतपुर के 'दर' शैलाश्रय से मानवाकृति, बाघ, बारहसिंगा व सूर्य के चित्रों वाले प्राचीन शैलचित्र मिले हैं, जो इस काल के मानव जीवन की झलक देते हैं।

🏹मध्य पाषाण (सूक्ष्म पाषाण) काल

  • मध्य पाषाण काल (लगभग 10,000-9,000 ईसा पूर्व) में जैस्पर, चर्ट व कार्नेलियन जैसे पत्थरों से छोटे व हल्के औजार — ब्लेड, त्रिभुज, क्रेसेन्ट, स्क्रैपर व प्वॉइंटर — बनाए जाते थे, इसलिए इसे सूक्ष्म पाषाण युग भी कहा जाता है।
  • ऐसे लघु पाषाण उपकरण तिलवाड़ा-बालोतरा-सोजत (लूनी घाटी), निम्बाहेड़ा (बेड़च घाटी), बागोर (कोठारी नदी तट) तथा विराटनगर जैसे स्थलों से मिले हैं।
  • भीलवाड़ा के निकट कोठारी नदी तट पर स्थित बागोर, जहाँ स्थानीय लोग टीले को 'महासती' कहते हैं, भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणकालीन स्थल है; इसे जनवरी 1967 में वी.एन. मिश्र व एल.एस. लैशनिक ने खोजा और 1970 तक उत्खनन किया।
  • बागोर से पाँच मानव कंकाल, स्थायी बसावट के प्रमाण, मात्र पाँच ताम्र उपकरण (सुई, कुन्ताग्र आदि) व शवों के साथ दफनाए गए मनके-आभूषण मिले; यहीं देश में कृषि-पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य व सर्वाधिक रेडियो-कार्बन डेटिंग हुई है।

🌾नव पाषाण युग

  • नव पाषाण युग (लगभग 9000-3000 ईसा पूर्व, भारत में लगभग 5000 ईसा पूर्व से) की पहचान कृषि द्वारा खाद्य उत्पादन व स्थायी ग्राम्य जीवन के आरंभ से होती है; मनुष्य ने पशुपालन व खेती सीखकर घुमन्तू जीवन त्याग दिया।
  • राजस्थान में नवपाषाणकालीन अवशेष बूढ़ा पुष्कर, बागोर, तिलवाड़ा-बालोतरा, भैंसरोडगढ़-नवाघाट, गिलूण्ड, हम्मीरगढ़ व जहाजपुर सहित बनास-गंभीरी-लूनी नदी तटों पर मिले हैं।

🎨शैलचित्र

  • अरावली शृंखला व चम्बल घाटी के शैलाश्रयों में मिले चित्रों में आखेट (शिकार) के दृश्य सबसे अधिक हैं; बूँदी की छाजा नदी व कोटा के आलनिया क्षेत्र के अलावा विराटनगर, सोहनपुरा, नीम का थाना व 'दर' (भरतपुर) में भी चित्रित शैलाश्रय मिले हैं।
  • बनास व उसकी सहायक बेड़च-गंभीरी घाटियों में प्रारंभिक सोहन घाटी शैली के पेबुल उपकरण मिले, जबकि उत्तरी राजस्थान में सूखी सरस्वती-दृषद्वती तलहटी में पूर्व-हड़प्पा व हड़प्पा संस्कृति के भग्नावशेष मिले हैं।
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ताम्र-कांस्य युगीन सभ्यताएँ

Copper & Bronze Age Civilizations

ताँबे के औजार बनाना सीखते ही राजस्थान की नदी घाटियों में सुनियोजित बस्तियाँ बसने लगीं — कालीबंगा से लेकर आहड़ व गणेश्वर तक, हर स्थल अपनी अनूठी कहानी कहता है।

🧱कालीबंगा — नियोजित नगर

  • हनुमानगढ़ में प्राचीन सरस्वती (आज की घग्घर) नदी के तट पर बसा कालीबंगा — शाब्दिक अर्थ 'काली चूड़ियाँ' — सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का महत्त्वपूर्ण केंद्र था; कार्बन डेटिंग के अनुसार इसका काल 2300-1750 ईसा पूर्व माना जाता है।
  • भाषाशास्त्री एल.पी. टेस्सिटौरी ने पहली बार यहाँ के अवशेषों का अध्ययन किया, अमलानंद घोष ने 1952 में इसे सैंधव स्थल के रूप में पहचाना, और 1961-69 के बीच बी.बी. लाल व बी.के. थापर के निर्देशन में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने इसका उत्खनन किया — यह स्वतंत्रता के बाद उत्खनित भारत का प्रथम पुरातात्त्विक स्थल था।
  • कालीबंगा से दुनिया के जुते हुए खेत का प्राचीनतम प्रमाण मिला है, जहाँ ग्रिड पैटर्न में समकोण जुताई कर एक ही खेत में दो फसलें (संभवतः गेहूँ-जौ) उगाई जाती थीं; चौड़ी, समकोण पर कटती सड़कें व लकड़ी-पक्की ईंट की नालियाँ इसे एक सुनियोजित नगर सिद्ध करती हैं।
  • पश्चिमी टीले पर मिली सात अग्निवेदिकाएँ धार्मिक अनुष्ठान की ओर संकेत करती हैं, जबकि छह छिद्रों वाली एक बच्चे की खोपड़ी संभवतः प्राचीन चिकित्सा उपचार की ओर इशारा करती है; इतिहासकार दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को 'सिंधु सभ्यता की तीसरी राजधानी' कहा।

⚒️आहड़ / ताम्रवती नगरी

  • उदयपुर के निकट बेड़च व बनास नदियों के काँठे पर बसी आहड़ सभ्यता का प्राचीन नाम ताम्रवती नगरी था; पं. अक्षयकीर्ति व्यास ने 1953 में इसका पहला छोटा उत्खनन किया, इसके बाद 1961-62 में वी.एन. मिश्र व एच.डी. साँकलिया के निर्देशन में विस्तृत खुदाई हुई, जिसे साँकलिया ने 'आहड़ या बनास संस्कृति' नाम दिया।
  • गोपीनाथ शर्मा के अनुसार यह ताम्रयुगीन सभ्यता लगभग 1900-1200 ईसा पूर्व की है; आहड़वासी ताँबा गलाकर औजार बनाने में दक्ष थे और काले-लाल मृद्भाण्डों पर सफेद रंग से ज्यामितीय आकृतियाँ उकेरते थे — यही इसकी दो प्रमुख पहचान हैं।
  • 40 फुट गहरी खुदाई में बस्ती के आठ बार बनने-उजड़ने के प्रमाण मिले; मकान मिट्टी-पत्थर के थे, अनाज 'बंकोर-गौरे-कोठे' नामक बड़े भाण्डों में भरा जाता, तथा जल निकासी के लिए मिट्टी के घड़े तह दर तह रखकर बनाई गई 'चक्रकूप' पद्धति प्रयुक्त होती थी।
  • यूनानी लेख व अपोलो देवता अंकित 6 सिक्के व 3 मुहरें यहाँ विदेशी व्यापार का प्रमाण देती हैं, और आस-पास मिलीं लगभग 40 प्राचीन ताम्र खदानें बताती हैं कि आहड़ कल्कोपाइराइट अयस्क भण्डारों के बीच बसा था; बनास घाटी में अब तक लगभग 50 संबंधित पुरास्थल खोजे जा चुके हैं।

🏛️गिलूण्ड, ओझियाना व बालाथल — बनास संस्कृति के अन्य केंद्र

  • राजसमंद में बनास तट पर स्थित गिलूण्ड का उत्खनन पहले बी.बी. लाल (1959-60) ने और बाद में 1998-2003 में वी.एस. शिंदे व अमेरिकी पुरातत्त्वविद् ग्रेगरी पोशल ने किया; यहाँ पाँच प्रकार के मृद्भाण्ड, चूने से पुते मकान तथा 100×80 फुट के एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं।
  • बदनोर (ब्यावर) के पास पहाड़ी पर बसा ओझियाना बनास संस्कृति का इकलौता पहाड़ी स्थल है, जिसे बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी ने 2000-01 में खोदा; यहाँ मिली सफेद-चित्रित मिट्टी की बैल आकृतियाँ 'ओझियाना बुल' नाम से प्रसिद्ध हैं।
  • उदयपुर के बालाथल गाँव में वी.एन. मिश्र के निर्देशन में 1993 में हुए उत्खनन में 11 कमरों वाला विशाल भवन, मिट्टी की दुर्ग-जैसी संरचना तथा लोहा गलाने की पाँच भट्टियाँ मिलीं; बैराठ के अलावा बुने वस्त्र का एकमात्र प्रमाण यहीं मिला है, जो इसे आहड़ संस्कृति का नवीनतम उत्खनित स्थल बनाता है।

🪓गणेश्वर — ताम्रयुगीन संस्कृतियों की जननी

  • सीकर के नीम का थाना में काँतली नदी तट पर बसा गणेश्वर भारत का पहला ऐसा स्थल है जहाँ एक ही जगह से कुल्हाड़ी, तीर, भाले, सुई व चूड़ियों जैसे भारी मात्रा में ताम्र उपकरण मिले — यहाँ के औजारों में लगभग 99% शुद्ध ताँबा पाया गया।
  • लगभग 2800 ईसा पूर्व की यह पूर्व-हड़प्पाकालीन सभ्यता ताम्रयुगीन संस्कृतियों में सबसे प्राचीन मानी जाती है और इसे भारत की ताम्रयुगीन संस्कृतियों की जननी व 'ताम्र-संचयी संस्कृति' कहा जाता है; माना जाता है कि गणेश्वर से ही सिंधु घाटी सभ्यता को ताँबे की आपूर्ति होती थी।
  • यहाँ की काली-नीली सजावट वाली कपिषवर्णी (गैरिक) मिट्टी के बर्तन, मछली पकड़ने के काँटे (जो दर्शाते हैं कि तब काँतली नदी में भरपूर पानी था) व मिट्टी के छल्लेदार बर्तन इसकी विशेष पहचान हैं; काँतली घाटी में अब तक इस संस्कृति के लगभग 300 स्थल खोजे जा चुके हैं।

🔶अन्य ताम्रयुगीन स्थल

  • भीलवाड़ा के लाछूरा में हनुमान नाले के पास मिले अवशेष 7वीं सदी ईसा पूर्व से दूसरी सदी ईस्वी तक की चार क्रमिक सभ्यताओं (पूर्व-NBP, NBP, शुंग व कुषाण) की कहानी कहते हैं; मलाह (भरतपुर) से 1982 में राज्य का पहला ताम्रयुगीन अस्त्र-शस्त्र भण्डार — तलवारें व हार्पून — मिला।
  • कुराड़ा (पूर्व नाम खुर्दी, डीडवाना-कुचामन) से 1934 में राजस्थान का सबसे पहला ताम्र भण्डार मिला था, जिसमें एक प्रणालयुक्त अर्घ्यपात्र ईरान से संपर्क दर्शाता है; झाड़ोल (उदयपुर) व सावणिया (बीकानेर) से भी ताम्र उपकरणों के भण्डार मिले हैं, और किराड़ोत (जयपुर) से सिंधु घाटी शैली की 56 ताम्र चूड़ियाँ प्राप्त हुई हैं।
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लौहयुगीन व परवर्ती ऐतिहासिक पुरास्थल

Iron Age & Later Historic Sites

लोहे के आविष्कार के साथ राजस्थान में नए नगर उभरे — कुछ व्यापार के केंद्र बने तो कुछ बौद्ध व वैष्णव आस्था के, और इनके सिक्के व अवशेष आज भी उस दौर की गाथा सुनाते हैं।

🗡️नोह — भारत में लौह युग का प्राचीनतम प्रमाण

  • भरतपुर से 6 किमी दूर रूपारेल नदी तट पर स्थित नोह में 1963-67 में रतनचंद्र अग्रवाल व अमेरिकी विद्वान डॉ. डेविडसन ने पाँच सांस्कृतिक स्तरों की खुदाई की, जिनमें सबसे नीचे गेरूवर्णी मृद्भाण्ड (OCW) संस्कृति के अवशेष मिले।
  • दूसरे स्तर के काले-लाल मृद्भाण्ड (B&R ware) व मृद्पात्रों से चिपके कपड़ों के अवशेष दर्शाते हैं कि नोहवासी लगभग 1100-600 ईसा पूर्व में ही बुनाई व लोहे के प्रयोग से परिचित थे — यह भारत में लौह युग के आरंभ की प्राचीनतम सीमा-रेखा मानी जाती है।
  • तीसरे स्तर में चित्रित सलेटी मृद्भाण्ड (PGW) संस्कृति के प्रमाण मिले, जो जोधपुरा, विराटनगर व सुनारी में भी दोहराई गई; बाद के स्तरों से मौर्य व कुषाणकालीन सिक्के (हुविष्क, वासुदेव) तथा स्वस्तिक-अंकित मृद्पात्र भी मिले हैं।

🕌बैराठ / विराटनगर — मत्स्य जनपद की राजधानी

  • कोटपूतली-बहरोड़ जिले में स्थित बैराठ महाजनपदकाल में मत्स्य जनपद की राजधानी 'विराटनगर' थी; महाभारत के अनुसार यहीं पांडवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम वर्ष बिताया था, और 'कीचक के महल' का नाम भी इसी सभ्यता से जुड़ा है।
  • 1937 में भाबू पहाड़ी से मिले सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दो स्तंभ लेख उनकी बुद्ध-धम्म-संघ के प्रति निष्ठा दर्शाते हैं; 1999 में बीजक की पहाड़ी पर मिला वृत्ताकार बौद्ध स्तूप व मठ राजस्थान में इस काल का एकमात्र गोल चैत्यगृह है और अशोक के बौद्ध होने का सबसे पुख्ता प्रमाण माना जाता है।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग यहाँ लगभग 634 ई. में आया और उसने आठ बौद्ध मठों का उल्लेख किया; दयाराम साहनी के अनुसार हूण शासक मिहिरकुल ने छठी सदी में बैराठ को ध्वस्त किया, जबकि बाद में मुगल सम्राट अकबर ने यहाँ अजमेर-यात्रा के दौरान रात्रि विश्राम कर एक टकसाल भी स्थापित की थी।

🛕नगरी (मध्यमिका) — शिवि जनपद की राजधानी

  • चित्तौड़गढ़ से लगभग 13 किमी दूर बेड़च नदी के मुहाने पर स्थित नगरी (प्राचीन मध्यमिका) की खोज 1872 में ए.सी.एल. कार्लाइल ने की थी; यह शिवि जनपद की राजधानी थी और यहाँ से 'मझिमिकाय शिवि जनपदस' अंकित सिक्के मिले हैं।
  • यहाँ मिले दूसरी सदी ईसा पूर्व के दो वैष्णव अभिलेखों में सर्वतात द्वारा अश्वमेध व वाजपेय यज्ञ का उल्लेख है, जो मेवाड़ की इस भूमि को भारत में भागवत धर्म के सबसे प्राचीन केंद्रों में गिनता है; डॉ. भण्डारकर को यहाँ गुप्तकालीन शेर व वृषभ शीर्ष वाले दो स्तम्भ भी मिले।
  • उत्खनन में मिली सुंदर प्रागैतिहासिक मिट्टी की बतख चित्तौड़गढ़ संग्रहालय में सुरक्षित है; यहाँ चार चक्राकार कुएँ (चक्रकूप) व एक नहर के अवशेष भी मिले हैं।

🔥जोधपुरा व सुनारी — पीजीडब्ल्यू व लौह-प्रगलन केंद्र

  • साबी नदी तट पर बसे जोधपुरा (कोटपूतली-बहरोड़) की खुदाई 1972-73 में रतनचंद्र अग्रवाल व विजय कुमार ने की; यह राजस्थान में चित्रित सलेटी मृद्भाण्ड (PGW) संस्कृति का महत्त्वपूर्ण केंद्र था, जहाँ लोग लोहा गलाकर औजार बनाना व घोड़े से रथ खींचना जानते थे।
  • झुंझुनूं के सुनारी में 1980-81 में हुए उत्खनन में लोहा गलाने की खुली धमन भट्टी व औजार ढालने की धौंकनी वाली भट्टी अलग-अलग मिलीं — ये भारत की प्राचीनतम लौह-भट्टियों में गिनी जाती हैं; यहीं देशभर में एकमात्र लोहे का प्याला (कटोरा) भी मिला है।

🪙तिलवाड़ा व रैढ़

  • लूनी नदी तट पर बसा तिलवाड़ा (बालोतरा, प्राचीन नाम खेड़गढ़) मध्यपाषाणकालीन स्थल है जो आहड़-बनास संस्कृति से जुड़ा नहीं है; यहाँ 1967-68 के उत्खनन में पाँच आवास स्थलों व मानव-पशु अस्थि भस्म युक्त एक अग्निकुण्ड के अवशेष मिले हैं।
  • टोंक की निवाई तहसील में ढील नदी तट पर बसे रैढ़ को इसके विशाल लौह भण्डार के कारण 'प्राचीन भारत का टाटा नगर' कहा जाता है; यहाँ 'मालव जनपदस' अंकित सीसे की मुद्रा व एशिया का अब तक का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।
  • 1938-39 में दयाराम साहनी व बाद में डॉ. केदारनाथ पुरी ने यहाँ खुदाई की; मथुरा-शैली से प्रभावित वसुंधरा व शालभंजिका जैसी मृण्मूर्तियाँ, 115 रिंग वेल्स तथा जस्ता शुद्धिकरण के प्रमाण रैढ़ को लोहे व कपड़ा-निर्माण का बड़ा केंद्र सिद्ध करते हैं।

🗿अन्य महत्त्वपूर्ण पुरास्थल

  • हनुमानगढ़ के रंगमहल में मिली मथुरा-गांधार शैली की मृण्मूर्तियाँ राजस्थान में कृष्ण-लीला का प्राचीनतम अंकन हैं, तो सौंथी-सीसवाल (लगभग 4600 ईसा पूर्व) व करनपुरा जैसे पूर्व-हड़प्पाकालीन स्थलों ने चौतांग नदी क्षेत्र में लगभग 165 संबंधित स्थलों की श्रृंखला उजागर की है।
  • श्रीगंगानगर के बरोर में काली मिट्टी के अनूठे मृद्भाण्ड व लगभग 8000 सेलखड़ी मनके मिले हैं, जबकि साँभर (जयपुर) में गुप्त व प्रतिहार-कालीन मंदिर के अवशेष तथा भीनमाल (जालौर) में रोमन एम्फोरा व यूनानी सुराही जैसे विदेशी व्यापार के प्रमाण मिले हैं।
  • माउंट आबू के निकट चन्द्रावती की खोज 1822 में कर्नल जेम्स टॉड ने की थी; यहाँ किले व 33 मंदिर समूहों के अवशेष, पाषाणकालीन उपकरण व 1325 ई. का एक अभिलेख मिला है।
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राजस्थान के प्रमुख जनपद

Major Janapadas of Rajasthan

सिकंदर के आक्रमण के बाद पंजाब से भागकर आईं कई स्वतंत्रताप्रिय जनजातियाँ राजस्थान में बस गईं और अपने-अपने जनपद स्थापित किए — इन्हीं से राजस्थान के प्राचीन राजनीतिक भूगोल की नींव पड़ी।

🌍जनपद व्यवस्था की पृष्ठभूमि

  • इतिहासकारों ने महाजनपदकाल को भारत का 'द्वितीय नगरीकरण' कहा है, जबकि प्रथम नगरीय सभ्यता सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता मानी जाती है; राजस्थान में आर्य जातियाँ मत्स्य, शिवि, शाल्व, मालव, राजन्य, यौधेय, मरु, शूरसेन, अर्जुनायन, जांगल व अवन्ति जैसे जनपदों में संगठित थीं।
  • सिकंदर के आक्रमण, मौर्यों के बढ़ते राजनीतिक एकीकरण और इंडो-यूनानी व उत्तरी क्षत्रपों के विदेशी शासन से प्रभावित होकर मालव, शिवि, अर्जुनायन, यौधेय, आभीर, राजन्य व उदेहिक जैसी अनेक गणतंत्रीय जातियाँ पंजाब छोड़कर राजस्थान आ बसीं और यहीं अपने जनपद बसाए।

🐟मत्स्य जनपद

  • ऋग्वेद में आर्यों के एक प्रमुख समूह के रूप में उल्लिखित मत्स्य जनपद का विस्तार आज के जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, अलवर, करौली, खैरथल-तिजारा, भरतपुर व डीग जिलों तक था; इसकी प्राचीन राजधानी उपाप्लव्य कही जाती है।
  • महाभारत काल में राजा विराट यहाँ के शासक थे, जिन्होंने विराटनगर (बैराठ) को राजधानी बनाया और जहाँ पांडवों ने अज्ञातवास का अंतिम वर्ष बिताया; समाज में चौपड़-पासा, घुड़सवारी, शिकार व नृत्य-संगीत लोकप्रिय थे और स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।
  • महाभारत व शतपथ ब्राह्मण के अनुसार मत्स्य में लंबे समय तक राजतंत्र चला; बाद में चेदियों से युद्ध में करारी हार के बाद मत्स्य जनपद चेदि जनपद में मिला दिया गया, और अंततः यह मगध साम्राज्य का हिस्सा बन गया।

🛡️शिवि जनपद

  • भीलवाड़ा-चित्तौड़गढ़ के आसपास व उदयपुर के पूर्व-पश्चिम-उत्तर क्षेत्रों में बसे शिवि गणों के नाम पर यह जनपद जाना जाता था; ऋग्वेद में इनका सबसे पहला उल्लेख राजा सुदास द्वारा पराजित जाति के रूप में मिलता है।
  • इंडो-यूनानी आक्रमण (मिनेन्डर) के दबाव में शिवि जाति पंजाब से मध्यमिका (आज की नगरी, चित्तौड़गढ़) में लगभग 187 ईसा पूर्व बस गई, जो इनकी राजधानी बनी; मध्यमिका को इतिहासकार भारत में वैष्णव भागवत धर्म के प्राचीनतम पूजा-केंद्रों में गिनते हैं।
  • शिवि सिक्कों पर चारों कोनों में स्वस्तिक-वृषभ का संयोजन भारत में यहीं पहली बार देखा गया है; कनिष्क के बाद यह जनपद क्रमशः कुषाणों, शक क्षत्रप नहपान, सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी व शक शासक रुद्रदामन के अधीन रहा, अंततः चंद्रगुप्त द्वितीय के समय गुप्त साम्राज्य में मिल गया।

💰मालव जनपद

  • सिकंदर के आक्रमण के समय पंजाब से भागकर मालव गण नगर (टोंक, प्राचीन कर्कोट नगर) में आ बसे; इनके सिक्कों पर 'मालवानाम् जयः' या 'जय मालवानाम्' अंकित मिलता है और नन्दसा यूप अभिलेख में भी इनका उल्लेख है।
  • मालवों को गण कहा जाता था और सिक्के भी गण के नाम से चलते थे; शक शासक नहपान ने इन्हें पराजित किया, जबकि प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार मालव, अर्जुनायन व यौधेय जैसी जातियों ने समुद्रगुप्त के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था।

🐫मरु, जांगल व शूरसेन जनपद

  • आर्यों का प्रारंभिक गणतंत्र माना जाने वाला मरु जनपद बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर-बालोतरा, नागौर, डीडवाना-कुचामन, चूरू व गंगानगर तक फैला था; कालांतर में इसी क्षेत्र से कुरु, मद्र व जांगल जैसे जनपद विकसित हुए।
  • जांगल जनपद बीकानेर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, जोधपुर व फलौदी के हिस्सों तक फैला था, जिसकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (आज का नागौर) थी; पौराणिक कथाओं के अनुसार बलराम-श्रीकृष्ण द्वारका जाते समय इसी क्षेत्र से गुजरे थे।
  • भरतपुर, डीग, धौलपुर व करौली के भागों में फैला शूरसेन जनपद, जिसकी राजधानी मथुरा (उत्तर प्रदेश) थी, यूनानी लेखकों के अनुसार 'शूरसेन' या 'सौरसेन' कहलाता था; बयाना प्रशस्ति में भी इसके राजवंश का उल्लेख मिलता है।

🏇अर्जुनायन, यौधेय, शाल्व, चेदि, राजन्य व अवन्ति जनपद

  • भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले अर्जुनायन जनपद के सिक्कों पर 'अर्जुनायनानां जयः' अंकित है, जबकि गंगानगर-हनुमानगढ़-बीकानेर के हिस्सों में फैले यौधेय जनपद ने अर्द्ध-राजसत्तात्मक व्यवस्था अपनाई थी, जिसका प्रमुख 'महाराज सेनापति' कहलाता था और सिक्कों पर 'यौधेय गणस्य जयः' लिखा मिलता है।
  • माना जाता है कि यौधेयों ने ही उत्तरी राजस्थान में कुषाण सत्ता का अंत किया; ये भगवान कार्तिकेय व देवी चामुंडा के उपासक थे। अलवर के निकट मत्स्य से सटा शाल्व जनपद, जिसकी राजधानी मृत्तिकावती थी, तथा उसी क्षेत्र में चेदि व भरतपुर के निकट राजन्य जनपद भी विद्यमान थे।
  • उदयपुर-चित्तौड़गढ़ के आसपास फैला अवन्ति जनपद भारत के सोलह महाजनपदों में गिना जाता था — यह दर्शाता है कि राजस्थान की धरती उस काल की अखिल भारतीय राजनीतिक व्यवस्था से भी सीधे जुड़ी थी।
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क्षेत्रीय नामकरण व जनपदीय सिक्के

Regional Names & Janapada Coins

पाँचवीं सदी के बाद हूण आक्रमणों ने पुरानी जनपद-व्यवस्था को तोड़ दिया और उसकी जगह मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती जैसे नए क्षेत्रीय नाम उभरे, जबकि प्राचीन जनपदों के सिक्के आज भी उनकी पहचान के अनूठे दस्तावेज़ हैं।

🏰मेवाड़ व वागड़

  • शिवि जनपद के उत्तराधिकारी क्षेत्र मेवाड़ में आज के उदयपुर, सलूम्बर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, राजसमंद व भीलवाड़ा जिले शामिल हैं; यहाँ शासन करने वाले गुहिल-सिसोदिया वंश की राजधानियाँ समय-समय पर नागदा, आहड़, कुम्भलगढ़, चावंड व उदयपुर रहीं, और यहाँ की भाषा मेवाड़ी कहलाती है।
  • डूँगरपुर व बाँसवाड़ा से मिलकर बना वागड़ क्षेत्र अपनी वागड़ी बोली के लिए जाना जाता है, जबकि झुंझुनूं के नरहड़, भादरा, नोहर व कनणा के संयुक्त क्षेत्र को 'बांगड़' कहा जाता है।

🐎मारवाड़, हाड़ौती, ढूँढाड़ व मेवात

  • मरु जनपद के उत्तराधिकारी मारवाड़ पर सातवीं सदी में मण्डोर (जोधपुर) से गुर्जर-प्रतिहारों ने शासन शुरू किया और बाद में यहाँ राठौड़ वंश की सत्ता स्थापित हुई।
  • कोटा, बूँदी, बारां व झालावाड़ से बना हाड़ौती क्षेत्र चौहान वंश की हाड़ा शाखा के नाम पर जाना गया और यहाँ हाड़ौती बोली बोली जाती है; जयपुर व आसपास फैला ढूँढाड़ क्षेत्र कछवाहा वंश के अधीन रहा और यहाँ ढूँढाड़ी बोली प्रचलित है।
  • अलवर, खैरथल-तिजारा, भरतपुर व डीग से बना मेवात क्षेत्र मेव समुदाय का निवास स्थान है, जिसके सर्वाधिक प्रसिद्ध नायक हसन खाँ मेवाती माने जाते हैं।

🧭अन्य क्षेत्रीय नाम

  • जैसलमेर को मांड/वल्ल, जोधपुर के दक्षिणी भाग को गुर्जरत्रा, प्रतापगढ़ को कांठल, झालावाड़ के हिस्से को मालवा क्षेत्र, चूरू-झुंझुनूं-सीकर को शेखावाटी, ब्यावर-अजमेर को मेरवाड़ा, उदयपुर के एक भाग को मेवल, सिरोही व आसपास को अर्बुद देश तथा जालौर को स्वर्णगिरि कहा जाता रहा है।

🪙जनपदीय सिक्के

  • जनपदीय सिक्के प्रमुखतः नलियासर (साँभर), रैढ़ (टोंक), कुन्दरा (सवाई माधोपुर), नगरी (चित्तौड़), नगर (उणियारा, टोंक), चाकसू व नमाना (बूँदी) से प्राप्त हुए हैं; इन पर वृषभ, हिरण, हाथी, यूप स्तम्भ व वृक्ष जैसे चिह्न अंकित मिलते हैं।
  • मालव सिक्के गोल, चौकोर व आयताकार तीनों आकारों में मिलते हैं; यौधेय सिक्कों पर देव सेनापति स्कंध (कार्तिकेय) व देवी षष्ठी अंकित हैं, जबकि गोल आकार के, ताँबे से बने व ब्राह्मी लिपि वाले शिवि सिक्के सबसे अधिक चित्तौड़ के निकट बेड़च नदी तट से मिले हैं।
  • ताँबे व चाँदी से बने आहत (पंच-मार्क्ड) सिक्के भारत के सबसे प्राचीन सिक्के माने जाते हैं; बयाना पर वरीक वंश का शासन था और इसे 'कब्रगाहों का शहर' भी कहा जाता है।