मुख्य सामग्री पर जाएं
🪙
राजस्थान GK

सिक्के

Coins

प्राचीन आहत मुद्राओं से लेकर राजपूत रियासतों के टकसालों तक — राजस्थान में सिक्कों के ढलने, बदलने और सफर करने की पूरी कहानी।

22 टॉपिक27 फ्लैशकार्ड15 MCQ
📜

मुद्राशास्त्र का परिचय

Introduction to Numismatics

सिक्कों को पढ़ना अपने आप में इतिहास पढ़ने जैसा है — यहाँ जानिए मुद्राशास्त्र क्या है, राजस्थान की सबसे पुरानी ठप्पेदार मुद्राएँ कैसी दिखती थीं, और किन पुस्तकों ने इन्हें दर्ज किया।

🔬मुद्राशास्त्र

  • सिक्कों के अध्ययन को समर्पित विज्ञान को मुद्राशास्त्र (Numismatics) कहा जाता है, जो प्राचीन अर्थव्यवस्था, कला व राजनीति को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

🔨आहत (पंचमार्क) मुद्राएँ

  • सबसे पुरानी आहत या पंचमार्क मुद्राएँ लगभग 600 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के बीच प्रचलन में रहीं; धातु पर ठप्पा मारकर ढाले जाने के कारण इन्हें 'आहत मुद्रा' नाम दिया गया — यह नामकरण मुद्राशास्त्री जेम्स प्रिंसेप ने 1835 ई. में किया था।
  • समकालीन स्रोतों में इन सिक्कों को धरण, कार्षापण और पण जैसे कई नामों से जाना जाता था।
  • इन मुद्राओं पर आमतौर पर पाँच चिह्न उकेरे मिलते हैं — सूर्य, तीर, मछली, घंटा और कोई पौधा या पशु।
  • राजस्थान में आहत मुद्राएँ रैढ़, विराटनगर (बैराठ), इस्माइलपुर, साँभर, जसवंतपुरा, नगरी, नोह और गुरारा सहित कई स्थलों की खुदाई में मिली हैं; बैराठ से 8 और साँभर से 6 चाँदी की पंचमार्क मुद्राएँ प्राप्त हुईं।

📚राजपूताना के सिक्कों पर पुस्तकें

  • राजपूताना में समय-समय पर प्रचलित रहे सिक्कों का ऐतिहासिक विवरण एडवर्ड थॉमस की 'क्रॉनिकल्स ऑफ द पठान किंग्स ऑफ डेहली' तथा विलियम वेब की 'द करेंसीज ऑफ द हिन्दू स्टेट्स ऑफ राजपूताना' जैसी पुस्तकों में मिलता है।
🏛️

प्राचीन जनपद व विदेशी प्रभाव की मुद्राएँ

Ancient Janapada & Foreign-influence Coins

ईसा-पूर्व सदियों में राजस्थान की धरती पर यूनानी शासकों से लेकर स्वतंत्र गणतांत्रिक जनपदों तक की मुद्राएँ ढलीं — इन प्राचीन सिक्कों की झलक यहाँ देखें।

🏹इंडो ग्रीक मुद्राएँ

  • आहड़ की खुदाई में मिली इंडो ग्रीक मुद्राओं पर एक तरफ दोनों हाथों में तीर थामे देवता अपोलो की आकृति और दूसरी तरफ 'महागजनत्रतर्स' शब्द अंकित मिलता है।
  • बैराठ में कुल 28 इंडो ग्रीक मुद्राएँ मिलीं, जिनमें से 16 यूनानी शासक मिनेण्डर के काल की हैं।
  • साँभर की खुदाई से चाँदी की एक इंडो ग्रीक मुद्रा प्राप्त हुई, जो शासक एण्टियोकस निकेफोरस की है।

🌳मालवगण की मुद्राएँ

  • मालव जनपद के गणतांत्रिक कबीले द्वारा ढाली गईं मालवगण मुद्राएँ आकार में छोटी और वजन में 1.5 से 10 ग्रेन के बीच होती थीं; राजस्थान में उत्खनन से मिली मुद्राओं में सबसे अधिक संख्या इसी मालव जनजाति की मुद्राओं की है।
  • मालव मुद्राओं का काल ईसा पूर्व दूसरी सदी से लेकर ईसा की दूसरी सदी तक फैला है; इन पर सूर्य और बोधिवृक्ष के चिह्नों के साथ-साथ सेनापतियों के नाम भी अंकित मिलते हैं।

🪙नहपान की मुद्राएँ

  • अजमेर क्षेत्र में शक क्षत्रप शासक नहपान द्वारा जारी सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

🐂यौधेय जनपद की मुद्राएँ

  • ईसा पूर्व दूसरी सदी की यौधेय जनपद की मुद्राओं पर एक तरफ नंदी व स्तंभ का अंकन तथा ब्राह्मी लिपि में 'यौधेयानां बहुधान' लेख मिलता है।
  • ईसा की दूसरी सदी की यौधेय मुद्राओं पर कमल-आसन पर विराजमान षडानन कार्तिकेय की प्रतिमा तथा ब्राह्मी लिपि में 'भागवतः यौधेयेन' अंकित है।
  • चौथी सदी ई. की यौधेय मुद्राओं पर कार्तिकेय, किसी देव अथवा सूर्य की प्रतिमा उकेरी मिलती है।

⚔️सेनापति व मित्र मुद्राएँ

  • रैढ़ में छह के एक समूह में मिले सेनापति सिक्कों में एक गोल तथा पाँच चौकोर आकार के हैं; इन पर ब्राह्मी लिपि में 'वच्छघोष' और 'नन्दी' के चिह्न अंकित हैं।
  • इसी शृंखला की मुद्राओं पर सूर्यमित्र, ब्रह्ममित्र और ध्रुवमित्र जैसे नाम मिलते हैं; ब्रह्ममित्र की मुद्रा पर लक्ष्मी की प्रतिमा है जबकि अन्य पर त्रिशूल, तालाब में तीन मछलियाँ तथा बैल जैसे चिह्न उकेरे गए हैं।
⛏️

उत्खनन स्थलों से प्राप्त मुद्राएँ

Coins Recovered from Excavation Sites

टोंक से लेकर हनुमानगढ़ तक फैली खुदाइयों ने राजस्थान की मिट्टी से हजारों प्राचीन सिक्के बाहर निकाले हैं — जानिए किस स्थल से कितनी और कैसी मुद्राएँ मिलीं।

🏺रैढ़ (टोंक) से प्राप्त मुद्राएँ

  • टोंक के रैढ़ स्थल की खुदाई में एक साथ चाँदी की 3075 आहत (पंचमार्क) मुद्राएँ मिलीं — यह देश में किसी एक उत्खनन से प्राप्त मुद्राओं की सर्वाधिक संख्या है; इन्हें 'धरण' या 'पण' कहा जाता था।
  • इनके अतिरिक्त रैढ़ से मालव, मित्र, सेनापति और इंडो-सेसेनियन शैली की गणमुद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं।

🥉नगर (टोंक) से प्राप्त मुद्राएँ

  • टोंक के नगर स्थल पर पुरातत्वविद् कार्लाइल को लगभग 6,000 ताँबे की मालव जनपद मुद्राएँ मिलीं, जो अब तक विश्व में मिली मुद्राओं में सबसे छोटी और सबसे हल्की मानी जाती हैं।

🏛️बैराठ से प्राप्त मुद्राएँ

  • बैराठ की खुदाई में चाँदी की 8 पंचमार्क (आहत) मुद्राओं के साथ 28 इंडो ग्रीक व यूनानी मुद्राएँ भी मिलीं, जिनमें 16 सिक्के यूनानी शासक मिनेण्डर के काल के हैं।

🏯रंगमहल से प्राप्त मुद्राएँ

  • हनुमानगढ़ के रंगमहल स्थल से ताँबे की 105 मुद्राएँ मिली हैं, जिनमें कुछ कुषाणोत्तर काल की 'मुरुण्डा' मुद्राएँ हैं; यहाँ कुषाण शासक कनिष्क-प्रथम की एक मुद्रा तथा हविष्क, वाजिष्क और कनिष्क-तृतीय की मुद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं।

🏞️साँभर से प्राप्त मुद्राएँ

  • साँभर में कुल 200 मुद्राएँ मिली हैं, जिनमें चाँदी की 6 पंचमार्क मुद्राएँ, ताँबे की 6 इंडो-सेसेनियन मुद्राएँ तथा कुषाण शासक हविष्क की एक मुद्रा शामिल है।
  • ये इंडो-सेसेनियन मुद्राएँ पाँचवीं सदी ई. के बाद राजस्थान में हूणों के आगमन का प्रमाण मानी जाती हैं; साँभर में मिली यौधेय मुद्रा पर ब्राह्मी लिपि में 'बबुधना' और 'गण' शब्द अंकित हैं।
🕉️

गुप्त, प्रतिहार व चौहानकालीन मुद्राएँ

Gupta, Pratihara & Chauhan-period Coins

गुप्तकाल के सोने से लेकर चौहान शासकों की चाँदी-ताँबे की मुद्राओं तक — मध्यकाल की ओर बढ़ते राजस्थान की टकसालों की कहानी यहाँ पढ़ें।

🥇गुप्तकालीन मुद्राएँ

  • भरतपुर जिले की बयाना तहसील स्थित नगला छैल गाँव से गुप्तकाल की 1,821 सोने की मुद्राएँ मिली हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के शासनकाल की है।
  • इनके अलावा गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएँ जयपुर के मारोली व बुन्दावली का टीबा, साँभर के नलियासर, भरतपुर के बयाना, अजमेर के अहेड़ा, सुखपुरा के सायला तथा टोंक के देवली स्थलों से भी प्राप्त हुई हैं।
  • सायला से समुद्रगुप्त (लगभग 350-375 ई.) की ध्वज-शैली की सोने की मुद्राएँ मिली हैं।

⚜️गुर्जर-प्रतिहार कालीन मुद्राएँ

  • मारवाड़ क्षेत्र में मिली गुर्जर-प्रतिहार कालीन मुद्राओं पर सेसेनियन शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखता है; इन्हें 'आदिवराह' शैली की मुद्राएँ माना गया है।
  • मारवाड़ में इस काल की गधिया मुद्राओं के साथ-साथ आदिवराह द्रम्म (मिहिर भोज व विनायकपाल देव द्वारा जारी), बरमल, द्रमार्थ, द्रमात्रिभाग और पंचीयम द्रम्म मुद्राओं का भी उल्लेख मिलता है।

🐎चौहानकालीन मुद्राएँ

  • 11वीं से 13वीं सदी के बीच साँभर-अजमेर व नाडोल-जालौर के चौहान शासकों की चाँदी व ताँबे की मुद्राएँ मिली हैं, जिन्हें समकालीन शिलालेखों में द्रम्म, विंशोपक, रूपक (अजयराज द्वारा) व दीनार कहा गया है।
  • अजयराज, अपने नाम पर सिक्के जारी करने वाला अजमेर के चौहान वंश का पहला शासक था। रानी सोमलेखा (अजयदेव की रानी) ने चाँदी की मुद्राएँ जारी कीं, तो राजा सोमेश्वर ने वृषभ व अश्वारोही शैली की मुद्राएँ चलवाईं।
🏰

राजपूत रियासतों की मुद्राएँ

Coins of the Rajput Princely States

मध्यकाल से लेकर ब्रिटिश दौर तक, मेवाड़ से बीकानेर तक — हर रियासत की अपनी टकसाल, अपने नाम और अपनी पहचान वाले सिक्के चलते थे; यहाँ जानिए उनकी विविधता।

🛡️मेवाड़ राज्य की मुद्राएँ

  • मेवाड़ में प्रचलित मुद्राएँ 'इंडो-सेसेनियन शैली' की थीं; चाँदी के सिक्कों को द्रम्म व रूपक और ताँबे के सिक्कों को कार्षापण कहा जाता था, जबकि ताँबे का चौकोर सिक्का 'ढींगला' कहलाता था।
  • चित्तौड़ विजय के बाद मुगल बादशाह अकबर ने वहाँ 'सिक्का एलची' नामक मुद्रा जारी की; मेवाड़ में प्रचलित अन्य ताँबे के सिक्के ढींगला, भिलाड़ी, त्रिशूलिया, भींडरिया और नाथद्वारिया जैसे नामों से जाने जाते थे।
  • नगरी (मध्यमिका) की खुदाई में मिले चाँदी व ताँबे के सिक्कों पर एक ओर 'शिवि जनपद' अंकित है, और मेवाड़ के कई स्थलों पर हूणों द्वारा प्रचलित गधिया सिक्के भी पाए गए हैं।
  • महाराणा कुंभा के सिक्कों पर एक ओर 'कुंभकर्ण' या 'श्री कुंभलमेरु महाराणा' और दूसरी ओर 'श्री एकलिंगजी दाता साम' अंकित मिलता है; महाराणा संग्रामसिंह के सिक्कों पर स्वस्तिक या त्रिशूल का चिह्न है, जबकि महाराणा स्वरूपसिंह के सिक्कों पर देवनागरी में 'चित्रकूट उदयपुर' के साथ चित्तौड़ दुर्ग की प्राचीर तथा दूसरी ओर 'दोस्ति लंधन' अंकित है।

🏇जोधपुर राज्य की मुद्राएँ

  • मारवाड़ क्षेत्र में गधिया सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं; महाराजा तख्तसिंह की सोने की मुहरों पर विक्टोरिया और तख्तसिंह का नाम तथा झाड़ व तलवार की आकृति अंकित थी।
  • महाराजा विजयसिंह के काल के विजयशाही सिक्कों पर फारसी में आगे की ओर 'सिक्कह मुबारक बादशाह आलम' और पीछे की ओर 'मैमनत मानूस जर्ब अल जोधपुर' अंकित है।

🦚बीकानेर राज्य की मुद्राएँ

  • लगभग 1759 ई. में बीकानेर की टकसाल से शाहआलम के नाम की चाँदी की मुद्राएँ ढाली गईं, जो 1859 ई. तक प्रचलन में रहीं।
  • महाराजा गजसिंह के समय की मुद्राओं पर फारसी में एक ओर 'सिक्कह मुबारक साहब किरांसानी आलम बादशाह गाजी' तथा दूसरी ओर 'सन् 1121 जुलूस मैमनत मानूस' अंकित मिलता है।
  • 1859 ई. के बाद के बीकानेर सिक्कों पर एक ओर फारसी में 'औरंग आराय हिंद व इंग्लिस्तान क्वीन विक्टोरिया 1859' तथा दूसरी ओर 'जर्ब श्री बीकानेर 1916' अंकित होता था, जबकि गंगाशाही सिक्कों पर महारानी विक्टोरिया के चेहरे के साथ अँग्रेजी में 'VICTORIA EMPRESS' तथा देवनागरी-उर्दू में 'महाराजा गंगासिंह बहादुर' लिखा मिलता था।
  • इनके अतिरिक्त बीकानेर की कुछ मुद्राओं पर मोरछल (मोर-पंखों का पंखा) का अंकन भी देखने को मिलता है।

🌿जयपुर राज्य की मुद्राएँ

  • जयपुर रियासत में मुगलों द्वारा जारी सिक्के 'मुगली सिक्के' कहलाते थे; जयपुर के अपने सिक्कों पर छह टहनियों वाले झाड़ का चिह्न होने के कारण उन्हें 'झाड़शाही सिक्के' कहा गया।
  • जयपुर के माधोशाही सिक्कों पर शाहआलम बहादुर का नाम अंकित था; माधोसिंह के शासनकाल की मुद्राओं को 'हाली सिक्का' भी कहा जाता था।
  • जयपुर में ताँबे के सिक्कों का प्रचलन 1760 ई. से शुरू हुआ, जिन्हें 'पुराना झाड़शाही पैसा' कहा जाता है; इन पर एक ओर 'सिक्का मुबारक बादशाह गाजीशाह आलम' और दूसरी ओर 'जर्ब सवाई जयपुर' तथा झाड़ का चिह्न अंकित होता था।
  • 1806 ई. में प्रचलित जयपुर के मुहम्मदशाही सिक्कों पर मछली का चिह्न भी अंकित मिलता है।

🏷️अन्य रियासतों की मुद्राओं के नाम

  • डूँगरपुर की मुद्राएँ उदयशाही, त्रिशूलिया, पत्रीसिरिया व चित्तौड़ी सालिमशाही कहलाती थीं; बूँदी ने रामशाही, कटारशाही, चेहरेशाही, ग्यारह-सना व हाली सिक्के चलाए; प्रतापगढ़ की मुद्राओं में सालिमशाही, मुबारकशाही, सिक्का मुबारक लन्नर, नया सालिमशाही व आलमशाही शामिल थे; और टोंक रियासत की टकसाल से चँवरशाही सिक्का ढला।
  • कोटा रियासत ने गुमानशाही, लक्ष्मणशाही, मदनशाही, हाली व मुहम्मद बीदारबख्श सिक्के जारी किए; धौलपुर की मुद्रा तमंचाशाही कहलाती थी; झालावाड़ में नये व पुराने मदनशाही, मदनशाही पैसा व मदनशाही टक्का प्रचलित थे; और जैसलमेर रियासत की मुद्राओं में अखैशाही, मुहम्मदशाही, डोडिया, डब्बू पैसा, नजराना सिक्के व पुट्ठा मुद्रा शामिल थीं।
  • अलवर ने रावशाही, रावशाही टक्का व हाली सिक्के चलाए; करौली की मुद्राएँ माणकशाही व कटार झाड़शाही कहलाती थीं; सिरोही में भिलाड़ी सिक्का प्रचलित था; बाँसवाड़ा ने लक्ष्मणशाही व सालिमशाही सिक्के जारी किए; और सलूंबर की मुद्रा पद्मशाही कहलाती थी।
  • शाहपुरा में ग्यारसंदा, माधोशाही, संदिया, चित्तौड़ी व भिलाड़ी सिक्के प्रचलित थे; किशनगढ़ की मुद्राएँ चाँदोड़ी व शाहआलम कहलाती थीं; और भरतपुर रियासत का सिक्का शाहआलमी नाम से जाना जाता था।

🏭राजस्थान की क्षेत्रीय टकसालें

  • नागौर की टकसाल से अमरशाही सिक्का, पाली की टकसाल से विजयशाही सिक्का तथा सोजत की टकसाल से लल्लूलिया (लल्लूशाही) सिक्का ढाला जाता था।
  • कुचामन की टकसाल से इकतीसंदा, बोपूशाही, बोरसी व कुचामनिया सिक्के तथा मेड़ता की टकसाल से अठ्यासिया व चाँदशाही सिक्के जारी किए जाते थे।