राजस्थान के इतिहास के स्रोत
Sources of Rajasthan's History
पुरातात्विक खोजों से लेकर शिलालेखों, प्रशस्तियों, ताम्रपत्रों और यात्रा-वृत्तांतों तक — जानिए वे साक्ष्य जिनसे राजस्थान का प्राचीन व मध्यकालीन इतिहास रचा गया है।
इतिहास जानने के स्रोत — परिचय
राजस्थान के अतीत को समझने के लिए इतिहासकार पुरातात्विक अवशेषों से लेकर पत्थर पर उकेरी गई राजाओं की प्रशस्तियों तक, अनेक तरह के साक्ष्यों पर भरोसा करते हैं।
🧭स्रोतों के प्रकार
- राजस्थान के इतिहास को जानने के प्रमुख साधनों में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन ग्रंथ, शासकों की प्रशस्तियाँ, विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत और शिलालेख/पुरालेख शामिल हैं।
⛏️पुरातात्विक सर्वेक्षण व उत्खनन
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की नींव 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम के नेतृत्व में रखी गई थी, जबकि राजस्थान में सर्वेक्षण कार्य की शुरुआत 1871 में ए.सी.एल. कार्लाइल ने की थी।
- बाद में एच.डी. सांकलिया, वी.एन. मिश्र और आर.सी. अग्रवाल जैसे पुरातत्वविदों के उत्खननों ने साबित किया कि राज्य में पाषाण-युगीन और ताम्रपाषाण-युगीन संस्कृतियाँ फली-फूली थीं।
- बूँदी की छाजा नदी घाटी और कोटा की चम्बल नदी घाटी इन खोजों के लिए विशेष महत्व रखती हैं, जबकि विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़), सोहनपुरा (सीकर) और हरसौरा (अलवर) से रंगे हुए शैलाश्रय मिले हैं।
🗄️राज्य अभिलेखागार
- पुराने दस्तावेजों को सहेजने के लिए राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना 1955 में जयपुर में हुई और 1963 में इसे बीकानेर स्थानांतरित कर दिया गया।
- वर्तमान में इसकी सात शाखाएँ जयपुर, जोधपुर, अजमेर, अलवर, भरतपुर, कोटा और उदयपुर में कार्यरत हैं।
🪨अभिलेख व प्रशस्ति
- अभिलेखों में शिलालेख, स्तम्भ-लेख, गुहा-लेख, मूर्ति-लेख, पट्ट-लेख और दानपत्र जैसे कई रूप शामिल हैं; जिन अभिलेखों में केवल किसी शासक की उपलब्धियों का गुणगान होता है, उन्हें 'प्रशस्ति' कहा जाता है और अभिलेखों के अध्ययन को एपिग्राफी कहा जाता है।
- भारत के सबसे प्राचीन ज्ञात अभिलेख मौर्य सम्राट अशोक के हैं, और राजस्थान के अधिकांश अभिलेखों की भाषा संस्कृत तथा राजस्थानी रही है।
प्राचीनतम अभिलेख — मौर्य से गुप्तोत्तर काल
ईसा-पूर्व सदियों से लेकर गुर्जर-प्रतिहार काल तक पत्थरों पर उकेरे गए ये लेख राजस्थान के सबसे प्राचीन लिखित साक्ष्य हैं।
🏺बड़ली व घोसुण्डी के अभिलेख
- अजमेर के भिनाय क्षेत्र में स्थित बड़ली गाँव से मिला शिलालेख (443 ई.पू.) राजस्थान का सबसे प्राचीन ज्ञात अभिलेख माना जाता है; यह ब्राह्मी लिपि में है और भिलोट माता मंदिर से प्राप्त हुआ था।
- चित्तौड़गढ़ के नगरी क्षेत्र के घोसुण्डी गाँव से मिला दूसरी सदी ई.पू. का शिलालेख संस्कृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा है और वैष्णव (भागवत) सम्प्रदाय से जुड़ा सबसे प्राचीन अभिलेख है; इसे सबसे पहले डी.आर. भण्डारकर ने पढ़ा था।
🦁अशोक के अभिलेख
- तीसरी शताब्दी ई.पू. के अशोक के भाबू और बैराठ शिलालेख विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़) की बीजक की पहाड़ी से मिले हैं; भाबू शिलालेख की खोज कैप्टन बर्ट ने की थी और यह भीमजी की डूँगरी के तल पर स्थित है। यह अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने का प्रमाण है, और यहीं से मौर्ययुगीन बौद्ध स्तूप के अवशेष भी मिले हैं।
- नगरी (चित्तौड़गढ़) से मिला 200-150 ई.पू. का लेख नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है और इसमें 'सर्वे भूतानां दयार्थ' जैसे शब्द अंकित हैं।
🕉️प्रारंभिक यूप-स्तम्भ व मंदिर अभिलेख (225-490 ई.)
- भीलवाड़ा के नांदसा से मिला यूप-स्तम्भ लेख (225 ई.) सोम द्वारा स्थापित किया गया था, जबकि बाराँ के बड़वा गाँव का यूप अभिलेख (238-39 ई.) मौखरी वंश का सबसे प्राचीन ज्ञात लेख है और प्राचीन राजस्थान में वैष्णव सम्प्रदाय की उपस्थिति का प्रमाण देता है।
- सवाई माधोपुर के बरनाला अभिलेख (278 ई.) से भी वैष्णव उपस्थिति का पता चलता है और यह आमेर संग्रहालय में सुरक्षित है; नगरी का 424 ई. का शिलालेख अजमेर संग्रहालय में रखा है, जिसमें सत्यसूर, श्रीगंध और दास नामक तीन भाइयों का उल्लेख है।
- प्रतापगढ़ की छोटी सादड़ी में मिले भ्रमरमाता अभिलेख (490 ई.) में गौवंशी व औलिकार वंश के शासकों का उल्लेख मिलता है।
🛕मारवाड़ व मेवाड़ के प्रारंभिक अभिलेख (608-713 ई.)
- नागौर के जायल स्थित दधिमती माता मंदिर अभिलेख (608 ई.) पश्चिमी राजस्थान (मारवाड़) का सबसे प्राचीन अभिलेख माना जाता है, जिसके अनुसार गोठ मांगलोद के आसपास का इलाका 'दाहिमा क्षेत्र' कहलाता था।
- सिरोही के बसंतगढ़ के जगन्माता मंदिर से मिला अभिलेख (625 ई.) अर्बुदांचल के शासक राजिल और उनके पुत्र सत्यदेव का वर्णन करता है, जबकि उदयपुर का सामोली शिलालेख (646 ई.) गुहिल शासक शिलादित्य के काल का है।
- उदयपुर के नागदा गाँव के कुण्डेश्वर मंदिर का अपराजित शिलालेख (661 ई.) गुहिल शासक अपराजित की विजयों और प्रताप का वर्णन करता है; इसकी रचना दामोदर ने की।
- चित्तौड़ की मानसरोवर झील से मिला मानमोरी शिलालेख (713 ई.) मौर्यवंशी शासक चित्रांग और चार मौर्य राजाओं — महेश्वर, भीम, भोज व मान — का उल्लेख करता है; इसे टॉड इंग्लैंड ले जा रहे थे तभी यह समुद्र में गिर गया।
🏹मौर्य व गुर्जर-प्रतिहार कालीन अभिलेख (738-880 ई.)
- कोटा के कणसवा गाँव के शिवालय से मिला अभिलेख (738 ई.) राजस्थान के अंतिम मौर्यवंशी शासक धवल का उल्लेख करता है; इसका सूत्रधार देइआ था।
- जोधपुर के बुचकला अभिलेख (815 ई.) को गुर्जर प्रतिहार शासक बाउक ने खुदवाया और इसमें गुर्जर प्रतिहार शासकों की वंशावली दी गई है; मंडोर का शिलालेख (837 ई.) भी जोधपुर से मिला है।
- जोधपुर के घटियाला शिलालेख (861 ई.) प्रतिहार नरेश कक्कुक का यशोगान करते हैं, संस्कृत व प्राकृत में लिखे हैं और आभीरों पर विजय का दावा करते हैं; इनकी रचना मग ने और उत्कीर्णन सुवर्णकार कृष्णेश्वर ने किया।
- ग्वालियर की मिहिरभोज प्रशस्ति (880 ई.) गुर्जर प्रतिहारों को लक्ष्मण का वंशज बताती है और नागभट्ट को 'म्लेच्छों का नाशक' कहती है; इसकी रचना बालादित्य ने की।
गुहिल व चौहान वंशीय प्रशस्तियाँ
दसवीं से बारहवीं सदी के बीच मेवाड़ के गुहिल शासकों और शाकम्भरी के चौहान शासकों की उपलब्धियाँ मंदिरों की दीवारों पर प्रशस्तियों के रूप में उकेरी गईं।
🔱मेवाड़ (गुहिल वंश) की प्रशस्तियाँ (953-977 ई.)
- उदयपुर के सारणेश्वर मंदिर की प्रशस्ति (953 ई.) से गुहिल शासक अल्लट के शासनकाल की पुष्टि होती है; इसे कायस्थपाल और वेलक नामक लिपिकों ने संस्कृत भाषा व नागरी लिपि में उत्कीर्ण किया।
- उदयपुर के लकुलीश मंदिर की नाथ प्रशस्ति (971 ई.) नागदा (नागह्रद) को मेवाड़ की राजधानी बताती है और बापा से लेकर नरवाहन तक के गुहिल शासकों का वर्णन करती है; इसकी रचना कवि आम्र ने संस्कृत में की।
- उदयपुर से मिले आटपुर/आहड़ अभिलेख (977 ई.) को कर्नल जेम्स टॉड इंग्लैंड ले गए थे; इसके अनुसार मेवाड़ के गुहिल शासक मूलतः आनन्दपुर से आए थे।
🐎चौहान वंश के अभिलेख (973-1161 ई.)
- सीकर की हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) हर्षनाथ मंदिर के निर्माता के रूप में अल्लट का उल्लेख करती है और चौहान शासक विग्रहराज द्वितीय के समय की वंशावली देती है, जिसमें वागड़ को 'वार्गट' कहा गया है।
- माउण्ट आबू के पास मिला हस्तिकुण्डी शिलालेख (996 ई.) चौहान शासकों हरिवर्मा, विदग्ध, मम्मट और धवल की उपलब्धियों का वर्णन करता है, जबकि डीडवाना-कुचामन के परबतसर से मिला किणसरिया लेख (999 ई.) चाहमान शासकों वाकपतिराज, सिंहराज और दुर्लभराज की विजयों का उल्लेख करता है।
- जालौर के 1118 ई. के लेख के अनुसार परमारों की उत्पत्ति माउण्ट आबू पर गुरु वशिष्ठ के यज्ञ-कुंड से मानी गई है; बाड़मेर के किराडू से मिले दो लेख (1152 व 1161 ई.) क्रमशः शासक आल्हणदेव के काल के हैं और परमारों की इसी वशिष्ठ-यज्ञ मूल कथा को दोहराते हैं।
📯बिजौलिया शिलालेख — एक विस्तृत स्रोत
- भीलवाड़ा के बिजौलिया में पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक चट्टान पर संस्कृत में उत्कीर्ण यह लेख (5 फरवरी 1170 ई.) जैन श्रावक लोलाक ने बनवाया था; इसकी रचना गुणभद्र ने की, उत्कीर्णन गोविंद ने किया और लेखन कायस्थ केशव ने किया। यह शाकम्भरी के चौहानों की वंशावली और प्रारंभिक इतिहास जानने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
- इसमें चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताया गया है और भूमि-अनुदान को 'डोहली' कहा गया है; बिजौलिया के आसपास के इलाके को 'उत्तमाद्रि' कहा गया और मेवाड़ के पूर्वी भाग में बहने वाली कुटिला नदी का भी उल्लेख मिलता है।
- लेख के अनुसार वासुदेव चाहमान ने चौहान वंश की स्थापना की और साँभर झील बनवाई, विग्रहराज चतुर्थ ने दिल्ली को अधीन किया, कीर्तिपाल को मांडव्यपुर का शासक बताया गया और धारा वर्ष को विजयी कहा गया है।
- यह लेख कई प्राचीन स्थान-नामों की पहचान भी कराता है — जैसे जाबालिपुर (जालौर), नड्डुल (नाडौल), शाकम्भरी (साँभर), ढिल्लिका (दिल्ली), श्रीमाल (भीनमाल), मंडलकर (मांडलगढ़), विंध्यवल्ली/विजयावल्ली (बिजौलिया) और नागह्रद (नागदा)।
🛕आर्थूणा की परमार प्रशस्ति (1079 ई.)
- बाँसवाड़ा के आर्थूणा स्थित शिवमंदिर की प्रशस्ति (1079 ई.) वागड़ के परमार शासकों का वर्णन करती है और इसकी रचना विजय नामक कवि ने की; यहाँ के महामण्डलेश्वर शिवालय का निर्माण परमार शासक मण्डलीक के पुत्र चामुण्डाराज ने करवाया था।
मेवाड़ की मध्यकालीन प्रशस्तियाँ (13वीं-15वीं सदी)
बापा रावल के वंशजों से लेकर महाराणा कुम्भा तक, मेवाड़ के सिसोदिया शासकों की वीरता, निर्माण-कार्यों और विजयों का ब्यौरा इन प्रशस्तियों में सुरक्षित है।
🗡️13वीं सदी की मेवाड़ प्रशस्तियाँ
- उदयपुर के चीरवा गाँव का शिलालेख (1273 ई.) बापा रावल के वंशजों — पदमसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह और समरसिंह — की उपलब्धियों का वर्णन करता है; इसकी रचना रत्नप्रभ सूरि ने संस्कृत भाषा व नागरी लिपि में की।
- चित्तौड़ की रसिया की छतरी का अभिलेख (1274 ई.) बापा से नरवर्मा तक के गुहिलवंशीय मेवाड़ शासकों की उपलब्धियाँ बताता है और इसे सूत्रधार सज्जन ने उत्कीर्ण किया; चित्तौड़गढ़ का शिलालेख (1278 ई.) दर्शाता है कि राणा तेजसिंह की रानी जयतल्ल देवी ने भर्तृपुरीय आचार्य के उपदेश से पार्श्वनाथ मंदिर बनवाया था।
🛡️अचलेश्वर व हम्मीरकालीन अभिलेख
- सिरोही के माउंट आबू स्थित अचलेश्वर अभिलेख (1285 ई.) बापा से समरसिंह तक की वंशावली देता है और राजपूतों की ब्राह्मण वंश से उत्पत्ति के सिद्धांत का समर्थन करता है; इसके लेखक शुभचन्द्र, उत्कीर्णकर्ता कर्मसिंह और रचनाकार चित्तौड़ निवासी वेद शर्मा नागर थे।
- कोटा के कोटड़ी गाँव से मिला हम्मीरदेव का बलवन शिलालेख (1288 ई.) रणथम्भौर के तीन शासकों — वाग्भट्ट, जैत्रसिंह और हम्मीरदेव — के नाम गिनाता है और रणथम्भौर को 'रणस्तम्भपुर' कहता है; इसके रचयिता बीजादित्य थे। चित्तौड़गढ़ के जैन कीर्तिस्तम्भ से जुड़े 13वीं सदी के तीन लेखों की स्थापना जीजाक (साह जीजा) ने करवाई थी।
🏰मोकल-कालीन प्रशस्तियाँ (1404-1428 ई.)
- डूँगरपुर के उपरगाँव से मिली प्रशस्ति (1404 ई.) वागड़ के राजवंश का वर्णन करती है; उदयपुर के शृंगी ऋषि लेख (1428 ई.) राणा हम्मीर से महाराणा मोकल तक के शासकों की विजयों का ब्यौरा देता है और बताता है कि मोकल ने एकलिंगजी मंदिर के चारों ओर प्राचीर बनवाई थी — इसकी रचना योगीश्वर ने की और इसे फन्ना ने उत्कीर्ण किया।
- चित्तौड़गढ़ के समिधेश्वर मंदिर का अभिलेख (1428 ई.) गुहिल शासक हम्मीर की तुलना कामदेव, ब्रह्मा, शंकर व कर्ण से करता है, मोकल द्वारा विष्णु मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख करता है और महाराणा लाखा के दरबार में झोटिंग भट्ट जैसे विद्वानों का जिक्र करता है; इसके रचनाकार एकनाथ और उत्कीर्णकर्ता वीसल थे।
🏔️महाराणा कुम्भा-कालीन अभिलेख
- पदराड़ा अभिलेख (1433 ई.) महाराणा कुंभा के काल का सबसे प्राचीन ज्ञात लेख है, जिसमें पदराड़ा को 'पाटकेपद्र' कहा गया; सतबीस देवरी (चित्तौड़गढ़) का शिलालेख (1438 ई.) राणा हम्मीर से मोकल तक के सिसोदिया शासकों की विजयों, दानों व निर्माण-कार्यों का उल्लेख करता है और हम्मीर को तुर्कों का विजेता बताता है — इसे नारद ने उत्कीर्ण किया और चरित्ररत्न गणि ने रचा।
- पाली की रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.) संस्कृत व नागरी में बापा से कुंभा तक की वंशावली देती है (जिसमें गलती से बापा को गुहिल का पिता मान लिया गया); इसके निर्माता देपाक थे।
- चित्तौड़गढ़ की कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.) में कवि अत्रि व उनके पुत्र महेश ने कुंभा की गुजरात-मालवा की संयुक्त सेना पर विजय और विजय स्तम्भ के निर्माण का वर्णन किया — कुल 64 श्लोकों में कुंभश्याम मंदिर की तुलना कैलाश व सुमेरु पर्वत से की गई है।
- राजसमंद के दो कुंभलगढ़ अभिलेख (दोनों 1460 ई.) बापा रावल को हारीत ऋषि की कृपा से मेवाड़-राज्य पाने वाला विप्रवंशीय बताते हैं और गुहिल को उनका पुत्र कहते हैं (रचयिता कान्ह व्यास); दूसरी प्रशस्ति के रचयिता महेश थे, जो उस समय की राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक स्थिति की जानकारी देती है।
उत्तरवर्ती प्रशस्तियाँ, फारसी अभिलेख, ताम्रपत्र व अन्य स्रोत
सोलहवीं सदी के बाद की प्रशस्तियों से लेकर फारसी लेखों, ताम्रपत्रों, स्थापत्य और साहित्य तक — इतिहास के ये विविध स्रोत मिलकर राजस्थान की तस्वीर पूरी करते हैं।
🚪रायमल से आमेर तक की प्रशस्तियाँ (1488-1612 ई.)
- नागदा (उदयपुर) में एकलिंगजी मंदिर की दक्षिण-द्वार प्रशस्ति (1488 ई.) बापा के संन्यास लेने का वर्णन करती है और महाराणा रायमल द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार के समय उत्कीर्ण की गई — उत्कीर्णकर्ता अर्जुन था; डूँगरपुर की नौलखा बावड़ी की प्रशस्ति (1587 ई.) वागड़ के चौहान शासकों की वंशावली देती है और बताती है कि यह बावड़ी महारावल आसकरण की रानी प्रेमलदेवी ने बनवाई थी।
- बीकानेर की रायसिंह प्रशस्ति (जूनागढ़/बीकानेर दुर्ग प्रशस्ति, 1594 ई.) बीकानेर दुर्ग के निर्माण की तिथि और राव बीका से राव रायसिंह तक की वंशावली बताती है — इसके रचयिता जैन मुनि जैता थे और जूनागढ़ का निर्माण मंत्री कर्मचंद की देखरेख में हुआ; जयपुर का आमेर लेख (1612 ई.) पृथ्वीराज कछवाहा से मानसिंह तक की वंशावली देता है और मानसिंह को भगवन्तदास का पुत्र बताता है।
🏞️राज प्रशस्ति — विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति
- राजसमंद झील की नौ चौकी पाल पर 25 काले पाषाण-शिलाओं पर संस्कृत में उत्कीर्ण राज प्रशस्ति (1676 ई.) को विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति माना जाता है; इसे महाराणा राजसिंह ने स्थापित करवाया और इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे।
- इसमें हल्दीघाटी के युद्ध, मुगल-मेवाड़ संधि और राजसिंह के किशनगढ़ की चारुमति से विवाह का वर्णन मिलता है; बाद में पं. देवीप्रसाद ने इसका उर्दू में अनुवाद किया।
- उदयपुर के जगन्नाथ मंदिर की जगन्नाथ राय प्रशस्ति (1652 ई.) में भी हल्दीघाटी युद्ध तथा महाराणा जगतसिंह के युद्धों और पुण्य-कार्यों का विस्तृत वर्णन है, जिसकी रचना कृष्णभट्ट लक्ष्मीदास ने की; देबारी (उदयपुर) की त्रिमुखी बावड़ी की प्रशस्ति (1675 ई.) बताती है कि महाराणा राजसिंह की रानी रामरसदे ने 'जया' नामक बावड़ी बनवाई थी।
- उदयपुर के वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति (1719 ई.) में भी बापा को हारीत ऋषि की कृपा से राज्य मिलने की कथा दोहराई गई है; इसके रचनाकार रूपभट्ट थे।
☪️फारसी अभिलेख
- राजस्थान का सबसे पुराना फारसी अभिलेख अजमेर की ढाई दिन के झोंपड़े की गुम्बज के पीछे की दीवार पर लगा है और यह 1200 ई. का है।
- अजमेर में ही दरगाह बाज़ार की मस्जिद, शाहजहाँनी मस्जिद और तारागढ़ के फारसी लेख मिलते हैं; चित्तौड़ में गयासुद्दीन का अभिलेख और ढाई बी पीर की दरगाह का लेख है, जिसमें चित्तौड़ का नाम 'खिज्राबाद' अंकित है।
- इसके अलावा भरतपुर में बरबद का लेख, पुष्कर में जहाँगीरी महल का लेख और बाराँ में शाहबाद लेख भी फारसी अभिलेखों के उदाहरण हैं।
📋ताम्रपत्र व दानपत्र
- राजाओं द्वारा दिए गए दान के आदेश ताँबे की पट्टिकाओं पर उत्कीर्ण किए जाते थे, इसलिए इन्हें 'ताम्रपत्र' कहा गया; शुरुआत में संस्कृत और बाद में स्थानीय भाषाओं का प्रयोग हुआ। ब्रोच-गुर्जर ताम्रपत्र (978 ई.) के आधार पर ए. कनिंघम ने राजपूतों की उत्पत्ति यू-ची (कुषाण) जाति से मानी थी।
- आबू के परमार शासक धारावर्ष का ताम्रपत्र (1180 ई.) भूमिदान दर्ज करता है; सोलंकी राजा भीमदेव के काल का आहड़ ताम्रपत्र (1206 ई.) बताता है कि आहड़ मेवाड़ का एक मंडल (जिला) था; वीरसिंह के ताम्रपत्र (1287 ई.) से वागड़ की राजधानी वटपद्रक (बड़ौदा) होने की जानकारी मिलती है; नादिया गाँव के ताम्रपत्र (1437 ई.) से महाराणा कुंभा के आबू क्षेत्र पर अधिकार का पता चलता है।
- जोधपुर के राव जोधा का कुल पुरोहित दानपत्र (1459 ई.) कोडमदेसर की स्थापना के अवसर पर जारी हुआ; वागड़ी भाषा में लिखा चीकली/चौकली ताम्रपत्र (1483 ई.) किसानों से वसूले जाने वाले 'लाग-बाग' करों का विवरण देता है; पुर ताम्रपत्र (1535 ई.) रानी कर्मवती द्वारा जौहर से पहले किए गए भूमिदान को दर्शाता है।
- मेवाड़ महाराणा उदयसिंह ने लावा गाँव के ताम्रपत्र (1558 ई.) से भोला ब्राह्मण को बदनौर क्षेत्र की 240 बीघा भूमि दान दी; बाँसवाड़ा ताम्रपत्र (1671 ई.) महारावल कुशलसिंह की माता आनंदकुँवरी द्वारा गंगा महोत्सव पर किए भूमिदान का उल्लेख करता है; राजसिंह के ताम्रपत्र (1678 ई.) में रानी बड़ी पँवार द्वारा वेणा नागदा को भूमिदान का जिक्र है, और मोरड़ी गाँव का ताम्रपत्र (1873 ई.) डूँगरपुर के महारावल उदयसिंह द्वारा निहालचंद को दिए गए दान का साक्ष्य है।
🏛️स्थापत्य एक स्रोत के रूप में
- उस दौर में बने मंदिर, राजप्रासाद, दुर्ग और इमारतें भी इतिहास की अनमोल जानकारी देते हैं; चित्तौड़गढ़, रणथम्भौर और मेहरानगढ़ जैसे दुर्ग सैन्य-व्यवस्था, राजवंशों और तत्कालीन जन-जीवन की झलक दिखाते हैं, जबकि दिलवाड़ा के जैन मंदिर और ओसियाँ के मंदिर उस समय की धार्मिक स्थिति व स्थापत्य-कला पर रोशनी डालते हैं।
📖साहित्य एक स्रोत के रूप में
- किसी क्षेत्र के इतिहास की सबसे बेहतरीन जानकारी वहीं रचे गए ग्रंथों से मिलती है — जैसे 8वीं सदी में उद्योतन सूरि की रचना 'कुवलयमाला' उस युग की धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक स्थिति पर प्रकाश डालती है।
- राजस्थान के आधुनिक इतिहास-लेखन की नींव कर्नल जेम्स टॉड ने रखी, और इसीलिए उन्हें 'राजस्थान के इतिहास का पिता' कहा जाता है।
🗂️अन्य स्रोत — बहियाँ, मूर्तियाँ व अभिलेखीय संदर्भ
- राजस्थानी दरबारों में रखे जाने वाले रिकॉर्ड्स को 'बही' कहा जाता था — जैसे भरतु रेख (सामन्त द्वारा राजकोष में जमा राजस्व की वास्तविक राशि), खरीता बही (महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के पत्रों की नकलें), हुकूमत री बही (राजा की दिनचर्या), अडसट्टा बही (भू-राजस्व रिकॉर्ड) और कमठाना बही (राजकीय भवनों के निर्माण का विवरण)। जयपुर रियासत की 'दस्तूर कौमवार' शृंखला वहाँ की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक स्थिति की जानकारी देती है।
- भटनेर (हनुमानगढ़) के भद्रकाली स्थल से मिली महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति बीकानेर संग्रहालय में प्रदर्शित है, और पाली में मिली उत्तर-गुप्तकालीन खड़ी 'स्थानक' विष्णु प्रतिमा जोधपुर संग्रहालय में रखी है — ये मूर्तियाँ भी अपने युग की कला व धर्म की गवाह हैं।
- नीलगुण्ड, राधनपुर, देवली और करहाड़ के शिलालेखों में प्रतिहारों को 'गुर्जर' कहा गया है, जबकि ग्वालियर अभिलेख में उज्जैन के प्रतिहारों को 'क्षत्रिय' बताया गया है; वैदिक स्तुतियों में उल्लिखित 'ब्रह्मावर्त' की भूमि राजस्थान के उत्तरी भाग से जुड़ी मानी जाती है।