राजस्थान के प्रमुख दुर्ग
Major Forts of Rajasthan
पहाड़ों पर बसे अभेद्य किलों से लेकर मरुस्थल में चमकते स्वर्ण दुर्गों तक -- राजस्थान के दुर्ग सिर्फ पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि साके, बलिदान और शौर्य की जीवंत गाथाएँ हैं, जिनमें से छह को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भी जगह मिली है।
दुर्ग सिद्धांत, वर्गीकरण एवं विरासत
पत्थर पर पत्थर रखे जाने से पहले ही भारतीय राजनीति-शास्त्र दुर्गों को भूभाग और रणनीति के आधार पर वर्गीकृत कर चुका था -- राजस्थान के इन पाषाण दानवों के पीछे छिपा सिद्धांत, और वह गौरव-सूची जिसने छह दुर्गों को यूनेस्को का तमगा दिलाया।
📖प्राचीन वर्गीकरण प्रणालियाँ
- दुर्गों का सबसे प्राचीन वर्गीकरण मनुस्मृति में मिलता है, जिसमें छह प्रकार के दुर्ग -- मरुवेष्टित, पाषाणखण्ड वेष्टित, जल, वृक्ष, नृ तथा गिरि दुर्ग -- बताए गए हैं, और गिरि दुर्ग को सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दुर्गों को चार भागों -- औदक (जल), पार्वत (गिरि), धान्वन तथा वन दुर्ग -- में बाँटा गया है, और यहाँ भी गिरि दुर्ग को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।
- शुक्रनीति में दुर्गों के नौ प्रकार गिनाए गए हैं, जिनमें सैन्य दुर्ग को सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
🧭दुर्गों के प्रकार व पहचान
- गिरि दुर्ग किसी एकांत ऊँची पहाड़ी पर बना होता है जहाँ जल संचय की समुचित व्यवस्था हो, जल दुर्ग चारों ओर फैली जलराशि से घिरा होता है, और परिख दुर्ग के चारों ओर पानी से भरी गहरी खाई होती है।
- धान्वन दुर्ग मरुस्थल के बीच रेत के टीलों व ऊबड़-खाबड़ भूमि से घिरा होता है, वन दुर्ग घने जंगलों व काँटेदार झाड़ियों की आड़ में छिपा रहता है, और सहाय दुर्ग की सुरक्षा दीवारों से ज़्यादा शूरवीर व वफादार बांधवों पर टिकी होती है।
- कवि-विद्वान नरपति जयाचार्य ने आठ अन्य प्रकार के किलों का उल्लेख किया -- मिट्टी से बने धूलकोट व जल से घिरे जलकोट से लेकर टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगों से भरे भूलभुलैया जैसे विषमाख्य कोट तक।
👑महाराणा कुंभा -- निर्माता शासक
- इतिहासकार श्यामलदास अपने ग्रंथ 'वीर-विनोद' में लिखते हैं कि मेवाड़ के 84 दुर्गों में से लगभग 32 दुर्ग अकेले महाराणा कुंभा ने बनवाए या पुनर्निर्मित करवाए।
- कुंभा के सबसे गौरवशाली निर्माणों में अचलगढ़, कुंभलगढ़, बसंतगढ़ तथा मचान का दुर्ग शामिल हैं -- यह निर्माण-अभियान आज भी मेवाड़ के भूदृश्य को गढ़ता है।
🏆यूनेस्को विश्व धरोहर के दुर्ग (2013)
- वर्ष 2013 में यूनेस्को ने राजस्थान के छह दुर्गों के एक समूह को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया, जिसने राज्यभर में साझा गिरि-दुर्ग स्थापत्य शैली को वैश्विक पहचान दी।
- इस सूची में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथम्भौर, जैसलमेर, आमेर तथा गागरोन दुर्ग शामिल हैं -- यह सूची मेवाड़, हाड़ौती और थार मरुस्थल तक फैली हुई है।
मेवाड़ के अभेद्य गढ़: चित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़
दो यूनेस्को-सूचीबद्ध दुर्ग मेवाड़ की लड़ाकू आत्मा को परिभाषित करते हैं -- चित्तौड़गढ़, जो तीन जौहरों की स्मृतियों में डूबा है, और कुंभलगढ़, जिसकी प्राचीर इतनी लंबी है कि उसकी तुलना चीन की महान दीवार से होती है।
🔥चित्तौड़गढ़ -- इतिहास व तीन साके
- गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम के निकट मेसा पठार पर बसा चित्तौड़गढ़ माना जाता है कि 7वीं सदी में मौर्य राजा चित्रांगद से जुड़ा था, जिसे बापा रावल ने 734 ई. में अंतिम मौर्य शासक से जीत लिया।
- मालवा का प्रवेश द्वार तथा सर्वाधिक साकों वाला दुर्ग कहलाने वाला चित्तौड़गढ़ एक लोकप्रिय उक्ति के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है -- 'गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।'
- इसका पहला साका 1303 में हुआ जब अलाउद्दीन खिलजी ने रावल रतनसिंह को पराजित किया; इस घेराबंदी के साथ रानी पद्मिनी के जौहर तथा वीर गोरा-बादल के बलिदान की गाथा सदा के लिए जुड़ गई।
- दूसरा साका 1535 में गुजरात के बहादुरशाह के विरुद्ध हुआ, और तीसरा 1567-68 में, जब अकबर की सेना ने किला जीता -- इससे पहले जयमल मेड़तिया, रावत पत्ता और कल्ला राठौड़ अंतिम साँस तक लड़े; उनकी वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा किले के बाहर हाथी पर सवार उनकी प्रतिमाएँ लगवाईं।
🗼चित्तौड़गढ़ -- विजय स्तम्भ व स्मारक
- राणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर सारंगपुर विजय के उपलक्ष्य में 1440 से 1448 ई. के बीच नौ मंजिला, लगभग 37 मीटर ऊँचे विजय स्तम्भ का निर्माण वास्तुशिल्पी मण्डन तथा शिल्पी जैता व उसके पुत्रों की देखरेख में करवाया।
- लाल बालू पत्थर व सफेद संगमरमर से बना यह मूलतः विष्णु स्तंभ प्रायः भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश कहा जाता है; इसकी तीसरी मंजिल पर 'अल्लाह' उत्कीर्ण है, और आज यह राजस्थान पुलिस व राज्य शिक्षा बोर्ड, दोनों के प्रतीक चिह्न में प्रयुक्त होता है।
- कुंभा ने दुर्ग को सात प्रवेश द्वार दिए, जिनमें मुख्य द्वार पाडन पोल है, साथ ही कुंभ श्याम व कालिका माता जैसे मंदिर भी बनवाए; पास ही स्थित 24.5 मीटर ऊँचा जैन कीर्ति स्तम्भ 13वीं सदी में जीजक व उनके पुत्र ने बनवाया था।
- व्हेल मछली के आकार का यह दुर्ग राजस्थान का सबसे बड़ा 'लिविंग फोर्ट' कहलाता है; इसकी प्राचीरों के भीतर मीरा मंदिर, 27 देवरियों वाली सतबीस देवरी तथा राजपरिवार का श्मशान महासती आज भी विद्यमान हैं।
🧱कुंभलगढ़ -- महान दीवार का दुर्ग
- सादड़ी के निकट अरावली की 3,568 फीट ऊँची चोटी पर स्थित कुंभलगढ़ का निर्माण महाराणा कुंभा ने एक प्राचीन दुर्ग के अवशेषों पर करवाया; इसका निर्माण-कार्य वास्तुशिल्पी मण्डन की देखरेख में 1448 से 1458 ई. के बीच चला।
- राजस्थान के इस सबसे ऊँचे दुर्ग की लगभग 36 किमी लंबी चारदीवारी है -- जिसे प्रायः भारत की महान दीवार कहा जाता है और विश्व की दूसरी सबसे लंबी सतत् दीवार माना जाता है -- यह इतनी विशाल है कि अबुल फजल के अनुसार ऊपर देखने भर से सिर से पगड़ी गिर जाती थी।
- मेवाड़-मारवाड़ सीमा का प्रहरी तथा संकटकाल में शासकों की शरणस्थली कहलाने वाले कुंभलगढ़ को न तो मुगल जीत सके और न अंग्रेज।
🐎कुंभलगढ़ -- महाराणा प्रताप की जन्मभूमि
- मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म इसी दुर्ग के बादल महल में हुआ; बाद में उन्होंने कुंभलगढ़ को अपनी संघर्ष-राजधानी बनाया और हल्दीघाटी के युद्ध से पहले व बाद में यहीं अपनी सेना पुनर्गठित की।
- स्वामिभक्त धाय माँ पन्ना धाय ने यहीं अपने पुत्र की बलि देकर शिशु उदयसिंह को बनवीर से बचाया और उसे कुंभलगढ़ के निकट गुप्त रूप से पाला -- इसी दुर्ग में आगे चलकर उदयसिंह का महाराणा के रूप में राज्याभिषेक भी हुआ।
- दुर्ग के भीतरी किले कटारगढ़ -- जिसे 'मेवाड़ की आँख' कहा जाता है -- में बादल महल व झाली रानी का मालिया स्थित हैं, इसी के निकट कुंभा की उनके पुत्र ऊदा द्वारा हत्या कर दी गई थी।
यूनेस्को धरोहरों से राजसी दुर्गों तक
रणथम्भौर की बाघ-प्रहरी प्राचीरों से लेकर जैसलमेर की सुनहरी गलियों तक -- ये वे दुर्ग हैं जिनके इर्द-गिर्द राजस्थान के हर राजवंश ने अपनी गाथा गढ़ी; मरुस्थलीय किले, पर्वतीय गढ़ और एक ऐसा दुर्ग भी जिसे न मुगल जीत सके, न अंग्रेज।
🐯रणथम्भौर दुर्ग
- सवाई माधोपुर में अण्डाकार थंभौर पहाड़ी पर बना यह विकट गिरि-वन दुर्ग परंपरागत रूप से 944 ई. का माना जाता है, हालाँकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे 5वीं सदी जितना प्राचीन भी मानता है।
- अबुल फजल ने चकित होकर लिखा था कि 'अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह दुर्ग आरमर्ड (बख्तरबंद) है' -- इसकी प्राकृतिक सुरक्षा को यह श्रद्धांजलि थी; 1301 में यहीं राजस्थान का पहला साका हुआ जब अलाउद्दीन खिलजी ने चौहान शासक हम्मीरदेव को पराजित किया।
- बाद में इस पर बारी-बारी से मेवाड़ के कुंभा, राणा सांगा की हाड़ी रानी कर्मवती, शेरशाह सूरी के परिवार तथा अंततः बूँदी के राव सुरजन हाड़ा का अधिकार रहा, जिन्होंने 1569 में इसे शांतिपूर्वक अकबर को सौंप दिया।
⛰️जालौर दुर्ग
- सुवर्ण गिरि या स्वर्णगिरि नाम से प्रसिद्ध जालौर दुर्ग मारवाड़ में सूकड़ी नदी के किनारे स्थित है, जिस पर बाद में नाडौल के कीर्तिपाल के वंशज सोनगरा चौहानों का शासन रहा।
- इसकी बलिदान गाथा 1311-12 में चरम पर पहुँची, जब पराक्रमी कान्हड़देव सोनगरा व उनके पुत्र वीरमदेव अलाउद्दीन खिलजी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; विजयी खिलजी ने दुर्ग का नाम जलालाबाद रखकर यहाँ अलाई मस्जिद बनवाई।
- इतिहासकार हसन निजामी ने इसे ऐसा अजेय दुर्ग बताया जिसके द्वार किसी विजेता ने कभी नहीं खोले; सदियों बाद स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसमें तुलसीदास राठी जैसे स्वतंत्रता सेनानी भी कैद रखे गए।
🦅जोधपुर दुर्ग (मेहरानगढ़)
- जोधपुर की चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर राव जोधा ने 1459 ई. में जिस मेहरानगढ़ की नींव रखी, वह आगे चलकर लाल पत्थर का ऐसा वैभव बन गया जिसे जैकलीन कैनेडी ने दुनिया का आठवाँ अजूबा कहा।
- मोतीमहल, फूलमहल जैसे इसके महल सोने की पॉलिश व जड़ाई के काम से सजे हैं, वहीं इसकी प्राचीरों पर आज भी किलकिला व गजनी खाँ जैसी प्रसिद्ध तोपें मौजूद हैं।
- दुर्ग की तलहटी में बसे जोधपुर शहर के चारों ओर 101 बुर्जों व छह द्वारों वाली प्राचीर है, जिनमें से हर द्वार का नाम उस मारवाड़ी नगर पर रखा गया जिसकी ओर उसका मार्ग जाता था।
⭐तारागढ़ दुर्ग, बूँदी
- 1354 ई. में राव बरसिंह हाड़ा द्वारा 1,426 फीट ऊँचे शिखर पर बनवाया गया बूँदी का तारागढ़ अपने भीतर 16वीं सदी का भीमबुर्ज संजोए है, जो विशाल तोप 'गर्भ गुंजन' को रखने हेतु बनाया गया था और आज भी वहीं मौजूद है।
- कर्नल टॉड ने बूँदी के राजमहलों को समस्त राजपूताना के राजप्रासादों में सर्वश्रेष्ठ बताया, वहीं रुडयार्ड किपलिंग ने मज़ाक में इसे 'प्रेतों व आत्माओं द्वारा निर्मित' दुर्ग कहा।
🌄तारागढ़ दुर्ग, अजमेर
- 7वीं सदी में चौहान शासक अजयपाल द्वारा बीठली पहाड़ी पर बनवाया गया अजमेर का तारागढ़ अपनी सामरिक महत्ता के कारण 'राजस्थान का जिब्राल्टर' व 'राजपूताने की कुंजी' जैसे उपनामों से जाना गया।
- मेवाड़ के युवराज पृथ्वीराज ने अपनी वीरांगना पत्नी तारा के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा; इसके सर्वोच्च भाग पर दुर्ग के प्रथम गवर्नर मीरान शाह की दरगाह है, जिन्होंने 1202 ई. में इसकी रक्षा करते हुए प्राण त्याग दिए।
- शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह का जन्म यहीं हुआ और पराजय के बाद उन्होंने यहीं शरण भी ली; 1818 में यह दुर्ग मराठों से होते हुए अंग्रेजों के अधिकार में चला गया।
🪞आमेर दुर्ग
- लगभग 700 वर्षों तक कछवाहों की राजधानी रहे आमेर के हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के मिश्रण वाले महल मुख्यतः मानसिंह प्रथम ने 1592 से लाल बलुआ पत्थर व सफेद संगमरमर से बनवाए।
- इसका चमकदार शीश महल एक दीये की रोशनी को हजारों प्रतिबिंबों में बदल देता है, वहीं 1639 में पूर्ण हुए गणेश पोल को फर्ग्युसन ने 'विश्व का सर्वश्रेष्ठ दरवाजा' बताया।
- कछवाहा राजपरिवार की आराध्य देवी शिलादेवी के मंदिर में पाल शैली की काले संगमरमर की मूर्ति है, जिसे मानसिंह प्रथम 1604 में बंगाल से लाए थे; जून 2013 में आमेर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
💣जयगढ़ दुर्ग
- आमेर की सुरक्षा हेतु ईगल पहाड़ी पर लगभग 1600 ई. से बनना शुरू हुआ जयगढ़ 'जयबाण' तोप के लिए जाना जाता है -- एशिया की सबसे बड़ी पहियेदार तोप, जिसका वजन लगभग 50 टन व नाल 20 फीट लंबी है।
- जयसुरंग नामक एक गुप्त सुरंग जयगढ़ को नीचे आमेर से जोड़ती है; यह राजस्थान का इकलौता दुर्ग है जिस पर कभी बाहरी आक्रमण नहीं हुआ और जहाँ कभी जौहर भी नहीं हुआ।
🦁नाहरगढ़ दुर्ग
- जयपुर की मीठड़ी पहाड़ी पर सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1734 में मराठों से सुरक्षा हेतु जिस दुर्ग को बनवाया, उसका आरंभिक नाम सुदर्शनगढ़ था; इसका वर्तमान नाम लोकदेवता नाहरसिंह भोमिया के नाम पर पड़ा।
- महाराजा माधोसिंह द्वितीय ने अपनी नौ पासवानों के लिए यहाँ नौ एक जैसे विक्टोरियन शैली के महल बनवाए, जो एक गुप्त सुरंग से आपस में जुड़े हुए हैं।
👁️अलवर दुर्ग (बाला किला)
- आमेर शासक काकिलदेव के पुत्र अलघुराय ने लगभग 1049 ई. में अलवर की सर्वोच्च अरावली चोटी पर इस दुर्ग की स्थापना की; इसे कभी युद्ध में जीता नहीं गया, इसलिए इसे कुँवारा किला भी कहा जाता है।
- इसकी लगभग 6 मील लंबी प्राचीर में शत्रुओं पर गोले दागने हेतु छेद बनाए गए हैं, जिस कारण इसे 'आँख वाला किला' भी कहते हैं; औरंगजेब की मृत्यु के बाद भरतपुर के सूरजमल ने यहाँ सूरज महल जुड़वाया।
🏹बयाना दुर्ग
- करौली के यदुवंशी शासक विजयपाल ने लगभग 1040 ई. में मानी पहाड़ी पर इस दुर्ग की नींव रखी; यहाँ स्थित आठ मंजिला भीम लाट को कभी-कभी 'राजस्थान का कुतुब मीनार' कहा जाता है, जिसे महाराजा विष्णुवर्द्धन ने लगभग 371 ई. में बनवाया था।
- यहाँ स्थित समुद्रगुप्त-कालीन विजय स्तम्भ राजस्थान का पहला कीर्ति स्तम्भ माना जाता है; बयाना दुर्ग को राजस्थान के दुर्गों में सर्वाधिक कब्रों वाला दुर्ग भी माना जाता है।
🌊गागरोन दुर्ग
- झालावाड़ के निकट आहू व कालीसिंध नदियों से तीन ओर घिरा यह दुर्लभ जल दुर्ग 12वीं सदी में डोड राजपूतों से खींची वंश के संस्थापक देवनसिंह के हाथों में आया।
- 1423 के इसके पहले साके में अचलदास खींची माँडू के सुल्तान होशंगशाह के विरुद्ध युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि उनकी रानी उमादे ने दुर्ग की स्त्रियों सहित जौहर किया; 1444 में महमूद खिलजी प्रथम के विरुद्ध दूसरा साका हुआ।
- यहाँ पाए जाने वाले दुर्लभ गागरोनी या हीरामन तोते मानव वाणी की हूबहू नकल कर सकते हैं; दुर्ग का बुलंद दरवाजा बाद में औरंगजेब ने बनवाया।
🐪जैसलमेर का किला (सोनारगढ़)
- 1178 ई. में भाटी रावल जैसल ने त्रिकूट पहाड़ी पर जिस दुर्ग की नींव रखी, वह पीले बलुआ पत्थर से बना यह त्रिकोणाकार 'स्वर्ण दुर्ग' विश्व का एकमात्र लकड़ी की छत वाला किला है, और चित्तौड़गढ़ के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है।
- इसने 1312-13 में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध एक साका तथा 1550 में कंधार के अमीर अली के विरुद्ध एक 'अर्द्ध साका' झेला -- इसे 'अर्द्ध' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ केसरिया तो हुआ पर जौहर नहीं हुआ।
- यहाँ स्थित 'जिनभद्रसूरि ग्रंथ भंडार' किसी भी राजस्थानी दुर्ग में हस्तलिखित ग्रंथों का सबसे बड़ा संग्रह है; इसी दुर्ग से प्रेरित होकर सत्यजित रे ने अपना उपन्यास व फ़िल्म 'सोनार किला' रचा।
🛶भटनेर का किला (हनुमानगढ़)
- घग्घर नदी के मुहाने पर भाटी राजा भट्टी के पुत्र भूपत ने लगभग 295 ई. में इसे बनवाया; उत्तरी सीमा के इस प्रहरी दुर्ग पर राज्य के किसी भी दुर्ग से अधिक विदेशी आक्रमण हुए।
- 1398 में तैमूरलंग के क्रूर आक्रमण के बाद यहाँ हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदाय की स्त्रियों द्वारा जौहर किए जाने के प्रमाण मिलते हैं; तैमूर ने स्वयं लिखा कि उसने पूरे हिन्दुस्तान में इतना मजबूत दुर्ग कहीं नहीं देखा।
- 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने भाटी शासकों से यह दुर्ग छीनकर इसका नाम हनुमानगढ़ रखा, जो आज तक प्रचलित है।
🕌नागौर का किला
- चौहान राजा सोमेश्वर के सामन्त कैमास ने 1154 ई. में नागौर दुर्ग की नींव रखी; इसकी बनावट के लिए यह प्रसिद्ध है कि बाहर से दागे गए तोप के गोले भी दुर्ग के महलों को बिना नुकसान पहुँचाए ऊपर से निकल जाते थे।
- इसकी दोहरी प्राचीर में 28 विशाल बुर्जें व एक गहरी खाई है; इसे सर्वाधिक गौरव लोकनायक अमरसिंह राठौड़ के शौर्य व स्वाभिमान से मिला, जिनकी स्मृति में पास में 16 स्तम्भों की छतरी बनी है।
- 1570 में अकबर ने यहाँ एक भव्य दरबार लगाया जिसमें राजस्थान के कई राजाओं ने उसकी अधीनता स्वीकार की; 2007 में यूनेस्को ने इसके जीर्णोद्धार के लिए इसे 'अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस' प्रदान किया।
💠बीकानेर का किला (जूनागढ़)
- राजा रायसिंह ने 1589 से 1594 के बीच पूर्णतः समतल भूमि पर बनवाया यह लाल पत्थर का जूनागढ़ 'जमीन का जेवर' कहलाता है और अपनी 37 बुर्जों में हिन्दू-मुगल शैलियों का सुंदर समन्वय समेटे है।
- बीकानेर शासकों के राज्याभिषेक स्थल अनूप महल में उस्ता कलाकारों की सोने की जड़ाई चमकती है; सूरजपोल द्वार पर हाथी पर सवार जयमल व पत्ता की प्रतिमाएँ चित्तौड़ के 1567 के साके को श्रद्धांजलि हैं।
- बीकानेर शासकों ने मुगल अधीनता स्वीकार कर ली थी, इसलिए इस दुर्ग पर कभी कोई बड़ा घेराव नहीं हुआ; आज यहाँ महाराजा गंगासिंह का लड़ाकू विमान तथा हस्तलिखित ग्रंथों का समृद्ध संग्रहालय 'अनूप संग्रहालय' मौजूद है।
🎨कोटा दुर्ग
- बूँदी शासक रतनसिंह हाड़ा के दूसरे पुत्र माधोसिंह ने चम्बल नदी के पूर्वी तट पर इस दुर्ग को बनवाया, जिसमें राजपूत व मुगल शैलियाँ घुली-मिली हैं; 1857 के विद्रोह के दौरान यह सबसे लंबे समय तक क्रांतिकारियों के अधीन रहा।
- कला इतिहासकार कार्ल खण्डालवाला ने दुर्ग की झाला हवेली के भित्ति चित्रों को समूचे एशिया के सर्वश्रेष्ठ भित्ति चित्र बताया।
🏛️मैग्जीन या अकबर का किला, अजमेर
- मुगलों द्वारा हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली में बनवाया गया राजस्थान का यह इकलौता दुर्ग अकबर ने 1571-72 में अपने वार्षिक अजमेर प्रवास हेतु सुरक्षित आवास के रूप में बनवाया; 1576 के हल्दीघाटी युद्ध की अंतिम योजना भी यहीं बनी थी।
- इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम के दूत सर टामस रो ने 1616 में यहीं जहाँगीर को अपना परिचय पत्र सौंपा और ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में व्यापार की अनुमति प्राप्त की।
- 1908 में पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने लॉर्ड कर्जन के आदेश पर यहाँ राजपूताना संग्रहालय स्थापित किया, जिसके पहले संग्रहाध्यक्ष इतिहासकार गौरीशंकर ओझा बने; इससे पहले 1801 में अंग्रेजों ने इस दुर्ग को अपना शस्त्रागार बना लिया था।
🛡️भरतपुर का लोहागढ़
- महाराजा सूरजमल ने 1733 में जिस लोहागढ़ का निर्माण शुरू किया और आठ वर्षों में पूर्ण करवाया, वह मोती झील से भरी 18.3 मीटर चौड़ी खाई से सुरक्षित है, और भारत का यह इकलौता दुर्ग है जिसे न मुगल जीत सके, न अंग्रेज।
- इसका अलंकृत उत्तरी द्वार -- अष्टधातु से बना यह वही दरवाजा है जिसे कभी अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़गढ़ से उठा ले गया था -- महाराजा जवाहरसिंह 1765 में मुगलों को हराकर दिल्ली के लाल किले से वापस लाए।
- अंग्रेज सेनापति सर चार्ल्स मेटकाफ ने स्वीकार किया कि उनकी सेना की प्रतिष्ठा का अधिकांश हिस्सा 'भरतपुर के दुर्भाग्यपूर्ण घेरे में दब गया'; आखिरकार यह दुर्ग 1826 में लॉर्ड काम्बरमेयर की सेना के आगे झुका।
शेखावाटी, हाड़ौती व ढूँढाड़ के क्षेत्रीय दुर्ग
बड़े नामी दुर्गों से परे, राजस्थान के विभिन्न अंचलों में नदी-घाटों, मरुमार्गों व व्यापारिक कारवाँओं की रखवाली करने वाले कम-चर्चित दुर्गों की एक पूरी शृंखला है -- हर एक के पीछे किसी योद्धा, संत या हठी घेराबंदी की अपनी कहानी।
⛰️सोजत दुर्ग
- मारवाड़-मेवाड़ सीमा पर नानी सीरड़ी पहाड़ी पर बना सोजत दुर्ग जोधपुर के राव मालदेव के नाम दर्ज है, जिनके पुत्र राम ने इसके भीतर रामेलाव तालाब बनवाया।
🏔️सिवाणा का किला
- मूल रूप से कुम्थाना का किला कहलाने वाला बालोतरा के निकट स्थित यह 10वीं सदी का पंवार दुर्ग संकटकाल में मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली बना; राव चन्द्रसेन ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष हेतु इसे अपना केंद्र बनाया।
- इसके दूसरे साके में शासक वीर कल्ला अकबर की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि उनकी हाड़ी रानी ने दुर्ग की स्त्रियों सहित जौहर किया।
🕉️अचलगढ़ दुर्ग
- माउंट आबू के गुरुशिखर के सामने महाराणा कुंभा ने लगभग 1452 ई. में अचलगढ़ का निर्माण करवाया; यहाँ गुजरात के कुमारपाल सोलंकी द्वारा बनवाया गया शांतिनाथ जैन मंदिर तथा कुंभा व उनके पुत्र ऊदा की प्रतिमाएँ स्थित हैं।
🌀मांडलगढ़ दुर्ग
- भीलवाड़ा में बनास, बेड़च व मेनाल नदियों के संगम के निकट स्थित कटोरेनुमा मांडलगढ़ दुर्ग में हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व मानसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना ने प्रशिक्षण लिया था।
🌾दौसा का किला
- देवगिरि पहाड़ी पर सूप के आकार का यह दुर्ग कछवाहों की सबसे प्रारंभिक राजधानी था, जब 11वीं सदी में दुलहराय ने स्थानीय मीणा व बड़गूजर शासकों से यह क्षेत्र जीता।
🌊भैंसरोडगढ़ दुर्ग
- 'राजस्थान का वैल्लोर' कहलाने वाला चम्बल-बामनी संगम पर स्थित यह जल दुर्ग अपनी अजेयता से कर्नल टॉड को इतना प्रभावित कर गया कि उन्होंने कहा कि राजस्थान की किसी भी जागीर में से वे इसी दुर्ग को चुनेंगे।
🕳️माधोराजपुरा का किला
- जयपुर जिले का यह स्थल दुर्ग ठाकुर भरतसिंह नरूका के साहस के लिए याद किया जाता है, जिन्होंने इसकी 30 फीट गहरी खाई के भीतर अमीर खाँ पिण्डारी की बेगमों को बंधक बनाकर रखा था।
🪟चौमूँ का किला
- संत के आशीर्वाद से लगभग 1595-97 ई. में ठाकुर कर्णसिंह द्वारा बसाया गया चौमूँ का किला अपने देवी निवास महल के लिए जाना जाता है, जिसकी बनावट जयपुर के अलबर्ट हॉल की प्रतिकृति जैसी है।
🌲कनकवाड़ी दुर्ग
- सरिस्का के घने जंगल में छिपा कनकवाड़ी दुर्ग सबसे अधिक इस बात के लिए याद किया जाता है कि यहीं औरंगजेब ने अपने पराजित भाई दाराशिकोह को बंदी बनाकर रखा था।
🛕राजोरगढ़ (नीलकण्ठ) दुर्ग
- 10वीं सदी में बड़गूजर शासक मंथनदेव द्वारा बनवाए गए भव्य नीलकण्ठ महादेव मंदिर के नाम पर नामित राजोरगढ़ दुर्ग को बाद में जयसिंह ने पुनर्निर्मित कर नगर के चारों ओर नई प्राचीर बनवाई।
🏨नीमराणा का किला
- 1464 में चौहान शासकों ने पृथ्वीराज चौहान के वंशजों की तीसरी राजधानी के रूप में नीमराणा दुर्ग बनवाया; 2008 में इसे 'नीमराणा फोर्ट पैलेस' नामक विरासत होटल में बदल दिया गया।
👻भानगढ़ दुर्ग
- 1574 में आमेर के भगवन्तदास द्वारा बसाया गया और बाद में उनके पुत्र माधोसिंह की राजधानी रहा भानगढ़ आज अपने बिखरे खंडहरों के बीच पूरे देश में राजस्थान के 'भुतहा किले' के नाम से प्रसिद्ध है।
🖼️राजगढ़ का किला
- 1770 में रावराजा प्रतापसिंह द्वारा अलवर जिले में बनवाया गया राजगढ़ दुर्ग वह स्थान है जहाँ चितेरे डालूराम ने सर्वप्रथम भित्तिचित्रण की विशिष्ट ढूँढाड़ी (जयपुरी) परंपरा स्थापित की।
☀️बसन्तगढ़ दुर्ग
- गुजरात के मुस्लिम शासकों को रोकने हेतु पिंडवाड़ा के निकट महाराणा कुंभा द्वारा बनवाए गए बसंतगढ़ की प्राचीरों में सीमेंट या चूने का बिल्कुल प्रयोग नहीं हुआ; एक शिलालेख इसका इतिहास 7वीं सदी तक ले जाता है।
💨कुचामन का किला
- राजस्थान के जागीरी किलों का सिरमौर माना जाने वाला कुचामन दुर्ग पराक्रमी मेड़तिया सरदार जालिमसिंह ने एक संत के आशीर्वाद से बनवाया था; इसकी जागीर की राजधानी मारोठ थी।
🕌फतेहपुर दुर्ग
- शेखावाटी का सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दुर्ग फतेहपुर 1453 में फतनखाँ कायमखानी ने बनवाया, जिन्होंने इसके इर्द-गिर्द फतेहपुर कस्बा भी बसाया।
🪨लक्ष्मणगढ़ दुर्ग
- 1805 में रावराजा लक्ष्मणसिंह द्वारा बिखरे चट्टानी टुकड़ों वाली पहाड़ी पर बनवाया गया लक्ष्मणगढ़ दुर्ग अपनी प्राचीर के लिए विशिष्ट है -- यह केवल बुर्जों से बनी है, सतत् दीवार से नहीं, जो वास्तुकला में एक असामान्य उदाहरण है।
🕍शाहाबाद दुर्ग
- मुकुन्दरा पर्वत श्रेणी की भामती पहाड़ी पर स्थित 9वीं सदी का यह परमारकालीन दुर्ग 1521 में पुनर्निर्मित हुआ और बाद में दो बार नाम बदला -- पहले शेरशाह सूरी ने इसे सलीमाबाद, फिर मुगलों के काल में इसे शाहाबाद कहा गया।
🌧️सज्जनगढ़ दुर्ग (मानसून पैलेस)
- उदयपुर की बाँसदरा पहाड़ी पर महाराणा सज्जनसिंह द्वारा बनवाया गया सज्जनगढ़ दुर्ग 'उदयपुर का मुकुटमणि' कहलाता है; 1881 में इसमें वाणी विलास पैलेस व गुलाबबाड़ी भी जोड़े गए।
💦डीग का किला
- जाट शासक बदनसिंह द्वारा 1730 में बनवाया गया डीग दुर्ग अपने जल महलों के लिए प्रसिद्ध है, जो महाराजा सूरजमल के निवास को घेरे हुए हैं; इसका मशहूर सफेद संगमरमर का झूला माना जाता है कि कभी सम्राज्ञी नूरजहाँ का था, जिसे दिल्ली से लूटकर लाया गया।
🏞️तवनगढ़ / तिमनगढ़ दुर्ग
- बयाना के विजयपाल के पुत्र त्रिभुवनपाल ने 11वीं सदी में त्रिभुवनगिरि पहाड़ी पर तिमनगढ़ का निर्माण करवाया; 1196 ई. में यह बयाना के साथ मुहम्मद गौरी की सेना के हाथों गिर गया और कुछ समय के लिए इसे इस्लामाबाद कहा गया।
🕌शेरगढ़ (कोशवर्द्धन) दुर्ग, बाराँ
- परवन नदी के किनारे शेरशाह सूरी के नाम पर बना यह दुर्ग बाद में झाला जालिमसिंह द्वारा पुनर्निर्मित किया गया, जिन्होंने कुछ समय के लिए अमीर खाँ पिण्डारी को भी यहाँ शरण दी।
⚙️शेरगढ़ दुर्ग, धौलपुर
- कुषाण कालीन शासक मालदेव द्वारा धौलपुर के निकट चम्बल नदी पर बनवाया गया और 1540 में शेरशाह सूरी द्वारा जीर्णोद्धृत यह दुर्ग साम्प्रदायिक सद्भाव का जीता-जागता उदाहरण है, जहाँ एक मस्जिद व हनुमान मंदिर पास-पास खड़े हैं।
🥈चूरू का किला
- 1739 में ठाकुर कुशालसिंह द्वारा बनवाया गया चूरू का किला 'चाँदी के गोले दागने वाला किला' कहलाता है -- 1814 के घेराव में जब गोले ढालने की धातु समाप्त हो गई, तो निवासियों ने घर की चाँदी दान कर तोपों को दागते रहने में मदद की।
राजस्थान के अन्य ऐतिहासिक दुर्ग
हर जिले में बिखरे ये छोटे दुर्ग भले ही पोस्टकार्डों में कम दिखें, पर हर एक राजस्थान की कहानी का एक टुकड़ा आज भी सँजोए है -- कोई राज्याभिषेक स्थल, कोई मुगल बंदी की जगह, कोई साझा आस्था का प्रतीक, तो कोई बस याद रखने लायक एक नाम।
🕌भूमगढ़/भोमगढ़ दुर्ग
- असीरगढ़ भी कहलाने वाला टोंक जिले का यह दुर्ग 17वीं सदी में एक ब्राह्मण भोला द्वारा बनवाया गया और बाद में टोंक के नवाब अमीर खाँ पिण्डारी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया।
🧱नाहरगढ़ दुर्ग (बाराँ)
- दिल्ली के लाल किले जैसे लाल पत्थर से बना बाराँ जिले का यह नाहरगढ़ दुर्ग नेकनाम बाबा की दरगाह के लिए भी जाना जाता है।
🔫खण्डार का दुर्ग
- सवाई माधोपुर का यह त्रिभुजाकार गिरि-वन दुर्ग खण्डार अपनी अष्टधातु से बनी 'शारदा तोप' के लिए जाना जाता है।
🏺मंडोर दुर्ग
- कभी माण्डव्यपुर नाम से पहचाना जाने वाला मंडोर जोधपुर शहर बसने से पहले राठौड़ों की राजधानी था, जो लगभग 300 फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है; राव जोधा ने लगभग 1453 ई. में इसे अपने अधीन किया।
🎋उटगिरि का किला
- करौली शहर के इस दुर्ग में महाराज प्रतापरुद्र के पुत्र चन्द्रसेन का राज्याभिषेक हुआ था; इसके कई पुराने नाम भी प्रचलित हैं, जिनमें उदित नगर शामिल है।
🏜️मंडरायल दुर्ग
- मध्यप्रदेश-राजस्थान सीमा पर चम्बल नदी के ऊपर स्थित करौली का यह लाल पत्थर से बना दुर्ग ब्रजबहादुर ने बनवाया था; बाद में इसके एक शासक मियाँ माखन के नाम पर इसका वर्तमान नाम पड़ा।
🦂इंदौर का किला
- वर्तमान खैरथल-तिजारा जिले में निकुंभों द्वारा बनवाया गया इंदौर का किला लंबे समय तक दिल्ली सल्तनत के लिए आँख की किरकिरी बना रहा।
🕯️तिजारा का दुर्ग
- 1836 में महाराजा बलवंतसिंह द्वारा अपनी माता मूसी महारानी की स्मृति में बनवाया गया तिजारा का दुर्ग महाभारतकालीन त्रिगर्त प्रदेश कहलाने वाले क्षेत्र में स्थित है।
🏚️बनेड़ा का किला
- भीलवाड़ा जिले का यह दुर्ग एक विशिष्ट पहचान रखता है -- 1730 में इसका पुनर्निर्माण शुरू होने के बाद से यह राजस्थान का इकलौता दुर्ग है जो आज भी अपने मूल स्वरूप में यथावत है।
🙏नाथों का दुर्ग
- जोधपुर के महाराजा मानसिंह द्वारा भीमनाथ जी महाराज को जागीर में दिया गया यह मजबूत जालौर दुर्ग नाथों का दुर्ग या कोटकास्तां का किला कहलाया।
🏨केसरोली का किला
- कोटपूतली-बहरोड़ जिले के नीमराणा में स्थित केसरोली का किला आज नीमराणा फोर्ट पैलेस चलाने वाले उसी समूह द्वारा एक रिसॉर्ट के रूप में संचालित किया जाता है।
🕌गूमट का दुर्ग
- धौलपुर जिले के बाड़ी कस्बे में स्थित गूमट के दुर्ग के निर्माण का उल्लेख 1444 ई. तक मिलता है; इसमें सम्राट हुमायूँ के काल की मस्जिदें भी हैं।
🏕️खींवसर दुर्ग
- नागौर जिले में राव करमसजी द्वारा लगभग 1523 ई. में बनवाया गया खींवसर दुर्ग कभी मुगल सम्राट औरंगजेब का पड़ाव रहा और अब एक विरासत होटल के रूप में संचालित है।
🚶भाद्राजूण का किला
- 1564 में अकबर द्वारा जोधपुर दुर्ग जीत लिए जाने के बाद मारवाड़ शासक राव चन्द्रसेन ने इसी जालौर स्थित भाद्राजूण के किले में शरण ली थी।
🌾मनोहरथाना दुर्ग
- झालावाड़ जिले में परवन व काली खोह नदियों के संगम पर स्थित मनोहरथाना दुर्ग कोटा के महाराव भीमसिंह ने बनवाया था।
🏞️नवलखा दुर्ग
- झालावाड़ के झालरापाटन के निकट स्थित नवलखा दुर्ग झाला पृथ्वीसिंह ने बनवाया था।
📍ककोड़ दुर्ग
- ककोड़ दुर्ग टोंक जिले में स्थित है।
📍इन्द्रगढ़ का किला
- इन्द्रगढ़ का किला बूँदी जिले में स्थित एक गिरि दुर्ग है।
⚔️रायपिथौरा किला
- रायपिथौरा किला महान चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने स्वयं बनवाया था।
🧡पोकरण दुर्ग
- जोधपुर के राव मालदेव द्वारा 1550 ई. में लाल पत्थरों से बनवाया गया पोकरण दुर्ग जैसलमेर जिले में स्थित है।
🐫सोढ़लगढ़ दुर्ग
- कभी सोढ़ल कहलाने वाला गंगानगर जिले का यह धान्वन दुर्ग 1799 में बीकानेर के सूरतसिंह द्वारा पुनर्निर्मित किया गया, जिन्होंने इसका नाम सूरतगढ़ रखा।
🧭टॉडगढ़ किला
- ब्यावर में कर्नल टॉड द्वारा बनवाया गया टॉडगढ़ किला बाद में विजयसिंह पथिक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को नजरबंद किए जाने के कारण चर्चा में रहा।
🎖️उँटाला का किला
- उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित मेवाड़ का यह दुर्ग महाराणा अमरसिंह द्वितीय के काल में मुगल सम्राट जहाँगीर के अधिकार में आ गया था।
🏔️बदनौर दुर्ग
- ब्यावर के निकट स्थित सात मंजिला ऊँचा यह दुर्ग एक छोटी पहाड़ी पर बना है, जिसके आसपास की पहाड़ियों में सुरम्य बैराठ माता मंदिर भी दर्शनीय है।
🔥देवहंस किला
- 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले धौलपुर रियासत के सेनापति देवहंस द्वारा बनवाया गया यह दुर्ग क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र के रूप में उपयोग होता था।
📍लाल पठान दुर्ग
- लाल पठान दुर्ग टोंक जिले के टोडारायसिंह में स्थित है।
🏰लालगढ़ किला
- लालगढ़ किला, जिसे लालगढ़ पैलेस भी कहते हैं, बीकानेर में स्थित है।
🗣️मेड़ता का किला
- जोधपुर के राव मालदेव द्वारा बनवाया गया मेड़ता का किला वह स्थान है जहाँ उन्होंने अकबर के दूतों अबुल फजल व फैजी से वार्ता की थी; 1562 में यह दुर्ग मुगलों के अधीन चला गया।
🏜️जूना किला
- बाड़मेर जिले में लगभग 10वीं-11वीं सदी में बसा जूना किला केवल एक ही मार्ग से प्रवेश योग्य है और चारों ओर पहाड़ों व मंदिरों से घिरा होने के कारण पूर्णतः सुरक्षित माना जाता है।