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राजस्थान GK

राजस्थान की स्थापत्यकला

Architecture of Rajasthan

राजस्थान के भव्य दुर्गों, राजप्रासादों, हवेलियों, नगर-नियोजन और मंदिर शैलियों की स्थापत्य यात्रा—शिल्प, इतिहास और शैलियों का सफर एक साथ।

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दुर्ग स्थापत्य

Forts of Rajasthan

राजस्थान के भव्य दुर्ग वीरता, सुरक्षा और शिल्पकारी की जीती-जागती मिसाल हैं — यहाँ जानिए इनके निर्माण-सिद्धांत और सबसे नामी किलों की खासियतें।

⚔️स्थापत्य शैली का विकास

  • राजस्थान में सदियों में एक अलग स्थापत्य शैली उभरी जिसमें बेहतरीन शिल्पकारी, मजबूती, अलंकरण, सुरक्षा-बोध, उपयोगिता, भव्यता और विषयों की व्यापक विविधता झलकती है; इसे व्यापक रूप से हिन्दू स्थापत्य शैली कहा जाता है।
  • मध्यकाल में तुर्क आक्रमणों की निरंतरता ने राजपूत स्थापत्य में वीरता के साथ-साथ सुरक्षा की सोच भी गहरी कर दी, जिससे विशाल और मज़बूत दुर्ग बनने लगे; राजाओं की धर्मपरायणता के चलते इन्हीं दुर्गों के भीतर मंदिर भी उभरे।
  • 16वीं-17वीं सदी में मुगलों से घनिष्ठ संबंधों ने राजपूत और मुस्लिम कला को निकट लाया, और दोनों परंपराओं के मेल से एक नई हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य शैली जन्मी।

📜दुर्ग निर्माण के सिद्धांत

  • शुक्रनीति में राज्य के सात अंगों में दुर्ग को गिना गया है; राज्य की तुलना मानव शरीर से करते हुए इसे शरीर की भुजा जैसे महत्वपूर्ण अंग के समान बताया गया।
  • शुक्रनीति दुर्गों के नौ भेद गिनाती है, जबकि कौटिल्य के अनुसार दुर्ग मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं।
  • ग्रंथों के अनुसार एक आदर्श दुर्ग में पर्याप्त हथियार, अनाज, पानी, चारा, दवाइयाँ, धन, घोड़े-हाथी और भारवाहक पशु, ब्राह्मण और शिल्पी होने चाहिए, साथ ही आपातकाल में चुपचाप निकलने के लिए एक गुप्त सुरंग भी होनी चाहिए—वरना वह दुर्ग महज़ एक बंदीगृह बनकर रह जाता है।
  • राजस्थान के अधिकांश किलों में प्राचीन ग्रंथों में बताई गई विशेषताएँ मिलती हैं: मजबूत प्राचीर, विशाल परकोटा, अभेद्य बुर्जें, चारों ओर गहरी खाई, शस्त्रागार, जलाशय, अन्न भंडार, गुप्त द्वार-सुरंग, राजप्रासाद और सैनिकों के लिए आवास।

🛡️चित्तौड़गढ़ दुर्ग

  • स्थापत्य की दृष्टि से चित्तौड़गढ़ को बेजोड़ माना जाता है, इसीलिए यह कहावत बनी—'गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया', यानी बाकी किले इसके सामने छोटे दुर्गों जैसे ही हैं।
  • घुमावदार मज़बूत प्राचीर, ऊँची-विशाल बुर्जें, सात दुर्भेद्य प्रवेश द्वार और किले तक पहुँचने वाला लंबा घुमावदार सर्पिल मार्ग—इन सबने चित्तौड़गढ़ को एक विकट व दुर्गम दुर्ग बना दिया।

🏔️कुम्भलगढ़ दुर्ग

  • कुम्भलगढ़ का निर्माण राणा कुम्भा के प्रमुख शिल्पकार और वास्तुशास्त्र के ज्ञाता मंडन की देखरेख में हुआ; चारों ओर घनी हरियाली और पहाड़ी चोटियों से घिरे होने के कारण यह ऊँचा होते हुए भी दूर से नज़र नहीं आता।
  • कई मील लंबी, ऊँची-चौड़ी प्राचीर जिस पर तीन-चार घुड़सवार साथ चल सकें, बीच-बीच में बनी विशाल बुर्जें और ऊँचे अवरोधक फाटक—इन विशेषताओं ने कुम्भलगढ़ को लगभग दुर्भेद्य बना दिया।

🌲रणथम्भौर दुर्ग

  • रणथम्भौर में गिरि दुर्ग (पहाड़ी किला) और वन दुर्ग (जंगल किला) दोनों के गुण एक साथ मिलते हैं; ऊँची पहाड़ी चोटी पर बसा होने के बावजूद यह दूर से आसानी से नज़र नहीं आता, जबकि इसके ऊपर से आती शत्रु सेना को दूर से ही देखा जा सकता है।

🟡जैसलमेर का किला

  • स्थापत्य कला की दृष्टि से जैसलमेर का किला बेहद उत्कृष्ट माना जाता है; गहरे पीले पत्थर से बना यह विशाल-मज़बूत दुर्ग बिना किसी चूने के केवल पत्थर पर पत्थर जमाकर खड़ा किया गया, जो इसकी सबसे अनूठी पहचान है।
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राजप्रासाद, हवेलियाँ एवं स्मारक

Palaces, Havelis & Memorials

किलों से आगे बढ़कर राजस्थान के राजप्रासाद, भव्य हवेलियाँ और छतरियाँ बताती हैं कि यहाँ रोज़मर्रा का वैभव और स्मृति दोनों कितनी कलात्मकता से गढ़े गए।

👑राजप्रासाद स्थापत्य

  • राजस्थान में राजप्रासाद या तो ऊँचे स्थान पर एक कोने में बसाए गए या फिर सीधे नगर के बीचोंबीच; बैराठ, मेनाल, नागदा, राजोरगढ़ और नगरी जैसे प्राचीन नगरों में मिले पूर्व-मध्यकालीन महलों के अवशेषों में छोटे कमरे, छोटे दरवाज़े और खिड़कियों की कमी साफ झलकती है।
  • राजपूत-मुगल संबंधों ने राजभवनों की बनावट को काफी बदल दिया और दोनों शैलियों का सुंदर मेल हुआ; फव्वारे व जलाशयों वाले बाग-बगीचे, दीवाने-खास, दीवाने-आम, शयनकक्ष, तोपखाना, शस्त्रागार, भंडार, मंदिर, चित्रशालाएँ, बारहदरियाँ, झरोखे और रंगमहल इसी मेल की मिसालें हैं।
  • शिल्पी मंडन के अनुसार राजभवन के लिए नगर का केंद्र या ऊँचा कोना उपयुक्त स्थान है; दुर्ग की तरह ही परकोटा और कुओं का होना ज़रूरी बताया गया, साथ ही रसोईघर, शस्त्रागार, अन्न भंडार, मंदिर और राजकुमार के कक्षों को भी अनिवार्य माना गया।

🪟हवेलियाँ

  • हवेली-निर्माण भारतीय स्थापत्य परंपरा के अनुरूप ही रहा—मुख्य द्वार के दोनों ओर सजी खिड़कियाँ, फिर एक लंबी पोल, विशाल चौक, चौक के इर्द-गिर्द कमरे, सामने चौबारा और उसके आगे-पीछे और कमरे; बड़ी हवेलियों में दो-तीन चौक और कई मंजिलें भी होती थीं।
  • राजस्थान के कस्बों में सामंतों और धनी सेठों ने भव्य हवेलियाँ बनवाईं—रामगढ़, नवलगढ़, फतेहपुर, मुकुन्दगढ़, मंडावा, पिलानी, सरदारशहर और रतनगढ़ जैसे कस्बे आज भी इनके लिए जाने जाते हैं।
  • जैसलमेर की सालिमसिंह की हवेली, नथमल की हवेली और पटवों की हवेली अपनी पत्थर की बारीक जाली और नक्काशी के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं; वहीं बंसी पत्थर से बनी करौली, भरतपुर और कोटा की हवेलियाँ भी अपनी शिल्पकारी के लिए बेजोड़ मानी जाती हैं।
  • इन्हीं हवेलियों की बदौलत आज हवेली स्थापत्य के साथ-साथ हवेली संगीत और हवेली चित्रकला भी सांस्कृतिक जगत में अपनी अलग पहचान रखते हैं।

छतरियाँ, मकबरे व दरगाह

  • मृत्यु के बाद स्मृति-चिह्न बनाने की परंपरा काफी पुरानी है; राजाओं की स्मृति में बने विशेष स्मारक छतरी या देवल कहलाते हैं, सती-जौहर करने वाली स्त्रियों की समाधियों को देवली या देवल कहा जाता था, और मुसलमानों के मकबरे भी इसी परंपरा में गिने जाते हैं।
  • स्थापत्य की दृष्टि से जयपुर की गैटोर छतरियाँ, जोधपुर का जसवंत थड़ा, कोटा का छत्रविलास बाग और जैसलमेर का बड़ा बाग खासतौर पर उल्लेखनीय हैं।
  • संगमरमर, बंसी पत्थर और जैसलमेर के पीले पत्थर से बनी ये छतरियाँ मुगल और राजपूत कला का सुंदर संगम दिखाती हैं—कई स्तंभों पर टिके गोल गुंबद, राजपूती मेहराबदार डिज़ाइन, मूर्तिकला और बेल-बूटों की नक्काशी इनकी खासियत है।
  • अलवर की मूसी महारानी की छतरी और फतह गुंबद, करौली में गोपालसिंह की छतरी, बूँदी की चौरासी खंभों की छतरी, रामगढ़ में सेठों की छतरी, बीकानेर में राव कल्याणमल की छतरी और जैसलमेर की राजा व पालीवाल छतरियाँ भी स्थापत्य सौंदर्य के लिहाज़ से खास आकर्षण हैं; राजाओं की छतरियों में अक्सर पगले (पैरों के चिह्न) उकेरे जाते थे, जबकि शैव-नाथ संतों की छतरियों में खड़ाऊँ, शिवलिंग या नंदी प्रतीक मिलते हैं—जोधपुर के महामंदिर की छतरी इस मामले में खास उल्लेखनीय है।
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नगर स्थापत्य

Towns & City Planning

आहड़-गिलूंड की प्राचीन बस्तियों से लेकर जयपुर के सुनियोजित नौ-वर्ग शहर तक — राजस्थान की नगर-योजना की सोच का सफर।

🏺प्राचीन नगर स्थापत्य

  • ऋग्वेद काल से भी कई सदियों पहले सरस्वती और दृषद्वती नदियों के उपजाऊ किनारों पर नगर बसने लगे थे; मंदिरों का सबसे पुराना उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है।
  • दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आहड़ और गिलूंड प्राचीन संस्कृति के प्रमुख केंद्र रहे—यहाँ की ईंटों से बनी इमारतें, सड़कें, नालियाँ, गोल कुएँ और वेदियाँ बेजोड़ थीं, और चौड़ी समानांतर सड़कों के साथ जल-निकासी की व्यवस्था एक समृद्ध नगर-शिल्प परंपरा की गवाही देती है।
  • नोह के टीले की खुदाई से भी उन्नत भवन-निर्माण परंपरा का पता चलता है; महाभारत काल में बैराठ, माचेड़ी और पुष्कर जैसे नगरों का ज़िक्र मिलता है जो स्थापत्य और सुरक्षा दोनों में समृद्ध थे।
  • मौर्य काल में बेड़च नदी किनारे मध्यमिका (नगरी) की नगर-योजना भव्य थी, और गुप्तकाल में मेनाल, अमझेरा, डबोक तथा भरतपुर का आसपास का इलाका नगरीय वैभव का प्रमाण देता है; बाद में स्थानीय राजाओं ने जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर, बूँदी, कोटा और जयपुर जैसे नगरों को अपनी राजधानी के रूप में एक संपूर्ण, सुनियोजित शहर की कल्पना के साथ बसाया।

📐जयपुर नगर नियोजन

  • सवाई जयसिंह की परिकल्पना को धरातल पर उतारने के लिए जयपुर की नींव राजगुरु पंडित जगन्नाथ सम्राट ने रखी, और महान शिल्पकार विद्याधर भट्टाचार्य ने पूरे शहर को नौ वर्गों (खंडों) के सिद्धांत पर बसाया।
  • जयपुर की पहचान चौड़ी और सीधी सड़कों की व्यवस्था रही; शाही वर्गाकार क्षेत्र के दोनों छोर पर छोटी व बड़ी चौपड़ हैं जिनमें फव्वारे लगे हैं और चौड़ी सड़क के दोनों किनारों पर बाज़ार सजते हैं, जबकि ब्रह्मपुरी में पुरोहित वर्ग और चौकड़ियों में सेठ-सामंतों की भव्य हवेलियाँ शहर की शोभा बढ़ाती हैं।
  • पूरा जयपुर शहर एक मज़बूत परकोटे से घिरा है जिसमें सूरजपोल, चाँदपोल, घाटगेट, साँगानेरी गेट, अजमेरी गेट और जोरावरसिंह गेट जैसे प्रवेश-निकास द्वार बनाए गए; आगे चलकर राजस्थान के अन्य नगरों की योजना पर भी जयपुर के इस स्थापत्य का गहरा असर पड़ा।
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मंदिर स्थापत्य की शैलियाँ

Temple Architecture Styles

नागर, द्रविड़ और वेसर—भारत के मंदिर-स्थापत्य की तीन क्लासिक शैलियों को उनकी बनावट, अंगों और फैलाव के साथ समझिए।

📚शैलियों का वर्गीकरण

  • शिल्पशास्त्र के अनुसार मंदिर-निर्माण की तीन मूल शैलियाँ मानी गई हैं—नागर, द्रविड़ और वेसर; प्राचीन ग्रंथों में मिलने वाले लतिन, साधार, भूमि या पुष्पक विमान जैसे नाम भी अंततः इन्हीं तीन शैलियों के अंतर्गत आते हैं।

⛰️नागर शैली

  • नागर शैली का मंदिर आधार से शिखर तक चौकोर या वर्गाकार आकृति लिए ऊँचे चबूतरे पर खड़ा होता है, जिस पर चढ़ने के लिए चारों ओर सीढ़ियाँ बनी होती हैं; वर्गाकार गर्भगृह के ऊपर की बनावट किसी ऊँची मीनार जैसी दिखती है, शिखर की रेखाएँ ऊपर जाते-जाते अंदर की ओर झुकती हैं और शीर्ष पर आमलक सुशोभित रहता है।
  • नागर शैली के मंदिर हिमालय और विंध्य पर्वतमाला के बीच के क्षेत्र में सबसे ज़्यादा फैले हैं; इतिहासकार पर्सी ब्राउन ने इसे उत्तर भारतीय आर्य शैली कहा, जबकि शिल्पशास्त्र ग्रंथ 'कालिकागम' के अनुसार एक नागर मंदिर में आठ प्रमुख अंग गिनाए गए हैं।
  • इस शैली का विस्तार पश्चिम में महाराष्ट्र से लेकर पूर्व में बंगाल-उड़ीसा तक और दक्षिण में तुंगभद्रा नदी से उत्तर में हिमाचल प्रदेश के चंबा-कांगड़ा तक फैला है, जबकि मध्यप्रदेश इसका केंद्र माना जाता है।

🧱नागर मंदिर के आठ अंग

  • नागर मंदिर की बनावट को आधार से शिखर तक क्रम में समझा जा सकता है: सबसे नीचे अधिष्ठान होता है जिस पर पूरा भवन खड़ा रहता है (इसका ऊपरी हिस्सा जगती कहलाता है), उसके ऊपर नींव और दीवार के बीच का भाग मसूरक और फिर दीवारें यानी जंघा आती हैं, और जंघा के ऊपर कोर्निस जैसा भाग कपोत कहलाता है।
  • इसके बाद गर्भगृह के ऊपर उठता शिखर आता है, जिसके ऊपरी हिस्से को ग्रीवा कहा जाता है; ग्रीवा के ऊपर कलश से ठीक नीचे का गोलाकार हिस्सा वर्तुलाकार आमलक कहलाता है, और सबसे ऊपर शिखर के शीर्षभाग पर कलश विराजमान होता है।

🕍द्रविड़ शैली

  • द्रविड़ प्रदेश में खासतौर पर विकसित होने के कारण इसे द्रविड़ शैली कहा गया; आधार आमतौर पर वर्गाकार होता है, गर्भगृह के ऊपर का हिस्सा कई मंज़िलों वाला पिरामिड जैसा दिखता है और शीर्ष गुंबदाकार होता है।
  • द्रविड़ शैली के मंदिर काफी ऊँचे होते हैं और एक विशाल प्रांगण से घिरे रहते हैं जिसके भीतर छोटे मंदिर, कक्ष और जलकुंड बने होते हैं; प्रांगण के मुख्य प्रवेश द्वार को गोपुरम कहा जाता है, जो इतना ऊँचा होता है कि उसके सामने मुख्य मंदिर का शिखर भी छोटा लगने लगता है।
  • कृष्णा या तुंगभद्रा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर फैले हैं; तंजौर, मदुरा, काँची, हम्पी और विजयनगर के प्रमुख मंदिर चोल, पांड्य, पल्लव और विजयनगर राजवंशों की देन हैं।

🌀वेसर शैली

  • वेसर का शाब्दिक अर्थ ही 'मिश्रित' है—नागर और द्रविड़ शैलियों के मेल को वेसर कहा गया, जिसमें बनावट द्रविड़ की तरह होती है पर रूप नागर शैली जैसा रहता है; ग्रंथ 'वृहच्छिल्पशास्त्र' में इसे 'मिश्रक' नाम दिया गया है।
  • वेसर शैली के मंदिर विंध्य पर्वतमाला से कृष्णा नदी तक बने; इनका निचला हिस्सा ग्रीवा तक वर्गाकार रहता था जबकि शीर्ष गोलाकार बनाया जाता था ताकि गोल शिखर से सजाया जा सके।
  • यह शैली सबसे पहले कर्नाटक में विकसित हुई और इसकी शुरुआत बादामी के चालुक्यों ने की; एलोरा की गुफाएँ इसी शैली में बनी हैं, जबकि बेलूर, हेलेबिडु व सोमनाथपुरा के मंदिर इसके सबसे उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।

🔲पंचायतन व एकायतन मंदिर

  • पंचायतन शैली दरअसल नागर शैली का ही विस्तृत रूप है—इसमें मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर उसी देव-परिवार के चार छोटे मंदिर एक साझा चबूतरे या परिक्रमा-पथ से जुड़े होते हैं; देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मंदिर और राजस्थान में बाड़ोली का शिवमंदिर व ओसियाँ का हरिहर-सूर्य मंदिर इसके उदाहरण हैं।
  • इसके उलट एकायतन मंदिर में सिर्फ एक ही मंदिर होता है, जिसमें एक गर्भगृह, एक सभामंडप और एक द्वारमंडप शामिल रहते हैं—यानी बिना किसी सहायक उप-मंदिर के एक स्वतंत्र इकाई।
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ऐतिहासिक मंदिर व मूर्तिकला

Historic Temples & Sacred Art

गुप्तकालीन गुहा-मंदिरों से लेकर महामारू शैली, किराडू के अलंकृत शिखरों और कालीबंगा की प्राचीन धातु-प्रतिमा तक — राजस्थान की मंदिर परंपरा और मूर्तिकला की झलक।

🪨आरंभिक मंदिर अवशेष

  • मौर्य से गुप्तकाल के बीच राजस्थान में मिले दो अवशेष खास महत्व रखते हैं—बैराठ में मिले मौर्यकालीन ईंट व लकड़ी से बने गोल बौद्ध चैत्य (मंदिर) के अवशेष, और चित्तौड़ के पास नगरी में वैष्णव मंदिर के चिह्न, जिनमें तोरण-द्वार के टुकड़े खासतौर पर उल्लेखनीय हैं।
  • शुरुआती गुप्तकालीन मंदिर पहाड़ काटकर बनाए गए मंदिरों की तरह सपाट छत वाले होते थे; दर्रा, चारचौमा और माकनगंज के मंदिर इसी परंपरा के हैं, और झालरापाटन का शीतलेश्वर महादेव मंदिर भी इसी श्रेणी में आता है। गुप्त व गुप्तोत्तर काल (लगभग 300-700 ई.) के ऐसे गुहा-शैली मंदिर कोटा-झालावाड़ मार्ग पर दर्रा के अलावा चारचौमा, माकनगंज, झालावाड़ का शीतलेश्वर महादेव और कोटा का कन्सुआ मंदिर जैसी जगहों पर मिलते हैं।

🏵️गुर्जर प्रतिहार / महामारू शैली

  • मंदिर-निर्माण में गुर्जर प्रतिहार शैली (लगभग छठी से बारहवीं शताब्दी) का दबदबा रहा; सांस्कृतिक निर्माण के लिहाज़ से इसे राजस्थान का स्वर्णकाल कहा जाता है।
  • मंडोर, मेड़ता और जालौर के प्रतिहार शासकों की अगुवाई में विकसित हुए इस कला-आंदोलन को 'महामारू' शैली कहा जाता है, जिसका विस्तार मरु प्रदेश से लेकर आभानेरी (बाँदीकुई), चित्तौड़, नाली, उत्तरी मेदपाट और उपरमाल पट्टी तक फैला।
  • प्रतिहार राजा कक्कुक ने 861 ई. में जोधपुर के निकट घटियाला में जैन अंबिका मंदिर बनवाया, जबकि गोठ मांगलोद (नागौर) का मंदिर नौवीं सदी की प्रतिहार शैली में निर्मित है। ओसियाँ में प्रतिहार राजा वत्सराज द्वारा आठवीं सदी में बनवाया गया महावीर मंदिर राजस्थान का अब तक ज्ञात सबसे पुराना जैन मंदिर माना जाता है।
  • महामारू शैली के प्रमुख मंदिरों में ओसियाँ (जोधपुर) के आठवीं सदी के सूर्य, हरिहर और महावीर मंदिर तथा पिप्पलाद माता मंदिर, चित्तौड़ के कालिका व कुंभश्याम मंदिर (जिनके कुछ हिस्से बाद में पुनर्निर्मित हुए), दसवीं सदी के आभानेरी, उदयपुर के जगत स्थित अंबिका माता मंदिर व नागदा का सास-बहू मंदिर, और सीकर का हर्षनाथ मंदिर शामिल हैं।

🎨गुजराती व मारू-गुर्जर प्रभाव

  • दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में महामारू शैली पर मध्य भारत की शैलियों का असर साफ दिखता है—बाड़ोली, रामगढ़, मेनाल, कंसुआ और केशोरायपाटन के मंदिर इसी तरह के हैं, जबकि लकुलीश मंदिर, एकलिंगजी, अर्थूणा, देवसोमनाथ और आहड़ जैसे स्थानों के मंदिरों पर गुजराती शैली की छाप मिलती है।
  • ग्यारहवीं से तेरहवीं सदी के बीच विकसित मारू-गुर्जर (सोलंकी) शैली के प्रमुख मंदिरों में चित्तौड़ का समिद्धेश्वर मंदिर, ओसियाँ का सच्चियाँ माता मंदिर और दिलवाड़ा के जैन मंदिर गिने जाते हैं।
  • ओसियाँ के मंदिरों की अपनी खास शैलीगत पहचान है—अलंकृत जगती पर स्थिति, पीठ (सांकल) का न होना, गर्भगृह पर सुघड़ शिखर, सजे हुए द्वार-स्तंभ-छतें, त्रिरथ व पंचरथ तल-विन्यास, कटिभाग में अक्सर कृष्णलीला का अंकन, और अधिकांश मंदिरों का विष्णु या सूर्य को समर्पित होना—साथ ही पंचायतन शैली में मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे मंदिरों की व्यवस्था भी यहाँ आम है।

🌸किराडू के मंदिर

  • गुर्जर प्रतिहार शैली का सबसे आखिरी और सबसे भव्य मंदिर बाड़मेर के किराडू का सोमेश्वर मंदिर है, जहाँ अलंकरण की भरमार और बेहद बारीक तक्षण-कला में गुप्तकालीन कला के साथ क्षेत्रीय परमार व सोलंकी शैलियों का संगम दिखता है।
  • पैंसठ अंग-उपांगों वाले इस मंदिर का शिखर बहु-कलश (अनेकाण्डक) रूप में है, और मंडप की सजावट में शक्ति-सौंदर्य तथा सूक्ष्मता-भव्यता का अनूठा संतुलन देखने को मिलता है; किराडू का विष्णु मंदिर इस परंपरा का एक और उल्लेखनीय उदाहरण है।

🌗नीलकंठ महादेव शिवालय

  • जालौर, पाली और बालोतरा जिलों की सीमा पर बसे नीलकंठ गाँव का यह शिवालय अलाउद्दीन खिलजी ने बनवाया था; यहाँ का शिवलिंग आधा काला और आधा पीला है, और मस्जिद जैसी बनावट व मीनारनुमा स्तंभों के कारण यह मंदिर बेहद आकर्षक दिखता है।

☀️राजस्थान के सूर्य मंदिर

  • सूर्य को अर्घ्य देना शायद पूजा का सबसे पुराना और सबसे सरल तरीका है, और दक्षिण राजस्थान में सूर्य-पूजा खासतौर पर प्रचलित रही; राजस्थान का सबसे पुराना सूर्य मंदिर (713 ई. का) चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है, जो अब कालिका माता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
  • झालरापाटन के दसवीं सदी के सूर्य मंदिर को कर्नल टॉड ने चारभुजा मंदिर कहा था; यहाँ मंडोवर के पीछे मुख्य रथिका में सूर्य और विष्णु के मिश्रित रूप की एक ही प्रतिमा स्थापित है। गंगरार (चित्तौड़) का नौवीं सदी का सूर्य मंदिर आज देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है।
  • आबू रोड से करीब 45 किमी दूर वरमान (जिसका पुराना नाम ब्राह्मण था) का सूर्य मंदिर ब्राह्मण स्वामी मंदिर कहलाता है; जयपुर की गलता पहाड़ी पर स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर आज भी पूजित है और भानु (सूर्य) सप्तमी पर यहाँ विशेष पूजा व सूर्यदेव की सवारी निकाली जाती है। पूर्वी राजस्थान में कामाँ (डीग) के पास सतवास में भी एक प्राचीन सूर्य मंदिर है।

🏞️कोटा क्षेत्र के देवालय

  • प्रतिहार-कालीन आवाँ के मंदिर कोटा से करीब 50 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित इसी नाम के प्राचीन ऐतिहासिक नगर में हैं; कोटा से लगभग 10 किमी उत्तर में चंदलोई नदी के बाएँ किनारे पर चंद्रसल के शिव मंदिर (मठ) स्थित हैं।
  • चाकण नदी के दक्षिणी तट पर कमलेश्वर शिव मंदिर बना है, जबकि कोटा से 135 किमी दक्षिण-पूर्व में बाराँ ज़िले में परवन नदी के बाएँ तट पर काकूनी मंदिर-समूह स्थित है।

🕉️राजस्थान में जैन मंदिर

  • प्राचीन काल से ही राजस्थान जैन धर्म का एक बड़ा केंद्र रहा है; आठवीं सदी में प्रतिहार राजा वत्सराज के समय ओसियाँ (प्राचीन नाम उपकेशपट्टन) में बना महावीर जिनालय पूरे पश्चिमी भारत का सबसे पुराना जिनालय माना जाता है।
  • जैन अभिलेखों के अनुसार महावीर स्वामी ने घर त्यागने से पहले 28 से 30 वर्ष की आयु के बीच के दो साल राजमहल में ही वीतराग होकर कायोत्सर्ग मुद्रा में तप में बिताए; इस स्वरूप को 'जीवंत स्वामी' कहा गया, जो श्वेतांबर संप्रदाय में बेहद लोकप्रिय रहा।
  • आठवीं से बारहवीं सदी के बीच मारवाड़-गोड़वाड़-सिरोही-आबू-मेवाड़ और पड़ोसी गुजरात में अलंकृत मुकुट व आभूषणों से सजी जीवंत स्वामी की पत्थर व धातु प्रतिमाएँ सबसे ज़्यादा बनाई गईं—ओसियाँ, खींवसर, सिरोही, सेवाड़ी, जूना पतरासर, देलवाड़ा, रणकपुर, श्रृंगार चँवरी, जैसलमेर, पारानगर, काकूनी, घाणेराव, नारलाई, आहड़, नादिया, पिंडवाड़ा, बसंतगढ़, मूँगथला और साँचौर जैसी अनेक जगहों पर इनके अवशेष मिले हैं।
  • जैन अभिलेखों के मुताबिक भगवान महावीर स्वयं पश्चिमी राजस्थान के श्रीमाल (भीनमाल) और अर्बुद क्षेत्र (आबू) में पधारे थे।

🗿अद्भुत पाषाण प्रतिमाएँ

  • चित्तौड़ और बूँदी ज़िलों से कुछ बेहद दुर्लभ पाषाण प्रतिमाएँ मिली हैं—चित्तौड़गढ़ के गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में पूजित 24×12 इंच की 'देवी प्रसवावस्था' प्रतिमा इनमें प्रमुख है।
  • केशोरायपाटन (बूँदी) के जंबुकेश्वर पथ स्थित सार्थवाही शिवालय में मिली वेणु-वीणाधारी देव-प्रतिमा हाड़ौती की मध्यकालीन कला में अनोखी है, क्योंकि वेणु और वीणा एक साथ दिखाना दुर्लभ है—झालरापाटन के सूर्य मंदिर के मंडोवर में भी ऐसी ही एक समकालीन प्रतिमा जड़ी मिलती है।
  • बूँदी शहर के एक तालाब-किनारे मंदिर में पूजित गजलक्ष्मी प्रतिमा राजस्थान की ज्ञात गजलक्ष्मी प्रतिमाओं में अपनी तरह की अनूठी मानी जाती है।

🏺मृण्मूर्तियाँ व धातु प्रतिमाएँ

  • रंगमहल, पीलीबंगा, बड़ोपल (हनुमानगढ़) और मुंडा जैसे टीलों की खुदाई में मिली मिट्टी की मूर्तियाँ शुरुआती गुप्तकाल की हैं; रूपवास (भरतपुर), हेमावास (पाली) और भीनमाल (जालौर) से मिलीं पत्थर की वैष्णव प्रतिमाएँ गुप्त कला के सुंदर नमूने हैं।
  • कालीबंगा से मिला छोटा ताम्र-वृषभ राजस्थान में मिली धातु-प्रतिमाओं में सबसे पुराना है, जिसकी अनुमानित प्राचीनता लगभग 1700 ई.पू. आँकी गई है; वहीं आहड़ (उदयपुर) के राजकीय संग्रहालय में रखी आठवीं-नौवीं सदी की तीर्थंकर प्रतिमा अब तक मिली सबसे बड़ी धातु-प्रतिमा है।
  • नगरी (चित्तौड़) में बिना छत वाले पूर्व-गुप्तकालीन वैष्णव मंदिरों के अवशेष मिले हैं और नांद (पुष्कर) में कुषाणकालीन शिवलिंग स्थापित है; नोह (भरतपुर) से मिली यक्ष 'जाखबाबा' की प्रतिमा भी कुषाणकालीन है, जबकि रेढ़ (टोंक) से मिली 'गजमुखी यक्ष' प्रतिमा शुंगकालीन मानी जाती है।