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राजस्थान GK

राजस्थान: एक परिचय

Rajasthan: An Introduction

भारत के सबसे बड़े राज्य की पूरी झलक — इसका भूगोल व सीमाएँ, 'राजस्थान' नाम की कहानी, प्रसिद्ध नगरों-दुर्गों के उपनाम, दिग्गज शख्सियतें और राज्य के हर अहम आँकड़े का क्विक-रेफरेंस, एक ही अध्याय में।

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राजस्थान: परिचय, भूगोल एवं सीमाएँ

Rajasthan: Introduction, Geography & Borders

भारत के सबसे बड़े राज्य की बुनियादी पहचान — इसकी अवस्थिति, अरावली की रीढ़, फैलाव-आकृति और पड़ोसी सीमाएँ, एक ही नज़र में।

📍स्थिति एवं क्षेत्रफल

  • राजस्थान भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में बसा है और पश्चिम में सीधे पाकिस्तान से अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है।
  • 342239 वर्ग किमी में फैला यह राज्य क्षेत्रफल के हिसाब से देश का सबसे बड़ा राज्य है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.41% घेरता है; इस सूची में मध्य प्रदेश दूसरे नंबर पर आता है।
  • आकार में अव्वल होने के बावजूद जनसंख्या के मामले में राजस्थान का स्थान देश में सातवाँ है।

🏜️मरुस्थल एवं जनजीवन

  • राज्य के भूभाग का लगभग 60% हिस्सा रेतीले टीलों से भरा मरुस्थल है, जहाँ पानी और हरियाली दोनों की भारी कमी रहती है।
  • इतनी विषम प्राकृतिक परिस्थितियों के बावजूद यहाँ के लोगों ने अपनी मेहनत से राज्य को आगे बढ़ाया, और इसी मिट्टी से निकले कई उद्योगपतियों ने दुनियाभर में अपना नाम कमाया।

⛰️अरावली पर्वतमाला

  • देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाने वाली अरावली राजस्थान के लगभग बीचोंबीच से गुजरती है और राज्य को दो अलग जलवायु क्षेत्रों में बाँट देती है — इसीलिए इसे राज्य की 'रीढ़ की हड्डी' भी कहा जाता है।
  • अरावली से निकलने वाली कई नदियों ने राज्य के विकास में अहम भूमिका निभाई है, और इनके किनारे प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक अनेक मानव बस्तियाँ बसती-उजड़ती रही हैं।
  • इन्हीं नदी-तटों पर पुरापाषाण, नवपाषाण, ताम्रयुगीन और लौहयुगीन बस्तियों के पुरातात्विक अवशेष आज भी मिलते हैं, जो राज्य की अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और अनूठी सांस्कृतिक विरासत की गवाही देते हैं।

📏विस्तार एवं आकृति

  • उत्तर से दक्षिण राज्य का फैलाव लगभग 826 किमी है जबकि पूर्व से पश्चिम यह लगभग 869 किमी तक जाता है — यानी लंबाई और चौड़ाई में करीब 43 किमी का अंतर है।
  • इसके दो विकर्ण भी लगभग बराबर हैं: दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व तक लगभग 784 किमी, और उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक लगभग 850 किमी — दोनों में करीब 66 किमी का फर्क है।
  • वैश्विक धरातल पर राजस्थान को ईशान (उत्तर-पूर्वी) कोण में, एशिया के सापेक्ष नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिमी) कोण में, तथा भारत के सापेक्ष वायव्य (उत्तर-पश्चिमी) कोण में स्थित माना जाता है।
  • भूगोलवेत्ता टी.एच. हेण्डले के अनुसार राज्य की आकृति एक विषम कोणीय चतुर्भुज यानी पतंग या रोम्बस जैसी है, और मानचित्रों में गंगानगर जिले का हिन्दुमल कोट इसके लिए एक प्रमुख संदर्भ बिंदु माना जाता है।

🧭भौगोलिक सीमा बिंदु

  • राज्य का उत्तरतम बिंदु श्रीगंगानगर जिले की गंगानगर तहसील में कोणा गाँव है, जो लगभग 30°12' उत्तरी अक्षांश पर स्थित है।
  • इसका दक्षिणतम बिंदु बाँसवाड़ा जिले की कुशलगढ़ तहसील में बोरकुंड गाँव है, जो लगभग 23°3' उत्तरी अक्षांश पर पड़ता है।
  • पश्चिमतम बिंदु जैसलमेर जिले की सम तहसील का कटरा गाँव है, जो लगभग 69°30' पूर्वी देशांतर पर स्थित है।
  • पूर्वतम बिंदु धौलपुर जिले की राजाखेड़ा तहसील में सिलावट गाँव है, जो लगभग 78°17' पूर्वी देशांतर पर स्थित है।

🌐पड़ोसी राज्यों व देश से सीमाएँ

  • पश्चिम में राजस्थान की सीमा सीधे पाकिस्तान से मिलती है, जबकि बाकी चारों दिशाओं में यह पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व गुजरात — इन पाँच भारतीय राज्यों से घिरा है; गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जैसलमेर व बाड़मेर जिले पाकिस्तान से सटे हैं।
  • पाकिस्तान से लगती रेडक्लिफ रेखा (अंतरराष्ट्रीय सीमा) लगभग 1070 किमी लंबी है; भारतीय राज्यों में मध्य प्रदेश से सबसे लंबी (लगभग 1600 किमी) और पंजाब से सबसे छोटी (लगभग 89 किमी) सीमा लगती है, जबकि गुजरात से करीब 1022 किमी, उत्तर प्रदेश से करीब 877 किमी और हरियाणा से करीब 1262 किमी सीमा साझा होती है।
  • कर्क रेखा (लगभग 23°30' अक्षांश) राजस्थान की दक्षिणी सीमा के बेहद करीब से गुजरती है, जो राज्य के दक्षिणतम बिंदु (23°3') के लगभग बराबर है।

🌡️जलवायु की झलक

  • राज्य का सबसे गर्म महीना जून है, जबकि मिट्टी के सबसे अधिक अवनालिका (गली) अपरदन का स्रोत चम्बल नदी मानी जाती है।
  • राजस्थान में मृदा अपरदन का सबसे बड़ा कारण वायु/पवन अपरदन है, जो यहाँ के शुष्क मरुस्थलीय भूभाग की खासियत है।
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इतिहास, नामकरण एवं एकीकरण

History, Naming & Integration

राजपूत रियासतों के उदय से लेकर 'राजस्थान' नाम गढ़े जाने और आजादी के बाद रियासतों के विलय व आधुनिक जिलों तक — राज्य की पहचान बनने की पूरी कहानी।

⚔️राजपूत राज्यों का उदय

  • मध्यकाल से पहले, छठी-सातवीं सदी के आसपास इस भूभाग में कई राजपूत राज्य उभर कर सामने आए, जो आगे चलकर अपनी वीरता और बलिदान के लिए इतिहास में अमर हो गए।
  • इन समूहों ने धीरे-धीरे अपनी अलग-अलग रियासतें कायम कीं और अपने-अपने वंश का शासन स्थापित किया; समय के साथ ये रियासतें अपने शासक वंशों के ही नाम से पहचानी जाने लगीं।
  • इन्हीं राजपूत रियासतों के दबदबे के चलते समूचे इलाके को आगे चलकर 'राजपूताना' नाम मिल गया।

👑प्रमुख राजवंश व उनकी रियासतें — भाग 1

  • मेवाड़ क्षेत्र पर गुहिल और बाद में सिसोदिया वंश का शासन रहा, जिनकी रियासतों में चित्तौड़, उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ व शाहपुरा शामिल थे।
  • जयपुर व अलवर पर कछवाहा वंश का शासन रहा, जबकि जोधपुर, बीकानेर व किशनगढ़ राठौड़ वंश की रियासतें थीं।
  • जैसलमेर व हनुमानगढ़ पर भाटी वंश का शासन रहा, तथा भीनमाल, मण्डोर, जालौर व गुर्जरत्रा क्षेत्र प्रतिहार वंश के अधीन रहे।

👑प्रमुख राजवंश व उनकी रियासतें — भाग 2

  • चौहान वंश की रियासतें व्यापक थीं — अजमेर, नाडौल, जालौर, सिवाणा, बूँदी, कोटा, सिरोही, रणथंभौर व गागरोन इसके अंतर्गत आते थे; बूँदी-कोटा पर आगे चलकर हाड़ा चौहान शाखा का शासन रहा।
  • करौली, हनुमानगढ़ व जैसलमेर के कुछ हिस्सों पर यादव वंश का शासन रहा, जबकि आबू, किराडू, मालवा, वागड़ व जालौर परमार वंश के अधीन आए।
  • झालावाड़ पर झाला वंश का शासन रहा; भरतपुर व धौलपुर पर जाट शासकों का तथा टोंक पर मुस्लिम शासकों का अधिकार रहा।

👑प्रमुख राजवंश व उनकी रियासतें — भाग 3

  • चौहान वंश की ही उपशाखाओं ने कई इलाकों में अलग पहचान बनाई: सिरोही में देवड़ा चौहान, जालौर में सोनगरा चौहान, गागरोन में खींची चौहान और भीनमाल में चावड़ा चौहान वंश ने शासन किया।

🔤'राजस्थान' शब्द की उत्पत्ति

  • 'राजस्थान' शब्द का सबसे पुराना ज्ञात प्रयोग सिरोही स्थित बसंतगढ़ (खीमेल माता मंदिर के पास) के एक शिलालेख में मिलता है, जो विक्रम संवत 682 यानी सन् 625 ई. का है और जहाँ यह 'राजस्थानीयादित्य' रूप में लिखा है।
  • जोधपुर के शासक जसवंतसिंह के मंत्री मुहणोत नैणसी — जिन्हें 'राजस्थान का अबुल फजल' भी कहा जाता है — ने 1665 ई. में अपने ग्रंथ 'मुहणोत नैणसी री ख्यात' में इस शब्द का प्रयोग किया, और बाद में कवि वीरभान रतनू ने भी 1731 ई. में रचित 'राजरूपक' में इसे दोहराया।

📖'राजपूताना' नाम एवं अन्य प्राचीन संदर्भ

  • 'राजपूताना' शब्द का सबसे पहला प्रयोग 1800 ई. में जॉर्ज थॉमस ने किया, और विलियम फ्रैंकलिन ने भी 1805 ई. में प्रकाशित अपनी किताब 'मिलिट्री मेमोयर्स ऑफ मिस्टर जॉर्ज थॉमस' में इस इलाके के लिए यही नाम इस्तेमाल किया।
  • इससे भी बहुत पहले, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में इस क्षेत्र के लिए 'मरुकान्तार' नाम का उल्लेख किया था।

🎩कर्नल जेम्स टॉड एवं आधुनिक नामकरण

  • पश्चिमी व मध्य भारत के राजपूत राज्यों के पॉलिटिकल एजेंट कर्नल जेम्स टॉड ने शुरुआत में इस प्रांत को 'रायथान' कहा, क्योंकि तत्कालीन बोलचाल व लोक साहित्य में राजाओं के निवास स्थान को यही कहा जाता था।
  • ब्रिटिश शासनकाल में इस प्रांत को 'राजपूताना' या 'रजवाड़ा' भी कहा जाता था, और अजमेर व उसके आसपास के इलाके को 'अजमेर-मेरवाड़ा' नाम से जाना जाता था।
  • 'राजाओं के निवास का स्थान' अर्थ वाला 'राजस्थान' शब्द आधुनिक अर्थ में सबसे पहले कर्नल जेम्स टॉड ने ही गढ़ा, और उन्होंने इसे 1829 में लंदन से प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध कृति 'Annals and Antiquities of Rajas'than' (जिसे 'Central and Western Rajpoot States of India' नाम से भी जाना जाता है) में इस्तेमाल किया।

🤝रियासतों का विलय

  • आजादी के वक्त यह प्रदेश 19 देशी रियासतों, 3 ठिकानों (कुशलगढ़, लावा व नीमराणा) तथा चीफ कमिश्नर द्वारा शासित अजमेर-मेरवाड़ा नामक केंद्र-प्रशासित प्रांत में बँटा हुआ था।
  • रियासतों के विलय के दौरान 30 मार्च 1949 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) को जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर व उदयपुर रियासतों के मिलने से संयुक्त राजस्थान अस्तित्व में आया — इसी दिन को अब राजस्थान दिवस के रूप में मनाया जाता है, और वर्ष 2026 में राज्य सरकार ने इसे हिंदी तिथि यानी चैत्र शुक्ल एकम के अनुसार ही मनाने का निर्णय लिया।

🏁अंतिम स्वरूप की प्राप्ति

  • जनवरी 1950 तक अजमेर-मेरवाड़ा तथा सिरोही की आबू-दिलवाड़ा तहसीलों को छोड़कर बाकी सभी इलाके राजस्थान में मिल चुके थे; उस समय अजमेर-मेरवाड़ा एक अलग 'सी' श्रेणी का राज्य था जबकि आबू-दिलवाड़ा तहसीलें बम्बई प्रांत का हिस्सा थीं।
  • आजादी के बाद राज्य पुनर्गठन के दौरान अलग-अलग नामों पर विचार हुआ, पर संविधान के लागू होने के साथ 26 जनवरी 1950 को इस पूरे भौगोलिक क्षेत्र के लिए औपचारिक रूप से 'राजस्थान' नाम अपनाया गया।
  • राजस्थान ने अपना वर्तमान स्वरूप 1 नवंबर 1956 को पाया, जब अजमेर-मेरवाड़ा और सिरोही की आबू-दिलवाड़ा तहसीलें भी इसमें शामिल कर दी गईं।

🗂️2023 का प्रशासनिक पुनर्गठन

  • 6 अगस्त 2023 तक राजस्थान 7 संभागों और 33 जिलों में बँटा था; बजट 2023-24 की घोषणा के तहत 7 अगस्त 2023 की अधिसूचना से 18 जिलों का पुनर्गठन कर 19 नए जिले व 3 नए संभाग बनाए गए, जिससे कुल जिलों की संख्या 50 और संभागों की संख्या 10 हो गई।

🔄2024 में जिलों की वापसी

  • 28.12.2024 को राज्य मंत्रिमंडल ने पिछली (गहलोत) सरकार द्वारा बनाए गए 3 नए संभागों — सीकर, पाली व बाँसवाड़ा — तथा 9 नए जिलों — जयपुर ग्रामीण, दूदू, जोधपुर ग्रामीण, अनूपगढ़, गंगापुरसिटी, केकड़ी, शाहपुरा, नीम का थाना व सांचौर — को समाप्त करने का फैसला किया, जिसकी अधिसूचना 29.12.2024 को जारी हुई।
  • इस फैसले के बाद अब राज्य में 41 जिले और 7 संभाग रह गए हैं।
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क्षेत्रों, नगरों व दुर्गों की पहचान

Regional, Town & Fort Identities

राजस्थान के भूभाग, नगर व किले समय के साथ कई नामों से पुकारे गए हैं — इन्हीं प्राचीन व प्रचलित नामों तथा प्रसिद्ध उपनामों का संकलन।

🏞️क्षेत्रों के प्राचीन नाम — भाग 1

  • सिरोही व आबू के आसपास के इलाके को कभी 'आर्बुद (अर्बुद)' व 'चंद्रावती' कहा जाता था, नागौर को 'अहिच्छत्रपुर', और साँभर से सीकर तक फैले भूभाग को 'अनन्त गोचर' के नाम से जाना जाता था।
  • भीलवाड़ा-चित्तौड़गढ़ के पठारी हिस्से को 'उपरमाल' कहा जाता था, बिजौलिया के आसपास का क्षेत्र 'उत्तमाद्रि' कहलाता था, और प्रतापगढ़ का इलाका 'काँठल' या 'देवलिया' नाम से जाना जाता था।
  • अलवर राज्य के उत्तरी हिस्से को 'कुरु देश' कहा गया, जबकि भीलवाड़ा की जहाजपुर तहसील व अधिकांश टोंक जिले को 'खैरढ़' व 'मालखैरढ़' नाम से पुकारा जाता था।
  • उदयपुर-सलूम्बर के आसपास के पहाड़ी क्षेत्र को 'गिरवा' व 'गिहिलोट' कहा जाता था, तथा दक्षिणपूर्वी बाड़मेर, जालौर व पश्चिमी सिरोही मिलकर 'गोडवाड़' क्षेत्र कहलाते थे।

🏞️क्षेत्रों के प्राचीन नाम — भाग 2

  • जोधपुर के दक्षिणी भाग (मण्डोर क्षेत्र) को 'गुर्जरत्रा' कहा जाता था, जबकि बीकानेर व जोधपुर के उत्तरी भाग को 'जांगलदेश' (कुरु जांगला व मादेय जांगला) के नाम से जाना जाता था।
  • धौलपुर, करौली व सवाई माधोपुर के कुछ हिस्सों को 'डांग क्षेत्र' कहा गया, जयपुर व आसपास का इलाका 'ढूँढाड़' कहलाया, और शेखावाटी में कांतली नदी के अपवाह क्षेत्र को 'तोरावाटी' नाम मिला, जहाँ शुरुआत में तंवर (तोमर) वंश का शासन रहा।
  • बीकानेर व चूरू का अधिकांश हिस्सा तथा दक्षिणी गंगानगर की मरुभूमि 'थली' (उत्तरी मरुभूमि) कहलाती थी, और उदयपुर के जरगा-रगा पर्वतों के आसपास का इलाका 'देशहरो' कहा जाता था।
  • भीलवाड़ा के इलाके को 'प्रागवाट' कहा जाता था, बूँदी के पश्चिमी पथरीले हिस्से को 'बरड़' नाम मिला, और पाली, नागौर, सीकर व झुंझुनूँ के कुछ भाग — लूणी नदी का अपवाह क्षेत्र — 'बांगड़' (बांगर) कहलाते थे।

🏞️क्षेत्रों के प्राचीन नाम — भाग 3

  • उदयपुर की गोगुन्दा व राजसमंद की कुंभलगढ़ तहसीलों के पठार को 'भोराट का पठार' कहा जाता था, जबकि डूँगरपुर, पूर्वी सिरोही व उदयपुर के अरावली आदिवासी इलाके को 'भोमट क्षेत्र' नाम मिला।
  • अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली के मालव इलाके को 'मत्स्य क्षेत्र' कहा जाता था, और उदयपुर-सलूम्बर के चारों ओर मछली के आकार में फैले पहाड़ी क्षेत्र को 'मछला मगरा' नाम मिला।
  • जोधपुर राज्य व आसपास का इलाका 'मरुवार' या 'मारवाड़' कहलाता था, तथा जैसलमेर, बीकानेर व जोधपुर मिलकर 'मरु त्रिकोण' कहलाते थे; दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश को महज 'माल' कहा जाता था।
  • प्रतापगढ़, झालावाड़ व बाँसवाड़ा के कुछ हिस्सों को 'मालवा देश' कहा जाता था, बालोतरा-जालौर के इलाके को 'मालाणी' नाम मिला, और जैसलमेर को 'मांड' या 'वल्लदेश' के नाम से भी जाना जाता था।

🏞️क्षेत्रों के प्राचीन नाम — भाग 4

  • अजमेर व राजसमंद जिले के दिवेर इलाके को 'मेरवाड़ा' कहा जाता था, जबकि अरावली के पर्वतीय क्षेत्र को स्वयं 'मेरू' नाम से जाना जाता था; डूँगरपुर-बाँसवाड़ा के बीच पहाड़ों से घिरे क्षेत्र को 'मेवल' कहते थे और अलवर व आसपास का इलाका 'मेवात' कहलाता था।
  • हनुमानगढ़-गंगानगर व आसपास के इलाके को 'यौध्देय' कहा जाता था, अलवर जिले के हरियाणा से सटे हिस्से को 'राठ' या 'अहीरवाट' नाम मिला, और साँभर झील के आसपास का इलाका 'रूमा' कहलाता था।
  • डूँगरपुर-बाँसवाड़ा-प्रतापगढ़ का इलाका 'वागड़' या 'वाग्वर' कहलाता था, चूरू-सीकर-झुंझुनूँ का क्षेत्र 'शेखावाटी' नाम से मशहूर हुआ, और उदयपुर-चित्तौड़गढ़-राजसमंद-प्रतापगढ़ को 'शिवी', 'मेदपाट' या 'मेवाड़' कहा जाता था।
  • भरतपुर, डीग, धौलपुर व करौली को 'शूरसेन' कहा जाता था; सवाई माधोपुर व करौली के मध्य प्रदेश से सटे इलाके को 'सपाड़' तथा साँभर व आसपास को 'सपादलक्ष' या 'साल्व प्रदेश' नाम मिला, जबकि कोटा-झालावाड़-बूँदी-बाराँ मिलकर 'हाड़ौती' कहलाए।

🏙️प्राचीन नगरों के वर्तमान नाम — भाग 1

  • आज का अजमेर कभी 'अजयमेरु' कहलाता था, नागौर 'अहिच्छत्रपुर' के नाम से जाना जाता था, और अलवर को 'आलोर' कहा जाता था।
  • जोधपुर के पास ओसियाँ का प्राचीन नाम 'उपकेश पट्टन' था, झालावाड़ को कभी 'उम्मेदपुरा की छावनी' कहा जाता था, और प्रतापगढ़ 'काँठल' नाम से जाना जाता था।
  • पुष्कर का प्राचीन नाम 'कोंकण तीर्थ' था, धौलपुर को 'कोठी' कहा जाता था, और चित्तौड़गढ़ 'खिज्राबाद' नाम से पुकारा जाता था।

🏙️प्राचीन नगरों के वर्तमान नाम — भाग 2

  • करौली को कभी 'गोपालपाल' कहा जाता था, जबकि सिरोही व आबू के आसपास का इलाका 'चंद्रावती' नाम से जाना जाता था, और जयपुर को 'जयनगर' कहा गया।
  • जालौर के पुराने नाम 'जाबालिपुर' व 'जालहुर' थे, आहड़ को 'ताम्रवती नगरी' कहा जाता था, और दौसा 'देवांश', 'देवनसा' या 'धौसा' नाम से जाना जाता था।
  • झालरापाटन को 'ब्रज नगर' कहा जाता था, हनुमानगढ़ 'भटनेर' नाम से जाना जाता था, और जैसलमेर के पुराने नाम 'मांड', 'स्वर्णनगरी' व 'वल्ल प्रदेश' थे।

🏙️प्राचीन नगरों के वर्तमान नाम — भाग 3

  • आज के नगरी कस्बे को 'माध्यमिका' कहा जाता था, मेड़ता 'मेदिनीपुर' नाम से जाना जाता था, और गंगानगर को 'रामनगर' कहा गया।
  • बीकानेर का प्राचीन नाम 'रातीघाटी' था, बिजौलिया को 'विजयावल्ली' कहा जाता था, और साँभर व आसपास के इलाके को 'शाकम्भरी' या 'सपादलक्ष' नाम से जाना जाता था।
  • सिरोही को 'शिवपुरी' कहा जाता था, बयाना के प्राचीन नाम 'श्रीपंथ' व 'शोणितपुर' थे, भीनमाल 'श्रीमाल' नाम से जाना जाता था, साँगानेर को 'संग्रामपुरा' कहा जाता था, और साँचौर 'सत्यपुर' नाम से जाना जाता था।

🏰मेवाड़-मारवाड़ के प्रसिद्ध दुर्ग

  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग को 'गढ़ों का सिरमौर', 'राजस्थान का गौरव' और 'चित्रकूट' जैसे नामों से नवाजा गया है — यह राज्य के सबसे विशाल व ऐतिहासिक दुर्गों में गिना जाता है।
  • जोधपुर के किले को मेहरानगढ़, मयूरध्वजगढ़ व गढ़चिंतामणि नाम से भी जाना जाता है, जबकि जैसलमेर दुर्ग को सोनगढ़, सोनारगढ़ या त्रिकूट दुर्ग कहा जाता है और बीकानेर के किले को जूनागढ़ नाम से पुकारा जाता है।
  • कुंभलगढ़ दुर्ग को कुंभलमेर का किला भी कहा जाता है, और अरावली में स्थित कटारगढ़ दुर्ग को 'मेवाड़ की आँख' कहकर सम्मानित किया जाता है।
  • भरतपुर के किले को लोहागढ़ कहा जाता है और बूँदी के किले को तारागढ़ नाम मिला है — यह नाम अजमेर दुर्ग के भी एक उपनाम, 'तारागढ़', से मिलता-जुलता है, जिसे 'गढ़बीठली', 'अजयमेरु दुर्ग' और 'राजस्थान का जिब्राल्टर' भी कहा जाता है।

🏰अन्य उल्लेखनीय दुर्ग

  • अलवर के किले को बाला किला कहा जाता है, अजमेर स्थित अकबर के किले को मैग्जीन या दौलतखाना नाम से जाना जाता है, और आबू के किले को अचलगढ़ कहा जाता है।
  • गागरोण के किले को धूलरगढ़ या डोडगढ़ नाम मिला है, चौमूँ दुर्ग को धारधारागढ़ या चौमुँहागढ़ कहा जाता है, और जयगढ़ दुर्ग को 'चिल्ह का टीला' नाम से भी जाना जाता है।
  • जालौर दुर्ग को सुवर्ण गिरि या सोनलगढ़ कहा जाता है, नागौर दुर्ग को नागदुर्ग या अहिच्छत्रपुर का किला नाम मिला है, और नाहरगढ़ दुर्ग को सुदर्शनगढ़ या 'नौ महलों का दुर्ग' कहा जाता है।
  • नीमराणा के किले को पंचमहल दुर्ग कहा जाता है, बयाना दुर्ग को विजयमंदिर गढ़ या बादशाह दुर्ग नाम मिला है, और बाड़मेर दुर्ग को किलोणगढ़ दुर्ग कहा जाता है; भैंसरोड़गढ़ दुर्ग को इसकी बनावट के चलते 'राजस्थान का वेल्लौर' कहा जाता है।
  • मंडोर के किले को मांडव्यपुर दुर्ग कहा जाता है, तिमनगढ़ दुर्ग को तवनगढ़ या त्रिभुवनगढ़ नाम मिला है, मीठड़ी के किले को भी नाहरगढ़ कहा जाता है, मेड़ता दुर्ग को मालकोट का किला या मेड़न्तकपुर दुर्ग कहते हैं, वल्लभगढ़ दुर्ग को ऊँटाला का किला कहा जाता है, शेरगढ़ दुर्ग (बाराँ) को कोशवर्धन दुर्ग तथा सिवाणा दुर्ग को कुम्थाना या अणखिला किला के नाम से भी जाना जाता है — और हनुमानगढ़ के किले का पुराना नाम भटनेर दुर्ग ही है।

🌸प्रमुख नगरों के उपनाम — भाग 1

  • जयपुर को इसकी गुलाबी इमारतों के चलते 'गुलाबी नगरी' (Pink City) कहा जाता है, और इसे 'पूर्व का पेरिस', 'रत्न नगरी' व 'Island of Glory' के नामों से भी जाना जाता है।
  • अपनी झीलों की वजह से उदयपुर को 'झीलों की नगरी' कहा जाता है; इसे 'राजस्थान का कश्मीर', 'पूर्व का वेनिस' और 'फाउंटेन का शहर' भी कहा जाता है।
  • जोधपुर को उसके नीले घरों के कारण 'ब्लू सिटी' कहा जाता है; इसे 'सूर्य नगरी' (Sun City), 'थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार' और 'मारवाड़' के नाम से भी जाना जाता है।
  • पीले बलुआ पत्थर की इमारतों के चलते जैसलमेर 'स्वर्ण नगरी' (Golden City) कहलाता है; इसे 'म्यूजियम सिटी' और 'हवेलियों व झरोखों का शहर' भी कहा जाता है।

🌸प्रमुख नगरों के उपनाम — भाग 2

  • तीर्थराज पुष्कर को 'कोंकणतीर्थ', 'पंचम तीर्थ', 'तीर्थों का मामा' व 'आदितीर्थ' जैसे नामों से भी पुकारा जाता है।
  • धार्मिक महत्त्व के चलते अजमेर को 'राजस्थान का हृदय', 'भारत का मक्का', 'पवित्र नगरी' और 'गरीब नवाज की नगरी' कहा जाता है।
  • अलवर को 'राजस्थान का सिंहद्वार', 'पूर्वी राजस्थान का कश्मीर' और 'राजस्थान का स्कॉटलैण्ड' कहा जाता है, जबकि माउंट आबू को 'राजस्थान का शिमला' व 'हिन्दू ओलम्पस' नाम मिला है।
  • कोटा को इसके कारखानों व कोचिंग संस्थानों के चलते 'राजस्थान की औद्योगिक नगरी', 'राजस्थान का कानपुर', 'वर्तमान नालंदा' और 'राज्य की शैक्षिक नगरी' कहा जाता है।

🌸प्रमुख नगरों के उपनाम — भाग 3

  • बूँदी को 'छोटी काशी' व 'बावड़ियों का शहर' कहा जाता है, चित्तौड़गढ़ को 'राजस्थान का गौरव' नाम मिला है, और भरतपुर को 'राजस्थान का प्रवेश द्वार व पूर्वी द्वार' तथा 'लोहागढ़' कहा जाता है।
  • वस्त्र उद्योग के लिए मशहूर भीलवाड़ा को 'वस्त्र नगरी', 'अभ्रक नगरी' व 'राजस्थान का मैनचेस्टर' कहा जाता है, जबकि जालौर को 'ग्रेनाइट शहर', 'सुवर्ण नगरी' व 'जाबालिपुर' नाम मिला है।
  • रणकपुर को इसके अनगिनत नक्काशीदार खम्भों के चलते 'हजार खम्भों का नगर' कहा जाता है, और हल्दीघाटी को 1576 के प्रसिद्ध युद्ध की वजह से 'राजस्थान की थर्मोपोली' नाम दिया गया है।
  • साँचौर को 'राजस्थान का पंजाब' कहा जाता है, गंगानगर को इसकी उपज के चलते 'राजस्थान का अन्नागार' नाम मिला है, और रावतभाटा को परमाणु ऊर्जा केंद्र के चलते 'राजस्थान की अणु नगरी' कहा जाता है।

🌸प्रमुख नगरों के उपनाम — भाग 4

  • डूँगरपुर को 'पहाड़ों की नगरी' कहा जाता है, डीग को 'जलमहलों की नगरी' नाम मिला है, बाँसवाड़ा को इसकी अनगिनत छोटी-बड़ी झीलों के चलते 'सौ द्वीपों का शहर' कहा जाता है, और झालरापाटन को इसके मंदिरों की घंटियों के चलते 'सिटी ऑफ बेल्स' कहा जाता है।
  • टोंक को इसके नवाबी इतिहास के चलते 'नवाबों का शहर' कहा जाता है, झालावाड़ को 'राजस्थान का नागपुर' नाम मिला है, और नागौर को धातु उद्योग के चलते 'राजस्थान की धातु नगरी' कहा जाता है।
  • दिवेर को 1582 के ऐतिहासिक युद्ध की वजह से 'मेवाड़ का मैराथन' कहा जाता है, और जोधपुर के पास स्थित जवाई बाँध को 'मारवाड़ का अमृत सरोवर' नाम दिया गया है।
  • आदिवासी समुदाय के विशाल मेले के चलते बेणेश्वर को 'आदिवासियों का कुंभ' कहा जाता है, ओसियाँ को इसके मंदिरों के चलते 'राजस्थान का भुवनेश्वर' नाम मिला है, और किराडू के मंदिरों की नक्काशी के चलते इसे 'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है — भिण्डदेवरा को भी इसी वजह से 'राजस्थान का मिनी खजुराहो' कहा जाता है।
  • धौलपुर के पास मचकुण्ड को 'तीर्थों का भांजा' कहा जाता है, चित्तौड़गढ़ के विजयस्तम्भ को इसकी मूर्तिकला के चलते 'भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश' नाम दिया गया है, और टोंक के पास रैंढ को 'प्राचीन भारत का टाटानगर' कहा जाता है।
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उल्लेखनीय व्यक्तित्व, प्रथम एवं पुरस्कार

Notable Personalities, Firsts & Awards

राजस्थान की माटी से निकले वे लोग, स्थान व घटनाएँ जिन्हें उनकी खासियत के चलते खास उपनाम मिले — साथ ही राज्य के इतिहास के कई 'पहली बार' के रिकॉर्ड।

🕊️समाज सुधारक व स्वतंत्रता सेनानी — भाग 1

  • अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य श्री तुलसी थे, जबकि आदिवासियों के उद्धार के लिए संघर्ष करने वाले मोतीलाल तेजावत 'आदिवासियों के मसीहा' कहलाए।
  • जमनालाल बजाज को गांधीजी का 'पाँचवाँ पुत्र' कहा जाता था, तो बूँदी की श्रीमती सत्यभामा को गांधीजी की 'मानसपुत्री' का दर्जा मिला।
  • चिड़ावा के प्यारेलाल गुप्ता को 'चिड़ावा के गांधी' कहा गया, गोकुलभाई भट्ट को 'राजस्थान के गांधी' और भोगीलाल पांड्या को 'वागड़ के गांधी' की उपाधि मिली, जबकि विजयसिंह पथिक को राजस्थान में किसान आंदोलन का जनक तथा सिद्धराज ढड्ढा को सर्वोदय आंदोलन का प्रमुख नेता माना जाता है।

🕊️समाज सुधारक व स्वतंत्रता सेनानी — भाग 2

  • सर्वाधिक कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया को 'आधुनिक राजस्थान का निर्माता' कहा जाता है, जबकि दामोदरलाल व्यास को 'राजस्थान के लौहपुरुष' की उपाधि मिली।
  • मुकुट बिहारी लाल भार्गव को 'राजस्थान का सी.आर. दास' कहा गया, और पं. जुगल किशोर चतुर्वेदी को उनके प्रभाव के चलते 'राजस्थान का नेहरू' (दूसरा नेहरू) की उपाधि मिली।
  • बालमुकुन्द बिस्सा को 'राजस्थान का जतिन दास' कहा जाता है, और रेलवे के लिए काम करने वाले किशन लाल सोनी को 'राजस्थान का रेलबाबा' नाम मिला।
  • जयनारायण व्यास को उनके प्रभावशाली नेतृत्व के लिए 'शेर-ए-राजस्थान' और गोकुल जी वर्मा को 'शेर-ए-भरतपुर' कहा जाता है, जबकि भक्ति आंदोलन के संत दादूदयाल को 'राजस्थान का कबीर' कहा जाता है।

🛡️ऐतिहासिक शासक व वीर योद्धा

  • पश्चिमी व मध्य भारत के राजपूत राज्यों के पॉलिटिकल एजेंट कर्नल जेम्स टॉड को स्थानीय लोग प्रेमपूर्वक 'घोड़े वाले बाबा' कहते थे, और डिंगल भाषा के प्रसिद्ध कवि पृथ्वीराज राठौड़ को उस भाषा का 'हैरोन्स' (श्रेष्ठतम कवि) कहा जाता है।
  • मारवाड़ के शासक राव चन्द्रसेन को उनके अदम्य संघर्ष के चलते 'मारवाड़ का प्रताप' या 'भूला-बिसरा राजा' कहा जाता है, जबकि मेवाड़ के वयोवृद्ध योद्धा कुँवर चूँड़ा को 'मेवाड़ के भीष्म पितामह' की उपाधि मिली।
  • जोधपुर के मंत्री मुँहणोत नैणसी को 'राजस्थान का अबुल फजल' (या 'राजपूताने का अबुल फजल') कहा जाता है, और बीकानेर के महाराजा रायसिंह को उनकी वीरता व दानशीलता के चलते 'राजपूताने का कर्ण' नाम मिला।
  • हल्दीघाटी के 1576 के युद्ध में अपनी वीरता के लिए विख्यात महाराणा प्रताप को 'हल्दीघाटी का शेर' कहा जाता है, और नहरों के जरिए मरुभूमि को सींचने वाले बीकानेर के महाराजा गंगासिंह को 'राजस्थान के भागीरथ' की उपाधि दी गई।

🎨कला, भक्ति व संस्कृति की शख्सियतें

  • भक्ति काल की कवयित्री मीराबाई को 'राजस्थान की राधा' कहा जाता है, और वागड़ क्षेत्र की भक्त कवयित्री गवरी बाई को 'वागड़ की मीरा' नाम मिला।
  • निहालचंद द्वारा बनाई गई प्रसिद्ध 'बणी-ठणी' पेंटिंग को उसकी सुंदरता के चलते 'राज्य की मोनालिसा' कहा जाता है, और लोक गायिका अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर) को 'राज्य की मरु कोकिला' की उपाधि मिली।
  • भक्त कवि दुर्लभ को उनकी रचनाओं के चलते 'राजस्थान का नृसिंह' कहा जाता है, और मारवाड़ की गायिका गुलाबराय पासवान को उनके प्रभाव के चलते 'मारवाड़ की नूरजहाँ' नाम मिला।

🏆खेल व आधुनिक उपलब्धियों की शख्सियतें

  • ऊँटों के संरक्षण के लिए काम करने वाले अशोक टांक को 'कैमल मैन' कहा जाता है, जबकि पैराग्लाइडिंग में उपलब्धियों के लिए हमीदा बानो को 'राजस्थान की उड़नपरी' नाम मिला।
  • तैराकी में उपलब्धियों के लिए रीमा दत्ता को 'राजस्थान की जलपरी' कहा जाता है, और स्क्वैश में शानदार प्रदर्शन के चलते सुरभि मिश्रा को 'स्क्वैश की सनसनी' नाम मिला।
  • आदिवासी समुदाय के उत्थान में योगदान के लिए मंजू राजपाल को 'आदिवासियों की बाईजी' कहा जाता है।

📌स्थानों व वस्तुओं के रोचक उपनाम — भाग 1

  • अनगिनत पुराने मकबरों के चलते बयाना को 'कब्रगाहों का शहर' कहा जाता है, और जालौर के पास बड़गाँव (रानीवाड़ा) को इसकी प्राकृतिक सुंदरता के चलते 'जालौर का कश्मीर' नाम मिला है।
  • मरुस्थल में जल का स्रोत होने के चलते चंदन नलकूप को 'थार का घड़ा' कहा जाता है, और जैसलमेर की तनोट देवी को उनकी लोकप्रियता के चलते 'थार की वैष्णो देवी' नाम मिला है।
  • नरहड़ के पीर को 'बांगड़ के धनी' कहा जाता है, और भारत की मेरिनो नस्ल मानी जाने वाली चोकला भेड़ को 'भारतीय मैरिनो' नाम मिला है — जबकि राज्य पक्षी गोडावण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'ग्रेट इण्डियन बस्टर्ड' कहा जाता है।
  • अब सूख चुकी सरस्वती नदी को 'मृतनदी' (मृत नदी) कहा जाता है, और सराड़ा किले को इसके अभेद्य कारागार जैसे इतिहास के चलते 'मेवाड़ का काला पानी' नाम मिला है।

📌स्थानों व घटनाओं के रोचक उपनाम — भाग 2

  • पाकिस्तान सीमा से सटे और शेष राज्य से कुछ अलग-थलग होने के चलते जैसलमेर को कभी-कभी 'राजस्थान का अण्डमान-निकोबार' कहा जाता है, और राशमी के पास स्थित मातृकुण्डिया को इसके धार्मिक महत्त्व के चलते 'राजस्थान का हरिद्वार' नाम मिला है।
  • जोधपुर स्थित जसवंतथड़ा को इसकी संगमरमरी बनावट के चलते 'राजस्थान का ताजमहल' कहा जाता है, और बाँसवाड़ा के मानगढ़ में हुए आदिवासी नरसंहार को उसकी गंभीरता के चलते 'राजस्थान का जलियाँवाला बाग हत्याकांड' नाम दिया गया है।
  • उदयपुर के राजमहल (सिटी पैलेस) को इसकी भव्यता के चलते 'राजस्थान के विंडसर महल' कहा जाता है, और डूँगरपुर के बेणेश्वर मेले को 'आदिवासियों का महाकुंभ' तथा 'वागड़ का प्रयाग' दोनों नामों से पुकारा जाता है।
  • सहरिया जनजाति के लिए बाराँ में आयोजित सीताबाड़ी मेले को 'सहरिया जाति का कुंभ' कहा जाता है।

🥇राजस्थान के प्रथम व्यक्तित्व — भाग 1

  • राज्य के प्रथम व एकमात्र महाराजप्रमुख महाराणा भूपाल सिंह (उदयपुर) थे, जबकि प्रथम व एकमात्र राजप्रमुख महाराजा सवाई मानसिंह (जयपुर) थे।
  • राज्य के प्रथम राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहालसिंह थे, प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री थे, और प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल थे।
  • राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे रहीं, जबकि प्रथम महिला राज्यपाल प्रतिभा पाटिल रहीं; सर्वाधिक कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री व आधुनिक राजस्थान के निर्माता मोहनलाल सुखाड़िया माने जाते हैं।
  • राज्य के प्रथम मुख्य सचिव के. राधाकृष्णन थे, प्रथम पुलिस महानिदेशक (DGP) रघुनाथ सिंह थे, और प्रथम पुलिस महानिरीक्षक (IGP) पी. बनर्जी थे।

🥇राजस्थान के प्रथम व्यक्तित्व — भाग 2

  • विधानसभा में प्रतिपक्ष के प्रथम नेता कुँवर जसवंत सिंह (बीकानेर) थे, प्रथम विधानसभाध्यक्ष नरोत्तम लाल जोशी थे, और विधानसभा में प्रथम मुख्य सचेतक मथुरादास माथुर थे।
  • राज्य की प्रथम महिला मंत्री कमला बेनीवाल थीं, प्रथम महिला विधायक यशोदा देवी थीं, प्रथम महिला विधानसभाध्यक्ष सुमित्रा सिंह थीं, और प्रथम महिला विधानसभा उपाध्यक्ष तारा भंडारी थीं।
  • राज्य की प्रथम महिला लोकसभा सदस्य महारानी गायत्री देवी थीं, जबकि राज्यसभा में मनोनीत होने वाले प्रथम राजस्थानी नारायण सिंह मानकलाव थे और प्रथम महिला राज्यसभा सदस्य (राज्य की प्रथम महिला सांसद) श्रीमती शारदा भार्गव (1952) थीं।
  • राज्य की प्रथम महिला डॉक्टर पार्वती गहलोत (जोधपुर, 1928) थीं, प्रथम महिला जिला प्रमुख श्रीमती नगेन्द्रबाला (हाड़ौती) थीं, और प्रथम महिला पायलट नम्रता भट्ट थीं; राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश श्री कमलकांत वर्मा थे।
  • राजस्थान की प्रथम तबला वादिका उर्मिला उपाध्याय थीं, और राजस्थान की प्रथम भूपद गायिका मधुभट्ट तैलंग थीं; प्रथम अध्यक्ष, राज्य मानवाधिकार आयोग कांता भटनागर रहीं।

🎖️प्रथम पुरस्कार विजेता — भाग 1

  • वनस्थली विद्यापीठ की संचालिका श्रीमती रतनशास्त्री राज्य की एकमात्र ऐसी महिला हैं जिन्हें पद्मश्री (1955) व पद्मभूषण (1975) दोनों सम्मान मिले हैं — यानी वे पद्मश्री व पद्मभूषण, दोनों से सम्मानित होने वाली राज्य की प्रथम महिला भी हैं।
  • पद्मश्री से सम्मानित होने वाले प्रथम पुरुष श्री सूर्य कुमार भुवन (1956) थे, पद्मभूषण से सम्मानित प्रथम व्यक्ति श्री कँवर सेन (1956) थे, और पद्मविभूषण से सम्मानित प्रथम पुरुष व प्रथम व्यक्तित्व क्रमशः श्री घनश्यामदास बिड़ला (1957) व श्रीमती जानकी देवी बजाज (1956) रहे।
  • परमवीर चक्र से सम्मानित प्रथम व्यक्ति हवलदार मेजर पीरूसिंह थे (मरणोपरांत, 1948), महावीर चक्र के प्रथम विजेता कर्नल किशनसिंह राठौड़ थे (1948, चूरू), और अशोक चक्र से सम्मानित प्रथम व्यक्ति हवलदार शम्भूसिंह थे (1961)।
  • कीर्तिचक्र के प्रथम विजेता पायनियर मूलसिंह थे (1968, जयपुर), और शौर्य चक्र के प्रथम विजेता झुंझुनूँ के मेजर दयानंद थे।

🎖️प्रथम पुरस्कार विजेता — भाग 2

  • अर्जुन पुरस्कार पाने वाले शुरुआती राजस्थानी खिलाड़ियों में डॉ. करणी सिंह (निशानेबाजी, 1961), प्रेमसिंह (पोलो, 1961) और सलीम दुर्रानी (क्रिकेट, 1961) शामिल हैं।
  • राजस्थान खेल रत्न पुरस्कार के प्रथम विजेता तीरंदाज लिम्बाराम रहे (1995-96), और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित प्रथम व्यक्ति एथलेटिक्स कोच प्रो. करनसिंह रहे।
  • मैग्सेसे पुरस्कार पाने वाले प्रमुख राजस्थानियों में कृत्रिम पैर के जनक डॉ. पी.के. सेठी और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती अरुणा रॉय शामिल हैं।
  • राजस्थान ललितकला अकादमी के 'कलाविद्' सम्मान से सम्मानित प्रथम कलाकार श्री रामगोपाल विजय वर्गीय रहे।
📊

राज्य की झलक — प्रतीक, आँकड़े व संसाधन

State at a Glance — Symbols, Stats & Resources

एक ही जगह राजस्थान के राजकीय प्रतीकों से लेकर अर्थव्यवस्था, जनसंख्या, नदी-झील, वन-वन्यजीव, शिक्षा, ऊर्जा, परिवहन व पर्यटन तक — राज्य का पूरा क्विक-रेफरेंस।

🎖️राजकीय प्रतीक चिन्ह

  • राजस्थान की राजभाषा हिंदी है; राज्य नृत्य घूमर है जबकि राज्य का शास्त्रीय नृत्य कथक है, और राज्य गीत 'केसरिया बालम पधारो नी म्हारे देश' है।
  • रोहिड़ा राज्य पुष्प है और खेजड़ी राज्य वृक्ष — खेजड़ी को मरुस्थल का 'कल्पवृक्ष' भी कहा जाता है; राज्य पक्षी गोडावण है और राज्य पशु चिंकारा व ऊँट, दोनों को माना गया है।
  • राज्य खेल के तौर पर बास्केटबॉल को मान्यता प्राप्त है।

📈आर्थिक आँकड़े (GSDP व आय)

  • स्थिर (2011-12) कीमतों पर राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) 2025-26 में 981807 करोड़ रुपये अनुमानित है, जो 2024-25 के 903564 करोड़ रुपये से अधिक है — यानी स्थिर कीमतों पर आर्थिक वृद्धि दर 2025-26 में 8.66% रही, जबकि 2024-25 में यह 8.77% थी।
  • प्रचलित कीमतों पर GSDP 2025-26 में 1875413 करोड़ रुपये और 2024-25 में 1701190 करोड़ रुपये रहा, जिससे प्रचलित कीमतों पर वृद्धि दर क्रमशः 10.24% व 11.77% निकलती है।
  • शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (NSDP) स्थिर कीमतों पर 2025-26 में 859333 करोड़ रुपये (2024-25: 789133 करोड़) तथा प्रचलित कीमतों पर 2025-26 में 1685118 करोड़ रुपये (2024-25: 1525291 करोड़) रहा।
  • प्रतिव्यक्ति आय स्थिर कीमतों पर 2025-26 में 103189 रुपये (2024-25: 95762 रुपये) और प्रचलित कीमतों पर 2025-26 में 202349 रुपये (2024-25: 185095 रुपये) आँकी गई है।

📐भौगोलिक कीर्तिमान — जिलों व स्थानों के

  • क्षेत्रफल में राज्य का सबसे बड़ा जिला जैसलमेर है (37182 वर्ग किमी; नोख उपतहसील के फलौदी में मिलने के बाद इसका क्षेत्रफल घटा है, पहले यह 38401 वर्ग किमी था), जबकि नए जिलों के गठन के बाद सबसे छोटा जिला संभवतः खैरथल-तिजारा है, जिसका क्षेत्रफल 2007 वर्ग किमी है — डीग का क्षेत्रफल 2169 वर्ग किमी है।
  • राज्य का सबसे अधिक आर्द्र जिला व सबसे अधिक वर्षा वाला जिला, दोनों झालावाड़ है, जबकि सबसे आर्द्र स्थान व सबसे ठंडा स्थान, दोनों माउंट आबू है।
  • सबसे शुष्क व सबसे कम वर्षा पाने वाला जिला जैसलमेर है, जबकि सबसे गर्म स्थान चूरू है और सबसे अधिक लू-आँधी वाला जिला श्रीगंगानगर है; सबसे ठंडा महीना जनवरी रहता है।
  • राज्य की सबसे ऊँची पर्वत चोटी गुरु शिखर (1722 मीटर) है, और राज्य के सबसे नजदीक स्थित बंदरगाह कांडला (पं. दीनदयाल उपाध्याय बंदरगाह) है।
  • पाकिस्तान से सर्वाधिक लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा जैसलमेर जिले की है (अब लगभग 444 किमी, पहले 464 किमी थी), जबकि सबसे कम सीमा फलौदी की है (लगभग 20 किमी); दूसरे राज्यों से सबसे लंबी अंतरराज्यीय सीमा झालावाड़ जिले की है (520 किमी)।
  • जयपुर, पाली, नागौर व चित्तौड़गढ़ — इन चार जिलों की सीमा सबसे अधिक, यानी 7-7 अन्य जिलों से मिलती है।

👥जनसांख्यिकी (जनगणना 2011) — भाग 1

  • 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान की कुल जनसंख्या 685.48 लाख थी, जिसमें से 170.48 लाख (24.9%) नगरीय और 515 लाख (75.1%) ग्रामीण जनसंख्या थी; जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी रहा।
  • राज्य की समग्र साक्षरता दर 66.1% रही, जिसमें पुरुष साक्षरता 79.2% व महिला साक्षरता 52.1% थी; ग्रामीण साक्षरता दर 61.4% और नगरीय साक्षरता दर 79.7% रही।
  • राज्य का समग्र लिंगानुपात 928 रहा (ग्रामीण 933, नगरीय 914), जबकि शिशु लिंगानुपात 888 था (ग्रामीण 892, शहरी 874)।

👥जनसांख्यिकी (जनगणना 2011) — भाग 2

  • अनुसूचित जाति की जनसंख्या राज्य की कुल आबादी का 17.83% और अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 13.48% रही।
  • 2001-11 के बीच राज्य की दशकीय वृद्धि दर 21.31% रही, जिसमें नगरीय क्षेत्र में यह 29.0% और ग्रामीण क्षेत्र में 19.0% रही।
  • राज्य में 10 लाख से अधिक आबादी (मिलियन-प्लस) वाले 3 शहर हैं — जयपुर, जोधपुर व कोटा; 5 लाख से अधिक आबादी वाले 5 शहर हैं — जयपुर, जोधपुर, कोटा, बीकानेर व अजमेर, क्रमशः — तथा 1 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या 30 है।

🏛️प्रशासनिक इकाइयाँ (मार्च 2026) — भाग 1

  • मार्च 2026 तक राज्य में 41 जिले, 41 जिला परिषदें, 330 उपखंड, 426 तहसीलें व 297 उपतहसीलें हैं।
  • सर्वाधिक उपखंडों वाले जिले जयपुर (18) व भीलवाड़ा (17) हैं, जबकि सबसे कम उपखंड (4-4) बालोतरा, जैसलमेर व सलूम्बर में हैं; सर्वाधिक तहसीलें जयपुर (21) में हैं, इसके बाद भीलवाड़ा व दौसा (18-18) तथा उदयपुर (17) का नंबर आता है, जबकि सबसे कम तहसीलें सलूम्बर (5) व सिरोही (6) में हैं।
  • सर्वाधिक उपतहसीलें जयपुर (24) में हैं।

🏛️प्रशासनिक इकाइयाँ (मार्च 2026) — भाग 2

  • राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी कर पंचायत समितियों की संख्या 368 से बढ़ाकर 457 तथा ग्राम पंचायतों की संख्या 11151 से बढ़ाकर 14403 करने का ऐलान किया है, पर चुनाव अभी नहीं होने से इनका औपचारिक गठन नहीं हो पाया है — मार्च 2026 तक की वास्तविक संख्या क्रमशः 368 पंचायत समितियाँ व 11151 ग्राम पंचायतें ही हैं।
  • जयपुर व उदयपुर सर्वाधिक पंचायत समितियों व ग्राम पंचायतों वाले जिलों में गिने जाते हैं (जयपुर में 20, उदयपुर में 16 पंचायत समितियाँ), जबकि खैरथल-तिजारा में सबसे कम पंचायत समितियाँ (4) व सबसे कम ग्राम पंचायतें हैं; हनुमानगढ़ व उदयपुर में सबसे अधिक गाँव हैं।
  • मार्च 2026 तक राज्य में 309 नगर निकाय हैं, जिनमें 251 नगर पालिकाएँ, 48 नगर परिषदें और 10 नगर निगम (जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर, उदयपुर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा व पाली) शामिल हैं; जयपुर व झुंझुनूँ में सबसे अधिक नगर निकाय (19-19) और सलूम्बर में सबसे कम (1) हैं, जबकि सबसे अधिक नगरपालिकाएँ झुंझुनूँ (18) व जयपुर (16) में हैं।

🏛️प्रशासनिक इकाइयाँ (मार्च 2026) — भाग 3

  • राज्य में 11281 पटवार सर्किल हैं; विधानसभा में कुल 200 सदस्य हैं, राज्य से लोकसभा में 25 और राज्यसभा में 10 सदस्य भेजे जाते हैं, तथा राज्य का विधानमंडल एक सदनात्मक (केवल विधानसभा) है।

🌊नदियाँ — विशेषताएँ

  • राज्य की सबसे लंबी नदी चम्बल है, जबकि राजस्थान में पूर्ण रूप से प्रवाहित होने वाली सबसे लंबी नदी बनास है; बनास की जलग्रहण क्षेत्र भी राज्य में सबसे बड़ा है।
  • चम्बल व माही राज्य की बारहमासी (सदानीरा) नदियाँ मानी जाती हैं; माही कर्क रेखा को दो बार काटती है, इसीलिए इसे दक्षिणी राजस्थान की 'स्वर्ण रेखा' और वागड़-कांठल क्षेत्र की 'गंगा' भी कहा जाता है।
  • चूरू, बीकानेर व फलौदी ऐसे जिले हैं जहाँ से कोई नदी नहीं गुजरती, जबकि कोटा संभाग में सबसे अधिक नदियाँ बहती हैं; चम्बल, बनास व लूनी — ये तीन नदियाँ सबसे अधिक जिलों से होकर गुजरती हैं।
  • घड़ियालों की प्रमुख शरणस्थली चम्बल नदी है, जो राज्य में सबसे अधिक सतही जल भी ले जाती है और राजस्थान-मध्यप्रदेश के बीच अंतरराज्यीय सीमा भी बनाती है।

🌊नदियों के त्रिवेणी संगम

  • बनास-मेनाल-बेड़च का संगम भीलवाड़ा जिले के मेनाल में बीगोद के पास होता है, जबकि माही-जाखम-सोम का संगम डूँगरपुर के बेणेश्वर में होता है।
  • बनास-चम्बल-सीप का संगम सवाई माधोपुर के रामेश्वर घाट पर होता है, बनास-डाई-खारी का संगम टोंक के राजमहल में होता है, और खेराकुशी-बाण्डी-माशी का संगम टोंक के ही निवाई स्थित देवधाम में होता है।

🏞️झीलें

  • राज्य की कई झीलों में मिलने वाला खारापन प्राचीन टेथिस सागर के बचे हुए अवशेषों की देन माना जाता है।
  • साँभर झील भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील है, जबकि माउंट आबू की नक्की झील राज्य की सबसे ऊँचाई पर स्थित झील है।

💧नहरें, सिंचाई एवं फसलें

  • इंदिरा गांधी नहर राज्य की सबसे बड़ी नहर है और इसे 'मरुगंगा' व राज्य की जीवनरेखा भी कहा जाता है; इसकी सबसे लंबी लिफ्ट नहर कँवरसेन लिफ्ट नहर है।
  • राज्य में सिंचाई का प्रमुख साधन कुएँ व नलकूप हैं; नहरों से सबसे अधिक सिंचाई गंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में होती है — गंगानगर को गंगनहर से और हनुमानगढ़ को भाखड़ा नांगल परियोजना से सर्वाधिक सिंचाई मिलती है, जबकि दक्षिणी आदिवासी क्षेत्र की मुख्य सिंचाई परियोजना डूँगरपुर की सोम-कमला-अम्बा परियोजना है।
  • राज्य की जलवायु उष्ण कटिबंधीय शुष्क प्रकार की है; सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र वाली फसल गेहूँ है, जबकि कृषि क्षेत्रफल में सबसे आगे बाजरा है — बाजरा उत्पादन व क्षेत्रफल दोनों में राज्य देश में प्रथम है, और राई-सरसों के उत्पादन में भी राज्य देश में पहले स्थान पर है।

🌳वन एवं वन्यजीव

  • राज्य में सबसे अधिक वन क्षेत्र उदयपुर जिले में है और सबसे कम वन क्षेत्र चूरू जिले में; दुनिया का एकमात्र वृक्ष मेला जोधपुर के खेजड़ली गाँव में लगता है।
  • राज्य में 3 राष्ट्रीय उद्यान हैं (पहला रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान रहा, जो राज्य की पहली बाघ परियोजना भी है) और 5 टाइगर रिजर्व हैं — नवगठित चौथा टाइगर रिजर्व रामगढ़ विषधारी अभयारण्य (बूँदी) और पाँचवाँ धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व है।
  • राज्य में 26 वन्यजीव अभयारण्य, 7 मृगवन, 4 जंतुआलय (चिड़ियाघर), 33 आखेट-निषिद्ध क्षेत्र और 39 कंजर्वेशन रिजर्व हैं।
  • राज्य के 5 रामसर स्थल (आर्द्रभूमियाँ) हैं — घना पक्षी विहार, साँभर झील, खींचन (फलौदी), मेनार (उदयपुर) व सिलीसेढ़ झील (अलवर)।

🐫पशुधन, दुग्ध व ऊन उद्योग

  • 2019 की पशुगणना के अनुसार राज्य में कुल 568.01 लाख पशु व 146.23 लाख मुर्गियाँ थीं — पिछली गणना से पशुधन में 1.61% गिरावट आई, फिर भी देश के कुल पशुधन में राज्य की हिस्सेदारी 10.60% रही; सबसे अधिक संख्या बकरियों की है (36.69%), और राज्य का औसत पशु घनत्व 166 प्रति वर्ग किमी है — डूँगरपुर में सबसे ज्यादा (433) व जैसलमेर में सबसे कम (62)।
  • राठी गाय को राजस्थान की 'कामधेनु' कहा जाता है, जबकि चोकला भेड़ को भारत की 'मेरिनो' नाम मिला है; दुग्ध उत्पादन में राज्य देश में दूसरे स्थान पर है।
  • सबसे अधिक दूध जयपुर में और सबसे कम बाँसवाड़ा में उत्पादित होता है, जबकि सबसे अधिक ऊन जोधपुर में और सबसे कम झालावाड़ में; बीकानेर एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी है, और जयपुर में राज्य का एकमात्र पक्षी चिकित्सालय है।

🌾खाद्यान्न उत्पादन

  • राज्य में खाद्यान्न उत्पादन 2025-26 में 283.98 लाख टन रहा जबकि 2024-25 में यह 309.62 लाख टन था — यानी कुल उत्पादन में लगभग 8.28% की गिरावट आई, जबकि इससे पिछले साल 12.85% की वृद्धि दर्ज हुई थी।
  • इसमें अनाज उत्पादन 2025-26 में 236.85 लाख टन रहा (2024-25: 267.82 लाख टन), जबकि दलहन उत्पादन 2025-26 में बढ़कर 47.13 लाख टन हो गया (2024-25: 41.80 लाख टन)।

🎓उच्च शिक्षा संस्थान

  • राज्य में केन्द्रीय व कौशल विश्वविद्यालयों सहित कुल 33 सरकारी विश्वविद्यालय हैं और 9 डीम्ड विश्वविद्यालयवत् संस्थाएँ हैं; राज्य का पहला विश्वविद्यालय राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर है।
  • IIT जोधपुर में, IIM उदयपुर में, AIIMS जोधपुर में और IIIT कोटा में स्थित है।
  • राज्य का पहला व एकमात्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय RUHS (जयपुर) है, पहला व एकमात्र तकनीकी विश्वविद्यालय RTU (कोटा) है, पहला व एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय (जयपुर) है, और पहला व एकमात्र खुला विश्वविद्यालय वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (कोटा) है।
  • राज्य का पहला विधि (कानून) विश्वविद्यालय नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जोधपुर है, और पहला महिला विश्वविद्यालय ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय है।

🏥चिकित्सा, इंजीनियरिंग एवं वित्तीय संस्थान

  • राजकीय क्षेत्र में कुल 31 चिकित्सा महाविद्यालय हैं (6 राजकीय, 22 राजमेस, 1 RUHS, तथा AIIMS जोधपुर व ESI अलवर सहित), जबकि 12 निजी चिकित्सा महाविद्यालय हैं; दन्त चिकित्सा में 1 राजकीय (RUHS) व 14 निजी महाविद्यालय हैं।
  • राज्य में 20 सरकारी इंजीनियरिंग महाविद्यालय हैं, जबकि निजी क्षेत्र में इनकी संख्या 54 है; राज्य का एकमात्र स्टॉक एक्सचेंज जयपुर में स्थित है।

विद्युत क्षेत्र

  • आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार राज्य की स्थापित विद्युत क्षमता दिसंबर 2025 तक 31556.43 मेगावाट तक पहुँच गई, जो दिसंबर 2024 के 27284 मेगावाट से अधिक है; राज्य में बिजली का सबसे बड़ा स्रोत ताप विद्युत है।
  • राज्य का पहला सुपर थर्मल पावर प्लांट सूरतगढ़ में है और दूसरा कोटा में; पहला गैस-आधारित विद्युत संयंत्र बाराँ के अंता में है, जबकि राज्य की अपनी पहली गैस परियोजना जैसलमेर के रामगढ़ में है।
  • राज्य का पहला व एकमात्र परमाणु शक्ति गृह चित्तौड़गढ़ के रावतभाटा में है, और पहला लिग्नाइट-आधारित विद्युतगृह बाड़मेर के गिराल में है।

🏭औद्योगिक नीति एवं उद्योग

  • राज्य की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा 24 जून 1978 को हुई; द्वितीय पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी, और राज्य का प्रमुख उद्योग सूती वस्त्र उद्योग है।
  • सबसे अधिक पंजीकृत फैक्ट्रियाँ जयपुर जिले में हैं; राज्य का पहला शिल्प ग्राम उदयपुर के हवाला गाँव में है, और राज्य का सबसे छोटा नगर बाँसवाड़ा का बोरखेड़ा है।
  • जिला पुनर्गठन से पहले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में राज्य के जो जिले शामिल थे, वे अलवर व भरतपुर थे।

🛣️सड़क मार्ग

  • 31 मार्च 2025 तक राज्य में सड़कों की कुल लंबाई 335306.33 किमी थी, जिससे सड़क घनत्व 97.97 किमी प्रति 100 वर्ग किमी निकलता है — 2019-20 में देश का औसत सड़क घनत्व इससे कहीं अधिक, 165.23 किमी प्रति 100 वर्ग किमी था।
  • राज्य में विभागीय आँकड़ों के अनुसार 54 राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, जिनकी कुल लंबाई 10790 किमी है, जबकि राज्य राजमार्गों (SH) की कुल लंबाई 17316 किमी है; राष्ट्रीय राजमार्गों की सबसे अधिक लंबाई बीकानेर (848 किमी) व जयपुर (780.6 किमी) में है, जबकि सबसे कम खैरथल-तिजारा (5 किमी) व करौली (55 किमी) में है।
  • राज्य का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग NH-11 व NH-52 है, जबकि सबसे छोटा NH-919 (SKM) व NH-168A (11.8 किमी) है; राज्य का सबसे व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग NH-48 है, और सबसे अधिक राजमार्ग जयपुर (9) व उदयपुर (7) से गुजरते हैं — गौरतलब है कि डीग व सलूंबर, इन दो अपेक्षाकृत नए जिलों में से कोई राष्ट्रीय राजमार्ग नहीं गुजरता।
  • 31 मार्च 2025 तक राज्य के 39666 गाँव, यानी 91.68%, सड़क-मार्ग से जुड़े हुए थे।

🚆रेल मार्ग

  • राज्य में पहली रेल सेवा 1874 में आगरा किला व बाँदीकुई के बीच शुरू हुई थी; आज राजस्थान में कुल रेल मार्ग की लंबाई 6100 किमी है, यानी प्रति 1000 वर्ग किमी 17.82 किमी रेल मार्ग है।
  • रेल मार्ग की लंबाई के हिसाब से राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर है, प्रथम स्थान उत्तर प्रदेश का है; राज्य में बाँसवाड़ा व प्रतापगढ़ ऐसे जिले हैं जहाँ कोई रेल मार्ग नहीं है।
  • फुलेरा जंक्शन एशिया का सबसे बड़ा मीटरगेज रेलवे यार्ड है, और धौलपुर में राज्य का एकमात्र नैरोगेज (छोटी लाइन) रेल मार्ग है; देश का पहला लोको इंजन 1895 में अजमेर लोको वर्कशॉप में बना था, और देश की पहली रेल बस 'इज़रा' के नाम से जानी जाती है।

✈️हवाई अड्डे एवं खनन

  • राज्य का पहला व देश का 14वाँ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जयपुर के साँगानेर में है।
  • राज्य का सुपर जिंक स्मेल्टर प्लांट चित्तौड़गढ़ के चंदेरिया में स्थित है।

🕌पर्यटन

  • राज्य में कुल पर्यटक आगमन 2024 के 2321.56 लाख से बढ़कर 2025 में 2544.48 लाख हो गया, यानी 9.60% की वृद्धि दर्ज हुई; इसमें स्वदेशी पर्यटकों की संख्या 2300.84 लाख से बढ़कर 2525.03 लाख (9.74% वृद्धि) हुई, जबकि विदेशी पर्यटकों की संख्या 20.72 लाख से घटकर 19.45 लाख (-6.14%) रह गई।
  • सर्वाधिक विदेशी पर्यटक क्रमशः जयपुर, उदयपुर व जोधपुर में आते हैं, जबकि सर्वाधिक स्वदेशी पर्यटक क्रमशः सीकर, अजमेर व चित्तौड़गढ़ में पहुँचते हैं।
  • राज्य में यूनेस्को के 9 विश्व धरोहर स्थल हैं, जिनमें 6 किले, जंतर-मंतर, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान व जयपुर का परकोटा शहर शामिल हैं।

🤝सहकारिता, पंचायती राज, पोखरण एवं व्यापार

  • राज्य में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत 1904 में अजमेर से हुई थी, और वर्तमान सहकारिता अधिनियम 14.11.2002 से लागू है; राज्य में 23 शीर्ष सहकारी संस्थाएँ हैं, सहकारी शीत भंडार जयपुर व अलवर में हैं, सहकारी ईसबगोल कारखाना आबूरोड में और सहकारी बर्फ का कारखाना जयपुर में है।
  • देश में पंचायती राज व्यवस्था का सबसे पहला शुभारंभ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में हुआ था, जबकि राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 23 अप्रैल 1994 से लागू है।
  • भारत का पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण 'स्माइलिंग बुद्धा' 18 मई 1974 को जैसलमेर के पोकरण में हुआ था, और दूसरा परीक्षण 'ऑपरेशन शक्ति' 11 व 13 मई 1998 को पोकरण के ही खेतोलाई में हुआ; जयपुर पन्ना (एमराल्ड) रत्न की दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मंडी है।

⚖️राजकीय संस्थाएँ एवं न्यायपालिका

  • राजस्थान लोक सेवा आयोग, राजस्व मंडल तथा राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड — तीनों का मुख्यालय अजमेर में है।
  • राजस्थान उच्च न्यायालय का मुख्यालय जोधपुर में है, जबकि इसकी स्थायी खंडपीठ जयपुर में स्थित है।

🏟️प्रमुख स्टेडियम

  • जयपुर में सवाई मानसिंह व चौगान स्टेडियम हैं, कोटा में उम्मेद सिंह स्टेडियम, उदयपुर में महाराणा भूपाल स्टेडियम, और जोधपुर में बरकतुल्ला खाँ स्टेडियम है।
  • अलवर में इंदिरा गांधी स्टेडियम, भीलवाड़ा में सुखाड़िया स्टेडियम, बीकानेर में डॉ. करणी सिंह स्टेडियम, श्रीगंगानगर में महाराजा गंगासिंह स्टेडियम, और जैसलमेर में पूनम स्टेडियम है।

🏆खेल अकादमियाँ

  • बालक व बालिका, दोनों बास्केटबॉल अकादमियाँ जयपुर में हैं (बालक अकादमी जैसलमेर व जयपुर दोनों में, सीनियर वर्ग); बालक फुटबॉल अकादमी जोधपुर में है और बालिका फुटबॉल अकादमी कोटा में; बालक कबड्डी अकादमी करौली में स्थित है।
  • बालिका हॉकी अकादमी अजमेर में है और बालक हॉकी अकादमी जयपुर में; बालक तीरंदाजी अकादमी उदयपुर में है और बालिका तीरंदाजी अकादमी जयपुर में।
  • बालक वॉलीबॉल अकादमी झुंझुनूँ में है और बालिका वॉलीबॉल अकादमी जयपुर में; बालक एथलेटिक्स अकादमी श्रीगंगानगर में है और बालिका एथलेटिक्स व बालिका हैंडबॉल अकादमियाँ जयपुर में हैं।
  • बालक कुश्ती अकादमी भरतपुर में है और बालक साइक्लिंग अकादमी बीकानेर में स्थित है।

🎯कुछ और महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • भारतीय थल सेना की 7वीं व सबसे नई कमान, दक्षिणी पश्चिमी कमान का मुख्यालय जयपुर में है, जिसकी स्थापना 15 अगस्त 2005 को हुई थी; सीमा सुरक्षा बल (BSF) राज्य में अंतरराष्ट्रीय सीमा की रखवाली करता है और इसका नया राजस्थान मुख्यालय बीकानेर के बीछवाल में है।
  • राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद युवा मामले एवं खेल विभाग के अधीन राज्य में खेलों के विकास की सर्वोच्च संस्था है, जिसके पहले अध्यक्ष श्री वी.जी. कानेटकर थे; इसके संरक्षक राज्यपाल तथा उप संरक्षक उपमुख्यमंत्री होते हैं, और यह उत्कृष्ट खिलाड़ियों-प्रशिक्षकों को महाराणा प्रताप पुरस्कार व विशिष्ट पुरस्कार देती है, जिनकी राशि अब बढ़ाकर 5,00,000 रुपये कर दी गई है।
  • जैसलमेर जिले में राज्य की सबसे अधिक बंजर व बेकार भूमि है, हालाँकि इंदिरा गांधी नहर आने के बाद यह भूमि धीरे-धीरे खेती लायक बनती जा रही है।