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राजस्थान GK

राज्य विधानसभा

State Legislative Assembly

जानिए राज्य का विधानमंडल कैसे बनता है, अध्यक्ष-उपाध्यक्ष की भूमिका, सत्र व विधेयक पारित होने की प्रक्रिया, चुनाव तंत्र और राजस्थान विधानसभा के 1952 से अब तक के सफ़र की पूरी कहानी।

23 टॉपिक42 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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राज्य सरकार व विधानमंडल की संरचना

Structure of State Government & the Legislature

संविधान भारत के हर राज्य में संसदीय ढाँचा स्थापित करता है, जहाँ शासन तीन प्रमुख अंगों में बँटकर चलता है और कानून बनाने की डोर विधानमंडल के हाथ में होती है।

🏛️सरकार के तीन अंग

  • भारत में केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई है, जहाँ शासन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — इन तीन अंगों के बीच बँटा होता है।
  • विधानमंडल कानून बनाता है, कार्यपालिका निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए रोज़मर्रा का शासन चलाती है, और न्यायपालिका न्यायालयों के माध्यम से इंसाफ देने के साथ-साथ कानूनों की वैधता की जाँच भी कर सकती है।
  • राज्यों में भी केंद्र की तरह दोहरी कार्यपालिका होती है — राज्यपाल नाममात्र संवैधानिक प्रमुख होता है जबकि असली सत्ता मुख्यमंत्री की अगुवाई वाली मंत्रिपरिषद् के पास रहती है।
  • संविधान के भाग VI में राज्य सरकार को तीन हिस्सों में बाँटा गया है — कार्यपालिका, विधानमंडल और उच्च न्यायालय; कार्यपालिका में सत्ता राज्यपाल से होकर मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद् तक पहुँचती है।

🏢एकसदनीय व द्विसदनीय विधानमंडल

  • राज्य की विधायी शक्ति उसके विधानमंडल में निहित होती है, जो राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बना सकता है; यह राज्यपाल तथा एक या दो सदनों से मिलकर बनता है, यानी एकसदनीय या द्विसदनीय दोनों हो सकता है।
  • अभी देश के 22 राज्यों में सिर्फ विधानसभा वाला एकसदनीय ढाँचा है, जबकि बिहार, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना समेत 6 राज्यों में विधानसभा के साथ विधानपरिषद् भी है, यानी वहाँ द्विसदनीय व्यवस्था है।
  • द्विसदनीय ढाँचे में जनता द्वारा सीधे चुना गया निचला सदन विधानसभा कहलाता है, जबकि अंशतः निर्वाचित और अंशतः मनोनीत वरिष्ठों वाला ऊपरी सदन विधानपरिषद् कहलाता है।
  • राजस्थान का विधानमंडल एकसदनीय है — यहाँ केवल विधानसभा है, विधानपरिषद् नहीं।

👥विधानसभा का गठन व सदस्य संख्या

  • हर राज्य में विधानसभा का होना अनिवार्य है, जबकि विधानपरिषद् बनाना या न बनाना राज्य की मर्जी पर निर्भर करता है।
  • किसी राज्य की विधानसभा में कम से कम 60 और अधिकतम 500 सदस्य हो सकते हैं, हालांकि सिक्किम (32), गोवा व मिज़ोरम (40-40) और पुडुचेरी (33) जैसे कुछ छोटे राज्य इस सीमा के अपवाद हैं।
  • विधानसभा सदस्य राज्य के अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से जनता द्वारा सीधे बहुमत के आधार पर चुने जाते हैं और एमएलए (विधानसभा सदस्य) कहलाते हैं।
  • देश में सबसे बड़ी विधानसभा उत्तरप्रदेश की है, जहाँ 403 एमएलए बैठते हैं।

🎓सदस्यता की योग्यता व अयोग्यता

  • विधानसभा सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार का भारतीय नागरिक होना, कम से कम 25 वर्ष की आयु पूरी करना, संसद द्वारा तय अन्य सभी योग्यताएँ पूरी करना, और सरकार के किसी लाभ के पद पर न होना ज़रूरी है।
  • कोई व्यक्ति एक साथ राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं रह सकता, और न ही संसद व किसी राज्य विधानमंडल दोनों का सदस्य बना रह सकता है — ऐसी स्थिति में एक को छोड़कर बाकी सभी सदस्यताओं से त्यागपत्र देना पड़ता है।
  • सदस्यता खोने के आधारों में सरकार के अधीन लाभ का पद रखना, अदालत द्वारा विकृतचित्त घोषित होना, दिवालिया होना, भारतीय नागरिकता न होना या स्वेच्छा से किसी और देश की नागरिकता लेना, और संसद के किसी कानून के तहत अयोग्य ठहराया जाना शामिल है; दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता भी सदस्यता समाप्त कर देती है।
  • किसी सदस्य की अयोग्यता का सवाल राज्यपाल के पास भेजा जाता है, जो निर्वाचन आयोग की राय लेकर अंतिम फैसला सुनाता है।
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अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व पीठासीन व्यवस्था

Speaker, Deputy Speaker and the Presiding System

सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चले, इसके लिए विधानसभा अपने बीच से एक अध्यक्ष व उपाध्यक्ष चुनती है, जिनकी शक्तियाँ लगभग लोकसभाध्यक्ष जितनी व्यापक होती हैं।

🗳️निर्वाचन एवं रिक्ति की व्यवस्था

  • विधानसभा की कार्यवाही चलाने के लिए सदस्य अपने बीच से बहुमत से एक अध्यक्ष चुनते हैं, और इसी तरह उपाध्यक्ष का चुनाव भी सदस्य आपस में करते हैं।
  • अध्यक्ष के अनुपस्थित रहने पर उपाध्यक्ष सदन की अध्यक्षता करता है और कार्यवाही चलाता है।
  • यदि अध्यक्ष व उपाध्यक्ष दोनों के पद खाली हों, तो राज्यपाल द्वारा नियुक्त कोई सदस्य सदन की अध्यक्षता करता है, जब तक सदस्य नए अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव न कर लें।
  • नई विधानसभा बनने पर राज्यपाल आमतौर पर सबसे वरिष्ठ निर्वाचित सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करता है, जो बाकी सदस्यों को शपथ दिलाता है और अध्यक्ष के चुनाव की कार्यवाही चलाता है; यह पद अध्यक्ष के निर्वाचन के साथ ही समाप्त हो जाता है।

त्यागपत्र व पद से हटाया जाना

  • यदि अध्यक्ष या उपाध्यक्ष विधानसभा के सदस्य नहीं रह जाते, तो उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ता है।
  • दोनों में से कोई भी कभी भी हस्ताक्षरित लिखित त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकता है — अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को देता है और उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को।
  • उपस्थित सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव से अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को समय से पहले भी हटाया जा सकता है, बशर्ते ऐसा प्रस्ताव लाने की सूचना कम से कम 14 दिन पहले दी गई हो।
  • जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तब वह व्यक्ति सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकता, हालांकि कार्यवाही में भाग लेकर वोट डाल सकता है — पर उस समय बराबरी होने पर उसे निर्णायक मत का अधिकार नहीं मिलता।

🔁कार्यवाहक अध्यक्ष की व्यवस्था

  • अध्यक्ष का पद खाली होने पर उपाध्यक्ष यह भूमिका निभाता है, और दोनों पद खाली होने पर राज्यपाल द्वारा नियुक्त कोई सदस्य बैठकों में अध्यक्ष का काम करता है।
  • अगर अध्यक्ष सिर्फ अनुपस्थित हो तो उपाध्यक्ष अध्यक्षता करता है, और दोनों अनुपस्थित हों तो नियम प्रक्रिया के तहत तय पैनल का कोई सदस्य अध्यक्षता करता है; ऐसी कोई व्यवस्था न हो तो सदस्य खुद किसी को उस बैठक के लिए अध्यक्ष चुन लेते हैं।

🔨अध्यक्ष की शक्तियाँ व सदन की व्यवस्था

  • विधानसभाध्यक्ष को करीब वही शक्तियाँ व अधिकार मिलते हैं जो लोकसभाध्यक्ष को प्राप्त होते हैं, और बैठकों को सुचारु ढंग से चलाने में उसका फैसला अंतिम माना जाता है।
  • किसी बैठक के लिए गणपूर्ति (कोरम) 10 सदस्य या सदन की कुल सदस्य संख्या का 10 प्रतिशत, जो भी ज़्यादा हो, तय है; गणपूर्ति पूरी न होने पर अध्यक्ष बैठक स्थगित या निलंबित कर सकता है।
  • अध्यक्ष सामान्यतः वोट नहीं देता, लेकिन मत बराबर होने पर वह निर्णायक मत डालता है; किसी विधेयक के धन विधेयक होने का प्रमाणन भी अध्यक्ष ही करता है और सदन के नेता के अनुरोध पर गुप्त बैठक की इजाज़त दे सकता है।
  • दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी सदस्य को अयोग्य ठहराने का फैसला भी अध्यक्ष ही लेता है; विधानसभा का अपना अलग सचिवालय होता है और हर सदस्य को सीट ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके प्रतिनिधि के सामने संविधान की तीसरी अनुसूची में दी गई शपथ लेनी होती है।
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कार्यकाल, सत्र एवं विधायी प्रक्रिया

Tenure, Sessions and the Legislative Process

विधानसभा का जीवनचक्र — उसका कार्यकाल, सत्र बुलाना, राज्यपाल का अभिभाषण और कानून व बजट पारित होने की पूरी प्रक्रिया — संविधान में बारीकी से तय किया गया है।

कार्यकाल एवं विघटन

  • विधानसभा का सामान्य कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष होता है और 5 साल पूरे होते ही यह अपने आप भंग हो जाती है, हालांकि राज्यपाल इसे इससे पहले भी भंग कर सकता है।
  • व्यवहार में विधानसभा का कार्यकाल राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन से जुड़े प्रावधानों और मुख्यमंत्री की इच्छा पर भी निर्भर करता है — बहुमत प्राप्त मुख्यमंत्री के विघटन की सिफारिश करने पर राज्यपाल को विधानसभा भंग करनी ही होती है।
  • राष्ट्रीय आपातकाल लागू रहने पर संसद विधानसभा का कार्यकाल एक बार में अधिकतम 1 वर्ष तक बढ़ा सकती है, लेकिन आपातकाल खत्म होने के बाद यह विस्तार 6 महीने से ज़्यादा नहीं चल सकता।
  • विधानसभा भंग होते ही अध्यक्ष अपना पद नहीं खोता — वह नई विधानसभा की पहली बैठक शुरू होने तक पद पर बना रहता है।

📅सत्र, सत्रावसान, स्थगन व विघटन

  • राज्यपाल राज्य मंत्रिपरिषद् की सलाह पर समय-समय पर या ज़रूरत पड़ने पर विधानसभा की बैठकें बुलाता है; एक सत्र के आखिरी दिन और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच 6 महीने से ज़्यादा का अंतर नहीं हो सकता, यानी साल में कम से कम दो सत्र होना अनिवार्य है — इससे ज़्यादा भी हो सकते हैं।
  • देश में आमतौर पर संसद व विधानसभाओं के तीन सत्र होते हैं — बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र।
  • सत्रावसान का मतलब है राज्यपाल द्वारा सत्र का काम पूरा हो जाने पर उसे समाप्त घोषित करना, जबकि सत्र का स्थगन — चाहे तय समय के लिए हो या अनिश्चितकाल के लिए — सिर्फ तत्कालीन अध्यक्ष कर सकता है, राज्यपाल को यह अधिकार नहीं है।
  • राज्यपाल कार्यकाल पूरा होने पर या मुख्यमंत्री की सलाह पर कभी भी विधानसभा भंग कर सकता है, जिसके बाद ताज़ा चुनाव कराए जाते हैं।

🎙️राज्यपाल का अभिभाषण

  • संविधान राज्यपाल को विधानसभा के सामने अभिभाषण देने और इस दौरान सदस्यों की उपस्थिति चाहने का अधिकार देता है।
  • हर आम चुनाव के बाद पहले सत्र की शुरुआत में और हर साल के पहले सत्र की शुरुआत में राज्यपाल विधानसभा को संबोधित करता है और सत्र बुलाने के कारण बताता है।

💰विधेयक पारण, धन विधेयक व बजट

  • धन व वित्त विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश किए जा सकते हैं, वह भी राज्यपाल की पूर्व सिफारिश से; कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका प्रमाणन अध्यक्ष करता है।
  • जहाँ विधानपरिषद् मौजूद है, वहाँ धन विधेयक पर उसकी शक्तियाँ राज्यसभा जैसी सीमित हैं — वह उसे सिर्फ 14 दिन तक रोक सकती है और अस्वीकार नहीं कर सकती; साधारण विधेयक पर भी उसकी शक्तियाँ विधानसभा से कम हैं, वह इसे पहली बार अधिकतम 3 महीने और दोबारा आने पर सिर्फ 1 महीने रोक सकती है।
  • राज्य की संचित निधि से पैसा निकालने के लिए विधानसभा की मंज़ूरी ज़रूरी है, और यह मंज़ूरी विनियोग विधेयक के ज़रिए दी जाती है; हर वित्तीय वर्ष शुरू होने से पहले राज्यपाल विधानसभा के सामने आगामी वर्ष की अनुमानित प्राप्तियों व खर्च का ब्योरा — यानी वार्षिक बजट — रखवाता है।
  • द्विसदनीय राज्यों में भी विधायी कामकाज के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है — यह सुविधा सिर्फ संसद में मिलती है।
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निर्वाचन तंत्र

The Election Machinery

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के पीछे निर्वाचन आयोग से लेकर परिसीमन आयोग और ईवीएम-वीवीपेट तक की एक पूरी मशीनरी काम करती है।

🗳️भारत निर्वाचन आयोग

  • भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक व स्वतंत्र संस्था है, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी।
  • यह सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूचियाँ तैयार करवाने के साथ-साथ संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों की निगरानी, निर्देशन व नियंत्रण करता है; राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी भी इसी की है।

🧑‍💼मुख्य व जिला निर्वाचन अधिकारी

  • निर्वाचन आयोग हर राज्य में राज्य सरकार से सलाह-मशविरा कर एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नियुक्त करता है, जो आमतौर पर राज्य सरकार का ही कोई वरिष्ठ अधिकारी होता है और अपने राज्य में संसद व विधानसभा चुनावों के संचालन तथा मतदाता सूचियों की तैयारी-संशोधन की निगरानी करता है।
  • हर ज़िले के लिए भी एक जिला निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किया जाता है, जो CEO व निर्वाचन आयोग की निगरानी में अपने ज़िले के चुनाव, वोटर फोटो पहचान पत्र कार्यक्रम व मतदाता सूचियों का काम संभालता है; राज्य के सभी जिला कलेक्टरों को ही जिला निर्वाचन अधिकारी बनाया गया है।

🗺️परिसीमन आयोग

  • परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत केंद्र सरकार को परिसीमन आयोग बनाने का अधिकार है, जो राज्यों में विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएँ तय करता है; पिछला आयोग न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में 12 जुलाई 2002 को बनाया गया था।
  • इस आयोग ने राज्य में लोकसभा के लिए 25 क्षेत्र (4 अजा व 3 अजजा आरक्षित) और विधानसभा के लिए 200 क्षेत्र (34 अजा व 25 अजजा आरक्षित) अधिसूचित किए; इस परिसीमन के बाद जयपुर जिले में सबसे ज़्यादा (चार) सीटें बढ़ीं और वहाँ कुल सीटें 19 हो गईं, हालांकि अगस्त 2023 में ज़िलों के पुनर्गठन के बाद यह तस्वीर बदल गई है।

🖨️ईवीएम व वीवीपेट

  • ईवीएम से पहले वोटिंग पारंपरिक मतपत्रों व मतपेटियों से होती थी; 1989 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 61क जोड़कर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को कानूनी मान्यता दी गई, और मतदाता बैलेटिंग यूनिट पर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम व चुनाव-चिह्न के सामने का बटन दबाता है।
  • ईवीएम का सबसे आख़िरी बटन गुलाबी रंग का 'नोटा' (इनमें से कोई नहीं) होता है; राजस्थान में 2003 के विधानसभा चुनाव व 2004 के लोकसभा चुनाव से सभी मतदान केंद्रों पर ईवीएम का इस्तेमाल शुरू हुआ और तभी से यह जारी है।
  • वीवीपेट (Voter Verifiable Paper Audit Trail) ईवीएम से जुड़ा एक प्रिंटर है — वोट डालते ही इसकी पारदर्शी खिड़की में 7 सेकंड के लिए एक पर्ची दिखती है, जिससे मतदाता पुष्टि कर सकता है कि उसका वोट सही उम्मीदवार को गया; आयोग के निर्देश पर अब सभी आम चुनावों व उपचुनावों में वीवीपेट अनिवार्य है।
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राजस्थान विधानसभा — इतिहास, रिकॉर्ड व वर्तमान

Rajasthan Assembly — History, Records and the Present

जयपुर रियासत की धारा सभा से लेकर आज की 200 सदस्यीय विधानसभा तक — राजस्थान विधानसभा का सफर कई ऐतिहासिक पहलों, रिकॉर्ड्स और यादगार चुनावों से भरा है।

🏰रियासतकाल से पहली विधानसभा तक

  • जयपुर के महाराजा मानसिंह द्वितीय ने सितंबर 1945 में जयपुर रियासत में एक द्विसदनीय विधानमंडल बनाया था, जिसके दो सदन 'धारा सभा' और 'प्रतिनिधि सभा' कहलाते थे।
  • आज़ादी और संविधान लागू होने के बाद राज्य की पहली 160 सदस्यीय विधानसभा के लिए 4 से 24 जनवरी 1952 तक आम चुनाव हुए; इसका गठन 23 फरवरी 1952 को हुआ और पहली बैठक 29 मार्च 1952 को जयपुर के सवाई मानसिंह टाउन हॉल में हुई, जिसे बाद में विधानसभा भवन का रूप दे दिया गया।
  • उस पहले चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास दो सीटों से लड़े पर दोनों जगह हार गए, इसलिए टीकाराम पालीवाल राज्य के 'पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री' बने; व्यास बाद में किशनगढ़ सीट के उपचुनाव में जीतकर मुख्यमंत्री बने।
  • पहली विधानसभा के कार्यकाल में सबसे ज़्यादा 17 सीटों पर उपचुनाव हुए, जो आज भी रिकॉर्ड है; इसी दौर में बाँसवाड़ा उपचुनाव (नवंबर 1953) जीतकर यशोदा देवी राज्य की पहली महिला विधायक बनीं, और कमला बेनीवाल 1954 में दूसरी महिला विधायक बनीं।

📈सदस्य संख्या का बढ़ना व शुरुआती दशक

  • राजस्थान बनने के समय अजमेर-मेरवाड़ा राज्य में शामिल नहीं था, इसलिए वहाँ 30 सदस्यीय अलग 'धारा सभा' थी; 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू होते ही अजमेर-मेरवाड़ा राजस्थान में मिल गया, जिससे सदस्य संख्या पहले 190 हुई और फिर घटकर 176 रह गई — दूसरी विधानसभा का चुनाव इन्हीं 176 सीटों पर हुआ।
  • तीसरी विधानसभा में भी 176 सीटें रहीं, पर इस बार से द्वि-सदस्यीय सीटों की व्यवस्था खत्म कर हर क्षेत्र को एक-सदस्यीय बना दिया गया; चौथी विधानसभा (1967) में नए परिसीमन से सीटें बढ़कर 184 हो गईं और यहीं पहली बार किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने से राष्ट्रपति शासन भी लगा।
  • छठी विधानसभा (1977) में परिसीमन के बाद सीटें बढ़कर 200 हुईं — यही संख्या आज भी है; इसी विधानसभा में गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी को पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला और राज्य को अपनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार मिली, जिसके साथ लक्ष्मणसिंह पहले गैर-कांग्रेसी अध्यक्ष बने; इसे तय समय से पहले भंग कर राज्य का पहला मध्यावधि चुनाव कराया गया।
  • आपातकाल के कारण पाँचवीं विधानसभा (1972-77) अकेली ऐसी विधानसभा रही जो 5 साल से थोड़ा ज़्यादा (5 साल 1.5 महीने) चली; राजस्थान विधानसभा का मौजूदा भवन जयपुर के ज्योति नगर में 2001 में बनकर तैयार हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने 6 नवंबर 2001 को इसका लोकार्पण किया।

🥇रिकॉर्ड्स व ऐतिहासिक पहलें

  • रामनिवास मिर्धा लगातार दूसरी व तीसरी विधानसभा के अध्यक्ष रहे और राजस्थान विधानसभा में सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने का रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है; कांग्रेस के हरिदेव जोशी देश भर में अकेले ऐसे विधायक थे जो पहली दस विधानसभाओं के चुनाव लगातार जीतते रहे।
  • बारहवीं विधानसभा (2003) में भाजपा को पहली बार स्पष्ट बहुमत (120 सीटें) मिला और इसी दौर में सुमित्रा सिंह राज्य की पहली महिला विधानसभाध्यक्ष, प्रतिभा पाटिल पहली महिला राज्यपाल और वसुंधरा राजे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
  • तेरहवीं विधानसभा (2008) में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और 96 सीटों वाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन इसी विधानसभा में अब तक की सर्वाधिक 29 महिला विधायक चुनी गईं; चौदहवीं विधानसभा (2013) में भाजपा को रिकॉर्ड 163 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस अब तक के सबसे कम 21 सीटों पर सिमट गई।

🗳️2018 का विधानसभा चुनाव (15वीं विधानसभा)

  • राज्य की 15वीं विधानसभा का चुनाव 7 दिसंबर 2018 को हुआ, जिसमें 74.71% मतदान दर्ज हुआ — सबसे ज़्यादा जैसलमेर में (84.66%) और सबसे कम पाली में (64.86%); इसी चुनाव में राज्य में पहली बार वीवीपेट मशीनों का इस्तेमाल हुआ।
  • 199 सीटों वाले इस चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अशोक गहलोत के नेतृत्व में सरकार बनी; गहलोत ने 17 दिसंबर 2018 को राज्यपाल कल्याण सिंह से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री बने।
  • इसके साथ ही गहलोत तीसरी बार (1998, 2008 और 2018 में) मुख्यमंत्री बने और राज्य के 22वें निर्वाचित मुख्यमंत्री कहलाए — मोहनलाल सुखाड़िया के बाद सबसे लंबे संचयी कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री; सी.पी. जोशी 16 जनवरी 2019 को 15वीं विधानसभा के अध्यक्ष चुने गए।

🏆2023 का विधानसभा चुनाव (16वीं विधानसभा)

  • 16वीं विधानसभा के लिए मतदान 25 नवंबर 2023 को हुआ (श्रीकरणपुर में उम्मीदवार की मृत्यु के चलते सिर्फ 199 सीटों पर); 3 दिसंबर 2023 की मतगणना में भाजपा को 115 और कांग्रेस को 69 सीटें मिलीं, जबकि पहली बार चुनाव लड़ी भारतीय आदिवासी पार्टी (BAP) ने 3 सीटें जीतीं।
  • सांगानेर से विधायक भजनलाल शर्मा को भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया और उन्होंने 15 दिसंबर 2023 को राज्यपाल कलराज मिश्र से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली; दीया कुमारी व प्रेमचंद बैरवा उपमुख्यमंत्री बने।
  • इस चुनाव में कुल 75.45% मतदान हुआ, जो 2018 से 0.74% ज़्यादा था; सबसे ज़्यादा मतदान कुशलगढ़ (88.13%) में और सबसे कम आहोर (61.24%) में रहा; भाजपा की दीया कुमारी सबसे बड़े अंतर (71,368 वोट) से जीतीं, जबकि हंसराज पटेल सिर्फ 321 वोट के अंतर से जीते।
  • इस चुनाव में सबसे युवा विधायक 25 वर्षीय निर्दलीय रविंद्र सिंह भाटी बने, जबकि सबसे उम्रदराज विधायक दीपचंद खैरिया व हरिमोहन शर्मा (दोनों 83 वर्ष) रहे; कुल 20 महिला विधायक चुनी गईं। बाद में हुए उपचुनावों के बाद विधानसभा में भाजपा के 119, कांग्रेस के 66 व BAP के 4 सदस्य हो गए हैं।

📋विधानसभा की स्थायी समितियाँ

  • सरकार के वित्तीय व अन्य कामकाज पर नज़र रखने के लिए संसद की तरह विधानसभा में भी स्थायी समितियाँ बनती हैं, जो अपनी रिपोर्ट सौंपती हैं; इनमें सबसे अहम लोक लेखा समिति (PAC) है, जो महालेखापाल की रिपोर्ट के आधार पर सरकारी विभागों व निगमों के हिसाब-किताब की जाँच करती है — इसके अधिकतम 15 सदस्य हर साल चुने जाते हैं और इसका अध्यक्ष हमेशा नेता प्रतिपक्ष होता है।
  • दो प्राक्कलन समितियाँ (A व B) हर साल विधानसभा सदस्यों में से एकल संक्रमणीय मत पद्धति से बनती हैं और सरकारी विभागों के अनुमानों की समीक्षा करती हैं; इसी तरह लोक उपक्रम समिति राज्य सरकार के उपक्रमों पर वित्तीय निगरानी रखती है — इन सभी में अधिकतम 15-15 सदस्य होते हैं।
  • सामान्य प्रयोजन समिति के पदेन अध्यक्ष खुद विधानसभाध्यक्ष होते हैं, और अब पहली बार इसमें मुख्यमंत्री को भी सदस्य बनाया गया है; इनके अलावा व्यापार सलाहकार समिति, पुस्तकालय व सरकारी आश्वासन समिति, याचिका व नैतिकता समिति, पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक कल्याण समितियाँ, अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण समितियाँ और विशेषाधिकार समिति जैसी कई अन्य स्थायी समितियाँ भी काम करती हैं।

💵वेतन-भत्ते व विविध तथ्य

  • 1 अप्रैल 2019 से लागू वेतनमान के अनुसार मुख्यमंत्री को 75,000 रु. वेतन व 85,000 रु. सत्कार भत्ता, उपमुख्यमंत्री व कैबिनेट मंत्री को 65,000 रु. वेतन व 80,000 रु. भत्ता, विधानसभाध्यक्ष को 70,000 रु. वेतन व 80,000 रु. भत्ता और एक साधारण विधायक को 40,000 रु. वेतन मिलता है; सरकारी आवास न मिलने पर मकान किराया भत्ता 10,000 रु. से बढ़ाकर 30,000 रु. प्रतिमाह कर दिया गया है।
  • राज्य की पहली विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर महाराव संग्रामसिंह थे; अगर एक भी मंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए या विधानसभा वित्त मंत्री का बजट अस्वीकार कर दे, तो सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के तहत पूरी मंत्रिपरिषद् को इस्तीफा देना पड़ता है।
  • संविधान अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए विधानसभा सीटों का आरक्षण उनकी आबादी के अनुपात में तय करता है, और 2019 के 104वें संशोधन ने इस आरक्षण को अगले 10 साल यानी 25 जनवरी 2030 तक बढ़ा दिया; इसी संशोधन ने राज्यपाल द्वारा आंग्ल-भारतीय समुदाय के मनोनयन वाले प्रावधान को आगे नहीं बढ़ाया, इसलिए वह अपने आप निष्प्रभावी हो गया।
  • राजस्थान विधानसभा परिसर में 8 मई 2026 को 'हर्बल वाटिका' व 'नक्षत्र वाटिका' का उद्घाटन हुआ, और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 14 मई 2026 को जोधपुर में पूर्व मुख्यमंत्री-उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत की तथा मेड़ता में राव दूदाजी की प्रतिमा का अनावरण किया।