मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद्
Chief Minister & Council of Ministers
राज्य की असली कार्यपालिका कैसे बनती है — मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद् से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों से लेकर 1949 से अब तक राजस्थान की गद्दी संभालने वाले हर नेता तक की पूरी झलक।
संवैधानिक आधार
मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद् की पूरी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 163, 164, 166 व 167 पर टिकी है, साथ ही अनुच्छेद 165 व 177 महाधिवक्ता के पद को आकार देते हैं।
🤝अनुच्छेद 163 — राज्यपाल को सहायता व सलाह
- अनुच्छेद 163(1) के अनुसार प्रत्येक राज्य में राज्यपाल को सहायता व सलाह देने हेतु मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद् का होना अनिवार्य है — राज्य की संपूर्ण कार्यपालिका शक्ति वास्तव में इसी मंत्रिपरिषद् में निहित होती है, और राज्यपाल इसी की सलाह पर कार्य करता है।
- अनुच्छेद 163(2) राज्यपाल के विवेकाधिकार से लिए गए निर्णयों को वैधता के प्रश्न से सुरक्षा देता है, जबकि अनुच्छेद 163(3) के तहत मंत्रियों द्वारा राज्यपाल को दी गई सलाह की किसी भी न्यायालय में जांच नहीं हो सकती।
📋अनुच्छेद 164 — नियुक्ति, आकार व शपथ
- अनुच्छेद 164(1) के अनुसार राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर शेष मंत्रियों की — सामान्यतः विधानमंडल के सदस्यों में से ही, पर किसी गैर-सदस्य को भी लिया जा सकता है; मंत्रिपरिषद् राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त पद पर रहती है, जो व्यवहार में विधानसभा का विश्वास बने रहने तक चलता है।
- 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 [अनुच्छेद 164(1क)] ने किसी राज्य की मंत्रिपरिषद् की अधिकतम संख्या (मुख्यमंत्री सहित) विधानसभा सदस्य संख्या के 15% तक सीमित कर दी, पर यह 12 से कम भी नहीं हो सकती — राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा के हिसाब से यह सीमा 30 बनती है।
- अनुच्छेद 164(2) मंत्रिपरिषद् को विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाता है, और अनुच्छेद 164(3) के तहत पद ग्रहण से पहले प्रत्येक मंत्री को तीसरी अनुसूची में दिए प्रारूप के अनुसार राज्यपाल के समक्ष पद व गोपनीयता की शपथ लेनी होती है।
- अनुच्छेद 164(4) के अनुसार यदि कोई मंत्री विधानमंडल का सदस्य नहीं है तो शपथ की तिथि से छह माह के भीतर उसे किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी है, अन्यथा उसका मंत्री पद समाप्त हो जाता है; अनुच्छेद 164(5) मंत्रियों के वेतन-भत्ते राज्य विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर तय कराता है।
🖋️अनुच्छेद 166 व 167 — कार्य नियम व मुख्यमंत्री का कर्तव्य
- अनुच्छेद 166 के अनुसार राज्य सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाइयाँ राज्यपाल के नाम से की जाती हैं, तथा मंत्रियों में कार्य आवंटन के नियम भी राज्यपाल ही बनाता है।
- अनुच्छेद 167 मुख्यमंत्री को बाध्य करता है कि वह प्रशासन व कानून-निर्माण से जुड़े मंत्रिपरिषद् के हर निर्णय की सूचना राज्यपाल को दे, राज्यपाल द्वारा माँगी गई कोई भी जानकारी उपलब्ध कराए, और यदि राज्यपाल कहे तो किसी एक मंत्री द्वारा अकेले तय किए गए विषय को मंत्रिपरिषद् के समक्ष विचारार्थ रखे।
⚖️महाधिवक्ता व सदन में मंत्रियों के अधिकार
- अनुच्छेद 165 राज्यपाल को महाधिवक्ता — उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य व्यक्ति — को राज्य के सर्वोच्च कानूनी अधिकारी के रूप में नियुक्त करने का अधिकार देता है; वह राज्यपाल की इच्छापर्यन्त पद पर रहता है और आमतौर पर मंत्रिपरिषद् के त्यागपत्र देते ही स्वयं भी पद छोड़ देता है, क्योंकि उसकी नियुक्ति भी मंत्रिपरिषद् की सलाह पर होती है।
- महाधिवक्ता राज्यपाल द्वारा सौंपे गए कानूनी मामलों पर सरकार को सलाह देता है और राजस्थान सरकार से जुड़े मुकदमों की पैरवी करता है; राज्य में यह पद 7वें संविधान संशोधन तथा राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के बाद अस्तित्व में आया, जिसके पहले धारक श्री जी.सी. कासलीवाल थे, और इसकी मुख्य पीठ जोधपुर में है (एक शाखा जयपुर में)।
- अनुच्छेद 177 के अनुसार राज्य का प्रत्येक मंत्री तथा महाधिवक्ता विधानमंडल के किसी भी सदन की कार्यवाही में भाग लेने व बोलने का अधिकार रखते हैं, परंतु उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता।
संरचना, सचिवालय व उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद् केवल मंत्रियों का समूह भर नहीं है — यह मंत्रियों के तीन वर्गों, एक सहायक सचिवालय-तंत्र और राजनीतिक व विधिक उत्तरदायित्व की कई परतों वाली एक सुगठित व्यवस्था है।
🎖️मंत्रियों के तीन वर्ग
- मंत्रिपरिषद् की संरचना में तीन स्तर होते हैं — कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री व उपमंत्री — जिनके साथ मंत्रिमण्डल सचिवालय व संसदीय सचिव इस व्यवस्था को सहारा देते हैं।
- कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र रूप से एक या अधिक विभागों के राजनीतिक प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं — इनमें सबसे वरिष्ठ स्वयं मुख्यमंत्री होता है — और सामूहिक रूप से ये मंत्रिमंडल बनाते हैं।
- राज्यमंत्री दो प्रकार के होते हैं — कैबिनेट मंत्री के सहायक, या स्वतंत्र प्रभार वाले छोटे विभागों के राजनीतिक प्रमुख — जबकि उपमंत्री, जो सामान्यतः युवा व नए विधायक होते हैं, प्रशासनिक अनुभव पाने व कैबिनेट मंत्री का भार हल्का करने हेतु नियुक्त किए जाते हैं।
🗂️मंत्रिमण्डल सचिवालय
- मंत्रिमण्डल सचिवालय मंत्रिमंडल की बैठकों व निर्णय-प्रक्रिया में सहायता करता है और निर्णयों के क्रियान्वयन की पूरी निगरानी भी करता है; इसका प्रशासनिक प्रमुख मुख्य सचिव होता है, जबकि राजनीतिक प्रमुख मुख्यमंत्री होता है।
- बैठक का एजेंडा मुख्यमंत्री की सलाह व निर्देश पर तैयार किया जाता है, और कार्यवाही व निर्णयों का विवरण (मिनट्स) तैयार कर अगली बैठक में मुख्यमंत्री से अनुमोदित कराया जाता है।
🌱संसदीय सचिव
- संसदीय सचिव दल के नए व युवा सदस्य होते हैं, जिन्हें राजनीतिक-प्रशासनिक अनुभव कम होने के बावजूद शासकीय दायित्व का प्रशिक्षण देने हेतु नियुक्त किया जाता है; अन्य मंत्रियों के विपरीत, इनकी नियुक्ति व शपथ राज्यपाल नहीं बल्कि मुख्यमंत्री द्वारा कराई जाती है।
- राजस्थान में यह पद पहली बार वर्ष 1967 में मोहनलाल सुखाड़िया के मुख्यमंत्रित्व काल में स्थापित हुआ।
🧩सामूहिक उत्तरदायित्व
- अनुच्छेद 164(2) के तहत संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद् विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है — यदि सदन मंत्रिपरिषद् या किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे, तो मुख्यमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना पड़ता है।
- यही परिणाम तब भी होता है जब धन्यवाद प्रस्ताव जैसा कोई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव, या बजट/वित्त विधेयक जैसा जरूरी विधेयक पारित न हो सके — इसे सदन का विश्वास मंत्रिपरिषद् से उठ जाना माना जाता है।
🪪व्यक्तिगत व विधिक उत्तरदायित्व
- मंत्रिपरिषद् का हर सदस्य राज्यपाल के प्रति व्यक्तिगत रूप से भी उत्तरदायी होता है और अनुच्छेद 164(1) के तहत राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त पद पर रहता है — इसलिए राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर, किसी भी मंत्री को किसी भी समय हटा सकता है, भले ही विधानसभा का विश्वास उसे प्राप्त हो।
- संविधान मंत्रियों को कोई विधिक उत्तरदायित्व नहीं सौंपता — राज्यपाल के किसी आदेश पर मंत्री के प्रति-हस्ताक्षर की जरूरत नहीं होती (जबकि ब्रिटेन में ऐसी व्यवस्था है), और मंत्रियों द्वारा राज्यपाल को दी गई सलाह न्यायिक जांच से परे होती है।
- चूँकि राजस्थान में विधानपरिषद् अस्तित्व में नहीं है, इसलिए मुख्यमंत्री व अन्य सभी मंत्रियों को पदग्रहण की तिथि से छह माह के भीतर विधानसभा का सदस्य बनना आवश्यक है।
मंत्रिमंडल व मुख्यमंत्री का आंतरिक दायरा
मंत्रिमंडल से लेकर किचन कैबिनेट और यहाँ तक कि छाया मंत्रिमंडल तक — सत्ता की ये परतें बताती हैं कि राज्य के असली फैसले कहाँ लिए जाते हैं।
🧭मंत्रिपरिषद् के कार्य
- मंत्रिपरिषद् राज्य का प्रशासन चलाने की नीति तय करती है और राज्य की वास्तविक कार्यपालिका होती है; विधानमंडल द्वारा बनाए कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी भी इसी की है, और यद्यपि कानून बनाना औपचारिक रूप से विधानमंडल का काम है, व्यवहार में विधेयकों का प्रारूप व राज्यपाल का अभिभाषण भी मंत्रिपरिषद् ही तैयार करती है।
- मंत्रिपरिषद् के परामर्श पर ही राज्यपाल महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्य, राज्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य वित्त आयोग व कुलपति जैसी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियाँ करता है, तथा उसी के नाम से अध्यादेश (अनुच्छेद 213) व राज्य का बजट जारी होता है।
🎯मंत्रिमंडल — मंत्रिपरिषद् का केंद्रीय हिस्सा
- मंत्रिमंडल मंत्रिपरिषद् का एक छोटा व केंद्रीय हिस्सा है, जिसमें केवल कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं; यह राज्य की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था की सर्वोच्च नीति-निर्धारक कार्यकारिणी है और एक संवैधानिक कार्यकारिणी होने के नाते वरिष्ठ प्रशासनिक सचिवों जैसी उच्च नियुक्तियाँ भी करता है।
- मंत्रिमंडल राज्य सरकार के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की तरह कार्य करते हुए प्रशासनिक तंत्र का समन्वय करता है, राज्यपाल का सलाहकार व मुख्य आपात प्रबंधक होता है, और सभी बड़े वैधानिक व वित्तीय मामलों की देखरेख करता है।
🧑✈️मुख्यमंत्री-मंत्रिपरिषद् संबंध
- मुख्यमंत्री ही मंत्रिपरिषद् का निर्माता व संहारक होता है — अर्थात् वह इस टीम का कप्तान है — और अध्यक्ष के रूप में वही इसका संचालन, नियंत्रण, निर्देशन व समन्वय करता है, मंत्रियों को योग्यता के आधार पर विभाग सौंपकर मार्गदर्शन भी देता है।
- मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद् एक टीम की तरह कार्य करते हैं, विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहते हुए जनकल्याण की योजनाएँ लागू करते हैं ताकि जनता का विश्वास बना रहे; मुख्यमंत्री सदस्यों का मनोबल बढ़ाता है व सदन के भीतर-बाहर उनकी रक्षा करता है, जबकि सदस्य भी उसे मूल्यवान सुझाव देते हैं।
- यदि मुख्यमंत्री को लगे कि कोई मंत्री राजहित में ठीक से कार्य नहीं कर रहा, तो वह उसे त्यागपत्र देने को कह सकता है — और इनकार करने पर राज्यपाल को उसे बर्खास्त करने की सलाह देकर हटा सकता है।
🍽️किचन कैबिनेट व छाया मंत्रिमंडल
- 'किचन कैबिनेट' — जिसे 'आंतरिक मंत्रिमंडल' भी कहा जाता है — प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री व उनके 4-5 विश्वासपात्र वरिष्ठ मंत्रियों (कभी-कभी मित्र व परिवारजन भी) का एक लघु, अनौपचारिक निकाय है, जो शक्ति का वास्तविक केंद्र होकर मुख्यमंत्री को गोपनीयता बनाए रखते हुए संवेदनशील राजनीतिक निर्णय लेने में मदद करता है।
- 'छाया मंत्रिमंडल' ब्रिटेन में प्रचलित व्यवस्था है, जिसे विधानमंडल में प्रमुख विपक्षी दल सरकार के विभिन्न विभागों पर निगरानी व नियंत्रण रखने हेतु गठित करता है; राजस्थान का पहला छाया मंत्रिमंडल 13वीं विधानसभा में भाजपा ने प्रतिपक्ष नेता श्रीमती वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बनाया था।
🔍मंत्रिपरिषद् व मंत्रिमंडल में अंतर
- सदस्यता: मंत्रिपरिषद् में कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री व उपमंत्री — तीनों वर्ग शामिल होते हैं, जबकि मंत्रिमंडल इसका छोटा व वरिष्ठ हिस्सा है, जिसमें केवल कैबिनेट मंत्री होते हैं।
- आकार व कार्य: बड़ी मंत्रिपरिषद् सरकारी क्रियाकलाप हेतु सामूहिक रूप से बैठक नहीं करती, जबकि लघु मंत्रिमंडल बैठक कर सामूहिक निर्णय लेता है, जो आगे मंत्रिपरिषद् के कार्यों को दिशा देते हैं।
- संवैधानिक आधार: मंत्रिपरिषद् का वर्णन अनुच्छेद 74, 75, 163 व 164 में है, अतः यह आरंभ से ही एक संवैधानिक निकाय है, जबकि मंत्रिमंडल का उल्लेख बाद में — 44वें संशोधन, 1978 द्वारा — अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया।
मुख्यमंत्री — नियुक्ति, कार्यकाल, शक्तियाँ व कार्यालय
राज्यपाल भले ही राज्य का संवैधानिक प्रमुख हो, पर व्यवहार में राज्य का नेतृत्व मुख्यमंत्री ही करता है — नियुक्ति से लेकर त्यागपत्र तक की पूरी यात्रा में।
🖊️मुख्यमंत्री की नियुक्ति
- भारत की संसदीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि मंत्रिपरिषद् का मुखिया मुख्यमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है; अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल उसे मुख्यमंत्री नियुक्त करता है जिसे उसकी राय में विधानसभा के बहुमत सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो — प्रायः सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को, जिसे एक माह में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया जाता है।
- मुख्यमंत्री को विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य होना जरूरी है, हालाँकि बहुमत का समर्थन होने पर राज्यपाल किसी गैर-सदस्य को भी मुख्यमंत्री बना सकता है, जिसे छह माह के भीतर विधानसभा सदस्य बनना होता है (राजस्थान में विधानपरिषद् नहीं है); स्पष्ट बहुमत न मिलने पर राज्यपाल स्वविवेक से निर्णय लेता है, और हर मुख्यमंत्री तीसरी अनुसूची के प्रारूप अनुसार राज्यपाल के समक्ष पद व गोपनीयता की शपथ लेता है।
📝कार्यकाल व त्यागपत्र
- मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद् राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त पद पर रहते हैं, सामान्यतः जब तक विधानसभा में बहुमत बना रहे; मंत्रिपरिषद् या किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर मुख्यमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना पड़ता है।
- मुख्यमंत्री व सभी मंत्रियों के वेतन-भत्ते राज्य विधानमंडल तय करता है; मुख्यमंत्री का राज्यपाल को संबोधित लिखित त्यागपत्र देते ही संपूर्ण मंत्रिपरिषद् स्वतः विघटित हो जाती है।
🧾मुख्यमंत्री की शक्तियाँ व कार्य
- मंत्रिपरिषद् के मुखिया के रूप में मुख्यमंत्री ही अन्य मंत्रियों की नियुक्ति या पदमुक्ति के लिए राज्यपाल को सलाह देता है, मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है, स्वयं त्यागपत्र देकर पूरी मंत्रिपरिषद् भंग कर सकता है, सदस्यों में विभाग बाँटता है, और 91वें संशोधन की 15% सीमा के भीतर मंत्रिपरिषद् का आकार तय करता है।
- राज्यपाल के संबंध में मुख्यमंत्री संवैधानिक कड़ी (अनुच्छेद 167) होता है, जो मंत्रिमंडल के निर्णयों की सूचना देता है व माँगी गई जानकारी उपलब्ध कराता है, और महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष/सदस्य, राज्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य वित्त आयोग व कुलपतियों जैसी नियुक्तियों-पदमुक्तियों पर सलाह देता है।
- विधानमंडल के संदर्भ में मुख्यमंत्री विधानसभा का नेता होता है, राज्यपाल को सत्र बुलाने व सत्रावसान की सलाह देता है, किसी भी समय विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकता है, और सदन के पटल पर सरकारी नीतियों की घोषणा करता है।
- इसके अलावा मुख्यमंत्री राज्य योजना बोर्ड व मुख्यमंत्री सलाहकार परिषद् का अध्यक्ष होता है, राष्ट्रीय आपातकाल में राजनीतिक स्तर पर मुख्य प्रबंधक होता है, राज्य सरकार का मुख्य प्रवक्ता होता है, तथा अंतरराज्यीय परिषद्, राष्ट्रीय विकास परिषद् व नीति आयोग का सदस्य भी होता है।
🏢मुख्यमंत्री कार्यालय
- मुख्यमंत्री को सचिवीय व प्रशासनिक सहायता देने हेतु एक अलग 'मुख्यमंत्री सचिवालय' राजस्थान में 1951 में बना; इसका प्रशासनिक प्रमुख 'मुख्यमंत्री का सचिव' होता है — एक वरिष्ठ व विश्वासपात्र IAS अधिकारी — और आज इसमें प्रमुख सचिव व विशेष सचिव के साथ संयुक्त सचिव व प्रमुख निजी सचिव भी शामिल हैं।
- इसकी टीम में 4 विशेषाधिकारी (OSD), एक प्रेस सलाहकार, एक अनुसंधान/लेखाधिकारी व एक पुलिस महानिरीक्षक-सतर्कता (अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक-सतर्कता) भी शामिल हैं; यह कार्यालय जनसाधारण की शिकायतें छाँटता है, मुख्यमंत्री के विचारार्थ फाइलों पर टिप्पणी करता है, उनकी बैठकों का समय तय करता है, प्रवासी राजस्थानियों-प्रवासी भारतीयों के मामले निपटाता है, मंत्रिमंडल के निर्णयों का क्रियान्वयन सुनिश्चित कराता है, मुख्यमंत्री के दौरों की व्यवस्था करता है, और मुख्यमंत्री सहायता कोष का प्रबंधन करता है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री व विधानसभा में विश्वास-संघर्ष
1949 से अब तक राजस्थान की गद्दी संभालने वाले हर नेता की कहानी, साथ ही विधानसभा में हुए विश्वास व अविश्वास प्रस्तावों की झलक।
🌾हीरालाल शास्त्री
- जोबनेर, जयपुर में जन्मे हीरालाल शास्त्री ने राज्य की प्रथम लोकप्रिय (उत्तरदायी) सरकार (07.04.1949-05.01.1951) का नेतृत्व किया; 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर ही उनका पदनाम 'प्रधानमंत्री' से बदलकर 'मुख्यमंत्री' हुआ।
- संविधान सभा एवं दूसरी लोकसभा के सदस्य रहे शास्त्री जी ने 1927 से 'तरुण राजस्थान' समाचार-पत्र का संपादन किया, और पत्नी श्रीमती रतन शास्त्री के साथ 1935 में शांताबाई शिक्षा कुटीर की स्थापना की — जो आज 'वनस्थली विद्यापीठ' के नाम से नारी शिक्षा का प्रमुख केंद्र है; 1976 में उनके सम्मान में एक स्मारक डाक-टिकट जारी हुआ।
- विडंबना यह कि उनके ही कार्यकाल में हुए राज्य के प्रथम आम चुनावों (जनवरी 1952) में वे स्वयं दोनों सीटों से चुनाव हार गए।
🎩सी.एस. वेंकटाचारी
- ICS अधिकारी व जोधपुर तथा बीकानेर रियासतों के पूर्व दीवान (प्रधानमंत्री) रहे संविधान सभा सदस्य वेंकटाचारी को केंद्र सरकार ने कुछ समय (05.01.1951-26.04.1951) के लिए मुख्यमंत्री नियुक्त किया था।
- उनके काल में राज्य का अब तक का सबसे छोटा मंत्रिमंडल (केवल दो मंत्री, दोनों ही ICS अधिकारी) रहा; बाद में 1958 में उन्हें कनाडा में भारत का हाई कमिश्नर बनाया गया।
🔁जयनारायण व्यास
- जोधपुर में जन्मे व्यास 1948 में जोधपुर रियासत की लोकप्रिय सरकार के मुखिया रहे, और आगे चलकर राज्य के तीसरे मनोनीत मुख्यमंत्री (26.04.1951-03.03.1952) तथा किशनगढ़ सीट से उपचुनाव जीतकर दूसरे निर्वाचित मुख्यमंत्री (01.11.1952-13.11.1954) बने।
- 6 नवम्बर 1954 को आजादी के बाद देश में किसी राज्य के सत्तारूढ़ दल के विधायक दल के नेता पद हेतु हुए पहले मुकाबले में युवा कांग्रेस नेता मोहनलाल सुखाड़िया ने तत्कालीन मुख्यमंत्री व्यास को हरा दिया — इसके बाद व्यास दो बार राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए।
🌱टीकाराम पालीवाल
- महुआ सीट (दौसा) से निर्वाचित पालीवाल राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री (03.03.1952-01.11.1952) बने; उन्हें राज्य में भूमि सुधार का जनक माना जाता है।
- मुख्यमंत्री रहने के बाद उपमुख्यमंत्री बनने वाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं — यह भूमिका उन्होंने मोहनलाल सुखाड़िया के कार्यकाल में निभाई, जिन्होंने उन्हें राज्य का प्रथम उप-मुख्यमंत्री बनाया।
🏞️मोहनलाल सुखाड़िया
- झालरापाटन (झालावाड़) में जन्मे व उदयपुर से कार्य करने वाले सुखाड़िया राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे और चार स्पैलों (1954-57, 1957-62, 1962-67, 1967-71 — कुल 16 वर्ष 6 माह 12 दिन) में सर्वाधिक अवधि तक मुख्यमंत्री रहे; उनके राजनीतिक गुरु माणिक्यलाल वर्मा थे, और उन्होंने श्रीमती कमला बेनीवाल को राज्य की प्रथम महिला मंत्री बनाया।
- 'आधुनिक राजस्थान का निर्माता' कहे जाने वाले सुखाड़िया के शासनकाल में इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) का निर्माण हुआ; उनके तीसरे व चौथे कार्यकाल के बीच, किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर, राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन (13.03.1967-26.04.1967) लागू हुआ, तब राज्यपाल डॉ. संपूर्णानन्द थे।
- किसी भी मुख्यमंत्री के मुकाबले सबसे अधिक — कुल चार — अविश्वास प्रस्तावों का सामना उन्होंने ही किया, और बाद में कर्नाटक, आंध्रप्रदेश व तमिलनाडु के राज्यपाल रहे; 1988 में उन पर एक स्मारक डाक-टिकट भी जारी हुआ।
🕊️बरकतुल्ला खाँ
- राज्य के अल्पसंख्यक वर्ग से प्रथम व एकमात्र मुख्यमंत्री बरकतुल्ला खाँ (09.07.1971-11.10.1973) ने 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय राज्य का नेतृत्व किया, और 11 अक्टूबर 1973 को पद पर रहते हुए उनका निधन हो गया।
🔄हरिदेव जोशी
- बाँसवाड़ा के खांदू गाँव में जन्मे हरिदेव जोशी तीन बार मुख्यमंत्री रहे (1973-77, 1985-88, 1989-90); वे लगातार दस विधानसभा चुनाव जीतने वाले प्रदेश के एकमात्र विधायक थे, पर कभी सांसद नहीं रहे, और मुख्यमंत्री रहने के बाद राज्यपाल बनकर फिर मुख्यमंत्री बनने वाले वे राज्य के एकमात्र व्यक्ति हैं।
- उनके प्रथम कार्यकाल में ही 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को देश में आपातकाल लागू हुआ (राज्यपाल - सरदार जोगिंदर सिंह), और 1977 में उनकी सरकार राष्ट्रपति शासन के तहत भंग हुई; उनके द्वितीय कार्यकाल में दिवराला सतीकांड (सीकर) हुआ, और वे 9वीं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे।
🎖️भैरोंसिंह शेखावत
- सीकर ठिकाने में थानेदार रह चुके शेखावत ने 1977 में जनता पार्टी की लहर में राज्य की प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई और तीन बार मुख्यमंत्री रहे (1977-80, 1990-92, 1993-98) — आपातकाल में वे 19 माह जेल में रहे और बाद में नेता प्रतिपक्ष भी रहे; उनकी प्रथम निर्वाचित सरकार राष्ट्रपति शासन (17.02.1980-5.06.1980) लागू होने पर भंग हुई, जिसके बाद राज्य का प्रथम मध्यावधि विधानसभा चुनाव हुआ।
- गरीबों के लिए 'अन्त्योदय अन्न योजना' शुरू करने का श्रेय उन्हें दिया जाता है, और वे एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो प्रोटेम स्पीकर (11वीं विधानसभा) भी रहे और बाद में देश के 11वें उपराष्ट्रपति (अगस्त 2002-21 जुलाई 2007) भी बने; सुखाड़िया व अशोक गहलोत के बाद सर्वाधिक अवधि (10 वर्ष 4 माह 9 दिन) तक मुख्यमंत्री रहने वाले वे तीसरे व्यक्ति हैं, और 2003 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया।
- बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बने घटनाक्रम में चौथी बार राष्ट्रपति शासन लगाकर उनकी सरकार भंग की गई, जिसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।
🌾जगन्नाथ पहाड़िया
- राज्य के अनुसूचित जाति से बने प्रथम मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया (06.06.1980-14.07.1981) ने राज्य के प्रथम मध्यावधि चुनाव के बाद बनी सरकार का नेतृत्व किया।
- मुख्यमंत्री बनते समय वे बयाना से लोकसभा सदस्य व इंदिरा गांधी सरकार में वित्त राज्य मंत्री थे; बाद में उनकी पत्नी शांति पहाड़िया ने बैर विधानसभा सीट खाली की, जिसे उपचुनाव में जीतकर वे विधानसभा सदस्य बने।
🏢शिवचरण माथुर
- दो बार मुख्यमंत्री रहे (14.07.1981-23.02.1985 व 20.01.1988-04.12.1989) शिवचरण माथुर ने राज्य प्रशासनिक सुधार आयोग की अध्यक्षता की; वे लोकसभा व राज्यसभा दोनों के सदस्य तथा केंद्रीय मंत्री भी रह चुके थे, और उन्होंने संपूर्ण राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की।
- 1985 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान डीग के निर्दलीय उम्मीदवार मानसिंह की हत्या के बाद उनकी सरकार गिर गई; बाद में वे बिहार व हरियाणा के राज्यपाल रहे।
⏱️हीरालाल देवपुरा
- मानसिंह हत्याकांड के कारण शिवचरण माथुर के त्यागपत्र के बाद कार्यवाहक राज्यपाल जगदीश शरण वर्मा द्वारा शपथ दिलाए गए देवपुरा (23.02.1985-10.03.1985) मात्र 16 दिनों के लिए मुख्यमंत्री रहे — राज्य के इतिहास में सबसे छोटा कार्यकाल।
- वे राज्य विधानसभा अध्यक्ष भी रहे और दूसरे राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष भी रहे।
💧अशोक गहलोत
- जोधपुर में जन्मे अशोक गहलोत तीन बार मुख्यमंत्री रहे (1998-2003, 2008-13, 2018-23) — व्यक्तियों की गिनती में राज्य के 12वें मुख्यमंत्री और सुखाड़िया के बाद सर्वाधिक अवधि तक मुख्यमंत्री पद पर कार्य करने वाले दूसरे व्यक्ति; उनके प्रथम कार्यकाल में कांग्रेस ने 11वीं विधानसभा चुनाव में तत्कालीन रिकॉर्ड 153 सीटें जीतीं, और लोकसभा सदस्य रहते हुए ही कार्यवाहक राज्यपाल एन.एल. टिबरेवाल ने उन्हें शपथ दिलाई।
- वे तीन बार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे और इंदिरा गांधी, राजीव गांधी व नरसिम्हा राव की सरकारों में केंद्रीय मंत्री भी रहे; उनके कार्यकाल में राजस्थान में सदी का भयंकर अकाल पड़ा, जिस पर उन्होंने 'पानी बचाओ, बिजली बचाओ, सबको पढ़ाओ' का नारा दिया।
👑वसुंधरा राजे
- 8 मार्च (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस) 1953 को मुंबई में ग्वालियर के पूर्व राजघराने में जन्मीं वसुंधरा राजे झालावाड़ से रिकॉर्ड पाँच बार लोकसभा सदस्य (1989-2003) चुनी गईं, इसके बाद वे राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनीं और दो बार यह पद संभाला (2003-08, 2013-18); वे भाजपा की राजस्थान इकाई की अध्यक्ष भी रहीं और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहीं।
- उनके प्रथम कार्यकाल में राज्य को पहली बार भाजपा की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार मिली; 14वीं विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने रिकॉर्ड 163 सीटें जीतीं, और अपने दोनों कार्यकालों के बीच वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहीं।
🆕भजनलाल शर्मा
- भरतपुर जिले की नदबई तहसील के अटारी गाँव के निवासी शर्मा ने सांगानेर (जयपुर) सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस प्रत्याशी पुष्पेन्द्र भारद्वाज को 48,081 मतों से हराया।
- व्यक्तियों की गिनती में वे राज्य के 14वें मुख्यमंत्री हैं, और भैरोंसिंह शेखावत व वसुंधरा राजे के बाद राज्य के तीसरे गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री हैं।
🤝राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री
- टीकाराम पालीवाल राज्य के प्रथम उप-मुख्यमंत्री (1952-54, मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास के काल में) रहे; हरिशंकर भाभड़ा सर्वाधिक समय (1993-98, मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के काल में) तक उप-मुख्यमंत्री रहे और विधानसभा अध्यक्ष भी रहे।
- कमला बेनीवाल राज्य की प्रथम महिला उप-मुख्यमंत्री (2003, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के काल में) बनीं और बाद में त्रिपुरा, गुजरात व मिजोरम की राज्यपाल रहीं; बनवारी लाल बैरवा (2002-03, गहलोत के ही काल में) पूर्व में लोकसभा सदस्य भी रहे थे।
- सचिन पायलट केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रह चुकने के बाद गहलोत के काल में उप-मुख्यमंत्री (2018-20) रहे; जयपुर राजघराने के ब्रिगेडियर भवानी सिंह की पुत्री व राजसमंद से पूर्व लोकसभा सदस्य दीया कुमारी विद्याधर नगर (जयपुर) सीट रिकॉर्ड 71,368 मतों से जीतकर राज्य की दूसरी महिला उप-मुख्यमंत्री बनीं।
- दूदू सीट से कांग्रेस प्रत्याशी बाबूलाल नागर को हराने वाले डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने 15 दिसंबर 2023 को उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
✅विश्वास प्रस्ताव
- अगस्त 2021 तक राजस्थान विधानसभा में मुख्यमंत्री या किसी मंत्री द्वारा कुल पाँच विश्वास प्रस्ताव लाए जा चुके हैं — इनमें से दो अकेले 9वीं विधानसभा में, दोनों भैरोंसिंह शेखावत (1990) से जुड़े रहे और ध्वनिमत से पारित हुए।
- शेखावत ने 10वीं विधानसभा (1993) में भी 108 मतों से विश्वास मत जीता; अशोक गहलोत की सरकार ने 13वीं विधानसभा (2009) व 15वीं विधानसभा (2020, मंत्री शांति धारीवाल द्वारा प्रस्तुत) दोनों में ध्वनिमत से विश्वास प्रस्ताव जीता।
⚠️अविश्वास प्रस्ताव — प्रक्रिया व रिकॉर्ड
- सदन का कोई भी सदस्य मंत्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रातः 10 बजे तक विधानसभा महासचिव को लिखित सूचना देकर ला सकता है; नियमानुकूल पाए जाने पर अध्यक्ष उसे सदन में पढ़ता है और प्रस्तुत करने की अनुमति के लिए कम से कम 50 सदस्यों के हाथ उठने चाहिए, जिसके बाद 10 दिन के भीतर उस पर विचार होता है।
- राजस्थान विधानसभा में सबसे पहला अविश्वास प्रस्ताव मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल के विरुद्ध (अक्टूबर 1952) लाया गया था; राज्य के इतिहास में कुल छह अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध ऐसे प्रस्ताव आए, जिनमें मोहनलाल सुखाड़िया को सबसे ज्यादा — कुल चार बार — इसका सामना करना पड़ा, और कोई भी प्रस्ताव सफल नहीं हुआ।
🥇सत्तारूढ़ दल के नेतापद हेतु पहला मुकाबला
- 6 नवम्बर 1954 को राजस्थान में आजादी के बाद देश में कहीं भी सत्तारूढ़ दल के विधायक दल के नेता पद हेतु हुआ पहला मुकाबला हुआ — जिसमें युवा कांग्रेस नेता मोहनलाल सुखाड़िया ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास को पराजित किया।
🔀मुख्यमंत्री से राज्यपाल तक
- राज्य के केवल सात मुख्यमंत्री कभी किसी राज्य के राज्यपाल नहीं बने: टीकाराम पालीवाल, जयनारायण व्यास, बरकतुल्ला खाँ (जिनका पद पर रहते निधन हुआ), भैरोंसिंह शेखावत (जो इसके बजाय उपराष्ट्रपति बने), अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे व भजनलाल शर्मा।
- इनके अतिरिक्त राज्य के बाकी सभी मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के बाद किसी न किसी राज्य के राज्यपाल भी बने; हरिदेव जोशी इस सूची में अकेले ऐसे हैं जो मुख्यमंत्री रहने के बाद राज्यपाल नियुक्त हुए और फिर दोबारा मुख्यमंत्री बने।