राज्यपाल
The Governor
जानिए राज्यपाल का पद राजस्थान में कैसे अस्तित्व में आया, उसकी नियुक्ति-कार्यकाल की शर्तें क्या हैं, उसकी पाँच तरह की शक्तियाँ कैसे काम करती हैं, और राज्य के 39 राज्यपालों से जुड़े दिलचस्प तथ्य।
राज्य कार्यपालिका व राज्यपाल का परिचय
भारत की संसदीय व्यवस्था में हर राज्य की सरकार तीन अंगों से मिलकर बनती है, और इसके सबसे ऊपर संवैधानिक प्रधान के रूप में बैठता है राज्यपाल — जानिए यह पद राजस्थान में कैसे अस्तित्व में आया और इसे कौन, कैसे और किन शर्तों पर धारण करता है।
📜संवैधानिक ढांचा
- संसदीय व्यवस्था के तहत राज्य सरकार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — तीन अंगों से मिलकर बनती है, और कानून बनाने की अंतिम शक्ति राज्य विधानसभा के पास होती है, जबकि संविधान के भाग VI (अनुच्छेद 153 से 167) में राज्य कार्यपालिका से जुड़े सभी प्रावधान दर्ज हैं।
- राज्यपाल राज्य कार्यपालिका का संवैधानिक प्रधान है, पर वास्तविक शासन मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् चलाते हैं, जो सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है; इसी ढांचे में महाधिवक्ता राज्य का सबसे बड़ा विधिक अधिकारी होता है।
🕰️पद का उदय: राजप्रमुख से राज्यपाल तक
- रियासतों के विलय के बाद, वृहत राजस्थान के चतुर्थ चरण में 30 मार्च 1949 को राज्य कार्यपालिका के मुखिया हेतु राजप्रमुख और महाराजप्रमुख नाम के पद बनाए गए; मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह राजस्थान के पहले और एकमात्र महाराजप्रमुख बने।
- जयपुर के भूतपूर्व महाराजा सवाई मानसिंह-II राज्य के पहले और एकमात्र राजप्रमुख रहे और 1 नवम्बर 1956 तक इस पद पर बने रहे; उसी दिन राज्य के सातवें व अंतिम पुनर्गठन के साथ राजप्रमुख का पद हटाकर राज्यपाल का पद स्थापित किया गया।
- सरदार गुरुमुख निहालसिंह राजस्थान के पहले राज्यपाल बने, और जैसे राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति देश का प्रधान होता है, वैसे ही राज्य स्तर पर राज्यपाल संवैधानिक व कार्यकारी प्रधान की भूमिका निभाता है, जिसके नाम से सरकार के सभी काम होते हैं।
🖋️नियुक्ति व पात्रता
- अनुच्छेद 155 के अनुसार राष्ट्रपति, केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् की अनुशंसा पर मुहरबंद वारंट के जरिए राज्यपाल की नियुक्ति करता है, जिसे शपथ-ग्रहण से पहले राज्य का मुख्य सचिव पढ़कर सुनाता है; यह नियुक्ति-प्रक्रिया मूलतः कनाडा के संविधान से ली गई है।
- व्यवहार में केन्द्र सरकार ही नियुक्ति करती दिखती है, फिर भी उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल का पद एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है, केन्द्र के अधीन नहीं।
- अनुच्छेद 157 के तहत राज्यपाल का भारतीय नागरिक होना और 35 वर्ष की आयु पूरी करना अनिवार्य है; अनुच्छेद 158(1) यह भी कहता है कि वह संसद या किसी राज्य विधायिका का सदस्य नहीं हो सकता — यदि हो, तो पद ग्रहण करते ही उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त मानी जाती है। वह किसी भी सरकार के अधीन लाभ के पद पर भी नहीं रह सकता।
⏳कार्यकाल, शपथ, त्यागपत्र व निष्कासन
- अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और सामान्यतः उसका कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है; राष्ट्रपति उसे समय-पूर्व हटा सकता है, दूसरे राज्य में स्थानांतरित कर सकता है, और कार्यकाल पूरा होने पर भी वह नए राज्यपाल के पदभार संभालने तक बना रह सकता है।
- अनुच्छेद 159 में तय प्रारूप के अनुसार राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल को पद की शपथ दिलाता है; उल्लेखनीय है कि संविधान में राज्यपाल को हटाने के कोई निश्चित आधार नहीं दिए गए हैं — यह पूरी तरह केन्द्र सरकार व राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है।
- अनुच्छेद 156(2) के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति को संबोधित व हस्ताक्षरित त्यागपत्र भेजकर स्वयं पद छोड़ सकता है।
💰वेतन-भत्ते व विशेषाधिकार
- राज्यपाल के वेतन-भत्तों का उल्लेख संविधान की दूसरी अनुसूची में है और यह राज्य की संचित निधि से दिया जाता है; वर्तमान में यह वेतन 3.50 लाख रुपए प्रतिमाह है और कार्यकाल के दौरान इसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती। एक ही व्यक्ति एक से अधिक राज्यों का राज्यपाल हो तो वेतन राष्ट्रपति द्वारा तय अनुपात में उन राज्यों के बीच बंट जाता है। इसके अलावा राज्यपाल को सरकारी आवास का निःशुल्क उपयोग भी मिलता है।
- अनुच्छेद 361(1) के तहत राज्यपाल अपने पदीय कार्यों के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होता, और कार्यकाल के दौरान उसके विरुद्ध कोई फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता; अनुच्छेद 361(3) उसकी गिरफ्तारी या कारावास पर भी रोक लगाता है। यहाँ तक कि पद ग्रहण से पहले के किसी कार्य के लिए भी दीवानी मुकदमा उसके विरुद्ध केवल 2 माह की पूर्व सूचना के बाद ही दायर हो सकता है।
राज्यपाल की शक्तियाँ
राज्य स्तर पर राज्यपाल की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसी केन्द्र में राष्ट्रपति की — उसकी शक्तियाँ कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय, न्यायिक और स्वविवेकीय, पाँच बड़ी श्रेणियों में फैली हैं।
🗂️शक्तियों का वर्गीकरण
- सैनिक, कूटनीतिक और आपातकालीन मामलों को छोड़कर राज्यपाल की शक्तियाँ लगभग राष्ट्रपति जैसी ही हैं; अनुच्छेद 163 के अनुसार ये शक्तियाँ दो हिस्सों में बंटती हैं — जो मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद् की सलाह पर प्रयोग होती हैं, और जो राज्यपाल अपने स्वविवेक से करता है।
- समग्र रूप से राज्यपाल की शक्तियों को पाँच श्रेणियों में बांटा जाता है: कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय, न्यायिक और स्वविवेकीय।
🏢कार्यपालिका शक्तियाँ
- अनुच्छेद 154 के तहत राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है और अनुच्छेद 166 के अनुसार सरकार का हर काम उसी के नाम से होता है; अनुच्छेद 164 के तहत वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह पर बाकी मंत्रियों को नियुक्त कर, उन्हें पद व गोपनीयता की शपथ दिलाकर विभाग बांटता है।
- आमतौर पर वह सदन के सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री बनने का न्योता देता है और तय समय में विश्वासमत साबित करने को कहता है; स्पष्ट बहुमत न हो तो वह अपने विवेक का इस्तेमाल करता है। मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्री उसके प्रसादपर्यंत ही पद पर रहते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर वह उन्हें हटा भी सकता है।
- राज्यपाल राज्य के महाधिवक्ता, लोकायुक्त (राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम, 1973 के तहत, जिसे वह हटा भी सकता है), राज्य मानवाधिकार आयोग तथा अनुच्छेद 316 के तहत राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति करता है — हालांकि लोक सेवा आयोग व मानवाधिकार आयोग के पदाधिकारियों को हटाने की शक्ति सिर्फ राष्ट्रपति के पास है।
- वह राज्य के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति होकर उनके कुलपतियों की नियुक्ति करता है, राज्य निर्वाचन आयुक्त व राज्य वित्त आयोग गठित करता है, मुख्यमंत्री से प्रशासन व प्रस्तावित विधेयकों की जानकारी मांग सकता है, और संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति को प्रतिवेदन भेजकर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन का रास्ता खोल सकता है — तब वह स्वयं केन्द्र के अभिकर्ता के रूप में प्रशासन चलाता है।
📜विधायी शक्तियाँ
- अनुच्छेद 168 के तहत राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग है; वह विधानमंडल का सत्र बुला सकता है, सत्रावसान कर सकता है और विधानसभा को भंग कर सकता है (अनु. 174), हर साल पहले सत्र और चुनाव बाद पहले सत्र को संबोधित करता है (अनु. 176), तथा विधान परिषद् के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है (अनु. 171)।
- अनुच्छेद 200 के अनुसार विधानमंडल से पारित कोई विधेयक कानून तभी बनता है जब राज्यपाल उस पर हस्ताक्षर करे; वह विधेयक को स्वीकृति दे सकता है, रोक सकता है, धन विधेयक को छोड़कर पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है, या राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है — पर लौटाए गए विधेयक को विधानमंडल दोबारा पारित कर दे तो हस्ताक्षर करना उसके लिए अनिवार्य हो जाता है।
- सत्रावसान की अवधि में जरूरत पड़ने पर राज्यपाल अनुच्छेद 213 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है, जो विधानमंडल के बनाए कानून जितना ही प्रभावी होता है; ऐसा अध्यादेश विधानमंडल के दोबारा बैठने से छह सप्ताह तक वैध रहता है, स्वीकृत न होने पर स्वतः खत्म हो जाता है और स्वीकृत होने पर स्थायी कानून बन जाता है।
- यदि किसी सदन में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद खाली हों तो राज्यपाल कार्यवाही चलाने के लिए किसी अन्य सदस्य को नियुक्त कर सकता है (अनु. 180); सदस्यों की निरर्हता के मामलों में वह चुनाव आयोग से परामर्श कर फैसला करता है (अनु. 192(2)); और वह लोक सेवा आयोग, वित्त आयोग व नियंत्रक-महालेखा परीक्षक की रिपोर्टें सदन में रखवाता है — पर चालू सत्र का स्थगन करने का अधिकार उसे नहीं, यह सदन के पीठासीन अधिकारी के पास होता है।
💵वित्तीय शक्तियाँ
- राज्यपाल विधानमंडल के सामने राज्य का वार्षिक बजट प्रस्तुत करवाता है और जब तक वह पारित नहीं हो जाता, आकस्मिकता निधि से जरूरी खर्च मंजूर कर सकता है; राज्य की संचित निधि उसी के अधिकार क्षेत्र में रहती है।
- अनुच्छेद 207 के तहत कोई धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुशंसा के बिना विधानसभा में पेश नहीं हो सकता, न ही उसकी सिफारिश के बिना किसी अनुदान की मांग हो सकती है; वह पंचायतों व नगरपालिकाओं की वित्तीय समीक्षा के लिए हर पाँच साल में एक राज्य वित्त आयोग भी गठित करता है।
🧑⚖️न्यायिक शक्तियाँ
- अनुच्छेद 161 के तहत राज्य सूची के विषयों में दंडित व्यक्ति की सजा राज्यपाल निलंबित, स्थगित या कम कर सकता है और क्षमा भी दे सकता है, पर मृत्युदंड को पूरी तरह माफ करने की शक्ति सिर्फ राष्ट्रपति के पास है; अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति उससे परामर्श लेता है, और अनुच्छेद 233 के तहत वह उच्च न्यायालय की सलाह से जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति व पदोन्नति तय करता है।
🧭स्वविवेकीय शक्तियाँ
- अनुच्छेद 163(1) के तहत राज्यपाल को कुछ मामलों में मंत्रिपरिषद् से परामर्श लिए बिना, अपने विवेक से निर्णय लेने की शक्ति मिली है; अनुच्छेद 163(2) यह भी कहता है कि किसी मामले के विवेकाधिकार में आने या न आने का फैसला खुद राज्यपाल करता है और इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इन शक्तियों का इस्तेमाल करते समय वह वस्तुतः केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि जैसा काम करता है, और इनके दो रूप हैं — संविधान द्वारा सीधे दी गई और परिस्थितिवश मिली।
- विधेयक असंवैधानिक हो, व्यापक राष्ट्रीय हित के विरुद्ध हो, नीति निदेशक तत्वों से टकराए या उच्च न्यायालयों की स्थिति को खतरे में डाले, तो राज्यपाल उसे स्वविवेक से राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है; इसी तरह संवैधानिक तंत्र विफल होने या उसकी आशंका होने पर वह स्वविवेक से राष्ट्रपति शासन (अनु. 356) की सिफारिश कर सकता है।
- विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत न होने पर वह अपने विवेक से उसे मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकता है जिसे उसकी राय में बहुमत सदस्यों का समर्थन मिल सकता है; मंत्रिपरिषद् को भंग करने का फैसला भी वह स्वविवेक से लेता है — जैसे एकता-सुरक्षा को खतरा हो, दल-बदल से बहुमत टूट जाए, अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए, या मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार में दोषी पाया जाए।
🎖️पदेन भूमिकाएँ व केन्द्र के अभिकर्ता के रूप में
- राज्यपाल पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र (उदयपुर), रेडक्रॉस सोसाइटी की राजस्थान शाखा, राज्य सैनिक बोर्ड और पूर्व सैनिकों की एकीकृत निधि प्रबंध समिति का पदेन अध्यक्ष होता है, स्काउट एवं गाइड्स राजस्थान का संरक्षक होता है, और राज्य-वित्तपोषित विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति भी।
- केन्द्र के अभिकर्ता के रूप में राज्यपाल अनुच्छेद 160 के तहत उन आकस्मिक स्थितियों में काम करता है जहाँ संविधान मौन है, अनुच्छेद 167 के तहत मंत्रिमंडल से सूचना ले सकता है, अनुच्छेद 200 के तहत विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेज सकता है, और अनुच्छेद 356 के तहत संवैधानिक तंत्र की विफलता की रिपोर्ट भेज सकता है — इसीलिए वह एक साथ राज्य का संवैधानिक प्रधान और केन्द्र-राज्य के बीच की कड़ी दोनों होता है।
- उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) की पहली राज्यपाल, स्वतंत्रता सेनानी व कवयित्री सरोजिनी नायडू (1947-49) ने इस दोहरी भूमिका पर मशहूर टिप्पणी की थी कि 'राज्यपाल उस पक्षी जैसा है जो सोने के पिंजरे में बंद है'; व्यवहार में राज्यपाल एक बुद्धिमान परामर्शदाता व राज्य के संरक्षक की भूमिका निभाता है, आमतौर पर मंत्रिमंडल की सलाह मानता है, पर जल्दबाजी रोकने को विधेयक पुनर्विचार हेतु भेज सकता है — इसीलिए उसे सक्रिय राजनीति से दूर रहना चाहिए।
राष्ट्रपति व राज्यपाल की तुलना
राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियाँ एक जैसी दिखती ज़रूर हैं, पर बारीकी से देखने पर विधेयकों पर वीटो और क्षमादान के मामले में दोनों के अधिकार-क्षेत्र में साफ फर्क नज़र आता है।
📝विधेयकों पर वीटो शक्ति
- संसद से पारित सामान्य विधेयक राष्ट्रपति के पास पहुंचने पर उसके सामने तीन विकल्प होते हैं — स्वीकृति देना, रोकना, या पुनर्विचार हेतु संसद को लौटाना; संसद उसे दोबारा पारित कर भेज दे तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही पड़ती है और विधेयक अधिनियम बन जाता है।
- राज्य विधानमंडल से पारित विधेयक राज्यपाल के पास पहुंचने पर उसके सामने चार विकल्प होते हैं — स्वीकृति, अस्वीकृति, पुनर्विचार हेतु लौटाना, या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना; लौटाया गया विधेयक दोबारा पारित होकर आए तो उसे भी स्वीकृति देनी ही पड़ती है, पर एक बार विधेयक राष्ट्रपति के पास आरक्षित कर दिया जाए तो उसे अधिनियम बनाने में राज्यपाल की आगे कोई भूमिका नहीं रह जाती।
- जब राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखता है, तब भी राष्ट्रपति के पास स्वीकृति, अस्वीकृति या पुनर्विचार हेतु लौटाने के तीन विकल्प होते हैं — पर इस स्थिति में विधानमंडल द्वारा दोबारा पारित किए जाने पर भी राष्ट्रपति स्वीकृति देने के लिए बाध्य नहीं होता, यही राष्ट्रपति व राज्यपाल की वीटो शक्ति में मूल अंतर है।
⚖️क्षमादान शक्ति की तुलना
- राष्ट्रपति संघीय विधि के तहत दोषी व्यक्ति के दंड को पूरी तरह क्षमा, कम या स्थगित कर सकता है, मृत्युदंड को भी पूरी तरह माफ कर सकता है, और कोर्ट मार्शल (सैन्य न्यायालय) की सजा को भी माफ, कम या परिवर्तित करने की शक्ति रखता है।
- राज्यपाल राज्य विधि के तहत दोषी व्यक्ति को क्षमा दे सकता है या उसकी सजा कम-स्थगित कर सकता है, पर मृत्युदंड को पूरी तरह माफ नहीं कर सकता — वह उसे केवल निलंबित, परिहृत या लघुकृत कर सकता है — और कोर्ट मार्शल की सजा पर उसे कोई अधिकार ही प्राप्त नहीं है।
राजस्थान के राज्यपाल — इतिहास व तथ्य
राजस्थान के राजभवन में अब तक कई रंगों वाले व्यक्तित्व राज्यपाल की कुर्सी पर बैठ चुके हैं — पूर्व मुख्यमंत्री, वायुसेना अध्यक्ष, न्यायाधीश और स्वतंत्रता सेनानी तक — साथ ही राज्य में चार बार राष्ट्रपति शासन भी लग चुका है।
👤उल्लेखनीय राज्यपाल
- सरदार गुरुमुख निहालसिंह (1956-1962) राजस्थान के पहले और सबसे लंबे कार्यकाल वाले राज्यपाल रहे; वे दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री और दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके थे।
- श्री रघुकुल तिलक (1977-81) से जुड़ा 1979 का मामला 'राज्यपाल रघुकुल तिलक बनाम हरगोविन्द पंत' आज भी याद किया जाता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने कहा कि राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य को भी राज्यपाल बनाया जा सकता है और राज्यपाल का पद केन्द्र के अधीन नहीं, पूर्णतः स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है; राष्ट्रपति ने 8 अगस्त 1981 को उन्हें पद से हटा दिया था।
- श्रीमती प्रतिभा पाटिल (2004-07) राजस्थान की पहली महिला राज्यपाल बनीं, और उन्होंने राष्ट्रपति चुने जाने पर इस्तीफा देकर भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का इतिहास रचा।
- वर्तमान में 31 जुलाई 2024 से श्री हरिभाऊ किसनराव बागड़े राजस्थान के राज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं।
🕊️महिला राज्यपाल व पद पर मृत्यु
- राजस्थान की राज्यपाल रह चुकीं तीन महिलाएँ हैं — श्रीमती प्रतिभा पाटिल, श्रीमती प्रभाराव और श्रीमती मार्गरेट अल्वा; राष्ट्रीय स्तर पर देश की पहली महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू और पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी थीं।
- चार राज्यपालों की पद पर रहते हुए मृत्यु हुई — श्री दरबारा सिंह (1998), श्री निर्मलचन्द जैन (2003), श्री शैलेन्द्र कुमार सिंह (2009) और श्रीमती प्रभाराव (2010)।
🗄️अतिरिक्त प्रभार व राज्यपाल सचिवालय
- कई मौकों पर पड़ोसी राज्यों के राज्यपालों को राजस्थान का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया, जैसे गुजरात के राज्यपाल स्वरूप सिंह (1991-92) व कैलाशपति मिश्रा (2003-04), हरियाणा के धनिक लाल मंडल (1993) व ए.आर. किदवई (2007), पंजाब के शिवराज पाटिल (2010-12), और उत्तर प्रदेश के टी.वी. राजेश्वर (2004) व रामनाइक (2014)।
- राज्यपाल को प्रशासनिक सहयोग देने के लिए राजस्थान में एक राज्यपाल सचिवालय काम करता है, जिसका प्रमुख राज्यपाल का सचिव होता है — आमतौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक वरिष्ठ अधिकारी।
🏰प्रोटोकॉल व निवास
- राज्यपाल श्री कल्याण सिंह ने 2018 में गार्ड ऑफ ऑनर की परंपरा समाप्त करने के निर्देश दिए थे, जबकि राज्यपाल रामनाइक की पहल पर 2014 में एक नया प्रोटोकॉल लागू हुआ जिसके तहत राज्यपाल को हिन्दी में 'माननीय राज्यपाल'/'राज्यपाल महोदय' और अंग्रेजी में 'Honourable Governor' कहकर संबोधित किया जाता है।
- राजस्थान के राज्यपाल का आधिकारिक निवास सिविल लाइन्स, जयपुर में स्थित राजभवन है।
🚨राजस्थान में राष्ट्रपति शासन के चार अवसर
- पहली बार राष्ट्रपति शासन 13 मार्च से 26 अप्रैल 1967 तक लगा, जब चुनावों में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने से सरकार नहीं बन पाई थी; उस समय मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया थे, और राज्यपाल डॉ. सम्पूर्णानंद व सरदार हुकुम सिंह रहे।
- दूसरी बार 30 अप्रैल से 22 जून 1977 तक, केन्द्र में जनता पार्टी सरकार बनने के बाद नए विधानसभा चुनाव कराने हेतु सदन भंग कर दिया गया था; उस समय मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे, और राज्यपाल वेदपाल त्यागी व रघुकुल तिलक रहे।
- तीसरी बार 17 फरवरी से 5 जून 1980 तक, जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में केन्द्र में कांग्रेस लौटी और गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारें बर्खास्त कर नए चुनाव कराए गए; तब मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत थे, और दोनों बार राज्यपाल रघुकुल तिलक ही रहे।
- चौथी और अब तक की आखिरी बार 15 दिसंबर 1992 से 3 दिसंबर 1993 तक, 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों के चलते भैरोंसिंह शेखावत सरकार को बर्खास्त किया गया; उस दौरान राज्यपाल एम. चेन्नारेड्डी व बलिराम भगत रहे।
सुधार आयोगों की सिफारिशें
समय-समय पर बनी अलग-अलग समितियों और आयोगों ने राज्यपाल की नियुक्ति, कार्यकाल और स्वविवेकीय शक्तियों को लेकर कई अहम सुझाव दिए हैं, जो केन्द्र-राज्य संबंधों की बहस का अहम हिस्सा रहे हैं।
🗳️प्रशासनिक सुधार आयोग व राजमन्नार समिति
- प्रशासनिक सुधार आयोग (1966) ने सुझाया कि राज्यपाल बनने वाले व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन व प्रशासन का लंबा अनुभव हो, उसे दोबारा नियुक्ति के योग्य न माना जाए, और स्वविवेकीय शक्तियों के इस्तेमाल पर राष्ट्रपति ज़रूरी दिशा-निर्देश जारी करे।
- तमिलनाडु की राजमन्नार समिति (1970) ने कहा कि राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य सरकार से विचार-विमर्श के बाद ही होनी चाहिए, और राष्ट्रपति राज्यपालों को यह भी निर्देशित करे कि वे एक जैसी राजनीतिक परिस्थितियों में एक जैसे फैसले लें।
🏛️सरकारिया आयोग (1983)
- आर.एस. सरकारिया आयोग (1983) ने कहा कि राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री की अनौपचारिक सहमति से हो, वह सक्रिय राजनीति से जुड़ा व्यक्ति न हो — विशेषकर केन्द्र के सत्तारूढ़ दल से तो कदापि नहीं — और सामाजिक-प्रशासनिक साख वाला व्यक्ति हो।
- आयोग ने राज्यपाल को पांच वर्ष के निश्चित कार्यकाल पर बिना बीच में स्थानांतरण के नियुक्त करने, कार्यकाल पूरा होने के बाद राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के अलावा किसी अन्य पद पर नियुक्त न करने, तथा राज्यों में राष्ट्रपति शासन को अंतिम विकल्प के रूप में ही लागू करने की सिफारिश की।
📚पुंछी आयोग व वेंकटचेलैया आयोग
- पुंछी आयोग (2007) ने राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित करने, उसे हटाने के लिए राज्य विधानसभा में महाभियोग जैसी प्रक्रिया अपनाने, नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से बातचीत करने, राज्यपालों को विश्वविद्यालयों का चांसलर न बनाने, और उसे पिछले दो साल से सक्रिय राजनीति से दूर व्यक्ति बनाने की सिफारिश की।
- पुंछी आयोग ने संविधान से 'राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत' वाक्यांश हटाने, चेलैया समिति के सुझावों को स्वीकार करने, तथा स्वविवेकीय शक्तियों को सीमित कर राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित विधेयकों पर चार महीने में फैसला लेने की भी अनुशंसा की।
- वेंकटचेलैया आयोग (2002) ने कहा कि राज्यपालों को सामान्यतः अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करने दिया जाए, समय-पूर्व हटाना ज़रूरी हो तो यह केवल संबंधित मुख्यमंत्री की सलाह पर हो, और नियुक्ति प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, उपराष्ट्रपति व राज्य के मुख्यमंत्री वाली एक समिति के जरिए हो।