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राजस्थान GK

आर्थिक नियोजन

Economic Planning

भारत में योजना आयोग से नीति आयोग तक की यात्रा और राजस्थान व देश की पंचवर्षीय योजनाओं की पूरी कहानी — संस्थाओं, लक्ष्यों और उपलब्धियों के साथ।

23 टॉपिक43 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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नियोजन की उत्पत्ति व संस्थाएँ

Origins & Institutions of Planning

भारत में नियोजित विकास की जड़ें कैसे पड़ीं — प्रारम्भिक निजी खाकों से लेकर आज भी राज्य व राष्ट्रीय निवेश को दिशा देने वाले तंत्र तक की कहानी।

📜स्वतंत्रता-पूर्व नियोजन के प्रयास

  • भारत की पहली आधिकारिक पंचवर्षीय योजना से पहले ही स्वतंत्रता-पूर्व काल में कई विचारकों और राजनीतिक समूहों ने नियोजन के खाके तैयार कर लिए थे।
  • इंजीनियर-राजनेता सर एम. विश्वेश्वरैया ने 1934 में अपनी पुस्तक 'प्लांड इकोनॉमी फॉर इंडिया' से इसकी शुरुआत की, जिसे देश में आर्थिक नियोजन की दिशा में पहला ठोस कदम माना जाता है।
  • 1944 में मुम्बई के आठ प्रमुख उद्योगपतियों ने मिलकर 15-सूत्रीय बॉम्बे प्लान प्रस्तुत किया, वहीं उसी वर्ष महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर श्रीमन्नारायण ने गांधीवादी योजना तैयार की।
  • जन योजना (1945) भारतीय श्रम संघ के एम.एन. राय ने बनाई, और स्वतंत्रता के बाद जनवरी 1950 में जयप्रकाश नारायण ने सर्वोदय योजना प्रस्तुत की, जिसके कुछ अंश सरकार ने बाद में अपनाए।

🏢योजना आयोग

  • योजनाओं के निर्माण और उनकी प्रगति के आकलन हेतु केन्द्र सरकार ने एक मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव के जरिये राष्ट्रीय स्तर पर योजना आयोग की स्थापना की।
  • इसका गठन 15 मार्च, 1950 को 1946 में बनी के.सी. नियोगी समिति की सिफारिश पर हुआ; चूँकि यह संविधान से नहीं बल्कि एक मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव से बना था, इसलिए यह एक गैर-संवैधानिक और विशुद्ध सलाहकारी निकाय था।
  • केन्द्रीय मंत्रिमंडल के छह सदस्य इसके पदेन सदस्य होते थे और एक सदस्य-सचिव भी होता था; यह एक प्रकार का स्वायत्त निकाय था जिसे कार्यकारी शक्तियाँ भी प्राप्त थीं।
  • प्रधानमंत्री ही इसके पदेन अध्यक्ष होते थे — पं. जवाहरलाल नेहरू प्रथम अध्यक्ष और गुलजारीलाल नंदा प्रथम उपाध्यक्ष रहे; 1 जनवरी, 2015 को जब नीति आयोग ने इसका स्थान लिया, तब इसके अंतिम अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे।

🤝राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC)

  • के.सी. नियोगी समिति की ही सिफारिश पर राज्यों और योजना आयोग के बीच सहयोग बढ़ाने हेतु 6 अगस्त, 1952 को एक मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव द्वारा राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन किया गया।
  • योजना आयोग की तरह यह भी एक गैर-संवैधानिक निकाय है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं; इसके पदेन सदस्यों में केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/प्रशासक तथा योजना आयोग (अब नीति आयोग) के सभी सदस्य शामिल होते हैं।

🔄पंचवर्षीय योजना कैसे बनती थी

  • योजना निर्माण की शुरुआत परंपरागत रूप से योजना आयोग (बाद में नीति आयोग) द्वारा बनाए गए कार्यकारी समूहों से होती थी, जो राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों की सरकारों से अनुमानित प्रस्ताव जुटाते थे।
  • इन क्षेत्रीय इनपुट के आधार पर आयोग पंचवर्षीय योजना का एक संक्षिप्त मैमोरेण्डम तैयार कर केन्द्रीय मंत्रिपरिषद व NDC के सामने रखता था, और स्वीकृति मिलने पर संसद, राज्यों, विश्वविद्यालयों व शोध संस्थाओं की टिप्पणी हेतु योजना का प्रारूप (ड्राफ्ट आउटलाइन) प्रकाशित करता था।
  • इस परामर्श से मिली टिप्पणियों के आधार पर योजना का अंतिम रूप तैयार होता था, जिसे मंत्रिपरिषद व NDC के अंतिम अनुमोदन हेतु रखा जाता था — इस पर NDC की मुहर लगते ही यह 'अंतिम योजना' बन जाती थी — इसके बाद प्रधानमंत्री इसे संसद में रखते थे, जिसके अनुमोदन के बाद यह 'सरकारी योजना' के रूप में प्रकाशित होती थी।
  • भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का सिलसिला 12वीं योजना (2012-17) के साथ प्रभावी रूप से समाप्त हो गया, जो 1 अप्रैल, 2012 से 31 मार्च, 2017 तक चली — यह इस तरह की अंतिम योजना थी।

🏦राज्य स्तर का नियोजन तंत्र

  • राज्य स्तर पर योजनाओं के निर्माण, नियंत्रण और मूल्यांकन का काम राज्य आयोजना विभाग का होता है, जिसकी सहायता मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाला राज्य आयोजना बोर्ड करता है।
  • मार्च 2015 में राजस्थान ने अपने राज्य आयोजना बोर्ड को भंग कर उसकी जगह मुख्यमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया।
  • राज्य सरकार ने बाद में एक आदेश द्वारा मुख्यमंत्री राजस्थान आर्थिक परिवर्तन सलाहकार परिषद (CMETC) का गठन किया, जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री हैं तथा जिसमें एक उपाध्यक्ष, 26 सदस्य व एक सदस्य-सचिव शामिल हैं।
  • CMETC राज्य के आर्थिक विकास की चुनौतियों — राजकोषीय प्रबंधन, उत्पादकता, रोजगार सृजन — की पहचान कर शिक्षा, स्वास्थ्य व स्वच्छता जैसी बुनियादी सेवाओं पर सलाह देती है; यह वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करती है, और इसके कार्यकारी समूहों में मनोनीत विषय-विशेषज्ञ दो वर्ष के लिए नियुक्त होते हैं।
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नीति आयोग

NITI Aayog

नीति आयोग ने छह दशक पुराने योजना आयोग की जगह कैसे ली और केन्द्र-राज्य साझा नियोजन की परिभाषा को कैसे बदला।

🔁योजना आयोग को क्यों बदला गया

  • केन्द्र की भाजपा सरकार ने एक मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव के जरिये योजना आयोग को भंग कर 1 जनवरी, 2015 से उसकी जगह नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) का गठन किया।
  • इसके गठन का उद्देश्य राष्ट्रीय आर्थिक नीति-निर्माण में राज्यों की भागीदारी बढ़ाना तथा सहयोगपूर्ण व प्रतिस्पर्धात्मक संघीय ढाँचे के जरिये केन्द्र-राज्य संबंधों को मजबूत करना था।
  • जहाँ योजना आयोग टॉप-डाउन निर्णय शैली अपनाता था, वहीं नीति आयोग ने बॉटम-अप नियोजन रणनीति अपनाई है; अपने पूर्ववर्ती की तरह यह भी एक सलाहकारी, गैर-संवैधानिक निकाय है जिसकी सलाह बाध्यकारी नहीं होती।

👤अध्यक्ष व उपाध्यक्ष

  • भारत के प्रधानमंत्री नीति आयोग के पदेन अध्यक्ष होते हैं — वर्तमान में नरेन्द्र मोदी — जबकि उपाध्यक्ष व अन्य विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति केन्द्र सरकार करती है।
  • राजस्थान मूल के अर्थशास्त्री अरविंद पानगड़िया नीति आयोग के प्रथम उपाध्यक्ष थे; मई 2026 की स्थिति के अनुसार यह पद अशोक कुमार लाहिड़ी के पास है।
  • नीति आयोग की पहली बैठक 8 फरवरी, 2015 को हुई थी।

👥स्थाई व पूर्णकालिक सदस्य

  • नीति आयोग में चार स्थाई सदस्य हैं: DRDO के पूर्व प्रमुख वी.के. सारस्वत, कृषि विशेषज्ञ प्रो. रमेश चन्द्र, डॉ. वी.के. पॉल और अरविंद विरमानी।
  • इसके पूर्णकालिक सदस्यों में पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा, अर्थशास्त्री डॉ. के.वी. राजू, डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम, एम्स दिल्ली के निदेशक डॉ. एम. श्रीनिवास, विज्ञान व प्रौद्योगिकी सचिव डॉ. अभय करांडिकर, और IISER भोपाल के वैज्ञानिक डॉ. गोवर्धन दास शामिल हैं।
  • अरुणाचल प्रदेश के निशी समुदाय की डॉ. जोराम आनिया नीति आयोग की प्रथम महिला सदस्य हैं।
  • इनके अलावा दो अंशकालिक सदस्य केन्द्र सरकार द्वारा चक्रानुक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों से नियुक्त किए जाते हैं।

🎖️पदेन व विशेष आमंत्रित सदस्य

  • प्रधानमंत्री द्वारा चार केन्द्रीय मंत्रियों को पदेन सदस्य नामित किया जाता है — वर्तमान में राजनाथ सिंह (रक्षा), अमित शाह (गृह), निर्मला सीतारमण (वित्त व कंपनी मामले) और शिवराज सिंह चौहान (कृषि, ग्रामीण विकास व पंचायती राज)।
  • इसके अलावा कई केन्द्रीय मंत्री विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल हैं, जिनमें नितिन गडकरी (सड़क परिवहन व राजमार्ग), जे.पी. नड्डा (स्वास्थ्य व रसायन-उर्वरक), एच.डी. कुमारस्वामी (भारी उद्योग व इस्पात), जीतनराम मांझी (सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग), राजीव रंजन 'ललन' सिंह (पंचायती राज, मत्स्यपालन, पशुपालन व डेयरी), वीरेन्द्र कुमार (सामाजिक न्याय व अधिकारिता), किंजरापु राममोहन नायडू (नागर विमानन), जुएल ओराम (जनजातीय कार्य), चिराग पासवान (खाद्य प्रसंस्करण उद्योग), राव इन्द्रजीत सिंह (सांख्यिकी, कार्यक्रम कार्यान्वयन व योजना) तथा अन्नपूर्णा देवी (महिला व बाल विकास) शामिल हैं।

🏫शासी परिषद व मुख्य कार्यकारी अधिकारी

  • शासी परिषद — जिसमें सभी राज्यों और विधानसभा वाले केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा शेष केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/प्रशासक शामिल हैं — मंत्रिमंडल सचिवालय की अधिसूचना द्वारा 16 फरवरी, 2015 से प्रभावी हुई, और 19 फरवरी, 2021 को इसका पुनर्गठन किया गया; यह 'सहकारी संघवाद' की भावना का प्रतीक है।
  • यह राज्यों को अंतर-क्षेत्रक, अंतर-विभागीय व संघीय मुद्दों पर चर्चा का मंच देती है ताकि राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताएँ तेजी से आगे बढ़ें; इसकी दसवीं बैठक 24 मई, 2025 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई।
  • बी.वी.आर. सुब्रमण्यम नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं।

🎯प्रमुख कार्य

  • यह राज्यों की सक्रिय भागीदारी के साथ विकास प्राथमिकताओं, क्षेत्रों व रणनीतियों का साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करता है, यह मानते हुए कि सशक्त राज्य ही सशक्त राष्ट्र बनाते हैं — इसीलिए यह राज्यों के साथ सतत, संरचित सहयोग पर बल देता है।
  • यह ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजनाएँ बनाने के तंत्र विकसित करता है, जिन्हें क्रमशः सरकार के उच्चतर स्तरों तक पहुँचाया जाता है, तथा अपने अधीन क्षेत्रों की आर्थिक रणनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को भी शामिल करता है।
  • यह समाज के उन वर्गों पर विशेष ध्यान देता है जिन्हें आर्थिक प्रगति का लाभ उचित रूप से न मिलने का जोखिम है, और दीर्घावधि रणनीतिक नीति-ढाँचे तैयार कर उनकी प्रगति व प्रभावशीलता की निगरानी करता है।
  • यह महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों और समान विचारधारा वाले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंकों, विश्वविद्यालयों व नीति-अनुसंधान संस्थाओं के बीच संवाद को भी बढ़ावा देता है।
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राजस्थान की पंचवर्षीय योजनाएँ

Rajasthan's Five Year Plans

राजस्थान ने राष्ट्रीय नियोजन ढाँचे को अपनी पंचवर्षीय योजनाओं में कैसे उतारा — एक मामूली पहली योजना से लेकर लगभग दो लाख करोड़ रुपये की बारहवीं योजना तक।

📊एक नजर में योजनाओं का आकार (1951-2007)

  • दशकों में राजस्थान की योजनाओं का आकार बेहद बढ़ा: पहली योजना (1951-56) में 64.5 करोड़ रु. (वास्तविक व्यय 54.15 करोड़ रु.) से शुरुआत हुई, फिर दूसरी योजना (105.27 करोड़ रु.), तीसरी योजना (236 करोड़ रु.) तथा 1966-69 की वार्षिक योजनाओं (स्वीकृत 132.60 करोड़ रु., व्यय 136.76 करोड़ रु.) तक यह बढ़ता गया।
  • यह वृद्धि चौथी योजना (306.21 करोड़ रु.) और पाँचवीं योजना (847.16 करोड़ रु.) तथा 1979-80 की वार्षिक योजना (स्वीकृत 275 करोड़ रु., व्यय 290.19 करोड़ रु.) से होते हुए छठी योजना में सीधे 2,025 करोड़ रु. तक जा पहुँची।
  • इसके बाद सातवीं योजना (3,000 करोड़ रु.), 1990-92 की वार्षिक योजनाएँ (2,126 करोड़ रु.), आठवीं योजना (11,500 करोड़ रु.) और नौवीं योजना (स्वीकृत 27,650 करोड़ रु., पर वास्तविक व्यय केवल 19,566.82 करोड़ रु.) से होते हुए दसवीं योजना (2002-07) में स्वीकृत आकार 31,831.75 करोड़ रु. रहा जबकि वास्तविक व्यय 33,951.21 करोड़ रु. हुआ।

🌾प्रथम से तृतीय योजना (1951-66)

  • प्रथम योजना (1951-56) में कृषि व सिंचाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई, साथ ही ऊर्जा साधनों व बुनियादी सामाजिक सेवाओं के विस्तार पर भी बल दिया गया; 2 अक्टूबर, 1952 को सामुदायिक विकास कार्यक्रम आरंभ हुआ।
  • द्वितीय योजना (1956-61) में फिर से सिंचाई व ऊर्जा पर जोर रहा; इसी दौरान 2 अक्टूबर, 1959 को नागौर में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ हुआ और जमींदारी-जागीरदारी प्रथाओं का उन्मूलन किया गया।
  • तृतीय योजना (1961-66) में फिर सिंचाई व ऊर्जा को प्राथमिकता मिली, उन्नत बीज, यांत्रिक कृषि व सिंचाई के जरिये सघन खेती को बढ़ावा दिया गया — इसी में हरित क्रांति की शुरुआत हुई — और अजमेर, जोधपुर व उदयपुर में तीन मेडिकल कॉलेज स्थापित हुए।

चतुर्थ से सप्तम योजना, बीच के अंतरालों सहित (1966-90)

  • 1965 के भारत-पाक युद्ध के कारण चौथी योजना टल गई और इसकी जगह 1966-69 में तीन वार्षिक योजनाएँ चलीं; स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि वास्तविक व्यय स्वीकृत योजना आकार से अधिक रहा, जिसका मुख्य कारण ऊर्जा पर हुआ खर्च था।
  • चतुर्थ योजना (1969-74) में क्षेत्र विकास और कमजोर वर्गों के लिए रोजगार पर बल दिया गया — 1970 में श्वेत क्रांति शुरू हुई — तथा सूखा संभाव्य क्षेत्र कार्यक्रम, डेयरी विकास और 1974 से कमांड क्षेत्र विकास कार्यक्रम शुरू किए गए; इस योजना में 7.71% की विकास दर हासिल हुई।
  • पंचम योजना (1974-79) में विकेन्द्रित नियोजन को प्राथमिकता दी गई और हर जिले में जिला उद्योग केन्द्र स्थापित हुए, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, बीस सूत्री कार्यक्रम (1975) और मरु विकास कार्यक्रम शुरू हुए; 2004-05 मूल्यों पर इस योजना में 5.34% वृद्धि दर रही।
  • मध्यावधि चुनावों के चलते छठी योजना का पहला वर्ष 1979-80 की वार्षिक योजना बन गया, जिसमें -14.21% की ऋणात्मक विकास दर दर्ज हुई; छठी योजना (1980-85) ने IRDP, NREP और बिखरी जनजातियों के लिए माडा योजना के जरिये निर्धनता उन्मूलन व ग्रामीण विकास पर ध्यान केन्द्रित किया, जिसमें 6.20% की वृद्धि दर मिली।
  • सप्तम योजना (1985-90) में भोजन, कार्य व उत्पादकता को प्राथमिकता दी गई, राज्य का लक्ष्य 8% रखा गया (जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 5% था), और वास्तव में 8.29% वृद्धि दर हासिल हुई।

🏭अष्टम से दशम योजना (1992-2007)

  • राजनीतिक अस्थिरता के कारण 1990-91 व 1991-92 में कोई नई योजना शुरू नहीं हो सकी, इसलिए दो वार्षिक योजनाएँ बनीं, जिनमें 2004-05 मूल्यों पर संयुक्त रूप से 11.16% की वृद्धि दर हासिल हुई।
  • आठवीं योजना (1992-97) में ऊर्जा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिली, यह सातवीं योजना से 283.33% बड़ी थी, इसमें 8.08% वृद्धि दर रही, अंतिम वर्ष में मूलभूत न्यूनतम सुविधा कार्यक्रम शुरू हुआ, और पहली बार मानव विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
  • नौवीं योजना (1997-2002) में सामाजिक-सामुदायिक सेवाओं व ऊर्जा को प्राथमिकता मिली, रोजगार सृजन को निर्धनता उन्मूलन का केन्द्र बनाया गया, जीवन-गुणवत्ता, रोजगार, क्षेत्रीय संतुलन व आत्मनिर्भरता पर बल दिया गया, और इसमें 4.59% वृद्धि दर हासिल हुई।
  • दसवीं योजना (2002-07) का लक्ष्य समानता आधारित सतत विकास के जरिये राज्य व राष्ट्रीय प्रतिव्यक्ति आय के अंतर को कम करना था; इसमें 8% का लक्ष्य रखा गया पर 7.17% हासिल हुआ, इसी योजना में पहली बार राज्यवार विकास दर तय की गई, सूचना प्रौद्योगिकी गाँवों तक पहुँची, जल संसाधन प्रबंधन में निजी भागीदारी को बढ़ावा मिला, तथा इसी दौरान FRBM एक्ट (2005-06) लागू हुआ और 2 फरवरी, 2006 को नरेगा शुरू हुई।

💰ग्यारहवीं योजना (2007-12)

  • राजस्थान की ग्यारहवीं योजना का आकार प्रचलित कीमतों पर 71,731.98 करोड़ रु. रखा गया — जो दसवीं योजना का 2.25 गुना था — तथा राज्य का विकास लक्ष्य 7.4% रखा गया, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 8.1% था।
  • ऊर्जा को फिर सबसे बड़ा हिस्सा मिला — 25,606.25 करोड़ रु. (35.7%) — इसके बाद सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं को 19,719.83 करोड़ रु. (27.49%) मिले; योजना का लक्ष्य गरीबी दर को 2004-05 के 22.1% से घटाकर 12.1% करना था।
  • वास्तविक व्यय 93,954.34 करोड़ रु. रहा — स्वीकृत प्रावधान से 30.98% अधिक — जिसमें ऊर्जा (40.04%) और सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं (31.35%) पर सर्वाधिक खर्च हुआ।
  • कृषि (3.5%), उद्योग (8%) और सेवा (8.9%) के लक्ष्यों के मुकाबले राजस्थान ने क्रमशः 7.41%, 7.28% और 10.09% की दर हासिल की, जिससे कुल विकास दर लक्ष्य के 7.40% के मुकाबले 8.46% रही।
  • उस दौर के राष्ट्रीय औसत — शिशु मृत्यु दर 28, मातृ मृत्यु अनुपात 100, साक्षरता 85% — की तुलना में राजस्थान में शिशु व मातृ मृत्यु दर अधिक (32 व 148) तथा साक्षरता कम (79.57%, जिसमें महिला साक्षरता मात्र 66.27%) रही।

🏗️बारहवीं योजना (2012-17): प्रावधान व लक्ष्य

  • राजस्थान की अंतिम पंचवर्षीय योजना में 1,96,992 करोड़ रु. प्रस्तावित किए गए — जो ग्यारहवीं योजना के स्वीकृत 71,731.98 करोड़ रु. का 2.75 गुना और कुल मिलाकर 174.62% अधिक था — इसका विकास लक्ष्य 7.7% रखा गया, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य मूलतः 9% था जिसे बाद में घटाकर 8% किया गया।
  • ऊर्जा को फिर सबसे बड़ा हिस्सा (36.92%) मिला, इसके बाद सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं को (35.28%); अन्य प्रावधानों में ग्रामीण विकास (9.00%), परिवहन (5.28%), कृषि व संबद्ध सेवाएँ (5.57%), सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण (3.99%), आर्थिक सेवाएँ (1.87%), सामान्य सेवाएँ (0.88%) और उद्योग व खनिज (0.50%) शामिल थे।
  • क्षेत्रवार विकास दर के लक्ष्य कृषि हेतु 3.5%, उद्योग हेतु 8% और सेवा क्षेत्र हेतु 9.5% रखे गए, जो राष्ट्रीय लक्ष्यों (क्रमशः 4%, 7.6% व 9%) से कुछ अधिक थे।
  • योजना अवधि के सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों में शिशु मृत्यु दर को 40, मातृ मृत्यु अनुपात को 200 और प्रजनन दर को 2.50 तक लाना शामिल था, वहीं 0-6 वर्ष के लिंग अनुपात को बढ़ाकर 912 और कुल साक्षरता दर को 79.57% (पुरुष 91.89%, महिला 66.22%) तक ले जाना था।
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भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ

India's Five Year Plans

राष्ट्रीय नियोजन की कहानी — भारत की बारह पंचवर्षीय योजनाओं के पीछे के मॉडल, मील के पत्थर और मोड़।

🌱प्रथम से तृतीय योजना (1951-66)

  • भारत की प्रथम योजना (1951-56) हैरोड-डोमर मॉडल पर आधारित थी, इसमें कृषि व सिंचाई को प्राथमिकता मिली, और सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) के साथ भाखड़ा नांगल व चम्बल परियोजनाएँ शुरू हुईं; इसका लक्ष्य 2.1% वृद्धि दर था, जबकि प्राप्ति 3.7% रही।
  • द्वितीय योजना (1956-61) महालनोबिस मॉडल पर आधारित थी और समाजवादी ढाँचे में तीव्र औद्योगीकरण पर केन्द्रित थी — 1959 में पंचायती राज व्यवस्था शुरू हुई, और भिलाई, राउरकेला व दुर्गापुर के इस्पात कारखाने स्थापित हुए; इसका लक्ष्य 4.5% था, प्राप्ति 4.2% रही।
  • तृतीय योजना (1961-66) का लक्ष्य आत्मनिर्भर व स्वयंस्फूर्त अर्थव्यवस्था बनाना था, इसी दौरान देश ने चीन (1962) व पाकिस्तान (1965) से युद्ध लड़े और 1965-66 में अकाल पड़ा; 1964 में बोकारो इस्पात कारखाना शुरू हुआ और 1966 में हरित क्रांति की शुरुआत हुई, पर 5.6% के लक्ष्य के मुकाबले वृद्धि दर मात्र 2.8% रही।

⏸️योजना अवकाश व चतुर्थ से सप्तम योजना (1966-90)

  • युद्धों व अकाल से पैदा संसाधनों की कमी के चलते 1966-67 से 1968-69 तक कोई नई पंचवर्षीय योजना नहीं बन सकी — इस अवधि को 'योजना अवकाश' कहा जाता है — इस दौरान तीन वार्षिक योजनाएँ चलीं, और 1966 में रुपये का पहली बार अवमूल्यन हुआ, जो 4.75 रु. प्रति डॉलर से बदलकर 7.5 रु. प्रति डॉलर हो गया।
  • चतुर्थ योजना (1969-74) का लक्ष्य आर्थिक स्थिरता के साथ विकास व आत्मनिर्भरता था; 19 जुलाई, 1969 को 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ, परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू हुआ, 23 जनवरी, 1974 को सेल (SAIL) की स्थापना हुई, और 1971 के भारत-पाक युद्ध का असर भी इसी अवधि पर पड़ा — इसका लक्ष्य 5.5% था पर प्राप्ति केवल 3.4% रही।
  • पंचम योजना (1974-78) का लक्ष्य जिला उद्योग केन्द्रों, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम व प्रधानमंत्री के 20-सूत्री कार्यक्रम के जरिये गरीबी हटाना व आत्मनिर्भरता था, पर 26 जून, 1975 को घोषित आपातकाल का साया इस पर पड़ा और जनता सरकार ने इसे मार्च 1978 में एक साल पहले ही समाप्त कर दिया, साथ ही 23 दिसंबर, 1977 को नई औद्योगिक नीति भी घोषित हुई; इसका लक्ष्य 4.4% था, प्राप्ति 4.9% रही।
  • जनता सरकार का 1978-80 के लिए 'अनवरत योजना' (रोलिंग प्लान) चलाने का प्रयास 1979 में सरकार गिरने से नाकाम हो गया और केवल वार्षिक योजनाएँ बनीं, जिनमें -6% की वृद्धि दर्ज हुई; इसके बाद आई छठी योजना (1980-85) ने ट्राइसेम, IRDP और NREP के जरिये गरीबी व बेरोजगारी से निपटा, 12 जुलाई, 1982 को नाबार्ड की स्थापना हुई, और 5.2% के लक्ष्य के मुकाबले 5.4% वृद्धि दर हासिल हुई।
  • सातवीं योजना (1985-90) खाद्यान्न उत्पादन, रोजगार व औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने पर केन्द्रित थी, साथ ही सामाजिक न्याय पर भी बल था; इसका लक्ष्य 5.0% था, प्राप्ति 5.6% रही।

💹अष्टम से दशम योजना (1992-2007)

  • राजनीतिक अस्थिरता के कारण आठवीं योजना (1992-97) दो साल टली, इसी दौरान जुलाई 1991 में रुपये का दो बार अवमूल्यन हुआ और प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण शुरू हुआ; जॉन डब्ल्यू. मिलर के मॉडल पर आधारित इस योजना का लक्ष्य रोजगार सृजन के साथ गरीबी व क्षेत्रीय असमानता घटाना था, पहली बार मानव विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता मिली, और उदारीकरण, वैश्वीकरण व राजकोषीय सुधार पर बल दिया गया; लक्ष्य 5.6% था, प्राप्ति 6.6% रही।
  • नौवीं योजना (1997-2002) को शुरू होने के करीब दो साल बाद, फरवरी 1999 में स्वीकृति मिली; इसमें ऊर्जा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई और न्यायसंगत वितरण के साथ विकास की रणनीति अपनाई गई; लक्ष्य 6.5% था, प्राप्ति केवल 5.7% रही।
  • दसवीं योजना (2002-07) में समता आधारित सतत विकास पर बल दिया गया, विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) स्थापित हुए, पहली बार राज्यवार विकास दर तय हुई, केन्द्र-राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने की पहली पहल हुई, और वंचित समूहों पर विशेष ध्यान दिया गया; लक्ष्य 8.0% था, प्राप्ति 7.6% रही।

🚀ग्यारहवीं योजना (2007-12): अब तक की सबसे तेज वृद्धि

  • NDC ने इसे चरणों में स्वीकृति दी — 9 दिसंबर, 2006 को दृष्टिकोण-पत्र और 19 दिसंबर, 2007 को NDC की 54वीं बैठक में प्रारूप — ग्यारहवीं योजना का लक्ष्य तीव्र, समावेशी विकास था; वैश्विक मंदी के बाद मूल 9% के लक्ष्य को घटाकर 8.1% किया गया, और इसका 36,44,718 करोड़ रु. का सार्वजनिक परिव्यय दसवीं योजना के वास्तविक व्यय से 125% अधिक था।
  • इस परिव्यय में केन्द्र का अंश (सार्वजनिक उपक्रमों सहित) 21,56,571 करोड़ रु. (59.2%) तथा राज्यों-केन्द्रशासित प्रदेशों का अंश 14,88,147 करोड़ रु. (40.8%) था; प्रावधान में सामाजिक सेवाएँ सबसे आगे रहीं — 11,02,327 करोड़ रु. (30.2%) — इसके बाद ऊर्जा को 8,54,123 करोड़ रु. (23.4%) मिले।
  • इसके समष्टिगत लक्ष्यों में 8.1% GDP वृद्धि, 4.0% कृषि, 10.5% उद्योग और 9.9% सेवा वृद्धि, साथ ही 36.7% निवेश दर व 34.8% घरेलू बचत दर शामिल थीं; सामाजिक लक्ष्यों में 2012 तक गरीबी अनुपात को 15% तक लाना, साक्षरता को 75% से ऊपर ले जाना, साक्षरता में लिंगीय अंतर को 10% तक घटाना, तथा 2010-12 तक शिशु मृत्यु दर को 28 व मातृ मृत्यु दर को 1 प्रति हजार लाना शामिल था।
  • इस योजना ने अब तक की सबसे ऊँची वृद्धि दर — 8% (दसवीं योजना के 7.6% के मुकाबले) — हासिल की, जिसमें कृषि 3.7%, उद्योग 7.2% और सेवा क्षेत्र 9.7% रहा; गरीबी हर साल 1.5 प्रतिशत अंक घटी, 2 फरवरी, 2006 से कुछ जिलों में शुरू हुई मनरेगा पूरे देश में लागू हुई, पर विद्युत क्षमता वृद्धि लक्ष्य से पीछे रही (78,700 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले 54,964 मेगावाट स्थापित हुए) और योजना के अंत तक राजकोषीय घाटा चिंताजनक रूप से GDP के 7.34% तक पहुँच गया।

🏁बारहवीं योजना (2012-17): भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना

  • भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल, 2012 से 31 मार्च, 2017 तक चली; वैश्विक मंदी के चलते 27 दिसंबर, 2012 को हुई NDC की 57वीं बैठक में (जिसमें योजना के मसौदे को भी मंजूरी मिली) मूल 9% के लक्ष्य को घटाकर 8% किया गया, और इसने पुरानी एकल विकास दर की अवधारणा छोड़कर तीन अलग-अलग आर्थिक परिदृश्यों का अनुमान लगाया।
  • कुल सार्वजनिक क्षेत्र परिव्यय 76,69,807 करोड़ रु. रखा गया — ग्यारहवीं योजना के वास्तविक व्यय से 108.59% अधिक; राज्यों में सबसे बड़ा प्रावधान आन्ध्रप्रदेश (3,42,842 करोड़ रु.) को मिला, इसके बाद उत्तरप्रदेश (3,26,953 करोड़ रु.) का स्थान था, जबकि सबसे कम प्रावधान सिक्किम को मिला, मात्र 11,325 करोड़ रु.।
  • क्षेत्रवार विकास दर के मानदंड कृषि हेतु 4%, उद्योग हेतु 7.6%, सेवा हेतु 9%, खनन हेतु 5.7%, विनिर्माण हेतु 7.1% और निर्माण हेतु 9.1% रखे गए; क्षेत्रवार व्यय में सबसे बड़ा हिस्सा सामाजिक सेवाओं (34.74%) को मिला, इसके बाद ऊर्जा (18.76%) और परिवहन (15.70%) का स्थान रहा।
  • प्रमुख लक्ष्यों में गैर-कृषि क्षेत्र में 5 करोड़ रोजगार सृजन, वनाच्छादित व वृक्षावरण क्षेत्र में हर साल एक मिलियन हैक्टेयर की वृद्धि, सभी सब्सिडी को प्रत्यक्ष कैश ट्रांसफर से जोड़ना, 90% परिवारों तक बैंकिंग सुविधा पहुँचाना, स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों को 7 तक बढ़ाना, गरीबी को 28.8% से घटाकर 18.8% करना, शिशु मृत्यु दर को 25 व मातृ मृत्यु दर को 1 प्रति हजार लाना, बाल लिंगानुपात को बढ़ाकर 950 करना, तथा पूर्वी व पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पूरा करना शामिल था।

🧩रोचक तथ्य व श्रेय

  • अर्थशास्त्री डॉ. राज कृष्णा ने भारत की उदारीकरण-पूर्व की धीमी वृद्धि दर को बताने के लिए 'हिन्दू विकास दर' शब्द गढ़ा था।
  • जोसफ स्टालिन ने 1928 में सोवियत संघ में विश्व की पहली पंचवर्षीय योजना शुरू की थी — इसी मॉडल से प्रेरित होकर नेहरू ने भारत में नियोजन की अपनी सोच बनाई।
  • आठ प्रमुख उद्योगपतियों द्वारा तैयार बॉम्बे प्लान (1944) को अक्सर स्वतंत्र भारत में नियोजित विकास का सबसे पहला ठोस खाका माना जाता है।
  • हर पंचवर्षीय योजना की औपचारिक स्वीकृति अंततः राष्ट्रीय विकास परिषद के पास होती थी, तथा 'अनवरत योजना' (रोलिंग प्लान) की संकल्पना गुनार मिर्डल ने दी थी, जिसे भारत में लागू कराने का श्रेय तत्कालीन योजना आयोग के उपाध्यक्ष डी.टी. लकड़वाला को जाता है।