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राजस्थान GK

अकाल, सूखा एवं बाढ़: आपदा प्रबंधन एवं सहायता

Famine, Drought and Flood: Disaster Management

जानिए राजस्थान के शुष्क भूगोल में अकाल, सूखा और बाढ़ बार-बार क्यों आते हैं, किन ऐतिहासिक आपदाओं ने राहत नीति को आकार दिया, और आज आपदा प्रबंधन के लिए कौन-से विभाग, कोष व योजनाएँ काम करती हैं।

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अकाल: राजस्थान की स्थायी चुनौती

Famine: Rajasthan's Enduring Challenge

मरुस्थलीय भूगोल और चंचल मानसून ने अकाल को राजस्थान के इतिहास से लगभग अभिन्न बना दिया है — प्राचीन कहावतों से लेकर हाल के दशकों की सबसे भीषण आपदा तक।

🏜️राजस्थान में अकाल क्यों आम है

  • चूँकि राजस्थान का अधिकांश भाग मरुस्थलीय है और यहाँ वर्षा बहुत कम होती है, अकाल को यहाँ के जनजीवन का लगभग स्थायी हिस्सा माना जाता है।
  • भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि मानसून राजस्थान में सबसे देर से पहुँचता है और सबसे पहले लौट जाता है, जिससे वर्षा ऋतु छोटी व अनिश्चित रह जाती है।
  • इस अपर्याप्त व अनिश्चित वर्षा के कारण राज्य के अधिकांश हिस्सों में लगभग हर साल अकाल जैसी स्थिति बनी रहती है — इतनी बार कि अकाल मानो राजस्थान का पर्याय ही बन गया है।

📜अकाल से जुड़ी लोक-कहावतें

  • एक प्रसिद्ध राजस्थानी कहावत अकाल की तुलना मानव शरीर से करती है — इसके 'पैर' पूगल (बीकानेर) में, 'धड़' कोटड़ा (बाड़मेर-जैसलमेर) में और 'भुजाएँ' बाड़मेर में फैली हैं; जोधपुर में यह आता-जाता रहता है, जबकि जैसलमेर को इसने अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है।
  • एक अन्य कहावत मरु-वनस्पतियों — खेजड़ी, जाल, कैर और फोग — की वफादारी की सराहना करती है: अकाल में भाई भी साथ छोड़ सकता है, पर ये पेड़ कभी नहीं छोड़ते — इनके फल जैसे साँगरी, पीलू, कैर और फोगला मनुष्यों का पेट भरते हैं, जबकि इनकी पत्तियाँ व टहनियाँ जैसे लूंग, पत्ता, घिंटाल और लहसू पशुओं का चारा बनती हैं।

📖प्रमुख ऐतिहासिक अकाल

  • सन् 1662 में मेवाड़ में एक भीषण अकाल पड़ा, और इसी संकट के दौरान राजसमंद झील का निर्माण करवाया गया — जिसे देश के पहले संगठित अकाल राहत कार्य के रूप में देखा जाता है।
  • वर्ष 1842 व 1843 के विनाशकारी अकालों को संयुक्त रूप से 'सहसा मूदसा' के नाम से याद किया जाता है, जबकि सन् 1899 (विक्रम संवत् 1956) के भीषण अकाल को — जिसमें भारी जन-पशुहानि हुई और बड़े पैमाने पर पलायन हुआ और जो आज भी याद किया जाता है — 'छप्पनियाँ अकाल' कहा जाता है।
  • वर्ष 2000-01 का भीषण अकाल — जिसने धौलपुर को छोड़कर राज्य के हर जिले को अपनी चपेट में लिया और जिसे पिछले सौ वर्षों का सबसे विकराल अकाल माना जाता है — 'मैक्रो ड्रॉट' या 'वृहद अकाल' के नाम से जाना जाता है।

📊अकाल की व्यापकता

  • राज्य गठन के बाद से केवल छह वर्षों — 1959-60, 1973-74, 1975-76, 1976-77, 1990-91 और 1994-95 — को छोड़कर, राजस्थान के किसी न किसी हिस्से में लगभग हर वर्ष अकाल जैसी स्थिति बनी रही है।
  • राज्य की लगभग 75% खेती सीधे वर्षा पर निर्भर है, और सिंचाई भी मुख्यतः कुओं व नलकूपों पर टिकी है, जिनमें से कई कम वर्षा होते ही सूख जाते हैं या उनका जलस्तर तेजी से गिर जाता है।
  • कई इलाकों में भू-जल स्तर बहुत नीचे चला गया है, और जहाँ पानी फ्लोराइडयुक्त या खारा है, वह सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए अनुपयुक्त हो जाता है — और समय पर पर्याप्त वर्षा न होने पर खरीफ व रबी दोनों फसलें प्रभावित होती हैं।

⚠️त्रिकाल — तिहरा संकट

  • त्रिकाल अकाल का सबसे गंभीर रूप है, जब भोजन, पेयजल और चारे — तीनों की कमी एक साथ हो जाती है।
  • राजस्थान ने ऐसी ही स्थिति 2002-03 में झेली, जब एक अप्रत्याशित अकाल-सह-सूखे ने राज्य के लगभग 90% गाँवों को अपनी चपेट में ले लिया — पिछले तीन दशकों का सबसे भीषण दौर।
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अकाल के कारण एवं समाधान

Causes of Famine and Ways to Tackle It

राजस्थान में अकाल केवल मौसम की देन नहीं है — प्राकृतिक, आर्थिक, मानवीय और राजनीतिक कारक एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं, और इससे निपटने के लिए तात्कालिक राहत के साथ-साथ धैर्यपूर्ण दीर्घकालिक योजना भी जरूरी है।

☀️प्राकृतिक कारण

  • राज्य की शुष्क जलवायु और उच्च तापमान, वर्षा की अपर्याप्तता व अनियमितता के साथ मिलकर राजस्थान की अकाल समस्या की प्राकृतिक बुनियाद बनाते हैं।
  • नियतवाही (बारहमासी) नदियों की लगभग अनुपस्थिति और अधिकांशतः अनुपजाऊ मिट्टी इस समस्या को और गहरा कर देती है।
  • राज्य में वनों का अभाव भी एक प्राकृतिक कारक है जो अकाल की स्थिति को और बिगाड़ता है।

💰आर्थिक कारण

  • परंपरागत रूप से कृषि-आधारित कमजोर अर्थव्यवस्था और पशुपालन की पिछड़ी दशा वर्षा न होने पर राज्य को बिना किसी सहारे के छोड़ देती है।
  • पारंपरिक कुटीर व ग्रामीण उद्योगों का ह्रास, बढ़ती अनुत्पादक जनसंख्या और सिंचाई साधनों की कमी आर्थिक दबाव को और बढ़ाते हैं।

🏛️मानवीय एवं राजनीतिक कारण

  • वनों की अनियंत्रित व अतार्किक कटाई, भू-जल का अंधाधुंध दोहन और इससे उपजा पारिस्थितिकी असंतुलन राजस्थान की अकाल समस्या के प्रमुख मानवीय कारण हैं।
  • राजनीतिक स्तर पर, दीर्घकालिक समाधान की बजाय तात्कालिक राहत पर अत्यधिक जोर, जल योजनाओं का निर्धारित समय से पिछड़ना, तथा प्रशासनिक शिथिलता व व्यापक भ्रष्टाचार संकट को और गहरा करते हैं।

🆘अल्पकालीन राहत उपाय

  • वार्षिक बजट में राहत कार्य के लिए एक नियमित प्रावधान अनिवार्य रूप से रखा जाना चाहिए, ताकि हर बार अकाल आने पर तदर्थ निर्णयों पर निर्भर न रहना पड़े।
  • राहत कार्य क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप हों और शीघ्र व समय पर लागू किए जाएँ, साथ ही संबंधित संस्थाओं में उचित समन्वय और जनसहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

🌳दीर्घकालिक समाधान

  • सिंचाई का विस्तार करना और उपलब्ध जल संसाधनों का दीर्घकालिक व सुव्यवस्थित प्रबंधन करना, सुलभ भू-जल क्षेत्रों की पहचान कर उनका दोहन करना, तथा उपग्रह सर्वेक्षण से अविवेकपूर्ण दोहन पर रोक लगाना — ये जल-संबंधी प्राथमिकताएँ हैं।
  • मरुस्थल के प्रसार को रोकने के लिए व्यापक वृक्षारोपण और बालू टिब्बों का स्थिरीकरण जरूरी है, साथ ही बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं का समयबद्ध पूरा होना और कृषि वानिकी, चरागाह विकास व शुष्क-मिश्रित कृषि को प्रोत्साहन देना भी आवश्यक है।
  • कृषि सघनता बढ़ाना, सब्जी, फल व औषधीय पौधों जैसी नकदी फसलों को बढ़ावा देना, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विविधीकरण करना एक ही असफल फसल पर निर्भरता कम करता है।
  • नस्ल सुधार व संतुलित आहार के साथ समेकित दुग्ध विकास कार्यक्रम, हर गाँव में एक कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र (जिससे स्थानीय रोजगार भी मिलेगा), ग्रामीण-कुटीर उद्योगों व पर्यटन को प्रोत्साहन, तथा ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का विकास — यह दीर्घकालिक रणनीति को पूरा करता है।

🚚तात्कालिक सरकारी कार्रवाई

  • अभावग्रस्त गाँवों में लोगों को रोजगार दिया जाता है, पशुओं के लिए उचित मूल्य पर चारा और टैंकरों से पानी उपलब्ध कराया जाता है, अधूरे राहत कार्यों को प्राथमिकता दी जाती है, तथा वन कार्य, भू-संरक्षण कार्य व स्कूल-अस्पताल-सहकारी भवन जैसे सामुदायिक विकास कार्य भी कराए जाते हैं।
  • पेयजलापूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है और टैंकरों, रेल परिवहन व हैंडपम्पों से इसकी व्यवस्था होती है, जबकि पर्याप्त सस्ता चारा, अनुदानित पशु आहार, ब्याज-मुक्त ऋण और चारा डिपो संचालन तथा लावारिस-असहाय पशुओं के लिए शिविर पशुधन को बचाए रखते हैं।
  • विधवा व विकलांग पेंशनरों को पेंशन के अलावा गेहूँ की अनुग्रह सहायता दी जाती है, भू-राजस्व वसूली स्थगित कर अल्पकालीन ऋणों को दीर्घकालीन ऋणों में बदला जाता है, पंजीकृत गौशालाओं को अनुदान मिलता है और आबियाना (सिंचाई शुल्क) माफ किया जाता है।

🚑अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटना

  • महामारियों को फैलने से रोकने के लिए दवाइयाँ व संक्रमण-रोधक उपलब्ध कराए जाते हैं, एंबुलेंस सेवा व सचल चिकित्सा दल तैनात किए जाते हैं, और अस्थायी औषधालय स्थापित किए जाते हैं।
  • बाढ़ के समय बचाव हेतु नावों की व्यवस्था की जाती है, राहत शिविरों में भोजन, आवास व वस्त्र उपलब्ध कराए जाते हैं, ग्रामीण-शहरी दोनों क्षेत्रों में आपात पेयजल आपूर्ति की जाती है, और बाढ़ के पानी की निकासी की जाती है।
  • कीट हमलों पर कीटनाशकों के हवाई छिड़काव से नियंत्रण किया जाता है, और टूटी पुलियाओं व पुलों की तुरंत मरम्मत कर कनेक्टिविटी बहाल की जाती है।
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बाढ़: कारण, प्रभाव व नियंत्रण

Floods: Causes, Impact and Control

जब कोई नदी अपनी क्षमता से अधिक पानी ढोती है, तो वह अपने किनारों को पारकर बहने लगती है और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को बदल देती है — कभी भलाई में, पर अक्सर हानि में।

💧बाढ़ का अर्थ

  • बाढ़ तब आती है जब किसी नदी की वाहिका उसकी क्षमता से अधिक पानी ढोती है, जिससे आसपास के निचले मैदानी इलाके जलमग्न हो जाते हैं।
  • सीधे शब्दों में, जब नदी अपने तटबंधों को तोड़कर या उनसे ऊपर बहकर चारों ओर फैल जाती है, तब उसे बाढ़ कहा जाता है।

🌧️बाढ़ के कारण

  • प्राकृतिक कारणों में तटीय क्षेत्रों के चक्रवात, लंबे समय तक मूसलाधार बारिश, हिम का पिघलना, भूमि की जल-अवशोषण क्षमता में कमी, तथा भारी मृदा अपरदन से नदी-तल का भर जाना शामिल है।
  • मानवीय गतिविधियाँ भी इसे बदतर बनाती हैं — अत्यधिक वनों की कटाई, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, अवरुद्ध प्राकृतिक अपवाह मार्ग, और नदी-तल व बाढ़ग्रस्त मैदानों पर बसी बस्तियाँ बाढ़ की तीव्रता व विध्वंसकता को बढ़ा देती हैं।

💥बाढ़ के परिणाम

  • बार-बार आने वाली बाढ़ खेतों व बस्तियों को डुबो देती है, राज्य की अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देती है, भारी जन-धन हानि पहुँचाती है, लोगों को बेघर करती है, और घरों, उद्योगों व कारोबार को तबाह कर देती है।
  • सड़कें, रेलमार्ग, पुल और अन्य आधारभूत ढाँचे भारी क्षतिग्रस्त होते हैं, और दूषित जल से फैलने वाली बीमारियाँ जैसे हैजा, आंत्रशोथ व हेपेटाइटिस व्यापक रूप से फैल जाती हैं।
  • बाढ़ पूरी तरह हानिकारक भी नहीं होती — इससे खेतों में जमा होने वाली जलोढ़ मृदा मिट्टी की उर्वरता को स्वाभाविक रूप से नवीनीकृत करती है, और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसके चलते चावल का उत्पादन भी बढ़ जाता है।

🚧बाढ़ नियंत्रण के उपाय

  • नदी मार्गों पर बाँध बनाकर मानसून के अतिरिक्त जल को रोका जा सकता है, जिससे बाढ़ की आवृत्ति घटती है, जबकि नदी किनारों को ऊँचा व मजबूत तटबंधों से सुरक्षित करने से आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ के पानी का फैलाव रुकता है।
  • नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वृक्षारोपण से बाढ़ का प्रकोप कम होता है, और सड़कों, नहरों व रेलमार्गों से अवरुद्ध हुए प्राकृतिक अपवाह मार्गों को फिर से खोलने से भी बाढ़ की आवृत्ति घटती है।
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सूखा: परिभाषा, कारण एवं मुकाबला

Drought: Definition, Causes and Response

सूखा मौसम-वैज्ञानिक व मानवीय कारकों की एक शृंखला से धीरे-धीरे उभरता है, राजस्थान के शुष्क पश्चिमी हिस्से को सबसे अधिक प्रभावित करता है, और सरकारी राहत जितनी ही जरूरत जल-बचत खेती की भी है।

📉सूखे की परिभाषा

  • किसी क्षेत्र को सूखा-प्रभावित तब माना जाता है जब उसे अच्छी कृषि उपज के लिए आवश्यक वर्षा से कम वर्षा मिलती है, और उसके पेयजल स्रोतों में भी आवश्यकता से कम पानी उपलब्ध होता है।
  • संक्षेप में, सूखा तब उत्पन्न होता है जब लंबे समय तक कम वर्षा, अत्यधिक वाष्पीकरण, और जलाशयों व भू-जल के अत्यधिक उपयोग के चलते भूतल पर जल की कमी हो जाती है।
  • औपचारिक रूप से यह एक जटिल परिघटना है जो कई मौसम-वैज्ञानिक व अन्य कारकों से मिलकर बनती है — वृष्टि, वाष्पीकरण, वाष्पोत्सर्जन, भू-जल, मृदा नमी, जल भंडारण व भरण, कृषि पद्धतियाँ (विशेषकर उगाई जाने वाली फसलें), सामाजिक-आर्थिक गतिविधियाँ और पारिस्थितिकी।

🔥सूखे के कारण

  • जल की कमी — चाहे वह वर्षा की विफलता से हो या धरातलीय व भू-जल स्रोतों से — सूखे का मुख्य कारण है, जिसमें अपर्याप्त वर्षा सबसे बड़ा कारक है।
  • कम भू-जल उपलब्धता, वनों का विनाश, और प्राकृतिक जल संचय स्रोतों का नष्ट होना — ये सब सूखे की स्थिति को बढ़ावा देते हैं।
  • स्थायी जल नीति के अभाव में उपलब्ध जल का समुचित उपयोग नहीं हो पाता, और लगातार बढ़ती जनसंख्या पहले से सीमित जल आपूर्ति पर दबाव और बढ़ा देती है।

🗺️राजस्थान के सूखा-प्रवण क्षेत्र

  • मानसून की अनियमितता व अनिश्चितता ही राजस्थान में सूखे की स्थिति उत्पन्न करती है, और अपर्याप्त मानसूनी वर्षा तथा पर्यावरण ह्रास के कारण राजस्थान व गुजरात प्रायः सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहते हैं।
  • अरावली के पश्चिम में स्थित मरुस्थली क्षेत्र सबसे गंभीर रूप से सूखा-प्रभावित माना जाता है; पूर्वी राजस्थान अधिक सूखा-प्रभावित श्रेणी में आता है; और उत्तरी भाग को मध्यम से कम सूखा-प्रभावित माना जाता है।

🥀सूखे के परिणाम

  • सूखे में फसलें सूख जाती हैं, किसान अपनी आजीविका खो देते हैं और बेरोजगार हो जाते हैं, तथा पशुओं को चारे व पानी दोनों की कमी झेलनी पड़ती है।
  • लोगों को अक्सर भोजन, पानी, हरे चारे व रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है, और जल की कमी के कारण कई लोग दूषित पानी पीने को मजबूर होते हैं, जिससे आंत्रशोथ, हैजा व हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।

🌱सूखे से मुकाबला

  • सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम के तहत जल संभर विकास, और मृदा नमी संरक्षण हेतु सरल व कम लागत वाले ढाँचे — ये सूखे के मुकाबले की बुनियाद बनाते हैं।
  • शुष्क असिंचित कृषि व जल संग्रहण संसाधनों का विकास किया जाता है, कपास, मूँग व बाजरा जैसी कम पानी चाहने वाली फसलों को प्रोत्साहित किया जाता है, और खेतों की ऊँची मेंड़ें, सीढ़ीदार खेती व किनारों पर पेड़ लगाने से वर्षा जल व मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
  • सिंचाई नहरों को पक्का करने से जल संरक्षित होता है, और स्प्रिंकलर व टपकन (बूँद-बूँद) सिंचाई अपनाकर कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई संभव होती है।
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आपदा प्रबंधन तंत्र, योजनाएँ एवं मरुस्थलीकरण

Disaster Management Machinery, Schemes and Desertification

1951 में स्थापित एक विभाग से लेकर कोषों, आवास योजनाओं और मरुस्थलीकरण के धीमे-मूक विस्तार तक — राजस्थान ने आपदा से निपटने के लिए किस तरह एक संस्थागत ढाँचा खड़ा किया, यह यहाँ जानिए।

🏢आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग

  • अकाल से निपटने के लिए राज्य ने 24 अक्टूबर 1951 को 'आपदा प्रबंधन एवं सहायता विभाग' की स्थापना की, और राहत कार्य से जुड़ी अकाल संहिता 30 अप्रैल 1962 को तैयार की गई।
  • 18 दिसंबर 2002 के भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के पालन में, विभाग (तब 'सहायता विभाग' कहलाता था) का नाम 30 अक्टूबर 2003 से बदलकर 'आपदा प्रबंधन एवं सहायता विभाग' कर दिया गया।
  • आज एक स्थायी राज्य विभाग के रूप में, यह हर तरह की प्राकृतिक आपदा का प्रबंधन करता है और प्रभावितों को राहत प्रदान करता है — इसमें आपदा-पूर्व रोकथाम योजना, प्रभाव को न्यूनतम करना, अग्रिम तैयारी, और आपदा आने पर बचाव, राहत व पुनर्वास कार्य प्रभावी ढंग से चलाना शामिल है।

⚖️राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं नीति

  • राजस्थान में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को 1 अगस्त 2007 से लागू किया गया, और इसकी धारा 14 की अनुपालना में 6 सितंबर 2007 को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) का गठन किया गया।
  • राज्य आपदा प्रबंधन नीति 25 अक्टूबर 2007 से लागू की गई, और अधिनियम की धारा 23 की अनुपालना में केंद्र के निर्देशानुसार राज्य आपदा प्रबंधन योजना भी तैयार कर लागू कर दी गई है।
  • राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) में केंद्र व राज्य सरकार का अंशदान अनुपात 3:1 है; इसके अतिरिक्त, कोई भी व्यक्ति राज्यपाल राहत कोष में दान दे सकता है और आयकर अधिनियम के तहत दान राशि पर 50% छूट पा सकता है।

🏠राजस्थान विशेष आवास योजना

  • अतिवृष्टि, बाढ़, आगजनी, भूकंप जैसी प्राकृतिक व मानव-जनित आपदाएँ राज्य के शहरी व ग्रामीण आवासों को बार-बार नुकसान पहुँचाती हैं, जिसके चलते सरकार ने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, निर्माण व मरम्मत हेतु 'राजस्थान विशेष आवास योजना' शुरू की।
  • इस योजना के तहत पूर्णतः क्षतिग्रस्त आवास हेतु 50,000 रुपए, आंशिक क्षतिग्रस्त आवास हेतु 25,000 रुपए, और शौचालय निर्माण हेतु अलग से 5,000 रुपए का अनुदान दिया जाता है।

💵राजस्थान राहत कोष

  • सीआरएफ के अंतर्गत न आने वाली आपदाओं के लिए राज्य ने 2005-06 में 5 करोड़ रुपए की प्रारंभिक राशि से राजस्थान राहत कोष का गठन किया, जिसका प्रबंधन मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य-स्तरीय समिति करती है; इसमें दिए गए दान पर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80G के तहत छूट मिलती है।
  • यह कोष ऐसी स्थितियों में खोज व बचाव कार्यों को कवर करता है जैसे मनुष्य, पशु या फसलों को प्रभावित करने वाली महामारी; खानों में बाढ़ का पानी आना या उनका ढहना; बहुमंजिला भवनों या कुओं का ढहना; और मिट्टी-चट्टान के ढहने या कुओं में जहरीली गैस निकलने से उत्पन्न आपदाएँ।
  • 4 अप्रैल 2022 की बैठक में राज्य-स्तरीय समिति ने इस कोष की अवधि को अगले चार वर्ष यानी 31 मार्च 2026 तक बढ़ाने की अभिशंसा की।

🆘राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा आकस्मिक निधि

  • अत्यंत गंभीर प्रकृति की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा आकस्मिक निधि (NCCF) से राशि जारी की जाती है।

📋सूखा प्रवण क्षेत्र विकास कार्यक्रम

  • 1973 में देश के 16 राज्यों के 182 जिलों में शुरू किए गए सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम का उद्देश्य भूमि, जल व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के अनुकूलतम विकास से पारिस्थितिक संतुलन बहाल करना था।
  • 1 अप्रैल 1995 से यह जल संभर विकास कार्यक्रम के अंतर्गत क्रियान्वित हो रहा है, अप्रैल 1999 से केंद्र व राज्यों के बीच वित्त-पोषण 75:25 के अनुपात में साझा होता है; इसके अंतर्गत क्षेत्रों की पहचान 1994-95 में हनुमंत राव समिति की सिफारिशों के आधार पर की गई थी।

🏜️मरुस्थलीकरण क्या है

  • मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिससे कोई भूमि रेगिस्तान या बंजर भूमि में बदल जाती है, या मौजूदा मरुस्थल का विस्तार होता है — यह एक प्राकृतिक परिघटना है जो जलवायु परिवर्तन या दोषपूर्ण भूमि उपयोग से उपजती है, जिसमें दोषपूर्ण भूमि उपयोग अधिक बड़ा कारण है।
  • वनों की अनियंत्रित कटाई और भूमि पर पशुधन का अत्यधिक दबाव इसे आगे बढ़ाते हैं, जिससे भूमि उपयोग पर मानवीय दबाव के चलते पारितंत्र का क्रमशः अवनयन होता है और उर्वर भूमि धीरे-धीरे शुष्क व बंजर बन जाती है।
  • वनस्पति आवरण हटाने से किसी क्षेत्र की स्थानीय जलवायु बदल जाती है, जबकि वन-विनाश व अतिचारण से मृदा अपरदन के साथ-साथ वर्षा, तापमान व पवन वेग में भी परिवर्तन आता है — ये सब मिलकर मरुस्थलीकरण के रूप में दिखते हैं।
  • विद्वान मैन के अनुसार, मरुस्थलीकरण जलवायवीय, मृदीय (मिट्टी-संबंधी) तथा जैविक कारकों की अंतःक्रिया से उत्पन्न होता है।

🌍मरुस्थलीकरण — वैश्विक व भारतीय परिदृश्य

  • विश्व की लगभग 35% भूमि मरुस्थल या अर्द्ध-मरुस्थल है, और लगातार कम वर्षा व कमजोर जल प्रबंधन के चलते यह लगातार फैल रहा है, आसपास की उपजाऊ भूमि को भी अपनी चपेट में ले रहा है — सिंचाई-रहित वर्षा-आधारित खेती वाले अर्द्ध-मरुस्थलीय क्षेत्रों में जोखिम सबसे अधिक है।
  • संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार अविवेकपूर्ण मानवीय गतिविधियों ने लगभग 1.30 करोड़ वर्ग किलोमीटर भूमि को मरुस्थलीय बना दिया है; 20वीं सदी के अंत तक सहारा मरुस्थल लगभग 20% फैल चुका था, और अकेला थार मरुस्थल हर साल लगभग 13,000 एकड़ भूमि निगल जाता है।
  • भारत में शुष्क-मरुस्थलीय भूमि मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक में केंद्रित है, जहाँ अतिचारण, भूमि पर दबाव व संसाधनों का अतिदोहन पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे हैं और पोषण चक्रों व मिट्टी के सूक्ष्म जलवायवीय संतुलन को बाधित कर रहे हैं।
  • कुमायूँ की कभी हरी-भरी रही पहाड़ियाँ भी इस अवनयन के लक्षण दिखा रही हैं, जहाँ पहाड़ी झरने सूखते जा रहे हैं — यह याद दिलाता है कि सूखा एक अस्थायी समस्या है, पर मरुस्थलीकरण एक बार शुरू होने पर स्थायी बन जाता है।

🌾मरुस्थलीकरण रोकने के उपाय

  • जल की कमी दूर करने व अधिकाधिक वृक्षारोपण संभव बनाने हेतु सिंचाई का विकास, खेजड़ी, कीकर, रोहिड़ा, जोजोबा, नीम, बोरड़ी व फोग जैसे मरुस्थल-अनुकूल पेड़ों को बढ़ावा, तथा पशु चराई का नियमन — ये अग्रिम मोर्चे के उपाय हैं।
  • सूखी खेती के साथ टपकन व स्प्रिंकलर सिंचाई, तथा बालुका स्तूपों (रेत के टीलों) का स्थिरीकरण मरुस्थल के विस्तार को थामने में मदद करते हैं।
  • ऊर्जा के वैकल्पिक व पुनर्नवीकरणीय स्रोतों का विकास जलावन की लकड़ी पर निर्भरता घटाकर वनों को बचाता है, जबकि उपलब्ध भू-जल का समुचित उपयोग, राष्ट्रीय जल विभाजन कार्यक्रम में तेजी, और जन-जागरूकता इस रणनीति को पूरा करते हैं।

🌐मरुस्थलीकरण के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय पहल

  • मरुस्थलीकरण से वैश्विक स्तर पर निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन (UNCCD) की स्थापना की गई है, और भारत इसका हस्ताक्षरकर्ता देश है।
  • प्रतिवर्ष 17 जून को मरुस्थलीकरण का सामना करने के लिए विश्व दिवस (World Day to Combat Desertification - WDCD) मनाया जाता है।