राजस्थान में जनजाति आंदोलन
Tribal Movements of Rajasthan
मेर, भील व मीणा जनजातियों के प्रतिरोध से लेकर गोविंद गिरी के मानगढ़ बलिदान व मोतीलाल तेजावत के एकी आंदोलन तक — राजस्थान की जनजातीय जनता के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की गाथा।
पृष्ठभूमि व मेर विद्रोह
राजस्थान के भील, मीणा, मेर व गरासिया जैसे मूल निवासी समुदायों ने सदियों तक पहाड़ों-जंगलों में अपनी स्वतंत्र जीवन-शैली बचाए रखी, लेकिन औपनिवेशिक हस्तक्षेप ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया।
🏘️आदिवासी समाज और राजपूत सत्ता
- भील, मीणा, सहरिया, गरासिया व डामोर जैसे समुदाय राजस्थान की धरती पर मानव सभ्यता के आरंभिक दौर से ही बसे हुए हैं, और छठी-सातवीं सदी में राजपूत राज्यों के उदय से पूर्व मेवाड़, वागड़, ढूँढाड़ व हाड़ौती जैसे क्षेत्रों में इन्हीं जनजातीय कबीलों के छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य हुआ करते थे।
- राजपूत सत्ता के विस्तार के साथ इन जनजातीय क्षेत्रों पर शक्तिशाली राजपूत राज्यों का अधिकार हो गया, जिससे मूल निवासियों को पहाड़ों-जंगलों की ओर पीछे हटना पड़ा; बाद में मध्यकाल में धीरे-धीरे यह संबंध सहयोग में बदला और जनजातियाँ राजपूत राज्यों की रक्षा में भी सहायक बनीं।
⚖️ब्रिटिश हस्तक्षेप व आर्थिक शोषण
- 1818 ई. में मेवाड़ सरकार व ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई संधि के अंतर्गत कंपनी ने क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व अपने हाथ में ले लिया, जिसके बाद ब्रिटिश शासन के दौरान राज्य की जनजातियाँ आर्थिक शोषण की शिकार होकर सामाजिक-आर्थिक रूप से लगातार पिछड़ती चली गईं।
- 19वीं सदी के अंत तक आते-आते समाज सुधारकों ने जनजातियों में व्याप्त कुप्रथाओं को समाप्त करने का बीड़ा उठाया और उन्हें विकास व शोषण-विरोधी जागृति की ओर प्रेरित करना शुरू किया, जिसने आगे चलकर संगठित आंदोलनों की जमीन तैयार की।
🐎मेर विद्रोह (1818-1824)
- संयोगवश भील व मेर (रावत) दोनों समुदायों के विद्रोह एक ही वर्ष, 1818 ई. में भड़के; मेवाड़, मारवाड़ व अजमेर में फैले मेर समुदाय पर पहले कभी किसी सत्ता का पूर्ण नियंत्रण नहीं रहा था, और अंग्रेज ही सबसे पहले उन्हें पूरी तरह अपने अधीन लाने का प्रयास करने वाले बने — यही प्रयास मेर विद्रोह का सीधा कारण बना।
- 1818 में अजमेर के अंग्रेज सुपरिटेंडेंट एफ. विल्डर ने झाक व अन्य केंद्रीय गाँवों के मेरों से लूटपाट न करने का समझौता किया, पर मार्च 1819 में एक मामूली घटना को समझौता-भंग बताकर मेरवाड़ा पर आक्रमण कर दिया, जबकि कर्नल टॉड ने मेवाड़ की ओर से इसी तरह के दमनकारी कदम उठाते हुए क्षेत्र में पुलिस थानों की एक शृंखला खड़ी कर दी।
- तीन पक्षों — ब्रिटिश, मेवाड़ व मारवाड़ — में बँटे मेरवाड़ा क्षेत्र में 1822 में मेरवाड़ा बटालियन का मुख्यालय ब्यावर में स्थापित हुआ, और महाराणा मेवाड़ (मई 1823) व महाराजा मारवाड़ (मार्च 1824) ने अपने-अपने हिस्से क्रमशः 10 व 8 वर्षों के लिए अंग्रेजों को सौंप दिए, जिससे अंग्रेज 1947 तक मेर विद्रोहों को नियंत्रण में रखने में सफल रहे।
भील विद्रोहों की शृंखला
मेवाड़ के भोमट क्षेत्र में रहने वाले भीलों व गरासियों ने वन अधिकारों, भू-राजस्व व बेगार जैसे मुद्दों पर बार-बार सत्ता के विरुद्ध हथियार उठाए, और यही असंतोष आगे चलकर एक संगठित जन-आंदोलन की नींव बना।
⛰️भोमट क्षेत्र व बिजौलिया का प्रभाव
- मेवाड़ का पहाड़ी क्षेत्र, जहाँ भील व गरासिया समुदाय रहते थे, 'भोमट' (भूमट) कहलाता था; यहीं के भीलों व गरासियों के लिए बिजौलिया किसान आंदोलन प्रेरणा का बड़ा स्रोत बना और उन्होंने राज्य व जागीरदारों के अत्याचारों के विरुद्ध स्वयं को संगठित करना शुरू किया।
🌲भील विद्रोह के कारण
- वन उत्पादों के निःशुल्क उपभोग का पारंपरिक अधिकार छिन जाना, डूँगरपुर-बाँसवाड़ा में लागू नई भू-राजस्व व्यवस्था, नए करों का बोझ, सेना से हटाया जाना तथा रखवाली-बोलाई कर वसूलने का अधिकार समाप्त होना — ये सभी भील असंतोष के मूल कारण बने।
- व्यापक बैठ-बेगार (बिना मजदूरी के जबरन श्रम) की प्रथा, महुए के फूलों से देशी शराब 'मावड़ी' बनाने की परंपरागत छूट का समाप्त होना, तथा समान सामाजिक स्थिति वाले अन्य समुदायों की तुलना में भीलों के प्रति भेदभावपूर्ण नीति — इन सबने असंतोष को और गहरा किया, और राज्य अधिकारी-जागीरदार भू-राजस्व, वन कानून, बेगार व आबकारी जैसे मामलों में भीलों के साथ कठोरता से पेश आते थे।
- 19वीं सदी के प्रारंभ में भोमट के भीलों ने मार्गों को रोककर बोलाई कर व चौकीदारी कर वसूलना शुरू कर दिया, वन क्षेत्रों में खेती व लकड़ी संग्रह पर कर लगाए गए और चुंगी चौकियों से दैनिक वस्तुएँ महँगी हो गईं — प्रारंभिक विद्रोह इसी नई व्यवस्था और जंगल में बाहरी हस्तक्षेप के प्रति स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया थे।
⚔️विद्रोहों की शृंखला (1819-1867)
- 1819-20 में उदयपुर रियासत के भीलों ने अपने क्षेत्र की नाकेबंदी कर विद्रोह किया, जिसे रियासती व अँग्रेजी सेनाओं के संयुक्त अभियान ने 1823 के अंत तक ही दबाया; मई 1825 में डूँगरपुर के भील मुखियाओं ने रियासत से समझौता किया, जबकि जनवरी 1826 में उदयपुर के गरासिया भील मुखिया दौलत सिंह व गोविंद राम का विद्रोह उनके आत्मसमर्पण के बाद ही थमा।
- 1836 में बाँसवाड़ा में भी छुटपुट भील विद्रोह दबाए गए, और उसी वर्ष भील दमन के लिए 'जोधपुर लीजन' सेना का गठन किया गया (1837 में इसका मुख्यालय अजमेर से सिरोही के बड़गाँव स्थानांतरित हुआ); अप्रैल 1841 में गवर्नर जनरल ने भील सैनिकों से बनी अर्ध-सैनिक 'मेवाड़ भील कोर' के गठन को मंजूरी दी, जिसका मुख्यालय खैरवाड़ा में स्थापित हुआ।
- दिसंबर 1855 में उदयपुर के कालीबास क्षेत्र में भड़के भील विद्रोह को मेहता सवाई सिंह के नेतृत्व वाली सेना ने गाँव जलाकर व अनेक जानें लेकर कुचला, और 1867 में खैरवाड़ा-डूँगरपुर क्षेत्र में हुए एक और विद्रोह को मेवाड़ भील कोर ने दबा दिया।
🤝बारापाल विद्रोह व 1881 का समझौता
- 1881 में बारापाल के भीलों का विद्रोह भड़का और 26 मार्च 1881 को मामा अमानसिंह के नेतृत्व वाली उदयपुर सेना व लोनारगन की अँग्रेजी सेना ने भील गाँवों में आग लगा दी; इसके विरोध में नीमा, खेमा व जोयता जैसे गमेती नेताओं की अगुवाई में करीब 8000 भीलों ने संयुक्त सेना को घेर लिया।
- महाराणा के निजी सचिव श्यामलदास ने ऋषभदेव मंदिर के पुजारी खेमराज भंडारी के माध्यम से भील नेताओं से बातचीत कर 25 अप्रैल 1881 को समझौता कराया, जिसमें आधा बराड़ कर माफ करने, भविष्य में जनगणना से न सताने व विद्रोही भीलों को क्षमा देने की शर्तें रखी गईं — बदले में भीलों ने कानून पालन का वचन दिया, जिससे गोविंद गिरी के संगठित आंदोलन के उदय तक भील कुछ समय शांत रहे।
गोविंद गिरी व भगत आंदोलन
बंजारा परिवार में जन्मे एक संन्यासी ने भीलों को नशा, अंधविश्वास व अन्याय से मुक्ति का मार्ग दिखाया, और यही सामाजिक-धार्मिक जागरण आगे चलकर मानगढ़ की पहाड़ी पर एक भीषण बलिदान में बदल गया।
🕉️गोविंद गिरी का प्रारंभिक जीवन
- गोविंद गिरी का जन्म 20 दिसंबर 1858 को डूँगरपुर राज्य के बाँसिया (बेड़सा) गाँव में एक बंजारा परिवार में हुआ; युवावस्था में पत्नी व बच्चे की मृत्यु के बाद उनका मन वैराग्य की ओर मुड़ गया और वे संन्यासी बन गए।
- उन्होंने कोटा-बूँदी के दशनामी अखाड़े के गुरु राजगिरी से दीक्षा ली और स्वामी दयानंद सरस्वती व आर्य समाज की शिक्षाओं से गहरे प्रभावित हुए; बेड़सा के निकट छाणी डूँगरी में अपनी पहली धूणी स्थापित कर उसके आगे 'सात निशान' (सात ध्वज) लगाए, जबकि सुराता गाँव का कुरा (कुरिया) उनका प्रथम शिष्य बना।
- गोविंद गिरी ने भीलों को नैतिक-आध्यात्मिक शिक्षा देनी शुरू की — शराब व मांस त्यागने, हत्या-व्यभिचार-लूटपाट से दूर रहने, माता-पिता की आज्ञा मानने और एक ईश्वर में आस्था रखने का उपदेश देकर उन्होंने हजारों अनुयायी बना लिए।
🚩सम्प सभा व भगत पंथ
- दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रेरित होकर गोविंद गिरी ने मेवाड़, डूँगरपुर, गुजरात व मालवा के भील-गरासियाओं को संगठित करने हेतु 'सम्प सभा' की स्थापना की (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 1883 ई., जबकि कुछ स्रोतों में 1903-1905 ई. भी बताया गया है); इसका उद्देश्य भीलों में सामाजिक-राजनीतिक चेतना जगाना, आपसी मेल-मिलाप स्थापित करना तथा व्यसनों, कुरीतियों व विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना था।
- सम्प सभा के नियमों में शराब-मांस का त्याग, चोरी-डकैती-लूटमार से परहेज़, गाँव-गाँव में स्कूल खोलना, नित्य स्नान-पूजा-हवन, पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधारना, विवादों को पंचायत में निपटाना, बेगार से इनकार तथा स्वदेशी वस्त्रों का प्रयोग शामिल था; मानगढ़ धाम इन गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना और भीलों को हिंदू धर्म के दायरे में बनाए रखने के लिए उन्होंने 'भगत पंथ' की स्थापना भी की, जिसके अनुयायी 'भगत' कहलाए।
- गुरु गोविंद गिरी ने सम्प सभा का पहला अधिवेशन 1903 ई. में मानगढ़ पहाड़ी पर आयोजित किया, और 1907 में बेड़सा गाँव से भीलों-कोलियों को उपदेश देना शुरू किया, जिससे शराब की खपत व राज्य के आबकारी राजस्व में गिरावट आई; उनकी शिक्षाओं ने भीलों को आदिवासी राजपूत ठाकुरों-अधिकारियों की आज्ञा मानने से इनकार करना सिखाया, जिसके चलते राज्यों ने उनके पंथ-प्रचारकों को भू-भाग से बेदखल करना शुरू कर दिया।
🚶निष्कासन व पुनरागमन
- डूँगरपुर के जागीरदारों-अधिकारियों ने अनेक स्थानों पर पंथ के ध्वज फाड़े व धूणियाँ मिटाईं, जिससे 1908 में गोविंद गिरी को बेड़सा गाँव व दक्षिण राजस्थान का भील क्षेत्र छोड़ना पड़ा; इसके बाद उन्होंने बम्बई सरकार के अधीन ईडर व सूंथ (गुजरात) के भीलों के बीच अपना धार्मिक सुधार कार्य जारी रखा और उन्हें अपने प्राकृतिक अधिकारों व शोषण के प्रति जागरूक किया।
- डूँगरपुर-बाँसवाड़ा के सदियों से शोषित भीलों को संगठित कर चलाया गया यह पूरा सामाजिक जागरण अभियान 'भगत आंदोलन' कहलाया, जिसमें सुर्जी भगत व पुंजा धीर उनके प्रमुख साथी बने; 1910 तक मुख्यतः गुजरात में सक्रिय रहने के बाद 1911 में गोविंद गिरी अपने जन्मस्थान बेड़सा लौट आए, वहाँ पुनः धूणी स्थापित कर भील-बहुल गाँवों में धूणियाँ व कोतवाल नियुक्त किए और भील पंचायतें भी गठित कीं — बेड़सा फिर भील गतिविधियों का केंद्र बन गया।
💥मानगढ़ हत्याकांड (1913)
- आंदोलन के बढ़ते प्रभाव से घबराकर अप्रैल 1913 में डूँगरपुर पुलिस ने गोविंद गिरी को गिरफ्तार कर तीन दिन बाद राज्य छोड़ने की सलाह के साथ रिहा किया; ईडर के रोजड़ा गाँव में भी गिरफ्तारी का खतरा भाँपकर वे अक्टूबर 1913 में अपने साथियों सहित बाँसवाड़ा-सूंथ सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर चले गए, जहाँ किलेबंदी कर आंदोलन का संचालन शुरू किया।
- उनके आह्वान पर हजारों भील रसद व शस्त्र लेकर मानगढ़ पर जमा हो गए, और स्थिति की जानकारी लेने आए जमादार यूसुफ खान व सिपाही गुलमोहम्मद को बंदी बना लिया गया, जिससे बाँसवाड़ा-डूँगरपुर-ईडर की रियासतें आशंकित हो उठीं; नवंबर 1913 के दूसरे सप्ताह में कर्नल शटन के आदेश पर मेवाड़ भील कोर, बड़ौदा की 104वीं वेलेजली राइफल्स व अहमदाबाद की सातवीं राइफल राजपूत रेजिमेंट को संयुक्त रूप से वहाँ भेजा गया।
- 12 नवंबर 1913 को गोविंद गिरी ने धूणियों की पुनर्स्थापना, बेगार-मुक्ति व पुरानी भू-राजस्व व्यवस्था जैसी माँगों वाला एक माँग-पत्र अँग्रेज अधिकारियों को भेजा, पर वार्ता विफल रहने पर 17 नवंबर 1913 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को संयुक्त सेनाओं ने मानगढ़ पहाड़ी को घेरकर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं, जिसमें बड़ी संख्या में भगत शहीद हुए (RBSE कक्षा 11 की पुस्तक में 1500 शहीदों का उल्लेख है, जबकि कक्षा 9 की पुस्तक 100 मृत व 900 बंदी बताती है) — इसी नरसंहार को राजस्थान में 'जलियांवाला बाग हत्याकांड' के नाम से जाना जाता है।
🕯️मुकदमा, सजा व स्मृति
- गोविंद गिरी व उनके प्रमुख शिष्य पुंजा धीर (डूँगर के पटेल) को बंदी बनाकर संतरामपुर व अहमदाबाद की साबरमती जेल भेजा गया और 'सम्प सभा' को अवैध घोषित कर दिया गया; 2 फरवरी 1914 को गठित विशेष ट्रिब्यूनल ने संतरामपुर में सुनवाई कर गोविंद गिरी को मृत्युदंड व पुंजा धीर को आजीवन कारावास सुनाया, जिसे 28 फरवरी 1914 को अपील पर आजीवन कारावास में और बाद में वायसराय ने 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया।
- सजा पूरी होने से सात वर्ष पहले, 1920 में, गोविंद गिरी को इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे संतरामपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा व कुशलगढ़ में प्रवेश नहीं करेंगे; रिहाई के बाद वे पंचमहल जिले के कम्बोई गाँव में बस गए, 1921-22 में असहयोग आंदोलन में भाग लिया और 30 अक्टूबर 1931 को उनका देहांत हो गया।
- आज भी कम्बोई में उनके समाधि स्थल पर व मानगढ़ धाम में एक-एक चबूतरा बना है, जहाँ हजारों भगत अनुयायी हर वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को श्रद्धांजलि देने जुटते हैं; 2 सितंबर 2002 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मानगढ़ धाम में 'शहीद स्मारक' व एक बॉटेनिकल गार्डन का लोकार्पण किया, और 17 नवंबर 2012 को शताब्दी समारोह में उन्होंने गुरु गोविंद गिरी की प्रतिमा का अनावरण किया — मानगढ़ धाम आज राजस्थान, गुजरात व मध्यप्रदेश के आदिवासियों की गहरी आस्था का केंद्र है।
मोतीलाल तेजावत व एकी आंदोलन
बिजौलिया व गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर एक जैन बनिया युवक ने भोमट के भीलों को 'एकी' के सूत्र में बाँधा और शांतिपूर्ण करबंदी को इतना संगठित आंदोलन बना दिया कि सत्ता उसे दमन से भी नहीं तोड़ पाई।
👤मोतीलाल तेजावत का प्रारंभिक जीवन
- मोतीलाल तेजावत का जन्म 1886 ई. के आसपास (कुछ स्रोतों में 8 जुलाई 1887) झाड़ोल ठिकाने के कोलियारी गाँव में एक ओसवाल बनिया जैन परिवार में हुआ; वयस्क होने पर वे झाड़ोल के जागीरदार के यहाँ 'कामदार' बने, पर आदिवासी भीलों की दयनीय दशा देखकर यह नौकरी अधिक समय तक नहीं कर सके।
- नौकरी छोड़कर उन्होंने आदिवासियों के बीच सीधे काम करना शुरू कर दिया — उनके आंदोलन की नींव भीलों में वर्षों से पनप रहा गहरा असंतोष ही था, जिसे भगत आंदोलन व 1917 के बिजौलिया किसान आंदोलन ने और मजबूत किया था।
📜एकी आंदोलन के कारण व उद्देश्य
- 'बराड़' जैसे राजकीय करों की क्रूरतापूर्ण वसूली, डाकन (डायन) प्रथा पर रोक जैसे सुधारों से आहत धार्मिक भावनाएँ, बिना भू-राजस्व चुकाए खेती व वनोत्पाद संचय के परंपरागत अधिकारों पर पाबंदी, तम्बाकू-अफीम-नमक पर नए कर तथा अत्यधिक लाग-बाग व बैठ-बेगार — इन सभी ने भीलों में गहरा असंतोष भर दिया।
- 1921 में बैसाख पूर्णिमा को चित्तौड़गढ़ की राशमी तहसील में मातृकुण्डिया मेले पर किसानों की एक सभा में तेजावत ने एकी आंदोलन का शंखनाद किया; इसके उद्देश्य राज्य-जागीरदारों के शोषण का विरोध, राज्य-जागीर कचहरियों का बहिष्कार, लगान दरें घटवाना, अन्यायपूर्ण लागतें हटवाना, बैठ-बेगार से मुक्ति, जंगली सूअरों से फसल-रक्षा, वनोत्पाद के निःशुल्क प्रयोग तथा कुरीतियों-अंधविश्वासों को दूर कर भील-गरासियों में एकता स्थापित करना था।
📢मेवाड़ की पुकार व आंदोलन का आरंभ
- तेजावत ने 21 माँगों वाली एक पुस्तिका 'मेवाड़ की पुकार' तैयार कर महाराणा को सौंपी, जिनमें से वन सम्पदा, बैठ-बेगार व सूअरों से संबंधित तीन माँगें अस्वीकार कर दी गईं; इससे रुष्ट होकर जुलाई 1921 में झाड़ोल ठिकाने को केंद्र बनाकर तेजावत के नेतृत्व में करबंदी सहित असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ, जिसे व्यापक जन-समर्थन मिला।
- 19 अगस्त 1921 को झाड़ोल ठाकुर ने भीलों को भड़काने के आरोप में तेजावत को गिरफ्तार किया, पर भीलों के भारी संख्या में झाड़ोल जुट जाने पर उन्हें छोड़ना पड़ा; 1 अक्टूबर 1921 को पानरवा के भील भी इस आंदोलन से जुड़ गए, जो शांतिपूर्ण होते हुए भी भीलों को इतना संगठित कर चुका था कि दमन से भी नहीं टूटा।
🔫नीमड़ा हत्याकांड (1921)
- तेजावत ने विजयनगर राज्य के नीमड़ा गाँव में 1921 में एक सम्मेलन बुलाया, जिसे विफल करने के लिए मेवाड़ भील कोर के सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियाँ बरसाकर लगभग 1200 आदिवासी भीलों की जान ले ली — इसका उद्देश्य किसानों को आतंकित कर एकी आंदोलन को कुचलना था, और इस गोलीकांड में तेजावत स्वयं भी घायल हुए।
- इसके बावजूद उसी वर्ष तेजावत के नेतृत्व में हजारों किसान-आदिवासियों ने महाराणा को ज्ञापन सौंपने उदयपुर की यात्रा की, पर महकमा खास ने भूमि कर सुधार, बैठ-बेगार व सूअरों के उत्पात जैसी शिकायतों पर केवल आश्वासन दिया और कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिससे नाराज भीलों ने लगान चुकाना बंद कर दिया, बिना अनुमति सूअर मारना व आरक्षित वनों में पशु चराई शुरू कर दी।
🗺️उदयपुर की रियायतें व सिरोही में विस्तार
- 31 दिसंबर 1921 को महाराणा ने भोमट के कोटड़ा-खैरवाड़ा क्षेत्रों में 50 से अधिक भीलों के जमावड़े पर रोक लगाई व तेजावत की गिरफ्तारी पर 500 रुपये का इनाम घोषित किया, पर 1 जनवरी 1922 को कुछ रियायतें देने का फैसला भी हुआ; जनवरी 1922 में जवास, थाना, छान, मादड़ीपट्टा व खैरवाड़ा जैसे ठिकानों ने बेगार-लाग घटाई और खालसा क्षेत्र में लगान में 20% छूट दी गई, जिससे खैरवाड़ा के भील-गरासिया संतुष्ट होकर आंदोलन से हट गए।
- तेजावत का एकी आंदोलन उदयपुर से आगे बढ़कर सिरोही, दांता, पालनपुर, ईडर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, बूँदी व विजयनगर जैसे राज्यों में फैल गया, और भारी भील-गरासिया आबादी वाला सिरोही राज्य इसका दूसरा प्रमुख केंद्र बना, जहाँ जनवरी 1922 में तेजावत ने अनेक सभाओं के जरिये कर-बंदी व असहयोग का खुला आह्वान किया।
- महात्मा गांधी ने मणिलाल कोठारी को आंदोलन वापस लेने हेतु तेजावत के पास भेजा, पर बिना रियायत के भील-गरासियों को मनाना संभव न होने से यह प्रयास विफल रहा; 7 मार्च 1922 को ईडर राज्य के पोल स्थान पर मेजर सटन की मेवाड़ भील कोर ने भीलों को घेरकर गोलियाँ चलाईं, जिसने आंदोलन को शांत करने के बजाय और तीव्र कर दिया, और 12 अप्रैल 1922 को गरासियों के मुख्य गाँव सियाबा पर हमले में कई गरासियों की जान गई।
🔒दमन, अंतिम रियायतें व आंदोलन का अंत
- मई 1922 में मेजर प्रिचार्ड के नेतृत्व वाली अँग्रेजी सेना ने बेलोरिया (5 मई) तथा भूला व नवापाड़ा (6 मई) गाँवों पर हमला किया; भाखर-सांथपुर-पिंडवाड़ा में अशांति बनी रही, और राजस्थान सेवा संघ के रामनारायण चौधरी व सत्य भक्त की जाँच से यह मामला ब्रिटिश संसद तक पहुँचा, फिर भी भीलों को कोई राहत नहीं मिली — संयुक्त कार्यवाहियों ने अंततः भील-गरासियों का मनोबल तोड़ दिया और 11-12 मई 1922 को गाँव के मुखियाओं ने एकी की शपथ त्यागकर आंदोलन से अलग होने की घोषणा कर दी।
- 23 मई 1922 को सिरोही के शासक ने कुछ रियायतें दीं — आंदोलनकारियों को क्षमा, जले घरों वाले किसानों को उस वर्ष का लगान माफ, सूकड़ी लाग की समाप्ति तथा गोलीकांड में मारे गए किसानों के नाबालिग पुत्रों को वयस्क होने तक लगान-मुक्ति — पर बेगार, लाग-बाग व वन कानूनों पर कुछ नहीं कहा गया, जिन्हें भीलों ने मजबूरी में स्वीकार कर लिया।
- 1923 में तेजावत ने छोछर (देलवाड़ा के निकट) से पोसीना व सिरोही में आंदोलन फिर से खड़ा करने की कोशिश की पर सफल नहीं हुए, जनवरी 1924 में भूमिगत हो गए और 3 जून 1929 को ईडर पुलिस ने खेड़ब्रह्मा गाँव से उन्हें पकड़कर उदयपुर को सौंप दिया, जहाँ मुकदमे के बाद उन्हें 1936 तक सेंट्रल जेल में रखा गया; रिहाई (23 अप्रैल 1936) की शर्त थी कि वे आंदोलन नहीं करेंगे और उदयपुर नहीं छोड़ेंगे — 5 दिसंबर 1963 को उनका निधन हो गया।
मीणा आंदोलन व जनजातीय सामाजिक सुधार
कभी राजस्थान के कई हिस्सों पर शासन करने वाले मीणा समुदाय को औपनिवेशिक दौर में अपराधी जाति घोषित कर दिया गया — और यही अपमान दशकों तक चले एक दृढ़ सुधार आंदोलन की चिंगारी बना।
👑मीणा शासन से हाशिए तक
- मेहनती, निष्ठावान व दबंग स्वभाव के लिए जाने जाने वाले मीणा समुदाय ने कभी राज्य के कई हिस्सों पर शासन किया — कछवाहा शासन से पहले जयपुर-अलवर के खोहगंग, माची, गैटोर व झोटवाड़ा क्षेत्र तथा बूँदी क्षेत्र भी मीणा सत्ता के अधीन थे।
- राजपूत सत्ता के उभार से मीणा शासन समाप्त होने पर वे आजीविका के लिए पहाड़ों-जंगलों में जा बसे और कृषि-वनोत्पाद पर निर्भर हो गए, यहाँ तक कि 19वीं सदी तक केवल खैराड़ क्षेत्र में ही उनका प्रभुत्व शेष बचा; 1818 की संधियों के बाद अँग्रेजों ने उनके स्वतंत्र जीवन पर नियंत्रण हेतु 'सुपरिटेंडेंट ऑफ मीणा डिस्ट्रिक्ट' जैसी प्रशासनिक इकाइयाँ बनाईं और उन्हें 'मीणा रेजीमेंट' में भर्ती किया।
🔥जहाजपुर के मीणा विद्रोह (1851, 1860)
- 1851 में उदयपुर रियासत के जहाजपुर परगने के मीणाओं ने नई भू-राजस्व व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, जिसकी मुख्य वजह नवनियुक्त हाकिम मेहता रघुनाथ सिंह द्वारा प्रशासनिक सुधार की आड़ में जबरन धन वसूली थी; अजीतसिंह के नेतृत्व में उदयपुर व अन्य ठिकानों की संयुक्त सेना ने मीणा गाँवों पर हमला किया, पर जयपुर-टोंक-बूँदी से करीब 5000 मीणा सहायता को पहुँच गए और सघन जंगल-पहाड़ियों में राजकीय सेनाएँ उन्हें परास्त नहीं कर सकीं — दिसंबर 1854 में लंबे सैन्य अभियान के बाद जनवरी 1855 के अंत में ही विद्रोही मीणाओं ने आत्मसमर्पण किया।
- जनवरी 1860 में जहाजपुर में मीणा विद्रोह फिर भड़का, जिसे दबाने महाराणा मेवाड़ ने 29 जनवरी 1860 को चंद्रसिंह के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसने लुहारी व गाढ़ोली गाँवों पर हमला कर विद्रोह कुचल दिया।
🚔सैन्य नियंत्रण व अपराधी जाति कानून
- मीणा उभार को नियंत्रित करने के लिए 1855 में देवली में सैनिक छावनी बनाई गई, जहाँ 1857-60 तक 42वीं देवली रेजीमेंट (मीणा बटालियन) का मुख्यालय रहा और 1921 में इसे 43वीं एरिनपुरा रेजीमेंट के साथ मिलाकर 'मीणा कोर' बनाया गया; इससे पहले 1871 के अपराधी जाति अधिनियम के तहत सभी मीणाओं का पंजीकरण अनिवार्य कर उन्हें नियमित थाना-हाजिरी व यात्रा-अनुज्ञा पत्र का पाबंद बनाया गया था, नियम तोड़ने पर जेल-जुर्माने के साथ।
- मीणाओं की घटती आजीविका व स्वतंत्र सामाजिक जीवन पर अँग्रेजों के बढ़ते प्रतिबंधों ने इनमें से एक वर्ग को लूटमार-नकबजनी-डकैती जैसी गतिविधियों की ओर धकेल दिया, जिसे बहाना बनाकर भारत सरकार ने 1924 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट पारित किया और जयपुर राज्य ने भी 1924 (व 1930) में अपना 'जरायम पेशा कानून' लागू कर सभी मीणा स्त्री-पुरुषों को अपराधी घोषित करते हुए प्रतिदिन थाने में हाजिरी अनिवार्य कर दी।
📖मीणा जागृति व सुधार समितियाँ
- 1912 में सूरजभान बैरवा के प्रयासों से अखिल भारतीय मीणा क्षेत्रीय महासभा का पहला अधिवेशन दिल्ली में हुआ; अपमानजनक जरायम पेशा कानून के विरुद्ध 1933 में छोटूराम झरवाल, महादेवराम पवड़ी व जवाहर मीणा के नेतृत्व में 'मीणा जाति सुधार समिति' बनी, जिसका लक्ष्य सामाजिक कुरीतियों को समाप्त कर शिक्षा फैलाना था; उसी वर्ष 'मीणा क्षेत्रीय महासभा' का भी पुनर्गठन हुआ।
- जैन मुनि मगन सागर द्वारा रचित 'मीणा पुराण' ने मीणा समाज को अपने प्राचीन गौरव का बोध कराया; अप्रैल 1944 में उन्हीं की अध्यक्षता में नीम का थाना में हुए बड़े अधिवेशन में पं. बंशीधर शर्मा की अध्यक्षता वाली जयपुर राज्य मीणा सुधार समिति गठित हुई (राजेन्द्र कुमार मंत्री व लक्ष्मीनारायण संयुक्त मंत्री बने), और 1945 में इसने श्रीमाधोपुर सम्मेलन में तीन-सूत्री कार्यक्रम — कुरीतियाँ मिटाना, जरायम पेशा-क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट-दादरसी जैसे कानून रद्द कराना, तथा चौकीदारी प्रथा समाप्त करना — तय कर राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ा।
🕊️चौकीदारी उन्मूलन व अंततः न्याय (1946-52)
- जुलाई 1946 में सरकार ने स्त्रियों-बच्चों को थाना-हाजिरी से मुक्त किया, और 28 अक्टूबर 1946 को बागावास (तहसील साँभर) के विशाल सम्मेलन में चौकीदार मीणाओं ने स्वेच्छा से चौकीदारी के काम से इस्तीफा दे दिया — इस दिन को 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाया गया।
- बदले में सरकार ने चौकीदारी हेतु दी गई जमीनें वापस ले लीं, जिसके विरोध में 6 जून 1947 को जयपुर में मीणाओं ने विशाल प्रदर्शन किया, जिसमें हजारों को जेल भेजा गया; अंततः हीरालाल शास्त्री व टीकाराम पालीवाल के प्रयासों से मीणाओं के निरंतर संघर्ष का फल मिला और 1952 में यह काला जरायम पेशा कानून पूर्णतः रद्द कर दिया गया।
🎓वनवासी सेवा संघ व भील आश्रम
- भूरेलाल बया, भोगीलाल पण्ड्या व राजकुमार मानसिंह जैसे समाज सुधारकों ने 'वनवासी सेवा संघ' बनाकर भीलों में सामाजिक-राजनीतिक चेतना जगाई, और माणिक्यलाल वर्मा, हरिदेव जोशी व गौरीशंकर उपाध्याय जैसे नाम भी इस प्रयास में जुड़े; इन सबने स्कूल, प्रौढ़ शिक्षा केंद्र व छात्रावास जैसी सुविधाएँ खड़ी कर आदिवासी समाज में नई चेतना फैलाई।
- ठक्कर बापा ने भील सेवा समिति की देखरेख में ऋषभदेव में 'भील आश्रम' की स्थापना की, जो आदिवासी शिक्षा व पुनर्वास के प्रयासों का एक प्रमुख केंद्र बना।