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राजस्थान GK

राजस्थान के किसान आंदोलन

Peasant Movements of Rajasthan

बिजौलिया से लेकर शेखावाटी तक — जानिए कैसे राजस्थान के किसानों ने बेगार, भारी लगान और अनगिनत लागों के विरुद्ध दशकों तक संघर्ष कर जागीरदारी प्रथा की नींव हिला दी।

24 टॉपिक36 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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बिजौलिया किसान आंदोलन

The Bijolia Movement

राजस्थान में किसान संघर्ष की कहानी भीलवाड़ा के बिजौलिया ठिकाने से शुरू होती है, जहाँ चार दशकों के संघर्ष ने पूरे देश का ध्यान खींचा।

🏯पृष्ठभूमि और शुरुआत

  • अंग्रेजी दखल से पहले राजस्थान की भू-राजस्व व्यवस्था में खालसा भूमि (सीधे शासक के अधीन) और जागीर भूमि (सामंतों के नियंत्रण में) का भेद था; अंग्रेजी प्रभाव बढ़ने पर सामंतों का रवैया कठोर होता गया, नई लागतें और बेगार थोपी जाने लगीं, जबकि कुटीर उद्योगों के पतन से भूमि पर निर्भर आबादी भी बढ़ती गई।
  • बिजौलिया मेवाड़ राज्य का एक प्रथम श्रेणी का ठिकाना था, जिसकी स्थापना जगनेर के अशोक परमार ने की थी; 1527 ई. के खानवा युद्ध में उनकी वीरता से प्रसन्न होकर महाराणा सांगा ने उन्हें उपरमाल की जागीर सौंपी थी, और यहाँ मुख्यतः धाकड़ जाति के किसान 'लाटा' व 'कूँता' पद्धतियों से लगान चुकाते थे।
  • 1897 ई. में गंगाराम धाकड़ के पिता के मृत्युभोज पर एकत्र हुए उपरमाल के किसानों ने ठिकाने के अत्याचारों के विरुद्ध महाराणा फतहसिंह तक शिकायत भेजने का फैसला किया; जांच में शिकायतें सही निकलीं, पर कार्रवाई न होने पर ठिकानेदार राव कृष्णसिंह ने शिकायत ले जाने वाले दोनों किसान प्रतिनिधियों को ही निर्वासित कर दिया, जिससे यह पहला प्रयास असफल रहा।

⚖️दमनकारी कर और साधु सीतारामदास का संघर्ष

  • 1903 ई. में राव कृष्णसिंह ने अपमानजनक 'चँवरी कर' लगाया, जिसके तहत हर विवाह पर धन जमा कराना पड़ता था और वर को राव के सामने नतमस्तक होना पड़ता था; व्यापक विरोध और हल न चलाने के आंदोलन के आगे झुकते हुए राव ने न केवल यह कर हटाया बल्कि लगान भी उपज के आधे से घटाकर दो-पाँचवें हिस्से पर ला दिया।
  • 1906 ई. में नए जागीरदार पृथ्वी सिंह ने 'तलवार बँधाई' नामक उत्तराधिकार शुल्क थोपा, जिसके विरुद्ध साधु सीतारामदास, फतहकरण चारण, बृह्मदेव दाधीच जैसे नेताओं ने पूरे ठिकाने में हल-बंदी करवाई; दमन के तहत सीतारामदास को नौकरी से निकाला गया और अन्य नेता जेल भेजे गए, फिर भी उन्होंने जागृति के लिए 'मित्रमंडल' नामक संगठन खड़ा किया।
  • इस पहले चरण के अंत में 81 प्रकार की लाग-बागों में से केवल 6 समाप्त की जा सकीं; 1914 ई. में पृथ्वीसिंह की मृत्यु पर उनका नाबालिग पुत्र केसरी सिंह जागीरदार बना और प्रशासन कोर्ट ऑफ वॉर्ड्स को सौंपा गया, जबकि किसानों को पहले छोड़ी गई परती भूमि फिर से जोतनी पड़ी।

🕊️विजयसिंह पथिक और आंदोलन का संगठित रूप

  • 1917 ई. में मेवाड़ रेजीडेंट की यात्रा और राव की माता की तीर्थयात्रा के लिए बेगार माँगे जाने पर एक किसान गिरधारी कुम्हार की मृत्यु हो गई तथा 300 किसानों ने बेगार न देने की शपथ ली, परंतु नेतृत्व के अभाव में यह प्रतिज्ञा दिशाहीन रही — यह कमी जनवरी 1915 में रासबिहारी बोस के आदेश पर राजस्थान आए विजयसिंह पथिक (मूल नाम भूपसिंह) ने पूरी की।
  • 1916 ई. में साधु सीतारामदास के आग्रह पर आंदोलन से जुड़े पथिक ने बिजौलिया में 'विद्या प्रचारिणी सभा' के तहत पुस्तकालय, पाठशाला और अखाड़ा खोले, मेवाड़ी में हस्तलिखित पत्र 'उपरमाल का डंका' गाँव-गाँव पहुँचाया, और 1917 में बैरीसाल गाँव में 'उपरमाल पंच बोर्ड' बनाकर आंदोलन को संगठित स्वरूप दिया; इसी दौर में माणिक्यलाल वर्मा ने ठिकाने की नौकरी छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े।
  • पथिक ने बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गांधी तक आंदोलन की बात पहुँचाई — तिलक के 'मराठा' में छपे लेखों के दबाव से कैदी नेता रिहा हुए (किसानों की प्रथम विजय), और 1919 के अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में तिलक ने स्वयं बिजौलिया पर प्रस्ताव रखा; अप्रैल 1919 में गठित बिन्दुलाल भट्टाचार्य आयोग की सिफारिश पर सभी बंदी किसान रिहा किए गए।
  • मि. रॉबर्ट हॉलैण्ड के नेतृत्व में भारत सरकार की समिति की मध्यस्थता से 11 जून 1922 को हुए समझौते ने अधिकांश लाग-बाग व कर समाप्त कर दिए — इसे किसानों की अभूतपूर्व विजय माना जाता है — पर जागीरदार ने इसे लागू करने में आनाकानी की, फिर भी 1922 से 1927 तक बिजौलिया शांत रहा।

🏁तीसरा चरण और अंतिम समाधान

  • 1923 में राव के विवाह हेतु बेगार की माँग से तनाव लौटा; 1926-27 के नए बंदोबस्त में ऊँची लगान दरों पर बंदोबस्त अधिकारी ट्रेंच ने समझौता कराया, पर शीघ्र ही वर्मा जी गिरफ्तार कर लिए गए और बेगूँ आंदोलन में सजा काट चुके पथिक को मेवाड़ से निर्वासित कर दिया गया — वे सीमा पार ग्वालियर राज्य के फुसरिया गाँव से आंदोलन की अगुवाई करते रहे।
  • 1929 में पथिक और रामनारायण चौधरी के आंदोलन से हटने के बाद नेतृत्व सेठ जमनालाल बजाज व हरिभाऊ उपाध्याय के हाथों आया; गांधीजी की सलाह पर मालवीय जी के पत्र के बाद 20 जुलाई 1931 को बजाज ने उदयपुर महाराणा से समझौता करा दिया, हालांकि इसका ईमानदारी से पालन नहीं हुआ और वर्मा जी को परिवार सहित कुम्भलगढ़ में नजरबंद कर दिया गया।
  • आंदोलन का अंतिम समाधान 1941 में हुआ, जब नए प्रधानमंत्री सर टी. विजय राघवाचार्य ने राजस्व मंत्री डॉ. मोहन सिंह मेहता को बिजौलिया भेजा; मेहता ने माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में किसानों की सभी माँगें स्वीकार कर लीं — यह वर्मा जी के जीवन की पहली बड़ी सफलता थी, और इसी कारण बिजौलिया आंदोलन को भारत का पहला व्यापक, संगठित व सफल किसान आंदोलन माना जाता है।

👩महिलाओं की भागीदारी

  • माणिक्यलाल वर्मा की पत्नी नारायणी देवी वर्मा ने बिजौलिया की महिलाओं को आंदोलन से जोड़ने का काम किया, जबकि रामनारायण चौधरी की पत्नी अंजना देवी चौधरी ने भी सक्रिय व अग्रणी भूमिका निभाई।
  • लादूराम जोशी की पत्नी रमा देवी ने 1931 में बिजौलिया आंदोलन में भाग लेकर गिरफ्तारी झेली और आगे चलकर 1930 के सत्याग्रह व 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी जेल गईं।
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मेवाड़ व हाड़ौती के अन्य आंदोलन

Other Movements of Mewar and Hadoti

बिजौलिया की चिंगारी जल्द ही मेवाड़ और हाड़ौती के दूसरे ठिकानों तक पहुँची — बेगूँ से लेकर बूँदी तक किसानों ने संगठित होकर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की।

🚩बेगूँ किसान आंदोलन

  • 1921 ई. में रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में बेगूँ के किसान मेनाल के भैरूँकुण्ड में एकत्र होकर मेवाड़ के दीवान दामोदर लाल से मिले और लाग-बाग, बेगार व ऊँची लगान के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प लिया — फसल का कूँता न कराने, कोई लागत या बेगार न देने और सरकारी दफ्तरों-अदालतों के बहिष्कार का निर्णय हुआ।
  • दो वर्ष की टकराव के बाद राजस्थान सेवा संघ और बेगूँ के ठाकुर अनूपसिंह के बीच हुए समझौते को मेवाड़ सरकार ने 'बोल्शेविक समझौता' नाम दिया, जिसके बाद ठाकुर अनूपसिंह को नजरबंद कर दिया गया; जाँच के लिए भेजे गए बंदोबस्त अधिकारी ट्रेंच ने एकतरफा फैसला देकर लगभग सभी लागतों व बेगार को जायज ठहरा दिया।
  • ट्रेंच के फैसले पर बातचीत विफल होने पर 13 जुलाई 1923 ई. को सेना ने घिरे किसानों पर लाठीचार्ज व गोलीबारी की, जिसमें रूपाजी और कृपाजी नामक दो किसान शहीद हुए; इस घटना से क्षुब्ध महाराणा फतहसिंह ने दीवान प्रभाषचंद चटर्जी को अपमानित किया, जबकि पथिक जी आंदोलन की कमान संभालने पर 10 सितंबर 1923 को गिरफ्तार कर पाँच वर्ष की सजा पाई।
  • 1925 ई. में बेगूँ ठिकाने में नया बंदोबस्त लागू हुआ, जिसमें लगान की दरें तय कर 34 प्रकार की लागतें वापस ले ली गईं और बेगार प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

💥बूँदी का बरड़ आंदोलन और डाबी हत्याकांड

  • अप्रैल 1922 में बूँदी के बरड़ क्षेत्र में शुरू हुए किसान आंदोलन का नेतृत्व नयनूराम शर्मा ने किया; सभाओं पर पाबंदी के बावजूद लंबाखोह व निमाणा में बड़ी सभाएँ हुईं, और निमाणा में गिरफ्तार कार्यकर्ता भँवरलाल सुनार 'प्रज्ञाचक्षु' को किसानों की भीड़ ने खुद छुड़ा लिया।
  • जून 1922 में गिरफ्तार 17 किसानों को रास्ते में 300 महिलाओं के एक जत्थे ने मुक्त करा लिया, जिसमें कई महिलाएँ घायल हुईं; बिजौलिया के नेता विजयसिंह पथिक ने भी बूँदी शासक को पत्र लिखकर किसानों की शिकायतें दूर करने की माँग की।
  • 2 अप्रैल 1923 ई. को बूँदी के डाबी नामक स्थान पर पुलिस अधीक्षक इकराम हुसैन के आदेश पर भीड़ पर गोली चलाई गई, जिसमें झंडा गीत गा रहे नानक भील और देवलाल गूजर शहीद हुए — यह बूँदी किसान आंदोलन की सबसे भीषण घटना मानी जाती है, और माणिक्यलाल वर्मा ने नानक भील की स्मृति में 'अर्जी' शीर्षक से गीत रचा।
  • बूँदी का किसान आंदोलन पूरी तरह राज्य के विरुद्ध था (जबकि मेवाड़ में मुख्यतः जागीरदारों के विरुद्ध संघर्ष हुआ) और इसमें महिलाओं की भारी भागीदारी रही; 1927 के बाद राजस्थान सेवा संघ के भीतरी विरोधाभासों के चलते संघ के बिखरने के साथ यह आंदोलन भी अपने आप ठंडा पड़ गया।

🐄बूँदी का गुर्जर आंदोलन

  • गुर्जर-मीणा किसानों का यह आंदोलन (1936-1945) मृत्युभोज (नुक्ता) पर प्रतिबंध, चरागाहों की निरंतर कटाई, पशुगणना और ऊँची राजस्व दरों के विरुद्ध हिण्डोली क्षेत्र में उभरा; 5 अक्टूबर 1936 को धूलेश्वर महादेव मंदिर पर 90 गाँवों के प्रतिनिधि एकत्र होकर सरकार को माँग पत्र भेजा, और यह आंदोलन 1945 में राजस्व मंत्री के हस्तक्षेप से शांत हुआ।
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अलवर व भरतपुर के किसान आंदोलन

Peasant Movements of Alwar and Bharatpur

पूर्वी राजस्थान की अलवर और भरतपुर रियासतों में भूमि बंदोबस्तों और सांप्रदायिक तनावों ने किसानों को कई मोर्चों पर संघर्ष के लिए प्रेरित किया, जिनमें नीमूचाणा की घटना सबसे रक्तरंजित रही।

📜अलवर के भूमि बंदोबस्त

  • अलवर में अधिकारी एम.एफ.ओ. डायर द्वारा 1900 में लागू दूसरे बंदोबस्त में लगान की दर उपज के एक-तिहाई से दो-पाँचवें हिस्से के बीच रखी गई थी, और राजपूत-ब्राह्मण जैसे वर्गों को चौथाई की विशेष छूट मिली थी; 1923-24 में पंडित एन.एल. टिक्को के तीसरे बंदोबस्त ने भू-राजस्व बढ़ाते हुए यह जातिगत रियायत ही समाप्त कर दी, जिससे राजपूत व ब्राह्मण किसानों तथा बिस्वेदारों में गहरा असंतोष फैला।
  • मंदिरों को दी गई माफी भूमि को खालसा घोषित किए जाने पर बानसूर और थानागाजी के राजावत व शेखावत राजपूत किसानों ने पुरानी दर (उपज का एक-चौथाई) पर ही लगान चुकाने का प्रण लिया, जो आगे चलकर नीमूचाणा के संघर्ष की पृष्ठभूमि बना।

🩸नीमूचाणा हत्याकांड

  • अक्टूबर 1924 में माधोसिंह व गोविंदसिंह के नेतृत्व में शुरू इस आंदोलन में किसानों ने नई ऊँची दरों पर लगान देने से इनकार किया; जनवरी 1925 में 200 राजपूत किसानों ने 'पुकार' पर्चे में शिकायतें छापकर दिल्ली की अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा में बाँटीं, और उनकी माँगों में लगान घटाना, चराई कर हटाना व माफी भूमि जब्त न करना शामिल था।
  • मई 1925 की शुरुआत में बड़ी संख्या में हथियारबंद राजपूत ठाकुर व किसान नीमूचाणा में जमा होकर फौज का सामना करने को तैयार हो गए; महाराजा जयसिंह द्वारा 7 मई को भेजा गया जनरल रामभद्र ओझा का आयोग बेअसर रहा, और 13-14 मई 1925 को कमांडर छाजूसिंह के आदेश पर सेना ने गाँव में मशीनगनों से गोलियाँ चलाईं, जिसमें जाँच समिति के अनुसार 95 लोग शहीद हुए और 250 घायल हुए।
  • गांधीजी ने इस हत्याकांड को 'जलियाँवाला बाग से भी वीभत्स' और 'दोहरी डायरशाही' बताया, दिल्ली के 'रियासत' समाचार पत्र ने भी इसकी तुलना जलियाँवाला बाग से की, और 18 जून 1925 को बंबई में सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में एक विरोध सभा हुई; 39 गिरफ्तार लोगों में से 30 को सज़ा हुई, पर महाराजा ने चरणबद्ध ढंग से रिहा करते हुए 3 जनवरी 1926 तक सभी प्रमुख नेताओं को छोड़ दिया।
  • महाराजा जयसिंह स्वयं नीमूचाणा गए और 18 नवंबर 1925 को लिखित आदेश जारी कर घोषणा की कि भू-राजस्व पुराने बंदोबस्त के अनुसार ही लिया जाएगा, जिससे राजपूत किसानों की यह लड़ाई अपने आप समाप्त हो गई।

🕌मेव आंदोलन

  • 1932 ई. में अलवर सरकार द्वारा निजी (विशेषतः इस्लामिया) स्कूलों पर पाबंदी और 'रजिस्ट्रेशन ऑफ सोसायटी एक्ट' लागू करने के विरोध में मेवात क्षेत्र के मेव समुदाय ने विद्रोह किया, जिसमें 22 जुलाई 1932 को पुलिस लाठीचार्ज के बाद लगभग 10,000 मेवों ने भरतपुर, गुड़गाँव, हिसार, रेवाड़ी जैसे क्षेत्रों में सामूहिक पलायन कर दिया।
  • अंबाला के गुलाम-भीक-नारंग, गुड़गाँव के यासीन खान और अलवर के डॉ. मोहम्मद अली की 'कौंसिल ऑफ एक्शन' ने नवंबर 1932 में तिजारा, किशनगढ़ व रामगढ़ जैसे इलाकों में लगान न देने का आह्वान कर साम्प्रदायिक असंतोष को किसान आंदोलन में बदल दिया; जनवरी 1933 में गोविंदगढ़ में सैनिक टुकड़ी पर हमले जैसी घटनाओं के बाद फ्लैग मार्च व हवाई पर्चों से शांति बहाल करने की कोशिश हुई।
  • 1933 में नए प्रधानमंत्री एफ.वी. वाइली और राजस्व मंत्री ए.डब्ल्यू. इबटसन ने भू-राजस्व का पुनर्आकलन करवाया, जिससे पाँच निजामतों में औसत राजस्व 20-25% (कुछ मामलों में 50% तक) घट गया — इससे मेवों की शिकायतें दूर हुईं और आंदोलन अपने आप शांत हो गया।

🏛️अलवर प्रजामंडल का किसान आंदोलन

  • 1938 में हरिनारायण शर्मा व कुंज बिहारी लाल मोदी द्वारा स्थापित अलवर राज्य प्रजामंडल को अगस्त 1940 में पंजीकरण तो मिला पर अपना झंडा रखने की अनुमति नहीं मिली; 1-2 अप्रैल 1941 को राजगढ़ में आयोजित 'जागीर प्रजा माफी कॉन्फ्रेंस' में सत्यदेव विद्यालंकार ने बेगार, लाग-बाग व ऊँची राजस्व दरों को समाप्त करने की माँग रखी, जिसमें 300 गाँवों के लगभग 500 किसान शामिल हुए।
  • फरवरी 1946 में खेड़ा मंगलसिंह गाँव की सभा के बाद कई नेताओं को बंदी बना लिया गया और अलवर नगर में एक सप्ताह की हड़ताल हुई; 8 फरवरी को पूरे राज्य में 'दमन विरोधी दिवस' मनाया गया, और अंततः हीरालाल शास्त्री की मध्यस्थता से 10 फरवरी 1946 को आंदोलनकारी रिहा हुए — 1947 में अंतरिम सरकार बनने पर नेहरू की सलाह पर यह संघर्ष समाप्त कर दिया गया।

🌾भरतपुर किसान आंदोलन

  • 1930-31 की वैश्विक मंदी और नए ऊँचे बंदोबस्त से नाराज़ भोजी लम्बरदार के नेतृत्व में 23 नवंबर 1931 को लगभग 500 किसान भरतपुर में जमा हुए; उनकी गिरफ्तारी के बावजूद बढ़ते दबाव में कौंसिल ऑफ स्टेट को नया बंदोबस्त पाँच साल के लिए टालना पड़ा।
  • 1938 में ठाकुर देशराज के नेतृत्व में जाट सभा का नाम 'किसान जर्मींदार सभा' रखा गया, पर झंडे को लेकर मतभेद से यह जाट सभा और 'लाल झंडा किसान सभा' में बँट गई; 5 जनवरी 1947 को केवलादेव झील में एक शिकार के दौरान जाटों-कोलियों से हुए दुर्व्यवहार पर लाल झंडा किसान सभा, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस व भरतपुर प्रजा परिषद ने मिलकर सत्याग्रह छेड़ा और 28 जनवरी को राजपूताना भर में 'भरतपुर दिवस' मनाया गया।
  • इस बेगार-विरोधी आंदोलन का समापन 18 जनवरी 1948 को गिरफ्तार नेताओं के वारंट वापस लेकर उन्हें रिहा किए जाने से हुआ।
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मारवाड़ व बीकानेर के किसान आंदोलन

Peasant Movements of Marwar and Bikaner

पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) और बीकानेर राज्यों में किसानों ने बेगार, भारी लगान और असंख्य लागतों के विरुद्ध दशकों तक संघर्ष कर अंततः जागीरदारी उन्मूलन के लिए ज़मीन तैयार की।

🐎मारवाड़ किसान आंदोलन का उदय

  • मारवाड़ में किसान अपनी लगभग आधी उपज लगान में तथा अतिरिक्त 136 प्रकार की लाग-बाग व बेगार में गँवाते थे; 1929 में मारवाड़ हितकारिणी सभा ने जयनारायण व्यास की अगुवाई में आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया और उनके पत्र 'तरुण राजस्थान' में छपे लेखों से प्रेरित होकर किसानों ने जागीरदारों को लगान देना बंद कर दिया।
  • आंदोलन को कुचलने के लिए जोधपुर के पुलिस महानिरीक्षक ने व्यास व उनके साथियों पर 'बोल्शेविक' कार्रवाई की सिफारिश की, फिर भी सरकार को 1 जून 1929 को पूरे मारवाड़ में बेगार को कानूनन अवैध घोषित करना पड़ा; 1931 के पुष्कर अधिवेशन में जोधपुर महाराजा से बेगार पूरी तरह समाप्त करने की माँग खारिज हुई, और सरकार ने 1932-33 में मारवाड़ हितकारिणी सभा सहित कई संगठनों को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

💰बिगोड़ी और पट्टा समर्पण आंदोलन

  • 1921-26 के मि. ड्रेक ब्रेकमेन के भूमि-बंदोबस्त में नकद भू-कर 'बिगोड़ी' को डेढ़ गुना बढ़ा दिया गया; मंडोर क्षेत्र के माली किसानों की 1931 की रियायत की माँग ठुकराए जाने पर उन्होंने लगान न देने का फैसला किया, और 29 मार्च से 30 अप्रैल 1933 के बीच अपनी भूमि के पट्टे तक सरकार को लौटा दिए।
  • अंततः 16 जून 1934 को सरकार ने अगले तीन वर्षों के लिए बिगोड़ी की रकम में प्रति रुपये तीन आने की छूट देने की घोषणा की, जिससे किसानों को कुछ राहत मिली।

🚨मारवाड़ लोक परिषद और डाबड़ा काण्ड

  • 16 मई 1938 को स्थापित मारवाड़ लोक परिषद ने मारवाड़ किसान सभा (स्थापना 27 जून 1941) के साथ मिलकर 'जागीरदारी प्रथा का नाश हो' जैसे नारों से जागृति फैलाई; 25-26 अप्रैल 1943 को सर छोटूराम चौधरी की अध्यक्षता में हुए दूसरे अधिवेशन में महाराजा उम्मेदसिंह ने खुद जागीरी इलाके में भूमि-बंदोबस्त कराने की घोषणा की।
  • 28 मार्च 1942 को चण्डावल में 'उत्तरदायी शासन दिवस' मनाने गए लोक परिषद कार्यकर्ताओं पर ठाकुर के आदमियों ने लाठियों-भालों से हमला किया, और अगले दिन नीमाज की सभा में भी लगभग 200 आदमियों ने हमला कर दिया; इस निष्क्रियता के विरोध में 24 अप्रैल 1942 को पूरे मारवाड़ में 'जागीरी अत्याचार दिवस' मनाया गया।
  • 13 मार्च 1947 को डाबड़ा (डीडवाना) में लोक परिषद व किसान सभा की सभा को चुनौती मानते हुए वहाँ के जागीरदार ने 5-6 हज़ार जुटे किसानों पर हमला करवाया, जिसमें पन्नाराम, चुन्नीलाल शर्मा, निम्बी जोधा व नंदाराम अड़कसर मारे गए — इस काण्ड के बाद पुलिस महानिरीक्षक बख्तावर सिंह को हटाने की माँग उठी।

⚖️मारवाड़ के भूमि सुधार कानून (1948-49)

  • 9 नवंबर 1948 को 'द मारवाड़ एबोलिशन ऑफ सेसेज एक्ट' से जागीरी गाँवों में लगान के अतिरिक्त वसूली जाने वाली सभी लागें समाप्त हुईं, और 15 दिसंबर 1948 को 'जागीरदार्स ज्यूडिशियल पावर एबोलिशन एक्ट' से जागीरदारों के न्यायिक अधिकार छीन लिए गए।
  • 14 फरवरी 1949 को 'डायरेक्ट मैनेजमेंट ऑफ जागीर एस्टेट्स एक्ट' से लगान वसूली की जिम्मेदारी रेवेन्यू अफसरों को सौंपी गई, और 6 अप्रैल 1949 को मारवाड़ लैंड रेवेन्यू व टिनेन्सी एक्ट के तहत किसानों को उनकी भूमि का मालिकाना हक मिल गया — इस तरह जागीरी समस्या का लगभग समाधान हो गया।

🌊बीकानेर का गंगनहर व जागीरी क्षेत्र आंदोलन

  • बीकानेर राज्य के पहले किसान आंदोलन की शुरुआत 1929-30 में गंगनहर क्षेत्र में सरदार दरबार सिंह की 'जमींदारा एसोसिएशन' के बैनर तले हुई; इसके दबाव में महाराजा गंगासिंह ने मार्च 1930 में कई राहतों की घोषणा की, फिर भी आबियाना (सिंचाई कर) और ब्याज को लेकर संघर्ष चलता रहा।
  • मई 1941 में सात नेताओं की गिरफ्तारी और नज़रबंदी के बाद भी दबाव बना रहा, और अंततः जब्त कृषि भूमि किसानों को लौटाई गई तथा नहरों से भरपूर पानी देने के आश्वासन के साथ यह आंदोलन 1942 के अंत तक धीरे-धीरे शांत हो गया।
  • बीकानेर के जागीरी क्षेत्रों में किसान 37 प्रकार की अतिरिक्त लागतों से त्रस्त थे; 1934 की याचिका बेअसर रहने पर महाजन ठिकाने के किसानों ने जनवरी 1939 में लगान रोकने का फैसला किया, जिसके जवाब में जागीरदार ने पुलिस की मदद से जबरन वसूली की, पर अंततः रियासती अधिकारियों की मध्यस्थता से रियायतों वाला समझौता हो गया, जिसने कुम्भन व पूगल जैसे अन्य ठिकानों के किसानों को भी जगाया।

दुधवाखारा, राजगढ़ व कांगड़ के आंदोलन

  • जिस तरह बिजौलिया ने पूरे देश का ध्यान खींचा था, उसी तरह चौधरी हनुमान सिंह के नेतृत्व में चला दुधवाखारा किसान आंदोलन (1943-47) भी राष्ट्रीय नेताओं तक पहुँचा; हनुमान सिंह को 20 जून 1945 को छल से गिरफ्तार किया गया, और महाराजा द्वारा 100 मुरब्बा जमीन के लालच को उन्होंने ठुकरा दिया — फिर भी आज़ादी के बाद तक दुधवाखारा के किसानों पर अत्याचार जारी रहे।
  • 1945-47 में चूरू की राजगढ़ निजामत में स्वामी कर्मानंद के नेतृत्व में उठे आंदोलन में पुलिस ने गाँव-मुखिया को ऊँट के पीछे बाँधकर घुमाया और कई जुलूसों पर लाठीचार्ज किया; नेहरू द्वारा भेजे गए एस. सुभान की जाँच के बाद जिम्मेदार अफसर को निलंबित किया गया, और 1947 में कर्मानंद के प्रजा परिषद अध्यक्ष चुने जाने पर माँग सीधे जागीरदारी उन्मूलन तक जा पहुँची।
  • रतनगढ़ के कांगड़ गाँव में शिकायत लेकर बीकानेर जा रहे 35 किसानों पर ठाकुर गोपसिंह ने 28 अक्टूबर 1946 को हमला करवाया, और जाँच के लिए पहुँचे प्रजा परिषद कार्यकर्ताओं की भी पिटाई की गई — इस अमानवीय व्यवहार की देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
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शेखावाटी का किसान आंदोलन और भूमि सुधार की परिणति

Shekhawati's Movement and the Culmination of Land Reform

जयपुर रियासत के शेखावाटी अंचल में जाट किसानों का संघर्ष तीन दशकों तक चला और कई खूनी घटनाओं से गुजरते हुए अंततः राजस्थान भर में जागीरदारी उन्मूलन की नींव रखने में मददगार बना।

🌾सीकर में पहला चरण

  • बिसाऊ, डूँडलोद, मलसीसर, मंडावा व नवलगढ़ के 'पंचपाना ठिकानों' सहित शेखावाटी में आंदोलन की शुरुआत सीकर ठिकाने से हुई, जहाँ 1922 में नए ठाकुर राव राजा कल्याण सिंह ने 25-50% अधिक भू-राजस्व वसूलना शुरू किया; जयपुर के आर.आई.आर. ग्लांसी की मध्यस्थता से समझौता हुआ, पर 1924 की अच्छी फसल पर फिर से 25% अधिक माँग कर ठिकाने ने समझौता तोड़ दिया।
  • 23 जनवरी 1925 को सीकर पहुँचे रामनारायण चौधरी की बातचीत विफल रहने पर उन्हें और साथी हरिजी ब्रह्माचारी को राज्य से निर्वासित करने का नोटिस मिला, और 4 मार्च 1925 को डोगरा गाँव में 18 किसान नेताओं को बिना वारंट गिरफ्तार किया गया; चौधरी के लंदन के 'डेली हेराल्ड' में लिखे लेखों से इंग्लैंड की संसद तक बात पहुँची, जिसके बाद अप्रैल-मई 1925 में जाँच आयोग बना और इजारा (ठेका) प्रणाली खत्म कर सीधी वसूली शुरू हुई।
  • 1928 में सीकर ठिकाने ने 'इजाफा' नाम से लगान में और वृद्धि कर दी; अक्टूबर 1925 के अखिल भारतीय जाट महासभा अधिवेशन से प्रेरित होकर शेखावाटी में भी जाट सभा बनी, और अंततः 1931 में स्थायी बंदोबस्त विभाग बनने तथा कुँवर रतनसिंह व ठाकुर देशराज जैसे नेताओं के हस्तक्षेप से किसानों को कुछ राहत मिली।

🔥दूसरा चरण, महिलाओं की भागीदारी और नरसंहार

  • 1931 में ठाकुर देशराज द्वारा गठित राजस्थान जाट क्षेत्रीय महासभा के तहत सितंबर 1933 में पलथाना में हुए सम्मेलन ने 'सीकरवाटी जाट किसान पंचायत' की नींव रखी; जनवरी 1934 के 'जाट प्रजापति महायज्ञ' के बाद ठिकाने ने मंत्री देवीसिंह बोचल्या समेत कई नेताओं को गिरफ्तार किया, जिसके विरोध में 200 किसानों का दल फरवरी 1934 में जयपुर के वाइस प्रेसीडेंट सर जॉन बिचम से मिला।
  • 21 जून 1934 को डूँडलोद ठाकुर के भाई ईश्वरसिंह के हमले में जयसिंहपुरा के 4 किसान मारे गए और 23 घायल हुए — जाँच के बाद ईश्वरसिंह को सजा हुई, जो जयपुर राज्य में जाट किसानों की हत्या के लिए दंड दिलाने वाला पहला मामला बना; अप्रैल 1934 में पोसाणा व सिहोट में हुए हमलों की देशव्यापी निंदा हुई, जिसके विरोध में 25 अप्रैल को कटराथल में किशोरी देवी के नेतृत्व में 10,000 महिलाओं का सम्मेलन हुआ, जहाँ उत्तमादेवी के भाषण ने खासा जोश भरा।
  • 23 अगस्त 1934 को कैप्टन वेब के साथ हुए समझौते में 12 लागें समाप्त हुईं और किसान पंचायत को मान्यता मिली, पर पालन न होने पर आंदोलन फिर भड़का; 28 अप्रैल 1935 को वेब के आदेश पर गोठड़ा भूकरका में हुई गोलीबारी में पृथ्वीसिंह व शंभुराम शहीद हुए, 27 मार्च 1935 को खुड़ी गाँव में लाठीचार्ज में दो लोग मारे गए और 100 घायल हुए, तथा 25 अप्रैल 1935 को कूदन में हुई गोलीबारी में चार जाट किसान मारे गए — यह मामला जून 1935 में इंग्लैंड की संसद तक पहुँचा।

🕊️तीसरा चरण और अंतिम समाधान

  • अप्रैल 1938 में सीकर के रावराजा और जयपुर महाराजा मानसिंह द्वितीय के बीच रावराजा के पुत्र को इंग्लैंड भेजने पर मतभेद से हथियारबंद टकराव हुआ, जिसके बाद रावराजा को निर्वासित कर दिया गया; दिसंबर 1938 से 1939 तक चले नए बंदोबस्त में 165 फुट लंबी मानक जरीब से भूमि नापकर पक्के बीघों में दर्ज किया गया, जिसे शेखावाटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर प्रजामंडल के साथ मिलकर आगे बढ़ाया।
  • 1940 में हीरालाल शास्त्री, टीकाराम पालीवाल, सरदार हरलाल सिंह व विद्याधर कुलहरि की समिति द्वारा 25 मार्च 1941 को पेश की गई रिपोर्ट को राज्य के भूमि सुधार इतिहास का 'मैग्नाकार्टा' कहा जाता है; 14 दिसंबर 1942 को जयपुर सरकार ने उदयपुरवाटी को छोड़कर सभी ठिकानों में बेगार प्रथा समाप्त कर दी।
  • 23 दिसंबर 1946 को हरलाल सिंह की अध्यक्षता में हुई सभा में 'जयपुर राज्य किसान सभा' बनी और जागीरदारी प्रथा हटाने की माँग उठी; 1947 में हीरालाल शास्त्री के मुख्यमंत्री बनने और 25 जनवरी 1947 को 'जयपुर जागीर लैंड टेनेंसी एक्ट' पारित होने के बाद मार्च 1947 में यह आंदोलन आखिरकार समाप्त हुआ, हालांकि 14 फरवरी 1947 की चनाणा सभा में भोमियों के हमले में सिंहथल के हनुमानाराम शहीद हो गए थे।

📜राज्यव्यापी भूमि सुधार कानून

  • जागीरी समस्या के स्थायी हल के लिए भारत सरकार ने 20 अगस्त 1949 को सी.एस. वेंकटाचारी की अध्यक्षता में 'राजस्थान मध्य भारत जागीर इन्क्वाइरी कमेटी' बनाई, जिसमें गोकुलभाई भट्ट व ब्रजचंद शर्मा राजस्थान से सदस्य थे; दिसंबर 1949 में समिति ने जागीरी प्रथा समाप्त करने की सिफारिश की, जो आगे चलकर पूरे प्रदेश में सुधार का आधार बनी।
  • इसी दौर में 14 अगस्त 1949 को बनीपार्क, जयपुर में चौधरी बलदेवराम मिर्धा की अध्यक्षता में 'राजस्थान किसान सभा' बनी; इसके बाद राजस्थान सरकार ने जून 1951 में 'राजस्थान उपज लगान नियमन अधिनियम', 18 फरवरी 1952 को 'राजस्थान भूमि सुधार और जागीरों का पुनर्ग्रहण अधिनियम', और 15 अक्टूबर 1955 को 'राजस्थान काश्तकारी विधेयक' पारित कर जागीरदारी प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया।

📰सहयोगी संगठन और विचारक

  • शेखावाटी की राजनीतिक चेतना जगाने में आर्य समाज का बड़ा योगदान रहा — इसकी स्थापना मंडावा के सेठ देवीबक्स सर्राफ ने की थी; 1922 में खेतड़ी ठिकाने के चिड़ावा कस्बे में मास्टर प्यारेलाल गुप्ता (जिन्हें 'चिड़ावा का गांधी' कहा जाता था) ने गुलाबचंद नेमानी जैसे साथियों के साथ 'चिड़ावा सेवा समिति' की स्थापना की।
  • 1929 में झुंझुनूं के पं. ताड़केश्वर शर्मा ने हस्तलिखित पत्र 'ग्राम' निकालकर सामंती तंत्र के विरुद्ध वैचारिक अभियान छेड़ा और 1934 में ठाकुर देशराज के सहयोग से आगरा से 'गणेश' पत्र भी शुरू किया; इसके अलावा श्रीमाधोपुर के बंशीधर शर्मा ने 1945-46 में राजस्थान मीणा सेवा संघ का नेतृत्व करते हुए मीणा समुदाय को कलंकित करने वाले क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को रद्द करवाने में सफलता पाई।