परिचय
गरमपंथी (उग्रवादी या चरमपंथी) बीसवीं सदी के आरंभ (लगभग 1905 से 1919 तक) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर एक महत्वपूर्ण गुट थे। वे नरमपंथियों की प्रार्थना-याचिका की नीति से असंतुष्ट थे और आत्मनिर्भरता, स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा तथा निष्क्रिय प्रतिरोध के माध्यम से स्वराज की मांग करते थे। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) इस धारा के प्रमुख नेता थे। गरमपंथी आंदोलन ने राष्ट्रवादी उत्साह जगाया और जन-भागीदारी का आधार तैयार किया। ध्यान रहे, सशस्त्र क्रांतिकारी (अनुशीलन समिति, अभिनव भारत आदि) इससे अलग धारा थे।
मुख्य अवधारणाएं
1. परिभाषा और मूल विचारधारा
गरमपंथी भारतीय राष्ट्रवाद की उग्र धारा थे, जो स्वराज को अपना लक्ष्य मानते थे और जन-आंदोलन तथा निष्क्रिय प्रतिरोध के माध्यम से उसे पाना चाहते थे। उन्होंने नरमपंथियों की संवैधानिक नीति (याचिका, प्रार्थना) की आलोचना की और ब्रिटिश शासन के प्रति अधिक कठोर रुख अपनाया। उनकी विचारधारा राष्ट्रीय गौरव, प्राचीन भारतीय विरासत और आत्मनिर्भरता पर जोर देती थी।
2. लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति
लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल गरमपंथी नेतृत्व की तिकड़ी थी। लाला लाजपत राय (पंजाब), तिलक (महाराष्ट्र) और पाल (बंगाल) विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रवादी गतिविधियों का नेतृत्व करते थे। उन्होंने पत्रकारिता और जनसभाओं के माध्यम से स्वराज और स्वदेशी के अपने विचारों का प्रचार किया। तिलक ने मराठी में "केसरी" और अंग्रेज़ी में "मराठा" पत्र निकाले।
3. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन
गरमपंथियों ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया, स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दिया और ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया। यह आर्थिक राष्ट्रवाद ब्रिटिश वाणिज्य को कमजोर करने और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता था। विदेशी कपड़े, नमक और अन्य ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार राष्ट्रवादी भावना और साम्राज्यवादी शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की एक मूर्त अभिव्यक्ति बन गई।
4. गरमपंथी बनाम क्रांतिकारी धारा
गरमपंथी कांग्रेस के भीतर रहकर बहिष्कार, स्वदेशी और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे जन-आधारित तरीके अपनाते थे। इनसे अलग क्रांतिकारी धारा थी, जिसने सशस्त्र साधनों का सहारा लिया — जैसे बंगाल की अनुशीलन समिति और विनायक दामोदर सावरकर का अभिनव भारत। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने 1908 में मुज़फ़्फ़रपुर में किंग्सफोर्ड पर बम फेंका था; यह क्रांतिकारी धारा की घटना है। सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह बाद के (1920-40 के दशक के) चरण से संबंधित हैं।
5. राष्ट्रीय शिक्षा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
गरमपंथियों ने ब्रिटिश पाठ्यक्रम से स्वतंत्र राष्ट्रीय शिक्षा पर जोर दिया (1906 में बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना हुई) और भारतीय संस्कृति, दर्शन और इतिहास में गौरव जगाया। तिलक ने गणपति और शिवाजी उत्सवों को जन-जागरण का माध्यम बनाया। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद युवाओं में राष्ट्रवादी चेतना को प्रेरित करने का लक्ष्य रखता था।
महत्वपूर्ण तथ्य
- गरमपंथी चरण लगभग 1905 में बंगाल विभाजन के बाद शुरू हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के अंत (लगभग 1919) तक माना जाता है
- बाल गंगाधर तिलक ने "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" का नारा दिया
- लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन (1905) गरमपंथ के उदय का प्रमुख कारण था
- 1906 के कलकत्ता अधिवेशन (अध्यक्ष: दादाभाई नौरोजी) में स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्ताव पारित हुए
- 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरम दल और गरम दल में बँट गई; अध्यक्ष रासबिहारी घोष थे
- 1908 में तिलक को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष की सजा देकर मांडले (बर्मा) जेल भेजा गया
- 1916 के लखनऊ अधिवेशन में नरम दल और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ
- गरमपंथी पत्र: केसरी और मराठा (तिलक), वंदे मातरम (बिपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष), संध्या (ब्रह्मबांधव उपाध्याय); "यंग इंडिया" गांधीजी का पत्र है (1919 से)
- लाला लाजपत राय का निधन नवंबर 1928 में साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन में लाठीचार्ज से लगी चोटों के बाद हुआ
| आधार | नरमपंथी | गरमपंथी |
|---|---|---|
| प्रमुख नेता | दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता | लाल-बाल-पाल, अरविंद घोष |
| तरीका | प्रार्थना, याचिका, संवैधानिक सुधार | स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, निष्क्रिय प्रतिरोध |
| लक्ष्य | ब्रिटिश शासन के भीतर सुधार | स्वराज |
| आधार वर्ग | शिक्षित मध्यम वर्ग | व्यापक जन-समर्थन की ओर |
- 1905बंगाल विभाजन; स्वदेशी आंदोलन
- 1906कलकत्ता अधिवेशन — चार प्रस्ताव
- 1907सूरत विभाजन
- 1908तिलक की गिरफ्तारी, मांडले जेल
- 1916लखनऊ अधिवेशन — पुनर्मिलन; होमरूल लीग
परीक्षा टिप्स
- मुख्य तारीखें याद रखें: बंगाल विभाजन (1905), सूरत अधिवेशन (1907), और गरमपंथी प्रभुत्व की अवधि
- नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच तरीके, विचारधारा और लक्ष्यों के संदर्भ में स्पष्ट अंतर करें
- लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति और आंदोलन में उनके व्यक्तिगत योगदान पर ध्यान केंद्रित करें
- स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलनों को साम्राज्यवाद की आर्थिक प्रतिक्रिया के रूप में समझें
- गरमपंथ के उदय के कारणों और भारतीय राष्ट्रवाद पर इसके प्रभाव पर उत्तर देने के लिए तैयार रहें
- गरमपंथी और क्रांतिकारी धारा का अंतर समझें
- महत्वपूर्ण गरमपंथी पत्रों (केसरी, मराठा, वंदे मातरम, संध्या) और राष्ट्रवादी विचारों को फैलाने में उनकी भूमिका को जानें
सारांश
गरमपंथी भारतीय राष्ट्रवाद की उग्र धारा थे, जिन्होंने नरमपंथियों की संवैधानिक याचिका-नीति को अस्वीकार कर स्वराज की मांग की। लाल-बाल-पाल त्रिमूर्ति—लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल—के नेतृत्व में उन्होंने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध का मार्ग अपनाया। 1905 के बंगाल विभाजन ने उनके उदय को गति दी, जबकि 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरम दल और गरम दल में बँट गई। 1916 के लखनऊ अधिवेशन में दोनों दलों का पुनर्मिलन हुआ। गरमपंथियों ने जन-भागीदारी और राष्ट्रवादी चेतना का आधार तैयार किया।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •मोहनजोदड़ो का अर्थ है 'मृतकों का टीला'; यह पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है।
- •अशोक ने 261 ई.पू. कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाया और धम्म नीति अपनाई।
- •कबीर दास ने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया; उनके गुरु रामानंद थे।
- •1857 की क्रांति का तात्कालिक कारण एनफील्ड राइफल की चर्बी वाली कारतूस थी।
- •INC की स्थापना 1885 में ए.ओ. ह्यूम ने की; प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी थे।