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राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ: मेवाड़, मारवाड़, किशनगढ़ | RAS

Rajasthan Painting Schools: Mewar, Marwar, Kishangarh

⏱ 14 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· History, Art, Culture, Literature, Tradition & Heritage of Rajasthan

परिचय

राजस्थान की रियासतें केवल दुर्गों और हवेलियों की ही नहीं, बल्कि भारत की कुछ सर्वाधिक विशिष्ट लघुचित्र (मिनिएचर) चित्रकला शैलियों की भी संरक्षक थीं। इन्हें सामान्यतः "राजस्थानी शैली" (या राजपूत शैली) के अंतर्गत एक साथ रखा जाता है, परंतु वास्तव में यह कई क्षेत्रीय शैलियों में बँटी हुई थी, जिनमें से प्रत्येक अपने राजघराने की रुचि, दरबारी कवियों तथा वहाँ बसे चित्रकारों के समूह से आकार लेती थी। यह गाइड तीन सबसे अधिक परीक्षा में पूछी जाने वाली शैलियों पर गहराई से केंद्रित है — मेवाड़ (चित्तौड़गढ़ व बाद में उदयपुर केंद्रित), मारवाड़ (जोधपुर केंद्रित, बीकानेर व नागौर जैसी महत्वपूर्ण उप-शैलियों सहित), तथा किशनगढ़ (प्रसिद्ध "बणी-ठणी" चित्र का घर) — इनके संरक्षकों, चित्रकारों, प्रमुख कृतियों तथा शैलीगत विशेषताओं के साथ-साथ उन बातों की भी चर्चा जो समग्र रूप से राजस्थानी चित्रकला को मुगल व पहाड़ी परंपराओं से अलग करती हैं।

मुख्य अवधारणाएँ

1. मेवाड़ शैली — गहरे रंग व भक्ति-प्रधान कथा-चित्रण

मेवाड़ शैली को सामान्यतः राजस्थानी चित्रकला की सबसे प्राचीन व सबसे शुद्ध/परंपरागत शैली माना जाता है, जिसकी सचित्र परंपरा आहड़ (1260, श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि) तक जाती है और जो 16वीं-17वीं शताब्दी में मेवाड़ के राणाओं के संरक्षण में शास्त्रीय रूप में विकसित हुई — पहले चित्तौड़गढ़ में, और 1568 में राजधानी परिवर्तन के बाद मुख्यतः उदयपुर में (बीच में छोटे पहाड़ी कस्बे चावंड में भी एक महत्वपूर्ण चरण रहा)। मेवाड़ की सबसे प्रारंभिक तिथियुक्त रागमाला चावंड रागमाला (1605) है, जिसके चित्रकार निसारदीन थे और जो महाराणा अमर सिंह प्रथम के लिए बनाई गई — भारतीय शास्त्रीय संगीत के भावों (रागों व रागिनियों) को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने वाली एक सचित्र शृंखला, जो लगभग हर राजस्थानी शैली में प्रिय विषय बन गई। मेवाड़ चित्रकला अपने शास्त्रीय शिखर पर 17वीं शताब्दी के मध्य में महाराणा जगत सिंह प्रथम के शासनकाल में पहुँची, जिनके दरबारी चित्रकार साहिबदीन दो विशाल सचित्र पांडुलिपियों — रामायण (लगभग 1649-53 में पूर्ण) व भागवत पुराण — के लिए प्रसिद्ध हैं। दोनों में सघन, निरंतर-कथा (continuous-narrative) रचना शैली दिखती है, जिसमें एक ही चित्र-फलक में कहानी के कई प्रसंग दीवारों, मंडपों या नदियों जैसे स्थापत्य उपकरणों से विभाजित होकर साथ-साथ दिखाए जाते हैं। मेवाड़ चित्रकला की पहचान है — सपाट, गहरे प्राथमिक रंगों (लाल, पीले, गहरे नीले) का प्रयोग, मोटी काली रूपरेखा, न्यूनतम छायांकन, तथा लगभग पूर्णतः हिंदू धार्मिक साहित्य से लिया गया विषय-वस्तु — रामायण, भागवत पुराण, गीत गोविंद व रागमाला शृंखलाएँ। दरबारी चित्र व शिकार दृश्य भी मिलते हैं, परंतु भक्ति-प्रधान सचित्र पांडुलिपि ही मेवाड़ का सबसे बड़ा योगदान है।

2. मारवाड़ शैली — जोधपुर की दरबारी शैली, बीकानेर व नागौर सहित

मारवाड़ शैली का नाम ऐतिहासिक मारवाड़ क्षेत्र से पड़ा है, जिस पर राठौड़ वंश ने अपनी राजधानी जोधपुर से शासन किया, और इसकी चित्रकला परंपरा को प्रायः एक समूह-शैली (मुख्य शैली) के रूप में देखा जाता है जिसके अंतर्गत कई निकट-संबंधित उप-शैलियाँ आती हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बीकानेर व नागौर हैं (किशनगढ़, यद्यपि एक राठौड़ राजकुमार द्वारा स्थापित, इतनी विशिष्ट व महत्वपूर्ण है कि उसे नीचे एक अलग शैली के रूप में चर्चा की गई है)। महाराजा मान सिंह (19वीं शताब्दी के आरंभ) जैसे शासकों के अधीन जोधपुर चित्रकला में नाथ संप्रदाय के योगियों के चित्रण की ओर एक विशेष झुकाव आया — जो मान सिंह की संत जालंधरनाथ के प्रति निजी भक्ति को दर्शाता है — इसके साथ ही दरबारी दृश्य, राजसी शिकार अभियान, शासक महाराजाओं के चित्र, तथा सचित्र रागमाला व ढोला-मारू लोक-प्रणय शृंखलाएँ इसकी दीर्घकालीन विशेषताएँ रही हैं। बीकानेर उप-शैली इसलिए उल्लेखनीय है कि इसने वास्तविक मुगल तकनीक को निकट से आत्मसात किया — 16वीं-17वीं शताब्दी में, राय सिंह, करण सिंह व अनूप सिंह जैसे शासकों के काल में, शाही मुगल कारखाने में प्रशिक्षित चित्रकार (जैसे उस्ताद अली रज़ा व रुकनुद्दीन) बीकानेर दरबार में आ बसे, और अपने साथ सूक्ष्म ब्रश-कार्य, कोमल छायांकन व यथार्थवादी विवरण लाए, जो स्थानीय राजस्थानी विषय-वस्तु के साथ घुल-मिल गया। मेवाड़ की तुलना में मारवाड़ चित्रकला सामान्यतः कम सघन तथा व्यक्तिगत व्यक्ति-चित्रण व दरबारी समारोहों पर अधिक केंद्रित होती है।

3. किशनगढ़ शैली — बणी-ठणी और भक्ति की कला

किशनगढ़ की स्थापना 1609 में जोधपुर के राठौड़ शासक के पुत्र किशन सिंह ने की थी, इसीलिए इस रियासत की आरंभिक चित्रकला की जड़ें मारवाड़ से जुड़ी हैं, यद्यपि इसकी परिपक्व शैली पूर्णतः अपनी बन गई। यह परिपक्व शैली 18वीं शताब्दी के मध्य में राजा सावंत सिंह (शासनकाल लगभग 1748-1764) के अधीन फली-फूली — एक शासक-कवि जिन्होंने "नागरीदास" उपनाम से कृष्ण-भक्ति काव्य रचा। उनके दरबारी चित्रकार निहालचंद को शैली के सबसे प्रसिद्ध चित्र — जो आज लोकप्रिय रूप से "बणी-ठणी" (शाब्दिक अर्थ "सजी-धजी" या "बनी-ठनी") नाम से जाना जाता है — के सृजन का श्रेय दिया जाता है। पारंपरिक मान्यता है कि यह सावंत सिंह के दरबार की गायिका-कवयित्री विष्णुप्रिया पर आधारित था, जिन्हें "बणी-ठणी" उपनाम मिला, और इसे प्रायः राधा के आदर्शीकृत रूप के रूप में देखा जाता है, जबकि नागरीदास-निहालचंद की व्यापक कृतियों में सावंत सिंह स्वयं कृष्ण के रूप में चित्रित मिलते हैं। 18वीं शताब्दी के मध्य में बना यह चित्र अपनी प्रतिष्ठित पहचान के कारण बाद में लोकप्रिय रूप से "भारत की मोनालिसा" कहलाने लगा, यद्यपि यह तुलना एक बाद की, अनौपचारिक उपाधि है, न कि 18वीं शताब्दी का समकालीन वर्णन। किशनगढ़ चित्रकला की पहचान एक विशिष्ट शैलीगत शब्दावली से होती है — नाटकीय रूप से लंबी, कान तक फैली आँखें, ऊँची मेहराबदार भौंहें, नुकीली ठुड्डी, कमल-सदृश पतली उँगलियाँ, तथा लंबे, दुबले-पतले शारीरिक ढाँचे — एक अतिरंजित, गीतात्मक सौंदर्य जो शैली के केंद्रीय विषय, भक्ति व नागरीदास की काव्य-परंपरा से प्रेरित रोमांटिक राधा-कृष्ण प्रेम, की सेवा हेतु रचा गया।

4. सभी राजस्थानी शैलियों में समान सामग्री व तकनीक

अपने अंतरों के बावजूद, मेवाड़, मारवाड़ व किशनगढ़ — बूंदी-कोटा व आमेर-जयपुर जैसी अन्य राजस्थानी शैलियों की भाँति — एक व्यापक रूप से समान तकनीकी आधार साझा करती थीं। चित्र हस्तनिर्मित कागज (वस्ली) पर, कभी-कभी कपड़े पर, प्राकृतिक व खनिज स्रोतों से प्राप्त रंगों का उपयोग कर बनाए जाते थे — नीले के लिए नील (इंडिगो), लाल के लिए गेरू व हिंगुल, पीले के लिए स्थानीय खनिज, तथा रूपरेखा हेतु दीपक-कालिख (लैम्प-ब्लैक), साथ ही आभूषणों, सिंहासनों व स्थापत्य के उभार हेतु सोने-चाँदी के वर्क का प्रयोग। सामान्य विषयगत आधार में रागमाला (संगीत के रागों का दृश्यांकन), बारहमासा (बारह महीनों व उनसे जुड़े भाव), नायिका-भेद (भावों के अनुसार नायिकाओं का वर्गीकरण), तथा कृष्ण-राधा प्रणय व दोनों महाकाव्यों के प्रसंग शामिल थे। समग्र रूप से राजपूत चित्रकला भ्रामक गहराई (illusionistic depth) के बजाय सपाट, द्विआयामी रचना, मोटी रूपरेखा-रेखाओं तथा चमकीले, अमिश्रित रंग-खंडों को प्राथमिकता देती है।

5. मुगल व पहाड़ी परंपराओं की तुलना में राजस्थानी चित्रकला

परीक्षा में प्रायः राजस्थानी (राजपूत) चित्रकला को उसकी दो निकटतम समकक्ष परंपराओं से अलग पहचानने की क्षमता जाँची जाती है। मुगल चित्रकला, जो शाही दरबार में समाहित फारसी कारखानों से आकार लेती थी, यथार्थवादी रूप-गठन, सूक्ष्म छायांकन, वायुमंडलीय परिप्रेक्ष्य तथा परिष्कृत, मंद रंग-सामंजस्य को प्राथमिकता देती है, और इसका विषय-वस्तु भक्ति-कथा के बजाय ऐतिहासिक इतिवृत्त, व्यक्ति-चित्रण व दरबारी अभिलेखों की ओर झुका होता है। पहाड़ी चित्रकला, जो कांगड़ा, बसोहली व गुलेर जैसी हिमालयी तराई रियासतों में विकसित हुई, राजस्थानी चित्रकला की तरह कृष्ण-केंद्रित प्रणय विषयों के प्रति समर्पित तो है, परंतु इन्हें कोमल रेखाओं, हल्के पेस्टल-झुकाव वाले रंग-पटल तथा गीतात्मक, रमणीय परिदृश्यों में प्रस्तुत करती है — एक दृश्य स्वभाव जिसे प्रायः मेवाड़ के गहरे, आत्मविश्वासी रंगों या किशनगढ़ की अलंकृत सुंदरता की तुलना में अधिक कोमल बताया जाता है। इसके विपरीत, राजस्थानी चित्रकला सामान्यतः रंगों में अधिक गहरी, परिप्रेक्ष्य में अधिक सपाट, तथा भावना या भक्ति की दृष्टि से अधिक प्रत्यक्ष होती है, और मंदिर, दरबारी इतिवृत्त तथा किसी राजपूत संरक्षक द्वारा प्रायोजित सचित्र पांडुलिपि से घनिष्ठ रूप से जुड़ी रहती है।

शैलीसंरक्षकचित्रकारप्रमुख कृति / विषयपहचान
मेवाड़महाराणा अमर सिंह प्रथम; जगत सिंह प्रथमनिसारदीन; साहिबदीनचावंड रागमाला (1605); रामायण (लगभग 1649-53), भागवत पुराणगहरे प्राथमिक रंग, मोटी काली रूपरेखा, धार्मिक विषय
मारवाड़ (जोधपुर, बीकानेर)महाराजा मान सिंह (जोधपुर)उस्ताद अली रज़ा, रुकनुद्दीन (बीकानेर)नाथ योगी, शिकार, दरबारी दृश्य, ढोला-मारूबीकानेर में मुगल तकनीक का प्रभाव
किशनगढ़राजा सावंत सिंह (नागरीदास)निहालचंदबणी-ठणी (लगभग 1750)लंबी आँखें, मेहराबदार भौंहें, नुकीली ठुड्डी
चित्रकला शैलियों के प्रमुख वर्ष
  1. 1260आहड़ (मेवाड़): श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि
  2. 1423देलवाड़ा: सुपासनाहचरियम
  3. 1568मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ से उदयपुर
  4. 1605चावंड रागमाला (निसारदीन)
  5. 1609किशनगढ़ की स्थापना
  6. लगभग 1649-53साहिबदीन की रामायण
  7. लगभग 1750बणी-ठणी (निहालचंद)

मुख्य तथ्य

  • मेवाड़ शैली: केंद्र चित्तौड़गढ़, बाद में उदयपुर; मेवाड़ की सबसे प्रारंभिक तिथियुक्त रागमाला चावंड रागमाला (1605), चित्रकार निसारदीन, महाराणा अमर सिंह प्रथम के अधीन। इससे पुरानी तिथियुक्त चित्रित कृतियाँ आहड़ (1260) और देलवाड़ा (1423, सुपासनाहचरियम) की हैं।
  • महाराणा जगत सिंह प्रथम के दरबारी चित्रकार साहिबदीन ने शास्त्रीय मेवाड़ शैली में रामायण (लगभग 1649-53) व भागवत पुराण का चित्रण किया।
  • मारवाड़ शैली का केंद्र राठौड़ वंश के अधीन जोधपुर है, जिसकी महत्वपूर्ण उप-शैलियाँ बीकानेर व नागौर में हैं।
  • जोधपुर के महाराजा मान सिंह (19वीं शताब्दी आरंभ) ने मारवाड़ चित्रकला को नाथ-योगी भक्ति की प्रबल धारा दी।
  • बीकानेर उप-शैली में उस्ताद अली रज़ा व रुकनुद्दीन जैसे प्रवासी चित्रकारों के माध्यम से राय सिंह/करण सिंह/अनूप सिंह के अधीन प्रत्यक्ष मुगल तकनीकी प्रभाव दिखता है।
  • किशनगढ़ रियासत की स्थापना 1609 में जोधपुर वंश के राठौड़ राजकुमार किशन सिंह ने की।
  • किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह (शासनकाल लगभग 1748-1764), उपनाम "नागरीदास," कृष्ण-भक्त कवि-राजा थे।
  • सावंत सिंह के दरबारी चित्रकार निहालचंद ने "बणी-ठणी" चित्र बनाया, जो लोकप्रिय रूप से "भारत की मोनालिसा" कहलाता है।
  • किशनगढ़ शैली की पहचान: लंबी आँखें, मेहराबदार भौंहें, नुकीली ठुड्डी, लंबे-दुबले शारीरिक ढाँचे।
  • सामान्य राजस्थानी चित्रकला विषय: रागमाला, बारहमासा, नायिका-भेद, रामायण, भागवत पुराण, गीत गोविंद।

परीक्षा उपयोगी बिंदु

  • "बणी-ठणी" (किशनगढ़, चित्रकार निहालचंद, संरक्षक सावंत सिंह) को मेवाड़ की रागमाला चित्रों (चावंड, 1605) से भ्रमित न करें — दोनों प्रतिष्ठित हैं परंतु पूर्णतः भिन्न शैली, विषय व शताब्दी से संबंधित हैं।
  • शैली-चित्रकार-संरक्षक शृंखला याद रखें: मेवाड़ → निसारदीन → अमर सिंह प्रथम (चावंड रागमाला); मेवाड़ → साहिबदीन → जगत सिंह प्रथम; किशनगढ़ → निहालचंद → सावंत सिंह।
  • किशनगढ़ मूलतः राठौड़ (मारवाड़) वंश की एक शाखा के रूप में आरंभ हुआ, परंतु अपनी विशिष्ट लंबी-आँखों वाली शैली के कारण एक स्वतंत्र शैली के रूप में परीक्षा में पूछा जाता है।
  • बीकानेर मारवाड़ के अंतर्गत एक उप-शैली है, जो विशेष रूप से वास्तविक मुगल चित्रकारों व तकनीक को आत्मसात करने हेतु जानी जाती है।
  • राजस्थानी चित्रकला (गहरी, सपाट, भक्ति-प्रधान) को मुगल (यथार्थवादी, छायांकित, ऐतिहासिक/व्यक्ति-चित्रण-केंद्रित) व पहाड़ी (कोमल, पेस्टल, गीतात्मक) परंपराओं से अलग पहचानें।
🧠 स्मरण ट्रिक — मेवाड़-मारवाड़-किशनगढ़

तीन शैलियों को एक यात्रा के तीन दृश्यों के रूप में कल्पना करें: चित्तौड़/उदयपुर (मेवाड़) में साहिबदीन गहरे लाल-पीले-नीले रंगों में राग व रामायण चित्रित करते हैं। जोधपुर (मारवाड़) के दरबार में महाराजा मान सिंह के समय नाथ योगी, शिकारी व दरबारी दृश्य भरे पड़े हैं। किशनगढ़ में निहालचंद कवि-राजा सावंत सिंह के लिए बणी-ठणी की लंबी आँखें रचते हैं। याद रखें: "मेवाड़ में राग, मारवाड़ में योगी, किशनगढ़ में सुंदरता" — इसी क्रम में तीनों को अलग-अलग रखें।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — बणी-ठणी (किशनगढ़) बनाम रागमाला (मेवाड़)

बणी-ठणी: निहालचंद द्वारा किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह हेतु 18वीं शताब्दी के मध्य में बनाया गया एक विशिष्ट, प्रतिष्ठित चित्र, जिसमें लंबी आँखें व आदर्शीकृत राधा-सदृश मुखाकृति दिखती है — व्यक्तिगत रूप से प्रसिद्ध, लोकप्रिय उपनाम "भारत की मोनालिसा"। रागमाला: एक अकेला चित्र नहीं बल्कि एक संपूर्ण सचित्र शृंखला है, जो कई राजस्थानी दरबारों में बनी (मेवाड़ का सबसे प्रारंभिक तिथियुक्त उदाहरण चावंड रागमाला, 1605, है), जो शास्त्रीय संगीत के भावों को ऋतुओं, देवताओं व प्रेमियों के माध्यम से दृश्यांकित करती है। छात्र प्रायः कहते हैं "सबसे प्रसिद्ध राजस्थानी चित्र रागमाला है" जब उनका अर्थ बणी-ठणी से होता है, या इसके विपरीत — याद रखें: बणी-ठणी = 18वीं शताब्दी का एक विशिष्ट किशनगढ़ चित्र; रागमाला = 16वीं-17वीं शताब्दी से चली आ रही एक शैली/जॉनर, जो मेवाड़ (व अन्य शैलियों) में मिलती है, किसी एक शैली तक सीमित नहीं।

मेवाड़, मारवाड़ व किशनगढ़ शैलियों की तुलना राजस्थानी लघुचित्रकला की तीन शैलियाँ मेवाड़ शैली — उदयपुर/चित्तौड़गढ़, सबसे प्राचीन राजस्थानी शैली, मेवाड़ के राणाओं द्वारा संरक्षित मेवाड़ मेवाड़ विशेषताएँ: गहरे प्राथमिक रंग, सपाट रचना, धार्मिक विषय — रागमाला, रामायण, भागवत पुराण उदयपुर/चित्तौड़ चित्रकार: साहिबदीन कृति: रामायण, रागमाला (1605) मारवाड़ शैली — जोधपुर, बीकानेर व नागौर उप-शैलियों सहित; राठौड़ शासकों द्वारा संरक्षित मारवाड़ मारवाड़ विशेषताएँ: शिकार दृश्य, दरबारी व्यक्ति-चित्रण, मान सिंह के अधीन नाथ-योगी विषय; बीकानेर उप-शैली में मुगल प्रभाव जोधपुर/बीकानेर संरक्षक: मान सिंह विषय: शिकार, दरबार, नाथ योगी किशनगढ़ शैली — स्थापना 1609, राजा सावंत सिंह के अधीन बणी-ठणी चित्र हेतु सर्वाधिक प्रसिद्ध किशनगढ़ किशनगढ़ विशेषताएँ: लंबी आँखें, मेहराबदार भौंहें, निहालचंद द्वारा चित्रित रोमांटिक राधा-कृष्ण विषय संरक्षक: सावंत सिंह चित्रकार: निहालचंद कृति: बणी-ठणी (लगभग 1750 के दशक) तीनों शैलियाँ 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य राजपूत दरबारी संरक्षण में फलीं-फूलीं राजपूत दरबारी संरक्षण, 16वीं-18वीं शताब्दी
📝 अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1. किशनगढ़ शैली का "बणी-ठणी" चित्र किस चित्रकार ने बनाया, और किसके संरक्षण में?

✅ निहालचंद ने, राजा सावंत सिंह (उपनाम "नागरीदास") के संरक्षण में।

प्रश्न 2. महाराणा जगत सिंह प्रथम के उस दरबारी चित्रकार का नाम बताएं जिसने शास्त्रीय मेवाड़ शैली में रामायण व भागवत पुराण का चित्रण किया।

✅ साहिबदीन।

प्रश्न 3. कौन-सी राजस्थानी उप-शैली विशेष रूप से प्रवासी मुगल-प्रशिक्षित चित्रकारों के माध्यम से वास्तविक मुगल चित्रकला तकनीक को आत्मसात करने हेतु जानी जाती है?

✅ मारवाड़ शैली की बीकानेर उप-शैली (चित्रकार उस्ताद अली रज़ा व रुकनुद्दीन जैसे)।

प्रश्न 4. मेवाड़ शैली से संबंधित सबसे प्रारंभिक तिथियुक्त सचित्र रागमाला कौन-सी है, और यह किस शासक के अधीन बनी?

✅ चावंड रागमाला (1605), चित्रकार निसारदीन; महाराणा अमर सिंह प्रथम के अधीन बनी।

प्रश्न 5. राजस्थानी (राजपूत) चित्रकला सामान्यतः शैली की दृष्टि से मुगल चित्रकला से किस प्रकार भिन्न है?

✅ राजस्थानी चित्रकला सपाट रचना, मोटी रूपरेखा व गहरे प्राथमिक रंगों के साथ भक्ति/धार्मिक विषय-वस्तु को प्राथमिकता देती है, जबकि मुगल चित्रकला यथार्थवादी छायांकन, वायुमंडलीय परिप्रेक्ष्य व मंद रंगों के साथ ऐतिहासिक/व्यक्ति-चित्रण विषय-वस्तु को प्राथमिकता देती है।

सारांश

तीन शैलियाँ, तीन हस्ताक्षर: मेवाड़ (चित्तौड़गढ़/उदयपुर) ने साहिबदीन जैसे चित्रकारों तथा चावंड रागमाला व साहिबदीन की रामायण जैसी पांडुलिपियों के माध्यम से राजस्थानी चित्रकला को उसकी सबसे प्रारंभिक व सबसे गहरी भक्ति-प्रधान आवाज़ दी; मारवाड़ (जोधपुर, बीकानेर व नागौर सहित) ने शिकार दृश्यों, दरबारी व्यक्ति-चित्रण तथा मान सिंह के अधीन नाथ-योगी भक्ति की एक दरबारी शैली रची, जबकि इसकी बीकानेर शाखा ने वास्तविक मुगल तकनीक को आत्मसात किया; और किशनगढ़, यद्यपि एक राठौड़ राजकुमार द्वारा स्थापित, शैलीगत रूप से अलग होकर भारत को उसके सबसे पहचाने जाने वाले चित्रों में से एक — कवि-राजा सावंत सिंह हेतु निहालचंद की "बणी-ठणी" — दे गया। इन तीनों में, और समग्र राजस्थानी चित्रकला में, समान सूत्र हैं — प्राकृतिक रंग, सोने के वर्क की सजावट, सपाट व गहरे रंगों वाली रचना, तथा कृष्ण-राधा प्रणय, रागमाला व महाकाव्य कथा के प्रति भक्ति — जो मिलकर राजस्थानी चित्रकला को यथार्थवादी मुगल शैली व कोमल पहाड़ी शैली से अलग पहचान देते हैं।

⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • •राजस्थान का एकीकरण 7 चरणों में हुआ और 30 मार्च 1949 को 'वृहत् राजस्थान' बना।
  • •महाराणा प्रताप ने 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध अकबर के सेनापति मानसिंह से लड़ा।
  • •फड़ चित्रकला श्रीलालजी चितेरे जाति द्वारा बनाई जाती है; पाबूजी और देवनारायणजी की फड़ प्रसिद्ध है।
  • •घूमर राजस्थान का राज्य नृत्य है और भीलों का प्रमुख नृत्य गैर है।
  • •चित्तौड़गढ़ का किला राजस्थान का सबसे बड़ा किला है; इसे 'राजस्थान का गौरव' कहते हैं।
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  1. RAS 2024

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    2. (B) I-b, II-c, III-a, IV-d
    3. (C) I-b, II-c, III-d, IV-a
    4. (D) I-b, II-a, III-c, IV-d

    उत्तर: (B) I-b, II-c, III-a, IV-d

  2. RAS 2018

    निम्नलिखित में से कौन-सा चित्रकार अलवर चित्रकला शैली से संबंधित नहीं है?

    1. (A) जमनादास
    2. (B) बक्साराम
    3. (C) नानकराम
    4. (D) नंदराम

    उत्तर: (C) नानकराम

  3. RAS 2015

    जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम और नंदलाल निम्नलिखित में से किस चित्रकला शैली से संबंधित हैं-

    1. (A) अलवर शैली
    2. (B) बीकानेर शैली
    3. (C) मारवाड़ शैली
    4. (D) झालावाड़ शैली

    उत्तर: (A) अलवर शैली

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