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📚 राजस्थान इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, परंपरा एवं विरासत

1857 की क्रांति और राजस्थान: आऊवा, कोटा, नसीराबाद

Revolt of 1857 in Rajasthan

⏱ 12 मिनटadvanced✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· History, Art, Culture, Literature, Tradition & Heritage of Rajasthan

परिचय

10 मई 1857 को मेरठ में सैनिकों के विद्रोह के महज तीन सप्ताह के भीतर यह हलचल राजपूताना तक जा पहुँची। लेकिन यहाँ जो कुछ हुआ, वह अवध, बुंदेलखंड या दोआब की घटनाओं से काफी अलग था। राजस्थान की लगभग सभी रियासतें — जयपुर, जोधपुर, उदयपुर (मेवाड़), बीकानेर, कोटा, अलवर आदि — 1817-18 में हुई सहायक संधियों (subsidiary treaties) के बाद से ईस्ट इंडिया कंपनी से बँधी हुई थीं, और कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग हर शासक अंग्रेज़ों के प्रति वफादार बना रहा; कई ने तो विद्रोह को कुचलने में सैनिक, रसद और सूचनाएँ देकर सक्रिय सहयोग भी किया। इसलिए राजस्थान में असली लड़ाई किसी रियासती दरबार ने नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी छावनियों में तैनात विद्रोही टुकड़ियों और कहीं-कहीं किसी असंतुष्ट अधिकारी या ठाकुर के नेतृत्व में स्थानीय प्रतिरोध ने लड़ी — अपने ही राज्य की सरकार के विरुद्ध। यह अध्ययन सामग्री बताती है कि राजस्थान में विद्रोह वास्तव में कहाँ-कहाँ भड़का, किसने उसका नेतृत्व किया, और "वफादार शासक बनाम विद्रोही प्रजा" का यह अंतर RAS प्रारंभिक परीक्षा में क्यों बार-बार पूछा जाता है।

मुख्य अवधारणाएँ

1. राजस्थान की रियासतें और संधि-व्यवस्था

1818 तक राजपूताना की लगभग हर बड़ी रियासत — जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा, बूंदी, अलवर, भरतपुर, करौली, जैसलमेर आदि — कंपनी के साथ सहायक संधि (subsidiary alliance) स्वीकार कर चुकी थी, जिसके तहत उन्होंने बाहरी मामलों पर नियंत्रण छोड़ दिया था और दरबार में एक रेज़िडेंट या पॉलिटिकल एजेंट रखना स्वीकार कर लिया था, बदले में कंपनी अपनी गद्दी की रक्षा का आश्वासन देती थी। यही सबसे बड़ा कारण है कि 1857 में राजस्थान की रियासती सत्ताएँ विद्रोह के साथ खड़ी नहीं हुईं — शासकों का अपना राजनीतिक अस्तित्व कंपनी के समर्थन पर टिका था, और कई शासकों को सैनिक विद्रोह अपने ही सिंहासन के लिए खतरा नज़र आया। कई दरबारों ने केवल तटस्थता ही नहीं दिखाई, बल्कि सैनिक और राजस्व भेजकर अंग्रेज़ों को विद्रोही छावनियाँ फिर से कब्ज़े में लेने और भगोड़े विद्रोहियों का पीछा करने में मदद भी की।

2. नसीराबाद और नीमच — छावनियों की बगावत

राजपूताना के भीतर सबसे पहला वास्तविक विद्रोह अजमेर के पास नसीराबाद छावनी में हुआ, जहाँ मई 1857 के अंत में बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की टुकड़ियों ने बगावत कर दी, कुछ अधिकारियों को मार डाला और दिल्ली की ओर कूच कर गईं — इसे सामान्यतः राजस्थान की सीमाओं के भीतर 1857 का पहला विद्रोह माना जाता है। कुछ ही दिनों बाद क्षेत्र की एक अन्य बड़ी अंग्रेज़ी छावनी नीमच में भी वैसा ही विद्रोह हुआ, जहाँ सैनिक अपने अधिकारियों के विरुद्ध हो गए और अंग्रेज़ निवासियों को कुछ समय के लिए स्टेशन छोड़ना पड़ा। नसीराबाद और नीमच दोनों ही राजस्थान के सामान्य पैटर्न को स्पष्ट करते हैं — बगावत करने वाले कंपनी की अपनी छावनी सेनाएँ थीं, न कि स्थानीय शासक की सेनाएँ।

3. कोटा का विद्रोह (अक्टूबर 1857) — वफादार शासक के विरुद्ध स्थानीय बगावत

कोटा इस बात का सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि किस तरह एक शासक स्वयं वफादार बना रह सकता था जबकि उसकी अपनी प्रजा और अधिकारी उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए। कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय पूरी तरह अंग्रेज़-समर्थक थे, फिर भी अक्टूबर 1857 में स्वयं कोटा नगर में एक स्थानीय विद्रोह भड़क उठा, जो अंग्रेज़ों के पक्षधर प्रशासन और वहाँ मौजूद पॉलिटिकल एजेंसी के विरुद्ध बढ़ते असंतोष का परिणाम था। इस विद्रोह का नेतृत्व मुख्यतः दो स्थानीय व्यक्तियों ने किया — जयदयाल (प्रायः लाला जयदयाल कहा जाता है), जो राज्य प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी थे, और मेहराब खान, जो सेना के फौजदार (कमांडर) थे — इन्होंने सशस्त्र लोगों को लेकर रेज़िडेंसी पर धावा बोला। कोटा के अंग्रेज़ पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन इस हिंसा में अपने परिवार के सदस्यों सहित मारे गए, और महाराव स्वयं न तो एजेंसी की रक्षा कर सके और न ही विद्रोह पर नियंत्रण पा सके — कुछ समय के लिए नगर उनके प्रभावी नियंत्रण से बाहर हो गया और वे अपने ही किले में शरण लेने को मजबूर हुए। बाद में अंग्रेज़ी और सहयोगी सेनाओं ने कोटा पर पुनः कब्ज़ा कर महाराव का अधिकार बहाल किया। कोटा की यह घटना इसलिए असाधारण है क्योंकि यह दिखाती है कि एक "वफादार" रियासत के भीतर से ही अंग्रेज़ अधिकारियों के विरुद्ध प्रतिरोध उठ सकता था, भले ही स्वयं शासक-वंश ने कभी कंपनी के प्रति निष्ठा नहीं त्यागी।

4. आऊवा — ठाकुर कुशाल सिंह का सशस्त्र प्रतिरोध

किसी राजपूत सरदार द्वारा सीधे अंग्रेज़ी सेनाओं के विरुद्ध हथियार उठाने का सबसे सुदृढ़ उदाहरण जोधपुर रियासत की जागीर आऊवा (वर्तमान पाली ज़िले में) से मिलता है, जो ठाकुर कुशाल सिंह के अधीन थी। कोटा से भिन्न, जहाँ राज्य-प्रशासन स्वयं स्थानीय विद्रोह का निशाना बना, आऊवा में एक जागीरदार स्वयं जोधपुर दरबार और अंग्रेज़ी राजनीतिक तंत्र दोनों के विरुद्ध खुलकर डटा रहा। कुशाल सिंह ने विद्रोही सैनिकों को शरण दी, समर्पण से इनकार किया, और उनकी सेनाओं का सामना उस संयुक्त अंग्रेज़-जोधपुर टुकड़ी से हुआ जिसे उन्हें दबाने के लिए भेजा गया था; 1857 की दूसरी छमाही में आऊवा के आसपास हुई लड़ाई राजस्थान की धरती पर विद्रोह के दौरान लड़ी गई सबसे गंभीर सशस्त्र मुठभेड़ों में से एक थी, और अंग्रेज़ी सत्ता को इस जागीर पर पुनः स्थापित करने में एक लंबा अभियान लगा। 8 सितंबर 1857 को बिठौड़ा के युद्ध में कुशाल सिंह ने जोधपुर की सेना को हराया; 18 सितंबर 1857 को चेलावास के युद्ध में जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉक मेसन मारे गए और ए.जी.जी. जॉर्ज लॉरेंस को पीछे हटना पड़ा। जनवरी 1858 में कर्नल होम्स ने आऊवा पर कब्ज़ा कर लिया, और कुशाल सिंह ने 1860 में आत्मसमर्पण किया। आऊवा को राजस्थान के उन गिने-चुने उदाहरणों में याद किया जाता है जहाँ विद्रोही सैनिकों या असंतुष्ट अधिकारियों की बजाय एक उपाधिधारी सरदार ने स्वयं मैदान में संगठित प्रतिरोध का नेतृत्व किया।

5. एरनपुरा, देवली और खेरवाड़ा — अन्य केंद्र

कोटा और आऊवा के अलावा राजपूताना में बिखरी अन्य अंग्रेज़ी चौकियों पर भी अशांति फैली। एरनपुरा में जोधपुर लीजन के सैनिकों — जो एक अंग्रेज़ी-अधिकारियों वाली टुकड़ी थी और मुख्यतः जोधपुर रियासत से भर्ती की गई थी — ने अपने अधिकारियों के विरुद्ध बगावत कर दी और विद्रोह में शामिल होने के लिए कूच कर गए, ठीक वैसे ही जैसे नसीराबाद और नीमच में हुआ था। टोंक के निकट देवली में तैनात कंपनी सैनिकों में भी एक और बगावत हुई। उदयपुर रियासत से लगे पहाड़ी क्षेत्र के खेरवाड़ा में स्थित मेवाड़ भील कोर 1857 में अंग्रेज़ों के प्रति वफादार रही। इन सभी मामलों में एक ही समान धागा दिखाई देता है — विद्रोह करने वाली छावनी या स्थानीय भर्ती की गई कंपनी सेनाएँ थीं, न कि उन क्षेत्रों की रियासती सरकारें।

स्थानतिथिनेतृत्व / सेनापरिणाम / महत्व
नसीराबाद28 मई 1857बंगाल नेटिव इन्फेंट्रीराजपूताना की पहली छावनी-बगावत; सैनिक दिल्ली की ओर कूच कर गए
नीमच3 जून 1857छावनी के सैनिकअंग्रेज़ निवासियों को कुछ समय के लिए स्टेशन छोड़ना पड़ा
एरनपुरा21 अगस्त 1857जोधपुर लीजनसैनिकों ने अधिकारियों के विरुद्ध बगावत की और कूच कर गए
आऊवासितंबर 1857ठाकुर कुशाल सिंहबिठौड़ा (8 सितंबर) व चेलावास (18 सितंबर) में विजय; 1858 में पतन, 1860 में आत्मसमर्पण
कोटा15 अक्टूबर 1857जयदयाल व मेहराब खानमेजर बर्टन मारे गए; महाराव रामसिंह द्वितीय वफादार रहे
देवली1857कंपनी सैनिकटोंक के निकट सैनिक बगावत

6. राजपूताना फील्ड फोर्स और दमन का पैटर्न

इन बिखरे हुए विद्रोहों पर पुनः नियंत्रण पाने के लिए अंग्रेज़ों ने राजपूताना फील्ड फोर्स का गठन किया, जो एक गतिशील सैन्य टुकड़ी थी और जिसका काम घिरी हुई चौकियों को राहत पहुँचाना, विद्रोही छावनियों पर पुनः कब्ज़ा करना और क्षेत्र से गुज़रने वाली विद्रोही टुकड़ियों — जिनमें 1858-59 में राजस्थान के कुछ हिस्सों से गुज़रे तात्या टोपे के अभियान से जुड़े दस्ते भी शामिल थे — का पीछा करना था। फील्ड फोर्स को कई वफादार दरबारों का पूरा सहयोग मिला, जिन्होंने सैनिक, रसद, परिवहन और सूचनाएँ उपलब्ध कराईं; यह सहयोग इस बात का पुख्ता प्रमाण माना जाता है कि 1857 तक राजस्थान की रियासती सरकारें अंग्रेज़ी हितों के साथ कितनी गहराई से जुड़ चुकी थीं। 1858 की पहली छमाही तक कोटा, आऊवा और विद्रोही छावनियों में संगठित प्रतिरोध कुचला जा चुका था और क्षेत्र पर अंग्रेज़ी राजनीतिक नियंत्रण पुनः स्थापित हो गया था।

7. शासकों की वफादारी बनाम स्थानीय प्रतिरोध — झाँसी या अवध से अंतर

झाँसी जैसे केंद्रों से तुलना करना उपयोगी है, जहाँ रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में स्वयं शासक-वंश ने प्रतिरोध का नेतृत्व किया, या अवध से, जहाँ अपदस्थ शासक-परिवार और उसका पूरा क्षेत्र विलय के विरुद्ध व्यापक रूप से उठ खड़ा हुआ। राजस्थान में कहानी बिखरे हुए, स्थानीय स्तर पर उपजे प्रतिरोध की है — अंग्रेज़ी छावनियों में सैनिक विद्रोह, कोटा में एक वफादार शासक के अपने ही प्रशासन के विरुद्ध स्थानीय बगावत, और आऊवा में एक जागीरदार का व्यक्तिगत प्रतिरोध — न कि किसी राजपूत रियासत का कंपनी के विरुद्ध घोषित विद्रोह। यही कारण है कि इस विषय पर प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्न प्रायः यह पहचानने पर केंद्रित होते हैं कि वास्तव में किन-किन स्थानों (नसीराबाद, नीमच, कोटा, आऊवा, एरनपुरा, देवली) पर विद्रोह हुआ, न कि यह मानने पर कि राजस्थान की कोई रियासत समग्र रूप से "विद्रोही" हो गई थी।

राजस्थान में 1857 — प्रमुख घटनाक्रम
  1. 28 मई 1857नसीराबाद छावनी की बगावत
  2. 3 जून 1857नीमच छावनी की बगावत
  3. 21 अगस्त 1857एरनपुरा में जोधपुर लीजन की बगावत
  4. 8 सितंबर 1857बिठौड़ा का युद्ध — कुशाल सिंह की विजय
  5. 18 सितंबर 1857चेलावास का युद्ध — कैप्टन मेसन मारे गए
  6. 15 अक्टूबर 1857कोटा विद्रोह — मेजर बर्टन मारे गए
  7. जनवरी 1858कर्नल होम्स का आऊवा पर कब्ज़ा
  8. 1860ठाकुर कुशाल सिंह का आत्मसमर्पण

महत्वपूर्ण तथ्य

  • नसीराबाद (अजमेर के निकट) राजपूताना के भीतर 1857 के पहले विद्रोह का स्थान माना जाता है — मई 1857 के अंत में बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की टुकड़ियों ने बगावत की।
  • नसीराबाद के कुछ ही दिनों बाद नीमच छावनी में भी वैसा ही विद्रोह हुआ।
  • अक्टूबर 1857 के कोटा विद्रोह का स्थानीय नेतृत्व जयदयाल और मेहराब खान ने अंग्रेज़-समर्थक प्रशासन के विरुद्ध किया; पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन मारे गए, जबकि महाराव रामसिंह द्वितीय वफादार बने रहे।
  • जोधपुर रियासत की जागीर आऊवा ठाकुर कुशाल सिंह के अधीन थी, जिन्होंने विद्रोहियों को शरण दी और संयुक्त अंग्रेज़-जोधपुर सेनाओं के विरुद्ध सुदृढ़ प्रतिरोध किया; बिठौड़ा का युद्ध 8 सितंबर 1857 को हुआ और कुशाल सिंह ने 1860 में आत्मसमर्पण किया।
  • एरनपुरा में जोधपुर लीजन ने (21 अगस्त 1857) बगावत की; देवली में कंपनी सैनिकों ने बगावत की; मेवाड़ भील कोर (खेरवाड़ा) वफादार रही।
  • अंग्रेज़ों ने घिरी चौकियों को राहत देने और बिखरे विद्रोहों को कुचलने के लिए राजपूताना फील्ड फोर्स का गठन किया, जिसे वफादार दरबारों का समर्थन प्राप्त था।
  • 1817-18 की संधियों से बँधी अधिकांश रियासतें शासक-वंश के स्तर पर विद्रोह में शामिल नहीं हुईं; कई ने दमन-अभियान में सक्रिय सहयोग भी दिया।

परीक्षा टिप्स

  • कोटा में स्थानीय अधिकारी/सैनिक अपने ही वफादार शासक के प्रशासन के विरुद्ध उठे; आऊवा में जागीरदार (कुशाल सिंह) सीधे अंग्रेज़ी सेनाओं के विरुद्ध उठे — MCQ में अक्सर ये दो पैटर्न आपस में मिला दिए जाते हैं।
  • "मेजर बर्टन की हत्या किसने की?" और "कहाँ हुई?" दोनों का उत्तर कोटा, अक्टूबर 1857 है — बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य।
  • नसीराबाद = राजस्थान की पहली छावनी-बगावत (मई 1857); इसे नीमच के साथ न उलझाएँ।
  • राजस्थान की किसी बड़ी रियासत को 1857 में "विद्रोही" कहना गलत है — शासक वफादार रहे जबकि स्थानीय/सैनिक स्तर पर प्रतिरोध हुआ।
  • आऊवा का प्रतिरोध ठाकुर कुशाल सिंह से जुड़ा है, न कि किसी शासक महाराजा/महाराव से — झाँसी के शासक-नेतृत्व वाले प्रतिरोध से भिन्न।
🧠 स्मरण क्रम — मई से अक्टूबर 1857: नसीराबाद, नीमच, एरनपुरा, आऊवा, कोटा

महीनों के क्रम से याद रखें — मई (28 मई) → नसीराबाद; जून (3 जून) → नीमच; अगस्त (21 अगस्त) → एरनपुरा (जोधपुर लीजन); सितंबर (बिठौड़ा 8 सितंबर, चेलावास 18 सितंबर) → आऊवा (ठाकुर कुशाल सिंह); अक्टूबर (15 अक्टूबर) → कोटा (मेजर बर्टन मारे गए)। छावनी-बगावतें पहले हुईं, जागीरदार का प्रतिरोध बीच में और कोटा की स्थानीय बगावत अंत में।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — कोटा की स्थानीय बगावत बनाम आऊवा का जागीरदार-प्रतिरोध

छात्र प्रायः कोटा और आऊवा को एक जैसा मानकर दोनों को "अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह" कह देते हैं — लेकिन दोनों घटनाओं में यह भिन्न है कि किसने और किसके विरुद्ध विद्रोह किया। कोटा में महाराव के अपने ही अधीनस्थ — जयदयाल और मेहराब खान, जो राज्य प्रशासन और सेना से जुड़े थे — स्थानीय स्तर पर उठ खड़े हुए, जबकि महाराव रामसिंह द्वितीय स्वयं पूरे समय अंग्रेज़ों के प्रति वफादार बने रहे; निशाना अंग्रेज़-समर्थक प्रशासन और पॉलिटिकल एजेंट बर्टन थे, न कि बाहर से भेजी गई कोई अंग्रेज़ी सेना। इसके विपरीत आऊवा में एक उपाधिधारी जागीरदार, ठाकुर कुशाल सिंह ने स्वयं अपने अधिपति (जोधपुर दरबार) और अंग्रेज़ी सत्ता, दोनों को खुलेआम चुनौती दी, विद्रोहियों को शरण दी और मैदान में अंग्रेज़-जोधपुर संयुक्त टुकड़ी से युद्ध किया — यह असंतुष्ट स्थानीय अधिकारियों की बगावत से कहीं अधिक किसी सरदार के खुले विद्रोह जैसा था। याद रखें: कोटा = अधिकारी/सैनिक अपने ही वफादार शासक के प्रशासन के विरुद्ध उठे; आऊवा = एक जागीरदार सीधे अंग्रेज़ी और सहयोगी सेनाओं के विरुद्ध उठा।

Centers of Resistance in Rajasthan, 1857 / राजस्थान 1857 के प्रतिरोध-केंद्रHeadingCenters of Resistance — Rajasthan, 1857Scattered outbreaks across RajputanaNasirabad — first cantonment mutiny, May 1857NasirabadNeemuch — cantonment mutiny, June 1857NeemuchErinpura — Jodhpur Legion mutiny, August 1857ErinpuraKota — local uprising vs loyal ruler's administration, Oct 1857; Major Burton killedKotaAuwa — Thakur Kushal Singh's jagirdar resistance, 1857AuwaLegendBlue = cantonment/legion mutiny Red = local revolt vs loyal ruler (Kota) Green = jagirdar resistance (Auwa)Key pointMost Rajasthan rulers stayed loyal; resistance was local/regimental, not ruler-led
📝 अभ्यास प्रश्न
Q1. राजस्थान की किस छावनी में 1857 का सबसे पहला विद्रोह हुआ, और लगभग कब?

✅ अजमेर के निकट नसीराबाद में, मई 1857 के अंत में — इसे राजपूताना के भीतर 1857 का पहला विद्रोह माना जाता है।

Q2. अक्टूबर 1857 में कोटा के स्थानीय विद्रोह का नेतृत्व किसने किया, और वहाँ कौन-सा अंग्रेज़ अधिकारी मारा गया?

✅ जयदयाल और मेहराब खान ने विद्रोह का नेतृत्व किया; पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन मारे गए, जबकि महाराव रामसिंह द्वितीय अंग्रेज़ों के प्रति वफादार बने रहे।

Q3. आऊवा में किस राजपूत जागीरदार ने अंग्रेज़ी और जोधपुर सेनाओं के विरुद्ध सुदृढ़ सशस्त्र प्रतिरोध किया?

✅ आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह।

Q4. 1857 के दौरान राजस्थान की रियासतों के शासकों का सामान्य रुख कंपनी के प्रति कैसा था?

✅ 1817-18 की सहायक संधियों से बँधे अधिकांश शासक अंग्रेज़ों के प्रति वफादार रहे और कई ने विद्रोह को कुचलने में सक्रिय सहयोग दिया, न कि शासक-वंश के स्तर पर विद्रोह में शामिल हुए।

Q5. राजपूताना में बिखरे 1857 के विद्रोहों को कुचलने का काम किस अंग्रेज़ी गतिशील सैन्य टुकड़ी को सौंपा गया था?

✅ राजपूताना फील्ड फोर्स।

सारांश

1857 का विद्रोह राजस्थान को मुख्यतः अंग्रेज़ी छावनियों (नसीराबाद, नीमच, एरनपुरा, देवली) की बगावतों और दो अलग-अलग किंतु विपरीत स्वरूप वाले स्थानीय प्रतिरोधों के माध्यम से छू गया — अक्टूबर 1857 का कोटा विद्रोह, जहाँ स्थानीय नेता जयदयाल और मेहराब खान अंग्रेज़-समर्थक प्रशासन के विरुद्ध उठे और पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन को मार डाला, जबकि महाराव रामसिंह द्वितीय अंग्रेज़ों के प्रति वफादार बने रहे; और जोधपुर रियासत के आऊवा में ठाकुर कुशाल सिंह का सुदृढ़ सशस्त्र प्रतिरोध। 1817-18 की सहायक संधियों से बँधी राजस्थान की लगभग हर रियासत विद्रोह में शामिल होने से बची रही और कई ने अंग्रेज़ी राजपूताना फील्ड फोर्स को दमन में सक्रिय सहयोग भी दिया। प्रारंभिक परीक्षा के लिए मूल अंतर यह याद रखना है कि राजस्थान की 1857 की कहानी सैनिक-बगावतों और स्थानीय/जागीरदार-स्तरीय प्रतिरोध की है, न कि झाँसी जैसे किसी शासक-नेतृत्व वाले विद्रोह की।

⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • •राजस्थान का एकीकरण 7 चरणों में हुआ और 30 मार्च 1949 को 'वृहत् राजस्थान' बना।
  • •महाराणा प्रताप ने 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध अकबर के सेनापति मानसिंह से लड़ा।
  • •फड़ चित्रकला श्रीलालजी चितेरे जाति द्वारा बनाई जाती है; पाबूजी और देवनारायणजी की फड़ प्रसिद्ध है।
  • •घूमर राजस्थान का राज्य नृत्य है और भीलों का प्रमुख नृत्य गैर है।
  • •चित्तौड़गढ़ का किला राजस्थान का सबसे बड़ा किला है; इसे 'राजस्थान का गौरव' कहते हैं।
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ब्रिटिश और मेवाड़ के बीच 1818 की संधि पर किसने हस्ताक्षर किए थे?

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कर्नल जेम्स टॉड, 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' के लेखक, ने पॉलिटिकल एजेंट के तौर पर काम किया:

3

किस मुगल शासक ने राजपूतों पर जजिया कर लगाया?

4

राजा टोडरमल, अकबर के मशहूर रेवेन्यू मिनिस्टर थे:

5

राजपूत-मुगल संबंधों के संदर्भ में इस्तेमाल होने वाले शब्द 'पातशाही' का मतलब था:

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