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मात्रा, अनुस्वार और वर्ण की अशुद्धियाँ

शब्द की अशुद्धियों में सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं तीन कारणों से बनता है — मात्रा का भ्रम, अनुस्वार और अनुनासिक का भेद, और वर्ण का गिर जाना या बढ़ जाना। कुल 100 शब्द, बाईं ओर अशुद्ध रूप और दाईं ओर शुद्ध।

29 सितंबर 2026 को सत्यापित

मात्रा संबंधी अशुद्धि — इ/ई और उ/ऊ का भ्रम

यह सबसे बड़ा और सबसे आसानी से सुधरने वाला वर्ग है। नियम सीधा है — संस्कृत से आए तत्सम शब्दों में मात्रा वही रहती है जो मूल में थी, चाहे हम बोलने में उसे खींच दें या दबा दें। ‘अतिथि’, ‘तिथि’, ‘हानि’, ‘निधि’, ‘विधि’ — इन सबका अंत ह्रस्व ‘इ’ पर होता है, इसलिए इन्हें ‘अतिथी’ या ‘हानी’ लिखना गलत है। दूसरी ओर ‘नदी’, ‘लक्ष्मी’, ‘सरस्वती’, ‘पृथ्वी’ में अंत दीर्घ ‘ई’ पर होता है। एक व्यावहारिक पहचान यह है कि पुल्लिंग तत्सम शब्द प्रायः ह्रस्व ‘इ’ पर और स्त्रीलिंग तत्सम शब्द प्रायः दीर्घ ‘ई’ पर समाप्त होते हैं — ‘मुनि’, ‘ऋषि’, ‘कवि’ पुल्लिंग हैं और ह्रस्व लेते हैं; ‘नारी’, ‘देवी’, ‘नदी’ स्त्रीलिंग हैं और दीर्घ। यह पहचान हर बार काम नहीं करती, पर आधे से ज़्यादा शब्दों में सही उत्तर तक पहुँचा देती है। ‘उ’ और ‘ऊ’ में भी यही बात है — ‘गुरु’, ‘साधु’, ‘वस्तु’ ह्रस्व लेते हैं, जबकि ‘वधू’, ‘सूर्य’, ‘पूर्ण’, ‘मूर्ति’ दीर्घ।

मात्रा संबंधी अशुद्धियाँ — अशुद्ध रूप और उसका शुद्ध रूप

  • अतिथीअतिथितत्सम पुल्लिंग शब्द, अंत में ह्रस्व इ
  • तिथीतिथि
  • हानीहानि
  • निधीनिधि
  • विधीविधि
  • ऋषीऋषि
  • मुनीमुनि
  • कवीकवि
  • प्रतिनीधिप्रतिनिधि
  • रचयीतारचयिता
  • कालीदासकालिदास
  • नविननवीनबीच में दीर्घ ई
  • प्रविणप्रवीण
  • द्वितियद्वितीय
  • तृतियतृतीय
  • बिमारीबीमारी
  • निरिक्षणनिरीक्षण
  • परिक्षापरीक्षा
  • शताब्दिशताब्दीअंत में दीर्घ ई
  • पत्निपत्नी
  • नारिनारी
  • लक्ष्मिलक्ष्मी
  • सरस्वतिसरस्वती
  • पृथ्विपृथ्वी
  • विद्यार्थिविद्यार्थी
  • अधिकारिअधिकारी
  • श्रीमतिश्रीमती
  • सुशिलसुशील
  • गुरूगुरुतत्सम में अंत ह्रस्व उ
  • साधूसाधु
  • वस्तूवस्तु
  • वधुवधूयहाँ अंत दीर्घ ऊ
  • सुचनासूचना
  • पुर्णपूर्ण
  • मुर्तिमूर्ति
  • सुर्यसूर्य
  • शुन्यशून्य
  • भुमिभूमि
  • समुहसमूह
  • पुज्यपूज्य
  • मुहुर्तमुहूर्त
  • दुसरादूसरा
  • उपरऊपर
  • उँचाईऊँचाई
  • अनुसुचितअनुसूचित
  • राजनितिकराजनीतिक
  • नविनतमनवीनतम

अनुस्वार और अनुनासिक की अशुद्धि — ं और ँ का भेद

यह भेद देखने में छोटा है और अंक में बड़ा। नियम यह है कि तत्सम शब्दों में, जहाँ नाक की ध्वनि पूरे व्यंजन के रूप में बोली जाती है और उसके बाद उसी वर्ग का स्पर्श व्यंजन आता है, वहाँ बिंदु यानी अनुस्वार लगता है — ‘अंक’, ‘संत’, ‘पंख’, ‘चिंता’, ‘संसार’। और तद्भव शब्दों में, जहाँ नासिकता केवल स्वर पर तैरती रहती है और अलग व्यंजन के रूप में नहीं बोली जाती, वहाँ चंद्रबिंदु यानी अनुनासिक लगता है — ‘आँख’, ‘गाँव’, ‘दाँत’, ‘साँप’, ‘हँसना’। ध्यान दीजिए, चंद्रबिंदु वाले शब्दों में भी आगे व्यंजन आ सकता है; अंतर इस बात का है कि वहाँ नाक की ध्वनि अपना अलग व्यंजन नहीं बनाती। इसे परखने का घरेलू तरीक़ा यह है कि शब्द को धीरे-धीरे बोलिए; यदि नाक से निकलने वाली ध्वनि एक अलग व्यंजन की तरह टकराती है तो बिंदु, और यदि स्वर ही नाक से गूँजता हुआ निकल जाता है तो चंद्रबिंदु। यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है — छपाई में चंद्रबिंदु की जगह अक्सर बिंदु लगा दिया जाता है, इसलिए किताबों में ‘गांव’ दिख जाना आम है। पर परीक्षा में शुद्ध रूप ‘गाँव’ ही माना जाता है। और सबसे मजेदार जोड़ी है ‘हंस’ और ‘हँस’ — बिंदु वाला पक्षी है, चंद्रबिंदु वाला हँसने की क्रिया।

अनुस्वार और अनुनासिक की अशुद्धियाँ

  • आंखआँख
  • गांवगाँव
  • दांतदाँत
  • कांचकाँच
  • पांचपाँच
  • चांदचाँद
  • सांपसाँप
  • ऊंटऊँट
  • मुंहमुँह
  • पूंछपूँछ
  • सांससाँस
  • आंगनआँगन
  • बांसुरीबाँसुरी
  • बांधनाबाँधना
  • हंसनाहँसनाक्रिया में चंद्रबिंदु; पक्षी ‘हंस’ में बिंदु
  • अंधेराअँधेरा
  • जहांजहाँ
  • वहांवहाँ
  • यहांयहाँ
  • कहांकहाँ
  • नहिंनहीं
  • मैमैं
  • सँसारसंसारयहाँ बिंदु चाहिए, चंद्रबिंदु नहीं
  • अँशअंश
  • चँचलचंचल
  • सुँदरसुंदर
  • चिँताचिंता
  • सँतोषसंतोष

वर्ण-लोप और वर्ण-आगम — वर्ण का गिर जाना या बढ़ जाना

इस वर्ग की दोनों भूलें आपस में उलटी हैं। वर्ण-लोप में शब्द से कोई वर्ण गिर जाता है — जैसे ‘अध्ययन’ में से एक ‘य’ गिरकर ‘अध्यन’ रह जाता है, या ‘स्वास्थ्य’ में से ‘य’ गिरकर ‘स्वास्थ’ बन जाता है। वर्ण-आगम में उलटा होता है, शब्द में एक वर्ण बेवजह घुस आता है — ‘पुरस्कार’ में ‘उ’ जुड़कर ‘पुरुस्कार’ बन जाता है, ‘अत्यधिक’ में मात्रा बढ़कर ‘अत्याधिक’ हो जाता है, ‘सदृश’ में ‘य’ चिपककर ‘सदृश्य’ बन जाता है। इनके साथ एक तीसरी भूल भी चलती है जिसे वर्ण-विपर्यय कहते हैं, यानी वर्णों का आपस में आगे-पीछे हो जाना; इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण ‘आशीर्वाद’ का ‘आर्शीवाद’ बन जाना है, जहाँ ‘र’ अपनी जगह छोड़कर पहले पहुँच जाता है। इन तीनों को पकड़ने का एक ही तरीक़ा है — शब्द को उसके मूल टुकड़ों में तोड़िए। ‘आशीर्वाद’ बना है ‘आशीः’ और ‘वाद’ से, इसलिए ‘र’ बीच में ही रहेगा, आगे नहीं जाएगा। ‘अध्ययन’ में ‘अधि’ के साथ ‘अयन’ है, इसलिए दो ‘य’ अनिवार्य हैं।

वर्ण-लोप और वर्ण-आगम से बनी अशुद्धियाँ

  • आर्शीवादआशीर्वादवर्ण-विपर्यय‘र’ की जगह बदल जाती है
  • अशीर्वादआशीर्वादमात्रा
  • अध्यनअध्ययनवर्ण-लोप‘अधि + अयन’ से बना, दो ‘य’ चाहिए
  • स्वास्थस्वास्थ्यवर्ण-लोप
  • हस्ताक्षेपहस्तक्षेपवर्ण-आगम
  • पुरुस्कारपुरस्कारवर्ण-आगम
  • अत्याधिकअत्यधिकवर्ण-आगम
  • सदृश्यसदृशवर्ण-आगम
  • इकठ्ठाइकट्ठावर्ण-आगम
  • शुरुवातशुरुआतवर्ण-आगम
  • वापिसवापसवर्ण-आगम
  • समान्यसामान्यमात्रा-लोप
  • तत्कालिकतात्कालिकवर्ण-लोप
  • मंत्रीमंडलमंत्रिमंडलमात्रा-लोप
  • दुरावस्थादुरवस्थावर्ण-आगम
  • अनुग्रहितअनुगृहीतवर्ण-अशुद्धि
  • कोतुहलकौतूहलमात्रा-लोप
  • अभ्यारण्यअभयारण्यवर्ण-विपर्यय
  • अंतर्ध्यानअंतर्धानवर्ण-आगम
  • सन्यासीसंन्यासीवर्ण-लोप‘सम् + न्यास’, इसलिए दो ‘न’
  • पुज्यनीयपूजनीयवर्ण-आगम
  • प्रदर्शनिप्रदर्शनीमात्रा-लोप
  • अभ्यस्थअभ्यस्तवर्ण-अशुद्धि
  • पुनरावृतिपुनरावृत्तिवर्ण-लोप
  • उपरोक्तउपर्युक्तवर्ण-अशुद्धि‘उपरि + उक्त’ की संधि से बना

इस भाग के अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1

निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —

  1. Aआशीर्वाद
  2. Bआर्शिवाद
  3. Cआर्शीवाद
  4. Dआशिर्वाद

व्याख्या

यह शब्द ‘आशीः’ और ‘वाद’ के मेल से बना है, इसलिए ‘र’ ‘शी’ के बाद ही आएगा। उसे आगे खिसकाकर ‘आर्शीवाद’ लिखना वर्ण-विपर्यय की भूल है, और ‘शि’ को ह्रस्व कर देना मात्रा की भूल।

प्रश्न 2

निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —

  1. Aअथिति
  2. Bअतिथि
  3. Cअतीथि
  4. Dअतिथी

व्याख्या

यह तत्सम पुल्लिंग शब्द है और ऐसे शब्दों का अंत प्रायः ह्रस्व ‘इ’ पर होता है, जैसे ‘तिथि’, ‘मुनि’, ‘कवि’। बोलने में खिंचाव आ जाने से लोग इसे दीर्घ कर देते हैं।

प्रश्न 3

निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —

  1. Aआन्ख
  2. Bआंख
  3. Cआँख
  4. Dआख

व्याख्या

यहाँ नासिक्यता स्वर पर ही रहती है और उसके बाद कोई स्पर्श व्यंजन नहीं टकराता, इसलिए चंद्रबिंदु लगता है। बिंदु तब लगता जब आगे क, च, ट, त या प वर्ग का व्यंजन आता, जैसे ‘अंक’ में।

प्रश्न 4

निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —

  1. Aव्यावहारिक
  2. Bव्यावहारीक
  3. Cव्यवाहरिक
  4. Dव्यवहारिक

व्याख्या

तत्सम संज्ञा से ‘इक’ प्रत्यय जोड़कर विशेषण बनाते समय आदि स्वर की वृद्धि होती है (अ→आ, इ→ऐ, उ→औ) — व्यवहार से व्यावहारिक, प्रमाण से प्रामाणिक, इतिहास से ऐतिहासिक।

प्रश्न 5

निम्नलिखित में अशुद्ध शब्द है —

  1. Aपुरस्कार
  2. Bतिरस्कार
  3. Cपुरुस्कार
  4. Dनमस्कार

व्याख्या

‘पुरस्कार’ में ‘पुरः’ और ‘कार’ का मेल है; बीच में ‘उ’ जोड़ देना वर्ण-आगम की भूल है। शेष तीनों शब्द उसी बनावट के हैं और शुद्ध हैं।

प्रश्न 6

निम्नलिखित में अशुद्ध शब्द है —

  1. Aस्वास्थ्य
  2. Bअत्याधिक
  3. Cहस्तक्षेप
  4. Dअध्ययन

व्याख्या

शुद्ध रूप ‘अत्यधिक’ है, जो ‘अति’ और ‘अधिक’ के मेल से बना है; बीच में दीर्घ मात्रा बढ़ा देना वर्ण-आगम की भूल है। शेष तीनों शब्द शुद्ध हैं।

प्रश्न 7

निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —

  1. Aमुहूरत
  2. Bमुहूर्त
  3. Cमूहुर्त
  4. Dमुहुर्त

व्याख्या

इसमें ‘हू’ दीर्घ है और उसके बाद ‘र्त’ आता है। बोलने में दीर्घ स्वर दब जाता है, इसी से ‘मुहुर्त’ लिखा जाने लगता है।

प्रश्न 8

निम्नलिखित में अशुद्ध शब्द है —

  1. Aउपर्युक्त
  2. Bपुनरावृत्ति
  3. Cवापिस
  4. Dइकट्ठा

व्याख्या

शुद्ध रूप ‘वापस’ है; बीच में ‘इ’ की मात्रा जोड़ देना वर्ण-आगम की भूल है। ‘उपर्युक्त’ ‘उपरि’ और ‘उक्त’ की संधि से बना शुद्ध शब्द है।

प्रश्न 9

निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —

  1. Aबीमारि
  2. Bबिमारि
  3. Cबिमारी
  4. Dबीमारी

व्याख्या

पहले स्वर पर दीर्घ ‘ई’ आती है और अंत में भी दीर्घ ‘ई’। दोनों जगह मात्रा घटा देना इस शब्द की सबसे आम भूल है।