तत्सम, विदेशी और लिंग-वचन की अशुद्धियाँ
संस्कृत से जस के तस आए तत्सम शब्द और उर्दू-फ़ारसी से आए विदेशी शब्द — दोनों की अशुद्धियाँ अलग कारण से बनती हैं। नुक़्ता कहाँ लगता है और कहाँ नहीं, यह नियम भी यहीं है। कुल 68 शब्द शुद्ध रूप सहित।
तत्सम शब्दों की अशुद्धि
तत्सम शब्द वे हैं जो संस्कृत से ज्यों-के-त्यों हिंदी में आए हैं, और यही उनकी कठिनाई भी है — उनका रूप बदलने की छूट हमें नहीं है। इस वर्ग की सबसे बड़ी भूल अनावश्यक प्रत्यय जोड़ना है। ‘सौजन्य’ अपने आप में भाववाचक संज्ञा है, उसमें फिर से ‘ता’ जोड़कर ‘सौजन्यता’ बना देना दोहरी भाववाचकता है और अशुद्ध है। यही बात ‘माधुर्य’, ‘सामर्थ्य’, ‘गौरव’, ‘लाघव’ और ‘दैन्य’ पर लागू होती है — ये सब पहले से पूरे शब्द हैं। दूसरी बड़ी भूल अतिशयता का दोहराव है: ‘श्रेष्ठ’ का सर्वोच्च रूप ‘श्रेष्ठतम’ है, इसलिए ‘सर्वश्रेष्ठतम’ लिखना एक ही बात दो बार कहना है। तीसरी भूल प्रत्यय लगने पर होने वाले ध्वनि-परिवर्तन को भूल जाना है — ‘व्यवहार’ से बना विशेषण ‘व्यावहारिक’ होता है, ‘प्रमाण’ से ‘प्रामाणिक’, ‘साहित्य’ से ‘साहित्यिक’; इनमें पहला स्वर दीर्घ हो जाता है, और जो इसे भूल जाता है वह ‘व्यवहारिक’ लिख बैठता है। चौथी भूल स्त्रीलिंग रूपों में होती है — ‘कवि’ का स्त्रीलिंग ‘कवयित्री’ है, ‘कवियत्री’ नहीं।
तत्सम शब्दों की अशुद्धियाँ
- सौजन्यतासौजन्यपहले से भाववाचक शब्द, ‘ता’ अनावश्यक
- माधुर्यतामाधुर्य
- सामर्थ्यतासामर्थ्य
- गौरवतागौरव
- लाघवतालाघव
- दैन्यतादैन्य
- सर्वश्रेष्ठतमसर्वश्रेष्ठअतिशयता का दोहराव
- व्यवहारिकव्यावहारिकप्रत्यय लगने पर पहला स्वर दीर्घ होता है
- प्रमाणिकप्रामाणिक
- साहित्यकसाहित्यिक
- ऐतिहासीकऐतिहासिक
- कवियत्रीकवयित्री
- अनुशरणअनुसरण
- आधीनअधीन
- निरपराधीनिरपराध
- उन्नतीउन्नति
- श्रीमानश्रीमान्हलंत सहित लिखा जाता है
- विद्वानविद्वान्
- भगवानभगवान्
- महात्ममहात्मा
- परिस्थितीपरिस्थिति
- अनुकुलअनुकूल
- प्रतिकुलप्रतिकूल
- वातावरनवातावरण
विदेशी शब्दों की अशुद्धि और नुक़्ते का नियम
हिंदी में फ़ारसी, अरबी, तुर्की और अंग्रेज़ी से ढेरों शब्द आए हैं, और इनकी वर्तनी के दो अलग सवाल हैं। पहला सवाल नुक़्ते का है। जो शब्द अभी भी अपनी मूल ध्वनि के साथ बोले जाते हैं, उन पर नुक़्ता लगता है — ज़रूरत, बाज़ार, ज़्यादा, फ़र्क़, ज़मीन, रोज़, वक़्त, तरीक़ा, मज़बूत। पर जो शब्द हिंदी में इतने घुल-मिल गए हैं कि अब हम उन्हें हिंदी की ही ध्वनि में बोलते हैं, उन पर नुक़्ता नहीं लगता — जोर, खबर, गरीब, फसल, इज्जत, जबान, हजार, किस्मत, सफेद, जहर, नुकसान, खुद, खर्च, जल्दी, जमाना। यही वह जगह है जहाँ अति-सुधार सबसे ज़्यादा होता है: लोग सभी ‘ज’ पर बिंदी लगा देते हैं और ‘जोर’ को ‘ज़ोर’ लिख बैठते हैं, जो अशुद्ध है। दूसरा सवाल अंग्रेज़ी शब्दों का है। अंग्रेज़ी के ‘ऑ’ वाले शब्दों में अर्धचंद्र लगता है — डॉक्टर, कॉलेज, ऑफ़िस — और उन्हें ‘डाक्टर’ या ‘कालेज’ लिखना अब अशुद्ध माना जाता है। साथ ही अंग्रेज़ी शब्दों के आगे बोलचाल में जुड़ जाने वाला ‘इ’ लिखने में नहीं आता — ‘इस्कूल’ नहीं ‘स्कूल’, ‘इस्टेशन’ नहीं ‘स्टेशन’।
विदेशी शब्दों की अशुद्धियाँ
- जरुरतज़रूरतफ़ारसी-अरबी मूल का शब्द, नुक़्ता आवश्यक
- बाजारबाज़ार
- ज्यादाज़्यादा
- फर्कफ़र्क़
- रोजरोज़
- वक्तवक़्त
- तरीकातरीक़ा
- मजबूतमज़बूत
- जमीनज़मीन
- इंतजारइंतज़ार
- इजाजतइजाज़त
- अंग्रेजीअंग्रेज़ी
- साफसाफ़
- तरफतरफ़
- सिर्फसिर्फ़
- दफ्तरदफ़्तर
- फैसलाफ़ैसला
- फौजफ़ौज
- फुर्सतफ़ुर्सत
- हस्पतालअस्पताल
- इस्कूलस्कूलआगे जुड़ा ‘इ’ केवल बोलचाल का है
- इस्टेशनस्टेशन
- डाक्टरडॉक्टरअंग्रेज़ी के ‘ऑ’ के लिए अर्धचंद्र
- कालेजकॉलेज
- आफिसऑफ़िस
- मसीनमशीन
लिंग और वचन से बनी अशुद्धि
यह वर्ग अकेले शब्द का नहीं, पूरे वाक्य का है, क्योंकि लिंग और वचन की भूल शब्द में नहीं बल्कि शब्द के मेल में दिखाई देती है। नियम यह है कि विशेषण, क्रिया और सर्वनाम — तीनों को संज्ञा के लिंग और वचन के अनुसार चलना पड़ता है। ‘पुस्तक’ स्त्रीलिंग है, इसलिए ‘मेरा पुस्तक’ नहीं, ‘मेरी पुस्तक’ होगा। ‘दही’ पुल्लिंग है, इसलिए वह ‘खट्टा’ होता है, ‘खट्टी’ नहीं। ‘समाचार’ भी पुल्लिंग है, इसलिए वह ‘सच्चा’ होता है। यहाँ राजस्थानी और अन्य बोलियों का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है, क्योंकि बोलियों में कई शब्दों का लिंग हिंदी से अलग है और वही आदत लिखने में उतर आती है। सुधारने का तरीक़ा यह है कि वाक्य लिखने के बाद उलटकर पढ़िए और हर क्रिया से पूछिए — यह किसके लिए आई है? जिस संज्ञा के लिए आई है, उसी का लिंग और वचन क्रिया पर चढ़ना चाहिए। वचन में सबसे आम भूल यह है कि संज्ञा बहुवचन कर दी जाती है पर क्रिया एकवचन रह जाती है, जैसे ‘उसकी पुस्तकें फटा है’ — यहाँ क्रिया को भी बहुवचन होना चाहिए।
लिंग और वचन से बनी अशुद्धियाँ
- यह मेरा पुस्तक है।यह मेरी पुस्तक है।लिंग‘पुस्तक’ स्त्रीलिंग है
- उसने अपना बात कही।उसने अपनी बात कही।लिंग
- मेरी भाई आ रहा है।मेरा भाई आ रहा है।लिंग
- गाय घास खा रहा है।गाय घास खा रही है।लिंग
- वह अच्छा लड़की है।वह अच्छी लड़की है।लिंग
- नदी बह रहा है।नदी बह रही है।लिंग
- मुझे तुम्हारा याद आती है।मुझे तुम्हारी याद आती है।लिंग
- आपका कृपा बनी रहे।आपकी कृपा बनी रहे।लिंग
- दही खट्टी है।दही खट्टा है।लिंग‘दही’ पुल्लिंग है
- आग बहुत तेज था।आग बहुत तेज थी।लिंग
- दूध ठंडी है।दूध ठंडा है।लिंग
- यह समाचार सच्ची है।यह समाचार सच्चा है।लिंग
- हवा ठंडा चल रही है।हवा ठंडी चल रही है।लिंग
- वह अपने माँ से मिला।वह अपनी माँ से मिला।लिंग
- उसकी पुस्तकें फटा है।उसकी पुस्तकें फटी हैं।वचनसंज्ञा बहुवचन है तो क्रिया भी बहुवचन
- सब विद्यार्थी आया।सब विद्यार्थी आए।वचन
- मेरे पास दो रुपया है।मेरे पास दो रुपये हैं।वचन
- सभा में बहुत लोग था।सभा में बहुत-से लोग थे।वचन
इस भाग के अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
निम्नलिखित में अशुद्ध शब्द है —
- Aचिह्न
- Bसंन्यासी
- Cसौजन्यता
- Dअनुगृहीत
व्याख्या
‘सौजन्य’ स्वयं भाववाचक संज्ञा है, इसलिए उसमें फिर से ‘ता’ जोड़ना एक ही भाव को दो बार कहना है। शेष तीनों शब्द शुद्ध हैं — ‘चिह्न’ में ‘ह्न’ है, ‘संन्यासी’ ‘सम् + न्यास’ से बना है इसलिए दो ‘न’ आते हैं।
प्रश्न 2
निम्नलिखित में अशुद्ध शब्द है —
- Aज़ोर
- Bवक़्त
- Cज़रूरत
- Dबाज़ार
व्याख्या
नुक़्ता केवल उन विदेशी शब्दों पर लगता है जो आज भी अपनी मूल ध्वनि में बोले जाते हैं। ‘जोर’ हिंदी में पूरी तरह घुल चुका है, इसलिए उस पर बिंदी नहीं लगती — यह अति-सुधार की भूल है।
प्रश्न 3
निम्नलिखित में शुद्ध शब्द है —
- Aकवयित्री
- Bकवियित्री
- Cकवयत्री
- Dकवियत्री
व्याख्या
‘कवि’ का स्त्रीलिंग रूप संधि के नियम से ‘कवयित्री’ बनता है, जहाँ ‘इ’ बदलकर ‘य’ हो जाता है। उच्चारण की सुविधा से बना ‘कवियत्री’ अशुद्ध है।
प्रश्न 4
निम्नलिखित में अशुद्ध शब्द है —
- Aगौरवता
- Bलाघव
- Cमाधुर्य
- Dसामर्थ्य
व्याख्या
‘गौरव’ पहले से भाववाचक संज्ञा है, इसलिए उसमें ‘ता’ जोड़ना अनावश्यक और अशुद्ध है। यही भूल ‘माधुर्यता’ और ‘सामर्थ्यता’ में भी की जाती है, पर यहाँ वे शुद्ध रूप में दिए गए हैं।