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उपसर्ग से विलोम बनाने की विधि

बहुत से विलोम याद करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती — वे उपसर्ग लगाकर बन जाते हैं। कौन-सा उपसर्ग कब लगता है, और सौभाग्य क्यों बनता है सुभाग्य क्यों नहीं — यही इस पेज पर है।

29 सितंबर 2026 को सत्यापित

विलोम बनने के मुख्य तरीक़े

हिंदी में विलोम चार रास्तों से बनते हैं, और चारों को अलग-अलग पहचान लेना आधी तैयारी है। पहला रास्ता है बिलकुल अलग, स्वतंत्र शब्द का — जैसे दिन–रात, जीवन–मृत्यु, आगे–पीछे। इनमें कोई नियम नहीं चलता, इन्हें अनुभव से याद करना पड़ता है, और सौभाग्य से ये सबसे जाने-पहचाने शब्द होते हैं।

दूसरा रास्ता उपसर्ग का है, जो सबसे अधिक काम आता है। मूल शब्द के आगे अ-, अन-, नि-, निर्-, दुर्-, कु-, बे-, ना- जैसे अंश जोड़ते ही अर्थ पलट जाता है — ज्ञान से अज्ञान, आदर से अनादर, ईमान से बेईमान। तीसरा रास्ता लिंग-परिवर्तन का है, जहाँ नर–नारी, राजा–रानी, बालक–बालिका जैसे जोड़े बनते हैं; इन्हें कुछ पुस्तकें विलोम मानती हैं और कुछ लिंग-भेद, पर परीक्षा में ये पूछे जाते हैं, इसलिए जान लेना ठीक है। चौथा रास्ता संस्कृत के तत्सम जोड़ों का है, जिनमें दोनों शब्द अलग-अलग धातुओं से बने हैं — उत्कर्ष–अपकर्ष, आविर्भाव–तिरोभाव, अन्वय–व्यतिरेक।

इनमें से उपसर्ग वाला रास्ता ही वह जगह है जहाँ थोड़ी-सी मेहनत बहुत दूर तक ले जाती है। कारण सीधा है — उपसर्ग गिनती के हैं, पर उनसे बनने वाले शब्द सैकड़ों हैं। इसलिए नीचे पूरा एक भाग सिर्फ़ उपसर्ग को दिया गया है। जो विद्यार्थी यह भाग ठीक से पढ़ लेता है, वह परीक्षा में ऐसे शब्दों का भी उत्तर निकाल लेता है जो उसने पहले कभी नहीं देखे।

उपसर्ग से विलोम बनाने की विधि

उपसर्ग वह छोटा-सा अंश है जो शब्द के आगे जुड़कर उसका अर्थ बदल देता है। विलोम के संदर्भ में उपसर्गों को दो हिस्सों में बाँटकर देखिए। एक हिस्सा वह है जो अर्थ को नकारता है या घटाता है — अ-, अन-, नि-, निर्-, दुर्-, कु-, बे-, ना-, अध-। दूसरा हिस्सा वह है जो दिशा ही पलट देता है — वि-, प्रति-, अप-, और उनके सामने खड़ा सु-, सत्-, उत्-।

पहले हिस्से में सबसे ज़रूरी नियम यह है कि ‘अ’ और ‘अन’ एक ही उपसर्ग के दो रूप हैं। जिस शब्द का पहला अक्षर व्यंजन हो, उसके आगे ‘अ’ लगता है — सत्य से असत्य, धर्म से अधर्म। और जिस शब्द का आरंभ स्वर से हो, उसके आगे ‘अन’ लगता है — आदर से अनादर, उचित से अनुचित, इच्छा से अनिच्छा। यही कारण है कि ‘अआदर’ जैसा रूप कहीं नहीं मिलता। यह एक नियम अकेले दर्जनों प्रश्नों का उत्तर दे देता है।

विलोम बनाने वाले प्रमुख उपसर्ग और उनका काम

उपसर्गअर्थ का प्रभावमूल शब्दविलोम रूप
अ-निषेध — व्यंजन से शुरू होने वाले शब्दों के आगेसत्य, धर्म, ज्ञानअसत्य, अधर्म, अज्ञान
अन-निषेध — स्वर से शुरू होने वाले शब्दों के आगेआदर, उचित, इच्छाअनादर, अनुचित, अनिच्छा
नि-अभाव या भीतर की ओरडर, कम्मा, ठल्लानिडर, निकम्मा, निठल्ला
निर्-पूरी तरह रहित होनासार्थक, बल, दोष, आशा, रोगनिरर्थक, निर्बल, निर्दोष, निराशा, निरोग
दुर्- / दुस्-बुरा, कठिन, कष्टदायकसुगम, सुबोध, भाग्यदुर्गम, दुर्बोध, दुर्भाग्य
कु-निम्न कोटि का, खोटासुपात्र, सुकर्म, सुमतिकुपात्र, कुकर्म, कुमति
बे-फ़ारसी मूल का निषेधईमान, होश, कसूरबेईमान, बेहोश, बेकसूर
ना-फ़ारसी मूल का निषेधपसंद, समझ, इंसाफ़नापसंद, नासमझ, नाइंसाफ़
अध-अधूरा, आधापका, खिला, मराअधपका, अधखिला, अधमरा
वि-दिशा या भाव का पलटनायोग, राग, संवादवियोग, विराग, विसंवाद
प्रति-सामने या उलटी ओरकूल, वादी, पक्षप्रतिकूल, प्रतिवादी, प्रतिपक्ष
सु-अच्छा — दुर्- और कु- के ठीक सामनेदुर्गम, कुपात्र, कुमतिसुगम, सुपात्र, सुमति

तालिका को केवल पढ़िए मत, उलटकर भी देखिए। जिस शब्द में पहले से ‘दुर्’ लगा हो, उसका विलोम बनाने के लिए ‘दुर्’ हटाकर ‘सु’ रख दीजिए — दुर्गम से सुगम, दुर्भाग्य से सौभाग्य, दुराचार से सदाचार। जहाँ ‘कु’ लगा हो, वहाँ ‘सु’ बैठ जाएगा — कुपात्र से सुपात्र, कुमति से सुमति। जहाँ ‘वि’ हो, वहाँ अक्सर ‘सं’ या मूल शब्द आ जाएगा — वियोग से संयोग, विक्षेप से संक्षेप। इस उलटी चाल का अभ्यास कर लीजिए, क्योंकि प्रश्नपत्र में शब्द दोनों दिशाओं से पूछा जाता है।

सौभाग्य क्यों, सुभाग्य क्यों नहीं

‘सु’ के बाद जब ‘भ’ जैसा शब्द आता है तो संधि के नियम से ‘सु + भाग्य’ मिलकर ‘सौभाग्य’ बन जाता है। ऐसे ही ‘सत् + जन’ से ‘सज्जन’ और ‘दुस् + चरित्र’ से ‘दुश्चरित्र’ बनता है। यानी उपसर्ग जोड़ने के बाद संधि भी लग सकती है — इसीलिए रूप हमेशा वैसा नहीं दिखता जैसा आप जोड़कर सोचते हैं। इस कारण बनाया हुआ रूप लिखने से पहले याद कीजिए कि भाषा में असल में कौन-सा शब्द चलता है।

उपसर्ग-आधारित विलोम — कक्षा में समझाने लायक उदाहरण

  • आस्तिकनास्तिकना-‘ना’ यहाँ पूरे विश्वास को नकार देता है।
  • सुपथकुपथकु-अच्छा रास्ता बनाम बुरा रास्ता — ‘सु’ के सामने सीधा ‘कु’ बैठता है।
  • साक्षरनिरक्षरनिर्-‘अक्षर से रहित’ — यहाँ ‘अ’ नहीं, ‘निर्’ चलता है; ‘असाक्षर’ प्रचलित रूप नहीं है।
  • सार्थकनिरर्थकनिर्-अर्थ से रहित। ‘निर् + अर्थक’ में संधि से ‘निरर्थक’ बना।
  • अनुकूलप्रतिकूलप्रति-‘अनु’ यानी पीछे-पीछे चलने वाला, ‘प्रति’ यानी सामने खड़ा।
  • संयोगवियोगवि-‘सम्’ जोड़ता है और ‘वि’ अलग करता है।
  • सुलभदुर्लभदुर्-सहज मिल जाने वाला बनाम कठिनाई से मिलने वाला।
  • होशबेहोशबे-फ़ारसी ‘बे’ हिंदी में इतना घुल गया कि अब यह देशज जैसा लगता है।
  • पकाअधपकाअध-‘अध’ पूरा नहीं नकारता, आधा कर देता है — यही इसकी विशेषता है।
  • उपस्थितअनुपस्थितअन-स्वर से शुरू होने के कारण ‘अ’ नहीं, ‘अन’ लगा।
  • ज्ञानअज्ञानअ-व्यंजन से शुरू होने के कारण केवल ‘अ’ लगा।
  • आशानिराशानि-‘नि + आशा’ में संधि से ‘निराशा’ बना।

इस भाग के अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1

निम्न में से किस शब्द का विलोम ‘अन’ उपसर्ग से नहीं बनता?

  1. Aआदर
  2. Bउचित
  3. Cधर्म
  4. Dइच्छा

व्याख्या

‘अन’ उपसर्ग स्वर से आरंभ होने वाले शब्दों के आगे लगता है — अनादर, अनुचित, अनिच्छा। ‘धर्म’ व्यंजन से शुरू होता है, इसलिए उसके आगे केवल ‘अ’ लगकर अधर्म बनता है। यही एक नियम दर्जनों प्रश्न हल कर देता है।

प्रश्न 2

‘सु’ जोड़कर बनाया गया निम्न में से कौन-सा रूप भाषा में प्रचलित नहीं है?

  1. Aसुगम
  2. Bसुमति
  3. Cसुभाग्य
  4. Dसुपात्र

व्याख्या

‘सु’ और ‘भाग्य’ जुड़ने पर संधि के कारण रूप ‘सौभाग्य’ बनता है, ‘सुभाग्य’ नहीं। उपसर्ग जोड़ने के बाद कई बार संधि भी लगती है, इसलिए जोड़कर बनाया हुआ रूप हमेशा सही नहीं होता।