राजस्थान की कृषि
Agriculture
राजस्थान की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा — वर्षा व सिंचाई से लेकर बाजरा-सरसों की राष्ट्रीय बादशाहत, कृषक कल्याण योजनाओं और जैतून-जोजोबा जैसी अनूठी फसलों तक, राज्य की कृषि की पूरी कहानी।
कृषि का महत्व एवं सांख्यिकी
कृषि राजस्थान की अर्थव्यवस्था और समाज की जीवनरेखा है — भूमि-उपयोग से लेकर वर्षा और नवीनतम कृषि गणना तक, आँकड़ों में जानिए यह कितनी विशाल है।
🌱अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका
- भारत की तरह राजस्थान की अर्थव्यवस्था भी मूलतः कृषि पर टिकी है; राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 49.53% भाग खेती में प्रयुक्त होता है और दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या आजीविका के लिए कृषि व संबद्ध गतिविधियों पर निर्भर है।
- राज्य के कुल कामगारों में से लगभग 62% कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर आजीविका के लिए निर्भर हैं।
- प्रचलित कीमतों पर राजस्थान के सकल मूल्यवर्धन (जी.वी.ए.) में कृषि व सम्बद्ध क्षेत्रों का योगदान 2025-26 में 25.74% रहा, जो 2011-12 के 28.56% से कम है, भले ही क्षेत्र का अपना जी.वी.ए. 2021-22 से 2025-26 के बीच प्रचलित कीमतों पर 3.23 लाख करोड़ से बढ़कर 4.41 लाख करोड़ रुपये (8.10% सी.ए.जी.आर.) और स्थिर कीमतों पर 1.92 लाख करोड़ से 2.23 लाख करोड़ रुपये (3.82% सी.ए.जी.आर.) हो गया।
🌧️वर्षा, सिंचाई एवं 'मानसून का जुआ'
- क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है (लगभग 3.42 करोड़ हैक्टेयर, देश का 10.41%), फिर भी यहाँ देश के सतही जल का मात्र 1.16% ही उपलब्ध है, इसलिए खेती वर्षा व भूमिगत जल दोनों पर निर्भर करती है — इसीलिए इसे 'मानसून का जुआ' भी कहा जाता है, यह वाक्यांश भारत रत्न एम.एस. स्वामीनाथन से जुड़ा है, जिसका अर्थ है कि फसल का भाग्य पूरी तरह वर्षा पर टिका होता है।
- कृषित भूमि का केवल लगभग 30% ही सिंचित है, शेष पूर्णतः वर्षा पर निर्भर है; औसत वार्षिक वर्षा में भी भारी अंतर है — पूर्वी राजस्थान में लगभग 704 मिमी जबकि पश्चिमी राजस्थान में मात्र 310 मिमी।
- 2024-25 में सकल सिंचित क्षेत्र लगभग 134.63 लाख हैक्टेयर तथा शुद्ध सिंचित क्षेत्र लगभग 99.28 लाख हैक्टेयर रहा, जिससे सिंचाई गहनता 135.61% निकलती है; इससे पिछले वर्ष (2023-24) में भी सिंचाई गहनता लगभग 135.75% तथा फसल गहनता 151.25% रही थी।
- दो-तिहाई से अधिक कृषित क्षेत्र पर बारानी खरीफ फसलें बोई जाती हैं, और रबी की फसलों में भी चने जैसी फसल का अच्छा उत्पादन जाड़े की वर्षा (मावठ) पर निर्भर करता है, क्योंकि चने का बमुश्किल 45-50% क्षेत्र ही सिंचित है।
🏆क्षेत्रफल, उत्पादन एवं राष्ट्रीय स्थिति
- कुल खाद्यान्न उत्पादन 2024-25 के 309.62 लाख टन से घटकर 2025-26 में 283.98 लाख टन (8.28% की गिरावट) रह गया, हालाँकि दलहन में 12.75% वृद्धि होकर उत्पादन 47.13 लाख टन तथा तिलहन में 7.18% वृद्धि होकर 100.46 लाख टन तक पहुँच गया।
- 2023-24 की राष्ट्रीय रैंकिंग में राजस्थान सरसों (राष्ट्रीय उत्पादन का 43.43%), बाजरा (41.34%) तथा कुल तिलहन (23.61%) में देश में शीर्ष पर रहा, तथा ग्वार उत्पादन में 88.80% के प्रभावी हिस्से के साथ पहले स्थान पर रहा।
- मूंगफली उत्पादन में राज्य गुजरात के बाद देश में दूसरे (19.91% हिस्सा) तथा चना (17.39%), कुल दलहन (13.76%) व सोयाबीन (8.96%) में तीसरे स्थान पर रहा।
🗺️भू-उपयोग का स्वरूप
- राज्य के कुल 343.43 लाख हैक्टेयर रिपोर्टिंग क्षेत्र (2024-25, प्रावधानिक) में से आधे से कुछ अधिक — 53.02% (182.09 लाख हैक्टेयर) — शुद्ध बोया गया क्षेत्र है, जबकि वन क्षेत्र 8.30% (28.50 लाख हैक्टेयर) है।
- कृषि के अयोग्य भूमि (गैर-कृषि उपयोग व ऊसर-अयोग्य भूमि मिलाकर) क्षेत्र का 12.81% है, जबकि कृषि योग्य बंजर भूमि व चरागाहों का हिस्सा 15.03% और है।
- कुल पड़त भूमि (चालू व अन्य पड़त मिलाकर) रिपोर्टिंग क्षेत्र का लगभग 10.84% है।
📋10वीं कृषि गणना (2015-16)
- भारत में कृषि गणना हर पाँच वर्ष में होती है; राजस्थान में जोत का औसत आकार 2010-11 के 3.07 हैक्टेयर से घटकर 2015-16 में 2.73 हैक्टेयर (11.07% की कमी) रह गया, जबकि कुल जोतों की संख्या 68.88 लाख से बढ़कर 76.55 लाख हो गई, जिससे राजस्थान का स्थान देश में (उत्तरप्रदेश व बिहार के बाद) आठवाँ रहा।
- 2010-11 से 2015-16 के बीच सीमान्त, लघु, अर्द्ध-मध्यम व मध्यम जोतों की संख्या बढ़ी, जबकि बड़ी जोतों में 11.14% की कमी आई, जिसका मुख्य कारण संयुक्त परिवारों का विघटन माना जाता है।
- दोनों गणनाओं के बीच महिला-प्रचालित जोतों की संख्या में लगभग 42% (5.46 लाख से 7.75 लाख) तथा क्षेत्रफल में 24% की वृद्धि हुई, जबकि राज्य का कुल जोत क्षेत्रफल मामूली रूप से घटकर 211.36 से 208.73 लाख हैक्टेयर रह गया।
🌍कृषि जलवायवीय क्षेत्र
- योजना आयोग ने 1988 में भारत को 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों में बाँटा; राजस्थान को आगे 10 कृषि जलवायवीय प्रखंडों में विभाजित किया गया है, जिनकी पहचान वर्षा, मिट्टी के प्रकार व विशिष्ट खरीफ-रबी फसलों से होती है।
- क्षेत्र I-C — अति शुष्क, आंशिक सिंचित पश्चिमी मैदानी क्षेत्र, जिसमें बीकानेर, जैसलमेर व चूरू का हिस्सा शामिल है — दसों क्षेत्रों में सबसे बड़ा है, जबकि बाँसवाड़ा-डूंगरपुर के आसपास का आर्द्र दक्षिणी मैदानी क्षेत्र (IV-B) सबसे छोटा है।
- पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्रों (I-A, I-B, I-C) में वर्षा मात्र 100-370 मिमी होती है, जबकि कोटा, बाराँ, बूँदी व झालावाड़ के आसपास आर्द्र दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र (V) में यह 650-1100 मिमी तक पहुँच जाती है।
कृषक कल्याण योजनाएँ, बजट एवं संस्थाएँ
देश के पहले पृथक कृषि बजट से लेकर आय सहायता, बीमा व डिजिटल योजनाओं की झड़ी तक — जानिए राजस्थान अपने किसानों को नीतिगत रूप से किस तरह सहारा देता है।
📜देश का पहला पृथक कृषि बजट एवं 12 मिशन
- 'समृद्ध किसान-खुशहाल राजस्थान' की सोच के साथ मुख्यमंत्री ने 23 फरवरी 2022 को वर्ष 2022-23 के लिए राज्य का — और देश का भी — पहला पृथक कृषि बजट पेश किया।
- कृषि विकास हेतु अब तक कुल 12 मिशन घोषित हो चुके हैं — 11 मिशन बजट 2022-23 में (सूक्ष्म सिंचाई, जैविक खेती, बीज उत्पादन, मिलेट्स, संरक्षित खेती, उद्यानिकी, फसल सुरक्षा, भूमि उर्वरता, कृषि श्रमिक संबल, कृषि तकनीक व खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े) तथा 12वाँ मिशन युवा कृषक कौशल संवर्द्धन हेतु बजट 2023-24 में घोषित हुआ।
- इन 12 मिशनों में शामिल राजस्थान मिलेट्स प्रोत्साहन मिशन का उद्देश्य राज्य को 'मिलेट्स हब' के रूप में विकसित करना है, जिसके लिए जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय में मिलेट्स उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित किया गया है।
💰बजट 2026-27 की प्रमुख घोषणाएँ
- बजट के आठवें स्तंभ के तहत उपनिवेशन क्षेत्र के किसानों को अप्रैल-सितम्बर 2026 के बीच बकाया भूमि किस्तें एकमुश्त जमा कराने पर ब्याज में पूर्ण छूट मिलेगी; पावर टिलर, कल्टीवेटर व रीपर जैसे कृषि यंत्रों हेतु 160 करोड़ रु. का अनुदान तथा 500 नए Custom Hiring Centres के लिए 96 करोड़ रु. भी तय किए गए हैं।
- पशुओं से फसल बचाने के लिए 228 करोड़ रु. से 50 हजार किसानों हेतु 20 हजार किमी तारबंदी की जाएगी और सामुदायिक तारबंदी के लिए न्यूनतम किसान संख्या 10 से घटाकर 7 कर दी गई है; हरे चारे के लिए 5 हजार किसानों को नि:शुल्क नेपियर घास भी दी जाएगी।
- हर ग्राम पंचायत में वर्मी-कम्पोस्ट इकाई का लक्ष्य है, शुरुआत 5 हजार से अधिक आबादी वाली 3496 पंचायतों से होगी (पहले चरण में 2098); अन्य घोषणाओं में 5 हजार किसानों हेतु सब्सिडीयुक्त वर्टिकल सपोर्ट सिस्टम आधारित सब्जी खेती, 500 अनुदानित सोलर क्रॉप ड्रायर, जोधपुर-पाली-कोटा में हाई-टेक एग्रो फॉरेस्ट्री नर्सरी, तथा अनूपगढ़, सांचौर व खाजूवाला में नई फूड/कपास मंडियाँ शामिल हैं।
📅बजट 2025-26 एवं 2024-25 की प्रमुख घोषणाएँ
- बजट 2025-26 में गेहूँ पर MSP से ऊपर मिलने वाला बोनस 125 से बढ़ाकर 150 रु. प्रति क्विंटल किया गया, 1000 नए Custom Hiring Centres की घोषणा हुई, तथा कृषि में AI, मक्का (बाँसवाड़ा), मधुमक्खी पालन (भरतपुर) व लहसुन (बाराँ) हेतु उत्कृष्टता केन्द्रों का प्रस्ताव रखा गया; इसमें खेती के बैलों की जोड़ी पर 30,000 रु. अनुदान की योजना भी शुरू हुई (दिशा-निर्देश 26 मार्च 2025 को जारी)।
- बजट 2024-25 में Centre of Excellence for Tissue Culture तथा State Institute of Food Technology, Entrepreneurship and Management (SIFTEM) का प्रस्ताव रखा गया, राष्ट्रीय RKVY की तर्ज पर राजस्थान कृषि विकास योजना (Raj KVY) घोषित हुई, तथा जैविक खाद उत्पादन के लिए प्रति किसान 10,000 रु. तक देने वाली गोबरधन जैविक उर्वरक योजना शुरू की गई।
- बैल जोड़ी अनुदान केवल उन लघु व सीमांत किसानों को मिलता है जिनके पास खेती में प्रयुक्त कम से कम दो बीमित बैल (आयु 15 माह से 12 वर्ष) हों, तथा जिनके पास भूमि स्वामित्व प्रमाण-पत्र या वनाधिकार पट्टा हो।
💵आय सहायता: पीएम-किसान एवं मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि
- 1 दिसम्बर 2018 को घोषित व 1 अप्रैल 2019 से प्रभावी पीएम किसान सम्मान निधि पूर्णतः केन्द्र-वित्तपोषित योजना है जो हर भू-धारक किसान को 2000-2000 रु. की तीन किस्तों में सालाना 6000 रु. देती है; राजस्थान में इसका राज्यस्तरीय शुभारंभ 24 फरवरी 2019 को हुआ (राष्ट्रीय शुभारंभ के ही दिन, गोरखपुर से), और लाभार्थियों की संख्या में राज्य देश में 5वें स्थान पर है।
- मुख्यमंत्री ने जनवरी 2024 में इसमें राज्यांश के रूप में 2000 रु. वार्षिक अतिरिक्त सहायता जोड़ी — मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि — जिसका शुभारंभ 30 जून 2024 को टोंक से हुआ, कुल सहायता 8000 रु. हो गई; बजट 2025-26 में राज्यांश और बढ़ाकर 3000 रु. सालाना कर दिया गया, अब किसानों को कुल 9000 रु. प्रतिवर्ष मिलते हैं।
- डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील तथा 10,000 रु. या अधिक मासिक पेंशन पाने वाले लोग पीएम-किसान से बाहर रखे गए हैं; राजस्थान में इसका नोडल विभाग सहकारिता विभाग है।
🛡️फसल बीमा एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
- खरीफ 2016 से लागू प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खाद्यान्न, तिलहन व बागवानी/वाणिज्यिक फसलों को एक समान कम प्रीमियम पर कवर करती है — खरीफ में 2%, रबी में 1.5% व वाणिज्यिक-बागवानी फसलों में 5% — शेष प्रीमियम सरकार वहन करती है; खरीफ 2020 से ऐच्छिक बनाई गई इस योजना में किसानों के पंजीकरण में भारत विश्व में पहले तथा प्रीमियम संग्रह में तीसरे स्थान पर है।
- MSP — वह न्यूनतम मूल्य जिस पर सरकार CACP की सिफारिश पर किसानों से सीधे फसल खरीदती है — अब एम.एस. स्वामीनाथन समिति के फार्मूले (उत्पादन लागत का 1.5 गुना) पर आधारित है, जो 1 जून 2020 से लागू है; इसके अंतर्गत वर्तमान में 14 खरीफ फसलें, 6 रबी फसलें व 2 वाणिज्यिक फसलें (जूट व खोपरा) आती हैं।
- MSP पर सर्वाधिक गेहूँ खरीद राजस्थान में होती है, जिसमें राज्य के भीतर जयपुर जिला अग्रणी है; 2025-26 की तुलना में 2026-27 में रबी फसलों में सर्वाधिक वृद्धि कुसुम (600 रु./क्विंटल) व खरीफ फसलों में सूरजमुखी (622 रु./क्विंटल) में हुई।
💧सिंचाई प्रोत्साहन योजनाएँ
- 2015-16 से चल रही (2005-06 की सूक्ष्म सिंचाई योजना पर आधारित) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) 60:40 केंद्र-राज्य अनुपात में लघु, सीमांत, SC/ST व महिला किसानों को 75% तथा अन्य को 70% ड्रिप-स्प्रिंकलर अनुदान 'हर खेत को पानी' के तहत देती है; इसके घटक प्रति बूँद अधिक फसल (PDMC) में राज्य के लघु-सीमांत किसानों को 55% व अन्य को 45% सहायता मिलती है — और PDMC व सूक्ष्म सिंचाई दोनों के क्रियान्वयन में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है।
- जलग्रहण विकास घटक (WDC-PMKSY 2.0) के तहत 2021-23 में 30 जिलों में 149 परियोजनाओं को 7.50 लाख हैक्टेयर भूमि उपचार हेतु मंजूरी मिली; छोटी जल संरचनाओं की मरम्मत-नवीनीकरण योजना (RRR), जो 2005 से चल रही है, वर्तमान में 14 जिलों में 37 जल निकायों तथा कोटा-बूँदी-टोंक के 84 नए स्वीकृत प्रस्तावों को कवर करती है।
- 2018-19 में नाबार्ड के साथ बनी सूक्ष्म सिंचाई निधि ड्रिप-स्प्रिंकलर कवरेज बढ़ाने के लिए संसाधन जुटाती है, जबकि पुरानी अमूल्य नीर योजना (2005-06 से) सिंचाई पाइपलाइन, फव्वारायुक्त डिग्गी व ड्रिप कार्यक्रमों को कवर करती है।
🏦ऋण, अवसंरचना एवं ऋण राहत
- किसान क्रेडिट कार्ड योजना (1998-99 से) किसानों को किफायती ऋण तक आसान पहुँच देती है; राजस्थान में पहला KCC 29 जनवरी 1999 को जयपुर के सिरसी गाँव के रामनिवास यादव को जारी हुआ, संपाश्विक-मुक्त सीमा अब 2 लाख रु. है, जबकि केंद्रीय बजट 2025-26 में कुल KCC ऋण सीमा 3 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रु. कर दी गई।
- 1 लाख करोड़ रु. का कृषि अवसंरचना कोष (घोषणा 15 मई 2020, अवधि वित्त वर्ष 2020-21 से 2032-33) फार्म-गेट अवसंरचना हेतु 2 करोड़ रु. तक ऋण देता है; AIF की उच्चतम सीजन प्रति इकाई औसत रोजगार सृजन में राजस्थान देश में सबसे आगे रहा (27, राष्ट्रीय औसत 11 की तुलना में)।
- नवम्बर 2024 से एक नई ब्याज अनुदान योजना दीर्घकालीन सहकारी कृषि/अकृषि ऋणों के समय पर चुकारे पर 7% अनुदान देती है (पुराने ऋणों पर 5%, और पहली बार अकृषि ऋणी भी शामिल); अलग से, कृषक ऋण राहत आयोग विधेयक 2023 के तहत न्यायाधिपति प्रकाशचंद गुमा की अध्यक्षता में राजस्थान राज्य कृषक ऋण राहत आयोग बनाया गया।
🤝पेंशन एवं कल्याण कोष
- लघु व सीमान्त वृद्ध किसानों के लिए सम्मान पेंशन योजना में 55+ वर्ष की महिला व 58+ वर्ष के पुरुष किसान को मासिक पेंशन मिलती है, जो 1 जनवरी 2026 से 1250 से बढ़ाकर 1300 रु. कर दी गई; 16 दिसम्बर 2019 के अध्यादेश से 1000 करोड़ रु. से बना कृषक कल्याण कोष बजट 2023-24 में बढ़ाकर 7500 करोड़ रु. कर दिया गया।
- महात्मा ज्योतिबा फुले मंडी श्रमिक कल्याण योजना (2015) लाइसेंसधारी महिला हम्मालों व पल्लेदारों को प्रसूति मजदूरी, 75,000 रु. विवाह सहायता, मेधावी बच्चों को छात्रवृत्ति व गंभीर रोग में 20,000 रु. तक अस्पताल सहायता देती है; मुख्यमंत्री कृषक साथी सहायता योजना (पहले 2009 की राजीव गांधी योजना) कृषि या मंडी कार्य के दौरान मृत्यु पर 2 लाख रु. तथा अंग-भंग पर 5,000-50,000 रु. देती है।
- सावित्री बाई फुले महिला कृषक सशक्तीकरण योजना (2018) मंडी में उपज बेचने पर ई-भुगतान लेने वाली महिलाओं को प्रोत्साहन देती है — 50 हजार से 1 लाख रु. तक के भुगतान पर 500 रु. तथा 1 लाख से अधिक पर 1000 रु., सीधे बैंक खाते में जमा।
🌿मृदा स्वास्थ्य, जैविक एवं प्राकृतिक खेती
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से शुरू हुई — इसी तारीख को अब हर वर्ष मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिवस मनाया जाता है; परम्परागत कृषि विकास योजना (2015-16, 60:40 वित्तपोषण) किसान समूहों के जरिये रसायन-मुक्त जैविक खेती को बढ़ावा देती है।
- प्राकृतिक खेती पहल के तहत राजस्थान के 2.5 लाख किसानों को इससे जोड़ा जा रहा है — 2.25 लाख राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत (केंद्र 60%, राज्य 40%) तथा 25,000 पूर्णतः राज्य-वित्तपोषित — जिसमें प्रति एकड़ 4000 रु. DBT प्रोत्साहन व प्रति बायो-इनपुट केंद्र 1 लाख रु. दिया जाता है।
- गोबरधन जैविक उर्वरक योजना (बजट 2024-25) ब्लॉक स्तर पर 50-50 किसानों के समूह हेतु वर्मीकम्पोस्ट इकाई के लिए लागत का 50% या 10,000 रु., जो भी कम हो, अनुदान देती है; पीएम-प्रणाम योजना (मंजूरी 28 जून 2023) भी राज्यों को संतुलित उर्वरक उपयोग व जैविक विकल्पों की ओर प्रोत्साहित करती है।
🏪विपणन सुधार, मंडियाँ एवं ODOP
- भारत का इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार e-NAM का राष्ट्रीय शुभारंभ 14 अप्रैल 2016 को राजस्थान की ही रामगंज मंडी (कोटा) से हुआ था; दिसम्बर 2025 तक राज्य की 173 मंडी समितियाँ इससे जुड़ चुकी हैं (जनवरी 2026 तक देशभर में 1522 मंडियाँ), और राजस्थान 10 वर्षों में कुल आवक में दूसरे, ई-ट्रेड में पहले तथा ई-पेमेंट में चौथे स्थान पर है — 12 फरवरी 2026 से e-NAM 2.0 लागू हुआ।
- PM-FME के अंतर्गत 6 फरवरी 2024 को देशभर के 713 जिलों के लिए स्वीकृत 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना राजस्थान के हर जिले को एक विशिष्ट कृषि उत्पाद से जोड़ती है — जैसे अलवर व सीकर के लिए प्याज, बाँसवाड़ा व डूंगरपुर के लिए आम, बाराँ व प्रतापगढ़ के लिए लहसुन, जोधपुर के लिए जीरा आधारित उत्पाद तथा बाड़मेर के लिए अनार — जिसे राज्यभर के 8 प्रसंस्करण इन्क्यूबेशन केंद्रों का सहयोग मिलता है।
- कृषक उपहार योजना e-NAM से बेचने वाले किसानों को कूपन इनाम देती है (हर 6 माह में मंडी स्तर पर ड्रॉ तथा राज्य स्तर पर वार्षिक 2.50 लाख रु. तक के पुरस्कार), और राज्य में मंडी आने वाले किसानों के लिए 5 रु. वाली किसान कलेवा योजना (2014) भी चलती है; राजस्थान में देश का पहला मसाला पार्क (मथानिया, जोधपुर, 2012) तथा दो मेगा फूड पार्क (रूपनगढ़-अजमेर व पलाना-बीकानेर) भी हैं।
💻राज्य कृषि नीति एवं डिजिटल पहलें
- डॉ. आर.एस. परौदा समिति द्वारा तैयार व 26 जून 2013 को स्वीकृत राज्य कृषि नीति का लक्ष्य खाद्यान्न उत्पादन दुगुना करना व 10 वर्षों में 4% वार्षिक कृषि विकास दर हासिल करना है; राजस्थान किसान आयोग का गठन 2007 से शुरू हुआ, नारायण सिंह इसके पहले अध्यक्ष (2011) रहे तथा वर्तमान अध्यक्ष सी.आर. चौधरी हैं।
- एग्रीस्टैक के तहत डिजिटल फार्मर आईडी बनाने में राजस्थान देश में अग्रणी है — लगभग 95 लाख आईडी बन चुकी हैं (लक्ष्य का 95%) — और इसका 'राज किसान साथी' सिंगल-विंडो पोर्टल (शुभारंभ 20 अगस्त 2021) देश का ऐसा पहला ढाँचा था, जिसे राष्ट्रीय CIPS इनोवेशन अवॉर्ड (2025) व राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस अवॉर्ड (सिल्वर, 2023-24) मिला।
- हाल की तकनीकी पहलों में AI-आधारित 'भारत-विस्तार' हेल्पलाइन (शुभारंभ 17 फरवरी 2026, नंबर 155261) तथा नमो ड्रोन दीदी योजना (1261 करोड़ रु., 2023) शामिल हैं, जो महिला स्वयं सहायता समूहों को 80% केंद्रीय अनुदान पर 15,000 ड्रोन देती है — अकेले राजीविका के 37,000 से अधिक SHG सदस्य पशु सखी तथा लगभग 37,000 कृषि सखी के रूप में कार्यरत हैं।
राजस्थान की फसलें: अनाज, दलहन, तिलहन एवं नकदी फसलें
फसल-दर-फसल राजस्थान के खेतों के पीछे के आँकड़े — जलवायु आवश्यकताएँ, प्रमुख किस्में, अग्रणी जिले और देश में राज्य की स्थिति।
🌾धान / चावल
- वानस्पतिक नाम Oryza sativa है; इसे उष्ण-आर्द्र जलवायु, 50-200 सेमी वार्षिक वर्षा तथा काली-चिकनी दोमट मिट्टी चाहिए; हनुमानगढ़ में यह पूर्णतः सिंचित क्षेत्र में उगाया जाता है।
- 2024-25 में क्षेत्र व उत्पादन दोनों में राजस्थान का राष्ट्रीय रैंक 17वाँ है (उत्तरप्रदेश अग्रणी); राज्य में बूँदी, हनुमानगढ़ व कोटा शीर्ष क्षेत्र-उत्पादन जिले हैं, और बासमती 370, कस्तूरी व पूसा 221 इसकी लोकप्रिय किस्में हैं।
🌾ज्वार
- 'गरीब की रोटी' कहलाने वाली ज्वार (Sorghum vulgare) गर्म जलवायु की फसल है जिसे 35-150 सेमी वर्षा व बलुई-चिकनी दोमट मिट्टी चाहिए; इसका अनाज ग्लूटेन-मुक्त होने से सेलियक रोगियों के लिए उपयोगी है।
- क्षेत्र व उत्पादन दोनों में राजस्थान देश में तीसरे स्थान पर है (शीर्ष उत्पादक महाराष्ट्र है), अजमेर, टोंक व भीलवाड़ा राज्य के अग्रणी जिले हैं।
🌾बाजरा
- 'राजस्थान का गौरव' कही जाने वाली बाजरा (Pennisetum typhoideum) शुष्क-उष्ण जलवायु, रेतीली मिट्टी व 50 सेमी से कम वर्षा में उगती है; इसका अनाज भी ग्लूटेन-मुक्त होता है, और अकेले राजस्थान भारत की लगभग 45% बाजरा उपज देता है।
- क्षेत्र व उत्पादन दोनों में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है; क्षेत्रफल में बाड़मेर-जोधपुर तथा उत्पादन में अलवर-जयपुर अग्रणी हैं।
🌽मक्का
- मक्का (Zea mays) गर्म जलवायु की उष्णकटिबंधीय फसल है जिसे दोमट मिट्टी, प्रचुर जल, 50-70 सेमी वर्षा व 24-30°C तापमान चाहिए; क्षेत्रफल में राजस्थान चौथे किंतु उत्पादन में मात्र सातवें स्थान पर है (मध्यप्रदेश अग्रणी), भीलवाड़ा, चित्तौड़ व उदयपुर — राज्य के दक्षिणी, अरावली व बनास-माही बेसिन क्षेत्र — शीर्ष जिले हैं।
🌾गेहूँ
- गेहूँ (Triticum aestivum) उत्पादन व सिंचित क्षेत्र दोनों में राजस्थान की सबसे बड़ी फसल है; इसे शीतोष्ण जलवायु, दोमट-बलुई मिट्टी, 50-75 सेमी वर्षा तथा मौसम के दौरान बढ़ता तापमान (बुवाई पर 10°C से पकने पर 21-28°C) चाहिए।
- क्षेत्र में राज्य का राष्ट्रीय रैंक चौथा तथा उत्पादन में पाँचवाँ है (उत्तरप्रदेश अग्रणी); हनुमानगढ़ क्षेत्र, उत्पादन व सिंचित क्षेत्र तीनों में शीर्ष पर है, इसके बाद गंगानगर व बूँदी हैं।
🌾जौ
- 'गरीब का खाद्यान्न' कही जाने वाली जौ (Hordeum vulgare) रबी की फसल है जो शीतोष्ण जलवायु, दोमट-बलुई मिट्टी, 50-80 सेमी वर्षा व 15-18°C तापमान में उगती है।
- क्षेत्र व उत्पादन दोनों में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है; गंगानगर क्षेत्र, उत्पादन, उत्पादकता व सिंचित क्षेत्र सभी में शीर्ष पर है, इसके बाद जयपुर व सीकर हैं।
🌾श्री अन्न (मिलेट्स): वर्गीकरण, संवर्धन एवं स्थिति
- श्री अन्न/न्यूट्री सीरियल्स में बाजरा, ज्वार, रागी, कांगनी, सांवा, कोदो, प्रोसो मिलेट, लिटिल मिलेट, कुट्टू व रामदाना शामिल हैं; बाजरा-ज्वार के अलावा दक्षिणी जनजातीय जिलों — डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, जालौर व सिरोही — में सांवा, कांगनी, कोदो व कुटकी भी उगाए जाते हैं।
- कुल मिलेट्स उत्पादन में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है (2024-25 में महाराष्ट्र दूसरे, कर्नाटक तीसरे स्थान पर), और श्री अन्न/पोषक अनाज की समग्र श्रेणी में भी शीर्ष पर है; कुल अनाज (Cereals) में राज्य क्षेत्र में तीसरे व उत्पादन में चौथे स्थान पर है।
- भारत सरकार का मिलेट्स विकास निदेशालय जयपुर में स्थित है, राज्य में एक समर्पित 'श्री अन्न प्रमोशन एजेंसी' बनाई गई है, और जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के मंडोर कृषि अनुसंधान केन्द्र में मिलेट्स उत्कृष्टता केन्द्र कार्यरत है; मिड-डे-मील, इंदिरा रसोई व ICDS मेन्यू में भी मिलेट्स शामिल किए गए हैं।
🫘मूँग
- मूँग (Vigna radiata) शुष्क-गर्म जलवायु, दोमट मिट्टी व 25-40 सेमी वर्षा में उगती है; क्षेत्र में राजस्थान देश में प्रथम तथा उत्पादन में दूसरे स्थान पर है (मध्यप्रदेश के बाद), नागौर, चूरू व जोधपुर क्षेत्रफल में अग्रणी हैं।
🫘उड़द, मोठ एवं चँवला
- उड़द (Vigna mungo) उष्ण-आर्द्र जलवायु व 40-60 सेमी वर्षा में उगती है; क्षेत्र में राजस्थान का राष्ट्रीय रैंक पाँचवाँ तथा उत्पादन में छठा है (आंध्रप्रदेश अग्रणी), बूँदी व भीलवाड़ा शीर्ष जिले हैं।
- शुष्क जलवायु व 35-70 सेमी वर्षा वाली मोठ (Vigna aconitifolia) में बीकानेर, चूरू व बाड़मेर क्षेत्रफल में अग्रणी हैं; आर्द्र-उष्ण खरीफ फसल चँवला मुख्यतः झुंझुनूँ, सीकर व चूरू में केन्द्रित है।
🫘अरहर/तूर
- अरहर (Cajanus cajan) आर्द्र-उष्ण जलवायु, काली मिट्टी, 40-80 सेमी वर्षा व 20-25°C तापमान में उगती है; उत्पादन उदयपुर के फलासिया-झाड़ोल-कोटड़ा क्षेत्र में केन्द्रित है, बाँसवाड़ा, उदयपुर व डूंगरपुर अग्रणी जिले हैं, हालाँकि क्षेत्र में राजस्थान का राष्ट्रीय रैंक मात्र 15वाँ व उत्पादन में 16वाँ है (महाराष्ट्र अग्रणी)।
🫘चना
- रबी की फसल चना (Cicer arietinum) को ठण्डी-शुष्क जलवायु व हल्की दोमट मिट्टी चाहिए, और इसका अच्छा उत्पादन जाड़े की वर्षा (मावठ) पर निर्भर करता है; क्षेत्र में राजस्थान देश में दूसरे व उत्पादन में तीसरे स्थान पर है (महाराष्ट्र अग्रणी), चूरू व अजमेर शीर्ष जिले हैं।
🫘मसूर
- मसूर (Lens culinaris) को ठण्डी जलवायु, हल्की दोमट मिट्टी व 80-100 सेमी वर्षा चाहिए; क्षेत्र में राजस्थान का राष्ट्रीय रैंक सातवाँ तथा उत्पादन में छठा है (उत्तरप्रदेश अग्रणी), झालावाड़ — क्षेत्र, उत्पादन, उत्पादकता व सिंचित क्षेत्र सभी में शीर्ष जिला — के बाद प्रतापगढ़ व झुंझुनूँ आते हैं।
📈कुल दलहन एवं खाद्यान्न — राष्ट्रीय स्थिति
- कुल दलहन उत्पादन में राजस्थान का राष्ट्रीय रैंक तीसरा है (मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र के बाद), जबकि कुल खाद्यान्न उत्पादन में यह चौथे स्थान पर है (उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश के बाद); दलहन के क्षेत्र व उत्पादन दोनों में राज्य के भीतर चूरू अग्रणी है।
🥜तिल एवं मूंगफली
- तिल (Sesamum indicum) मध्यम-उष्ण जलवायु, हल्की बलुई दोमट मिट्टी व 30-100 सेमी वर्षा में उगती है; उत्पादन में राजस्थान देश में पाँचवें स्थान पर है (पश्चिम बंगाल अग्रणी), गंगानगर राज्य का शीर्ष उत्पादक व सिंचित जिला है।
- मूंगफली एक उष्णकटिबंधीय तिलहन है, जो मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाती है और 43-52% तक तेल देती है; उत्पादन में राजस्थान गुजरात के बाद देश में दूसरे स्थान पर है; बीकानेर राज्य में क्षेत्र व उत्पादन दोनों में अग्रणी है, और मूंगफली प्रधानता के कारण लूणकरणसर (बीकानेर) को 'राजस्थान का राजकोट' कहा जाता है।
🌻राई-सरसों एवं सोयाबीन
- सरसों शुष्क-ठण्डी जलवायु की फसल है जिसे 80-100 सेमी वर्षा व 15-20°C तापमान चाहिए; उत्पादन में राजस्थान देश में सबसे आगे है, दूसरे स्थान पर उत्तरप्रदेश है; गंगानगर क्षेत्रफल में जबकि बीकानेर उत्पादन व सिंचित क्षेत्र में अग्रणी है।
- गर्म-आर्द्र जलवायु व 75-125 सेमी वर्षा वाली सोयाबीन उत्पादन में राजस्थान को देश में तीसरा स्थान (महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश के बाद) दिलाती है; झालावाड़, बाराँ व कोटा अग्रणी जिले हैं।
🌱अरण्डी, तारामीरा, अलसी एवं कुल तिलहन
- 22-30°C अनुकूल उष्ण-शुष्क जलवायु की अरण्डी में राजस्थान गुजरात के बाद देश में दूसरे स्थान पर है, जालौर, बाड़मेर व सिरोही शीर्ष जिले हैं; तारामीरा शुष्क-उष्ण जलवायु व हल्की दोमट मिट्टी में उगती है, इसमें नागौर, पाली व जैसलमेर अग्रणी हैं।
- शीतोष्ण जलवायु व 75-150 सेमी वर्षा वाली अलसी में राजस्थान चौथे स्थान पर है (मध्यप्रदेश के बाद), इसमें प्रतापगढ़, झालावाड़ व चित्तौड़गढ़ अग्रणी हैं; समग्र रूप से कुल तिलहन उत्पादन में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर है, और राज्य के भीतर बीकानेर क्षेत्र व उत्पादन दोनों में शीर्ष पर है।
🎋गन्ना एवं ग्वार
- उष्णकटिबंधीय जलवायु व 125-165 सेमी वर्षा वाला गन्ना राजस्थान में एक छोटी फसल है — राज्य का राष्ट्रीय रैंक मात्र 17वाँ है, शीर्ष उत्पादक उत्तरप्रदेश से बहुत पीछे — फिर भी यह राज्य की सबसे अधिक सिंचित फसल है, गंगानगर इसका अग्रणी जिला है।
- इसके विपरीत ग्वार राजस्थान की विशेषता है — राज्य देश के कुल ग्वार गम उत्पादन का लगभग 90% पैदा करता है और उत्पादन में राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान पर है, बीकानेर, हनुमानगढ़ व गंगानगर अग्रणी हैं, तथा पाँच जिलों में इसके लिए विशेष कृषि निर्यात जोन बनाए गए हैं।
🌱कपास (सफेद सोना)
- 'सफेद सोना' कहलाने वाली कपास (Gossypium hirsutum) काली, जलोढ़ व गहरी दोमट मिट्टी में 15-25°C पर उगती है और बुवाई बाद 90 दिन पाला-रहित मौसम चाहती है; राज्य के उत्तर-पश्चिम (गंगानगर-हनुमानगढ़) में अमेरिकन/नरमा किस्म, हाड़ौती क्षेत्र, टोंक व बाँसवाड़ा में मालवी कपास उगती है, और बीकानेरी नरमा को राज्य की पहली स्वदेशी संकर किस्म माना जाता है।
- 2023-24 के उत्पादन में राजस्थान देश में चौथे स्थान पर रहा (महाराष्ट्र, गुजरात व तेलंगाना के बाद); राज्य में गंगानगर क्षेत्र, उत्पादन (लगभग 30% हिस्सा) व सिंचित क्षेत्र तीनों में अग्रणी है, इसके बाद हनुमानगढ़ व जोधपुर आते हैं — और कपास के बीज (बिनौला) से तेल व पशु-आहार (खल) दोनों मिलते हैं।
📅फसलों का वर्गीकरण: उपयोग एवं मौसम अनुसार
- उपयोग के आधार पर फसलें खाद्य फसलों (भोजन हेतु उगाई जाने वाली — बाजरा, गेहूँ, ज्वार, मक्का, जौ, चावल जैसे अनाज; चना, मूंग, उड़द, अरहर जैसी दालें) और मुख्यतः बिक्री हेतु उगाई जाने वाली वाणिज्यिक फसलों (रेशेदार, बागानी, उद्दीपक जैसे तम्बाकू-अफीम, तथा चारा फसलें) में बँटती हैं।
- मौसम के अनुसार खरीफ फसलें (स्यालु या चौमासा) मानसून आरंभ (जून-जुलाई) में बोई जाकर सितंबर-अक्टूबर में कटती हैं, इसमें खाद्यान्न (क्षेत्र का 60-65%, बाजरा सबसे बड़ा), तिलहन व कपास-गन्ना शामिल हैं; रबी फसलें (उन्हालु) अक्टूबर-नवम्बर में बोई जाकर मार्च-अप्रेल में कटती हैं, गेहूँ अग्रणी है, जहाँ पानी उपलब्ध हो वहाँ मार्च-जून में तीसरी 'जायद' फसल (तरबूज, खीरा, चारा) भी ली जाती है, तथा अगस्त-सितंबर में तोरिया जैसी कैच क्रॉप बोई जाती है।
- चना, अरहर, मूंग व मूंगफली जैसी दलहनी फसलों की जड़ ग्रंथियों में नाइट्रोजन-स्थिरीकारी राइजोबियम जीवाणु पाए जाते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बहाल करते हैं, तथा चने के साथ सरसों-अलसी व मूंग के साथ सूरजमुखी जैसी अंतःफसल जोड़ी लाभकारी पाई गई है।
बागवानी, मसाले, चारा एवं औषधीय पौधे
अनाज के खेतों से आगे — वे फल, सब्जियाँ, मसाले, शहद और जड़ी-बूटियाँ जो राजस्थान के जिलों को उनकी विशिष्ट पहचान देते हैं।
🍊बागवानी: परिचय
- राजस्थान में उद्यानिकी विकास के लिए एक पृथक उद्यान निदेशालय 1989-90 में बना; फल, सब्जी, मसाला व फूल उत्पादन में निरंतर वृद्धि से कई जिलों की अपनी पहचान बनी है — झालावाड़ का संतरा, श्रीगंगानगर का किन्नू-माल्टा-मौसमी, तथा बालोतरा-बाड़मेर-जालौर का अनार।
- अमरूद सवाई माधोपुर, भरतपुर व बूँदी में; बेर श्रीगंगानगर, जोधपुर व भरतपुर में; आँवला अजमेर, भीलवाड़ा, नागौर, जयपुर व अलवर में; धनिया हाड़ौती क्षेत्र में; तथा जीरा पश्चिमी पट्टी के बाड़मेर, जालौर व जोधपुर जिलों में पनपता है।
📊बागवानी सांख्यिकी
- आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार फलों का क्षेत्रफल 2023-24 के 88,672 हैक्टेयर से बढ़कर 2024-25 में 92,993 हैक्टेयर हुआ, उत्पादन 11.98 से 13.85 लाख टन पहुँचा; सब्जियों का क्षेत्रफल इसी अवधि में 1.94 से 2.05 लाख हैक्टेयर तथा मसाला फसलों का क्षेत्रफल लगभग दोगुना होकर 6.84 से 13.65 लाख हैक्टेयर हो गया।
- 2023-24 में सुगंधित व औषधीय पौधों के उत्पादन में राजस्थान देश में प्रथम, मसाला फसलों में चौथे तथा शहद में पाँचवें स्थान पर रहा; मसालों में जीरा (गुजरात के बाद), सौंफ, मेथी व लहसुन में दूसरे तथा धनिया में तीसरे स्थान पर रहा — 2022-23 में राज्य जीरा उत्पादन में देश में प्रथम भी रह चुका है।
🏅उद्यानिकी उत्कृष्टता केन्द्र
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 2012-13 में इजरायली सहयोग से तीन उत्कृष्टता केन्द्र बने — अनार हेतु ढिंढोल फार्म (बस्सी, जयपुर), नींबूवर्गीय हेतु नान्ता (कोटा) व खजूर हेतु सगरा-भोजका (जैसलमेर); इसके बाद 2014-15 (झालावाड़ में संतरा, देवड़ावास-टोंक में अमरूद, खेमरी-धौलपुर में आम) व 2016-18 (बूँदी में सब्जी, चित्तौड़गढ़ में सीताफल, सवाईमाधोपुर में फूल, मावली-उदयपुर में औषधीय फसलें) में और केन्द्र बने, जिससे 2017-18 तक राज्य में कुल केन्द्रों की संख्या 10 से ऊपर पहुँच गई।
🧅प्याज एवं सब्जियाँ
- खरीफ व रबी दोनों में उगाई जाने वाली नकदी फसल प्याज के 2023-24 उत्पादन में राजस्थान महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात व कर्नाटक के बाद देश में पाँचवें स्थान पर रहा।
- जोधपुर के मथानिया कस्बे की विशिष्ट लाल मिर्च प्रसिद्ध है, और राज्य में सीकर, जोधपुर, जयपुर, अलवर व डीडवाना-कुचामन जैसे जिलों में टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, आलू, गाजर व पपीता जैसी सब्जियों की विविध खेती होती है।
🍈फल किस्में: बेर, आँवला, अनार एवं नींबूवर्गीय
- अनार की उल्लेखनीय किस्मों में गणेश, जालौर सीडलेस, सुपर भगवा व भगवा (सिंदूरी) शामिल हैं, जबकि नींबूवर्गीय फलों में मौसमी, माल्टा, संतरा तथा जयदेवी व कागजी जैसी नींबू किस्में उगाई जाती हैं।
- आम व्यापक रूप से उगाया जाता है, इसकी लोकप्रिय किस्मों में आम्रपाली, मल्लिका, तोतापुरी व बंगनपल्ली शामिल हैं, तथा बाँसवाड़ा में इसका समर्पित उत्कृष्टता केन्द्र है और यह जिले की ODOP पहचान भी है।
🌵जोजोबा
- मैक्सिको, कैलिफोर्निया व एरिजोना के सोनोरन रेगिस्तान का मूल पौधा जोजोबा (Simmondsia chinensis) मात्र 30 सेमी वार्षिक वर्षा वाले रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी उग सकता है, और इसका उपयोग विमान ईंधन, लुब्रीकेंट, सौंदर्य प्रसाधन, मोम व आसंजक बनाने में होता है।
- काजरी, जोधपुर ने 1965 में राजस्थान का पहला जोजोबा पौधा इजरायल से लाया; खेती बढ़ाने के लिए 1996-97 में एजोर्प ने इजरायली तकनीकी सहायता से ढंड (जयपुर) व फतेहपुर (सीकर) में जोजोबा फार्म स्थापित किए।
🌴खजूर एवं देसी पान
- सर्दियों का प्रमुख मेवा खजूर मुख्यतः बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर व बाड़मेर में उगाया जाता है; सगरा-भोजका (जैसलमेर) व खारा (बीकानेर) में मॉडल खजूर फार्म हैं, चौपासनी (जोधपुर) में खजूर टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला बनी है, तथा बीकानेर संभाग को 'खजूर हब' बनाया जा रहा है।
- देसी पान पूर्वी राजस्थान में उगता है — भरतपुर के खरैरी व बागरैन, दौसा के गढ़मोरा, बूँदी के लाखेरी तथा करौली के मासलपुर-उपरैला में — जहाँ पान के खेत को स्थानीय रूप से 'बजेड़ा' या 'बरेजा' कहा जाता है।
🐉लीची, ड्रैगन फ्रूट एवं अन्य फल पहलें
- बाँसवाड़ा व कुम्भलगढ़ में लीची की खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जबकि ड्रैगन फ्रूट (पिटाया) की खेती 7 अप्रैल 2016 को बस्सी (जयपुर) के ढिंढोल फार्म में शुरू हुई — जिससे राजस्थान महाराष्ट्र, कर्नाटक व आंध्रप्रदेश के बाद इसे उगाने वाला देश का चौथा राज्य बना।
🫒जैतून
- राजस्थान जैतून को बागानी फसल के रूप में अधिसूचित करने वाला और जैतून तेल का उत्पादन करने वाला देश का पहला राज्य है — देश की पहली जैतून रिफाइनरी का उद्घाटन 3 अक्टूबर 2014 को लूणकरणसर, बीकानेर में हुआ, जिसे इजरायल की इंडोलिव लिमिटेड, राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड व प्लास्ट्रोप्लासन इंडस्ट्रीज के संयुक्त उपक्रम राजस्थान ऑलिव कल्टीवेशन लिमिटेड ने बनाया।
- बस्सी गाँव, जयपुर में देश की पहली जैतून-पत्ती चाय फैक्ट्री भी है (उत्पादन जुलाई 2017 से शुरू, ओलिटिया फूड्स द्वारा), और राजस्थान जैतून शहद (ऑलिव हनी) का उत्पादन करने वाला भी देश का पहला राज्य बनेगा।
🌹जिलों के उपनाम, पुष्प एवं टसर रेशम
- झालावाड़ को इसकी प्रधान संतरा फसल के कारण 'राजस्थान का नागपुर' कहा जाता है, तथा खमनौर (राजसमंद) व नाथद्वारा चैत्र माह में सबसे अधिक खिलने के कारण नामित प्रतिष्ठित चैती (दमश्क) गुलाब के लिए जाने जाते हैं।
- राजस्थान बाँसवाड़ा, कोटा व उदयपुर को कृत्रिम रेशम (टसर) के केंद्रों के रूप में विकसित कर रहा है।
🍯शहद उत्पादन
- भारत के कुल शहद उत्पादन में राजस्थान की लगभग 9% हिस्सेदारी है और यह देश के पाँच अग्रणी शहद उत्पादक राज्यों में शामिल है, अलवर, भरतपुर व हनुमानगढ़ अग्रणी जिले हैं; श्रीगंगानगर में शहद परीक्षण प्रयोगशाला तथा देवली (उनियारा, टोंक) में मधुमक्खी पालन उत्कृष्टता केन्द्र प्रस्तावित हैं।
- पराग की कमी व अधिक तापमान के कारण मधुमक्खी कॉलोनियाँ स्थानांतरित करने की जरूरत पड़ने पर राज्य के 1000 मधुमक्खी पालकों को प्रति पालक 9000 रु. सहायता दी जाती है; प्रधानमंत्री का राष्ट्रीय 'हनी मिशन' व्यापक 'मीठी क्रांति' का हिस्सा है।
🌶️बीजीय मसाले एवं निर्यात जोन
- राज्य के बीजीय मसालों में जीरा, सौंफ (शरद ऋतु में बोई जाने वाली), मेथी, धनिया व लहसुन (रबी की फसल) शामिल हैं; जीरे के लिए नागौर, जालौर, बाड़मेर, पाली व जोधपुर तथा धनिये के लिए कोटा, बूँदी, चित्तौड़गढ़, झालावाड़ व बाराँ में कृषि निर्यात जोन बने हैं, जबकि झालावाड़ को स्वयं 'हॉर्टिकल्चर हब' के रूप में विकसित किया जा रहा है।
🌿मेहँदी
- व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली बहुवर्षीय झाड़ी मेहँदी का केंद्र पाली जिले का सोजत व मारवाड़ जंक्शन है — जिससे सोजत को 'मेहँदी नगर' नाम मिला — जबकि राजसमंद के गिलूंड कस्बे की मेहँदी अपने गहरे सुर्ख रंग के लिए प्रसिद्ध है।
🌾चारा फसलें
- हरा चारा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में सहायक है और इसे 'हे' या साइलेज के रूप में संरक्षित किया जा सकता है; बहुवर्षीय फलीदार रबी चारा फसल रिजका एक बार बोने पर लगभग 3 वर्ष तक उपज देती है, जबकि जई रबी की एक प्रमुख चारा फसल है।
- सेवण घास को 'घासों का राजा' तथा बरसीम को 'चारे की फसलों का राजा' कहा जाता है।
🌿औषधीय पौधे
- अश्वगंधा के एल्केलॉइड्स (विथेनिन, सोमेनीफेरोन) यूनानी-आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयुक्त होते हैं, जबकि सफेद मूसली की कंदिल जड़ों से शक्तिवर्धक टॉनिक बनते हैं; अत्यधिक जल-अवशोषण क्षमता वाले ईसबगोल उत्पादन में राजस्थान का दबदबा है — बीकानेर, जालौर, बाड़मेर, नागौर व जैसलमेर अग्रणी हैं, और अकेले राज्य विश्व के 40% से अधिक उत्पादन देता है, जहाँ इसे स्थानीय भाषा में 'घोड़ा जीरा' कहा जाता है।
- रतनजोत के बीजों में कैंसर-प्रतिरोधक तत्व मिलते हैं और इनसे पशु-आहार, कीटनाशक के अलावा बायोडीजल भी बनता है — जैव ईंधन प्राधिकरण के अनुसार बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ व उदयपुर सहित 12 जिले इसके लिए उपयुक्त हैं, तथा अलवर व भरतपुर सहित 8 जिले करंज के लिए चिह्नित हैं; तुलसी, नीम, ग्वारपाठा व सोनामुखी भी राज्य के उल्लेखनीय औषधीय पौधे हैं।
कृषि विज्ञान, अनुसंधान संस्थाएँ एवं कृषि इतिहास
प्राचीन स्थानान्तरी कृषि से लेकर भारत रत्न वैज्ञानिकों और विविध नामी 'क्रांतियों' तक — वे संस्थाएँ व विचार जो राजस्थान के खेतों को आकार देते हैं।
🚜कृषि के प्रकार
- मिश्रित कृषि में खेती व पशुपालन साथ किए जाते हैं, जबकि शुष्क/बारानी कृषि में अभावग्रस्त वर्षा जल को सहेजकर कम पानी चाहने वाली, जल्दी पकने वाली फसलें उगाई जाती हैं; निर्वाह कृषि, जो घनी आबादी वाले मानसूनी एशिया में आम है, गहन व आदिम/स्थानान्तरी दो रूपों में मिलती है — राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में इसे 'वालरा' या 'चिमाता कृषि' कहा जाता है, यह कृषि की प्राचीनतम विधि है, जिसे 'कर्तन-दहन' या 'झूमिंग' कृषि भी कहते हैं।
- वाणिज्यिक कृषि में मशीनों व उन्नत बीजों की मदद से पूर्णतः बाजार हेतु उत्पादन होता है; रोपण (बागाती) कृषि बड़े बागानों में चाय, कॉफी या रबर जैसी एक ही फसल का वृहद उत्पादन करती है; तथा समोच्च व पट्टीदार खेती जैसी तकनीकें पहाड़ी ढलानों पर मृदा-क्षरण रोकने के लिए बुवाई की दिशा को ढाल के आर-पार रखती हैं।
- जैविक कृषि में रासायनिक आदानों के स्थान पर जैव उर्वरक व जैव कीटनाशक इस्तेमाल होते हैं — अल्बर्ट हावर्ड को विश्व स्तर पर इसका जनक माना जाता है, और सिक्किम भारत का पूर्णतः जैविक राज्य है — जबकि जल कृषि (हाइड्रोपोनिक्स) व वायवीय कृषि (एयरोपोनिक्स) क्रमशः जल व नमीयुक्त वायु में बिना मिट्टी के पौधे उगाती हैं।
🔧कृषि की आधुनिक विधियाँ
- फर्टिगेशन में पौधों के तने-जड़ों पर पोषक तत्वयुक्त जल का छिड़काव किया जाता है, और शून्य बजट प्राकृतिक कृषि (ZBNF) अच्छी कृषि-विज्ञान पद्धतियों के जरिये रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग समाप्त कर रसायन-मुक्त उपज का लक्ष्य रखती है।
- संविदा खेती में कंपनी बुवाई से पहले ही किसान की पूरी उपज को पूर्व-निर्धारित मूल्य पर खरीदने का करार कर लेती है — इससे किसान गिरते दाम से बचता है, पर बाद में दाम बढ़ने का लाभ नहीं मिलता, क्योंकि कौन-सी फसल उगानी है यह कंपनी तय करती है, किसान नहीं।
🔬कृषि अनुसंधान केन्द्र
- काजरी (केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान), जोधपुर, 1959 में बना और शुष्क-अर्द्धशुष्क भूमि प्रणालियों का अध्ययन करता है, इसके क्षेत्रीय केंद्र जैसलमेर, बीकानेर, पाली व भुज में हैं; रूस की मदद से 1956 में बना सूरतगढ़ (गंगानगर) का केन्द्रीय कृषि फार्म एशिया का सबसे बड़ा कृषि फार्म है, तथा कनाडा की मदद से बना इसका सहयोगी फार्म जैतसर (अनूपगढ़, 1964) एशिया में दूसरे स्थान पर है।
- बीछवाल, बीकानेर स्थित केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान की जड़ें 1993 में हिसार से हुए स्थानांतरण में हैं, इसे 2000 में पूर्ण संस्थान का दर्जा मिला; भरतपुर के सेवर स्थित सरसों अनुसंधान निदेशालय (ICAR, 1993) का नाम 2009 में राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र से बदला गया; बीकानेर में बेर अनुसंधान केन्द्र व खजूर अनुसंधान केन्द्र दोनों 1978 के हैं।
- राज्य के फसल-विशिष्ट अनुसंधान केंद्रों में शामिल हैं — बाजरा हेतु बाड़मेर, मक्का हेतु बाँसवाड़ा, ज्वार हेतु वल्लभनगर (उदयपुर), सरसों-राई हेतु सेवर (भरतपुर) तथा खजूर हेतु बीछवाल (बीकानेर)।
🎓कृषि विश्वविद्यालय
- स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर की जड़ें 1962 में उदयपुर में हैं, यह राज्य का — व देश का दूसरा — कृषि विश्वविद्यालय था; 1987 में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से अलग होकर 2009 में इसे वर्तमान नाम मिला। उदयपुर स्थित महाराणा प्रताप कृषि व तकनीकी विश्वविद्यालय राज्य का दूसरा समर्पित कृषि विश्वविद्यालय बना, स्थापना 1 नवम्बर 1999।
- 14 सितम्बर 2013 को तीन और कृषि विश्वविद्यालय बने — जोबनेर/जयपुर (श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जिसका SKN महाविद्यालय, स्थापना जुलाई 1947, राज्य का पहला कृषि महाविद्यालय है), मंडोर (जोधपुर) व बोरखेड़ा (कोटा) — प्रत्येक अलग-अलग जिलों के समूह का क्षेत्राधिकार रखता है।
🏢राज्य स्तरीय कृषि संस्थाएँ
- राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड (6 जून 1974) मंडियाँ व ग्रामीण सम्पर्क सड़कें बनाता है और राज्य की कृषि निर्यात नीति लागू करता है; राजस्थान राज्य भंडारण निगम (30 दिसम्बर 1957) गोदाम बनाता-संभालता है; तथा राज्य सहकारी क्रय विक्रय संघ RAJFED (26 नवम्बर 1957) प्राथमिक सहकारी समितियों के जरिये किसानों को आदान व उपज विपणन सुविधा देता है।
- राजस्थान स्टेट सीड्स कार्पोरेशन (28 मार्च 1978) व राज्य बीज एवं जैविक उत्पादन प्रमाणीकरण संस्था (1977) बीज उत्पादन-प्रमाणीकरण संभालते हैं, जबकि जयपुर स्थित चौधरी चरणसिंह राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान (NIAM, 8 अगस्त 1988) कृषि विपणन में प्रशिक्षण देता है, और जिला स्तरीय कृषि प्रौद्योगिकी प्रबन्ध अभिकरण (ATMA, 2005-06 से) 60:40 केंद्र-राज्य अनुपात में विस्तार सेवाओं का विकेंद्रीकरण करता है।
🏛️राष्ट्रीय स्तर की कृषि संस्थाएँ
- ICAR (16 जुलाई 1929) देशभर में कृषि विज्ञान-तकनीक को गति देता है; नाबार्ड, मुम्बई (12 जुलाई 1982, शिवरमन कमेटी की सिफारिश पर) कृषि व ग्रामीण विकास हेतु पुनर्वित्त देने वाली सर्वोच्च संस्था है; तथा कृषि लागत व मूल्य आयोग, जो 1965 में 'कृषि मूल्य आयोग' के रूप में शुरू हुआ (1985 में CACP नाम, पहले अध्यक्ष एम.एल. दांतेवाला), MSP स्तर की सिफारिश करता है।
- भारतीय खाद्य निगम (1964, कार्य 1966 से), नाफेड (2 अक्टूबर 1958) व राष्ट्रीय बीज निगम (मार्च 1963) क्रमशः उचित मूल्य, सहकारी विपणन व गुणवत्तायुक्त बीज आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं, जबकि उर्वरक सहकारी संस्थाएँ इफको (3 नवम्बर 1967) व कृभको (17 अप्रैल 1980) गुजरात, उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र में संयंत्र चलाती हैं।
📖कृषि शब्दावली एवं राज्य बीज फार्म
- विशिष्ट '-कल्चर' शब्दावली में शामिल हैं — एपीकल्चर (मधुमक्खीपालन), पिसीकल्चर (मत्स्यपालन), सेरीकल्चर (रेशमकीटपालन), मोरीकल्चर (शहतूत कृषि), वर्मीकल्चर (केंचुआपालन), फ्लोरीकल्चर (पुष्प), विटीकल्चर (अंगूर), सिल्वीकल्चर (वन प्रबंधन) व टिश्यूकल्चर (कोशिकाओं से नया टिश्यू विकसित करना)।
- राज्य बीज निगम के बीज फार्म जैतसर व पदमपुर (श्रीगंगानगर), कवई (बाराँ), कल्याणपुरा (भीलवाड़ा), सांथून (जालौर), फरासिया (टोंक) व बरोर (श्रीगंगानगर) में हैं।
🦠पादप रोग: विषाणु, बैक्टीरिया एवं फफूँदी जनित
- विषाणु जनित रोगों में तम्बाकू का मोजेक रोग, टमाटर-आलू का पत्ती मुड़न रोग तथा गेहूँ का टुण्डु रोग शामिल हैं; बैक्टीरिया जनित रोगों में नींबू का केंकर रोग, चावल-धान का अंगमारी/झुलसा रोग तथा कपास का जीवाणु अंगमारी (ब्लैक आर्म) रोग शामिल हैं।
- फफूँदी जनित रोग सूची में सबसे अधिक हैं — कण्डुआ रोग गेहूँ, बाजरा व धान में; किट्ट रोग गेहूँ (काला स्तंभ किट्ट) व अलसी में; तुलासिता/मृदुरोमिल आसिता रोग ज्वार व बाजरे में (हरित बाली रोग के रूप में); लाल सड़न रोग गन्ने में; तथा उकठा रोग अरहर, कपास या गन्ने में भी लग सकता है।
📆महत्वपूर्ण दिवस एवं वर्ष
- विश्व खाद्य दिवस 16 अक्टूबर, विश्व उपभोक्ता दिवस 15 मार्च तथा राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस 24 दिसम्बर को मनाया जाता है; संयुक्त राष्ट्र के FAO ने वर्ष 2023 को 'अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष' घोषित किया था (₹5 डाक टिकट व ₹75 सिक्के के साथ), तथा संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2025 को 'अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष' घोषित किया है।
🌾हरित क्रांति
- 1966-67 से HYV बीजों, रासायनिक उर्वरकों व नई तकनीकों से कृषि उत्पादन में आई तेज वृद्धि को हरित क्रांति कहा गया — यह शब्द अमेरिका के विलियम गैड ने 1958 में गढ़ा था; नॉर्मन बोरलॉग (जिन्होंने 1950 के दशक में मैक्सिको में 'रॉकफेलर फोर्ड फाउंडेशन' के जरिये इसे शुरू किया और 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार जीता) इसके वैश्विक जनक हैं, जबकि भारत में यह श्रेय एम.एस. स्वामीनाथन (1925-2023) को जाता है।
- भारत में हरित क्रांति दो चरणों में आई — 1960 के दशक के मध्य से 1970 के दशक तक, फिर 1970-80 के दशक में — जिसकी नोडल एजेंसी पंत कृषि विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड थी; गैर-परम्परागत आगतों को अपनाना इसकी नींव होने से इसे 'आगत क्रांति' भी कहा जाता है। स्वामीनाथन को 28 सितम्बर 2023 को निधन के कुछ महीनों बाद 9 फरवरी 2024 को मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।
🎨अन्य नामी कृषि क्रांतियाँ
- श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड, 1970 का दशक, जनक वर्गीज कुरियन) से दुग्ध उत्पादन बढ़ा; नीली क्रांति (1990 का दशक) से मत्स्य विकास हुआ, नैल्लोर को भारत की 'झींगा राजधानी' कहा जाता है; पीली क्रांति (1986-87, सैम पित्रोदा से जुड़ी) तिलहन हेतु थी; तथा प्रोटीन क्रांति (2014, नरेन्द्र मोदी-अरुण जेटली से जुड़ी) दलहन को लक्षित करती है।
- अन्य नामी क्रांतियों में रजत क्रांति (अण्डा, नेतृत्व इंदिरा गांधी, 1969-78), गोल्डन फाइबर क्रांति (जूट), सिल्वर फाइबर क्रांति (कपास), राउंड क्रांति (आलू), सैफ्रॉन क्रांति तथा 2016 में जम्मू-कश्मीर में अरोमा मिशन के जरिये लैवेंडर खेती हेतु शुरू हुई बैंगनी (पर्पल) क्रांति शामिल हैं।
💡विविध महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत का कृषि वर्ष 1 जुलाई से 30 जून तक होता है, और संविधान के तहत कृषि राज्य-सूची का विषय है; जिप्सम क्षारीय भूमि सुधारता है और तिलहनी-दलहनी-गेहूँ फसलों को पोषण देता है, जबकि वर्मी कम्पोस्ट केंचुओं के अवशेष, मल व कोकून से बनी खाद है।
- निकोटीन (तम्बाकू पत्तियों व ज्वार के पौधे में) व कैफीन (कॉफी में) उल्लेखनीय पादप विषैले तत्व हैं, जबकि मलेरिया-रोधी 'कुनैन' सिनकोना वृक्ष की छाल से मिलता है; गंगानगर को 'राजस्थान का खाद्य टोकरा' कहा जाता है।
- विनोबा भावे द्वारा 1951 में शुरू भूदान आंदोलन में बड़े जमींदारों से दान की भूमि भूमिहीनों में बाँटी गई; मशरूम, जो तकनीकी रूप से एक कवक है और प्रोटीन-विटामिन सी से भरपूर पर शर्करा-स्टार्च रहित होता है, को 'Delight of Diabetic' कहा जाता है।