सिंचाई व पेयजल परियोजनाएँ तथा जल संरक्षण
Irrigation, Drinking-water Projects & Water Conservation
थार में हर बूँद की कहानी — भाखड़ा नाँगल से रामजल सेतु लिंक परियोजना तक की वृहद योजनाएँ, इंदिरा गांधी नहर की मरुगंगा, और टाँका-जोहड़-बावड़ी जैसी सदियों पुरानी जल-संरक्षण परंपराएँ, एक ही जगह।
जल संकट, आवंटन व राज्य की जल-योजनाएँ
राजस्थान के जल संकट की जड़ों से लेकर पड़ोसी राज्यों से जल-हिस्सेदारी, भूजल की चिंताजनक स्थिति और जल जीवन मिशन जैसे बड़े मिशनों तक — राज्य की जल-नीति की पूरी तस्वीर।
🏜️जल संकट व सिंचाई की पृष्ठभूमि
- राजस्थान की सबसे बड़ी भौगोलिक चुनौती पर्याप्त पेयजल व सिंचाई जल की कमी है, जिसकी जड़ में कम वर्षा, सीमित सतही जल और बार-बार पड़ने वाला सूखा है, इसलिए यहाँ की खेती आज भी मुख्यतः मानसून पर निर्भर करती है।
- राज्य के पास देश की 12.84% कृषि योग्य भूमि (281.71 लाख हैक्टेयर) है, फिर भी देश के कुल सतही जल में उसका हिस्सा मात्र 1.16% है; कुल उपलब्ध सतही जल 25.38 BCM है, जिसमें से आर्थिक रूप से उपयोग-योग्य भाग केवल 16.05 BCM (158.60 लाख एकड़ फीट) है।
- आजादी से पहले राज्य की एकमात्र वृहद सिंचाई परियोजना गंग नहर प्रणाली थी, जो 1927 में पूरी हुई थी; 1951 तक राज्य में केवल 43 वृहद-मध्यम व 2272 लघु परियोजनाएँ थीं, जिनसे मुश्किल से 4 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचित हो पाती थी।
🤝पड़ोसी राज्यों से जल-आवंटन
- 1955 के अंतरराज्यीय समझौते में पंजाब ने रावी-व्यास जल में से राजस्थान को 8.6 MAF पानी देना स्वीकार किया; यह जल मुख्यतः इंदिरा गांधी नहर (7.59 MAF), गंगनहर (0.33 MAF), भाखड़ा नहर (0.21 MAF), नोहर नहर (0.13 MAF) व सिद्धमुख नहर (0.34 MAF) के माध्यम से उपयोग होता है।
- वर्तमान में पड़ोसी राज्यों से राजस्थान को रावी-व्यास, सतलज, चम्बल, माही, नर्मदा व यमुना नदियों से मिलाकर कुल 145 लाख एकड़ फीट (17.88 BCM) सतही जल आवंटित है।
- चिनाब नदी का अतिरिक्त जल रावी-व्यास-सतलज प्रणाली के जरिए राजस्थान लाने के लिए चंद्रा नदी पर 18.7 किमी लंबी चिनाब-व्यास लिंक सुरंग की निविदा जारी हो चुकी है; यह जल भाखड़ा नहर व IGNP के जरिए 2029 तक राजस्थान पहुँचेगा।
- चम्बल बेसिन के अतिरिक्त जल के उपयोग के लिए जून 1999 में मध्यप्रदेश के साथ एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था; दिसम्बर 2025 तक राज्य में (IGNP सहित) कुल 40.19 लाख हैक्टेयर में सिंचाई क्षमता सृजित हो चुकी है।
🕳️भूजल की स्थिति व नए कानून
- भूजल दोहन व पुनर्भरण के अनुपात के आधार पर ब्लॉकों को सुरक्षित, अर्द्ध-क्रिटिकल, क्रिटिकल व अतिदोहित श्रेणियों में बाँटा जाता है; 2025 में राज्य के कुल 302 ब्लॉकों में से 213 (सर्वाधिक) अतिदोहित श्रेणी में हैं, जबकि केवल 36 सुरक्षित श्रेणी में हैं।
- देश के औसत की तुलना में राजस्थान में भूजल दोहन की दर लगभग 147% है; चित्तौड़गढ़ जिला सर्वाधिक दोहन के साथ राज्य के डार्क जोन में शुमार है।
- भूजल स्तर बनाए रखने, बढ़ाने व संरक्षण-प्रबंधन के लिए राज्य प्राधिकरण गठित करने हेतु राजस्थान भू-जल (संरक्षण एवं प्रबंधन) प्राधिकरण विधेयक, 2024, 10 सितम्बर 2025 को विधानसभा में ध्वनिमत से पारित हुआ।
- नदियों को आपस में जोड़ने के लिए राजस्थान नदी बेसिन व जल संसाधन योजना विधेयक, 2015 को 8 अप्रैल 2015 को पारित किया गया, और ऐसा कानून बनाने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बना; इसके बाद 11 मई 2015 को राज्य सरकार ने राजस्थान नदी बेसिन और जल संसाधन आयोजना प्राधिकरण का गठन किया।
🚰सिंचाई के स्रोत व सिंचित क्षेत्र
- राज्य में सिंचाई के प्रमुख साधन कुएँ, नलकूप, नहरें व तालाब हैं; कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 66-70% भाग कुओं-नलकूपों से, 27-29% नहरों से और शेष तालाबों व अन्य साधनों से सिंचित होता है।
- राज्य का सकल सिंचित क्षेत्र 2023-24 के 129.6 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 2024-25 में 134.63 लाख हैक्टेयर हो गया; नहरों में सर्वाधिक सिंचाई क्रमशः IGNP, भाखड़ा नहर, गंगनहर व चम्बल नहर से होती है।
- नहरी सिंचाई में गंगानगर जिला सबसे आगे है, जबकि IGNP से बीकानेर में सर्वाधिक क्षेत्रफल व जैसलमेर में सर्वाधिक प्रतिशत सिंचित होता है; नलकूपों से सर्वाधिक सिंचाई जोधपुर में होती है।
🚿जल जीवन मिशन - ग्रामीण व शहरी
- 15 अगस्त 2019 को घोषित जल जीवन मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार को घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) से प्रतिदिन 55 लीटर पेयजल देना है; आदर्श वाक्य 'कोई छूटे नहीं' है और यह केंद्र-राज्य की 50:50 भागीदारी वाली योजना है।
- राज्य में दिसम्बर 2025 तक 62.40 लाख कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन दिए जा चुके हैं; भीलवाड़ा का मांडल ब्लॉक राज्य का पहला 100% नल-कनेक्शन वाला ब्लॉक बना, और ग्राम जल स्वच्छता समितियों के गठन में राजस्थान देश में पहले स्थान पर है।
- गोवा 'हर घर जल' वाला देश का पहला राज्य (9 अक्टूबर 2020) और तेलंगाना दूसरा राज्य बना; जल जीवन मिशन (शहरी) की घोषणा केंद्रीय बजट 2021-22 में हुई और इसका लक्ष्य SDG-6 के तहत 4378 वैधानिक शहरों में नल जल आपूर्ति करना है, जिसकी कुल प्रस्तावित लागत 2,87,000 करोड़ रुपये है।
🌧️मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान, बजट घोषणाएँ व जन-अभियान
- मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (MJSA) 2.0 के तहत बजट 2024-25 में लगभग 11,200 करोड़ रुपये से 4 वर्षों में 20,000 गाँवों में 5 लाख जल संग्रहण संरचनाएँ बनाने का लक्ष्य रखा गया; बजट 2025-26 में ERCP कॉर्पोरेशन को राजस्थान वाटर ग्रिड कॉर्पोरेशन में बदलने का प्रावधान किया गया।
- बजट 2026-27 में सीकर, झुंझुनूं, चूरू जैसे जिलों की 30 वर्षों से लंबित पेयजल माँग पूरी करने हेतु हथिनीकुंड बैराज से यमुना जल शेखावाटी लाने पर 32,000 करोड़ रुपये की परियोजना और जयपुर में जल-प्रबंधन उत्कृष्टता केंद्र की घोषणा हुई; सूक्ष्म सिंचाई क्षेत्र को भी 2030 तक 24% से बढ़ाकर 51% करने का लक्ष्य है।
- जल संचय जन भागीदारी अभियान (6 मार्च 2026 से) 'कैच द रेन' पहल के तहत छत वर्षा जल संचयन व रिचार्ज पिट जैसे कम लागत कार्यों पर केंद्रित है; इसके प्रथम चरण में राजस्थान देश में तीसरे स्थान पर रहा तथा बाड़मेर व भीलवाड़ा को केंद्र सरकार ने सम्मानित किया।
- राजीव गांधी जल संचय योजना का प्रथम चरण 20 अगस्त 2019 और द्वितीय चरण विश्व जल दिवस (22 मार्च 2023) को शुरू हुआ, जिसमें सभी जिलों की 349 पंचायत समितियों के 4600 गाँवों में जल संरक्षण कार्य हुए; वहीं 12 अगस्त 2025 को जयपुर के जमवारामगढ़ बाँध क्षेत्र में भारत की पहली ड्रोन-आधारित क्लाउड सीडिंग का पायलट परीक्षण शुरू किया गया।
वृहद व अंतरराज्यीय बहुउद्देशीय परियोजनाएँ
भाखड़ा नाँगल से नर्मदा नहर तक — पड़ोसी राज्यों संग साझी वे वृहद बाँध व नहर परियोजनाएँ जिन्होंने राजस्थान की सिंचाई-पेयजल तस्वीर बदल दी।
🏔️भाखड़ा नाँगल परियोजना
- पंजाब, हरियाणा व राजस्थान की साझा भाखड़ा नाँगल परियोजना की कल्पना 1908 में सर लुईस डेन ने की थी; निर्माण मार्च 1948 में शुरू हुआ और सतलज नदी पर हिमाचल के बिलासपुर में भाखड़ा तथा पंजाब के रोपड़ में नाँगल बाँध बनाए गए।
- 225.55 मीटर ऊँचा भाखड़ा बाँध विश्व के सबसे ऊँचे सीधे खड़े (स्ट्रेट ग्रेविटी) बाँधों में से एक है; इसके पीछे बना विशाल जलाशय गोविन्द सागर तीन राज्यों की पेयजल-सिंचाई तथा दिल्ली-चंडीगढ़ की पेयजल जरूरतें पूरी करता है।
- नेहरू ने 22 अक्टूबर 1963 को इसे राष्ट्र को समर्पित करते हुए 'पुनरुत्थित भारत का नवीन मंदिर' कहा था; परियोजना की कुल विद्युत क्षमता 1570.3 मेगावाट है, जिसमें से राजस्थान को 15.22% (239 मेगावाट) मिलती है।
- भाखड़ा नहर से राज्य में लगभग 2.3 लाख हैक्टेयर क्षेत्र सिंचित होता है, जिसमें हनुमानगढ़ जिले को सर्वाधिक लाभ मिलता है; भाखड़ा नहर प्रणाली 1954 में पूरी हुई थी और राजस्थान को उसी वर्ष से पानी मिलना शुरू हुआ।
⛰️व्यास परियोजना
- पंजाब, राजस्थान व हरियाणा की साझा व्यास परियोजना में हिमाचल के मंडी में पंडोह बाँध और काँगड़ा में पोंग बाँध बनाए गए हैं; पोंग बाँध का मुख्य उद्देश्य शीत ऋतु में भी IGNP को जल आपूर्ति बनाए रखना है।
- राजस्थान को पोंग विद्युत गृह से 59% व देहर विद्युत गृह से 20%, यानी कुल 429.66 मेगावाट विद्युत मिलती है; व्यास-सतलज लिंक परियोजना (BSLP) पंडोह बाँध से निकलकर व्यास का अतिरिक्त जल सतलज में मिलाती है।
- रावी-व्यास जल-विवाद के समाधान हेतु 1986 में गठित इराडी कमीशन ने राजस्थान के लिए 86 लाख एकड़ फीट पानी की अतिरिक्त हिस्सेदारी तय की थी।
🌉चम्बल परियोजना व लिफ्ट योजनाएँ
- 1953-54 में शुरू राजस्थान-मध्यप्रदेश की 50:50 साझी चम्बल परियोजना की कुल विद्युत क्षमता 386 मेगावाट है (राजस्थान को 193 मेगावाट); इससे दोनों राज्यों में मिलाकर लगभग 4.5 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचित होती है।
- परियोजना की चार प्रमुख इकाइयाँ हैं - गांधी सागर बाँध (मंदसौर, 1959), कोटा बैराज (1960, नेहरू द्वारा समर्पित), राणा प्रताप सागर बाँध (रावतभाटा, 1970, भराव क्षमता में राज्य का सबसे बड़ा बाँध) और जवाहर सागर बाँध (1972, मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में स्थित)।
- कोटा बैराज से निकलने वाली दायीं व बायीं मुख्य नहरों से कोटा, बूँदी व बाराँ जिलों में सिंचाई होती है; प्रवाह-क्षेत्र से बाहर रह गए इलाकों को सींचने के लिए दायीं मुख्य नहर पर आठ लिफ्ट योजनाएँ (जालीपुरा, दीगोद, अंता आदि) बनाई गई हैं।
🐟माही परियोजनाएँ
- जनजाति क्षेत्र की जीवन रेखा कही जाने वाली माही बजाज सागर परियोजना राजस्थान-गुजरात की साझी योजना है; बाँसवाड़ा के बोरखेड़ा में माही बजाज सागर बाँध और गुजरात में कड़ाना बाँध 1983 में बने और 1 नवम्बर 1983 को राष्ट्र को समर्पित हुए।
- इसकी लागत राजस्थान-गुजरात 45:55 अनुपात में वहन करते हैं; 140 मेगावाट विद्युत पूरी तरह राजस्थान को मिलती है और लगभग 80,000 हैक्टेयर सिंचित होता है; नामकरण स्वतंत्रता सेनानी जमनालाल बजाज के नाम पर हुआ।
- 12 मई 2023 से शुरू माही अपर हाई लेवल कैनाल परियोजना माही की बायीं मुख्य नहर से जल लिफ्ट कर बाँसवाड़ा की छह तहसीलों के 338 गाँवों की 42,000 हैक्टेयर भूमि को फव्वारा पद्धति से सींचेगी; कार्य 24 अक्टूबर 2027 तक पूरा होना है।
🚩गंगनहर परियोजना
- पंजाब के हुसैनीवाला में सतलज नदी से निकाली गई 129 किमी लंबी गंगनहर राज्य की पहली नहर सिंचाई परियोजना है; इसका निर्माण बीकानेर महाराजा गंगासिंहजी ने करवाया और 26 अक्टूबर 1927 को वॉयसराय लॉर्ड इरविन ने शिवपुर हैडवर्क्स पर इसका उद्घाटन किया।
- 3.08 लाख हैक्टेयर सिंचाई क्षमता वाली गंगनहर को रावी-व्यास जल में से 1.44 MAF पानी आवंटित है; इसका सिंचाई क्षेत्र गंगानगर जिला है और लालगढ़, लक्ष्मीनारायण, करणी व समीजा इसकी प्रमुख शाखाएँ हैं।
- 5 दिसम्बर 2025 को श्रीगंगानगर में गंगनहर शताब्दी समारोह मनाया गया — ठीक 100 वर्ष पहले 5 दिसम्बर 1925 को महाराजा गंगासिंहजी ने इसका शिलान्यास किया था।
🏗️सरदार सरोवर व नर्मदा नहर परियोजना
- गुजरात के केवडिया में नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बाँध राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की साझी परियोजना है; इसकी नींव नेहरूजी ने 5 अप्रैल 1961 को रखी थी और लोकार्पण 17 सितंबर 2017 को हुआ। 163 मीटर ऊँचा यह भारत का तीसरा सबसे ऊँचा कंक्रीट बाँध है।
- 1979 में नर्मदा जल विकास प्राधिकरण ने नर्मदा जल में राजस्थान का हिस्सा 0.50 मिलियन एकड़ फीट तय किया; इसके उपयोग हेतु बनी नर्मदा नहर मार्च 2008 में सांचौर (जालौर) से राज्य में प्रवेश करती है और जालौर-बाड़मेर के 2.46 लाख हैक्टेयर क्षेत्र को सींचती है।
- यह राज्य की पहली परियोजना है जिसमें सिंचाई केवल फव्वारा (स्प्रिंकलर) पद्धति से होती है; नर्मदा मुख्य नहर विश्व की सबसे बड़ी 'लाइन्ड इरिगेशन कैनाल' है।
🏞️बीसलपुर व ईसरदा बाँध
- अजमेर की जीवन रेखा कही जाने वाली बीसलपुर परियोजना 1988-89 में शुरू हुई थी; टोंक के टोडारायसिंह के पास बनास नदी पर बना यह बाँध जयपुर, अजमेर, केकड़ी, ब्यावर व किशनगढ़ को पेयजल तथा टोंक के 81,800 हैक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई देता है।
- बीसलपुर के डाउनस्ट्रीम में टोंक के उनियारा में बनास नदी पर बन रहा ईसरदा बाँध बनास के अतिरिक्त जल का उपयोग करेगा; मार्च 2026 तक इसका 98% कार्य पूरा हो चुका था और यह दौसा-सवाईमाधोपुर को पेयजल देगा। इसका उद्घाटन 25 सितम्बर 2025 को प्रधानमंत्री ने किया।
🛠️अन्य प्रमुख वृहद परियोजनाएँ
- झालावाड़-बाराँ-कोटा के लिए परवन नदी पर बन रही परवन वृहद बहुउद्देशीय परियोजना से 637 गाँवों की 2.01 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 1402 गाँवों को पेयजल मिलेगा; संशोधित लागत 7355.23 करोड़ रुपये है।
- राजीव गांधी सिद्धमुख व नोहर परियोजना का शिलान्यास राजीव गांधी ने 5 अक्टूबर 1989 को किया था और लोकार्पण सोनिया गांधी ने 12 जुलाई 2002 को किया; यह भाखड़ा नाँगल बाँध के जल से हनुमानगढ़ की नोहर-भादरा व चूरू की राजगढ़ तहसीलों को सींचती है।
- प्रतापगढ़ में जाखम नदी पर बना जाखम बाँध, 81 मीटर ऊँचाई के साथ राजस्थान का सबसे ऊँचा बाँध है; इसकी नींव 14 मई 1968 को मोहनलाल सुखाड़िया ने रखी थी।
- चम्बल नदी को स्रोत मानकर बनी धौलपुर लिफ्ट सिंचाई व पेयजल परियोजना (39,980 हैक्टेयर) तथा 12 मई 1994 के समझौते के तहत बनी यमुना जल सिंचाई परियोजना (भरतपुर, डीग, झुंझुनूं, सीकर, चूरू) भी इसी कड़ी की उल्लेखनीय परियोजनाएँ हैं।
इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP)
पश्चिमी राजस्थान की 'मरुगंगा' — थार के रेगिस्तान को सींचने वाली देश की सबसे लंबी नहर परियोजना की पूरी कहानी, इसकी शाखाओं से लेकर लाभ व चुनौतियों तक।
💡पृष्ठभूमि व नामकरण
- 'मरुगंगा' कही जाने वाली इस परियोजना की परिकल्पना बीकानेर के शासक सादुलसिंह ने की और मुख्य सिंचाई अभियंता कँवरसेन के निर्देशन में योजना बनी; 1957 में योजना आयोग ने इसे मंजूरी दी और 31 मार्च 1958 को गोविंदवल्लभ पंत ने आधारशिला रखी।
- 19 दिसंबर 1958 को राजस्थान नहर बोर्ड बना जिसके पहले अध्यक्ष कँवरसेन थे; सिंचाई 1961 में शुरू हुई और उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 11 अक्टूबर 1961 को नौरंगदेसर वितरिका से पहली बार पानी छोड़ा।
- 2 नवंबर 1984 को 'राजस्थान नहर परियोजना' का नाम बदलकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में 'इंदिरा गांधी नहर परियोजना' रखा गया; इसका उद्देश्य रावी-व्यास के 7.59 MAF जल से मरुस्थलीय क्षेत्र को सिंचाई-पेयजल देना व मरुस्थलीकरण रोकना है।
🗺️चरण, मार्ग व लंबाई
- परियोजना दो चरणों में बँटी है - प्रथम चरण में हरिके बैराज से पूगल (बीकानेर) तक 383 किमी लंबी मुख्य नहर, और द्वितीय चरण में पूगल से मोहनगढ़ (जैसलमेर) तक अतिरिक्त 256 किमी; कुल लंबाई 649 किमी (204 किमी फीडर + 445 किमी मुख्य नहर) है, जिससे जुड़ी वितरण प्रणाली 9413 किमी लंबी है।
- नहर का उद्गम पंजाब के फिरोजपुर के पास सतलज-व्यास संगम पर स्थित हरिके बैराज से है; राजस्थान में यह हनुमानगढ़ की टिब्बी तहसील के खरखेड़ा गाँव से प्रवेश करती है।
- शुरुआत में कुल सिंचित क्षेत्र 19.83 लाख हैक्टेयर तय था, पर जल की कमी के कारण इसे घटाकर 16.17 लाख हैक्टेयर (बाद में चौधरी कुंभाराम लिफ्ट नहर सहित 16.27 लाख हैक्टेयर) कर दिया गया।
🔀शाखाएँ, लिफ्ट नहरें व लाभान्वित जिले
- IGNP से नौ मुख्य शाखाएँ निकाली गई हैं, जिनमें हनुमानगढ़ की रावतसर शाखा नहर के बायीं ओर की एकमात्र शाखा है, शेष सभी दायीं ओर हैं; मुख्य नहर का अंतिम छोर मोहनगढ़ (जैसलमेर) 'जीरो पॉइंट' कहलाता है।
- सिंचाई व पेयजल दोनों के लिए हनुमानगढ़, गंगानगर, फलौदी, चूरू, बीकानेर व जैसलमेर लाभान्वित होते हैं, जबकि बाड़मेर, बालोतरा, डीडवाना-कुचामन, सीकर, नागौर, झुंझुनूं व जोधपुर को केवल पेयजल मिलता है।
- IGNP की सात लिफ्ट नहरों में सबसे लंबी (151.64 किमी) व सबसे पहले बनी कँवरसेन लिफ्ट नहर (बीकानेर-लूणकरणसर) है, जिसका काम 1968 में मोहनलाल सुखाड़िया ने शुरू करवाया था; अन्य प्रमुख लिफ्ट नहरों में राजीव गांधी लिफ्ट नहर (जोधपुर) व जयनारायण व्यास लिफ्ट नहर (पोकरण) शामिल हैं।
🌱इंदिरा गांधी नहर के लाभ
- मरुक्षेत्र में सिंचाई व पेयजल सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ भूमिगत जल स्तर ऊपर उठा है, रोजगार बढ़ा है, पर्यटन-उद्योग व मत्स्य पालन को बढ़ावा मिला है और अकाल-सूखे के दुष्प्रभाव घटे हैं।
- सूरतगढ़, रामगढ़, गिराल, गुढ़ा, बरसिंगसर व राजवेस्ट जैसी बिजली-औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ भारतीय सेना व सीमा सुरक्षा बल को भी नहर से जल मिलता है; IGNP क्षेत्र में विश्व में पहली बार 'वन सेना' का गठन हुआ।
⚠️समस्याएँ व समाधान
- नहरी पानी के रिसाव व अत्यधिक सिंचाई से भूजल स्तर ऊपर आने पर जमीन दलदली होने लगती है, जिसे 'सेम' (जलभराव) कहा जाता है; इससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और लवणीयता-क्षारीयता बढ़ने से जमीन बंजर हो सकती है, साथ ही टिड्डी दलों का प्रकोप भी बढ़ा है।
- समाधान के तौर पर गहरी जल निकासी नहरें (डीप ड्रेनेज कैनाल), नहरों की मरम्मत-लाइनिंग, ड्रिप व फव्वारा जैसी आधुनिक सिंचाई पद्धतियाँ, वृक्षारोपण तथा जिप्सम-चूने के प्रयोग जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं।
रामजल सेतु लिंक परियोजना (ERCP) व नदी जोड़ो पहलें
राजस्थान की सबसे बड़ी नदी जोड़ो महत्वाकांक्षा — पार्वती-कालीसिंध-चम्बल का पानी पूर्वी राजस्थान तक पहुँचाने वाली परियोजना और उससे जुड़ी नई पहलें।
🏢पृष्ठभूमि व निगम गठन
- रामजल सेतु लिंक परियोजना (संशोधित पीकेसी एकीकृत ईआरसीपी) एक अंतरराज्यीय नदी जोड़ो परियोजना है, जिसे केंद्र सरकार ने 5 प्राथमिकता वाली लिंक परियोजनाओं में शामिल कर राष्ट्रीय महत्व का दर्जा दिया है; यह पचपदरा रिफाइनरी के बाद राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी परियोजना है।
- 17 जून 2022 के आदेश से 'पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना निगम लिमिटेड' (ERCPCL) गठित किया गया, जिसका पंजीयन 2 अगस्त 2022 को हुआ; यह 100% राज्य सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी है, जिसे अब राजस्थान वाटर ग्रिड कॉर्पोरेशन के रूप में स्थापित किया जा रहा है।
- 13 दिसंबर 2022 को पार्वती-कालीसिंध-चम्बल (PKC) लिंक परियोजना को पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना के साथ एकीकृत कर 'संशोधित PKC लिंक परियोजना' नाम दिया गया; DPR तैयार करने हेतु 28 जनवरी 2024 को केंद्र, राजस्थान व मध्यप्रदेश के बीच MOU हुआ।
🏺संकल्प कलश कार्यक्रम व नामकरण
- 17 दिसंबर 2024 को प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में जयपुर में आयोजित 'रामजल सेतु संकल्प कलश कार्यक्रम' में राजस्थान, मध्यप्रदेश व भारत सरकार के बीच MOA का आदान-प्रदान हुआ, जिसमें पार्वती, कालीसिंध व चम्बल नदियों का जल कलश में प्रवाहित किया गया; 'राम' नाम राजस्थान के 'रा' व मध्यप्रदेश के 'म' से बना है।
- 22 जनवरी 2025 को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ के अवसर पर मुख्यमंत्री ने संशोधित पीकेसी लिंक परियोजना का नाम बदलकर 'रामजल सेतु लिंक परियोजना' रखने की घोषणा की।
🚧बैराज, बाँध व जिलेवार जलाशय योजनाएँ
- परियोजना में कुन्नू, रामगढ़, महलपुर, नवनेरा, मेज व नीमोद-राठौड़ बैराज तथा डूँगरी बाँध शामिल हैं; कालीसिंध नदी पर बना नवनेरा बैराज (भराव क्षमता 226.65 मिलियन घनमीटर) प्रधानमंत्री द्वारा 17 दिसंबर 2024 को लोकार्पित किया गया।
- कालीसिंध का जल नवनेरा बैराज से बीसलपुर व ईसरदा बाँधों तक पहुँचाने के लिए 'नवनेरा-गलवा-बीसलपुर-ईसरदा (NGBI) लिंक परियोजना' (लागत 14,200 करोड़ रुपये) पर काम चल रहा है, जिसमें बूँदी के इन्द्रगढ़ पहाड़ी में लगभग 1.7 किमी लंबी सुरंग भी शामिल है।
- कोटा की दीगोद तहसील के पीपल्दा-सेमल और बूँदी के इन्द्रगढ़ तहसील के गुहाटा गाँव के बीच चम्बल नदी पर 2280 मीटर लंबा 'चम्बल एक्वाडक्ट' बनाया जा रहा है, जिसका काम मई 2025 में शुरू हुआ और जून 2028 तक पूरा होगा।
- झालावाड़, बाराँ, कोटा-बूँदी, टोंक-अजमेर-ब्यावर, सवाईमाधोपुर-करौली-धौलपुर-भरतपुर-डीग तथा जयपुर-अलवर-कोटपूतली क्षेत्रों के लिए अलग-अलग जलाशय व बैराज निर्माण की जिलेवार योजना बनाई गई है।
🎁राजस्थान व मध्यप्रदेश को लाभ
- राजस्थान के 17 जिलों (झालावाड़, बाराँ, कोटा, बूँदी, टोंक, सवाईमाधोपुर, दौसा, करौली, धौलपुर, भरतपुर, डीग, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, जयपुर, अजमेर, ब्यावर) की 32.5 मिलियन आबादी को पेयजल तथा 25 लाख किसान परिवारों की 4.03 लाख हैक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी; राज्य को कुल 4102.60 mcm जल प्राप्त होगा।
- मध्यप्रदेश के 15 जिलों (मुरैना, शिवपुरी, मंदसौर, गुना आदि) की 43 लाख आबादी व 2094 गाँवों की 6.13 लाख हैक्टेयर भूमि को भी सिंचाई-पेयजल का लाभ मिलेगा; परियोजना से बनास, मोरेल, बाणगंगा, रूपारेल, पार्वती, गंभीर व साबी जैसी नदियाँ भी पुनर्जीवित होंगी।
🌉केन-बेतवा लिंक व अन्य नदी जोड़ो पहल
- देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक परियोजना है, जिस पर प्रधानमंत्री ने 22 मार्च 2021 को ऐतिहासिक समझौता किया; उत्तरप्रदेश-मध्यप्रदेश की इस परियोजना में दाऊधन बाँध बनाकर केन नदी का पानी बेतवा नदी में पहुँचाया जाएगा।
- राज्य सरकार ने गंभीर, रूपारेल, बनास व बाणगंगा बेसिन की लुप्तप्राय भद्रावती, रूपारेल, मोरेल व पलासन नदियों को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई है; बजट 2024-25 में साबी-करौली, रूपारेल-अलवर व जोजड़ी-जोधपुर नदियों को भी पुनर्जीवित करने की योजना जोड़ी गई।
🏞️द्रव्यवती नदी परियोजना व अन्य पुनरुद्धार कार्य
- जयपुर की लगभग मृतप्राय द्रव्यवती नदी (जो 'अमानीशाह के नाले' में तब्दील हो चुकी थी) को पुनर्जीवित करने के लिए 'द्रव्यवती रिवर फ्रंट' परियोजना बनाई गई, जिसका काम टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को सौंपा गया और लोकार्पण 2 अक्टूबर 2018 को हुआ; 47.5 किमी लंबी यह नदी जैसलिया की पहाड़ियों से निकलकर गोनेर में बूढ़ नदी में मिलती है।
- सागवाड़ा (डूँगरपुर) में सोम नदी पर भभराना व वनवासा ग्राम सिंचाई परियोजनाएँ तथा प्रतापगढ़ में करमोही नदी पर ढोलिया ग्राम सिंचाई परियोजना जैसी छोटी योजनाएँ भी क्रियान्वित हो रही हैं।
जल संरक्षण कार्यक्रम, परंपरागत जल-स्रोत व कलात्मक बावड़ियाँ
सदियों पुरानी टाँका-जोहड़-खड़ीन परंपरा से लेकर आधुनिक अटल भूजल योजना तक — रेगिस्तान में हर बूँद बचाने की राजस्थानी कला व नीति।
🌾कमांड क्षेत्र विकास व वाटरशेड प्रबंधन
- विश्व बैंक व भारत सरकार की मदद से 1974-75 में शुरू कृषि सिंचित क्षेत्र विकास एवं जल प्रबंधन (CADWM) कार्यक्रम का उद्देश्य उपलब्ध सिंचाई क्षमता का पूरा उपयोग कर उत्पादकता बढ़ाना है; इसी वर्ष चम्बल क्षेत्र विकास प्राधिकरण व इंदिरा गांधी सिंचित क्षेत्र विकास प्राधिकरण भी स्थापित हुए।
- जलग्रहण विकास कार्यों में तेजी लाने के लिए 1990-91 में अलग जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग बना; हनुमंत राव समिति की सिफारिश पर 1 अप्रैल 1995 से सभी वाटरशेड कार्यक्रम एक समान दिशानिर्देशों के तहत चलाए जा रहे हैं।
- मरु विकास कार्यक्रम (DDP) 1977-78 से राज्य के 16 (पुनर्गठन-पूर्व) जिलों के 85 विकास खंडों में लागू है, जबकि सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) 1974-75 से राज्य के 11 जिलों के 32 विकास खंडों में केंद्र-राज्य की 75:25 भागीदारी से चल रहा है।
🔬अटल भूजल योजना व विशेष कार्यक्रम
- 6000 करोड़ रुपये की अटल भूजल योजना (अभय) का उद्घाटन 25 दिसंबर 2019 व वास्तविक शुभारंभ 1 अप्रैल 2020 से हुआ; इसका आधा खर्च विश्व बैंक व आधा केंद्र सरकार वहन करती है और यह सात राज्यों के 80 जिलों में लागू है, जिनमें राजस्थान की सर्वाधिक भूजल-दोहित 17 जिलों की 1132 ग्राम पंचायतें शामिल हैं।
- अगस्त 1984 में USAID के सहयोग से कोटा में सिंचाई प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्थान (IMTI) स्थापित हुआ; राजस्थान देश का सबसे अधिक फ्लोराइड-प्रभावित राज्य है और नागौर-डीडवाना क्षेत्र की फ्लोरोसिस-प्रभावित पट्टी को 'कूबड़ पट्टी' या 'बाँका पट्टी' कहा जाता है।
- जल व पर्यावरण प्रबंधन में उत्कृष्टता के लिए राजस्थान सरकार व दक्षिण ऑस्ट्रेलिया सरकार के बीच 9 अगस्त 2016 को MOU होने के बाद 'रेसवार्म' उत्कृष्टता केंद्र बना; पश्चिम बंगाल के बाद ऐसा केंद्र स्थापित करने वाला राजस्थान देश का दूसरा राज्य बना।
🏺टाँका व पालर पानी
- थार मरुस्थल में पीने का वर्षा जल जमा करने के लिए बनाई जाने वाली कुएँ जैसी गोल या चौकोर संरचना 'टाँका' कहलाती है; इसमें जमा पानी 'पालर पानी' कहलाता है और साल भर पीने के काम आता है, जबकि इसके छोटे रूप को 'कुण्डी' कहा जाता है।
- जिस आँगन (पायतन) में वर्षा जल इकट्ठा कर टाँके में बहाया जाता है, उसे 'आगोर' कहते हैं; भूजल में फ्लोराइड या लवण अधिक होने पर छत पर गिरे शुद्ध वर्षा जल का सेवन कुबड़ेपन व जोड़ों के दर्द से बचाव करता है।
- 'पालर पानी' के प्रति लोगों का खास लगाव है - इसे घरों में बने भूमिगत टैंकों में जमा किया जाता है और यह रेगिस्तानी क्षेत्रों में पेयजल का प्रमुख स्रोत है; राज्य सरकार ने अब सभी नए भवनों में वर्षा जल संचयन प्रणाली अनिवार्य कर दी है।
🌾नाड़ी, जोहड़ व खड़ीन
- नाड़ी एक तालाबनुमा गड्ढा है जिसका जलग्रहण क्षेत्र 10-100 हैक्टेयर व गहराई 3-12 मीटर तक होती है, जिसमें 2-8 महीने पानी टिका रहता है; जिस भूमि से इसमें पानी आता है उसे 'मदार' कहते हैं।
- जोहड़ (जोहड़ी/ताल) नाड़ी से बड़ा होता है और इसमें 7-8 महीने पानी टिकता है; मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह ने जोहड़ पद्धति को लोकप्रिय बनाया और पूर्वी राजस्थान (अलवर) में 'जोहड़ वाले बाबा' के नाम से प्रसिद्ध हुए।
- खड़ीन जैसलमेर में मध्यकाल में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित तकनीक है, जिसमें ढलान वाली घाटी के मुहाने पर मिट्टी का बाँध बनाकर बहते वर्षा जल के साथ आई उपजाऊ चिकनी मिट्टी को खेत में बदला जाता है; खरीफ में बाजरा-मोठ-ग्वार व रबी में चना-गेहूँ उगाया जाता है।
🕌बावड़ी व झालरा
- बावड़ियाँ चतुष्कोणीय, गोल या वर्तुल आकार की सीढ़ीदार जल संरचनाएँ हैं जिनमें कलात्मक मेहराब, स्तम्भ व झरोखे होते हैं; ये राज्य के सभी जिलों में मिलती हैं और बावड़ियों की अधिकता के कारण बूँदी को 'सिटी ऑफ स्टेप वेल्स' कहा जाता है।
- झालरा बावड़ी जैसी सीढ़ीदार आयताकार संरचना है जिसमें तीन तरफ सीढ़ियाँ होती हैं और पानी ऊँची झील-तालाब से रिसकर आता है; इसका पानी मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठान व सामूहिक स्नान में उपयोग होता है, और जोधपुर में झालरे सबसे अधिक हैं।
- 'झालरा' शब्द संस्कृत के 'झल्लरी' से बना है; इसका साहित्यिक उल्लेख सबसे पहले 'शिवकरण पंचोली की बही' में विक्रम संवत् 1730 के पंचोली केसरीसिंह के झालरे के संदर्भ में मिलता है।
⛲सर, बेरी, टोबा व अन्य पारंपरिक संरचनाएँ
- सर (सरोवर) नाड़ी से बड़े क्षेत्रफल में फैला पर कम गहरा जलस्रोत है, जो पशुधन व लोगों के पेयजल का पारंपरिक स्रोत रहा है; जैसलमेर का गडीसर व गजरूपसागर इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
- बेरी (कुई) पश्चिमी राजस्थान में तालाब या खड़ीन की आगोर भूमि में 5-6 मीटर गहरा व 2-3 फीट व्यास का गड्ढा खोदकर बनाई जाती है, जिसका उपयोग गर्मियों में सतही वर्षा जल सूखने के बाद होता है; यह जैसलमेर व बाड़मेर में सबसे अधिक पाई जाती है।
- टोबा नाड़ी जैसी पर उससे गहरी संरचना है, जबकि नेहटा नाड़ी-तालाब-जोहड़ से अतिरिक्त पानी निकालने वाली छोटी नाली है जिससे बचा पानी अगली संरचना में चला जाता है।
🏛️आधुनिक भंडारण संरचनाएँ व कलात्मक बावड़ियाँ
- सार्वजनिक जलकुण्ड/डिग्गी व फार्म तालाब जैसी आधुनिक संरचनाएँ नीची भूमि पर बनाई जाती हैं ताकि जलग्रहण क्षेत्र का पानी आसानी से जमा हो; रिसाव रोकने के लिए तालाब की सतह पर पॉलिथीन या चिकनी मिट्टी की परत बिछाई जाती है।
- आभानेरी (दौसा) की चाँद बावड़ी 8वीं सदी में प्रतिहार राजा निकुम्भ चंद ने बनवाई थी; कोटपूतली-बहरोड़ की नौ मंजिली नीमराणा की बावड़ी 18वीं सदी में राजा जनकसिंह ने अकाल राहत कार्य के रूप में बनवाई थी।
- बूँदी की रानीजी की बावड़ी (क्वीन्स स्टेप वेल) को सभी बावड़ियों में 'सिरमौर' माना जाता है, जिसे 18वीं सदी के पूर्वार्ध में रानी नाथावतजी ने बनवाया था; जयपुर के आमेर की पन्ना मीणा की बावड़ी 17वीं सदी में मिर्जा राजा जयसिंह के शासनकाल में बनी।
- बालोतरा के निकट बायतु पंचायत समिति क्षेत्र का 'बाटाडू का कुआँ' अपनी भव्य संगमरमरी बनावट के कारण 'रेगिस्तान का जलमहल' कहलाता है।