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राजस्थान GK

राजस्थान में वन व वन्य जीवन

Forests & Wildlife

मरुस्थल के कांटेदार वनों से लेकर रणथंभौर के बाघों व खेजड़ली के बलिदान तक — राजस्थान की वनस्पति, वन्यजीव संरक्षण व पर्यावरण-विरासत की पूरी यात्रा।

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वन आवरण, प्रकार व नीति

Forest Cover, Types & Policy

राजस्थान के वन कहीं एक जैसे नहीं हैं — कंटीली मरुस्थलीय झाड़ियों से लेकर मानसून-पोषित सागवान पट्टी और राज्य की एकमात्र सदाबहार पहाड़ियों तक — हर रूप वर्षा, भूभाग व वर्षों की नीतियों से गढ़ा गया है।

🌍वनों का महत्त्व व वितरण

  • वन संसाधन व पारिस्थितिकीय सुरक्षा का मानव जीवन से गहरा नाता है — ये प्राणवायु देते हैं, अनेक आवश्यकताएं पूरी करते हैं और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को भी कुछ हद तक थामते हैं, इसीलिए इन्हें 'जीवनरक्षक' कहा जाता है।
  • राजस्थान में वनों का फैलाव बेहद असमान है — अधिकांश वन व वन्यजीव संपदा दक्षिणी-दक्षिणपूर्वी भाग में सिमटी है; राज्य के कुल वन क्षेत्र का लगभग आधा भाग मात्र आठ जिलों (उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बारां, अलवर, करौली, सिरोही व बूंदी) में केंद्रित है, जबकि पश्चिमी-उत्तरपश्चिमी मरुस्थलीय पट्टी में वन बेहद विरल हैं।

📊विधिक वर्गीकरण व ISFR वन आंकड़े

  • राजस्थान वन अधिनियम 1953 के तहत राज्य के वनों को तीन विधिक श्रेणियों में बांटा गया है — आरक्षित वन (पूर्णतः सरकारी नियंत्रण, कटाई व चराई पूर्णतः वर्जित), रक्षित वन (वन विभाग की अनुमति से सीमित सूखी लकड़ी काटने व चराई की छूट — क्षेत्रफल में सबसे बड़ी श्रेणी) तथा अवर्गीकृत वन (निम्न श्रेणी के बिखरे वन, जहां चराई-कटाई पर कोई रोक नहीं — सबसे छोटी श्रेणी)।
  • ISFR 2023 के अनुसार राज्य का अभिलिखित वन क्षेत्र 32,869 वर्ग किमी (भौगोलिक क्षेत्र का 9.6%) है, जिसमें लगभग 37% आरक्षित, 56.5% रक्षित तथा 6.4% अवर्गीकृत वन शामिल है।
  • ISFR 2023 के अनुसार राज्य में वनावरण 16,548.21 वर्ग किमी (4.84%) तथा वृक्षावरण 10,841.12 वर्ग किमी (3.17%) है, जो मिलकर राज्य के 8% भाग को आच्छादित करते हैं; उदयपुर सर्वाधिक अभिलिखित वन क्षेत्र व सर्वाधिक वनावरण प्रतिशत (23.6%) वाला जिला है, जबकि चूरू दोनों में सबसे पीछे है।
  • अभिलिखित वन क्षेत्र की दृष्टि से राजस्थान का देश में 10वां स्थान है।

🌵उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन

  • उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन राज्य के उन मरुस्थलीय भागों में मिलते हैं जहां वार्षिक वर्षा 50 सेमी से भी कम रहती है — यहां खारी-दलदली निचली भूमि, कुओं व बस्तियों के आसपास कंटीली झाड़ियां, घास व बिखरे वृक्ष उगते हैं, और तापमान ऊंचा व वर्षा नगण्य रहती है।
  • इन वनों के प्रमुख वृक्ष खेजड़ी, बबूल, थूहर व केर हैं, जबकि भूमि पर सेवण, धामन, मुरात व अंजन जैसी घास फैली रहती है; कठोर परिस्थितियों से जूझने के लिए इनकी जड़ें मोटी-लंबी, तने कंटीले व मोटी छाल वाले तथा पत्तियां छोटी, चिकनी व गूदेदार होती हैं ताकि वाष्पोत्सर्जन कम हो।
  • राज्य के कुल वन क्षेत्र के मात्र 6.26% भाग में फैले ये वन जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, चूरू, सीकर, जालौर, गंगानगर व हनुमानगढ़ जैसे मरुस्थलीय जिलों में पाए जाते हैं; ऐसे शुष्क क्षेत्रों की वनस्पति को मरुद्भिद (Xerophytes) कहा जाता है।

🍂उष्ण कटिबंधीय शुष्क व मिश्रित पर्णपाती (मानसूनी) वन

  • 'मानसूनी वन' भी कहलाने वाले ये वन दक्षिणी-दक्षिणपूर्वी अरावली की मध्यम ऊंचाई वाली ढलानों पर, जहां वार्षिक वर्षा 50-100 सेमी रहती है, फैले हैं — मुख्यतः उदयपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, कोटा, बारां व झालावाड़ में, जबकि जयपुर, अजमेर व अलवर में अत्यधिक कटाई से इनका दायरा सिमट गया है।
  • आम, खैर, ढाक, धोकड़ा, गूलर, बरगद, तेंदू, सेमल व साल जैसे इनके प्रमुख वृक्ष वर्ष में एक बार, प्रायः मार्च-अप्रैल में, पत्ते गिराते हैं; कुल मिलाकर यह वन-परिवार राज्य के कुल वन क्षेत्र के 90% से अधिक भाग को आच्छादित करता है।
  • इसी परिवार के भीतर कई उल्लेखनीय उप-प्रकार आते हैं — बांसवाड़ा-प्रतापगढ़-डूंगरपुर का शुष्क सागवान वन (लगभग 6.86% क्षेत्र, देशी सागवान प्रधान), उदयपुर-अलवर की पहाड़ियों का सालर (साल) वन (गोंद का अच्छा स्रोत व भगवान विष्णु का पवित्र वृक्ष — कहा जाता है महावीर को साल वृक्ष के नीचे ही कैवल्यज्ञान मिला था), बांसवाड़ा-चित्तौड़गढ़-कोटा का बांस वन, राजसमंद-केंद्रित सुर्ख पलाश (ढाक) वन तथा कोटा-बारां पठार का खैर वन, जिसकी छाल उबालकर कथौड़ी जनजाति कत्था तैयार करती है।

🌾धोंक वन — राज्य का सबसे व्यापक वन प्रकार

  • धोंक (Anogeissus pendula) वन अरावली के पश्चिमी अर्द्धशुष्क भागों तथा सीकर, झुंझुनूं, जालौर व सवाईमाधोपुर जैसे क्षेत्रों में मिलते हैं, जहां वार्षिक वर्षा 30-60 सेमी व ऊंचाई 245-760 मीटर के बीच रहती है; धोंक के साथ यहां बबूल, खेजड़ी, रोहिड़ा, बेर व केर भी पाए जाते हैं।
  • लगभग 19,027 वर्ग किमी — यानी राज्य के कुल वन क्षेत्र का करीब 58% भाग — घेरने वाला धोंक वन राजस्थान का सबसे व्यापक वन प्रकार है।

⛰️उपोष्ण कटिबंधीय पर्वतीय वन (माउंट आबू)

  • सिरोही जिले में आबू पर्वत के आसपास ही सीमित यह वन, जहां वार्षिक वर्षा 150 सेमी या अधिक रहती है, सघन व वर्ष भर हरा-भरा रहता है — यह वानस्पतिक विविधता की दृष्टि से राज्य का सबसे संपन्न क्षेत्र है, जहां मुख्यतः सिरस, बांस, बेल, जामुन व रोहिड़ा उगते हैं, फिर भी इसका फैलाव राज्य के वन क्षेत्र का मात्र 0.39% ही है।

📜वन नीति — वर्तमान व ऐतिहासिक तथ्य

  • 5 जून 2023 को जारी राजस्थान वन नीति देश की पहली संयुक्त वन एवं पर्यावरण नीति है, जिसका लक्ष्य 2040 तक वनावरण को 20% तक बढ़ाना है; इसके अनुसार राज्य में मुख्यतः उत्तरी शुष्क पर्णपाती वन (40.07%), एनोगिसस पेंडुला वन (15.21%), शुष्क पर्णपाती स्क्रब (10.96%) तथा मरुस्थलीय ड्यून/कांटेदार स्क्रब पाए जाते हैं।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्य का वन क्षेत्र 33,020 वर्ग किमी (9.65%) है, हालांकि FSI रिपोर्ट 2023 ने वनावरण में 83.80 वर्ग किमी की कमी दर्ज की, जिससे अभिलिखित वन क्षेत्र में राजस्थान का देश में स्थान 15वां रह गया।
  • इसी सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में 3 राष्ट्रीय उद्यान, 5 टाइगर रिजर्व, 26 वन्यजीव अभयारण्य, 39 कन्जर्वेशन रिजर्व, 33 आखेट निषिद्ध क्षेत्र, 7 मृगवन तथा 4 बायोलॉजिकल पार्क (जयपुर, उदयपुर, कोटा व जोधपुर) मौजूद हैं।

🏛️वन संरक्षण व प्रशासन का इतिहास

  • रियासतकालीन राजस्थान में वन संरक्षण की पहली योजना जोधपुर के महाराजा सरदारसिंह ने 1910 में बनाई; क्षेत्र का पहला वन अधिनियम 1935 में अलवर रियासत में तथा शिकार पर पहला प्रतिबंध 1901 में टोंक रियासत में लागू हुआ।
  • राजस्थान में वन विभाग की स्थापना 1949-50 में हुई, जब राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 13% भाग ही वन था; वर्तमान में विभाग का नेतृत्व जयपुर स्थित प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन बल प्रमुख) करते हैं।
  • आज विभाग के प्रशासनिक ढांचे में 18 वन्यजीव मंडल (सर्किल), 64 प्रादेशिक मंडल तथा 463 रेंज शामिल हैं।
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राजस्थान की वनस्पति

Flora of Rajasthan

राजस्थान की वनस्पति मानो एक जीवन-रक्षा पुस्तिका है — जल संचित करने वाले वृक्ष, राजकीय पक्षी को पालने वाली घास, और वे प्रजातियां जो दैनिक जीवन से इतनी जुड़ी हैं कि इनके अपने उपनाम व लोककथाएं तक हैं।

🌳खेजड़ी — राज्य वृक्ष

  • मरुस्थल का 'कल्पवृक्ष' व 'गौरव वृक्ष' माने जाने वाले खेजड़ी को 31 अक्टूबर 1983 को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया (यह तेलंगाना का भी राज्य वृक्ष है); इसकी सूखी फली 'सांगरी' सब्जी के रूप में खाई जाती है, पत्तियां 'लूम' चारे का काम देती हैं और फूल को 'मींझर' कहा जाता है।
  • लेग्युमिनोसी परिवार का यह सदाबहार वृक्ष रेत में भी उग जाता है, जल संचयन व भू-क्षरण रोकने में सक्षम है — इसीलिए इसे 'Wonder Tree' व 'भारतीय मरुस्थल का सुनहरा वृक्ष' भी कहा जाता है; दशहरे पर इसे शमी रूप में पूजा जाता है, और इसके नीचे प्रायः गोगाजी व झुंझार बाबा के थान बने मिलते हैं।
  • खेजड़ी वृक्ष पर 5 जून 1988 को 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया था।

🌸रोहिड़ा — राज्य पुष्प

  • 31 अक्टूबर 1983 को राज्य पुष्प घोषित रोहिड़ा (Tecomella undulata) को उसकी मजबूत, टिकाऊ व आसानी से नक्काशी होने वाली लकड़ी के चलते 'मरुस्थल का सागवान' व 'मारवाड़ टीक' कहा जाता है, और काव्यात्मक रूप से इसे राज्य की 'मरुशोभा' भी कहते हैं; यह रेतीली मिट्टी में उगता है और सूखा सहने की विलक्षण क्षमता रखता है।

🪵चंदन, महुआ व तेंदू

  • राजसमंद के हल्दीघाटी (खमनौर) व सिरोही के देलवाड़ा क्षेत्र में चंदन (Santalum album) वृक्षों की इतनी अधिकता है कि इन वन-पट्टियों को ही 'चंदन वन' कहा जाता है।
  • आदिवासी समुदाय का 'कल्पवृक्ष' माना जाने वाला महुआ (Madhuca longifolia) मुख्यतः उदयपुर, डूंगरपुर व सिरोही में पाया जाता है; इसके फलों से तेल व पारंपरिक शराब 'मोकड़' दोनों बनाई जाती है, और यह आदिवासियों के लिए टोटम के रूप में भी महत्त्व रखता है।
  • 'वागड़ का चीकू' कहलाने वाला तेंदू (Diospyros melanoxylon) झालावाड़, बारां, कोटा व चित्तौड़गढ़ में सबसे अधिक मिलता है, और इसकी पत्तियों से बीड़ी बनाई जाती है — हालांकि सर्वाधिक तेंदू वृक्ष मध्यप्रदेश में पाए जाते हैं।

🎋बांस व गोंद

  • 'आदिवासियों का हरा सोना' कहलाने वाला बांस मुख्यतः आबू पर्वत, बांसवाड़ा, उदयपुर व कोटा में मिलता है; वानस्पतिक वर्गीकरण में अब इसे वृक्ष की श्रेणी से हटाकर घास में शामिल किया जा चुका है।
  • गोंद राजस्थान के पश्चिमी भागों से प्राप्त होता है, जिसमें बाड़मेर के 'चौहटन' का गोंद विशेष रूप से प्रसिद्ध है; राज्य में घास के मैदानों या चरागाहों को स्थानीय भाषा में 'बीड़' कहा जाता है।

🌾मरुस्थल की घासें

  • सेवण या 'लीलोण' घास (Lasiurus sindicus), जो जैसलमेर के पोकरण-मोहनगढ़ के बीच स्थित लाठी सीरीज क्षेत्र में सबसे अधिक मिलती है, दोहरे महत्त्व की है — चारे के रूप में भी और राज्य पक्षी गोडावण के अंडे देने की भूमि के रूप में भी।
  • खस व पामरोजा जैसी सुगंधित घासें, जो इत्र व शरबत बनाने में काम आती हैं, टोंक, सवाईमाधोपुर व भरतपुर में उगती हैं, जबकि बूर घास बीकानेर के आसपास तथा 'लेमन घास' के नाम से मशहूर ओलेवरी घास ओसियां व लोहावट क्षेत्र में मिलती है।
  • अन्य उल्लेखनीय मरु घासों में भूमि को बांधे रखने वाली धामण, पशुओं का उत्तम चारा करड़, गायों-घोड़ों के लिए उपयुक्त अंजन, जैसलमेर की सुगणी घास तथा बारां जिले की सोरसन घास शामिल हैं — इसी सोरसन घास के नाम पर सोरसन पक्षी अभयारण्य का नामकरण हुआ।

🌱सहजन, चिरमी व अन्य उल्लेखनीय पौधे

  • सहजन (मोरिंगा, Moringa oleifera), जिसे सेजन भी कहा जाता है, इतना पोषक तत्वों से भरपूर है कि इसे 'औषधीय भंडार' का दर्जा मिला हुआ है।
  • चिरमी नामक खरपतवार की चमकीली बीजों को वाद्ययंत्रों में मोतियों की तरह पिरोया जाता है (इसलिए इसे 'रोजरी पी' भी कहते हैं); यह मुख्यतः पूर्वी मैदानी भागों में पाई जाने वाली बारहमासी लता है। मरुस्थल में गूंदा, केर व कूम्बट जैसे पौधे भी पर्यावरण संरक्षण में चुपचाप अपनी भूमिका निभाते हैं।

🙏राजस्थान में पूजनीय वृक्ष

  • अलग-अलग वृक्षों की पूजा तय दिनों पर होती है — खेजड़ी (शमी रूप में) दशहरा व जन्माष्टमी पर, पीपल हर शनिवार व ज्येष्ठ पूर्णिमा को, बड़ ज्येष्ठ अमावस्या को, केला हर बृहस्पतिवार को, तुलसी हर माह की तेरस को तथा आंवला आंवला नवमी व आंवला एकादशी पर पूजी जाती है।
  • विभिन्न राजवंशों ने भी अपने-अपने पूज्य वृक्ष अपनाए — तोमरों ने खेजड़ी, यादवों ने कदंब, कछवाहों ने बड़, हाड़ाओं ने अशोक, राठौड़ों ने नीम व चौहानों ने पीपल को अपनाया; शमी (खेजड़ी) वृक्ष को गोगाजी, पाबूजी व भूभूतोजी का निवास तथा उसकी झाड़ी को बायांजी का धाम माना जाता है।

🏷️वृक्षों व पौधों के उपनाम

  • हर वृक्ष का अपना उपनाम है — तेंदू 'वागड़ का चीकू', बांस 'आदिवासियों का हरा सोना', महुआ उनका 'कल्पवृक्ष', रोहिड़ा 'मरुस्थल का सागवान/मारवाड़ टीक', खेजड़ी 'थार का कल्पवृक्ष/गौरव वृक्ष', आर्किड 'जंगल की सुंदरता' तथा सुर्ख पलाश वन 'जंगल की ज्वाला' कहलाता है।
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वन्यजीव संरक्षण व प्रमुख प्रजातियां

Wildlife Conservation & Iconic Species

थार में जूझ रहे संकटापन्न गोडावण से लेकर आशा की प्रजनन-भूमि बन चुके टाइगर रिजर्व तक — राजस्थान की प्रमुख संरक्षण गाथाएं उतनी ही नाटकीय हैं जितने इसके भूदृश्य।

🦌राज्य पशु, राज्य पक्षी व राष्ट्रीय प्रतीक

  • छल्लेदार सींगों वाला शर्मीला चिंकारा (Gazella bennettii) 1981 में राजस्थान का राज्य पशु बना, जबकि 'रेगिस्तान का जहाज' कहे जाने वाले ऊंट को 19 सितंबर 2014 को राजकीय पशुधन घोषित किया गया, और उसकी सुरक्षा हेतु राजस्थान ऊष्ट्र अधिनियम, 2015, 16 मार्च 2016 से लागू हुआ।
  • गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, Ardeotis nigriceps) 1981 से राज्य पक्षी है, जबकि खेजड़ी व रोहिड़ा क्रमशः राज्य वृक्ष व राज्य पुष्प का दर्जा रखते हैं; राष्ट्रीय स्तर पर बरगद राष्ट्रीय वृक्ष, कमल राष्ट्रीय पुष्प, बाघ राष्ट्रीय पशु व मोर राष्ट्रीय पक्षी है।

🦢गोडावण — ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

  • सोनचिरैया, पाल मोरड़ी, महासारंग व भारतीय तिलोर जैसे नामों से भी पहचाना जाने वाला गोडावण उड़ने वाले सबसे भारी पक्षियों में गिना जाता है — यह शर्मीला, सर्वाहारी व घोंसला न बनाने वाला पक्षी जंगल में केवल राष्ट्रीय मरु उद्यान (जैसलमेर), सोंकलिया (अजमेर) व सोरसन (बारां) में ही बचा है।
  • 2011 में IUCN ने गोडावण को 'क्रिटिकली एंडेंजर्ड' सूची में डाला; मई 2024 के जल-स्रोत सर्वेक्षण में जैसलमेर में मात्र 64 गोडावण गिने गए (2022 में सिर्फ 42 थे), और दुनियाभर के लगभग 150 बचे गोडावणों में से करीब 98% राजस्थान में ही हैं।
  • गोडावण पर पहला डाक टिकट 1 नवंबर 1980 को जारी हुआ था, और राष्ट्रीय मरु उद्यान में गोडावण दिवस (21 मई) पर इसकी एक प्रतिमा का अनावरण किया गया।

🥚प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

  • 5 जून 2013 को जैसलमेर के राष्ट्रीय मरु उद्यान में शुरू 'प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' के साथ राजस्थान बस्टर्ड-संरक्षण की समर्पित परियोजना चलाने वाला देश का पहला राज्य बना; इसके तहत रामदेवरा में अंडा संग्रहण व हैचिंग केंद्र तथा सोरसन में प्रजनन केंद्र संचालित हैं।
  • 22 अक्टूबर 2024 को देश में पहली बार कृत्रिम गर्भाधान से गोडावण चूजे का जन्म हुआ — यह उपलब्धि रामदेवरा/सुदासरी प्रजनन केंद्रों में नर पक्षी 'सुदा' व मादा पक्षी 'टोनी' के प्रयोग से हासिल की गई; इसी दिशा में खरमोर (लेसर फ्लोरिकन) का दूसरा प्रजनन केंद्र बारां के अंता में प्रस्तावित है।

🐯प्रोजेक्ट टाइगर व राजस्थान के टाइगर रिजर्व

  • राजस्थान की बाघ-यात्रा 1 अप्रैल 1973 को शुरू हुई रणथंभौर टाइगर परियोजना से शुरू हुई, जो राष्ट्रव्यापी प्रोजेक्ट टाइगर का हिस्सा थी; इस परियोजना ने 2023 में 50 वर्ष पूरे किए — शुरुआत में देश में मात्र 268 बाघ व 9 रिजर्व थे, जो 2022 की गणना तक औसतन 3,682 बाघों तक पहुंच गए।
  • राज्य में अब पांच टाइगर रिजर्व हैं — रणथंभौर (1973, सबसे पुराना व सबसे बड़ा, 1,530 वर्ग किमी), सरिस्का (1978-79), मुकुंदरा हिल्स (2013, बाघों का 'जच्चा घर'), रामगढ़ विषधारी (2022, चौथा) व धौलपुर-करौली (6 अक्टूबर 2023 को घोषित, सबसे नया व सबसे छोटा, लगभग 1,058 वर्ग किमी) — जिनका कुल क्षेत्रफल 6,434 वर्ग किमी से अधिक है; कुंभलगढ़ अभयारण्य को छठा टाइगर रिजर्व बनाने की प्रक्रिया जारी है।

📈बाघों की संख्या व गणना

  • 2022 की अखिल भारतीय बाघ गणना में राजस्थान में 88 बाघ दर्ज किए गए, जिनमें सर्वाधिक रणथंभौर व सरिस्का में थे, जिससे राज्य बाघों की संख्या में देश में 10वें स्थान पर रहा (मध्यप्रदेश 785 बाघों के साथ शीर्ष पर रहा); हाल के आंकड़ों में राज्य में बाघों की संख्या बढ़कर लगभग 140 हो गई है।

🐆प्रोजेक्ट लेपर्ड व लेपर्ड सफारी

  • 2017 में शुरू हुए राजस्थान के 'प्रोजेक्ट लेपर्ड' की शुरुआत जयपुर के झालाना से हुई (उद्घाटन 4 अक्टूबर 2018); इसके बाद 22 मई 2022 को आमागढ़ तथा 5 जून 2025 को बीड़-पापड़ वन क्षेत्र में तीसरी लेपर्ड सफारी शुरू हुई — जिससे जयपुर विश्व का इकलौता ऐसा शहर बन गया जहां एक साथ तीन लेपर्ड सफारी, एक टाइगर सफारी व एक लायन सफारी चलती हैं।
  • लेपर्ड संरक्षित क्षेत्र व सफारी अब कुंभलगढ़, रावली टॉडगढ़, जयसमंद, शेरगढ़, माउंट आबू, जवाई बांध, बस्सी व सीतामाता में भी संचालित हैं, और उदयपुर के आमरख महादेव व अजमेर की गंगा-भैरवी घाटी में नई सफारियां जुड़ी हैं; झालाना में 40 से अधिक, बीड़ पापड़/नाहरगढ़ में 21 व आमागढ़ में 20 तेंदुए दर्ज हैं।

🐈कैराकल (सियागोश) संरक्षण

  • रात्रिचर बिल्ली कैराकल (Felis caracal), जो अब केवल राजस्थान व गुजरात के कुछ हिस्सों में बची है, को 2021 में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड व केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने गंभीर रूप से लुप्तप्राय सूची में डाला; इसके बाद राजस्थान देश का पहला राज्य बना जहां कैराकल की औपचारिक जनगणना हुई, जिसके परिणामस्वरूप केंद्र ने सियागोश संरक्षण योजना शुरू की और सवाईमाधोपुर के रणथंभौर में इसका ब्रीडिंग सेंटर प्रस्तावित है।

🐻भालू व घड़ियाल संरक्षण

  • राज्य का पहला भालू अभयारण्य 20 जुलाई 2010 को जालौर-सिरोही के बीच स्थित जसवंतपुरा के सुंधामाता क्षेत्र में अधिसूचित किया गया; नाहरगढ़ में देश का तीसरा बियर रेस्क्यू सेंटर भी संचालित है।
  • दुनियाभर की लगभग 80% घड़ियाल आबादी चंबल नदी में बसती है, जिनकी संख्या 2020 के 900 से बढ़कर 2021 में 954 हो गई; इनके प्रजनन के लिए धौलपुर के निकट इको सेंटर घड़ियाल प्रोजेक्ट, मुरैना के देवरी में प्रजनन केंद्र, कोटा के निकट गुड़ला की उपयुक्त साइट तथा सवाईमाधोपुर के पालीघाट में नया घड़ियाल रियरिंग सेंटर प्रस्तावित हैं।

🕊️प्रवासी अतिथि — कुरजां, रोजी पेलिकन व ओपन बिल स्टॉर्क

  • डेमोसिल क्रेन या 'कुरजां' हर सितंबर में साइबेरिया, यूक्रेन व कजाकिस्तान से मारवाड़ के जल-स्रोतों — खींचन, बाप व जांबा — की ओर प्रवास करती है, जिनमें खींचन गांव विश्व भर में सबसे प्रसिद्ध है; ये पक्षी ज्वार, नमक, चूना पत्थर व खारे पानी पर निर्भर रहकर मार्च में वापस लौट जाते हैं।
  • रोजी पेलिकन (ग्रेट व्हाइट पेलिकन) अफ्रीका होते हुए जैसलमेर के सांवता गांव स्थित इंडेरी तालाब में आता है, जबकि 'मानसून का दूत' कहलाने वाला ओपन बिल स्टॉर्क वर्षाकाल में प्रजनन हेतु दक्षिण भारत से केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की ओर प्रवास करता है।

🦜दुर्लभ व उल्लेखनीय पक्षी

  • झालावाड़ के गागरोन क्षेत्र में मिलने वाला गागरोनी तोता (एलेक्जेन्ड्राइन पैराकीट) मानव आवाज की हूबहू नकल के लिए जाना जाता है और अब विलुप्ति के कगार पर है; अजमेर के आसपास पीपल-बड़ पर दिखने वाला हरा कबूतर (हरियल) तथा 'पक्षियों का इंजीनियर' कहलाने वाली बया, जो लालटेन जैसे घोंसले बुनती है, भी राज्य की उल्लेखनीय पक्षी संपदा में शामिल हैं।
  • मध्य एशिया से आने वाला दुर्लभ यलो आइड पिजन, जो IUCN की रेड सूची में है, बीकानेर के जोड़बीड़ में सफेद पीठ व पीली आंख-रिंग के साथ पहचाना जाता है; रस्टी स्पॉटेड केट विश्व की सबसे छोटी जंगली बिल्ली है, और भारत का राष्ट्रीय जलचर गंगा डॉल्फिन (स्थानीय नाम 'सूंसू') 18 मई 2010 को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया गया।
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राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य व कन्जर्वेशन रिजर्व

National Parks, Sanctuaries & Conservation Reserves

राजस्थान का हर राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य अपनी अलग कहानी कहता है — वन्यजीवों की शरणस्थली बने किले, मगरमच्छों को पालती नदियां, और बिखरे वनों को चुपचाप जोड़ते संरक्षण रिजर्व।

🐯रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान

  • राज्य का सबसे बड़ा व पहला राष्ट्रीय उद्यान रणथंभौर (सवाईमाधोपुर) मूलतः 1955 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित हुआ था और 1 नवंबर 1980 को राष्ट्रीय उद्यान अधिसूचित किया गया; 282.03 वर्ग किमी में फैला यह उद्यान दक्षिण में चंबल व उत्तर में बनास नदी के बीच स्थित है।
  • यहां जोगी महल व गणेश मंदिर प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं, जबकि पदम तालाब, मलिक तालाब व राजबाग झील भी इसी परिसर में स्थित हैं; बाघों के अलावा मगरमच्छ भी यहां का बड़ा आकर्षण हैं।

🦩केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

  • भरतपुर स्थित केवलादेव (घना पक्षी अभयारण्य), राज्य का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान (मात्र 28.73 वर्ग किमी), 1956 में पक्षी अभयारण्य, 1 अक्टूबर 1981 को रामसर स्थल तथा 1985 में यूनेस्को विश्व प्राकृतिक धरोहर घोषित हुआ।
  • 'पक्षियों का स्वर्ग' कहलाने वाला यह उद्यान साइबेरियन क्रेन के ऐतिहासिक आगमन के लिए प्रसिद्ध रहा है; यहां पानी अजान बांध से आता है, बाणगंगा व गंभीरी नदियां बहती हैं तथा कदंब वृक्षों की भरमार है।

🌄मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान

  • 9 जनवरी 2012 को राष्ट्रीय उद्यान घोषित मुकुंदरा हिल्स का नामकरण हाड़ौती के प्रकृति-प्रेमी शासक मुकंदसिंह के नाम पर हुआ; यह कोटा, बूंदी, झालावाड़ व चित्तौड़गढ़ में फैला है और यहां से चंबल, आहू, काली व आमझर नदियां गुजरती हैं, साथ ही अबली मीणी का महल, रावता महल व बाड़ोली का शिव मंदिर भी इसी परिसर में हैं।

🏜️राष्ट्रीय मरु उद्यान

  • जैसलमेर-बाड़मेर में 3,162 वर्ग किमी में फैला यह राज्य का सबसे बड़ा अभयारण्य/उद्यान है — यहां जीवाश्मों के लिए प्रसिद्ध 'आकल वुड फॉसिल पार्क' स्थित है, और यह राज्य पक्षी गोडावण व राज्य पशु चिंकारा का प्रमुख आवास भी है।

🐒सरिस्का वन्यजीव अभयारण्य

  • अलवर के कांसका-कांकवाड़ी पठार पर बसा सरिस्का (544.22 वर्ग किमी) 1978-79 में टाइगर रिजर्व बना; यह रीसस बंदरों के लिए भी उतना ही प्रसिद्ध है, और यहां पांडुपोल, भर्तृहरि व नीलकंठ महादेव के मंदिरों के साथ बाला किला, अजबगढ़ व रहस्यमय भानगढ़ जैसी विरासत स्थल भी मौजूद हैं।

🦌सीतामाता अभयारण्य — चौसिंगा की जन्मभूमि

  • चित्तौड़गढ़-प्रतापगढ़-सलूंबर में फैला सीतामाता (422.94 वर्ग किमी) चीतल की मातृभूमि है और दुर्लभ चौसिंगा (चार सींग वाला मृग, स्थानीय नाम 'भेडल') तथा महुआ वृक्षों की कोटरों में रहने वाली उड़न गिलहरी ('आशियावा/आशोवा') के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
  • यह मान्यता है कि सीता ने अपने वनवास का कुछ समय यहीं बिताया था; सागवान व बांस से भरपूर यह अभयारण्य जाखम नदी पर स्थित गर्म-ठंडे जुड़वां झरनों 'लव-कुश' के लिए भी जाना जाता है, और हिमालय के बाद औषधीय वनस्पतियों की दृष्टि से इसे भारत का सबसे समृद्ध क्षेत्र माना जाता है।

⛰️पहाड़ी अभयारण्य — कुंभलगढ़, फुलवारी की नाल, टॉडगढ़ रावली व माउंट आबू

  • उदयपुर-पाली-राजसमंद में फैला कुंभलगढ़ अभयारण्य (610.53 वर्ग किमी) भेड़ियों के लिए जाना जाता है और इसमें कुंभलगढ़ का किला व रणकपुर का जैन मंदिर भी शामिल हैं; उदयपुर स्थित फुलवारी की नाल (511.41 वर्ग किमी) से सोम व मानसी वाकल नदियां निकलती हैं, और यहां देश का पहला सागवान की लकड़ी से बना ह्यूमन एनाटॉमी पार्क स्थित है।
  • टॉडगढ़ रावली (ब्यावर-पाली-राजसमंद, 495.27 वर्ग किमी) का किला कर्नल जेम्स टॉड ने बनवाया था और यहां कभी विजयसिंह पथिक जैसे स्वतंत्रता सेनानी बंदी रहे — आज यह गोरुमघाट ट्रेन सफारी व तेंदुओं के लिए प्रसिद्ध है; माउंट आबू अभयारण्य (सिरोही, 326.10 वर्ग किमी), जहां गुरुशिखर चोटी स्थित है, जंगली मुर्गे के लिए जाना जाता है।

🐊रामगढ़ विषधारी, दर्रा, कैलादेवी व राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य

  • बूंदी की रामगढ़ विषधारी अभयारण्य (303.05 वर्ग किमी), जो कभी बूंदी शासकों की शिकारगाह थी, बाघ-बघेरों की प्रजनन 'नर्सरी' मानी जाती है और अब राज्य का चौथा टाइगर रिजर्व भी है; कोटा-झालावाड़ की दर्रा अभयारण्य (227.63 वर्ग किमी) गागरोनी तोतों, धोंक वनों व गागरोन किले के लिए प्रसिद्ध है।
  • करौली-सवाईमाधोपुर की कैलादेवी अभयारण्य (676.82 वर्ग किमी) मुख्यतः धोंक वन क्षेत्र है, जहां कैलादेवी मंदिर स्थित है; राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य (564.03 वर्ग किमी), जो राजस्थान, उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश तक फैला है, चंबल के घड़ियालों की सुरक्षा करता है।

🦌ताल छापर व जयसमंद अभयारण्य

  • चूरू की ताल छापर अभयारण्य (मात्र 7.19 वर्ग किमी) काले हिरणों व शीतकालीन कुरजां पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है, और महाभारत काल में इसे 'द्रोणपुर' कहा जाता था, जिसे गुरु द्रोणाचार्य का निवास माना जाता है; उदयपुर-सलूंबर की जयसमंद अभयारण्य (52.34 वर्ग किमी) तेंदुओं के लिए जानी जाती है और इसे 'जलचरों की बस्ती' भी कहा जाता है।

🌉कन्जर्वेशन रिजर्व — वन्यजीव गलियारे

  • 2002 में बनाई गई कन्जर्वेशन रिजर्व की श्रेणी राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों व संरक्षित वनों के बीच बफर जोन व वन्यजीव गलियारे का काम करती है; राजस्थान में अब कुल 39 कन्जर्वेशन रिजर्व हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 1,450.21 वर्ग किमी है — सबसे बड़ा बालेश्वर (सीकर, 221.69 वर्ग किमी) व सबसे छोटा बीड़ मुहाना-B (जयपुर, मात्र 0.10 वर्ग किमी) है।
  • उल्लेखनीय रिजर्वों में खींचन का कुर्जा कन्जर्वेशन रिजर्व (डेमोसिल क्रेन हेतु देश का पहला ऐसा रिजर्व), सुंधामाता (राज्य के पहले भालू अभयारण्य से जुड़ा), जवाई बांध (तेंदुओं हेतु), गुजराती जंगली गधे 'घुड़खर' के लिए प्रसिद्ध रणखार तथा तेंदुआ रिजर्व के रूप में विकसित मनसा माता शामिल हैं; सबसे नए दो रिजर्व — मोखला-परेवर व बुचारा मैन — 2025-26 में घोषित हुए।
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आर्द्रभूमि, संस्थाएं, योजनाएं व संरक्षण विरासत

Wetlands, Institutions, Schemes & Conservation Heritage

वनों के परे भी राजस्थान आर्द्रभूमियों, संस्थाओं, योजनाओं व पुरस्कारों का एक पूरा तंत्र चलाता है — साथ ही उन आम लोगों की मार्मिक विरासत भी संजोए है जिन्होंने वृक्षों के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

💧भारत व राजस्थान के रामसर स्थल

  • आर्द्रभूमि संरक्षण हेतु रामसर संधि 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर नगर में स्वीकृत हुई (लागू 1975 से), और भारत 1982 में इसका हस्ताक्षरकर्ता बना; एशिया में सबसे अधिक व विश्व में तीसरी सबसे अधिक रामसर स्थलों की सूची में भारत की सूची तेजी से बढ़ रही है, जिसमें बिहार की गोगाबील झील व उत्तरप्रदेश की पटना पक्षी अभयारण्य व शेखा झील जैसी हालिया प्रविष्टियां शामिल हैं।
  • राजस्थान अब पांच रामसर स्थलों का योगदान देता है — केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (सबसे पुराना, 1 अक्टूबर 1981), सांभर झील (23 मार्च 1990), खींचन व मेनार तालाब (दोनों 4 जून 2025) तथा सिलीसेढ़ झील, अलवर (12 दिसंबर 2025, राज्य का सबसे नया रामसर स्थल)।

🌆आर्द्रभूमि शहर मान्यता व नई वेटलैंड अधिसूचनाएं

  • रामसर संधि की 'वेटलैंड सिटी मान्यता' योजना उन शहरों को सम्मानित करती है जिन्होंने अपनी शहरी आर्द्रभूमियों की रक्षा में असाधारण कदम उठाए हैं — उदयपुर व इंदौर दोनों को यह मान्यता मिल चुकी है।
  • विश्व जल दिवस (22 मार्च) के अवसर पर राज्य के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने आर्द्रभूमि (संरक्षण व प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत राज्य के 44 और जल-स्रोतों को वेटलैंड के रूप में चिह्नित करते हुए ड्राफ्ट अधिसूचना जारी की।

🏢वन व वन्यजीव संस्थाएं

  • राज्य के वन-वन्यजीव प्रशासन में प्रमुख संस्थाओं में शामिल हैं — स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 6 के तहत फरवरी 2020 में गठित), राजस्थान राज्य वन विकास निगम/RSFDC (16 दिसंबर 2020 को स्थापित, इमारती लकड़ी-बांस व लघु वनोपज के मूल्य संवर्द्धन हेतु), कैम्पा (राज्य की प्रतिकरात्मक वनरोपण प्राधिकरण, 14 सितंबर 2018 को गठित) तथा राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (वन मंत्री की अध्यक्षता वाली 20 सदस्यीय संस्था, 27 नवंबर 2019 को गठित)।
  • वन विभाग का मुख्यालय झालाना, जयपुर स्थित अरण्य भवन में है; राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड का नाम 30 अगस्त 2023 को बदलकर 'अमृता देवी राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड' किया गया, और शिकार रोकने तथा पुलिस-वन विभाग समन्वय के लिए एक अलग स्टेट वाइल्ड लाइफ क्राइम ब्यूरो भी कार्यरत है।

🔬अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान

  • जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI) की स्थापना 1985 में ICFRE के अधीन हुई, जबकि काजरी (सेंट्रल एरिड ज़ोन रिसर्च इंस्टीट्यूट) की स्थापना 1952 में मरुस्थल वनरोपण शोध केंद्र के रूप में हुई थी (1959 में नामकरण बदला) — यह मरुस्थल के वृक्षों, चरागाहों, मृदा व जल संरक्षण पर काम करता है।
  • इसके अलावा राज्य में जयपुर स्थित राजस्थान वानिकी व वन्यजीव प्रशिक्षण संस्थान, जोधपुर का मरु वन प्रशिक्षण केंद्र, अलवर का राजस्थान वन प्रशिक्षण केंद्र तथा चूरू के तालछापर स्थित वन्यजीव प्रबंधन व रेगिस्तान परितंत्र प्रशिक्षण केंद्र जैसे विशेषीकृत संस्थान भी काम करते हैं।

🌱मिशन हरियाळो राजस्थान

  • राज्य के 2023-24 बजट में घोषित तथा जुलाई 2024 में औपचारिक रूप से शुरू हुए मिशन हरियाळो राजस्थान का लक्ष्य पांच वर्षों में लगभग 4,000 करोड़ रुपये खर्च कर 50 करोड़ पौधे लगाना है — 2024 में 7.22 करोड़ व 2025 में 11.75 करोड़ पौधे लगाए जा चुके हैं, तथा 2026 के लिए 10 करोड़ पौधों का लक्ष्य है।
  • मिशन के तहत हर जिले में एक 'मातृ वन' स्थापित किया जाएगा, 'वन-प्रजाति' कार्यक्रम (One District-One Species) लागू होगा, 2,000 स्थानीय लोगों को 'वन मित्र' नियुक्त किया जाएगा, तथा झालाना-जयपुर में एक Forest and Wildlife Training-cum-Management Institute स्थापित किया जाएगा।

🎋वन-धन योजना व प्रोजेक्ट बोल्ड

  • 17 अगस्त 2015 को स्वीकृत वन-धन योजना रणथंभौर, कुंभलगढ़, राष्ट्रीय मरु उद्यान, माउंट आबू व जवाई बांध जैसे संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बसे लोगों की वनों पर निर्भरता घटाने, रोजगार देने तथा वन्यजीव-वन सुरक्षा मजबूत करने के लिए चलाई जाती है।
  • सूखाग्रस्त भूमि पर बांस आधारित हरियाली विकसित करने वाली 'प्रोजेक्ट बोल्ड' की शुरुआत उदयपुर के आदिवासी गांव निचला मंडवा से हुई, जहां 25 बीघा शुष्क भूमि पर बांस की 5,000 पौध रोपी गई; बाद में खादी व ग्रामोद्योग आयोग व BSF ने 28 जुलाई 2021 को जैसलमेर के तनोट में और 1,000 बांस पौधे लगाए।

🏅वानिकी व वन्यजीव पुरस्कार

  • 1994 में शुरू अमृता देवी विश्नोई स्मृति पुरस्कार वन सुरक्षा व वन्यजीव संरक्षण में उत्कृष्ट कार्य को सम्मानित करता है — संस्थाओं को 1 लाख रु. तक व व्यक्तियों को 50,000 रु. तक दिए जाते हैं (पहला पुरस्कार पाली के गंगाराम विश्नोई को मिला); 2019 से शुरू वानिकी पुरस्कार सर्वोत्तम वनरक्षक, वनपाल व पौधारोपण कार्य को मान्यता देते हैं।
  • अन्य प्रमुख पुरस्कारों में कैलाश सांखला वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार (50,000 रु.), राजीव गांधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार (2012 से हर 5 जून को), इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार (1987 में स्थापित) तथा इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (1986) शामिल हैं, जो व्यक्तिगत वन अधिकारियों से लेकर स्कूली इको-क्लबों तक विभिन्न श्रेणियों में दिए जाते हैं।

🌳बिश्नोई बलिदान व खेजड़ली हत्याकांड

  • बिश्नोई संप्रदाय के संस्थापक गुरु जांभोजी ने 29 नियम बनाए, जिनमें एक नियम विशेष रूप से वृक्षों की रक्षा से जुड़ा था।
  • विक्रम संवत् 1787 (सन् 1730) की भाद्रपद शुक्ला दशमी को अमृता देवी व उनकी तीन पुत्रियों के नेतृत्व में 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने जोधपुर के खेजड़ली गांव में वृक्षों से लिपटकर अपने प्राण न्योछावर कर दिए, ताकि शासक अभयसिंह के आदेश पर हो रही कटाई रोकी जा सके; इसे 'साका-खडाना' कहा जाता है तथा भारत का पहला 'चिपको आंदोलन' माना जाता है — हर वर्ष खेजड़ली में शहीद दिवस व विशाल मेला भरता है, और 1978 से 12 सितंबर को खेजड़ली दिवस भी मनाया जाता है।
  • वृक्षों के लिए ऐसे बलिदान इतिहास में और भी दर्ज हैं — 1604 में जोधपुर रियासत के रामसड़ी गांव की करमा व गौरा (सबसे पहला ऐसा बलिदान), नागौर के पोलावास गांव के बूचोजी जिन्होंने होली के लिए हो रही कटाई का विरोध करते हुए स्वयं अपनी गर्दन काट ली, तथा जोधपुर के तिलासनी गांव के खींवजी, मोटो व नेतू नैण।

🤝चिपको आंदोलन व सुंदरलाल बहुगुणा

  • मार्च 1974 में उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गांव में गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर सरकार की कटाई योजना रोकी — चंडी प्रसाद भट्ट व गोविंद सिंह रावत जैसे कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर यह आंदोलन चिपको आंदोलन कहलाया।
  • पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने 1970 के दशक में इस आंदोलन को विश्व भर में पहचान दिलाई और आजीवन वन-संरक्षण की आवाज उठाते रहे; उनका निधन 21 मई 2021 को हुआ।

📅महत्त्वपूर्ण पर्यावरण दिवस

  • वर्ष भर कई पर्यावरण दिवस मनाए जाते हैं — 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस, 3 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस, 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस, 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस, 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस, 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस, 1-7 जुलाई को वानिकी सप्ताह, 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस तथा 2-8 अक्टूबर को वन्यजीव सप्ताह।
  • संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2011 को वनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में घोषित किया था, जबकि विश्व प्रवासी पक्षी दिवस 2006 से साल में दो बार — मई व अक्टूबर के दूसरे शनिवार को — मनाया जा रहा है।