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राजस्थान GK

राजस्थान की जाति एवं जनजातियाँ

Castes & Tribes of Rajasthan

मीणा, भील, गरासिया, सहरिया व कथौड़ी जैसी जनजातियों से लेकर कालबेलिया व कंजर जैसे घुमन्तू समुदायों तक — राजस्थान की समृद्ध सामाजिक विविधता, उनके उद्भव, रीति-रिवाज व लोक-संस्कृति का सफर।

27 टॉपिक70 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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राजस्थान का जनजातीय परिदृश्य

Tribal Landscape of Rajasthan

राजस्थान की वनाच्छादित पहाड़ियों और दक्षिण-पूर्वी पठार में अनुसूचित जनजातियों का समृद्ध मिश्रण बसता है — यहाँ जानिए वे कौन हैं, कहाँ रहते हैं और उनकी संख्या का लेखा-जोखा क्या कहता है।

🏞️परिचय एवं संवैधानिक ढाँचा

  • राजस्थान भारत के छह प्रमुख जनजाति-बहुल राज्यों में शुमार है, जहाँ भील, मीणा, गरासिया, सहरिया, डामोर और कथौड़ी जैसी जनजातियाँ निवास करती हैं।
  • राज्य का लगभग पूरा दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्र तथा दक्षिण-पूर्वी पठार का एक हिस्सा जनजाति-बहुल माना जाता है; अकेले उदयपुर और बाँसवाड़ा जिलों में राज्य की कुल अनुसूचित जनजाति आबादी का 30% से अधिक हिस्सा केंद्रित है।
  • अनुसूचित जनजातियों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित किया जाता है, और जनजातीय समुदायों को गिरिजन या वनवासी के नाम से भी जाना जाता है।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1976 के अंतर्गत राजस्थान सरकार ने 27 जुलाई 1977 को 12 श्रेणियों की अनुसूचित जनजातियों को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया।

📜12 अधिसूचित जनजातियाँ (1977)

  • 1977 में अधिसूचित पहली छह जनजातियाँ थीं — मीना/मीणा, भील मीणा, पटेलिया, भील, डामोर और कोकना/कुकणा।
  • शेष छह जनजातियाँ थीं — सहरिया, धांका, गरासिया, कोलीढोर, कथौड़ी और नायकड़ा, जो मिलकर राजस्थान की 12 आधिकारिक रूप से अधिसूचित जनजातियों की सूची पूरी करती हैं।

📊जनसंख्या रैंकिंग एवं 2011 जनगणना आँकड़े

  • मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान भारत में सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या वाले राज्यों में शीर्ष पर हैं।
  • 2011 की जनगणना में राजस्थान निरपेक्ष जनजातीय जनसंख्या के लिहाज से देश में चौथे स्थान पर रहा, जबकि कुल जनसंख्या में जनजातीय हिस्सेदारी के आधार पर इसका स्थान 13वाँ था।
  • 2011 के आँकड़ों के अनुसार राजस्थान की अनुसूचित जनजाति जनसंख्या 92.38 लाख थी, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 13.48% है; संख्या में उदयपुर सबसे आगे (15.25 लाख) रहा जबकि बीकानेर सबसे पीछे (लगभग 7,700)।
  • जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से बाँसवाड़ा (76.4%), डूँगरपुर (70.8%) और प्रतापगढ़ (55.46%) में सर्वाधिक जनजातीय प्रतिशत दर्ज हुआ, जबकि नागौर (0.31%), बीकानेर (0.33%) और चूरू (0.55%) में सबसे कम।

🧭जनजातिवार प्रमुख जिले

  • मीणा जनजाति की संख्या उदयपुर, जयपुर, प्रतापगढ़, दौसा और करौली में सबसे अधिक है, जबकि भील जनजाति मुख्यतः बाँसवाड़ा, डूँगरपुर और उदयपुर में केंद्रित है।
  • गरासिया मुख्यतः सिरोही, उदयपुर, पाली, बाँसवाड़ा और डूँगरपुर में बसे हैं, जबकि सहरिया की संख्या बाराँ, कोटा, झालावाड़, धौलपुर और जयपुर में सर्वाधिक है।
  • छोटी अधिसूचित जनजातियों में धांका जयपुर व अलवर में, डामोर डूँगरपुर व बाँसवाड़ा में, तथा कथौड़ी उदयपुर व डूँगरपुर में अग्रणी है।
  • दिलचस्प यह है कि नायकड़ा जनजाति दक्षिणी पहाड़ों के बजाय बीकानेर, हनुमानगढ़ व चूरू जैसे शुष्क उत्तरी जिलों में सर्वाधिक पाई जाती है।
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मीणा — राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति

Meena — Rajasthan's Largest Tribe

मछली को अपना गणचिह्न मानने वाला और भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से अपनी वंशावली जोड़ने वाला मीणा समुदाय न केवल राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति है, बल्कि कभी उसी भूमि पर राज करता था जो आगे चलकर आमेर व जयपुर बनी।

🐠उद्भव एवं पौराणिक जड़ें

  • मीणा राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति है और इसका गणचिह्न (टोटम) मीन यानी मछली है।
  • मुनि मगनसागर रचित मीन पुराण (मत्स्य पुराण) में मीणा जाति को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का वंशज बताया गया है, तथा समुदाय के भीतर 5,200 गोत्रों, 32 तड़ों व 13 पालों का उल्लेख मिलता है।
  • महाभारत में वर्णित अज्ञातवास के एक वर्ष के दौरान पांडवों ने मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर में निवास किया था, और महाकाव्य में मत्स्यों को साल्वों का मित्र बताया गया है।
  • कर्नल जेम्स टॉड मीणाओं की उत्पत्ति अजमेर से आगरा तक फैली कालीखोह की पहाड़ियों में मानते हैं; 2011 में 43.46 लाख की जनसंख्या के साथ मीणा राज्य की कुल जनजाति आबादी का लगभग 47% हैं, जो मुख्यतः उदयपुर, जयपुर व प्रतापगढ़ के अलावा दौसा, करौली, सवाई माधोपुर व अलवर में बसे हैं।

🏰शासन का इतिहास व विद्वानों के मत

  • कछवाहा वंश के सत्ता में आने से पहले आमेर पर मीणाओं का शासन था; कछवाहा वंश के संस्थापक दुलहराय ने मीणा सरदारों को हराकर सत्ता हासिल की, और सन् 1342 ई. से पहले बूँदी (तत्कालीन बूँदघाटी) पर भी मीणों का ही राज था।
  • मीणाओं को परंपरागत रूप से इस क्षेत्र का रक्षक माना जाता था — स्वतंत्रता से पहले जब भी कोई नया राजा गद्दी पर बैठता, उसका राजतिलक कालीखोह के मीणा सरदार द्वारा किया जाता था।
  • इतिहासकार कनिंघम ने मीणाओं को राजपूताना की प्रमुख जनजाति के रूप में स्वीकार किया, जबकि फादर हेरास आधुनिक मीणा समुदाय को आर्य युग के मीन-गणचिह्नधारी लोगों का वंशज मानते हैं।
  • हरमन गॉइज मीणाओं को उसी मत्स्य जाति से जोड़ते हैं जिसे ऋग्वैदिक दसराज्ञ युद्ध में राजा सुदास ने हराया था और जिसने बाद में महाभारत युद्ध में कौरवों का साथ दिया; जी.एन. कैम्पबेल ने इस जनजाति को मुण्डा (कोलारियन) समूह का हिस्सा माना, और मीणा क्षेत्रीय सभा की स्थापना 1933 में हुई।

🏘️समाज, विवाह व दैनिक जीवन

  • मीणा समाज मुख्यतः दो वर्गों में बँटा है — जमींदार/पुरानावासी मीणा, जो कृषि व पशुपालन करते हैं, और चौकीदार/नयाबासी मीणा, जो पारंपरिक रूप से राजाओं के महलों व खजानों की रखवाली करते थे; अन्य उपवर्गों में प्रतिहार, चौथिया, आदिया, चमरिया, रावत व भील मीणा शामिल हैं।
  • परिवार पितृसत्तात्मक होते हैं और एकल तथा संयुक्त दोनों रूपों में मिलते हैं; बाल विवाह की प्रथा अब भी प्रचलित है, गाँव के मुखिया को पटेल कहा जाता है, सबसे छोटी बस्ती इकाई ढाणी कहलाती है, और हथोई वह स्थान है जहाँ गाँव व समाज से जुड़े मसलों पर चर्चा होती है।
  • प्रचलित विवाह रूपों में ब्रह्म, गांधर्व व राक्षस विवाह शामिल हैं, साथ ही विधवा पुनर्विवाह हेतु नातरा प्रथा भी अपनाई जाती है; विवाह से पूर्व दापा/चारी नाम से वधू-मूल्य लेने की परंपरा भी है।
  • जेहुरे या निकाला नामक तलाक प्रथा में पति अपने साफे का एक टुकड़ा फाड़कर पत्नी को दे देता है, और वह पानी से भरे दो मटके सिर पर रखकर घर से चली जाती है; इससे अलग नाता प्रथा में विवाहित स्त्री किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लगती है, और नया पुरुष पूर्व पति को झगड़ा रकम के रूप में मुआवजा देता है।

🛕देवी-देवता व मेले

  • मीणा जनजाति में भूरिया बाबा और गौतमेश्वर (जिन्हें बुझ देवता भी कहा जाता है) लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं, जबकि जीणमाता को उनकी लोकदेवी का दर्जा प्राप्त है; अन्य पूजित देवी-देवताओं में बांकमाता, ध्यावण माता, शीतला माता, भैरव, हनुमानजी, चारभुजा व महादेवजी शामिल हैं।
  • मीणाओं के प्रमुख मेलों में महावीरजी मेला (हिंडौन, करौली), कैलादेवी मेला (करौली), अम्बा माता मेला (उदयपुर), गौतमेश्वर मेला (अरनोद, प्रतापगढ़), रामेश्वरम् धाम मेला (सवाई माधोपुर) व शीतला माता मेला (चाकसू, जयपुर) शामिल हैं।
  • चिड़ी फाड़ना सिरोही जिले के चोटीला गाँव की मीणाओं की एक विशिष्ट परंपरा है, जिसका उपयोग विशेष रूप से गौतमेश्वर बाबा-भूरिया बाबा मेले के निमंत्रण भेजने के लिए किया जाता है।

🎭वेशभूषा, नृत्य व दैनिक रीति-रिवाज

  • मीणा पुरुष पारंपरिक रूप से अँगरखी, धोती, पगड़ी व साफा पहनते हैं और सर्दियों में ऊनी पछेवड़ा ओढ़ते हैं, जबकि स्त्रियाँ ओढ़नी, घाघरा, कब्जा, आँगी व काँचली के साथ कड़े, करधनी व गले के आभूषण धारण करती हैं; चौकीदार मीणे साफे पर लाल या काला जाड़िया बाँधकर अलग पहचान रखते हैं, और उनकी महिलाएँ लाल घाघरा-लुगड़ी व काँचली पहनती हैं।
  • मीणाओं के प्रमुख नृत्यों में लाठी, सुन्दरी, युद्ध, मोहुलो, गरबा व नेजा शामिल हैं, वहीं लीला-मोरिया संस्कार व मोरनी-मांडणा परंपरा विवाह से जुड़ी रस्मों का हिस्सा हैं।
  • जगा उन लोगों को कहा जाता है जो भाट परंपरा की तरह समुदाय का वंश-लेखन करते हैं, बड़ालिया विवाह संबंधों में मध्यस्थता करने वाले फूफा या मामा को कहा जाता है, और कगली विधवा से विवाह करने पर जातीय पंचायत द्वारा लगाया जाने वाला जुर्माना है।
  • सुबह के नाश्ते को कलेवा तथा शाम के भोजन को ब्यालू कहा जाता है; मौसर या नुक्ता मृत्यु के 12वें दिन आयोजित होने वाला सामूहिक मृत्युभोज है, मेवासे जंगलों में बने घर हैं, और ओबरी अनाज भंडारण हेतु बनाई गई मिट्टी की कोठियाँ हैं।
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भील — राजस्थान के प्राचीनतम वनवासी

Bhil — Rajasthan's Ancient Forest Dwellers

कभी वनपुत्र कहलाने वाले धनुर्धर भील भारत का सबसे बड़ा जनजातीय समूह और राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति हैं — उनका तीर-कमान, लोकनाट्य और वन-संस्कृति आज भी उतनी ही जीवंत है।

🌳परिचय, उद्भव व पहचान

  • भील मीणा के बाद राज्य की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है और साथ ही भारत का सबसे बड़ा जनजातीय समूह भी है, जो मुख्यतः बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ व सिरोही जिलों में केंद्रित है।
  • 'भील' शब्द द्रविड़ भाषा के 'बील' से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है तीर-कमान — यही तीर-कमान (जिसे हरिया कामटी भी कहा जाता है) आज भी भीलों का मुख्य अस्त्र है, और उन्हें राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति माना जाता है, जिन्हें महाभारत काल में निषाद कहा जाता था।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने भीलों को 'वनपुत्र' कहा, जबकि डी.एन. मजूमदार सहित कुछ मानवशास्त्री उनका संबंध क्रमशः मुण्डा जनजाति व नेग्रिटो प्रजाति से मानते हैं; मेवाड़ के राज्य चिह्न में तो राजपूत राजा के साथ भील राजा पूँजा भील का चित्र भी अंकित है, और अबुल फजल की आइने अकबरी में उन्हें नियम-पालक व मेहनती बताया गया है।
  • बाबादेव/बापजी/बावजी के रूप में पूजे जाने वाले भगवान शिव भीलों के अधिदेव हैं; 2011 की जनगणना के अनुसार उनकी जनसंख्या 41 लाख थी (राज्य की कुल जनजाति आबादी का लगभग 44.38%), जिसमें बाँसवाड़ा (13.40 लाख), डूँगरपुर (6.87 लाख) व उदयपुर (6.52 लाख) सबसे आगे रहे।

🏡सामाजिक जीवन एवं निवास

  • भील परिवार पितृसत्तात्मक होते हैं, जिनमें सबसे बड़ा पुरुष सदस्य मुखिया होता है; निवास स्थान को फला और गाँव या बस्ती को पाल कहा जाता है, जबकि घरों को टापरा/कू व उनके बाहरी बरामदे को डहलिया/ढालिया कहते हैं।
  • गाँव के मुखिया को गमेती और मार्गदर्शक को बोलावा कहा जाता है; पालवी ऊँची पहाड़ियों पर बसे भील हैं जबकि वागड़ी मैदानी भागों में रहते हैं, और डाम देना रोग उपचार की उनकी पारंपरिक विधि है।
  • भीलों में बाल विवाह सामान्यतः प्रचलित नहीं है, किंतु विधवा विवाह स्वीकृत है, जिसमें छोटा भाई अपने बड़े भाई की विधवा (देवर बट्टा) से विवाह कर सकता है।
  • शिकार, वनोपज की बिक्री और कृषि मिलकर भील अर्थव्यवस्था का आधार बनाते हैं, और उनके परिवार सामान्यतः संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं।

👘वेशभूषा व आभूषण

  • भील पुरुष लाल/पीले/केसरिया रंग का फेंटा या सफेद पोत्या साफा बाँधते हैं, इसके साथ लँगोटी/खोयतू या अधिक तंग ढेपाड़ा धोती, अँगरखी (जिसे बख्तरी, बण्डी, कमीज या कुर्ता भी कहते हैं) तथा फालू नामक अँगोछा पहनते हैं।
  • भील स्त्रियाँ घुटनों तक की कछाबू घाघरा, अँगरूठी या काँचली नामक चोली और वक्षस्थल ढकने वाला कब्जा पहनती हैं, जबकि दुल्हन परंपरागत रूप से लाल सिंदूरी साड़ी या पीले रंग की पिरिया लहँगा पहनती है।
  • स्त्रियों की साड़ी को ओढ़नी या लूगड़ा कहा जाता है, जिसमें लोकप्रिय ताराभाँत के अलावा हाड़ला, गवन, मलकपुरी व चुंदड़ी/अँगूछा शैलियाँ शामिल हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ चीरम भाँत व पावली भाँत (चवन्नी छाप) की ओढ़नी पसंद करती हैं।
  • परिजनी भील महिलाओं द्वारा पैरों में पहनी जाने वाली पीतल की मोटी चूड़ियाँ हैं, जो समुदाय की विशिष्ट आभूषण परंपरा की पहचान हैं।

💍विवाह प्रथाएँ

  • एकल विवाह से आशय एकपत्नीव्रत से है, क्रय विवाह वधू-मूल्य (दापा) देकर संपन्न किया जाने वाला विवाह है, और आँटा-साँटा एक विनिमय विवाह है जिसमें उसी घर से वधू लेने के बदले वधू दी जाती है।
  • सह-पलायन विवाह भाग कर किया जाने वाला विवाह है और प्रेम विवाह पारस्परिक प्रेम से, जबकि सेवा विवाह में वर विवाह से पूर्व वधू के घर रहकर सेवा करता है, और हरण विवाह में लड़की को भगाने के बाद परिवार की सहमति से विवाह पूरा किया जाता है।
  • दापा या झगड़ा राशि वर पक्ष द्वारा वधू के परिवार को नकद या वस्तु के रूप में दी जाने वाली वधू-मूल्य राशि है, जबकि छेड़ा फाड़ना समुदाय की तलाक प्रथा है, जिसमें जातीय पंचायत के समक्ष नई साड़ी के पल्लू में रुपया बाँधकर उसे फाड़ा जाता है और फटी साड़ी पत्नी को अलगाव के प्रमाण स्वरूप दे दी जाती है।
  • नातरा प्रथा भील स्त्रियों के पुनर्विवाह की अनुमति देती है, हाई रखवी हाट बाजार में जीवनसाथी चुनने की प्रथा है, और भराड़ी वह लोकदेवी चित्रकारी है जो भील बेटी के विवाह के अवसर पर घर की दीवार पर बनाते हैं।

🥁नृत्य, वाद्ययंत्र व दैनिक शब्दावली

  • भीलों के प्रमुख नृत्यों में हाथीमना, गैर-नेजा, युद्ध, द्विचक्री, भगोरिया व घूमरा शामिल हैं, साथ ही गवरी (जिसे राई भी कहा जाता है) — उनका प्रमुख धार्मिक लोकनाट्य, जिसे राज्य का सबसे प्राचीन लोकनाट्य भी माना जाता है।
  • उनके परंपरागत वाद्ययंत्रों में मांदल सबसे प्रमुख है, साथ ही ढोल, कुण्डी, काँसे की थाली, वाहली (बाँसुरी), ढाँक व कामड़ा भी शामिल हैं।
  • भील कुलदेवता (गणचिह्न) को टोटम कहा जाता है और उनका पारंपरिक रणघोष फाइरे-फाइरे है; झूमिंग या दजिया मैदानी भूमि को जलाकर की जाने वाली खेती है, जबकि चिमाता/वालरा इसी झूमिंग खेती का पहाड़ी ढलानों पर किया जाने वाला रूप है।
  • भोपा भीलों में झाड़-फूँक करने वाला व्यक्ति होता है, कबलियाँ व केलड़ी क्रमशः उनकी मिट्टी की अनाज-कोठी व तवा हैं, मौताणा प्रथा मृत्यु के बाद समुदाय से वसूली जाने वाली धनराशि है, और भील समाज में 'काँडी' शब्द को गाली तथा 'पाड़ा' शब्द को शुभ माना जाता है।

🛕आराध्य देव, मेले व संप्रदाय

  • भीलों की मान्यता है कि केसरियानाथजी को चढ़ाई गई केसर मिश्रित जल पीने वाला व्यक्ति फिर कभी झूठ नहीं बोल सकता; अन्य पूजित देवों में कालाबावजी, कालाजी व ऋषभदेवजी शामिल हैं, जबकि आमजा माता उनकी कुलदेवी और भराड़ी माता उनकी लोकदेवी हैं।
  • बेणेश्वर मेला, जो माघ पूर्णिमा को साबला गाँव (डूँगरपुर) के पास माही-सोम-जाखम के त्रिवेणी संगम पर संत मावजी की स्मृति में भरता है, को प्रसिद्ध रूप से 'आदिवासियों का कुंभ' कहा जाता है; अन्य प्रमुख मेलों में घोटिया अम्बा मेला (बाँसवाड़ा) व लीला पानी मेला (डूँगरपुर) शामिल हैं।
  • हाथी वैंडो प्रथा में विवाह पीपल, साल, बाँस व सागवान के पेड़ों को साक्षी मानकर संपन्न किए जाते हैं; उन्दरिया संप्रदाय व भगत पंथ जनजाति के प्रमुख संप्रदायों में शामिल हैं, और उनकी बोली जाने वाली भाषा बागड़ी या भीली है।
  • डूँगरपुर के साबला गाँव में जन्मे संत मावजी को भगवान विष्णु का दसवाँ निष्कलंकी अवतार माना जाता है, और उनकी शिक्षाएँ चोपड़े नामक ग्रंथों में दर्ज हैं; मक्का की रोटी व प्याज (काँदे) का साग समुदाय का मुख्य भोजन है, और जी.एस. थॉमसन ने भीली भाषा का व्याकरण ग्रंथ 'भीली व्याकरण' लिखा।
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गरासिया, सहरिया, कथौड़ी व डामोर

Garasia, Sahariya, Kathodi & Damor

मीणा व भील के अतिरिक्त राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्र में कई अन्य विशिष्ट जनजातीय समुदाय बसते हैं, जिनकी अपनी अलग मातृभूमि, बोली व रीति-रिवाज हैं।

⛰️गरासिया — उद्भव व समाज

  • गरासिया मीणा व भील के बाद राजस्थान की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है, जिसकी 2011 में जनसंख्या 3.142 लाख थी और यह मुख्यतः सिरोही (1.53 लाख) व उदयपुर (1.04 लाख) के अलावा पाली, बाँसवाड़ा व डूँगरपुर में बसी है; इनका केंद्र सिरोही की आबूरोड व पिंडवाड़ा तहसीलें, पाली की बाली तहसील तथा उदयपुर की गोगुन्दा व कोटड़ा तहसीलें हैं।
  • कर्नल टॉड गरासिया नाम की उत्पत्ति 'गवास' शब्द से मानते हैं, जिसका अर्थ सेवक है, और इनके क्षेत्र को लोकप्रिय रूप से 'कुँवारों का देश' कहा जाता है; आबूरोड का भाखर क्षेत्र इनका मूल स्थान माना जाता है, और ये माउंट आबू की नक्की झील को पवित्र मानकर वहाँ पूर्वजों की अस्थियाँ विसर्जित करते हैं।
  • गरासिया परिवार पितृवंशीय एकाकी इकाइयाँ होते हैं; घर को घेर और गाँव की सबसे छोटी इकाई को फालिया कहा जाता है, तथा जनजातीय पंचायत का मुखिया सहलोत या पालवी कहलाता है; मोर इनका प्रतीक पक्षी है और इनकी बोली गुजराती, भीली, मेवाड़ी व मारवाड़ी का मिश्रण है।
  • समाज सामाजिक रूप से मोटी नियात (उच्च वर्ग, बाबोर हाइया), नेनकी नियात (मध्यम वर्ग, मादेरिया) व निचली नियात (निम्न वर्ग) में बँटा है; भीलों से अंतर्विवाह पर अलग पारिवारिक पहचान मिलती है — गरासिया पुरुष द्वारा भील स्त्री से विवाह पर भील गरासिया, और इसके विपरीत होने पर गमेती गरासिया कहलाते हैं।

💃गरासिया — विवाह, रीति-रिवाज व संस्कृति

  • गरासिया विवाह रूपों में मोरबंधिया विवाह (ब्रह्म विवाह जैसा, जिसमें मोड़ बाँधकर फेरे लिए जाते हैं) और ताणना विवाह (बिना सगाई-रस्म के, पंचायत द्वारा तय वधू-मूल्य) से लेकर पहरावना विवाह (ब्राह्मण के बिना प्रतीकात्मक फेरे), आँटा-साँटा विनिमय विवाह, आणा करना विधवा विवाह, सेवा-विवाह (जिसमें वर घर जँवाई बनकर रहता है), खेवणा/माता विवाह (विवाहित स्त्री का प्रेमी संग भाग जाना), और मेलबो विवाह (खर्च बचाने हेतु वधू को वर के घर छोड़ देना) शामिल हैं।
  • इनके कुलदेवता घोड़ा बावसी हैं, और संबोधनों में माता व बड़ी उम्र की स्त्रियों को आई/नानी/आईजी, पुत्र को दिकरा, पुत्री को दिकरी, पिता को बापा, चाचा को काका तथा दादा को मोटा बाबा कहा जाता है; मृत्यु के 12वें दिन अंतिम संस्कार किया जाता है, और नवजात की नाल काटने की रस्म को अनाला मोरयू प्रथा कहते हैं।
  • चेहरे पर गोदना मांडलिया और हाथ-पाँव पर गोदना मांडला कहलाता है, जबकि वालरा मध्य माही के छप्पन बेसिन क्षेत्र में गरासिया व भील द्वारा संयुक्त रूप से की जाने वाली झूमिंग खेती है; इनकी मुख्य रोटियाँ रोटो (मक्का), रोटा (गेहूँ) व पानिया (खाखरे के पत्ते में सिंकी मक्के की रोटी) हैं, और होली व गणगौर मुख्य त्योहार हैं।
  • शिव, भैरव व दुर्गा इनके प्रमुख देव हैं, सफेद रंग इनका पवित्र रंग है; प्रमुख वाद्ययंत्रों में बाँसुरी, नगाड़ा, अलगोजा, ढोल, कुण्डी व मंजीरा शामिल हैं, और नृत्यों में लूर, घूमर, गौर, ज्वारा, वालर, मोरिया व कूद आते हैं। गरासिया का सबसे बड़ा मेला सियावा गाँव का मेला बैसाख कृष्ण पंचमी को लगता है, इसके साथ कोटेश्वर, चेतर-विचित्रा व सरणेश्वर महादेव मेले भी होते हैं।

🌲सहरिया — उद्भव, अर्थव्यवस्था व समाज

  • सहरिया नाम फारसी शब्द 'सहर' से बना माना जाता है, जिसका अर्थ जंगल है; ये मुख्यतः दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में, विशेषकर बाराँ जिले की शाहाबाद व किशनगंज तहसीलों में निवास करते हैं, और कर्नल टॉड इन्हें भीलों के विस्तृत परिवार का ही हिस्सा मानते थे।
  • 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में सहरिया जनजाति की कुल जनसंख्या 1.114 लाख थी, जिसमें से 1.085 लाख अकेले बाराँ जिले में रहती है, इसके अलावा कोटा, झालावाड़, धौलपुर व जयपुर में भी छोटी संख्या में सहरिया बसे हैं।
  • आदिम जनजाति समुदाय माने जाने वाले सहरियों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पशुपालन, शिकार-संग्रहण तथा कुछ हद तक कृषि पर टिकी है; शाहाबाद व किशनगंज में सहरिया विकास कार्यक्रम की शुरुआत 1977-78 में हुई।
  • इनकी बस्तियाँ सहराना और गाँव सहरोल कहलाते हैं, फला सबसे छोटी इकाई है; तीन-स्तरीय पंचायत तंत्र गाँव-स्तरीय पंचताई से शुरू होकर 11 गाँवों की एकादसिया और फिर 84 गाँवों की सबसे बड़ी पंचायत चौरासिया तक जाता है — जो आमतौर पर सीताबाड़ी स्थित वाल्मीकि मंदिर में मिलती है — और परिवारों व गाँवों के विवाद सुलझाती है।

🎨सहरिया — रीति-रिवाज, वेशभूषा व मेले

  • कोडिया देवी को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है, तेजाजी व भैरव को लोकदेवता माना जाता है, और वाल्मीकिजी को इनका आदिगुरु व कुलदेवता माना जाता है; कपिलधारा मेला बाराँ जिले में कार्तिक पूर्णिमा को लगता है, और सीताबाड़ी में ज्येष्ठ अमावस्या को लगने वाला सीताबाड़ी का मेला 'सहरियों का कुंभ' कहलाता है।
  • विशिष्ट रीति-रिवाजों में भीख माँगने पर प्रतिबंध, बेटी के जन्म को शुभ मानना, पुरुषों में गोदना (टैटू) की मनाही, तथा दहेज प्रथा व माता-पिता की संपत्ति में बेटी के अधिकार दोनों का अभाव शामिल है; इसके बजाय बेटी के पिता को दापा नामक वधू-मूल्य प्राप्त होता है।
  • सहरिया पुरुष सलुका (अँगरखी), खपटा (साफा) व पंछा (धोती) पहनते हैं, जबकि विवाहित स्त्रियाँ रेजा वस्त्र धारण करती हैं; महिलाओं के आभूषणों में बोर/रखड़ी, गुटीजेला, लौंग, कर्णफूल/झेला व बिछिया (पैर की अंगूठी) शामिल हैं, जिसे विधवा स्त्रियाँ नहीं पहनतीं।
  • फाग व राई नृत्य होली के अवसर पर होते हैं, लेंगी मकर संक्रांति पर खेला जाने वाला डंडों का खेल है, और हिंडा दीपावली पर गाया जाने वाला गीत है; क्षेत्र की अन्य जनजातियों से अलग, सहरिया उत्सवों में पुरुष व स्त्रियाँ साथ मिलकर नृत्य नहीं करते।

🪔कथौड़ी — समाज व रीति-रिवाज

  • कथौड़ी उदयपुर जिले की कोटड़ा व झाड़ोल पंचायत समितियों के अलावा सराड़ा (सलूम्बर), डूँगरपुर, बाराँ व झालावाड़ में निवास करते हैं; महाराष्ट्र को इनका मूल निवास माना जाता है, जहाँ इन्हें कतकरी नाम से जाना जाता है, और 2011 की जनगणना में इनकी कुल जनसंख्या मात्र 4,833 दर्ज हुई, जिसमें से अधिकांश उदयपुर में हैं।
  • इनका नाम कत्था (कैटेच्यू) बनाने में इनकी पारंपरिक दक्षता से पड़ा है; ये घास-फूस, पत्तों व बाँसों से बने खोलरा नामक झोंपड़ों में रहते हैं, स्त्रियाँ मराठी अंदाज की फड़का साड़ी पहनती हैं, और समुदाय के मुखिया को नायक या भोपा कहा जाता है।
  • परिवार एकाकी व पितृवंशीय होते हैं, और इनकी बोली मराठी, गुजराती व मेवाड़ी का मिश्रण है; इनका विवाह मंडप साल्दी वृक्ष की चार लकड़ियों से बनता है जिसे जामुन के पत्तों से सजाया जाता है, और विवाह होते ही व्यक्ति अपने मूल परिवार से अलग हो जाता है।
  • वर पक्ष द्वारा गाँव में विवाह की घोषणा को बोल-पेन कहा जाता है, विवाह-पूर्व की छोटी रस्म नानी-पेन और पूर्ण विवाह मोटी-पेन कहलाता है; यदि वर पूरा वधू-मूल्य नहीं चुका सकता तो वह पेन-भरला नामक छोटी राशि देकर वधू को घर ले आता है और शेष राशि बाद में चुकाता है।

🎋डामोर जनजाति

  • डामोर मुख्यतः डूँगरपुर जिले की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में बसे हैं — जिसे इसी सघनता के कारण डामरिया क्षेत्र कहा जाता है — इसके अलावा बाँसवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़, राजसमंद व कई अन्य जिलों में भी निवास करते हैं; ये अपनी उत्पत्ति राजपूतों से मानते हैं, और 2011 में इनकी जनसंख्या 91.5 हजार थी।
  • टापरे इनके कच्चे मकान हैं और मुखी समुदाय पंचायत का प्रधान होता है; कृषि इनका मुख्य व्यवसाय है, और दिलचस्प यह है कि डामोर पुरुष भी महिलाओं जैसे ही आभूषण पहनते हैं।
  • चाड़िया होली के अवसर पर आयोजित किया जाने वाला कार्यक्रम है, और इनके पूजित देवी-देवताओं में केसरिया जी, कुबेरजी, डाकौर जी, कालकामाता व हनुमान जी शामिल हैं।
  • डामोर के प्रमुख मेलों में छैला बावजी का मेला (पंचमहल, गुजरात), ग्यारस की रैवाड़ी का मेला व बेणेश्वर का मेला शामिल हैं, जिनमें से अंतिम दो डूँगरपुर में लगते हैं।
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घुमन्तू एवं अन्य लोक समुदाय

Nomadic & Other Folk Communities

अधिसूचित जनजातियों के अलावा राजस्थान के सांस्कृतिक ताने-बाने में घुमन्तू व अर्ध-घुमन्तू जातियाँ भी बुनी हुई हैं — सपेरे, कठपुतली कलाकार, ऊँट पालक और भी बहुत कुछ — जिनमें से हर एक की अपनी कला व परंपरा है।

🏕️कंजर जाति

  • कंजर बूँदी, कोटा, बाराँ, झालावाड़, भीलवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, टोंक, अजमेर व अलवर में निवास करते हैं; इनका नाम संस्कृत के 'काननचार' से बना है, जिसका अर्थ जंगल में विचरण करने वाला है, और पटेल इस जाति का मुखिया होता है।
  • पाती माँगना अपने पारंपरिक पेशे पर निकलने से पूर्व ईश्वर का आशीर्वाद लेने की रस्म है; हनुमानजी इनके आराध्य देव हैं, जबकि चौथमाता व रक्तदंतिका माता (सातूर, बूँदी) आराध्य देवियाँ हैं, और जोगणिया माता (भीलवाड़ा) को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
  • कंजरों की मान्यता है कि हाकम राजा का प्याला पीने के बाद कोई भी झूठ नहीं बोल सकता, इसलिए इसे सत्य-शपथ की तरह प्रयोग किया जाता है; समुदाय अपने मृतकों को जलाने के बजाय दफनाता है, और पारंपरिक रूप से घरों के दरवाजे बंद नहीं रखता।
  • चकरी व धाकड़ इस जाति के प्रमुख नृत्य हैं, और खूसनी वह परिधान है जिसे कंजर महिलाएँ परंपरागत रूप से कमर पर पहनती हैं।

🐎साँसी जाति

  • साँसी एक घुमन्तू जाति है जो अपनी उत्पत्ति सांसमल नामक व्यक्ति से मानती है, यह मुख्यतः भरतपुर व डीग जिलों के साथ-साथ बीकानेर, जोधपुर, झुंझुनूँ, गंगानगर, हनुमानगढ़ व चूरू में पाई जाती है, और इसकी जनसंख्या 86,524 है।
  • कूकड़ी रस्म के अंतर्गत विवाह के बाद कन्या के चरित्र की परीक्षा ली जाती है; इस जाति में विधवा विवाह प्रचलित नहीं है, और इसके उपवर्गों में बीजा तथा माला/मावा शामिल हैं।
  • भाखर बावजी को साँसी जाति के आराध्य संरक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है।

🐍कालबेलिया जाति

  • पारंपरिक रूप से साँप पालने वाली इस जाति के लोग अजमेर, पाली, जोधपुर, भीलवाड़ा व उदयपुर में पाए जाते हैं, और साँप-बिच्छू के डसने पर जहर उतारने वाली जड़ी-बूटियाँ भी उपलब्ध कराते हैं; कालबेलिया नृत्य की सुविख्यात नृत्यांगना गुलाबो इसी समुदाय से हैं।
  • इनके नृत्य के साथ बीन, डफ व पूँगी जैसे वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, और इसमें इंडोणी, टाँकरिया, पणिहारी व बागड़िया जैसी शैलियाँ शामिल हैं।

🎪नट जाति

  • नट जाति विशेष रूप से कठपुतली नृत्य के लिए प्रसिद्ध है और मुख्यतः अलवर, जोधपुर, जयपुर, पाली, टोंक, भीलवाड़ा व अजमेर में पाई जाती है, जबकि कठपुतली नट मारवाड़, कुचामन, परबतसर व मेवाड़ क्षेत्र में केंद्रित हैं।
  • ये परंपरागत रूप से गाँव-गाँव घूमकर कठपुतली प्रदर्शन से आजीविका कमाते थे — हालाँकि अब कई परिवार स्थायी रूप से बस गए हैं — और गायन कला में भी दक्ष हैं।

🐫अन्य लोक व घुमन्तू समुदाय

  • रायका जाति का पारंपरिक व्यवसाय ऊँट पालन है, और ये हर वर्ष अक्टूबर में अपने पशुओं के साथ चराई के लिए निकलते हैं; गोडवार रायका इसके बजाय भेड़-बकरी पालन में विशेषज्ञ हैं, जबकि मारू रायका — जिनकी बस्तियाँ ढाणी कहलाती हैं — भी ऊँट पालन से जुड़े हैं।
  • थोरी, नायक व बोलिया राजस्थान के परंपरागत शिकारी समुदायों में गिने जाते हैं, जबकि बंजारे राज्य के गाँवों में पाया जाने वाला चरवाहों का एक विख्यात घुमन्तू समूह हैं।
  • चोखला किसी विशेष क्षेत्र के आदिवासी गाँवों के समूह को कहते हैं, हलमा सामुदायिक सहयोग (श्रमदान) की परंपरा है, और केरी भाँत आदिवासी महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली ओढ़नी की एक विशेष शैली है।
  • चरी नृत्य गुर्जर जाति से जुड़ा लोकनृत्य है, और तेरहताली नृत्य कामड़ जाति से जुड़ा है।

🏛️जनजाति विकास संस्थाएँ व दिवस

  • माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना 2 जनवरी 1964 को उदयपुर में हुई और यह करियर-मार्गदर्शक पत्रिका 'तूणीर' प्रकाशित करता है, जबकि राजस्थान जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ की स्थापना भी उदयपुर में, वर्ष 1975 में हुई।
  • गोविन्द गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय बाँसवाड़ा में स्थित है, और उदयपुर राज्य की प्रथम जनजाति हॉकी अकादमी का घर है, जिसका शुभारंभ 9 अगस्त 2021 को हुआ।
  • परावर्तित क्षेत्र विकास उपागम (MADA) की शुरुआत 1978-79 में हुई, और राष्ट्रीय आदिवासी भील सम्मेलन जून 2010 में उदयपुर में आयोजित हुआ; कालीबाई भील मेधावी छात्रा निःशुल्क स्कूटी वितरण योजना जनजाति क्षेत्र की मेधावी छात्राओं को निःशुल्क स्कूटी उपलब्ध कराती है।
  • विश्व आदिवासी दिवस प्रतिवर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है, और 15 नवंबर — भगवान बिरसा मुण्डा का जन्मदिवस — को जनजातीय समुदाय गौरव दिवस के रूप में मनाता है।