राजस्थानी वेशभूषा, आभूषण, खान-पान एवं रीति-रिवाज
Dress, Ornaments, Cuisine, Customs & Traditions of Rajasthan
राजस्थान की वेशभूषा, आभूषण, स्वादिष्ट खान-पान और सदियों पुरानी रस्मों-रिवाजों की झलक — जहाँ हर वस्त्र, हर गहना और हर प्रथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान बयाँ करती है।
वस्त्र एवं पगड़ी परंपरा
राजस्थान की धरती पर वस्त्र सिर्फ शरीर ढकने का साधन नहीं, बल्कि जाति, अवसर और ऋतु की पहचान भी हैं — हर कपड़े और हर पगड़ी के पीछे एक कहानी छुपी है।
🧥पुरुषों के परम्परागत वस्त्र
- सिर ढकने के लिए पगड़ी, पाग, पेंचा, बागा या साफा पहना जाता है, जो प्रतिष्ठा का प्रतीक भी माना जाता है — विवाह में मोठड़े की, सावन में लहरिये की और होली पर फूल-पत्ती छपाई वाली पगड़ी बाँधने की परम्परा है।
- अँगरखी या अँगरखा शरीर के ऊपरी हिस्से का वस्त्र है, जिसे क्षेत्र के अनुसार बुगतरी, तनसुख, दुताई, गाबा, मिरजाई, डोंढ़ी या डगला जैसे कई नामों से पुकारा जाता है, और इसका ही आगे चलकर विकसित रूप अचकन कहलाया।
- कमर पर सफेद धोती पहनी जाती है, जबकि अँगरखी के ऊपर चुगा या चोगा (कश्मीर में 'फिरन') ओढ़ा जाता है और नीचे पायजामा या तंग बिरजस/ब्रीचेस पहना जाता है; जामा एक ऐसा ऊपरी वस्त्र है जिसमें चोली जैसा ऊपरी भाग और घुटनों तक घेरदार निचला हिस्सा जुड़ा रहता है।
- ठंड से बचाव के लिए ऊनी पछेवड़ा या घूघी ओढ़ी जाती है, जामे-अँगरखी के ऊपर तलवार-कटार खोंसने हेतु कमरबंद या पटका बाँधा जाता है, और कड़ाके की सर्दी में आतमसुख (कश्मीरी फिरन के समान) पहना जाता है, जबकि शिकार के समय पुराने समय में खाकी रंग का अमोवा प्रयोग होता था।
👗स्त्रियों के परम्परागत वस्त्र
- कुर्ती और काँचली शरीर के ऊपरी भाग को ढकते हैं, जबकि कमर से एड़ी तक पहना जाने वाला घेरदार घाघरा कई कलियाँ जोड़कर सिला जाता है।
- कुर्ती-काँचली और घाघरे के ऊपर ओढ़नी, लूगड़ी या साड़ी ओढ़ी जाती है; इसके पोमचा, लहरिया, चुनरी, मोठड़ा व धनक जैसे प्रकार लोकप्रिय हैं — पीला पोमचा प्रसव के बाद और लहरिया विशेष रूप से सावन में तीज पर पहना जाता है, जबकि आड़ी-तिरछी कटती लहरिया धारियों को मोठड़ा कहा जाता है।
- जोबनेर की फूल-पत्ती वाली साड़ी और सवाईमाधोपुर के पक्के काले दुपट्टों पर छपी 'सूंठ की साड़ियाँ' अपनी छपाई के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि तिलका मुस्लिम स्त्रियों की पारम्परिक पोशाक है।
- पेशवाज सिर से पैर तक पूरे शरीर को ढकने वाली पोशाक है जिसे चोली और स्कर्ट के साथ पहना जाता है, और इसके नीचे सलवार या इजर (जो कमर पर इजारबंद डोरी से बाँधी जाती है) पहनी जाती थी।
🌿आदिवासी वेशभूषा
- आदिवासी पुरुष सिर पर अँगोछा (विशेषकर केरी भाँत का) बाँधते हैं, तंग धोती को ढेपाड़ा और कमर की लँगोटी को खोयतू कहा जाता है; सहरिया समुदाय में साफे को खपटा और अँगरखी को सलूका के नाम से जाना जाता है।
- आदिवासी स्त्रियों की ओढ़नियों में हर छपाई की अपनी पहचान है — विवाह में लाल जमीन पर बेल-बूटी वाली जामसाई, नीले रंग की सबसे पुरानी नान्दणा, अविवाहित युवतियों की पावली-भाँत कटकी, और विवाहित स्त्रियों की सफेद जमीन पर लाल बूटों वाली लुगड़ा (अँगोछा साड़ी) पहनी जाती है।
- अन्य लोकप्रिय ओढ़नी-छपाइयों में तीज पर पहनी जाने वाली लहर भाँत, केरी की आकृति वाली केरी भाँत, तारों जैसी अष्टकोणीय आकृति वाली तारा भाँत और मारवाड़ की कढ़ाईदार लाल दामड़ी/दामणी शामिल हैं; शरद ऋतु में खेस, शाल व पामड़ी कंधे पर डाले जाते हैं।
- आदिवासी स्त्रियों का घुटने तक का घाघरा कछावू कहलाता है, और भील स्त्रियों की चूनड़ में कत्थई-लाल जमीन पर सफेद बिंदियाँ होती हैं; साड़ी के लिए क्षेत्र-दर-क्षेत्र चोल, निचोल, दुकूल, चूँदड़ी व धोरखाली जैसे कई नाम प्रचलित रहे हैं।
👳पगड़ी की परम्पराएँ
- पगड़ी हर त्योहार और ऋतु के अनुसार बदलती है — तीज पर लहरिया, दशहरे पर मदील, होली पर सफेद-पीली, वर्षा में हरी-कसूमल, सर्दी में कसुम्बी और गर्मी में केसरिया पाग बाँधी जाती है, जबकि शोक के अवसर पर सफेद साफा पहना जाता है।
- मेवाड़ में हर महाराणा के शासनकाल की अपनी पगड़ी रही — उदयसिंह के समय उदयशाही, अमरसिंह द्वितीय के समय अमरशाही, भीमसिंह के समय भीमशाही; महाराणा की पगड़ी बाँधने वाले व्यक्ति को छाबदार कहा जाता था, जबकि जोधपुरी साफा महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय के काल में प्रचलन में आया।
- पगड़ियों के कई शाही नाम प्रचलित रहे हैं जैसे चूँड़वतशाही, जसवंतशाही, राठौड़ी, हमीरशाही, विजयशाही व शाहजहानी; जोधपुर में तखतेशाही पगड़ी पहनी जाती है, जबकि सुनार आँटेवाली और बनजारे मोटी पट्टेदार पगड़ी बाँधते थे।
- पगड़ी को चमकाने के लिए तुर्रे, सरपेच, बालाबंदी, गोसपेच व लटकन जैसे आभूषण लगाए जाते थे, और यह गौरव व प्रतिष्ठा का प्रमुख प्रतीक मानी जाती थी; उच्च व धनी वर्ग में चीरा और फेंटा भी प्रचलित रहे, जबकि जोधपुर में चूँदड़ी का साफा बहुतायत से पहना जाता है।
🔶चूड़ियों की परम्परा
- लाख से बनी चूड़ियों में पाटला, गोखरू, लहरिया, मोठला, मेथी का चूड़ा व गठिया चूड़ा जैसे कई प्रकार प्रचलित हैं; सादा लाल पड़ला चूड़ा (जिसे हींगल या सुहाग का चूड़ा भी कहते हैं) दुल्हन के संपूर्ण ससुराल-प्रदत्त पहनावे — बरी-पड़ला — के साथ आता है।
- श्रावण में तीज पर नवविवाहिताएँ सफेद-लाल-नीली-पीली तिरछी धारियों वाला लहरिया चूड़ा पहनती हैं, और मकर संक्रांति पर महिलाएँ ब्राह्मणी व कुँवारी कन्याओं को सादा पड़ला चूड़ा भेंट करती हैं।
- कोटा-बूँदी में चार बंद का सेट चौबन्दा और भीलवाड़ा-अजमेर-जोधपुर में पाँच बंद का सेट पंचबन्दा कहलाता है; उदयपुर की आदिवासी स्त्रियाँ विवाह में चाँदी का पाट का चूड़ा (जरपोई) पहनती हैं, जबकि कुँवारी कन्याएँ वन्य चूड़ा धारण करती हैं।
- अलग-अलग समुदायों में चूड़ी की भी अपनी पहचान है — गुर्जर स्त्रियाँ तीन लड़ा और जैन स्त्रियाँ गजरा पहनती हैं, उदयपुर क्षेत्र में कटीर का चूड़ा प्रचलित है; बरगद-पीपल की लाख सर्वोत्तम मानी जाती है और इसका काम करने वाले कारीगर लखेरे (लखारे) कहलाते हैं।
छपाई, बंधेज एवं गोटा कला
रंग, बंधन और चमक — राजस्थान की छपाई, बंधेज और गोटा कला ने वस्त्रों को कला के दर्जे तक पहुँचा दिया है, और हर शहर का अपना खास हुनर है।
🖌️छपाई एवं रंगाई तकनीकें
- कटार छींट के कपड़े से मुख्यतः घाघरे बनते हैं और कुम्हार, चौधरी, राइका, मेघवाल व विश्नोई समुदायों की स्त्रियों में यह विशेष रूप से प्रचलित है; बालोतरा की कटारछींट अपनी बनावट के लिए प्रसिद्ध है।
- बंधेज तकनीक में कपड़े को बाँधकर रंग को रुकने दिया जाता है, और 'खत' व 'बूँद' की बँधाई के अनुसार अलग-अलग अलंकरण उभरते हैं; लहरिया आड़ी धारियों में रंगा कपड़ा है, जिसकी खंजरीनुमा धारियों को गंडादर कहा जाता है — जयपुर का 'समुद्र लहर' लहरिया ओढ़नी और पगड़ी दोनों के रूप में प्रयुक्त होता है।
- पोमचा कमल पुष्प का भाव लिए ओढ़नी है, जो लाल-गुलाबी या लाल-पीले रंगों में रँगी जाती है; बच्चे के जन्म पर पीहर से लाल पल्लू वाला पीला पोमचा भेजा जाता है, जिसे 'पीला' कहा जाता है।
- दाबू छपाई में जिन जगहों पर रंग नहीं चढ़ाना हो वहाँ मोम, मिट्टी या गेहूँ के बीजाण (चोकर) से ढककर रोका जाता है — सवाईमाधोपुर में मोम, बालोतरा में मिट्टी और बगरू-साँगानेर में चोकर का दाबू प्रयुक्त होता है; चित्तौड़गढ़ का अकोला दाबू प्रिंट के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
📍बंधेज एवं छपाई के केंद्र
- बंधेज के प्रमुख केंद्र जोधपुर व जयपुर हैं, और चूरू, नागौर, शेखावाटी, बगरू, सुजानगढ़, रतनगढ़ व बीकानेर में भी यह कार्य होता है; जोधपुरी बंधेज मुख्यतः चढ़वा समुदाय के मुसलमान करते हैं और माना जाता है कि यह कला मुल्तान से मारवाड़ पहुँची।
- जयपुर जिले के बगरू व साँगानेर कस्बे रंगाई-छपाई के लिए विशेष ख्याति रखते हैं — साँगानेर की पहचान सफेद-हल्के रंगों पर बारीक बूटियाँ रही है (अब मुख्यतः काला-लाल), जबकि बगरू में मूलतः स्याह-बेगू व हरे-नीले रंगों की मैण की छपाई होती थी।
- शेखावाटी में सीकर बंधेज का मुख्य केंद्र है, जहाँ की तिबारी बंधेज व चौपड़ चुनरी प्रसिद्ध हैं; अलवर दोरुखी (दोनों तरफ की) रंगाई तथा असली-नकली जरी वाले पल्लूदार साफों के लिए जाना जाता है।
- लोकोक्ति के अनुसार राजस्थान में उपजने वाले तीन रत्नों में ढोला, मारवण और कसूमल रंग गिने जाते हैं, जहाँ कसूमल रंग का अभिप्राय लाल रंग से है; फड़, बंधेज व अजरख वस्त्र-चित्रण कलमकारी कला के प्रमुख उदाहरण हैं, और जोधपुरी कोट-पेंट को राजस्थान की राष्ट्रीय पोशाक का दर्जा मिला हुआ है।
✨गोटा शिल्प
- लप्पा में ताना सूत का और बाना बादले (धातु के तार) का होता है, जिससे बुनाई में ही अलंकरण उभरता है; इसका संकरा रूप लप्पी कहलाता है, और पहले खंडेला (सीकर) व भिनाय (अजमेर) गोटा निर्माण के प्रमुख केंद्र थे।
- गोटे के अनेक प्रकार प्रचलित हैं जैसे गोटा-किनारी, लप्पा-लप्पी, नक्शी, बादले, मुकेश, गंगाजमनी गोटा व चाँदतारा; बिजिया (गोटे के फूल) से बनी बेल को चम्पाकली कहते हैं, और आम की दौड़, मीनाकारी की बेल व कूण्याँ जैसी विधियों से इसे कपड़े पर लगाया जाता है।
- बंधेज की प्रसिद्ध ओढ़नियों में पहाड़ के आकार की डूँगरशाही, बीच में बड़े गोल डिजायन वाली लड्डू-जलेबी लहरिया, मोठड़ा व सतरंगी चुनरी, जोधपुर का फागणिया और जयपुर का पचरंगी साफा-मोठड़ा शामिल हैं।
आभूषण एवं शृंगार
सिर से पैर तक — राजस्थानी आभूषणों की शब्दावली इतनी विशाल है कि हर अंग, हर समुदाय और यहाँ तक कि ऊँट के शृंगार का भी अपना अलग नाम है।
🏺आभूषणों का इतिहास
- आभूषण का शाब्दिक अर्थ है गहना या अलंकार, जिसे स्त्री-पुरुष दोनों शरीर को सुंदर व आकर्षक बनाने हेतु पहनते हैं।
- कालीबंगा व आहड़ सभ्यता के युग में स्त्रियाँ मिट्टी व चमकीले पत्थरों की मणियों के आभूषण तथा हाथी दाँत से बने गहने पहनती थीं; आज सोना, चाँदी व ताँबे से बने आभूषणों का चलन है।
👂सिर, नाक व कान के आभूषण
- स्त्रियों के सिर व मस्तक पर बोर/बोरला, शीशफूल, रखड़ी, टीका, मोर-पट्टा व माँगटीको जैसे आभूषण सजते हैं, जिनमें से बोरला माथे के बीचोंबीच पहना जाने वाला सबसे विशिष्ट आभूषण है।
- नाक के आभूषणों में नथ, लौंग, काँटा, बेसर व बुलाक प्रमुख हैं; कान के ऊपरी हिस्से में पहनी जाने वाली सोने-चाँदी की लटकन ओगनियौ (या पीपळपतियौ) कहलाती है, और परंपरा के अनुसार एक कान में तीन-तीन ओगनियौ पहने जाते हैं।
- कान के अन्य लोकप्रिय आभूषणों में झुमका, बाली, कर्णफूल, चंपाकली व मुरकी शामिल हैं; कर्णफूल कान की निचली लौ में पहना जाने वाला पुष्पाकार आभूषण है, जिसके मध्य में नगीना जड़ा होता है और पीछे कील से इसे कान के छेद में टिकाया जाता है।
📿गले, बाजू व कमर के आभूषण
- गले व छाती के आभूषणों में हांसली/हँसुली, चंपाकली, कंठी, हार, मंगलसूत्र व चंद्रहार जैसे नाम शामिल हैं; चंपाकली में चंपा की कली के आकार के सोने के दाने जंजीर या रेशमी धागे में गूँथे जाते हैं।
- बाजू व हाथ के आभूषणों में बाजूबंद, कड़ा, चूड़ियाँ, गजरा, गोखरू व नवरतन जैसे नाम प्रचलित हैं, जबकि अँगुलियों में अँगूठी/मूंदड़ी, छल्ला व पवित्री पहनी जाती है।
- कमर का प्रमुख आभूषण करधनी (या कंदोरा, मेखला) है, जो कमर को चारों ओर से घेरता है — इसे कटि प्रदेश का प्रमुख गहना माना जाता है।
🦶पैर, पंजे व दाँत के आभूषण
- पैरों में कड़ा, पायल, पायजेब, झाँझर व नेवरी जैसे आभूषण पहने जाते हैं, जबकि पंजे की उँगलियों में बीछिया, अँगूठा व फूलिया जैसे छल्ले सजाए जाते हैं।
- दक्षिणी राजस्थान की आदिवासी स्त्रियाँ पैर में तीन परतों में आभूषण पहनती हैं — सबसे नीचे पागड़ा, उसके ऊपर पींजणी और सबसे ऊपर बाजणा।
- स्त्रियों के दाँत के आभूषण भी प्रचलन में रहे हैं, जिनमें रखन, चूप, धाँस व मेख शामिल हैं — यह भारत के अपेक्षाकृत कम-प्रचलित आभूषण-रीति-रिवाजों में से एक है।
🤴पुरुषों के आभूषण
- पुरुष सिर व पगड़ी पर कलंगी, तुर्रा, सिरपेच व रतनपेच जैसे आभूषण सजाते थे, जबकि कान में मुरकियाँ व लौंग तथा हाथ में बाजूबंद, कड़ा व तड्डा पहने जाते थे।
- पुरुष कमर पर चौथ व कमरसाल तथा अँगुलियों में अंगूठी व मुद्दड़िया पहनते थे, और गले में दोरा, गोप व गलसर जैसे आभूषण भी प्रचलित थे।
🪶सहरिया जनजाति के आभूषण
- सहरिया समुदाय की स्त्रियाँ माथे पर बोरला, गले में खुंगारी-खुंगाळी, हाथ से बनी बजन्टी (मूँगों का हार), कानों में टोकली, कमर में करधनी तथा पैर-हाथों में ग्रामखजूरा पहनती हैं, और नाक में काँटा, अँगूठी व बिछ्वे धारण करती हैं।
- सहरिया स्त्रियों को गोदना (टैटू) गुदवाना अत्यंत प्रिय है, और वे माथे पर दोनों भौंहों के बीच बिन्दी (टंटूला) गुदवाती हैं — यह उनकी सांस्कृतिक पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
🐫ऊँट का शृंगार
- ऊँट के गले में कलात्मक ढंग से सजाया गया गोरबन्द झूलता है, जिसके साथ झालरिया आगे की सजावट जोड़ती है, जबकि मोहरा तंग व कमरबंद के साथ मुँह की सजावट में प्रयुक्त होता है।
- पीठ पर रखा जाने वाला पलाण (काठी) पड़छी की गद्दी पर टिका होता है, और उसके नीचे मेल-खुरी, सिंघाड़ा व चेवती जैसी कई परतें ऊँट की असमान पीठ को बैठने योग्य बनाती हैं; टाँगों पर नेवाट (गोडिया/सरिया) और पूँछ पर पर्चंनी की सजावट होती है।
👞जूते-चप्पल एवं हस्तकला
- जयपुर की नागरा जूती जरी-रेशम की कढ़ाई के लिए मशहूर है — शुद्ध रेशमी कढ़ाई वाली लाल जोड़ी को बिनोटा कहा जाता है और नवविवाहितों को भेंट की जाती है, जबकि जोधपुर क्षेत्र में इसे सलीमशाही जूती कहते हैं।
- पुराने समय में खल्फक, खपुशा, बागुर व कोशा जैसे विशेष जूते पहने जाते थे, जिनमें से कुछ पैर की उँगलियों और नाखूनों तक की सुरक्षा करते थे; जंघा जूता पूरी जाँघ ढकता था, और अर्द्ध जंघा उसका आधा रूप था।
- जालौर के हरजी व थाँवला गाँवों के कुम्हार मिट्टी से मामाजी के घोड़े बनाने में विशेष रूप से निपुण माने जाते हैं, और उदयपुर क्षेत्र में सिकलीघर परिवार तलवार-कटार जैसे हथियारों पर सोने-चाँदी के तार जड़ने की तारकशी कला करता है — यह कला मूलतः ईरान से भारत आई थी।
- दक्षिणी व दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में सोम्पुरा समुदाय पत्थर व मिट्टी की मूर्तियाँ गढ़ता है, चूरू में जांगिड़ परिवार चंदन की लकड़ी पर नक्काशी करता है, और बाजू मण्डाई भवनों की बाहरी दीवारों पर की जाने वाली रंगीन चित्रकारी है।
राजस्थान का खान-पान
राजस्थान की थाली उसके रेगिस्तानी भूगोल की कहानी कहती है — बाजरे-मक्के की रोटी से लेकर घेवर की मिठास तक, हर व्यंजन में यहाँ की मिट्टी का स्वाद बसा है।
🌾दैनिक खान-पान की परम्परा
- राजस्थान में शाकाहारी व मांसाहारी दोनों तरह के भोजन का प्रचलन रहा है, और यहाँ के लोग स्वादिष्ट भोजन के शौकीन तथा मेहमाननवाजी के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।
- शहरी परिवार परम्परागत रूप से गेहूँ, बाजरा, मक्का, जौ, चावल, दाल-सब्जी, दूध-दही-छाछ, हलवा-मिठाई, जलेबी, पापड़ और केर-सांगरी व नींबू-आम के अचार का सेवन करते रहे हैं, और समय के साथ लहसुन-प्याज-मिर्च का उपयोग भी बढ़ता गया।
- ग्रामीण क्षेत्रों में बाजरे, बेजड़ (जौ-चना) व गो-चनी (गेहूँ-चना) के आटे की रोटी दही-दूध व मौसमी सब्जी के साथ खाई जाती रही है; प्याज-बाजरा-जौ की रोटी गरीब ग्रामीणों का सामान्य भोजन रही है, जबकि मरु प्रदेश में बाजरे-छाछ से बनी राबड़ी विशेष रूप से लोकप्रिय है।
- चावल राजस्थान में सीमित मात्रा में उपजता है फिर भी पूरे राज्य में इसका उपयोग होता है, और भोजन के बाद पान, सुपारी, सौंफ व खाटा-चूरी खाने की प्रथा पूरे राज्य में देखी जाती है।
🎉त्योहारी एवं मौसमी व्यंजन
- गेहूँ के दलिये से बनी लापसी राजस्थान का प्रमुख त्योहारी व्यंजन है, जो दीवाली, होली व दशहरे पर परोसी जाती है, और इसमें गुड़ मिलाना शुभ माना जाता है; बाजरे की भरपूर पैदावार के चलते अक्षय तृतीया पर हर गाँव-शहर में बाजरी-मोठ की खीचड़ी/खीचड़ा खाई जाती है, जो सर्दी में विशेष लाभदायक मानी जाती है।
- मध्यकालीन राजस्थान में मुगल प्रभाव से अकबरी जलेबी, खुरासानी खिचड़ी, बाबर बड़ी, पकौड़ी व मँगौड़ी जैसे व्यंजन लोकप्रिय हुए, जिन्हें शाकाहारी व मांसाहारी दोनों बड़े चाव से खाते थे।
- सर्दियों में राज्य के दक्षिणी भाग में हाजिया, ढोकले, मक्की की पापड़ी व गुड़राब खाए जाते हैं, और मक्का की भरपूर पैदावार के चलते वहाँ की ग्रामीण रसोई में मक्का की रोटी व मक्का की राबड़ी का विशेष चलन है।
- पश्चिमी राजस्थान की मरुभूमि में काचरी, कंकोड़े, कैर-सांगरी, गूँदा, ग्वारफली, बेसन की कढ़ी व गट्टे जैसी विशेष सब्जियाँ बनाई जाती हैं, जो यहाँ के शुष्क मौसम में मिलने वाली फसलों से तैयार होती हैं।
🍮प्रसिद्ध क्षेत्रीय व्यंजन
- दाल-बाटी-चूरमा राजस्थान का सबसे प्रतिष्ठित व्यंजन है और देशभर में प्रसिद्ध है; बाटी अब सादी, बाफला व मसालेदार जैसे कई रूपों में मिलती है, जबकि चूरमा गेहूँ, बेसन व बाजरे सहित कई आटों से बनाया जाता है।
- शहर-दर-शहर मिठाई की अपनी पहचान है — बीकानेर के रसगुल्ले व भुजिया-पापड़ (जिनका खास नमकीन स्वाद वहाँ के पानी को दिया जाता है), जोधपुर की मावे की कचौरी व मिर्ची बड़े, जयपुर का घेवर, अजमेर का सोहन हलवा और अलवर का मिल्क केक व कलाकंद।
- राजपूत समाज में उत्सवों के अवसर पर नाचने-गाने वाले बाजेदारों को कसुंबा पिलाने की रीति रही है, और घेवर विशेष रूप से तीज व रक्षाबंधन पर बनाया जाता है, जिसमें जयपुर का घेवर देशभर में मशहूर है।
📖भोजन संबंधी शब्दावली
- शाकाहारी भोजन के लिए निरामिश और मांसाहारी भोजन के लिए आमिष शब्द प्रयुक्त होता है; सुबह के भोजन को कलेवा, शाम के भोजन को ब्यालू और दोपहर के भोजन को भाता, रोट या दोपेर्या कहा जाता है।
- पश्चिमी राजस्थान में मोटी बाजरा रोटी को सोगरा और मोटी गेहूँ रोटी को टिक्कड़-टुक्कड़ कहा जाता है, जबकि रुखे आटे को पानी में गाढ़ा पकाकर घी के साथ खाए जाने वाले व्यंजन को खीच कहते हैं।
- साँझ के बाद सौंफ पर कत्था-चीनी चढ़ाकर बनाई गई चूरी और खट्टे-मीठे पाचक टुकड़ों को खाटा कहते हैं — सरदारशहर की खाटा-चूरी विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
रीति-रिवाज, प्रथाएँ एवं संस्कार
जन्म से मृत्यु तक — राजस्थान की सामाजिक प्रथाओं में गौरवशाली वीरता की गाथाएँ भी हैं और वे कुरीतियाँ भी, जिनके विरुद्ध लंबा सुधार आंदोलन चला।
⚔️वीरता व बलिदान: केसरिया व जौहर
- हार निश्चित होने पर राजपूत योद्धा पलायन या समर्पण के बजाय केसरिया वस्त्र धारण कर दुर्ग के द्वार से भूखे सिंह की भाँति शत्रु पर टूट पड़ते और वीरगति को प्राप्त होते थे — इसे केसरिया करना कहा जाता था।
- जौहर प्रथा के अंतर्गत युद्ध हारने की आशंका होने पर स्त्रियाँ अपने शील की रक्षा हेतु दुर्ग के भीतर प्रज्ज्वलित अग्निकुंड में सामूहिक रूप से कूदकर आत्मदाह कर लेती थीं, जिसे 'जौहर करना' कहा जाता था।
🔥सती प्रथा एवं उसका उन्मूलन
- सती प्रथा में पति की मृत्यु पर पत्नी उसकी चिता में जलकर मर जाती थी; मध्यकाल में यह सतीत्व-रक्षा के भाव से प्रचलित हुई पर बाद में जबरन जलाने की भयावह प्रथा बन गई, जिसका सबसे अधिक प्रचलन राजपूतों में देखा गया — इसे सहमरण, सहगमन या अन्वारोहण भी कहा जाता था।
- मोहम्मद बिन तुगलक सती प्रथा पर रोक लगाने वाला पहला शासक था, जबकि मुगलों में हुमायूँ ने सबसे पहले इसे प्रतिबंधित करने का प्रयास किया; बूँदी राजस्थान की पहली रियासत थी जिसने 1822 ई. में इसे गैर कानूनी घोषित किया, और राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 ई. में इस पर रोक लगाई।
- जब पति की मृत्यु कहीं और होने पर वहीं दाह संस्कार हो जाता था और उसकी विधवा किसी प्रतीक चिह्न के साथ या बिना चिह्न के ही चितारोहण करती थी, तो इसे अनुमरण कहा जाता था; ऐसी सतियों को 'महासती' की उपाधि दी जाती थी। राजस्थान सरकार ने 1987 में सती (रोकथाम) अधिनियम बनाया।
🚫स्त्रियों के विरुद्ध कुप्रथाएँ: कन्या वध व डाकन प्रथा
- कन्या वध, जो विशेषतः राजपूतों में प्रचलित था, में नवजात कन्या को जन्म लेते ही अफीम देकर या गला दबाकर मार दिया जाता था; हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट विलकिंसन के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिक के समय कोटा ने 1833 में और बूँदी ने 1834 में इसे गैर कानूनी घोषित किया, जबकि जयपुर ने 1849 में यह कानून बनाया।
- त्याग प्रथा में राजपूत विवाहों पर चारण, भाट व ढोली कन्या पक्ष से मुँहमाँगी दान-दक्षिणा के लिए हठ करते थे, और यह बोझ बढ़ने पर अक्सर कन्या वध का कारण बनता था; जोधपुर राज्य ने 1841 में इसे सीमित करने वाला पहला नियम बनाया।
- डाकन प्रथा में भील व मीणा जैसी जातियों में स्त्रियों पर 'डाकन' (डायन) होने का आरोप लगाकर उन्हें मार डाला जाता था। अप्रैल 1853 में मेवाड़ भील कोर के कमांडेंट जे.सी. ब्रुक ने खैरवाड़ा (उदयपुर) में इसे सबसे पहले गैर कानूनी घोषित किया, और उदयपुर महाराणा ने 22 अक्टूबर, 1853 को इसके दोषियों के लिए 6 माह कारावास का आदेश दिया।
👰बाल विवाह, दहेज एवं विधवा पुनर्विवाह सुधार
- बाल विवाह की कुप्रथा आज भी निम्न जातियों में अधिक प्रचलित है और हर वर्ष अक्षय तृतीया पर सैकड़ों बच्चों का विवाह होता है; अजमेर के हरविलास शारदा ने 1929 में बाल-विवाह निरोधक अधिनियम (शारदा एक्ट) प्रस्तावित किया, जिसे गवर्नर जनरल लॉर्ड इरविन ने 1 अप्रैल 1930 से पूरे देश में लागू किया — इससे पहले जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह ने 1885 में ही बाल विवाह प्रतिबंधक कानून बनवाया था।
- शारदा कानून में लड़की के लिए 15 व लड़के के लिए 18 वर्ष की आयु-सीमा तय थी, जिसे 1978 के संशोधन से बढ़ाकर क्रमशः 18 व 21 वर्ष कर दिया गया; बाद में भारत सरकार ने बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (पीसीएमए) पारित किया, जो 1 नवम्बर 2007 से शारदा एक्ट का स्थान लेते हुए लागू हुआ। अलवर रियासत 10 दिसम्बर 1903 को इस दिशा में कानून बनाने वाली पहली रियासत थी।
- दहेज प्रथा में वधू पक्ष विवाह की शर्त के रूप में वर पक्ष को धन या संपत्ति देता है; 1961 में दहेज निरोधक अधिनियम पारित होने के बावजूद यह समस्या आज भी विकराल रूप में बनी हुई है।
- विधवा स्त्री का जीवन परम्परागत रूप से अत्यंत कष्टसाध्य होता था। ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड डलहौजी ने 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बनाया; स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी इसका समर्थन किया, और चाँदकरण शारदा ने अपनी पुस्तक 'विधवा विवाह' के जरिये राजस्थान में इसे बढ़ावा दिया।
🔗दास प्रथा, पर्दा प्रथा एवं अन्य कुरीतियाँ
- राजस्थान में प्राचीन काल से दास प्रथा प्रचलित थी, जिसमें दास-दासी प्रायः युद्धबंदी होते थे; घरेलू दासों को गोला, दरोगा या चेला कहा जाता था और राजघरानों में इनका पृथक विभाग 'राजलोक' कहलाता था। विलियम बैंटिक ने 1832 में दास प्रथा पर रोक लगाई, और उसी वर्ष कोटा-बूँदी राजस्थान में इसे प्रतिबंधित करने वाली पहली रियासतें बनीं।
- मध्यकाल से 19वीं सदी के मध्य तक राजस्थान में स्त्रियों-बच्चों की खरीद-फरोख्त आम बात थी; जयपुर ने 16 फरवरी 1847 को इस व्यापार को अवैध घोषित किया, हालाँकि कोटा ने पहले ही 1831 में इस पर रोक लगा दी थी — बाद में भारत सरकार ने 1956 में SITA और 1986 में इसके संशोधित रूप PITA को लागू किया।
- प्राचीन भारतीय समाज में पर्दा प्रथा नहीं थी, पर मध्यकाल में विदेशी आक्रमणकारियों की कुदृष्टि से बचाव हेतु यह चलन में आई और धीरे-धीरे हिन्दू समाज की स्थायी नैतिक प्रथा बन गई — राजपूत समाज में यह विशेष रूप से कठोर थी; स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे समाज सुधारकों ने 19वीं सदी में इसका विरोध कर स्त्री शिक्षा पर बल दिया।
- डावरिया प्रथा में राजा-महाराजा व जागीरदार अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ कुछ कन्याएँ भी दे दिया करते थे, जिन्हें डावरिया कहा जाता था — यह अपने-आप में एक अलग तरह की स्त्री-विषयक कुप्रथा थी।
🤝सामुदायिक सहयोग एवं पुनर्विवाह प्रथाएँ
- नाता प्रथा के अनुसार पत्नी पति को छोड़कर किसी और पुरुष के साथ रहने लगती थी — यह मुख्यतः आदिवासी समुदायों में प्रचलित थी, और नया रिश्ता जोड़ने से पहले महिला को अपने पूर्व पति व ससुराल से सभी संबंध औपचारिक रूप से तोड़ने होते थे, जिस रस्म को फरगती/फारगती कहा जाता था।
- आदिवासियों में विधवा स्त्री के पुनर्विवाह को नातरा प्रथा (या आणा) कहा जाता है; गरासिया जनजाति में इसे आणा/नातरा करना या चुनरी ओढ़ाणा भी कहते हैं, जबकि किसी विवाहित स्त्री का प्रेमी के साथ भाग जाना खेवणा या माता विवाह कहलाता है।
- आदिवासी समाज में हलमा (या हाँडा/हीड़ा) सामुदायिक सहयोग की परंपरा है, जिसमें 'हलमा करबु है' की पुकार पर पूरा समुदाय घर बनाने या खेत जोतने जैसे कार्यों में निःस्वार्थ भाव से मदद करता है; संकट के समय 'मारूढोल' बजाकर संदेश दिया जाता है, जिससे आसपास के लोग हथियार-साधन लेकर मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं।
🌳भील व गरासिया विवाह प्रथाएँ
- भील समाज की एक अनूठी परंपरा में पीपल, साल, बाँस व सागवान के पेड़ों को साक्षी मानकर हरज व लाड़ी (वर-वधू) जीवनसाथी बनते हैं, जबकि अपहरण विवाह में लड़का-लड़की भागकर 2-3 दिन बाद लौटते हैं और गाँव वाले मिलकर विवाह को मान्यता देते हैं।
- जब कोई भील स्त्री पति को छोड़कर किसी और पुरुष के साथ चली जाती है, तो नया पति पहले पति को झगड़ा या दापा नामक क्षतिपूर्ति राशि देता है, जिसका निर्णय पंचायत करती है; तलाक देने पर भील पुरुष जाति पंचों के सामने नई साड़ी के पल्लू में रुपया बाँधकर उसे फाड़कर पत्नी को पहना देता है।
- गरासिया जनजाति में विवाह वधू मूल्य पर आधारित एक संविदा (contract) माना जाता है, जिसके तीन मुख्य प्रकार हैं — मोरबंधिया (ब्रह्म विवाह जैसा, मोड़ बाँधकर फेरे लेना), ताणना/तारणा (पंचों को वधू मूल्य चुकाकर कन्या को घर लाना) और पहरावना (ब्राह्मण के बिना नाम मात्र के फेरों से विवाह पूर्ण करना)।
- गरासियों में विवाह-खर्च बचाने के लिए वधू को सीधे वर के घर छोड़ देने की भी प्रथा रही है, और नवजात की नाल काटने की रस्म को अनाला भोर (या भू-प्रथा) कहा जाता है, जबकि कुछ गरासिया विवाहों में वर वधू के घर घर-जँवाई बनकर रहता है।
💒वैवाहिक रस्में एवं समारोह
- विवाह की तैयारी घर की महिलाओं द्वारा कुम्हार के चाक-पूजन और मांगलिक गीतों से शुरू होती है; तोरण द्वार पर सजावट के लिए पत्तों की बांदरवाल लटकाई जाती है, वर-वधू के शरीर पर हल्दी-आटे की पीठी लगाई जाती है, और वर की बरात रवाना होने से पूर्व दुल्हे का तोरण-नाश्ता होता है।
- बारात के गाँव पहुँचने पर वधू पक्ष अगवानी करता है और सासू तोरण पर दूल्हे को आँचल से बाँधती है; अग्नि के समक्ष सात फेरों में वर-वधू एक-दूसरे को सात वचन देते हैं, और कलाई पर मांगलिक कंकण-सूत्र बाँधा जाता है।
- विवाह के दूसरे दिन वर-वधू गाँव में माताजी व क्षेत्रपाल के थान पर नारियल चढ़ाते हैं, जिसे 'जात देना' कहा जाता है, और दुल्हन की झोली भरने की रस्म तथा परात में छाछ भरकर उसमें चाँदी का सिक्का ढूँढ़ने का खेल भी खेला जाता है।
- बाल-विवाह के बाद वधू के वयस्क होने पर पीहर से पुनः ससुराल भेजे जाने पर उपहार भेजे जाने की रस्म मुकलावा कहलाती है, जबकि वर-वधू की ननिहाल पक्ष से मिलने वाले वस्त्राभूषण को नैण कहा जाता है — विवाह की ऐसी अनेक छोटी-बड़ी रस्में मिलकर पूरे उत्सव को गढ़ती हैं।
🕯️मृत्यु संस्कार
- मृतक को श्मशान ले जाने वाली लकड़ी की चारपाई अरथी कहलाती है, और उसे अग्नि देने वाला बेटा (या निकट संबंधी) लांपा कहलाता है; तीसरे दिन शमशान जाकर कुछ हड्डियाँ चुनी जाती हैं, जिन्हें बाद में हरिद्वार गंगा में प्रवाहित किया जाता है।
- किसी की मृत्यु पर रखी जाने वाली तीन या बारह दिवसीय शोक-बैठक की समाप्ति को उठावणा कहते हैं, और मृत्यु के 12वें दिन मौसर भोज के बाद बड़े बेटे की पगड़ी बाँधकर परिवार की जिम्मेदारी सौंपी जाती है; इस भोज को मौसर तथा जीवित व्यक्ति के सम्मान में होने वाले भोज को औसर या नुक्ता कहा जाता है।
- यदि किसी की मृत्यु परदेश में होती है, तो सूचना मिलने पर संबंधी तालाब पर जाकर स्नान करते हैं, इसे पानीवाड़ा कहते हैं, जो मृत्यु के 9वें दिन किया जाता है; सहरिया समुदाय अस्थि-राख को सीताबाड़ी की बाणगंगा या कपिलधारा में प्रवाहित करने की प्रक्रिया को धारी संस्कार कहता है।
- गरासिया समुदाय मृत्यु-भोज को कोंधिया या मेक कहते हैं, जबकि आदिवासियों में इसे सामान्यतः कांदिया या लोकाई कहा जाता है; किसी की दुर्घटना में मृत्यु होने पर पंचों द्वारा आरोपी से वसूली गई क्षतिपूर्ति मौताणा कहलाती है, जिसके मिलने पर ही शव हटाया जाता है।
🍼जन्म एवं अन्य संस्कार
- पुत्र जन्म के दस दिन बाद शुभ मुहूर्त में महिलाएँ पारम्परिक वेशभूषा में गाजे-बाजे संग शिशु को कुएँ पर ले जाकर कुएँ का पूजन करती हैं ताकि परिवार भरा-पूरा रहे, और छठे दिन षष्ठी देवी की पूजा कर रात भर जागरण किया जाता है।
- पुत्र जन्म पर नाई शिशु के पगल्ये (शुभ समाचार) लेकर उसके ननिहाल जाता है, जिसके बदले नाना या मामा उपहार स्वरूप वस्त्राभूषण व मिठाई भेजते हैं, जिसे जामणा कहा जाता है; मांगलिक अवसरों पर गोबर से आँगन लीपने की प्रथा भी प्रचलित रही है।
- राजतिलक के दूसरे दिन नया राजा पड़ोसी शत्रु राज्य पर चढ़ाई कर उसके किसी नगर या गाँव को अपने अधीन कर लेता था, जिसे तिका दौड़ कहा जाता है, और सवामणी अनुष्ठान में 51 किलो सामग्री से दाल-बाटी-चूरमा तैयार कर देवताओं को अर्पित किया जाता है।
- नवजात शिशु के जन्म पर उसे विमलीकृत मक्खन चटाना, दाहिने कान में तीन बार 'वाक्' शब्द कहना, तथा सुनहली चम्मच से दही-मधु-घृत चटाना जैसी रस्में निभाई जाती हैं, और प्रसव के सातवें दिन प्रसूता का विशेष स्नान-संस्कार भी होता है।
🕉️सोलह संस्कार
- हिन्दू परंपरा में जीवन को संस्कारित करने वाले सोलह संस्कारों की शुरुआत गर्भाधान, पुंसवन (गर्भ के तीसरे मास में) व सीमन्तोन्नयन (चौथे-आठवें मास में, मारवाड़ में इसे अगरणी कहते हैं) से होती है, जो गर्भावस्था से जुड़े हैं।
- जन्म के बाद जातकर्म, नामकरण (10वें या 12वें दिन), निष्क्रमण (चौथे मास में सूर्य-चंद्र दर्शन), अन्नप्राशन (छठे मास में पहला अन्न), चूड़ाकर्म/जड़ूला (पहले-तीसरे वर्ष में मुंडन) और कर्णभेद (तीसरे-पाँचवें वर्ष में कान बींधना) जैसे संस्कार होते हैं।
- शिक्षा से जुड़े संस्कारों में विद्यारंभ (अक्षर ज्ञान की शुरुआत), उपनयन (गुरु के पास ब्रह्मचर्याश्रम आरंभ, जिसे यज्ञोपवीत भी कहा जाता है और जो केवल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य को प्राप्त था), वेदारंभ, केशांत/गोदान (16 वर्ष में बाल कटवाना) और समावर्तन (शिक्षा-समापन पर गुरुदक्षिणा देकर घर लौटना) शामिल हैं।
- अंतिम दो संस्कार जीवन के गृहस्थ व अंतिम चरण से जुड़े हैं — विवाह संस्कार गृहस्थाश्रम में प्रवेश का प्रतीक है, जबकि अंत्येष्टि मृत्यु पर किया जाने वाला अंतिम दाह संस्कार है।