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राजस्थान GK

राजस्थान की लोक कलाएँ एवं हस्तशिल्प

Folk Arts & Handicrafts of Rajasthan

पड़ चित्रण व मांडणे से लेकर ब्ल्यू पॉटरी, मीनाकारी व उस्ता कला तक — राजस्थान की रंग-बिरंगी लोक कलाओं व हस्तशिल्प परंपराओं की सैर, जिसमें हर गाँव-कस्बे का अपना हुनर बोलता है।

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चित्रित आख्यान कलाएँ

Painted Narrative Arts

रात में गाकर जीवंत की जाने वाली विशाल कपड़ा-पट्टिकाओं से लेकर मंदिरों की पिछवाइयों और त्योहारों पर दीवार पर चिपकाए जाने वाले कागजी चित्रों तक — राजस्थान में कथा-वाचन स्वयं एक दृश्य कला बन जाता है।

🖌️पड़ चित्रण

  • पड़ मोटे सूती या खादी कपड़े पर बना एक लंबा वृत्तांत-चित्र होता है जिसमें लोक देवताओं की जीवनगाथाएँ, पौराणिक प्रसंग और ऐतिहासिक आख्यान उकेरे जाते हैं; भीलवाड़ा जिले का शाहपुरा कस्बा इसका प्रमुख केंद्र है, साथ ही भीलवाड़ा नगर व चित्तौड़ भी इसके लिए जाने जाते हैं।
  • शाहपुरा के जोशी गोत्र के छीपे इसे चित्रित करते हैं और 'चितेरा' कहलाते हैं; इसी परिवार के श्रीलाल जोशी को पद्मश्री मिला, जबकि श्रीमती पार्वती जोशी को देश की प्रथम महिला पड़ चितेरी माना जाता है और गौतली देवी को भी अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली है।
  • इस शैली में गहरे लाल-हरे रंग, मोटी-गोल आकृतियाँ तथा बड़ी आँखें-नाक विशेषता हैं — नायक प्रायः लाल तथा खलनायक हरे वस्त्रों में दिखाए जाते हैं; चातुर्मास में काम रुक जाता है और देवउठनी ग्यारस के बाद फिर शुरू होता है।
  • सर्वाधिक लोकप्रिय पड़ पाबूजी की मानी जाती है, देवनारायणजी की सवारी वाली पड़ कथा में सबसे लंबी है, और अब तक की सबसे छोटी पड़ मात्र 2×2 सेमी की देवनारायण पड़ है, जिसे 2 सितंबर 1992 को देवनारायण जयंती पर भारतीय डाक विभाग ने टिकट के रूप में जारी किया था।

🪕पड़ वाचन

  • पड़ वाचन राजस्थान की एक विशिष्ट परंपरा है, जिसे प्रायः किसी मनौती के रूप में अनिष्ट टालने के लिए खुले मैदान या चौपाल में सामूहिक रूप से किया जाता है; भोपा पड़ में चित्रित कथा को सुर, ताल व लय के साथ गाकर सुनाता है।
  • रात्रि में पड़ बाँची जाने पर भोपिन डंडे पर लटके दीपक के साथ गाथा दोहराते हुए नृत्य करती है, जबकि साथी कलाकार ढोलक, मंजीरा, अलगोजा, थाली, चींपिया, जंतर व रावणहत्था जैसे वाद्यों से संगत देते हैं।
  • फटी या जीर्ण-शीर्ण हो चुकी पड़ को यूँ ही नहीं छोड़ा जाता, बल्कि उसे विधिपूर्वक पुष्कर में विसर्जित कर दिया जाता है, जिसे 'पड़ ठंडी करना' कहा जाता है।

📜प्रमुख पड़ें

  • पश्चिमी राजस्थान में सर्वाधिक लोकप्रिय पाबूजी की पड़ रात में नायक जाति के भोपे-भोपिन द्वारा रावणहत्था के साथ बाँची जाती है, जबकि बाड़मेर में भील भोपे इसे 'गूजरी' वाद्य के साथ वाचते हैं।
  • देवनारायणजी की पड़ सबसे पुरानी, सबसे अधिक चित्रांकन वाली व सबसे लंबी है, जिस पर 'सर्प' भी चित्रित होता है; इसे गूजर भोपे जंतर वाद्य के साथ बाँचते हैं और वाचन देवउठनी एकादशी से देवशयनी एकादशी तक चलता है।
  • रामदेवजी की पड़ का सर्वप्रथम चित्रांकन चौथमल चितेरे ने किया था; इसे 'कामड़' जाति के भोपे रावणहत्था के साथ रात में बाँचते हैं, और इसका वाचन पाबूजी के भोपे-भोपी द्वारा भी होता है।
  • रामदला व कृष्णदला की पड़ें बिना किसी वाद्य के भाट जाति के भोपों द्वारा मुख्यतः हाड़ौती क्षेत्र में बाँची जाती हैं, जिनमें समस्त चराचर जगत के साथ राम या कृष्ण के जीवन-प्रसंग चित्रित होते हैं; इनका वाचन दिन में होता है।

🖼️पिछवाइयाँ व पाने

  • पिछवाई मंदिर की मूर्ति के पीछे टाँगा जाने वाला बड़े आकार का चित्रित कपड़ा है; नाथद्वारा की पिछवाइयाँ, जिन्हें वहाँ के जांगिड़ व गौड़ ब्राह्मण परिवार बनाते हैं, संपूर्ण भारत में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
  • पाना किसी देवता का कागज पर बना बड़े आकार का चित्र है — गणेश, लक्ष्मी, रामदेव, गोगाजी, श्रीनाथजी, श्रीकृष्ण व शिव-पार्वती के पाने आम हैं — जिसे त्योहारों पर दीवार पर चिपकाकर पूजा जाता है; इनमें चौबीस शृंगारों को दर्शाने वाला श्रीनाथजी का पाना सर्वाधिक कलात्मक माना जाता है।

🔍मिनिएचर पेंटिंग व बातिक कला

  • मिनिएचर पेंटिंग छोटी-छोटी वस्तुओं या हाथी दाँत पर की जाने वाली अत्यंत सूक्ष्म व बारीक चित्रकला है, जो जोधपुर, जयपुर व किशनगढ़ में विशेष रूप से फलती-फूलती है।
  • बातिक कला में कपड़े के कुछ हिस्सों को मोम से ढककर शेष खुले भाग को विभिन्न रंगों से रंगा जाता है; यह मूलतः राजस्थान की 'चुनर' पद्धति का ही परिष्कृत रूप है, जिसका आगे विकास दक्षिण भारत में हुआ।
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मांडणा, साँझी एवं अनुष्ठान लोककला

Mandana, Sanjhi & Ritual Folk Art

राजस्थान में हर आँगन, दीवार व त्योहार एक कैनवास बन जाता है — ज्यामितीय भूमि-अलंकरण, व्रत-देवी के रूपांकन और अंग-चित्रांकन जो रोजमर्रा की मांगलिकता को कला में बदल देते हैं।

🔷मांडणा

  • मांगलिक अवसरों पर महिलाएँ आँगन को गोबर से लीपकर अनामिका उंगली से खड़िया (सफेद), हिरमिच व गेरू (लाल) रंगों से ज्यामितीय अलंकरण बनाती हैं — राजस्थान में इस लोककला को 'मांडणा' कहा जाता है, जो लगभग हर त्योहार पर और तीर्थयात्रा से सकुशल लौटने पर 'पुष्कर पेड़ी' या 'पथवारी' के रूप में भी बनाई जाती है।
  • यही अलंकरण-परंपरा भारत भर में अलग-अलग नामों से प्रचलित है — गुजरात में सातिया, महाराष्ट्र में रंगोली, बंगाल में अल्पना, उत्तर प्रदेश में चौक पूरना/सोन, भोजपुरी अंचल में थापा, तेलुगु क्षेत्र में मोगु, केरल में अत्तापु, तमिलनाडु में कोलम, बिहार में अहपन और ब्रज-बुंदेलखंड में साँझा।
  • मांडणों के प्रकारों में 'पगल्या' — पूजा के समय आराध्य देव के आगमन की कामना में बनाए गए प्रतीकात्मक पद चिह्न — सर्वाधिक बनाया जाता है, वहीं बच्चे के जन्म पर द्वार-चौखट के इर्द-गिर्द 'साट्या' या 'सातिये' (स्वस्तिक) तथा विवाह के लग्न मंडप पर 'ताम' मांडणा बनाया जाता है।
  • होली पर चार कोणों वाला 'चौकड़ी मांडणा' बनाया जाता है, जबकि 'चीरण', 'भरती', 'छः फूल्या' व 'मोरड़ी' इस भूमि व भित्ति कला के अन्य नामित प्रकार हैं।

🌼साँझी

  • साँझी आश्विन मास में श्राद्धपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक, यानी दशहरे से ठीक पहले पंद्रह दिनों तक राजस्थानी कन्याओं द्वारा मनाया जाने वाला अत्यंत रंगीन व्रतोत्सव है, जिसमें गोबर के साथ मिट्टी, चूना, फूल, पीतर-पत्ती, हल्दी, कुमकुम, कौड़ी व मिर्च से अलंकरण किया जाता है।
  • नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर की 'केले के पत्तों की साँझी' संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है, जिसका अंतिम दिन का रूप 'कोट साँझी' कहलाता है; उदयपुर का मच्छंदरनाथ मंदिर अपनी साँझियों के लिए इतना विख्यात है कि उसे ही 'संझ्या मंदिर' कहा जाने लगा है, और जयपुर के लाडलीजी मंदिर में श्राद्धपक्ष के हर दिन साँझी बनाई जाती है।
  • साँझी को राजस्थान में लोक देवी गौरी (पार्वती) के रूप में पूजा जाता है; प्रतिवर्ष गोबरपुती दीवारों पर बनाया जाने वाला इसका बड़ा व विकसित रूप 'संझ्या कोट' या 'बड़ी साँझी' इस आस्था से रचा जाता है कि कन्याओं को वैसा ही वर मिले जैसा पार्वती को मिला था।

🌿मेहंदी-महावर

  • मेहंदी या महावर रचाना राजस्थान में एक ओर सौंदर्य प्रसाधन है तो दूसरी ओर सुहाग व सौभाग्य की प्रतीक एक पुरानी मांगलिक लोककला भी है; राज्य में सोजत (पाली) की मेहंदी सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जबकि गिलूण्ड (राजसमंद) की मेहंदी अपने गहरे लालसुर्ख रंग के लिए जानी जाती है।
  • मेहंदी के अलंकरण अवसर के अनुसार बदलते हैं — दीपावली पर पान, हथड़ी, शंख, लक्ष्मीजी के चरण-चिह्न (पगल्या) व सुदर्शन चक्र; मकर संक्रांति पर घेवर व बीजणी; करवा चौथ पर छबड़ी व स्वस्तिक; रक्षाबंधन पर लहरिया व चीक के अंकन; तथा विवाह पर तोरण, कैरी, सिंघाड़ा, स्वस्तिक, कलश व पुष्प जैसे रूपांकन प्रमुख हैं।

थापा व गोदना

  • मांगलिक अवसरों पर उंगलियों को कुमकुम, हल्दी, गेरू, मेहंदी, काजल या गोबर में डुबोकर दीवार पर छपे बिंब के रूप में बनाए गए चित्र 'थापे' कहलाते हैं, जिनके साथ प्रायः एक स्वस्तिक भी अंकित किया जाता है।
  • गोदना अंग-चित्रांकन की एक विशिष्ट परंपरा है — सुई या बबूल के काँटे से त्वचा पर आकृति गोदकर उस पर कोयले व खेजड़े के पत्तों का काला पाउडर मला जाता है, जो खून सोखकर स्थाई निशान छोड़ देता है; यह मुख्यतः राजस्थान की जनजातियों में स्त्री-पुरुष दोनों में प्रचलित है।
  • स्त्रियाँ पारंपरिक रूप से ललाट पर चाँद-तिलक तथा आँखों को तीर-सी पैनी दिखाने के लिए निचली पलक पर 'सांया' गुदवाती थीं; आज यही परंपरा दुनिया भर में आधुनिक 'टैटू' के रूप में एक फैशन-प्रतीक बनकर लौट आई है।

🏺वील, भराड़ी व ग्रामीण मिट्टी-गोबर शिल्प

  • 'वील' राजस्थान के ग्रामीण घरों की छोटी-मोटी वस्तुएँ सुरक्षित रखने हेतु बनाई गई मिट्टी की महलनुमा चित्रित आकृति है; मेघवाल जाति की महिलाएँ इस कला में विशेष निपुण होती हैं।
  • 'भराड़ी' आदिवासी भीलों द्वारा बेटी के विवाह पर घर की दीवार पर बनाई जाने वाली लोक देवी की मांगलिक तस्वीर है, जिसे परंपरागत रूप से घर का जँवाई चावल के विविधरंगी घोल से बनाता है।
  • ढूँढाड़ अंचल में सूखे गोबर के उपलों को चौकोर या आयताकार रूप में इकट्ठा कर उन्हें पुनः गोबर से लीपकर एक ढालू व बंद ढेर बनाया जाता है, जो वर्षा से बचाता है — यह अनूठा लोककला-दस्तावेज़ 'बटेवड़ा' या 'थापड़ा' कहलाता है।
  • राजस्थान के अनुष्ठान-कैलेंडर में तीन और मिट्टी-गोबर से जुड़े लोक-प्रतीक मिलते हैं: मिट्टी का 'हीड़' पात्र, जिसे दीवाली पर जलाकर बच्चे रिश्तेदारों को आशीर्वाद देते हैं (और छोटे रूप में 'हीड़ भरना' नामक बाल-पूजन रीति भी होती है); भील-गरासिया जनजातियों में पूजित मिट्टी के मनौती-घोड़े 'घोड़ा बावसी'; तथा चेचक निकलने पर उपचार-कामना से बनाई-पूजी जाने वाली गोबर की आकृति 'ओका-नोका-गुणा'।
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काष्ठ, मृद्भाण्ड एवं कठपुतली शिल्प

Wood, Clay & Puppetry Crafts

कहानी की किताब की तरह खुलने वाले काष्ठ देवघर, सदियों से मनोरंजन करती आ रही धागे की पुतलियाँ, और अनाज के मटकों से लेकर चमकदार ब्ल्यू पॉटरी तक पकाई गई मिट्टी की विविध सृष्टियाँ।

🪵काष्ठ कला व कठपुतली

  • मेवाड़ का बस्सी गाँव अपनी कलात्मक काष्ठ-कृतियों के लिए प्रसिद्ध है; इस कला का श्रेय स्वर्गीय प्रभातजी सुथार को जाता है, जिन्हें तत्कालीन शासक रावत गोविंददासजी सन् 1652 में मालपुरा (टोंक) से यहाँ लाए थे।
  • राजस्थान को कठपुतली की जन्मस्थली माना जाता है, जिसे परंपरागत रूप से नट या भाट परिवार खेलाते हैं और मारवाड़ इनका मुख्य केंद्र है; पुतलियाँ मुख्यतः उदयपुर, चित्तौड़गढ़ व कठपुतली नगर (जयपुर) में अरडू (आडू) की लकड़ी से बनाई जाती हैं।
  • क्षतिग्रस्त पुतलियों को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है और वर्षाकाल में, जब देवता सोए माने जाते हैं, प्रदर्शन नहीं होते; स्वर्गीय देवीलाल सामर के नेतृत्व में उदयपुर के लोककला मंडल ने कठपुतली कला को विश्व-स्तर तक पहुँचाया, जिसमें सूत्रधार 'स्थापक' ही केंद्रीय आधार होता है।
  • भारत में मुख्यतः चार प्रकार की कठपुतलियाँ प्रचलित हैं — दस्ताना, छड़, छाया व धागा (सूत्र) पुतली; राजस्थान के कठपुतली खेलों में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की 'सिंहासन बत्तीसी', पृथ्वीराज-संयोगिता तथा नागौर के अमरसिंह राठौड़ की कथा सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।

🚪तोरण व कावड़

  • तोरण मयूर या सुग्गे की आकृति से सजी लकड़ी की वह कलाकृति है, जिसे विवाह में दुल्हन के घर के मुख्य द्वार पर टाँगा जाता है; दूल्हा प्रवेश से पहले हरी डाली, तलवार, खांडे या गोटा लगी डंडी से इसे छूकर अपनी शक्ति सिद्ध करता है — जयपुर के त्रिपोलिया बाजार स्थित विद्याधर के रास्ते में इन्हें बहुतायत से बनाया जाता है, जबकि कहीं-कहीं इसकी जगह 'मोवण' नामक स्तंभ गाड़ा जाता है।
  • कावड़ कई कपाटों वाली मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति है, जिस पर देवी-देवताओं व पौराणिक प्रसंगों का चित्रण होता है — एक चलता-फिरता देवघर, जिसे राम-प्रसंगों की बहुलता के कारण 'रामजी की कावड़' भी कहा जाता है; इसका वाचन कावड़िया भाट करता है, जो कथा के साथ हर कपाट को मयूर पंख से छूते हुए खोलता जाता है।
  • लाखी-लाल रंग में रंगी कावड़ पर सामान्यतः महाभारत, रामायण, कृष्ण लीला, अष्टावतार व पांडव-चरित के साथ रामदेवजी व गोपीचंद भरथरी के प्रसंग भी चित्रित होते हैं; इसे बस्सी गाँव (चित्तौड़गढ़) के खेरादी जाति के लोग बनाते हैं, जहाँ शिल्पकार मांगीलाल मिस्त्री ने इसमें कई नए प्रयोग किए हैं।

🪑काष्ठ की अन्य कलाकृतियाँ

  • 'चोपड़ा' विवाह व अन्य मांगलिक अवसरों पर कुमकुम, अक्षत आदि रखने हेतु प्रयुक्त लकड़ी का पात्र है, वहीं 'बाजोट' भोजन या पूजा के थाल के नीचे रखी जाने वाली लकड़ी की छोटी चौकी है।
  • 'बेवाण' लकड़ी से बना देव-विमान है, जिस पर ठाकुरजी को शृंगारित कर बैठाया जाता है और देवझूलनी एकादशी को इसकी झाँकी निकाली जाती है; इसे 'मिनीएचर वुडन टेम्पल' भी कहा जाता है।
  • कपड़े पर हाथ से छपाई में प्रयुक्त लकड़ी के ठप्पे, जिन्हें 'छापे' कहते हैं, खेरादी जाति के लोगों द्वारा बनाए जाते हैं।
  • होली पर खातियों द्वारा गढ़े व चित्रित लकड़ी के तलवारनुमा 'खांडे' यजमानों को भेजे जाते हैं, यही रिवाज विवाह के बाद वर के घर से वधू के घर भी निभाई जाती है; वहीं श्वेतांबर जैन साधु-संत रोहिड़े की लकड़ी से बने 'पातरे-तिपरणी' पात्र प्रयोग करते हैं, जिन्हें जोधपुर के पीपाड़ कस्बे के खेरादी विशेष रूप से बनाते हैं।

🐄गोड़लिया व मिट्टी के पारंपरिक पात्र

  • पशुओं पर चोरी की पहचान व सामान्य निशानी दोनों के लिए गर्म लोहे के सरिये, मिट्टी की ढकनी, लोहे-पीतल के अक्षर या गर्म डाली से बड़े कलात्मक दाग दिए जाते हैं — दागने की क्रिया 'अटेरना' और दाग 'गोड़लिया' कहलाते हैं, जो प्रायः किसी जाति, अंचल या राजघराने के प्राकृतिक, धार्मिक, मानवाकृति, कृषि या दैनिक प्रतीकों को दर्शाते हैं।
  • 'कोठियाँ' ग्रामीण राजस्थान में अनाज संग्रह हेतु प्रयुक्त कलात्मक मिट्टी के पात्र हैं, जिनमें घी, दूध व दही जैसी दैनिक वस्तुएँ भी रखी जाती हैं।
  • 'सोहरियाँ' इसी तरह के मिट्टी के पात्र हैं, जो ग्रामीण घरों में भोजन-सामग्री रखने के काम आते हैं।
  • मेड़ता क्षेत्र में बनाए जाने वाले मिट्टी के बड़े माटे (मटके) 'मोण' कहलाते हैं।

🐎टैराकोटा

  • पकाई हुई मिट्टी के बर्तन व खिलौने संपूर्ण राजस्थान में बनते हैं, पर नाथद्वारा (राजसमंद) के निकट मोलेला गाँव व बस्सी (चित्तौड़गढ़) इसके सर्वाधिक प्रसिद्ध केंद्र हैं; मोलेला में मिट्टी को मजबूत करने हेतु चावल की भूसी व गधे का गोबर मिलाया जाता है।
  • अलवर में मिट्टी की अत्यंत बारीक व परतदार वस्तुएँ बनती हैं, जिन्हें 'कागजी टैराकोटा' या 'डबल कर्ट पॉटरी' कहा जाता है; मोलेला के ही मोहनलाल कुम्हार को टेराकोटा कला हेतु 2012 में पद्मश्री मिला, और डिजाइनदार मिट्टी-पात्रों के लिए ओमप्रकाश गालव भी इस कला के जाने-माने नाम हैं।

🔵ब्ल्यू व ब्लैक पॉटरी

  • ब्ल्यू पॉटरी — क्वार्ट्ज व चीनी-मिट्टी के बर्तनों पर मुख्यतः नीले-हरे रंगों में की गई चित्रकारी — महाराजा मानसिंह प्रथम के काल में आगरा-दिल्ली से जयपुर पहुँची थी, और मूलतः यह कला मुगलों के जरिए फारस से भारत आई थी; राजस्थान में जयपुर आज भी इसका प्रमुख केंद्र है।
  • महाराजा रामसिंह द्वितीय के काल में यह कला और अधिक फली-फूली; 1974 में पद्मश्री सम्मानित कृपाल सिंह शेखावत ने इसे पुनर्जीवित कर विश्वस्तरीय ख्याति दिलाई और 1960 के दशक में अपने निवास पर 'कृपाल कुंभ' संस्था स्थापित की, जबकि गोपाल सैनी, राजेश गोधा व दुर्गासिंह इसके बाद के प्रमुख कलाकार माने जाते हैं।
  • ब्लैक पॉटरी — फूलदानों, प्लेटों व मटकों पर काले रंग की चित्रकारी — कोटा क्षेत्र की पहचान है, और सवाई माधोपुर भी इसके लिए जाना जाता है।
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वस्त्र कला — छपाई, बंधेज व कढ़ाई

Textile Arts — Printing, Tie-Dye & Embroidery

ठप्पे, धागे व गाँठें साधारण सूती कपड़े को राजस्थान की सबसे पहचानी जाने वाली कलाकृतियों में बदल देते हैं — GI-टैग प्राप्त छपाइयों से लेकर मातृत्व के प्रतीक पीले पोमचे तक।

🧵हाथ से छपाई

  • कपड़े पर पारंपरिक हाथ से छपाई राजस्थान के लगभग हर हिस्से में की जाती है, जिसकी शुरुआत 12वीं सदी से मानी जाती है; छपाई करने वालों को 'छीपे' कहा जाता है, जबकि सांगानेर के छीपे विशेष रूप से 'नामदेवी छीपे' कहलाते हैं।
  • बाड़मेर में परंपरागत रूप से खत्री जाति के लोग यह कार्य करते हैं, जबकि जयपुर में महाराजा सवाई जयसिंह ने इस छपाई कला को राजकीय प्रोत्साहन दिया था।
  • प्रक्रिया कई चरणों की होती है: सूती कपड़े को गोबर, तिल्ली के तेल, बकरी की मेंगनी व सोडे के घोल में पूरी रात भिगोया जाता है, सुखाकर हरड़ के घोल में डुबोया जाता है, और अंत में लकड़ी के तराशे हुए ठप्पों से छापा जाता है — पहले केवल प्राकृतिक रंग प्रयुक्त होते थे, आज सिंथेटिक रंगों का भी उपयोग होता है।
  • सांगानेर, बालोतरा, बाड़मेर, पाली, जैसलमेर, बगरू, आकोला, आहड़, पीपाड़, कालाडेरा, बड़गाँव, जावता व बस्सी राजस्थान के प्रमुख हाथ-छपाई केंद्रों में गिने जाते हैं, जहाँ मुख्यतः लट्टे, मलमल या पॉपलीन कपड़े पर छपाई होती है।

🔴प्रसिद्ध छपाई शैलियाँ

  • बाड़मेर दो विशिष्ट ज्यामितीय शैलियों के लिए जाना जाता है, जो कपड़े के दोनों तरफ छापी जाती हैं: अजरख प्रिंट, जिसमें नीला-लाल रंग अधिक है, और मलीर प्रिंट, जिसमें कत्थई-काला रंग प्रधान है।
  • आकोला (चित्तौड़गढ़) अपने आजम व जाजम प्रिंट के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें लाल, काले व हरे रंग का बाहुल्य है, विशेषकर यहाँ के छपाई वाले घाघरे प्रसिद्ध हैं; 'फेटिया शैली' की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग भी आकोला से जुड़ी रही है।
  • साँगानेरी प्रिंट में सफेद या ऑफ-व्हाइट पृष्ठभूमि पर काले-लाल रंग की प्रधानता वाले जटिल पुष्प पैटर्न बनाए जाते हैं; इसे GI टैग प्राप्त है।
  • बगरू प्रिंट में काले-लाल रंग की विशेष प्रधानता है और इसे भी GI टैग प्राप्त है; कपड़ों की रंगाई का कार्य नीलगरों व रंगरेजों द्वारा किया जाता है।

🌈बंधेज

  • बंधेज का काम जोधपुर, जयपुर, शेखावाटी, बीकानेर व सीकर में सर्वाधिक होता है; इनमें जयपुर का लहरिया व पोमचा विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
  • पोमचा जच्चा स्त्रियाँ पहनती हैं, जो मुख्यतः पीले रंग का होता है और जिसके किनारों पर लाल रंग व बीच में बड़े गोल फूल बने होते हैं; वंश-वृद्धि का प्रतीक मानी जाने वाली इस ओढ़नी को 'पीला' भी कहा जाता है।
  • लहरिया राजस्थानी स्त्रियों द्वारा श्रावण मास में, विशेषकर तीज पर, पहनी जाने वाली ओढ़नी है; इससे जुड़े जोधपुरी बंधेज को भी GI टैग मिल चुका है।

🧶कढ़ाई व कशीदाकारी

  • वस्त्रों को रेशम, कलाबूत व बादले से कढ़ा जाता है, यह कार्य विशेष रूप से सीकर, झुंझुनूं व आसपास के इलाकों में होता है; सूती या रेशमी कपड़े पर बादले से बनाई गई बारीक बिंदकी कढ़ाई विशेष रूप से 'मुकेश' कहलाती है।
  • पूर्वी व दक्षिणी राजस्थान में उल्टी बखिया, चेन व लंबे-छोटे टाँकों से बारीक कढ़ाई होती है, जबकि पश्चिमी-उत्तरी राजस्थान में लाल-काले कपड़ों पर चमकीले रेशम से मोटे टाँकों की भराव कढ़ाई की जाती है, जिसमें बीच-बीच में शीशे जड़कर भड़कीलापन लाया जाता है।
  • यह कढ़ाई आज भी जैसलमेर, बालोतरा व बाड़मेर क्षेत्रों में प्रचलित है; 'मोती भारत' जालौर जिले की एक पारंपरिक कढ़ाई शैली का नाम है।

✂️वस्त्रों की अन्य हस्तकलाएँ

  • 'पेच वर्क' — विविध रंगों के कपड़े काटकर उन्हें डिजाइनों में सिलना — विशेष रूप से शेखावाटी क्षेत्र में प्रचलित है, जबकि 'चटापटी' कहते हैं किसी आकृति के अनुसार कपड़ा काटकर उसे दूसरे कपड़े पर टाँक देने को।
  • कपड़ों पर जरी, आरी-तारी व गोटे की किनारी का प्रयोग महिलाएँ विशेष रूप से करती हैं; गोटे का काम मुख्यतः खण्डेला (सीकर), जयपुर, भिनाय व अजमेर में होता है, और जरी का काम महाराजा सवाई जयसिंह के समय सूरत से जयपुर लाया गया था।
  • जयपुर गलीचा निर्माण के लिए प्रसिद्ध है, अब यह टोंक, ब्यावर, किशनगढ़, मालपुरा व भीलवाड़ा में भी बनते हैं — बीकानेर जेल के गलीचे सर्वाधिक सुंदर माने जाते हैं; नागौर के टांकला गाँव की दरियाँ विश्व-प्रसिद्ध हैं, सूत की दरियाँ जोधपुर, टोंक, नागौर, बाड़मेर व भीलवाड़ा में बुनी जाती हैं, और टोंक के ऊनी नमदे — जो ईरान से आयातित मानी जाने वाली कला है, तथा टोंक भेड़ की ऊन से नमदे बनाने वाला राज्य का एकमात्र जिला है — अपने आप में प्रसिद्ध हैं।

🏷️वस्त्र कला के रोचक तथ्य व GI टैग

  • साँगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंट, बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंट तथा कोटा डोरिया — इन तीनों वस्त्र-हस्तकलाओं को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) की मान्यता मिली है।
  • 'मलयगिरि' राजस्थान की भूरे रंग-प्रधान वस्त्र-रंगाई तकनीक है, जिससे रंगे कपड़े लंबे समय तक सुगंधित बने रहते थे, जबकि 'फागण्या' होली के अवसर पर पहने जाने वाले वस्त्रों को कहा जाता है।
  • सीकर के रंगरेजों व छीपों द्वारा चुनरी में पशु-पक्षियों के अलंकरण बनाने की कला प्रसिद्ध है, और सुनहरे धागे से कढ़े वस्त्र को 'हिरण्य' कहा जाता है, जिसे फारसी में 'जरदोजी' कहते हैं।
  • कोटा डोरिया साड़ी उद्योग मुख्यतः कैथून, मांगरोल व कोटा में केंद्रित है, 'जटपट्टी' उद्योग को सिरोही, भाकला व गंदहा नामों से भी जाना जाता है, और बगरू (जयपुर) राजस्थान में अपनी बेल-बूटे की छपाई के लिए विशेष प्रसिद्ध है।
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धातु, आभूषण एवं विविध हस्तशिल्प

Metal, Jewellery & Miscellaneous Crafts

सोने से मीनाकारी किए गए काँच व ऊँट की खाल के पात्रों से लेकर संगमरमर की मूर्तियों व GI-टैग प्राप्त चाँदी-शिल्प तक — राजस्थान के धातुकार व शिल्पकार कच्चे माल को विरासत में बदल देते हैं।

💠मीनाकारी

  • मीनाकारी सोने-चाँदी व अन्य आभूषणों तथा कलात्मक वस्तुओं पर मीना चढ़ाने की कला है; यह 16वीं शताब्दी में महाराजा मानसिंह प्रथम के समय लाहौर से जयपुर पहुँची थी, और मूलतः मुगलों के माध्यम से फारस से भारत आई थी।
  • जयपुर राजस्थान में मीनाकारी का प्रमुख केंद्र बना हुआ है; कुदरत सिंह को इस कला के लिए 1988 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

💚थेवा कला

  • थेवा कला — काँच पर सोने का सूक्ष्म व कलात्मक चित्रांकन, जिसमें हरा रंग प्रमुखता से प्रयुक्त होता है — प्रतापगढ़ की अपनी कला है, जिसमें वहाँ का सोनी परिवार सिद्धहस्त माना जाता है; इसे GI टैग मिल चुका है।
  • प्रतापगढ़ के नाथूजी सोनी को थेवा कला का जनक माना जाता है; उनके परिवार के पाँच सदस्यों को इस कला हेतु राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं, जिससे एक ही परिवार द्वारा सर्वाधिक राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के सम्मान में राजसोनी परिवार का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ।
  • प्रतापगढ़ की आदिवासी जनजातियों में पीतल व चाँदी के आभूषण भी प्रसिद्ध हैं, जबकि महेश सोनी, रामप्रसाद सोनी व बेनीराम सोनी थेवा कला के अन्य प्रमुख कलाकारों में गिने जाते हैं।

💎कुन्दन, कोफ्तगिरी व तहनिशां

  • 'कुन्दन' स्वर्णाभूषणों में कीमती पत्थर जड़ने की कला है, जो राज्य में सर्वाधिक जयपुर में प्रचलित है।
  • 'कोफ्तगिरी' — फौलाद की वस्तुओं पर सोने के पतले तारों की जड़ाई — पारंपरिक विवरण के अनुसार दमिश्क से पंजाब होते हुए गुजरात के रास्ते राजस्थान पहुँची; यह जयपुर, उदयपुर व अलवर में बहुतायत से होती है, और उदयपुर के कोफ्तगिरी मैटल क्राफ्ट को अब GI टैग मिल चुका है।
  • 'तहनिशां' कार्य में लोहे के हथियारों या वस्तुओं पर डिजाइन गहरा खोदकर उसमें पतला तार भर दिया जाता है; अलवर के तलवारसाज व उदयपुर के सिगलीगर इसे सुंदर ढंग से अंजाम देते हैं।

🫖मुरादाबादी कार्य व बादला

  • पीतल के बर्तनों पर की गई कलात्मक खुदाई-नक्काशी 'मुरादाबादी' का काम कहलाती है, जो जयपुर में प्रचुरता से तथा अलवर में भी होती है।
  • 'बादला' जस्ता धातु की पानी की बोतलें हैं, जिन पर कलात्मक कपड़े का आवरण चढ़ाकर पानी को लंबे समय तक ठंडा रखा जाता है; जोधपुर के बादले सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, और यह कला परंपरागत रूप से दमिश्क से आई मानी जाती है।

🐫उस्ता कला

  • 'मुनव्वती' कार्य — ऊँट की खाल के पात्रों पर सोने-चाँदी से किया गया कलात्मक चित्रांकन-नक्काशी — बीकानेर की उस्ता कला की पहचान है, जिसके लिए बीकानेर का उस्ता परिवार विश्वप्रसिद्ध है; इस कला को 1 अगस्त 2023 को GI टैग मिला, और इसके सिद्धहस्त कलाकार हिसामुद्दीन उस्ता को 1986 में पद्मश्री मिला था।
  • इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले वर्तमान उस्ता कलाकारों में हनीफ उस्ता, सज्जाद उस्ता, अयूब उस्ता, शौकत उस्ता व अजमल उस्ता के साथ राजकुमार व कमल किशोर जोशी शामिल हैं।
  • बीकानेर के उस्ता कलाकार लगभग 500 वर्ष पूर्व मुल्तान क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान) से यहाँ आए थे; ईरानी शैली के निकट मानी जाने वाली यह कला मुगल दरबार के रास्ते बीकानेर पहुँची, जब राजा रायसिंह अकबर के दरबार से 7 उस्ता कलाकारों को अपने साथ लाए — जिनमें उस्ता अली राजा, उस्ता हामिद व उस्ता रुकनुद्दीन प्रमुख थे।
  • महाराजा अनूपसिंह के समय रुकनुद्दीन ने 'रसिकप्रिया' के 187 चित्र बनाए थे; उस्ता कलाकार आज भी परंपरागत रूप से घड़े की पिसी मिट्टी से रंग तैयार करते हैं, और राज्य सरकार ने 1975 में इस कला के विकास व प्रशिक्षण हेतु बीकानेर में 'उस्ता कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर' स्थापित किया था।

🪞हाथी दाँत, चंदन, पेपरमैशी व मिरर वर्क

  • हाथी दाँत व चंदन पर खुदाई का कार्य मुख्यतः जयपुर में होता है, जहाँ सजावटी वस्तुएँ, खिलौने व मूर्तियाँ बनाई जाती हैं; चूरू की चंदन कलाकारी भी प्रसिद्ध है, जिसके प्रमुख कलाकार पवन जांगिड़ व चौथमल जांगिड़ हैं — पवन जांगिड़ द्वारा बनाई चंदन की 'मोरपंखी' स्मृति चिह्न 20 मार्च 2022 को जापान के प्रधानमंत्री को भेंट की गई थी।
  • कागज की लुगदी से कलात्मक वस्तुएँ बनाना 'पेपरमैशी' या कुट्टी का काम कहलाता है, जो मुख्यतः जयपुर व उदयपुर में होता है।
  • पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर जैसलमेर व बाड़मेर में, कपड़ों पर शीशे के छोटे टुकड़े सिलने का काम बहुतायत से होता है, जो सिंध व बलूचिस्तान से इस क्षेत्र में आया।

🥈तारकशी, रत्नाभूषण, चमड़ा व चाँदी शिल्प

  • नाथद्वारा में चाँदी के बारीक तारों से बने आभूषण व कलात्मक वस्तुएँ 'तारकशी' कहलाती हैं, और इनसे बने आभूषण 'तारकशी के जेवर' कहलाते हैं।
  • जयपुर में मूल्यवान पत्थरों सहित सोने-चाँदी के आभूषण बनाने की लंबी परंपरा रही है, और इस कार्य के लिए यह संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है — यह पन्ने की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मंडी है, जबकि जड़ाऊ गहनों के लिए जयपुर, जोधपुर, बीकानेर व उदयपुर प्रसिद्ध हैं।
  • चमड़े की कलात्मक मोजड़ियाँ जोधपुर में बहुतायत से बनती हैं, जयपुर, नागौर व जालौर इसके अन्य प्रमुख केंद्र हैं — भीनमाल व नागौर की कशीदाकारी वाली मोजड़ियाँ विशेष प्रसिद्ध हैं; वहीं बीकानेर चाँदी की डिब्बियों, अफीमदानियों, कटोरदान व सिगरेट केस के लिए जाना जाता है, और उदयपुर का सिगलीगर परिवार चाँदी के खिलौने, पशु-पक्षी व शस्त्रों की मूठ बनाने में सिद्धहस्त है।

🗿मूर्तिकला, मथैरण व आलागीला कला

  • राज्य में पत्थर की सुंदर मूर्तियाँ बनाने में जयपुर अग्रणी है, जहाँ मुख्यतः सफेद संगमरमर की मूर्तियाँ बनती हैं, जबकि डूँगरपुर-बाँसवाड़ा के निकट तलवाड़ा में सोमपुरा जाति के मूर्तिकार काले संगमरमर पर काम करते हैं; लाल पत्थर की मूर्तियाँ अलवर की थानागाजी तहसील में बनती हैं, और पत्थर की मूर्ति बनाने वाले कारीगर 'सिलावट' कहलाते हैं।
  • जोधपुर में जस्ते की मूर्तियाँ, खिलौने व अन्य कलात्मक वस्तुएँ बनाने वाली फैक्ट्रियाँ स्थित हैं।
  • 'मथैरण कला' — देवी-देवताओं के आकर्षक भित्ति चित्र तथा ईसर, गणगौर, तोरण जैसी आकृतियाँ चटख रंगों में उकेरना — बीकानेर क्षेत्र में सर्वाधिक प्रचलित है, जिसके प्रसिद्ध कलाकार मुन्नालाल व मुकुन्द हैं; 'आलागीला कारीगरी', चूने व कली से बनाई गई भित्ति-चित्रकारी, चूनगरों द्वारा की जाती है और इसके अधिकांश कारीगर बीकानेर व शेखावाटी में मिलते हैं।

📜हस्तनिर्मित कागज, काँच कला व शिल्पकार शब्दावली

  • साँगानेर (जयपुर) में कई प्रकार का हस्तनिर्मित कागज बनाया जाता है, तथा घोसुण्डी (चित्तौड़गढ़) के कागजी मुसलमान कलाकार भी इसे बनाते हैं; यह कला मुगल बादशाह हुमायूँ के समय ताशकंद से आई मानी जाती है।
  • जयपुर के श्री हरिनारायण मारोठिया रंगीन काँच के टुकड़ों से आकर्षक कलाकृतियाँ बनाने में सिद्धहस्त हैं।
  • राजस्थान में शिल्पकार अपने कार्य के अनुसार अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं: काँसे के बर्तन बनाने वाले 'कंसारा' (कसेरा), पीतल के बर्तन बनाने वाले 'ठठेरा', तथा सोने-चाँदी का महीन वर्क बनाने वाले — जिसे पान या मिठाइयों पर लगाया जाता है — 'पत्तीगर' कहलाते हैं।
  • मिट्टी के बर्तन बनाने वाला कारीगर 'कुम्हार' या 'भाटेड़ा' और चिनाई का काम करने वाला 'चेजारा' कहलाता है, जबकि 'मणिहार' लाख के सामान, रेशमी डोरी, मोतियों व सलमे-सितारों से माला-कंठी जैसी सौंदर्य वस्तुएँ बनाने वाले कारीगर होते हैं।

विविध रोचक तथ्य

  • राजस्थानी लोकजीवन में 'नारचारी' शब्द गृह-क्रीड़ा यानी घर में खेले जाने वाले खेलों से संबंधित है, जबकि विश्व शिल्प परिषद (डब्ल्यूसीसी) ने जयपुर को आधिकारिक रूप से 'विश्व शिल्प नगरी' घोषित किया है।
  • धनुष-बाण बनाने का कार्य उदयपुर-बाँसवाड़ा राजमार्ग पर स्थित 'चंदूजी का गढ़ा' (बाँसवाड़ा) व 'बोडीगामा' (डूँगरपुर) गाँवों में केंद्रित है, जबकि 'पलाण' ऊँट की पीठ पर कसा जाने वाला बैठने का ढाँचा है, जिसके घोड़े की पीठ वाले समकक्ष रूप को 'जीण' कहा जाता है।
  • काँसे के बर्तन बनाने का कार्य विशेष रूप से भीलवाड़ा में होता है, सीप पर कलात्मक कार्य जोधपुर में होता है, और बीकानेर कागज जैसे पतले पत्थर पर की गई चित्रकारी के लिए भी जाना जाता है।