भित्ति चित्रण
Mural Painting
राजस्थान की हवेलियों, महलों, मंदिरों व छतरियों को सजाने वाली भित्ति चित्रकला की तकनीकों, शैलियों और जयपुर से लेकर शेखावाटी तक फैले उसके वैभवशाली इतिहास की सैर।
परिचय एवं तकनीकें
राजस्थान की रंगी हुई हवेलियों और महलों की सैर से पहले जानिए भित्ति चित्रण असल में कैसे बनता था — इसे किसने बनाया, किस सतह पर और किन रंगों से।
🎨भित्ति चित्रण क्या है
- दीवार पर केवल सौंदर्य और सृजनात्मकता की दृष्टि से किया गया अलंकरण भित्ति चित्रण कहलाता है, और इसमें दीवार (भित्ति) को ही कला का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।
- इस कार्य में लगे कारीगरों को 'चेजारे' कहा जाता था और इनमें अधिकांश कुम्हार समुदाय से थे।
- राजस्थानी भित्ति चित्रण की तकनीकों को आलागीला, आरायश तथा मोराकशी कहा जाता है — ये सभी ताज़े प्लास्टर पर सीधे की जाने वाली चित्रकारी को दर्शाती हैं।
🧱चित्रांकन विधियाँ: गीली, सूखी व साधारण दीवार
- अभी गीली, ताज़ी प्लास्टर की गई दीवार पर बनाया गया चित्र फ्रेस्को बूनो कहलाता है; शेखावाटी में इसी तकनीक को 'पणा' नाम से भी जाना जाता है।
- इसके विपरीत, फ्रेस्को सेको विधि में दीवार के पूरी तरह सूख जाने के बाद ही चित्रांकन किया जाता है।
- साधारण भित्ति चित्रण किसी भी दीवार पर बिना विशेष तैयारी के किया जा सकता था, पर ऐसे चित्र लंबे समय तक टिकते नहीं थे।
- राजस्थान में भित्ति चित्रकला का विकास मुख्यतः 15वीं सदी के सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल में हुआ, जो प्रायः इतालवी मूल की म्यूरल/फ्रेस्को पद्धति या जयपुर की अपनी आलागीला पद्धति से रचा जाता था।
🌈पारंपरिक रंग-योजना
- भित्ति चित्रकार प्राकृतिक रंगों की एक तय शृंखला अपनाते थे — रामराज (यलो ओकर), हिरमिज (इंडियन रेड), गेरू (बर्न्ट साइना) और हरा भाटा (टेरावर्ट ग्रीन) — जबकि काला रंग काजल से और सफेद रंग चूने से लिया जाता था।
जयपुर व अलवर के भित्ति चित्र
जयपुर शैली पर राजस्थान की किसी भी भित्ति परंपरा से अधिक मुगल प्रभाव देखने को मिलता है, जो राजसी हवेलियों, जैन मंदिरों, उणियारा ठिकाने और अलवर के किलों तक फैली।
🖋️जयपुर शैली की तकनीक
- जयपुर के भित्ति चित्र आलागीला पद्धति से बनाए जाते थे, जो मुगल बादशाह अकबर और जहाँगीर के काल में इटली से भारत लाई गई थी; राजस्थानी भित्ति चित्रों पर मुगल शैली का प्रभाव जयपुर और अलवर में सबसे अधिक दिखता है।
- जयपुरी चित्रकार सामान्यतः रंगभरण आरायश (आलागीला) पद्धति से करते और बारीक रेखांकन के लिए टेम्परा पद्धति अपनाते थे; इसी कारण जयपुरी भित्ति चित्र फ्रेस्को बूनो, फ्रेस्को सेको और टेम्परा — तीनों पद्धतियों में मिलते हैं।
🐘जयपुर के प्रमुख स्थल
- आमेर के मानसिंह महल में शिकार, श्रीकृष्णलीला, घुड़सवार व नायिकाओं के दृश्य हैं, जबकि सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई आमेर की भोजनशाला में आलागीला तकनीक में स्याह कलम से बने 27 चित्र हैं।
- बैराठ में कृष्णलीला और राग-रागिनी के विषयों के साथ अकबर का एक चित्र भी मिलता है, वहीं मानसिंह की छतरी में एक राजकुमारी को महफिल के दौरान ऊँट पर बैठे दिखाया गया है, और मकदूम शाह की छतरी में पंखदार परियों के चित्र बने हैं।
- आचार्य जी की हवेली के एक कक्ष में पूरी तरह रागमाला विषय पर चित्रकारी की गई है।
👑विषयवस्तु व शैली का चरम
- जयपुर शैली की भित्ति चित्र परम्परा 18वीं सदी तक अपने चरम पर पहुँच गई, जब आमेर महल की भोजनशाला, गलता महल और पुण्डरीकजी की हवेली में महत्वपूर्ण चित्र बने — जिनमें रागमाला के साथ पोलो खेल, शेषशायी विष्णु, बाँसुरी बजाते कृष्ण और राम दरबार भी दर्शाए गए।
- पश्चिमी प्रभाव में आकर जयपुर के चित्रकारों ने चेहरे पर चोट के निशान, चेचक के दाग और बुढ़ापे की विशेषताओं को भी बारीकी से उकेरना शुरू किया; सुनहरे रंग का भरपूर प्रयोग हुआ, जिसका सबसे बेहतरीन उदाहरण पुरोहितजी की हवेली है।
- जयपुर शैली के भित्ति चित्रों में धार्मिक-पौराणिक कथाएँ (मुख्यतः भागवत पुराण पर आधारित), बारहमासा-प्रकृति चित्रण, रागमाला, राजदरबारी जीवन, व्यक्ति चित्र और आलेखन शामिल हैं; अन्य उल्लेखनीय स्थलों में गुसाईंजी की छतरियाँ, जगत शिरोमणि मंदिर, चुरासिंहजी की हवेली, दुसाधों की हवेली, आदर्श नगर श्मशान की छतरियाँ व सिसोदिया रानी महल शामिल हैं।
🏯जयपुर की हवेलियाँ व मंदिर
- पुण्डरीकजी की हवेली में बाजबहादुर-रूपमती के साथ राजसी वैभव व जयपुर तथा मुगल राजपरिवारों की वंशावली अंकित है; दुसाधों की हवेली में राधा-कृष्ण व गंगा देवी के बड़े चित्र हैं।
- नानाजी की हवेली में हाथियों की लड़ाई, लैला-मजनूँ, पतंगबाज़ी व काँटा निकालने के दृश्य हैं, जबकि प्रतापनारायण पुरोहितजी की हवेली गणिकाओं के चित्रों के लिए जानी जाती है, और गलता के चित्र राग-रागिनियों को दर्शाते हैं।
- मानपुर स्थित पन्नाधाय की छतरी में दही बिलोती हुई एक स्त्री का चित्र बना है।
🕉️दिगम्बर जैन मंदिरों के भित्ति चित्र
- श्री दिगम्बर जैन मंदिर शांतिनाथ स्वामी में पंचकल्याणक तीर्थ स्थलों, जयपुर शहर के पाण्डुकशिला तथा सजे हुए हाथी, घोड़े व लताओं के चित्र हैं; मंदिर संगाकन मुख्यतः समवसरण रचना, पंचकल्याणक, जन्म कल्याणक, तीन लोक के मानचित्र, सोलह स्वप्न, सीता की अग्नि परीक्षा तथा शतलेश्या-गंधकुटी पर केंद्रित है।
- मंदिर संघीजी जम्बूद्वीप, पंचकल्याणक व तेरहद्वीप पर केंद्रित है, जबकि मंदिर चंपारामजी पाण्ड्या में पार्श्वनाथ के जीवन-प्रसंग, मुनि गजकुमार, भक्तामर स्तोत्र व सुकुमाल के चित्र हैं।
- मंदिर दीवान बढ़ीचंदजी साह में संसार वृक्ष, अढ़ाई द्वीप व शतलेश्या का अंकन है, वहीं मंदिर पाटोदी में तीर्थ स्थल, पाण्डुकशिला पर इन्द्र-अभिषेक, पंचकल्याणक, नेमिजी की बारात व सम्मेद शिखर दर्शाए गए हैं।
🌿उणियारा की भित्ति चित्र परम्परा
- उणियारा के शासक आमेर रियासत के महाराजा उदयकरण के वंशज थे; यहाँ के उल्लेखनीय भित्ति चित्र रंगमहल, चारभुजाजी मंदिर, जगत शिरोमणि मंदिर तथा राव-शासकों की छतरियों में मिलते हैं, और उणियारा के सबसे प्राचीन देवालय चारभुजाजी के चित्र फ्रेस्को सेको तकनीक में बने हैं।
- रंगमहल के तीन बड़े पैनलों में क्रमशः मुगल बादशाह का दरबार, मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय का दरबार तथा जयपुर रियासत का दरबार चित्रित है, और यहाँ का बारहमासा चक्र आषाढ़ माह से आरंभ होकर ज्येष्ठ पर समाप्त होता है।
- उणियारा के नायक-नायिका साधारण वेशभूषा में, कम रेखाओं के बावजूद प्रबल भावनात्मक अभिव्यक्ति के साथ दर्शाए जाते हैं; यहाँ की स्त्रियों में मीनाकार नेत्र, लम्बी पुष्ट नासिका व धनुषाकार भौंहें दिखाई जाती हैं, और समूचे चित्रण में हरा रंग प्रमुख है।
🦚अलवर के भित्ति चित्र
- अलवर के निकट राजगढ़ किले के शीशमहल के भित्ति चित्र चित्रकार डालूराम ने बनाए थे, जिनमें श्रृंगाररत, तबला-सितार बजाती, होली खेलती, काँटा निकालती व अंगड़ाई लेती नायिकाएँ दर्शाई गई हैं।
- अलवर के शीशमहल, दीवाने-खास व राजदरबार में राधा-कृष्ण तथा राग-रागिनियों पर आधारित चित्रण हुआ है, जबकि दीवान जी की हवेली में महाराजा बख्तावर सिंह की शिकार सवारी, हाथियों की लड़ाई व झूला झूलती स्त्रियाँ चित्रित हैं।
मेवाड़-मारवाड़ की परंपरा
उदयपुर की झील-किनारे हवेलियों से लेकर नाथद्वारा के भक्तिमय संसार और जोधपुर, बीकानेर व नागौर के मरुस्थलीय किलों तक, यह समूह दिखाता है कि भित्ति चित्र किस तरह राजदरबार और जीवंत आस्था दोनों की सेवा में रचे गए।
🏞️उदयपुर के भित्ति चित्र स्थल
- उदयपुर के उल्लेखनीय भित्ति चित्र बाफना की हवेली, नगर सेठ की हवेली, कृष्ण विलास, बरहठ की हवेली, गणगौर घाट, पिछोला स्थित रामद्वारा, कोठारी की हवेली, अम्बा माता मंदिर, उदयपुर के महलों तथा जैनीवास में फैले हैं।
🏹जोधपुर के भित्ति चित्र
- जोधपुर किले के भित्ति चित्रों में मदिरा पिलाए जाते राजा, अंगड़ाई लेती व शृंगार करती नायिकाएँ, तथा साधुओं के आगे हाथ जोड़े खड़ी रानियाँ दर्शाई गई हैं।
- मारवाड़ शैली में जोधपुर के चोखेलाव महल की छतों के भीतरी भाग के चित्र विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
- चित्तौड़ के महाराणा कुम्भा के काल में बने भित्ति चित्रों को क्षेत्र में सबसे प्राचीन माना जाता है, जिनके 15वीं शताब्दी में बने होने की बात कही जाती है।
🪈नाथद्वारा की भक्तिमय परम्परा
- नाथद्वारा के भित्ति चित्रों में मुख्यतः श्रीनाथजी के विविध शृंगार-स्वरूप तथा भागवत में वर्णित श्रीकृष्ण की बाल-किशोर लीलाएँ अंकित हैं; मुगलकाल के धार्मिक प्रतिबंधों के चलते वल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों को जानबूझकर साधारण घरों जैसा बनाया गया, इसलिए इन्हें 'मंदिर' न कहकर 'नन्दालय' की भावना से 'हवेली' कहा जाता था, और चित्रकारी ही इनकी मुख्य साज-सज्जा थी।
- वल्लभ सम्प्रदाय की पुरानी भित्ति चित्र परम्परा के अवशेष आज भी नाथद्वारा के महुवा वाले अखाड़े में देखे जा सकते हैं; इनमें बार-बार आने वाले विषयों में सात स्वरूपोत्सव, तिलकायत, उदयपुर के महाराणा, रासलीला, घड़ा ढोती गोपिकाएँ, चँवर डुलाती सेविकाएँ तथा अंगड़ाई लेती नायिकाएँ शामिल हैं।
- चित्रकार नारायणजी ने विक्रम संवत् 1925 (सन् 1868) में गोवर्धन कुण्ड के भित्ति चित्र बनाए, जिनमें विष्णु के विभिन्न अवतार अंकित हैं, जबकि मोतीमहल के अलंकृत मेडेलियन्स में तत्कालीन ब्रिटिश शैली की वेशभूषा वाले स्त्री-पुरुष चित्रित हैं।
- वल्लभवंशीय गोस्वामी महाप्रभु श्री हरिरायजी ने सबसे पहले श्रीनाथ मंदिर के भित्ति चित्रों को सम्प्रदाय के मूल दर्शन व प्रतीकात्मकता के अनुरूप विस्तृत व्याख्या दी, और इन चित्रों में गाय व मोर का अंकन प्रमुखता से हुआ है।
🏜️बीकानेर व नागौर
- बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह लाहौर से मुगल-प्रशिक्षित 'उस्ता' चित्रकारों को लाए, जिन्होंने बीकानेर में असाधारण सुंदर भित्ति चित्रण किया और 'उस्ताद' कहलाए; उस्ता परिवार द्वारा जूनागढ़ किले में बनाए गए श्रमसाध्य चित्र मुगल चित्रकारी से काफी मिलते-जुलते हैं।
- नागौर किले के भित्ति चित्रों में सौंदर्य व दोष-बरदोष, उद्यान में मद्यपान करती नायिका, हौज में स्नान करते हुए संगीत का आनंद लेती नायिका, तोता पकड़े नायिका तथा अंगड़ाई लेती नायिका जैसे विषय हैं — ये सभी एक मनमोहक, प्रायः एकरंगी (इकरंगी) योजना में बने हैं।
हाड़ौती: बूँदी व कोटा के भित्ति चित्र
हाड़ौती क्षेत्र ने अपनी प्रसिद्ध शैल (लघु) चित्रकला के साथ भित्ति चित्रकला की भी उतनी ही समृद्ध परंपरा विकसित की, जो बूँदी के महलों और कोटा की विशाल हवेलियों में अपने चरम पर दिखती है।
🏛️बूँदी: चित्रशाला व छत्रमहल
- बूँदी की चित्रशाला, जिसे रंगशाला भी कहा जाता है, राव उम्मेदसिंह (1748-1771 ई.) ने बनवाई थी और अपने भित्ति चित्रों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है; इससे पहले राव शत्रुशाल (1621-1658 ई.) द्वारा बनवाए गए छत्रमहल में राम दरबार, श्री रंगनाथजी, देवी आराधना, शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण, हुक्का पीता राजा, राज दरबार तथा रागमाला का एक युद्ध-दृश्य चित्रित है।
- छत्रमहल के भित्ति चित्रों में चित्रकार की बहु-बिंदु (मल्टी-पर्सपेक्टिव) दृष्टि की विशेष सराहना होती है, जो आखेट (शिकार) के दृश्यों में सबसे स्पष्ट दिखती है।
🦚बूँदी शैली की पहचान
- बूँदी शैली में राग-रागिनी को लगभग दो सौ वर्षों तक 'आँच रागमाला' के रूप में विशिष्ट ढंग से चित्रित किया गया; इसके कृष्ण-लीला के चित्रों में 'चीर-हरण' व 'गोवर्धन धारण' के प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
- बूँदी के प्रमुख विषयों में कृष्ण-लीला, शिकार दृश्य, केले के वृक्ष, कूकते मयूर, वृक्षों पर कूदते वानर, कदम्ब वृक्ष, स्नान करती महिलाएँ, ढोला-मारू की गाथा, अंगड़ाई लेती नायिकाएँ, हाथी अंकन तथा राजदरबार के दृश्य शामिल हैं।
🕌महल से परे: बूँदी के अन्य स्थल
- राव भोज द्वारा निर्मित बादल महल में आखेट, हाथियों का अंकन, कृष्ण-जन्म, संगीत तथा महफिल के चित्र हैं; फूलमहल में कृष्णलीला के साथ धार्मिक आस्था से जुड़े चित्र हैं, और बूँदी की ब्राह्मणों की हवेली में भित्ति चित्रों का विशेष रूप से समृद्ध खज़ाना है।
- हाड़ा राव रतन के पुत्र इन्द्रभान द्वारा स्थापित इन्द्रगढ़ ठिकाने के जनाना महल की छतरी में शाही सवारी, राम दरबार तथा कदम्ब वृक्ष के निकट कृष्ण व आखेट के दृश्य चित्रित हैं; निकटवर्ती कनकसागर झील के किनारे बसे दुगारी के सीतारामजी मंदिर में मुख्यतः रामचरितमानस पर आधारित आकर्षक भित्ति चित्र मिलते हैं।
🏹कोटा के भित्ति चित्र
- समग्र रूप से कोटा-बूँदी क्षेत्र भित्ति चित्रकला की दृष्टि से खासा विकसित रहा है, जहाँ स्त्री के घरेलू जीवन, नायिका सौंदर्य, रासलीला, शिकार व शृंगार विषयों पर सरस व आकर्षक चित्र मिलते हैं।
- झाला जालिमसिंह द्वारा बनवाई गई झाला हवेली की विशाल भित्तियों पर जालिमसिंह व उम्मेदसिंह को उत्साहपूर्वक आखेट करते हुए दर्शाया गया है; कला इतिहासकार कार्ल खण्डालावाला ने इन चित्रों को एशिया में अपनी सानी न रखने वाला बताया था।
- महाराव शत्रुशाल (1756-1764 ई.) द्वारा निर्मित कोटा के छत्रमहल में शिकार के दृश्य, भागवत पुराण व कृष्ण लीला अंकित हैं, जबकि महाराव माधोसिंह द्वारा निर्मित बड़ा महल में उत्सव, शाही सवारी व शिकार के विषय शामिल हैं।
- 1855 ई. में बड़े देवता श्रीधरलालजी द्वारा बनवाई गई बड़े देवता की हवेली में बड़े-बड़े पैनलों पर कोटा के महापर्व दशहरे की सवारी का यथार्थपरक चित्रण है।
शेखावाटी: खुली कला दीर्घा
राजस्थान का कोई क्षेत्र शेखावाटी जितना अपने भित्ति चित्रों को खुलेआम नहीं दिखाता, जहाँ के किलों, मंदिरों, छतरियों, हवेलियों और यहाँ तक कि बावड़ियों ने भी इसे 'खुली कला दीर्घा' की उपाधि दिलाई।
🎭शेखावाटी की पहचान
- शेखावाटी लंबे समय से कला के क्षेत्र में अपनी गौरवपूर्ण स्थिति के लिए प्रसिद्ध रहा है, और इसके भित्ति चित्रों के कारण ही इसे 'खुली कला दीर्घा' कहा जाता है।
- 1742 ई. में शार्दुल सिंह शेखावत के निधन के बाद शेखावाटी राज्य उनके पाँच भाइयों में बँट गया, जिसे 'पंचपाना' कहा जाता है; डूँडलोद, नवलगढ़, सीकर, मंडावा, बिसाऊ, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, मुकुन्दगढ़ व सूरजगढ़ जैसे ठिकाने अपने भित्ति चित्रण के लिए प्रसिद्ध हैं।
🌸विषय, रंग व स्वर्ण युग
- शेखावाटी के भित्ति चित्र प्रमुखतः धार्मिक विषयों पर हैं, जिनमें कृष्ण की बाल लीला, चीरहरण व दधिहरण प्रसंग, नायिका भेद, बारहमासे के चित्र, राजदरबार दृश्य, विशाल हाथी-घोड़े, चोबदार, मल्लयुद्ध, विचित्र पशु-पक्षी, देवी-मिथक, राक्षस, राग-रागिनी, साधु-संत तथा लोककथाएँ शामिल हैं।
- शेखावाटी के चित्रकारों ने कत्थई, नीले व गुलाबी रंगों का बहुतायत से प्रयोग किया, साथ ही हाथी-घोड़ों का प्रचुर अंकन भी हुआ; स्त्री चित्रों में 'बल खाती हुई लट' का अंकन एक ऐसी विशेषता है जो अन्य राजस्थानी भित्ति चित्रों में नहीं मिलती, और 1830 से 1900 ई. तक के काल को शेखावाटी भित्ति चित्रकला का स्वर्ण युग माना जाता है।
- फ्रांसीसी संरक्षणविद् नदीन ला प्रेन्स ने फतेहपुर की हवेलियों के भित्ति चित्रों के संरक्षण के लिए सराहनीय कार्य कर एक मिसाल कायम की है; शेखावाटी भित्ति चित्रकला के विशिष्ट उदाहरणों में लक्ष्मणगढ़ की गनेरीवालों की चार हवेलियाँ, खेतड़ी का बख्तावर महल, लक्ष्मणगढ़ की राठियों की बैठक, महनसर की पोद्दार हवेली तथा फतेहपुर की जालान हवेली शामिल हैं।
🕌किले व मंदिर
- मंडावा किले के चित्रों में रागमाला, गणगौर की सवारी, शिकार के दृश्य व एक युगल जोड़ी दिखाई गई है, जबकि सूरजगढ़ किले में शिवगंगा का चित्र है; सीकर किले के चीनी महल में राजा की सवारी तथा राव शासकों की शबीह अंकित है, और नवलगढ़ किले में जयपुर व नवलगढ़ शहरों के दृश्य चित्रित हैं।
- सीकर के गोपीनाथ मंदिर में राजाओं व ठिकानेदारों के सामूहिक चित्र हैं, जबकि झुंझुनूं के गंगेसर व बिहारीजी के मंदिर में शार्दुल सिंह शेखावत के समूचे परिवार का चित्रण है; सीकर के रघुनाथजी मंदिर में ब्रिटिश अधिकारी बॉयलो की शबीह है, खेतड़ी के इसी नाम के मंदिर में कबीर की आकृति अंकित है, और डूँडलोद के सत्यनारायणजी मंदिर में चित्रकार का स्वयं का चित्र दशावतार के साथ बना है, जिसकी तुलना सामोद के महलों की चित्रकारी से की जाती है।
- मालसीसर के गोपीनाथजी मंदिर को जोधपुर के चित्रकारों ने चित्रित किया था, जिससे यहाँ शेखावाटी में अन्यत्र न मिलने वाली जोधपुर शैली की झलक मिलती है — जिसमें दस भुजाओं वाले हनुमानजी व नवग्रहों का अंकन शामिल है।
⛲शेखावाटी की छतरियाँ
- उदयपुरवाटी की जोगीदास की छतरी, जिसे बिजयराम व देवी ने बनवाया और देवा ने चित्रित किया, में बादशाह औरंगजेब हाथियों की लड़ाई देखते हुए, गोपिकाओं संग कृष्ण की रासलीला व गोवर्धन धारण, उड़ती परियाँ, हुमा पक्षी तथा लम्बी गर्दन की सुराही दिखाई गई है।
- परासरामपुरा की राव शार्दुल की छतरी, जिसे उनके पाँच पुत्रों — ज़ोरावर सिंह, किशन सिंह, अखय सिंह, नवल सिंह व केसरी सिंह — ने बनवाया और पामदेव (पेमा) ने चित्रित किया, में गोवर्धन धारण, रासलीला, राम-रावण युद्ध तथा राम-लक्ष्मण-सीता की कथा अंकित है; चूरू की तकनेटों की छतरी में विवाह दृश्य, सवारी, पूजा तथा यूरोपीय सैनिक दर्शाए गए हैं।
- गनेड़ी (सीकर) की चाँदसिंह की छतरी, जिसे देवीसिंह ने बनवाया, में सीकर की ऐतिहासिक कथाएँ, दान-लीला, सिंहवाहिनी दुर्गा, नंदी पर शिव-पार्वती, सूर्य, इन्द्र, वराह अवतार, रामायण के दृश्य, हिरण का वध करते राम तथा संजीवनी बूटी लाते हनुमान अंकित हैं, और हर दृश्य के नीचे पात्रों के नाम लिखे गए हैं — यह विशेषता सीकर की रेंगस की छतरी में भी मिलती है, जहाँ के चित्रों में धार्मिक विषयों की प्रधानता है।
- पातोदा (सीकर) की डूंगजी-जवाहरजी की छतरी 19वीं सदी के उत्तरार्ध की चित्रशैली का प्रतिनिधित्व करती है और शेखावाटी भित्ति चित्रकला के स्वर्ण युग को चिह्नित करती है, जबकि मालसीसर की प्रेमगिरि गोस्वामी की छतरी इतनी सुंदर चित्रित है कि स्थानीय लोग इसे 'सोने की दुकान' कहते हैं।
🏠हवेलियाँ: जनजीवन, पौराणिकता व आधुनिकता
- मानवीय व लोक-प्रेम प्रसंग नवलगढ़ की माहेश्वरियों की हवेली (वधू की विदाई), कन्हैयालाल बागला की हवेली (ढोला-मारू), नागल हवेली (हीर-राँझा व एक सेठ-मुनीम दृश्य) तथा मोतीलाल सिंघानिया की हवेली (ग्रामीण वेशभूषा में एक स्त्री) में मिलते हैं।
- दैवीय व पौराणिक विषय मंडावा की हवेलियों (बकासुर वध करते कृष्ण), मुकुन्दगढ़ की हवेलियों (सुंदर दशावतार शृंखला), जगन्नाथ गोयनका की हवेली (अर्धनारीश्वर) तथा लालचंद गोयनका की हवेली (डाकिनी को प्रसन्न करना) में मिलते हैं, जिसके फतेहपुर स्थित हमनाम में कृष्ण की आठ गोपियों को हाथी के आकार में दर्शाने वाला प्रसिद्ध चित्र है।
- विदेशी व औपनिवेशिक-कालीन विषय भी दिखते हैं — गणेशलाल की हवेली में जिराफ़, फतेहपुर की हवेली में सोनी-महिवाल, चचरिया की हवेलियों में अंग्रेज़, चतुर्भुज डालमिया की हवेली में अंग्रेज़ी बैंड, मोहनलाल नेवटिया हवेली में हवाई जहाज़, नवलगढ़ की एक हवेली में रेड कोर्ट परेड, तथा रामजीलाल कैड़िया हवेली में कंपनी स्कूल शैली का दृश्य।
- पोदारों की हवेलियों को क्षेत्र के सर्वोत्कृष्ट चित्रों वाला माना जाता है, अजीतगढ़ की हवेलियाँ अपनी सुंदरता के लिए सराही जाती हैं, इस्माइलपुर की नागरमल सोमानी की हवेली को स्थानीय रूप से 'चित्तौड़गढ़' कहा जाता है, और केसरदेव सर्राफ की हवेली अपने घूँघट काढ़े स्त्री के चित्र के लिए जानी जाती है।
💧बावड़ियाँ: कुओं-बावड़ियों के भित्ति चित्र
- शेखावाटी की भित्ति-अलंकृत बावड़ियों में फतेहपुर की अलफ खान की बावड़ी, झुंझुनूं की मेड़तानी की बावड़ी, उदयपुरवाटी की साह मोहनजी की बावड़ी तथा खंडेले की बावड़ी शामिल हैं।