राजस्थान की चित्रकला
Painting Traditions of Rajasthan
शैलचित्रों से लेकर मेवाड़, मारवाड़, ढूँढाड़ व हाड़ौती की शाही चित्रशालाओं तक — राजस्थान की समृद्ध लघुचित्र परम्परा, उसके प्रमुख चित्रकारों और आधुनिक कलाकारों की एक झलक।
उद्भव, नामकरण एवं विशेषताएँ
राजस्थानी चित्रकला की जड़ें प्राचीन शैलाश्रयों में कैसे जमीं, विद्वानों की दशकों की बहस के बाद इसे अपना नाम कैसे मिला, और वह दृश्य पहचान कैसे बनी जो आज भी इसे अलग खड़ा करती है।
🪨उद्भव एवं शैलचित्र
- भारत में लघु चित्रकारी (मिनिएचर पेंटिंग) की शुरुआत मुगलों के साथ हुई, जिसमें ताड़पत्र, कागज, लकड़ी व वस्त्र को आधार सामग्री बनाया जाता था; लेकिन राजस्थान के सबसे पुराने चित्रित अवशेष इससे भी पहले के शैलाश्रयों (रॉक शेल्टर) में मिलते हैं।
- ये शैलाश्रय कोटा जिले में चम्बल किनारे स्थित 'दर', भरतपुर के बंध बरौठा, बैराठ-विराटनगर की पहाड़ियों और पुष्कर में मिलते हैं; हाड़ौती में मुकुन्दरा-दर्रा व आलनिया नदी के आसपास तो करीब 30,000 वर्ष पुराने शैलचित्र खोजे गए हैं, जिन्हें पुरातत्वविदों ने 'प्राचीन युग की चित्रशाला' नाम दिया।
- तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने 1608 ई. में मरुप्रदेश (मारवाड़) के 7वीं सदी के चित्रकार श्रृंगधर का उल्लेख किया, जो राजा सील के दरबारी चित्रकार थे; राजस्थान के सबसे प्राचीन उपलब्ध चित्रित ग्रन्थ 1060 ई. के 'ओघ नियुक्ति वृत्ति' व 'दशवैकालिका सूत्र चूर्णि' हैं, जो जैसलमेर के जिनभद्रसूरि ग्रन्थ भण्डार में सुरक्षित हैं।
🌱राजस्थानी शैली का उद्भव
- 15वीं सदी के अंत तक अपभ्रंश शैली से एक विशुद्ध राजस्थानी चित्रकला शैली उभरी; मेवाड़ को इसकी जन्मभूमि माना जाता है, क्योंकि यह अजंता चित्रशैली से पूरी तरह प्रभावित थी।
- शुरुआत में इस पर जैन, गुजराती व अपभ्रंश शैलियों का प्रभाव रहा, बाद में मुगल चित्रकला ने भी इसे नया रंग दिया।
- स्व. आनंद कुमार स्वामी ने 1916 ई. में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'राजपूत पेंटिंग' में इस शैली का पहला वैज्ञानिक वर्गीकरण किया और राजस्थानी व पहाड़ी शैलियों को मिलाकर 'राजपूत चित्रकला' नाम दिया।
🏷️नामकरण विवाद
- विद्वानों में इस शैली के नाम को लेकर मतभेद रहा है - आनंद कुमार स्वामी, ओ.सी. गांगुली व हैवेल ने इसे 'राजपूत चित्रकला' कहा, जबकि W.H. ब्राउन ने अपनी पुस्तक 'इण्डियन पेंटिंग्स' में इसे 'राजपूत कला' नाम दिया।
- रायकृष्णदास ने इसे सीधे 'राजस्थानी चित्रकला' नाम दिया, जो आज सबसे प्रचलित है, जबकि N.C. मेहता ने अपनी पुस्तक 'स्टडीज इन इण्डियन पेंटिंग्स' में इसे 'हिन्दू चित्रकला' कहा।
⚖️स्वर्णयुग व प्रभाव पर मत
- राजस्थानी चित्रकला के स्वर्णयुग को लेकर भी राय बँटी हुई है - RBSE कक्षा 12वीं के अनुसार कुछ विद्वान 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध व 18वीं सदी के आरम्भिक काल को स्वर्णयुग मानते हैं, जबकि REET L-2, 2021 के पेपर में केवल 17वीं सदी को स्वर्णकाल बताया गया है।
- डॉ. स्मिथ के अनुसार राजस्थानी चित्रकला बौद्ध चित्रकला से भी प्रभावित रही है।
🖌️शैली की विशेषताएँ
- राजस्थान के किलों, मंदिरों, महलों व हवेलियों में यह चित्रकला सबसे अधिक देखने को मिलती है; चित्रकारों ने ऋतुओं का शृंगारिक चित्रण कर मानव जीवन पर उनके प्रभाव को उकेरा।
- लोक जीवन से निकटता, भावों की गहराई, विषय व रंग की विविधता तथा देश-काल के अनुरूप प्रकृति-चित्रण इसकी पहचान बनाते हैं; मुगल दरबार की तुलना में यहाँ के चित्रकारों को अधिक स्वतंत्रता मिली, इसलिए आम जनजीवन व लोक विश्वासों को भी भरपूर जगह मिली।
- नारी सौन्दर्य के चित्रण में विशेष सजगता बरती गई; रचना में समग्रता झलकती है - हर तत्व विषय से जुड़ा रहता है और मुख्य आकृति व पृष्ठभूमि को बराबर महत्त्व मिलता है। कलाकारों ने प्रकृति को निर्जीव न मानकर मानव सुख-दुःख से जुड़ी चेतन सत्ता माना, इसलिए नायक के भाव प्रकृति में भी झलकते हैं।
मेवाड़ स्कूल
राजस्थानी चित्रकला की जननी मानी जाने वाली मेवाड़ शैली और उससे निकली उदयपुर, नाथद्वारा, देवगढ़, चावंड व शाहपुरा उपशैलियों की झलक।
👑मेवाड़ शैली - प्रारम्भ
- मेवाड़ क्षेत्र को राजस्थानी चित्रकला का प्राचीनतम केन्द्र व जन्मस्थान माना जाता है; इसे शैलियों की 'जनक शैली' भी कहा जाता है, क्योंकि यह राजस्थानी चित्रकला का सबसे शुरुआती व स्वदेशी रूप है।
- कला के उत्थान की दृष्टि से महाराणा कुंभा का काल मेवाड़ शैली का स्वर्णकाल कहलाता है; परंपरा के अनुसार शैली की शुरुआत रागमाला चित्रों से हुई, जिसे 1605 ई. में चावण्ड में चित्रकार निसारदीन ने रचा - रागमाला चित्रण रागों व रागिनियों की सचित्र व्याख्या है।
- महाराणा अमरसिंह-प्रथम के शासनकाल में 1615 ई. के बाद मेवाड़ शैली पर मुगल प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा; इसके प्रमुख केन्द्र शाहपुरा, बेगूँ व आसींद रहे।
📜प्राचीनतम मेवाड़ी ग्रन्थ
- मेवाड़ शैली का सबसे पुराना चित्रित ग्रन्थ 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' है, जो 1260 ई. में गुहिल शासक तेजसिंह के समय कमलचन्द्र द्वारा आघाटपुर में चित्रित हुआ; ताड़पत्र पर बना यह पहला प्राप्त ग्रन्थ है, जिसे सबसे पहले आनंद कुमार स्वामी ने प्रकाशित करवाया।
- 'सुपासनाह चरियम' (सुपार्श्वनाथ चरितम) महाराणा मोकल के काल में देलवाड़ा में चित्रकार हीरानन्द द्वारा 1422-23 ई. में चित्रित हुआ, जिसका उल्लेख 'विजयवल्लभ सूरि स्मारक ग्रन्थ' में मिलता है; मेवाड़ शैली में 'आसिफ खाँ रो बेटो' अंकित 'फर्रुख़फाल' नामक चित्र भी उल्लेखनीय है।
- अन्य उल्लेखनीय चित्रित ग्रन्थों में महाराणा कुंभा कालीन 'रसिकाष्टक' (चित्रकार पं. भीखमचंद), गोगुन्दा में चित्रित 'गीत गोविंद' (चित्रकार जयदेव), महाराणा उदयसिंह कालीन 'भागवतपुराण का परिजात अवतरण' (चित्रकार नानाराम), चंपावती के प्रेम पर आधारित 'चौर-पंचाशिका' (चित्रकार विल्हण) तथा नई दिल्ली के संग्रहालय में सुरक्षित 'ढोला-मारू री चौपाई' शामिल हैं।
🐟मेवाड़ शैली - चित्रकार व विशेषताएँ
- मीनकृत नयन (मछली-जैसी आँखें) व नारी अंकन इस शैली की खास पहचान है; हाथी, शेर, हिरण, घोड़े, चकोर, हंस व मयूर जैसे पशु-पक्षी भी खूब चित्रित हुए। लाख के लाल, चमकीले पीले, हरे, नीले व सफेद रंगों का प्रयोग हुआ; विषयों में श्रीमद् भागवत, सूरसागर, गीत-गोविंद, कृष्णलीला के साथ दरबार व शिकार के दृश्य प्रमुख रहे।
- मुख्य चित्रकार साहिबदीन (रागमाला, गीत गोविंद, रसिक प्रिया, भागवत पुराण) व मनोहर (गीत गोविंद, सूरसागर, रामायण) थे; अन्य उल्लेखनीय नामों में निसारदीन, जयराम, जीवा, गंगाराम, कृपाराम, जगन्नाथ, चोखा, भोपा, नंगा व नूरुद्दीन शामिल हैं। महाराणा संग्राम सिंह के काल में चित्रकार नूरुद्दीन ने पंचतंत्र की कथा 'कलीला दमना' (शेर के दरबारी गीदड़ों की कहानी) पर आधारित चित्र बनाए, जो अल-बरूनी के अनुसार मूलतः पंचतंत्र का ही अनुवाद है।
🎋उदयपुर शैली
- मेवाड़ शैली का स्वर्णकाल महाराणा जगतसिंह-प्रथम (1628-1652 ई.) का काल माना जाता है, जब रसिकप्रिया, गीतगोविंद, भागवत पुराण, रामायण व भ्रमरगीत जैसे विषयों पर बेहतरीन काम हुआ; इसी दौर में उदयपुर के राजमहल में स्थापित शाही चित्रकार्यशाला 'चितेरों की ओवरी' (उपनाम 'तस्वीरां रो कारखानों') की स्थापना हुई, जिसके प्रमुख चित्रकार को 'दारोगा' कहा जाता था।
- प्रमुख चित्रकार मनोहर व साहिबदीन (जिन्हें महाराणा जगतसिंह का सीधा संरक्षण मिला) रहे, साथ ही नसीरुद्दीन, नूरुद्दीन, जगन्नाथ व नैनसुख जैसे नाम भी उल्लेखनीय हैं; प्रमुख रंग लाल व पीला थे और हाथी, चकोर, कमल, हंस, मयूर व मछली प्रमुखता से अंकित हुए।
- पुरुष आकृतियाँ गठीले बदन, छोटे कद, लम्बी मूँछों, उदयपुरी पगड़ी व मोतियों की कलंगी से पहचानी जाती हैं, जबकि स्त्री आकृतियाँ मीनाकृत आँखों, लम्बी नाक, पारदर्शक वस्त्रों व नीम के पत्ते जैसी भौंहों से; साहिबदीन ने रागमाला (1628), गीत गोविंद व भागवत पुराण (1648) रचे, जबकि महाभारत का चित्रांकन महाराणा जयसिंह के समय हुआ और बिहारी सतसई जगन्नाथ ने चित्रित की।
🐄नाथद्वारा शैली एवं पिछवाई
- नाथद्वारा शैली की शुरुआत करीब 1671 ई. से मानी जाती है और इसका विकास महाराणा राजसिंह के समय हुआ; इस पर वल्लभ सम्प्रदाय का गहरा प्रभाव रहा और चित्रण मुख्यतः श्रीकृष्ण के बालरूप का हुआ। इसकी सबसे बड़ी देन 'पिछवाई' चित्रण है - वैष्णव मंदिरों में राधा-कृष्ण व श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे लगाए जाने वाले कपड़े पर बने रंगीन पर्दे, जिनकी विषयवस्तु प्रायः रासलीला रहती है और जो कोटा, बूँदी, किशनगढ़ व नाथद्वारा में अलग-अलग रूपों में बनते हैं।
- प्रमुख रंग हरा व पीला थे; गाय, मोर व केले के वृक्ष तथा आसमान में देवताओं का अंकन इसकी खास पहचान है। हाथी दाँत पर चित्रण को इस शैली की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है; यह शैली उदयपुर व ब्रज चित्रकला का मेल है, जिसमें रूपक (सांकेतिक) चित्रों की प्रधानता रहती है। अन्नकूट, छप्पन भोग, नाव का मनोरथ, यमुना स्नान, हिंडोला व जन्माष्टमी जैसे वार्षिक उत्सवों की झाँकियाँ भी खूब बनीं।
- श्रीरामचन्द्र बाबा, घनश्याम, नरोत्तम शर्मा, चतुर्भुज व घासीराम जैसे चित्रकारों के साथ महिला चित्रकार कमला व इलायची भी उल्लेखनीय हैं। पिछवाई में प्रयुक्त रंगों में हिंगलू, पियावड़ी, सफेदा, नील, हड़मच व सोने-चाँदी की स्याही शामिल हैं; मूर्ति की दीवार पर टँगा पटचित्र 'दिवालगिरी' कहलाता है और छत पर सिर के ऊपर लगने वाला 'चन्दोवा'।
🌾देवगढ़, चावंड व शाहपुरा उपशैलियाँ
- देवगढ़ उपशैली को सबसे पहले प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ. श्रीधर अंधारे को जाता है; देवगढ़ ठिकाने की स्थापना द्वारकादास चूँडावत ने 1680 ई. में की, जहाँ 16 उमराव सामंत रहे। इस पर मारवाड़, जयपुर व मेवाड़ - तीनों शैलियों का मिला-जुला असर दिखता है, प्रमुख रंग हरा-पीला रहा और मरुस्थली परिवेश, शिकार व अंतःपुर जैसे विषय प्रमुख थे; बगता, कँवला-I, कँवला-II व चोखा जैसे चित्रकारों के भित्ति चित्र अजारा की ओवरी व मोती महल में देखे जा सकते हैं।
- महाराणा प्रताप ने चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया, और यहीं उनके काल में मशहूर कृति 'ढोला-मारू' चित्रित हुई; चावंड शैली का स्वर्णकाल महाराणा अमरसिंह-प्रथम का समय माना जाता है, जब चित्रकार नसीरुद्दीन (निसारदीन) ने 1605 ई. में प्रसिद्ध 'चामण्ड रागमाला' रची।
- शाहपुरा ठिकाने की स्थापना बादशाह शाहजहाँ ने की; इस उपशैली पर लोकजीवन का गहरा असर रहा और चित्रण फड़ शैली में हुआ। श्रीलाल जोशी व दुर्गालाल जोशी यहाँ के प्रमुख चित्रकार थे, जिनकी उल्लेखनीय कृतियों में राजा उम्मेदसिंह का व्यक्ति-चित्र व एक रागमाला सेट शामिल हैं।
मारवाड़ स्कूल
राजस्थान की प्रांतीय मुगल शैली कहलाने वाला मारवाड़ स्कूल — जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, अजमेर, नागौर व जैसलमेर की चित्र-परंपराओं का संगम।
🏇मारवाड़ स्कूल - परिचय
- मारवाड़ की सीमाओं में विकसित चित्रकला को मारवाड़ स्कूल कहा जाता है, जिसे राजस्थान की 'प्रान्तीय मुगल शैली' भी कहा जाता है और जो पंचतंत्र के चित्रांकन के लिए विशेष रूप से जानी जाती है।
- मेवाड़ की तरह यहाँ भी गुजरात व अन्य क्षेत्रों से आए चित्रकारों ने अजंता परम्परा को आधार बनाकर राठौड़ शासकों के संरक्षण में चित्रांकन किया, जिसका शुरुआती रूप मण्डोर में देखने को मिलता है।
🐎जोधपुर शैली - उद्भव व चित्रित ग्रन्थ
- मारवाड़ की सांस्कृतिक व कलात्मक परम्परा को नया रूप देने का श्रेय राव मालदेव को जाता है; जोधपुर के चोखेलाव महल में मारवाड़ शैली के चित्रों का संग्रह सुरक्षित है। महाराजा मानसिंह के समय बूँदी नरेश भाणसिंह के राजकवि मतिराम रचित 'रसराज' पर आधारित 63 चित्रों की एक महत्त्वपूर्ण शृंखला बनी।
- 1591 ई. में मारवाड़ शैली में चित्रित 'उत्तराध्ययन सूत्र' बड़ौदा संग्रहालय में सुरक्षित है (कागज़ पर बनी प्रति जैसलमेर में है); महाराजा सूरसिंह (1595-1619 ई.) के काल में बिलावल रागिनी व भागवत के साथ उनका व्यक्ति चित्र तथा जोधपुर शैली में सर्वाधिक चित्रित प्रेमी-युगल 'ढोला-मारू' भी बना। गजसिंह के काल में वीरजी ने रागमाला रची और जसवंतसिंह (1638-1678 ई.) के समय रसिक प्रिया व सूरसागर चित्रित हुए।
🗡️जोधपुर शैली - विशेषताएँ व चित्रकार
- जोधपुर शैली का स्वतंत्र विकास राव मालदेव के समय हुआ; पुरुष आकृतियाँ लम्बे कद, घनी दाढ़ी-मूँछों, ऊँची पाग, मोती माला व हाथ में तलवार से पहचानी जाती थीं, जबकि स्त्री आकृतियों में मृगनयनी आँखें, धनुषाकार भौंहें, पतली कमर व पारदर्शी वस्त्र प्रमुख थे।
- प्रधान रंग पीला व लाल थे (हाशिये में पीले का विशेष प्रयोग); विषयों में ढोला-मारू, सूरसागर, पंचतंत्र, कामसूत्र, बारहमासा व गीत-गोविंद प्रमुख रहे, और वृक्ष-पशु-पक्षियों में ऊँट, कुरजाँ, घोड़ा व हिरण खास तौर पर उकेरे गए; इस शैली का पूर्ण विकास 16वीं-17वीं सदी में माना जाता है।
- प्रमुख चित्रकारों में वीरजी, राम, नाथा, गोविंद, छज्जू भाटी, कृपाराम, किशनदास, बिशनदास व शिवदास भाटी जैसे कई नाम शामिल हैं।
🏜️बीकानेर शैली
- मारवाड़ स्कूल की दूसरी प्रमुख शैली बीकानेर पर मुख्य रूप से मथैरण व उस्ता परिवारों का प्रभाव रहा; मथैरण एक जैन समुदाय है, जो शासकों के व्यक्तिगत चित्र बनाने में माहिर रहा और जिसे महाराजा अनूपसिंह के काल में संरक्षण मिला। उस्ता परिवार ऊँट की खाल पर सोने से चित्रण करने की अनूठी 'उस्ता कला' के लिए जाना जाता है, जो इस शैली की सबसे खास पहचान है।
- महाराजा रायसिंह (1574-1612 ई.) के काल में भागवत पुराण इस शैली का प्रारम्भिक चित्रण है और उनका व्यक्ति चित्र नूर मोहम्मद ने बनाया; रायसिंह ही उस्ता अली रजा व उस्ताद हामिद रुकनुद्दीन को मुगल दरबार से बीकानेर लाए। शैली का समृद्ध विकास महाराजा अनूपसिंह के समय हुआ, जब अलीरजा, रुकनुद्दीन व शाह मुहम्मद ने उस्ता चित्रण और मुन्नालाल, मुकुंद व चंदूलाल ने मथैरण चित्रण किया।
- प्रमुख रंग हरा, नीला व लाल थे; पुरुष आकृतियाँ उग्रभाव, शाहजहाँ-औरंगजेब शैली की पगड़ियों व हाथ में भाले से युक्त दिखाई गईं, जबकि पशु-पक्षियों में ऊँट, हिरण, सिंह व सारस तथा मुख्य वृक्ष नारियल प्रमुख रहा। चित्रों पर कलाकार व उसके पिता का नाम तथा तिथि (संवत्) अंकित करने की प्रथा इस शैली की खास पहचान है; स्वर्गीय हिसामुद्दीन उस्ता को ऊँट की खाल पर चित्रकारी के लिए 1986 ई. में पद्मश्री मिला, और जर्मन विद्वान हरमन गोएट्ज़ ने इस शैली पर 'आर्ट एण्ड आर्किटेक्ट ऑफ बीकानेर' नामक पुस्तक लिखी।
🌙किशनगढ़ शैली
- एरिक डिक्सन व डॉ. फैयाज अली को किशनगढ़ शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय जाता है; यह 18वीं सदी में मुख्यतः महाराजा सावंतसिंह (उपनाम नागरीदास) के समय विकसित हुई और उन्हीं के काल को इसका स्वर्णकाल माना जाता है, जब शैली को स्वतंत्र स्वरूप मिला। सावंतसिंह का निधन वृंदावन में हुआ था।
- इस शैली की सबसे मशहूर कृति 'बणी-ठणी' है - महाराजा सावंतसिंह की पासवान का चित्र, जिसे चित्रकार मोरध्वज निहालचंद ने बनाया और जिसमें बणी-ठणी को राधा तथा सावंतसिंह को कृष्ण के रूप में दिखाया गया। एरिक डिक्सन ने इसे 'भारत की मोनालिसा' नाम दिया, और 5 मई 1973 को इस पर आधारित 20 पैसे का डाक टिकट भी जारी हुआ।
- प्रधान रंग सफेद, गुलाबी, स्लेटी व सिन्दूरी थे; पुरुष आकृति पेचबंधी पगड़ी, लम्बी सुराहीदार गर्दन व घुटनों तक लम्बी भुजाओं से पहचानी गई, जबकि स्त्री आकृति खंजन-सी आँखों व चमेली की पंखुड़ी जैसे होठों से युक्त थी। इस शैली में भित्ति चित्रण व राग-रागिनी चित्रण बिल्कुल नहीं मिलता; इस पर कांगड़ा, कश्मीरी शैली व ब्रज साहित्य का प्रभाव है, और मोरध्वज निहालचंद अपने चित्रों के नीचे फारसी में हस्ताक्षर करते थे।
🕌अजमेर शैली
- अजमेर शैली पर हिन्दू, मुस्लिम व ईसाई - तीनों परम्पराओं का मिला-जुला प्रभाव रहा; इसकी उपशैलियाँ सावर व शाहपुरा थीं, और विषयों में अकबर की पैदल तीर्थयात्रा, दरगाह शरीफ, पच्चीकारी, मीनाकारी व राजा पाबूजी का व्यक्ति चित्र शामिल थे।
- पुरुष आकृतियाँ श्वेत जामा, मुगल-मारवाड़ी पगड़ी व कमर में कटार से युक्त दिखाई गईं, जबकि महिला आकृतियाँ लहँगा, ओढ़नी व पायजेब से सुसज्जित; इसमें लगभग सभी रंगों का प्रयोग हुआ। प्रमुख चित्रकारों में चाँद, तैय्यब, रामसिंह व महिला चित्रकार साहिबा शामिल थीं; जूनिया के चित्रकार चाँद द्वारा सन् 1698 में बनाया गया राजा पाबूजी का व्यक्ति चित्र इस शैली का अनूठा उदाहरण है।
🏰नागौर व जैसलमेर शैलियाँ
- नागौर शैली का विकास 18वीं सदी में नागौर के शासक बख्तसिंह के समय माना जाता है; इसकी खासियत वृद्धावस्था के चित्र, पारदर्शी वेशभूषा व धीमे रंगों का प्रयोग है, और इस पर जैन, दक्षिणी, अफगानी व मुगल शैलियों का मिला-जुला प्रभाव रहा। नागौर किले के बादल महल व शीशमहल के भित्ति चित्रों में राजसी ठाठ-बाट व आम जन-जीवन का मिश्रित रूप देखने को मिलता है।
- जैसलमेर शैली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पर मुगल या जोधपुर शैली का कोई असर नहीं है - यह पूरी तरह स्थानीय शैली है। इसका पहला ज्ञात चित्र 'महाराजा जसवंतसिंह की सवारी' (1710 ई.) है, जिसका उल्लेख डब्ल्यू.जी. आर्चर की पुस्तक 'इण्डियन मिनिएचर' में मिलता है।
ढूँढाड़ व हाड़ौती स्कूल
जयपुर के आसपास पनपे ढूँढाड़ स्कूल (आमेर, जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी) तथा हाड़ौती की माटी में रचे-बसे बूँदी, कोटा व झालावाड़ चित्र-कलम की कहानी।
🐘आमेर शैली
- जयपुर व आसपास के क्षेत्र को 'ढूँढाड़' कहा जाता है, इसलिए वहाँ पनपी चित्रशैली ढूँढाड़ शैली कहलाई, जिसका शुरुआती रूप आमेर शैली के रूप में विकसित हुआ और मौजमाबाद इसका गढ़ रहा। इस पर मुगल प्रभाव गहरा रहा, और इसका स्वर्णकाल मिर्जा राजा जयसिंह का काल माना जाता है।
- प्रमुख चित्रकार हुकमचंद, मुरली व मन्नालाल थे; प्रमुख कृतियों में आदिपुराण (चित्रकार पुष्पदत्त, पालम में 1540 ई. में चित्रित), रुक्मणिनामा, सचित्र भागवत व बिहारी सतसई शामिल हैं। विषयों में शिकार, कुश्ती, योग, बैल की सवारी व राग-रागिनी प्रमुख रहे; प्राकृतिक रंगों जैसे हिरमिच, गेरू व सफेदा के साथ चार-नोक वाला चाकदार जामा व जहाँगीरी पगड़ी वेशभूषा में आम थी।
🌷जयपुर शैली - चित्रकार, विषय व स्वर्णकाल
- महाराजा सवाई जयसिंह के दरबारी चित्रकार मुहम्मद शाह के साथ साहिबराम, सालिगराम, घासी, रघुनाथ व लालचंद जैसे अनेक कलाकार जुड़े रहे; विषयों में आदमकद चित्र, शिकार-युद्ध के दृश्य, कृष्णलीला, रागमाला, महाभारत, रामायण व वात्स्यायन का 'कामसूत्र' प्रमुख रहे।
- प्रमुख रंग लाल, पीला, हरा, नीला व सफेद थे; पुरुष आकृतियाँ दाढ़ी-विहीन साफ चेहरे व खंजनाकार आँखों से पहचानी गईं, जबकि स्त्री आकृतियाँ बड़ी मीन-सदृश आँखों व धनुष जैसी भौंहों से। शैली का स्वर्णकाल महाराजा सवाई प्रतापसिंह का माना जाता है, जो 'ब्रजनिधि' नाम से काव्य रचते थे और जिन्होंने 21 ग्रन्थ रचे।
- सवाई जयसिंह तृतीय व महाराजा रामसिंह द्वितीय के समय कंपनी शैली का प्रभाव दिखने लगा; रामसिंह द्वितीय ने 1857 ई. में कलाकारों के लिए 'मदरसा ए हुनरी' (महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स) की स्थापना की और जयपुर को गुलाबी रंग से पुतवाकर इसे 'पिंक सिटी' नाम दिलवाया।
🖼️जयपुर शैली - तकनीक व प्रमुख कृतियाँ
- बड़े कैनवासों पर बने राजा-महाराजाओं के आदमकद व्यक्ति-चित्र जयपुर शैली की खास पहचान हैं - इसकी शुरुआत ईश्वरीसिंह के काल में चित्रकार साहिबराम ने की और महाराजा ईश्वरीसिंह का ऐसा ही एक चित्र बनाया। आलागीला (ताजे चूने के प्लास्टर पर चित्रण) व मोराकसी फ्रेस्को तकनीकों की शुरुआत भी सबसे पहले आमेर में हुई, और माधोसिंह द्वितीय के समय छाजूराम ने हवामहल का चित्र बनाया।
- प्रसिद्ध भित्ति चित्र पुरोहितजी की हवेली, आमेर भोजनशाला व सिसोदिया रानी महल में मिलते हैं; जयपुर शैली पर सबसे अधिक मुगल प्रभाव दिखाई देता है, और इसका असर ईसरदा, उणियारा, चौमूँ व सामोद जैसे ठिकानों तक फैला, जहाँ 'ठिकाना पेंटिंग' विकसित हुई। सूरतखाना महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा संचालित 36 कारखानों में से एक था।
- गुलिस्ताँ की पाण्डुलिपि का चित्रण इस शैली की उल्लेखनीय कृति है, जिसके सुलेखित व चित्रित खण्ड में सभी चित्र बलदेव व गुलामअली ने बनाए; इसमें हरे-नीले के साथ सुनहरे रंग का खूब प्रयोग हुआ और हाथी दाँत पर चित्रण, नाथों-जोगियों के चित्र व कुरान का चित्रण भी विषयों में शामिल रहा।
🦅अलवर शैली
- अलवर चित्रकला में महाराजा विनयसिंह का वही स्थान है जो मुगल चित्रकला में अकबर का था, और उनका शासनकाल इस शैली का स्वर्णकाल माना जाता है; राव राजा बलवंतसिंह के दरबारी कलाकार जमनादास अपने चित्रों पर राजा व स्वयं का नाम-संवत् दोनों अंकित करते थे।
- हाथीदाँत पर बने अनेक व्यक्ति-चित्र इस शैली की अनूठी विशेषता हैं, जो मूलचन्द व उदयराम जैसे चित्रकारों ने महाराजा मंगलसिंह के काल में बनाए; महाराजा श्री जयसिंह की सवारी का 10 फुट लंबा व 2 फुट चौड़ा चित्र इसकी प्रमुख कृति है। राजा बलवंत सिंह के समय छोटेलाल व सालिगराम ने 'दुर्गा सप्तशती' का चित्रण किया।
- कामशास्त्र, गणिकाओं के चित्र व योगासन इस शैली के प्रमुख विषय रहे, जो ईरानी, मुगल व जयपुर शैलियों का संतुलित समन्वय दर्शाती है; चिकने-उज्ज्वल रंगों तथा सफेद बादल व शुभ्र आकाश के अंकन के कारण इसके चित्र अंग्रेजी चित्रों से मिलते-जुलते लगते हैं।
🏡उणियारा व शेखावाटी उपशैलियाँ
- उणियारा उपशैली जयपुर व बूँदी शैलियों के मेल से विकसित हुई, और यहाँ कोटा-बूँदी शैली के लक्षण भी मिलते हैं; धीमा, मीरबख्श, काशीराम व बख्ता जैसे चित्रकारों तथा नरूका ठिकाने के संरक्षण ने इसे आगे बढ़ाया। रंगमहल के चित्रों में बूँदी व जयपुर कलम का मिश्रित असर दिखता है, और मीरबक्स ने 18वीं सदी में 'राम-सीता, लक्ष्मण व हनुमान' के चित्र बनाए।
- शेखावाटी शैली जयपुर व आमेर शैलियों के प्रभाव से विकसित हुई और मुख्यतः भित्ति चित्रण के लिए मशहूर है; शेखावाटी की हवेलियों में यह परंपरा 19वीं सदी में अपने चरम पर पहुँची, जिस पर कंपनी शैली का भी पूरा असर रहा। आलागीला, आराइश व मोराकसी जैसी फ्रेस्को तकनीकों का यहाँ खूब प्रयोग हुआ, और विषयों में पशु-पक्षी, देवी-देवता, मल्लयुद्ध व लोककथाएँ शामिल रहीं।
🦚बूँदी शैली
- बूँदी शैली का विकास बूँदी शासक राव सुरजन हाड़ा (1554-1585 ई.) के समय से माना जाता है, जिस पर ईरानी, दक्कनी, मराठा व मेवाड़ी असर रहा; 1569 ई. में राव सुरजन के अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बाद इसमें मुगल शैली का प्रभाव भी दिखने लगा, और इसका सर्वाधिक विकास 18वीं सदी में हुआ।
- प्रमुख चित्रकारों में लच्छीराम, अहमद अली, गोविंदराज, नूर मोहम्मद व रघुनाथ शामिल थे; प्रमुख रंग हरा था, और विषयों में राग-रागिनी, नायिका-भेद, ऋतु-वर्णन, बारहमासा व मतिराम के रसराज पर आधारित चित्रण प्रमुख रहे। महारावल शत्रुशाल (छत्रशाल) ने भित्तिचित्रों से सजा रंगमहल बनवाया, और महाराव उम्मेदसिंह के काल में बूँदी चित्रशाला व दुर्ग स्थित रंगविलास चित्रशाला बनी।
- पशु-पक्षियों व प्राकृतिक सौन्दर्य का सतरंगा चित्रण बूँदी शैली की खास पहचान है - वर्षा में नाचते मोर, उड़ते पक्षी, कमलों से भरे सरोवर व कलाबाजी दिखाते वानर इसमें आम दृश्य हैं; उम्मेदसिंह के काल में बना 1750 ई. का जंगली सूअर के शिकार का चित्र प्रसिद्ध है, और दुगारी किले की चित्रकला भी इसी शैली से जुड़ी मानी जाती है।
🐅कोटा व झालावाड़ शैलियाँ
- कोटा शैली बूँदी, मुगल व स्थानीय परिवेश के मिले-जुले असर से एक स्वतंत्र शैली के रूप में उभरी, जिसका श्रेय राव रामसिंह को जाता है; महाराव उम्मेदसिंह प्रथम के काल को इसका सर्वाधिक व उत्कृष्ट चित्रांकन काल माना जाता है, और महाराव भीमसिंह के समय वल्लभ सम्प्रदाय के प्रभाव से कृष्ण-लीला के चित्र भी बनने लगे।
- प्रमुख चित्रकार रघुनाथ, गोविंदराम, डालू, लच्छीराम व नूरमोहम्मद थे; शिकार के बहुरंगी दृश्य इस शैली की पहचान बन गए, जिसमें रानियों को भी शिकार करते दिखाया गया, और बड़ी वस्लियों पर सामूहिक शिकार का अंकन हुआ। महाराव गुमानसिंह के काल में चित्रकार डालू ने 1768 ई. में रामकिशन-रचित रागमाला का चित्रण किया, जो कोटा शैली का सबसे बड़ा रागमाला सेट है।
- हाशिये लाल-नीले रंग के होते थे और मुख्य चित्र के चारों ओर हरी रेखा खींची जाती थी; पुरुष आकृतियाँ भारी-गठीले बदन व बड़ी दाढ़ी-मूँछों से पहचानी गईं। झालावाड़ उपशैली पर कोटा शैली का प्रभुत्व रहा और इसमें राजसी वैभव, श्रीनाथजी-मथुरेशजी की लीलाओं व ज्यामितीय बेलबूटों का उत्तम चित्रांकन हुआ।
आधुनिक चित्रकार, आलोचक व कला संस्थाएँ
पारम्परिक शैलियों से आगे बढ़कर राजस्थान में उभरे आधुनिक चित्रकार, इस कला का अध्ययन करने वाले विद्वान-आलोचक, तथा कला को संस्थागत रूप देने वाली अकादमी व केंद्र।
🖌️आधुनिक चित्रकला के अग्रदूत
- उदयपुर में 1860 ई. में जन्मे कुंदनलाल मिस्त्री को राजस्थान में आधुनिक चित्रकला की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है; उन्हें वेलिंगटन पुरस्कार व 'चित्रकला भूषण' उपाधि मिली, और उनके प्रसिद्ध चित्रों में 'कुम्हारिन बाजार की ओर' शामिल है। उन्होंने उदयपुर में महाराणा प्रताप का जो चित्र बनाया, उसकी प्रतिकृति बाद में मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा ने भी बनाई।
- 1848 ई. में केरल के किलिमन्नूर में जन्मे राजा रवि वर्मा को 'भारतीय चित्रकला के पितामह' कहा जाता है - वे पाश्चात्य यथार्थवादी शैली में चित्रांकन करने वाले भारत के पहले आधुनिक चित्रकार माने जाते हैं; नाथद्वारा में जन्मे घासीराम का प्रसिद्ध चित्र 'महाराणा प्रताप' (1930 ई.) है, और पन्नालाल गौड़ 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में शाही कार्यशाला 'चितेरों की ओवरी' के मुखिया रहे।
🦌'चितेरा' उपनाम वाले प्रकृति-प्रेमी चित्रकार
- बालेर (सवाई माधोपुर) में 1905 ई. में जन्मे श्रीराम गोपाल विजयवर्गीय को 'कला रत्न' की उपाधि मिली और वे राजस्थान ललित कला अकादमी के पहले 'कलाविद्' सम्मान पाने वाले कलाकार (1970 ई.) भी बने; उनके गुरु शैलेन्द्रनाथ डे थे और मेघदूत, गीतगोविंद जैसे विषय उनके प्रमुख चित्रों में शामिल हैं।
- मऊ (सीकर) में 1922 ई. में जन्मे कृपाल सिंह शेखावत को 'ब्लू पॉटरी के जादूगर' कहा जाता है और वे भारत के संविधान की मूल प्रति के चित्रांकन के लिए भी जाने जाते हैं (पद्मश्री, 1974); बीकानेर के धोंधलिया गाँव में जन्मे भूरसिंह शेखावत को नेहरू जी की प्रशंसा मिली और वे 'गाँव का चितेरा' कहलाए।
- अलवर में 1917 ई. में जन्मे देवकीनन्दन शर्मा को 'Master of Nature & Living Objects' कहा जाता है, जिन्होंने 1953 ई. में वनस्थली विद्यापीठ में भित्ति चित्रण कार्यशाला शुरू की; कांकरोली में जन्मे गोवर्धनलाल जोशी 'बाबा' 'भीलों का चितेरा' कहलाए, कोटा में जन्मे परमानन्द चोयल 'भैंसों का चितेरा' तथा बारां के डॉ. जगमोहन माथोड़िया 'श्वानों का चितेरा' कहलाए - इनका नाम अधिक श्वान-चित्रण के लिए लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।
- बीकानेर में जन्मे द्वारका प्रसाद शर्मा 'घोड़ों की शृंखला' के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने परम्परावादी कला इलाही बक्श उस्ता से व यथार्थवादी कला मूलर से सीखी; अजमेर में 1938 ई. में जन्मे सुरेश चन्द्र राजोरिया 'प्रकृति का चितेरा' कहलाए, और जयपुर में जन्मे सौभागमल गहलोत को उनके स्वर्ण-पदक विजेता चित्र 'नेस्ट' (1930 ई.) के कारण 'नीड़ का चितेरा' कहा गया।
🎭अन्य उल्लेखनीय आधुनिक चित्रकार
- अलवर के तोलावास में 1929 ई. में जन्मे जयसिंह नीरज ने 'स्प्लेन्डर ऑफ राजस्थानी पेंटिंग' सहित कई किताबें लिखीं; बीकानेर में 1936 ई. में जन्मे प्रेमचंद गोस्वामी ने 'भारतीय चित्रकला का इतिहास' लिखी, और जयपुर के नयन गाँव में 1943 ई. में जन्मे एम.के. शर्मा 'सुमहेन्द्र' ने 'कलावृत्त' पत्रिका व संगठन दोनों की स्थापना की।
- उदयपुर में 1914 ई. में जन्मे नंदलाल शर्मा ('ए व्यू ऑफ उदयपुर' के चित्रकार), 1943 ई. में जन्मे कन्हैयालाल वर्मा (जिन्होंने पद्मिनी के जौहर को चित्रित किया, फैलोशिप 2013-14), 1937 ई. में कोटा में जन्मे अमूर्त चित्रकार सुरेश शर्मा ('रेड ऑन रेड' के लिए मशहूर) तथा 1973 ई. में मथुरा में जन्मे राम जैसवाल (कैनवास आर्टिस्ट्स ग्रुप, अजमेर के संस्थापक) राजस्थान की आधुनिक चित्रकला की विविधता को दर्शाते हैं।
- जयपुर में 1887 ई. में जन्मे गोपीराम को महाराजा माधोसिंह ने 'राज्य चित्रकार' की उपाधि दी और वे 1912 ई. में भरतपुर के भी राज्य चित्रकार रहे; 1884 ई. में जन्मे चित्रकार रघुनाथ ने हल्दीघाटी युद्ध पर तैल-चित्र बनाए। जयपुर की महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स से जुड़े शैलेन्द्रनाथ डे (1923 ई. में नियुक्त) के शिष्यों में रामगोपाल विजयवर्गीय व देवकीनन्दन शर्मा जैसे कई नाम शामिल रहे, जबकि बंगाल के असित कुमार हलदार (जन्म 1890 ई.) इसी स्कूल के प्रधानाचार्य रहे।
- जर्मनी में 1878 ई. में जन्मे ए. हरमन मूलर को 1932 ई. में बीकानेर के महाराजा गंगासिंह बीकानेर लाए; उनकी प्रसिद्ध कृति 'वीर दुर्गादास' है और उनका निधन जोधपुर में हुआ।
📚कला के आलोचक व विद्वान
- कोलम्बो में 1877 ई. में जन्मे आनन्द कुमार स्वामी ने 1916 ई. की अपनी पुस्तक 'राजपूत पेंटिंग्स' में इस शैली का पहला वैज्ञानिक वर्गीकरण किया, और उनकी अन्य प्रमुख कृति 'The Dance of Shiva' है; 1904 ई. में जन्मे कार्ल जे. खण्डालावाला को 1970 ई. में पद्मश्री व 1980 ई. में ललित कला अकादमी फैलोशिप मिली।
- वाराणसी में 1892 ई. में जन्मे रायकृष्णदास ने इस शैली को 'राजस्थानी चित्रकला' नाम दिया और 'भारतीय चित्रकला' व 'भारतीय मूर्तिकला' जैसे लेख लिखे; एन.सी. मेहता ने 'गुजरात पेंटिंग' व 'स्टडीज इन इंडियन पेंटिंग' रचीं, जबकि ओ.सी. गांगुली ने 'मास्टर पीसेज ऑफ राजपूत पेंटिंग' लिखी।
- 1871 ई. में जन्मे अवनीन्द्रनाथ ठाकुर को 'आधुनिक भारतीय चित्रकला के पितामह' कहा जाता है - उन्होंने बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट व इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना की; डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार राजस्थानी चित्रशैली 'स्त्रियों की सुंदरता की खान' है, और डॉ. जगतनारायण ने राजस्थान में आलनियाँ के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज की।
🏛️राजस्थान ललित कला अकादमी व कला केन्द्र
- राजस्थान ललित कला अकादमी, जयपुर की स्थापना 24 नवम्बर 1957 ई. को हुई (प्रथम अध्यक्ष रायजी मेहता), और 1959 ई. में इसे स्वायत्त संस्थान बनाया गया; यह राज्य का सर्वोच्च कला सम्मान 'कलाविद्' (फैलोशिप) प्रदान करती है और दृश्य कला के साथ-साथ प्रदर्शनकारी कलाओं को भी बढ़ावा देती है।
- जयपुर का जवाहर कला केन्द्र (स्थापना 1993 ई., शिल्पकार चार्ल्स कोरिया) व राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट (मूल नाम हुनरी मदरसा, 1857 ई. में महाराजा रामसिंह द्वारा स्थापित) राज्य के प्रमुख कला संस्थान हैं; वनस्थली विद्यापीठ में 1937 ई. में चित्रकला विभाग व 1953 ई. में भित्ति चित्रण कार्यशाला की शुरुआत हुई।
- राज्यभर में कई कलाकार-संगठन सक्रिय रहे हैं, जैसे तूलिका कलाकार परिषद् (उदयपुर), प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप-पैग (जयपुर, 1970 ई.), कलावृत्त (जयपुर, 1970 ई.), रंगबोध (कोटा, 1971 ई.) व अलंकृति कलाकार समूह (अजमेर, 1997 ई., राम जैसवाल द्वारा स्थापित) - ये संगठन आज भी राजस्थान की सक्रिय कला-बिरादरी को जोड़े रखते हैं।