राजस्थान के प्रमुख साहित्य, कला एवं संगीत संस्थान
Major Literature, Art & Music Institutions of Rajasthan
राजस्थान की उन प्रमुख अकादमियों, कला केंद्रों, अभिलेखागारों व संग्रहालयों से परिचित हों जो प्रदेश की साहित्यिक, कलात्मक व सांगीतिक विरासत को सहेजते और आगे बढ़ाते हैं।
प्रदर्शनकारी कला व नृत्य संस्थान
राजस्थान की वे राजकीय संस्थाएँ जो शास्त्रीय नृत्य, नाट्य व संगीत की परम्पराओं को सार्वजनिक मंचों पर जीवंत बनाए रखती हैं।
🎻राजस्थान संगीत नाटक अकादमी
- जोधपुर में 1957 में स्थापित यह स्वायत्तशासी अकादमी राजस्थान की संगीत, नृत्य व नाट्य परम्पराओं के प्रचार-प्रसार, संरक्षण एवं उन्नयन के लिए कार्य करती है।
- इसका व्यापक उद्देश्य इन क्षेत्रीय कला रूपों को देश की साझा सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता को मजबूत करना है।
🎼राजस्थान संगीत संस्थान, जयपुर
- 30 दिसंबर 1950 को जयपुर में राजस्थान कला संस्थान नाम से स्थापित इस संस्थान में पहले से चल रही चित्रकला व मूर्तिकला शाखाओं के साथ एक नई संगीत शाखा जोड़ी गई; इसके प्रथम निदेशक ब्रह्मानंद स्वामी थे।
- 1980 में इस संस्थान को कॉलेज शिक्षा निदेशालय के अधीन कर दिया गया।
💃जयपुर कथक केन्द्र
- 1978 में सरकार द्वारा स्थापित यह केन्द्र जयपुर कथक घराने की शास्त्रीय नृत्य शैली के पुनरुद्धार व परिष्करण हेतु कार्यरत है; इसने औपचारिक प्रशिक्षण 19 मई 1979 से आरम्भ किया।
🌸गणगौर घूमर नृत्य अकादमी
- 1986 में राजमाता गोवर्धन कुमारी द्वारा घूमर लोकनृत्य के संरक्षण व प्रोत्साहन हेतु स्थापित यह अकादमी भारत की एकमात्र ऐसी अकादमी है जो घूमर के प्रामाणिक रजवाड़ी स्वरूप की शिक्षा देती है।
🎪रवीन्द्र मंच सोसायटी, जयपुर
- 15 अगस्त 1963 को राजस्थान सरकार द्वारा रवीन्द्र मंच के रूप में स्थापित इस संस्था का उद्देश्य नृत्य-नाटक व संगीत कला का पोषण था; 28 नवम्बर 1985 को सांस्कृतिक गतिविधियों को और गति देने हेतु इसे 'रवीन्द्र मंच सोसायटी' के रूप में पुनर्गठित किया गया।
- इसका मूल उद्देश्य आज भी कला व संस्कृति का संरक्षण, प्रदर्शन एवं संवर्द्धन बना हुआ है।
🎶वीणा संगीत समूह, जयपुर
- जयपुर के इस संगीत समूह के संस्थापक सदस्यों में सुजानगढ़ (चूरू) निवासी के.सी. मालू शामिल हैं, जिन्हें बाद में 'राजस्थान रत्न' सम्मान से नवाजा गया।
लोक संस्कृति व दृश्य कला संस्थान
उदयपुर की कठपुतली शोध संस्था से लेकर चार्ल्स कोरिया द्वारा डिज़ाइन किए गए जवाहर कला केन्द्र तक — ये संस्थाएँ राजस्थान की लोक व दृश्य कला विरासत की रक्षक हैं।
🪆भारतीय लोक कला मंडल, उदयपुर
- 1952 में पद्मश्री देवीलाल सामर द्वारा स्थापित यह संस्था प्रदर्शनकारी लोक कलाओं व कठपुतली कला के शोध, संरक्षण एवं प्रचार का कार्य करती है।
- इसका अध्ययन क्षेत्र राजस्थान तक सीमित नहीं, बल्कि गुजरात व मध्यप्रदेश की लोक कलाओं, संस्कृति, गीतों व त्योहारों तक भी फैला हुआ है।
🏺पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर (शिल्पग्राम सहित)
- भारत सरकार द्वारा स्थापित सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्रों में से एक, इसकी स्थापना 1986 में उदयपुर की बागोर की हवेली में हुई; इसका उद्देश्य लुप्त होती कलाओं को पुनर्जीवित करना व कलाकारों को मंच देना है, और इसका कार्यक्षेत्र गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात व राजस्थान तक फैला है।
- इसके निकट स्थापित शिल्पग्राम हस्तशिल्पियों को बढ़ावा देता है और यहाँ चारकोल चित्रकला जैसी प्रदर्शनियाँ भी आयोजित होती हैं।
🖼️जवाहर कला केन्द्र, जयपुर
- राज्य की पारम्परिक व लुप्त होती कलाओं के संरक्षण, शोध व समन्वित विकास हेतु 1989 में स्थापित इस केन्द्र का उद्घाटन 8 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने किया; भवन को वास्तुकार चार्ल्स कोरिया ने डिज़ाइन किया।
- यहाँ चाक्षुष कला, संगीत व नृत्य थियेटर तथा प्रलेखन से जुड़े कुल चार विभाग कार्यरत हैं।
🪕रूपायन संस्थान, बोरूंदा (जोधपुर)
- जोधपुर ग्रामीण स्थित बोरूंदा में 1960 में लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु स्थापित इस संस्थान के संस्थापक निदेशक प्रसिद्ध नृजातीय संगीतज्ञ कोमल कोठारी तथा पद्मश्री लोककथाकार-लेखक विजयदान देथा थे।
🖌️ललित कला अकादमी, जयपुर
- 24 नवम्बर 1957 को स्थापित यह अकादमी राजस्थान की दृश्य व शिल्पकला परम्पराओं को प्रोत्साहित करने तथा प्रांत की सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है।
🏢राष्ट्रीय ललित कला अकादमी, नई दिल्ली
- शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 5 अगस्त 1954 को इसका उद्घाटन किया और सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत 11 मार्च 1957 को इसका पंजीकरण हुआ; यह देश-विदेश में भारतीय कला की समझ व प्रचार बढ़ाने का कार्य करती है।
✏️राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट्स, जयपुर
- सवाई रामसिंह द्वितीय ने 1857 में इसकी नींव 'मदरसा-ए-हुनरी' नाम से रखी थी; 1886 में इसका नाम 'महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट्स' हुआ और स्वतंत्रता के बाद इसे वर्तमान नाम मिला।
भाषा एवं साहित्य अकादमियाँ
राजस्थान में बोली जाने वाली लगभग हर प्रमुख भाषा के लिए अलग राजकीय अकादमी है, जो साहित्य को पोषित करती है, पत्रिकाएँ प्रकाशित करती है और लेखकों को सम्मानित करती है।
🏆राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर
- 28 जनवरी 1958 को उदयपुर में साहित्य व साहित्यिक चेतना के प्रचार-प्रसार हेतु स्थापित इस अकादमी को 8 नवम्बर 1962 को स्वायत्तता मिली।
- राजस्थानी साहित्य के क्षेत्र में इसका सर्वोच्च सम्मान मीरा पुरस्कार है, जो सबसे पहले डॉ. रामानंद तिवारी को दिया गया।
🕉️राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर
- 25 अगस्त 1980 (संस्कृत दिवस) को राज्य सरकार द्वारा स्थापित यह अकादमी संस्कृत भाषा व साहित्य के संरक्षण, विकास व प्रोत्साहन, संस्कृत ग्रंथों में निहित ज्ञान के प्रकाशन, अन्य भाषाओं में अनुवाद तथा पारम्परिक वैदिक उच्चारण के संरक्षण हेतु कार्यरत है।
- यह त्रैमासिक पत्रिका 'स्वरमंगला' प्रकाशित करती है तथा मौलिक संस्कृत लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु प्रतिवर्ष माघ पुरस्कार, पद्मश्री डॉ. मण्डन मिश्र पुरस्कार व पं. अम्बिकादत्त व्यास पुरस्कार जैसे राष्ट्रीय व राज्य-स्तरीय सम्मान देती है।
🪔राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी, जयपुर
- ब्रजभाषा के प्रचार-प्रसार व विकास हेतु 1985-86 (19 जनवरी 1986) में स्थापित यह एक स्वशासी संस्था है।
🪶राजस्थान सिंधी अकादमी, जयपुर
- सिन्धी भाषा, साहित्य, कला व संस्कृति के विकास व संवर्द्धन हेतु यह स्वायत्तशासी संस्था है; इसके गठन को 12 सितम्बर 1978 को स्वीकृति मिली और राजस्थान संस्था रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1958 के तहत 28 मार्च 1979 को पंजीकरण हुआ।
- इसका केन्द्रीय उद्देश्य लुप्त होती सिन्धी भाषा, कला, साहित्य व संस्कृति का व्यापक प्रचार-प्रसार करना है।
✒️राजस्थान उर्दू अकादमी, जयपुर
- उर्दू भाषा व साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने हेतु फरवरी 1979 में स्थापित।
📗राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 के अंतर्गत 15 जुलाई 1969 को स्वायत्तशासी संस्था के रूप में गठित यह अकादमी हिन्दी में विश्वविद्यालय-स्तरीय मानक पाठ्य पुस्तकों व संदर्भ ग्रंथों के निर्माण-प्रकाशन तथा हिन्दी भाषा के उन्नयन हेतु कार्यरत है; इसका पूर्व नाम 'राजस्थान ज्ञान-विज्ञान हिन्दी रचना संस्थान' था।
🎋राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
- राजस्थानी भाषा व साहित्य के विकास हेतु 25 जनवरी 1983 को बीकानेर में स्थापित।
🌾राजस्थान पंजाबी भाषा अकादमी, श्रीगंगानगर
- पंजाबी भाषा, साहित्य, कला व संस्कृति के संरक्षण व संवर्द्धन हेतु राज्य सरकार द्वारा 7 मार्च 2006 को गंगानगर में स्थापित।
📰अकादमियों की पत्रिकाएँ
- मधुमति राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की मासिक पत्रिका है, जबकि जागती जोत राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की मासिक पत्रिका है।
- रिहाण राजस्थान सिंधी अकादमी, जयपुर की वार्षिक साहित्यिक पत्रिका है, तथा ब्रज शतदल राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी, जयपुर की त्रैमासिक पत्रिका है।
अभिलेखागार, हस्तलिखित ग्रंथ व शोध संस्थान
मुगलकालीन राजकीय दस्तावेज़ों से लेकर दुर्लभ जैन हस्तलिखित संग्रहों तक — राजस्थान के लिखित अतीत के ये संरक्षक विद्वानों व आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर सहेजते हैं।
📜राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर
- 1955 में इतिहास की लिखित सामग्री के संरक्षण हेतु स्थापित इस अभिलेखागार में पूर्व मुख्य आयुक्त प्रांत अजमेर-मेरवाड़ा सहित प्रदेश की सभी पूर्व रियासतों के शाखा कार्यालय समाहित किए गए; वर्तमान में इसके सात शाखा कार्यालय हैं।
- यह भारत का प्रथम डिजिटल आर्काइव है, जो मुगलकाल से लेकर वर्तमान सरकार के 25 वर्ष से अधिक पुराने अभिलेखों तक का संधारण करता है।
- इसके निजी संग्रहों में 'श्री भैया जयपाल सिंह संग्रह' तथा ब्रिगेडियर बाघ सिंह द्वारा दान किया गया 'वाल्टर नोबल स्कूल संग्रह' शामिल हैं।
- इसका जनरल रिकॉर्ड ऑफिस भवन महाराजा गंगासिंह ने 1896 में बीकानेर में बनवाया था; राष्ट्रीय अभिलेखागार का जयपुर अभिलेख केंद्र अलग से 1977 में स्थापित हुआ।
📚मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फारसी शोध संस्थान, टोंक
- अरबी-फारसी भाषा व साहित्य के शोध व विकास हेतु 4 दिसंबर 1978 को टोंक में स्थापित इस संस्थान की नींव शौकत अली खान के प्रयासों से पड़ी; इसका वर्तमान नाम 1988 में रखा गया।
📖राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
- मूलतः 1954 में मुनि जिनविजय के मार्गदर्शन में जयपुर में स्थापित यह संस्था 1956 से जोधपुर में हस्तलिखित ग्रंथों के संग्रह, सर्वेक्षण, सम्पादन, प्रकाशन व संरक्षण का कार्य कर रही है।
- इसके छह शाखा कार्यालय अलवर, भरतपुर, उदयपुर, कोटा, बीकानेर व जयपुर में स्थापित हैं।
🔎राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी (जोधपुर)
- जोधपुर के चौपासनी क्षेत्र में स्थित एक शोध संस्थान।
🏯जिनभद्र सूरि ग्रंथ भण्डार, जैसलमेर दुर्ग
- जैसलमेर दुर्ग में स्थित यह हस्तलिखित जैन ग्रंथों का एक दुर्लभ भण्डार व संरक्षण केंद्र है।
🧾पं. झाबरमल्ल शोध संस्थान, जयपुर
- जयपुर में वर्ष 2000 में स्थापित एक शोध संस्थान।
संग्रहालय व धरोहर संस्थाएँ
राजस्थान का सबसे पुराना संग्रहालय, राजसी हस्तलिखित संग्रह, तथा राज्य के स्मारकों के पुनरुद्धार व प्रबंधन हेतु गठित आधुनिक प्राधिकरण।
📕पोथीखाना संग्रहालय, जयपुर
- यह हस्तलिखित ग्रंथ संग्रहालय जयपुर में 1952 में महाराजा मानसिंह द्वितीय द्वारा स्थापित किया गया।
🏯अल्बर्ट हॉल, जयपुर
- इसे राजस्थान का प्राचीनतम संग्रहालय माना जाता है।
🏺पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग
- 1950 में गठित यह विभाग प्रदेश की बिखरी हुई सांस्कृतिक धरोहर की खोज, सर्वेक्षण, संरक्षण व प्रचार-प्रसार करता है तथा 'द रिसर्चर' नामक पत्रिका प्रकाशित करता है।
📙श्रीरामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय, जयपुर
- 1960 में जयपुर में स्थापित तथा 1979 में पंजीकृत न्यास बनी इस संस्था के दो प्रमुख विभाग हैं — प्राच्य विद्यापीठ तथा प्राच्य संग्रहालय।
🏰राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण, जयपुर
- 19 अगस्त 2006 को राज्य सरकार द्वारा गठित यह प्राधिकरण कला व संस्कृति विभाग के अधीन कार्यरत है तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण व राज्य की धरोहर के पुनरुद्धार हेतु कार्य करता है।
🕊️अम्बेडकर पीठ, जयपुर
- डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सामाजिक, आर्थिक व बौद्धिक चिंतन को बढ़ावा देने हेतु जयपुर में स्थापित इस पीठ का शिलान्यास 14 अप्रैल 2007 को ग्राम मूण्डला (जमवारामगढ़, जयपुर ग्रामीण) में हुआ; इसकी शासी परिषद के पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं।
🎫राजस्थान राज्य संग्रहालय एवं स्मारक प्रबंधन एवं विकास संस्था
- यह संस्था प्रदेश के स्मारकों व संग्रहालयों में पुनर्गठन, विकास व पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु गठित की गई।