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राजस्थान GK

राजस्थानी साहित्य एवं साहित्यकार

Rajasthani Literature & Writers

महाकाव्य रचने वाले दरबारी कवियों से लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताओं तक — डिंगल, पिंगल, मारवाड़ी और अन्य बोलियों में राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक परंपरा गढ़ने वाले कवियों, इतिहासकारों व विधाओं को जानिए।

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राजस्थानी साहित्य: स्वरूप, विधाएँ एवं काल-विभाजन

Forms, Genres & Periods of Rajasthani Literature

साहित्यकारों से मिलने से पहले यह जान लेना उपयोगी है कि वे किस शब्दावली में रचना करते थे — राजस्थानी लेखन की पाँच धाराएँ, इसकी दो महान काव्य-शैलियाँ, तथा वे कालखंड जिनसे विद्वान इसके लंबे इतिहास को समझते हैं।

🗂️राजस्थानी साहित्य की पाँच धाराएँ

  • राजस्थानी साहित्य में राजस्थान क्षेत्र की जनभाषाओं में रचित लिखित तथा मौखिक, दोनों प्रकार की रचनाएँ शामिल हैं, और विद्वानों ने शैली व विषय के आधार पर इसे पाँच व्यापक धाराओं में बाँटा है।
  • जैन साहित्य में ऋषिवर्धन सूरि की नल-दमयंती रास तथा सिद्धर्षि की उपमिति भव प्रपंचा जैसी रचनाएँ शामिल हैं, जबकि चारण साहित्य की सबसे पुरानी ज्ञात रचना बादर ढाढ़ी की वीरमायण मानी जाती है।
  • ब्राह्मणी साहित्य में बेताल पच्चीसी, हितोपदेश तथा रामायण-महाभारत के अनुवाद जैसे ग्रंथ आते हैं, जबकि संत साहित्य में दादूदयाल की वाणियाँ और मीरा बाई की पदावली केंद्रीय स्थान रखती हैं।
  • लोक साहित्य में राजस्थान की सबसे लोकप्रिय प्रेम-गाथाएँ सुरक्षित हैं, जिनमें ढोला-मारू रा दूहा, जेठवा-ऊजली व जलाल-बूबन शामिल हैं।

⚔️डिंगल एवं पिंगल

  • डिंगल पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) का साहित्यिक स्वरूप है, जिसे मुख्यतः चारण कवियों ने रचा और जिसका विकास गुर्जरी अपभ्रंश से हुआ; इसके प्रमुख ग्रंथों में राजरूपक, ढोला-मारू रा दूहा, नागदमण व रुक्मिणी हरण शामिल हैं।
  • पिंगल ब्रजभाषा एवं पूर्वी राजस्थानी का साहित्यिक स्वरूप है, जिसे मुख्यतः भाट कवियों ने रचा और जिसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ; इसके प्रमुख ग्रंथों में पृथ्वीराज रासो, रतन रासो, वंश भास्कर व खुमाण रासो शामिल हैं।
  • 'डिंगल' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कवि बांकीदास ने अपनी रचना कुकविबतीसी (वि.सं. 1871) में किया था; डिंगल साहित्य प्रधानतः वीर रसात्मक है।

🕰️साहित्य का काल-विभाजन

  • साहित्यकार सीताराम लालस द्वारा राजस्थानी साहित्य के काल-विभाजन का सर्वाधिक मान्य वर्गीकरण किया गया: प्रारंभिक काल/आदिकाल (वि.सं. 800-1460), मध्यकाल (वि.सं. 1461-1900) तथा आधुनिक काल (वि.सं. 1900 से वर्तमान तक)।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित कई विद्वानों ने इस प्रारंभिक काल को 'वीरगाथा काल' नाम दिया है।
  • व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि से इस परंपरा को चार कालखंडों में भी बाँटा जाता है: वीरगाथा काल, भक्तिकाल, शृंगार-रीति-नीति काल तथा विविध नई विधाओं के उदय वाला आधुनिक कालखंड।

📚ऐतिहासिक विधाएँ: ख्यात, वंशावली, वात, प्रकास, वचनिका

  • ख्यात राजस्थानी साहित्य के इतिहासपरक ग्रंथ हैं, जिन्हें तत्कालीन शासकों ने अपनी मान-मर्यादा व वंशावली अंकित कराने हेतु लिखवाया; इनमें तिथियाँ दी गई हैं तथा लेखन प्रशस्ति के रूप में हुआ है, जिसकी शुरुआत 16वीं शताब्दी के अंत में हुई — मुहणोत नैणसी री ख्यात इसका सर्वाधिक चर्चित उदाहरण है।
  • वंशावली भाटों द्वारा रचित राजवंशों का विस्तृत विवरण है, जैसे अमरकाव्य वंशावली; वात कहानी कहने-सुनने की एक विशेष प्रणाली है जिसमें कथावाचक बोलता है और श्रोता हुंकारा भरता है — यह गद्य, पद्य व गद्य-पद्य तीनों रूपों में मिलती है, जैसे राणा प्रताप री वात।
  • प्रकास किसी वंश या विशेष व्यक्ति की उपलब्धियों पर प्रकाश डालने वाली कृतियाँ हैं, जैसे पाबू प्रकास; वचनिका गद्य-पद्य तुकांत मिश्रित रचना है, जो प्रायः अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी में लिखी गई है — इसका सर्वोत्तम उदाहरण अचलदास खींची री वचनिका है।

🎭काव्य विधाएँ: रासो, वेलि, विगत, दूहा, बारहमासा, प्रशस्ति

  • मोतीलाल मेनारिया के अनुसार रासो वह काव्य ग्रंथ है जिसमें किसी राजा की कीर्ति, विजय व वीरता का विस्तृत वर्णन हो, जैसे बीसलदेव रासो व पृथ्वीराज रासो; वेलि साहित्य में भी शासकों की वीरता, इतिहास व वंशावली से जुड़ी घटनाओं का छंदबद्ध वर्णन होता है, जैसे राव रतनसिंह री वेलि।
  • विगत में किसी विषय का विस्तृत विवरण दिया जाता है, जैसे मारवाड़ रा परगना री विगत; दूहा वीर तथा दानी पुरुषों की प्रशंसा में लिखे गए दोहे हैं, जैसे अखैराज सोनिगरै रा दूहा।
  • बारहमासा वर्ष के बारह महीनों की परिस्थितियों का चित्रण करता है, जिसका वर्णन आषाढ़ माह से आरंभ होता है; पल्हण रचित नेमिनाथ बारहमासा को मारू-गुर्जर भाषा की पहली बारहमासा रचना माना जाता है।
  • प्रशस्ति मंदिर, दुर्ग या स्तंभ आदि पर उत्कीर्ण राजाओं की उपलब्धियों का प्रशंसापरक वृत्तांत है, जैसे रायसिंह प्रशस्ति; साखी व परची जैसी विधाएँ क्रमशः संत कवियों के अनुभवजन्य ज्ञान व जीवन-परिचय को पद्यबद्ध करती हैं।
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आरंभिक व मध्यकालीन साहित्यकार

Early & Medieval Litterateurs

स्वयं देखे गए युद्धों को शब्दबद्ध करने वाले दरबारी कवियों से लेकर भक्ति-पद रचने वाली रानियों तक — आरंभिक व मध्यकाल ने राजस्थान के सर्वाधिक चिरस्थायी साहित्यिक नाम दिए।

🗡️चंदबरदाई एवं पृथ्वीराज रासो

  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबारी कवि व सामंत चंदबरदाई ने पिंगल भाषा में पृथ्वीराज रासो की रचना की, जिसे हिंदी का पहला महाकाव्य माना जाता है; इसे उनके पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया।
  • इस ग्रंथ में राजपूत राजवंशों की 36 शाखाओं की सूची दी गई है, राजपूतों की उत्पत्ति आबू के अग्निकुंड से बताई गई है, तथा अजमेर के अंतिम चौहान सम्राट के साथ हिंदू व मुसलमान दोनों जातियों का चरित्र-चित्रण मिलता है।

💕नरपति नाल्ह एवं बीसलदेव रासो

  • नरपति नाल्ह रचित बीसलदेव रासो में अजमेर के चौहान शासक बीसलदेव (विग्रहराज-IV) और उनकी रानी राजमती की प्रेमगाथा वर्णित है; इसमें 216 छंद व चार खंड हैं, तथा भाषा गुजराती-राजस्थानी का मिश्रण है।

⚔️पद्मनाभ एवं कान्हड़दे प्रबंध

  • कवि पद्मनाभ रचित कान्हड़दे प्रबंध (1512 ई.) में जालौर के शासक कान्हड़दे चौहान तथा अलाउद्दीन खिलजी के मध्य हुए जालौर युद्ध का, साथ ही वीरमदेव व अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा के प्रेम-प्रसंग व जौहर का वर्णन है।

📜शिवदास गाडण एवं अचलदास खींची री वचनिका

  • अचलदास खींची के आश्रित कवि शिवदास गाडण ने अचलदास खींची री वचनिका लिखी — जिसे डिंगल भाषा में चारण गद्य साहित्य की प्रथम रचना माना जाता है — इसमें मांडू के सुल्तान होशंगशाह और गागरोन के शासक अचलदास खींची के बीच हुए 1423 ई. के युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी वर्णन है; डॉ. टैस्सीटोरी ने इसे युद्ध की समकालीन रचना बताया।

👑महाराणा कुंभा एवं उनके आश्रित कवि

  • महाराणा कुंभा ने स्वयं संगीत राज व संगीत मीमांसा जैसे ग्रंथों की रचना की, जबकि उनके आश्रित कवि मंडन ने देवमूर्ति प्रकरण व राजवल्लभ जैसे ग्रंथों में स्थापत्य व मूर्तिकला पर लेखन किया।
  • मंडन के पुत्रों गोविंद व नाथा ने इस विद्वत् परंपरा को आगे बढ़ाया, और क्रमशः कलानिधि व वास्तुमंजरी जैसी रचनाएँ लिखीं।

📖मुहणोत नैणसी

  • जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह-I के मंत्री (दीवान) मुहणोत नैणसी को मुंशी देवीप्रसाद ने 'राजपूताने का अबुल फजल' उपनाम दिया; मारवाड़ी भाषा में रचित उनकी ख्यात अपने तथ्यों के स्रोतों का उल्लेख करती है और राजकीय संरक्षण से दूर रहकर रची गई।
  • उनकी अन्य प्रमुख रचना मारवाड़ रा परगना री विगत में 7 परगनों का विवरण है, जिसमें प्रत्येक गाँव का संवत् 1715 से 1719 तक का पाँच वर्षीय सर्वेक्षण है; इसकी तुलना अक्सर 'आइन-ए-अकबरी' से की जाती है।

🖋️बांकीदास

  • पचपदरा के निकट भाड़ियावास गाँव में वि.सं. 1828 में जन्मे बांकीदास जोधपुर महाराजा मानसिंह के कृपापात्र कवि व काव्य गुरु थे; उन्होंने ही अपनी कुकविबतीसी में 'डिंगल' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया।
  • उनके प्रसिद्ध गीत 'चेतावणी रा गीत' व 'आयो अंग्रेज मुल्क रे ऊपर' आज भी चर्चित हैं, तथा उनकी बांकीदास री ख्यात में जयपुर व जोधपुर की स्थापना की तिथियाँ दी गई हैं।

🎶महाकवि बिहारी एवं मीरा बाई

  • गोविंदपुर (ग्वालियर) में जन्मे महाकवि बिहारी आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे, जिन्होंने 713 दोहों की बिहारी सतसई रची, जो मुख्यतः शृंगार रस पर केंद्रित है और जिसमें नीति व भक्ति के भी सूत्र मिलते हैं।
  • मेवाड़ के कुँवर भोजराज की पत्नी मीरा बाई का जन्म मेड़ता के निकट कुड़की गाँव में हुआ था; 'राजस्थान की राधा' के रूप में विख्यात उनकी भक्ति रचनाएँ 'पदावलियाँ' नाम से प्रसिद्ध हैं।
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आधुनिक काल के साहित्यकार

Litterateurs of the Modern Period

उन्नीसवीं सदी से आगे राजस्थानी लेखन को अपना नवजागरण मिला — 1857 को छंदों में ढालने वाले डिंगल कवि से लेकर बिज्जी तक, जिनकी लोककथाएँ रुपहले पर्दे तक पहुँचीं।

🛡️सूर्यमल्ल मिश्रण

  • बूँदी के हरणा गाँव में 1815 ई. में जन्मे सूर्यमल्ल मिश्रण 19वीं सदी में बूँदी नरेश रामसिंह के दरबारी कवि थे; उन्हें 'राजस्थान के राज्य कवि' कहा जाता है — वे आधुनिक काल के प्रथम तथा डिंगल परंपरा के अंतिम महान कवि माने जाते हैं।
  • उनका चार खंडों वाला महाकाव्य वंश भास्कर, डिंगल भाषा (हाड़ौती बोली) व चम्पू शैली में, बूँदी के साथ राजस्थान व भारत के इतिहास का भी विवेचन करता है; इसे 'विश्वकोषीय ऐतिहासिक काव्य' तथा 1857 का 'दस्तावेजी काव्य' कहा जाता है; इसे उनके दत्तक पुत्र मुरारीदान ने पूर्ण किया।
  • उनकी वीर सतसई 1857 के स्वतंत्रता संग्राम व बूँदी के इतिहास का काव्यमय वर्णन करती है; इन दोनों रचनाओं के माध्यम से वीरकाव्य को पुनर्जीवित करने के कारण वे 'राजस्थान भूषण' के नाम से जाने जाते हैं।

🥇शिवचंद भरतिया एवं राजस्थानी की 'प्रथम' रचनाएँ

  • 'आधुनिक राजस्थानी का भारतेन्दु हरिश्चंद्र' कहे जाने वाले शिवचंद भरतिया ने केसर विलास नामक राजस्थानी भाषा का पहला नाटक तथा कनक सुंदर नामक पहला उपन्यास लिखा।
  • उनकी कहानी विश्रांत प्रवासी को राजस्थान की प्रथम कहानी माना जाता है, जिससे वे एक साथ तीन आधुनिक राजस्थानी साहित्यिक विधाओं के जनक बन जाते हैं।

🎬विजयदान देथा ('बिज्जी')

  • 'बिज्जी' के नाम से लोकप्रिय विजयदान देथा (1926-2013) का जन्म बोरूंदा, जोधपुर में हुआ; उनके 14 खंडों वाले लोककथा संग्रह बातां री फुलवारी को केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, तथा बाद में उन्हें बिहारी पुरस्कार (2002), पद्मश्री (2007) व प्रथम राजस्थान रत्न (2012) से सम्मानित किया गया।
  • उनकी कई कृतियों पर फिल्में बनीं — 'दुविधा' पर फिल्म 'पहेली' बनी, साथ ही 'परिणति' व 'चरणदास चोर' पर भी — और लोक-संस्कृति विद् कोमल कोठारी के साथ उन्होंने 'रूपायन संस्थान' की सह-स्थापना की।

🌾कन्हैयालाल सेठिया

  • 11 सितम्बर, 1919 को सुजानगढ़ में जन्मे कन्हैयालाल सेठिया को 'राजस्थानी भाषा के भीष्म पितामह' के रूप में सम्मानित किया जाता है; उनकी पहली रचना वनफूल थी, और उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'पाथल और पीथल', लीलटांस व लोकप्रिय 'धरती धोरां री' शामिल हैं।
  • उनके प्रमुख सम्मानों में मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार (1981, 'निग्रंथ' के लिए), पद्मश्री (2004) व मरणोपरांत राजस्थान रत्न (2008) शामिल हैं।

🏅चन्द्रप्रकाश देवल

  • 1949 में वल्लभ नगर, उदयपुर में जन्मे चन्द्रप्रकाश देवल को उनकी कृति 'पागी' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार व पद्मश्री (2011) मिला, तथा 'हिरणा! मौन साध वन चरणा' के लिए 23वाँ बिहारी पुरस्कार (2013) प्राप्त हुआ।
  • उन्होंने सूर्यमल्ल मिश्रण के 'वंश भास्कर' का हिन्दी में अनुवाद किया, तथा दोस्तोयेव्स्की के Crime and Punishment व बेकेट के Waiting for Godot का भी राजस्थानी में अनुवाद किया।

🕊️लक्ष्मी कुमारी चूंडावत

  • देवगढ़ (मेवाड़) में जन्मीं साहित्यकार, पूर्व सांसद व विधायक लक्ष्मी कुमारी चूंडावत (1916-2014) राजस्थानी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिलाने की माँग करने वाली राज्य की पहली राजनेता थीं; उन्हें पद्मश्री (1984) व राजस्थान रत्न (2012) से सम्मानित किया गया।
  • रूसी कथाओं के उनके राजस्थानी अनुवाद 'गजबण' के लिए उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला, तथा फ्रांसीसी लेखिका फ्रांसेस टेफ्ट ने 'फ्रॉम पर्दा टू द पीपल' शीर्षक से उनकी जीवनी का संपादन किया।

📕सीताराम लालस

  • 20 दिसम्बर, 1908 को सरवड़ी गाँव में जन्मे सीताराम लालस राजस्थानी भाषा के 'पाणिनी' कहलाते हैं और पद्मश्री से सम्मानित थे; उन्होंने राजस्थानी भाषा के 165,000 से अधिक शब्दों का 9 खंडों वाला बृहद् शब्दकोश तैयार करने वाले पहले व्यक्ति होने का गौरव प्राप्त किया।

🖊️रांगेय राघव एवं अन्य आधुनिक साहित्यकार

  • रांगेय राघव (1923-1962) ने घरौंदा व मुर्दों का टीला जैसे उपन्यासों के साथ गदल व पंच परमेश्वर जैसी कहानियाँ भी लिखीं।
  • चन्द्रसिंह 'बिरकाली' ने 'बादली' लिखी, जिसे आधुनिक राजस्थानी की प्रथम काव्यकृति तथा स्वतंत्र प्रकृति-चित्रण की पहली महत्त्वपूर्ण रचना माना जाता है; मणि माधुकर के उपन्यास पगफेरो को केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
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इतिहासकार, शोधकर्ता एवं विदेशी विद्वान

Historians, Researchers & Foreign Scholars

राजस्थान की साहित्यिक विरासत उतनी ही उन विद्वानों की ऋणी है जिन्होंने इसे दस्तावेज़ीकृत किया, जितनी उन कवियों की जिन्होंने इसे रचा — अंग्रेज़, इतालवी और स्थानीय शोधकर्ता, जिन्होंने मिलकर इसके इतिहास को विस्मृति से बचाया।

🐴कर्नल जेम्स टॉड

  • 'राजस्थान के आधुनिक इतिहास लेखन के पितामह' तथा लोकप्रिय रूप से 'घोड़े वाले बाबा' कहलाने वाले जेम्स टॉड 1800 ई. में भारत आए और 1817 ई. में उदयपुर के पॉलिटिकल एजेन्ट बने।
  • इंग्लैण्ड लौटकर लिखे गए उनके ग्रंथ 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' (जिसे 'सेन्ट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स ऑफ इंडिया' भी कहा जाता है) में पहली बार मुद्रित रूप में 'राजस्थान' शब्द प्रयुक्त हुआ; इसके दो भाग क्रमशः 1829 व 1832 ई. में प्रकाशित हुए।

🇮🇹डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी

  • इतालवी विद्वान डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी अप्रैल 1914 में मुंबई पहुँचे और उसी वर्ष जुलाई में जयपुर आए; उन्होंने अपने कर्मस्थल बीकानेर में अधिकांश जीवन बिताया, जहाँ 22 नवंबर, 1919 को उनका देहांत हुआ; बीकानेर का म्यूजियम उन्हीं की देन है।
  • बीकानेर के महाराजा गंगासिंह द्वारा चारण साहित्य के सर्वेक्षण का दायित्व सौंपे जाने पर उन्होंने 'राजस्थानी चारण साहित्य एक ऐतिहासिक सर्वे' व 'पश्चिमी राजस्थानी का व्याकरण' लिखीं, तथा अलग से कालीबंगा के हड़प्पा-पूर्व पुरातात्विक स्थल की खोज भी की।

🏛️डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा

  • 15 सितम्बर, 1863 को रोहिड़ा गाँव, सिरोही में जन्मे तथा 1914 में रायबहादुर की उपाधि से सम्मानित डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा को 'राजस्थान का ग्रिबन' कहा जाता है; उनका ग्रंथ 'भारतीय प्राचीन लिपिमाला' संसार का श्रेष्ठतम लिपि-विषयक ग्रंथ माना जाता है।
  • उन्होंने 'मुहणोत नैणसी री ख्यात' का संपादन किया, जेम्स टॉड की 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' का हिन्दी अनुवाद किया, तथा हिन्दी में लिपि-शास्त्र पर पहली रचना लिखकर गिनीज वर्ल्ड बुक में अपना नाम दर्ज कराया।

🗣️जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन

  • एशियाटिक सोसाइटी ऑफ कलकत्ता से संबद्ध अंग्रेज भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 में 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' की रचना की, जिसमें पहली बार राजस्थान की भाषा के लिए 'राजस्थानी' शब्द का प्रयोग हुआ।

📗कविराज श्यामलदास दधिवाड़िया

  • 5 जुलाई, 1836 को ढोकलिया गाँव, शाहपुरा में जन्मे श्यामलदास महाराणा सज्जनसिंह के दरबारी कवि थे और उन्हें 'केसर-ए-हिंद' व 'महामहोपाध्याय' जैसी उपाधियाँ मिलीं; उनका पाँच जिल्दों वाला ग्रंथ वीरविनोद, जो मूलतः मेवाड़ के इतिहास पर केंद्रित है, वि.सं. 1928 में आरंभ हुआ और वि.सं. 1944 में पूर्ण हुआ।

🕉️मुनि जिन विजय

  • 1887 में भीलवाड़ा परगने के रूपाहेली गाँव में किशनसिंह नाम से जन्मे मुनि जिन विजय ने अपना जीवन पुरासामग्री शोध को समर्पित किया; उनके ही मार्गदर्शन में 1950 में 'राजस्थान ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' की स्थापना हुई; उनकी रचना 'प्राचीन काव्यों की रूप परम्परा' है।
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साहित्य अकादमी, पुरस्कार एवं साहित्यिक संस्थाएँ

Sahitya Akademi, Awards & Literary Institutions

एक जीवंत परंपरा को जीवंत पहचान की भी आवश्यकता होती है — वे अकादमियाँ, सम्मान व पत्रिकाएँ जो आज भी राजस्थानी साहित्यकारों को सम्मानित करती आ रही हैं।

🏛️साहित्य अकादमी

  • साहित्य अकादमी की औपचारिक स्थापना भारत सरकार द्वारा 12 मार्च, 1954 को हुई तथा यह 7 जनवरी, 1956 को सोसायटी के रूप में पंजीकृत हुई; यह भारत की 24 भाषाओं में साहित्य को बढ़ावा देने वाली एक स्वायत्त संस्था है, जिसका मुख्यालय 1961 में निर्मित रवीन्द्र भवन, फिरोजशाह मार्ग, नई दिल्ली में है।
  • इसकी पट्टिका का डिजाइन फिल्मकार सत्यजीत रे ने बनाया था, तथा माखनलाल चतुर्वेदी 1955 में अपने काव्य संग्रह 'हिम तरंगिणी' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले प्रथम हिंदी लेखक बने।
  • राजस्थानी भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार 1974 से दिया जाना शुरू हुआ, जिसके तहत वर्तमान में 1 लाख रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाता है।

🥇साहित्य अकादमी पुरस्कार: राजस्थानी भाषा के विजेता

  • विजयदान देथा को 1974 में उनके लोककथा संग्रह बातां री फुलवारी के लिए राजस्थानी भाषा का पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
  • हाल के राजस्थानी भाषा के पुरस्कार-विजेताओं में सोहनदान चारण (2024, महाकाव्य भीलां रो भारत के लिए) व जितेंद्र कुमार सोनी (2025, कहानी संग्रह भरखमा के लिए) शामिल हैं।

🏵️बिहारी पुरस्कार व राजस्थान साहित्य अकादमी के पुरस्कार

  • के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा 1991 में कवि बिहारी के नाम पर स्थापित बिहारी पुरस्कार सर्वप्रथम जयसिंह नीरज को उनकी कृति 'ढाणी का आदमी' के लिए मिला।
  • राजस्थान साहित्य अकादमी कई नामित पुरस्कार प्रदान करती है — मीरा पुरस्कार (प्रथम बार 1959-60 में), सुधीन्द्र (काव्य) पुरस्कार (प्रथम बार 1958-59 में) तथा कथा-उपन्यास हेतु रांगेय राघव पुरस्कार, जो सर्वप्रथम यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' को 'खम्मा अन्नदाता' के लिए मिला।

🎖️राजस्थानी साहित्य में 'प्रथम'

  • सबसे पुरानी ज्ञात राजस्थानी रचना वज्रसेन सूरि रचित भरतेश्वर बाहुबलिघोर (1168 ई.) है, जबकि शालिभद्र सूरि रचित भरत बाहुबलि रास इस परंपरा की प्रथम संवतोल्लिखित (तिथियुक्त) रचना है।
  • शिवचंद भरतिया की कनक सुंदर राजस्थानी का पहला उपन्यास है, तथा स्वातंत्र्योत्तर काल का प्रथम राजस्थानी उपन्यास श्रीलाल नथमल जोशी रचित आभैपटकी है।

📰साहित्यिक पत्रिकाएँ एवं संस्थाएँ

  • मधुमती राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की मासिक पत्रिका है, जबकि जागती जोत बीकानेर की राजस्थानी भाषा, साहित्य व संस्कृति अकादमी की राजस्थानी भाषा में प्रकाशित मासिक पत्रिका है।
  • विजयदान देथा व कोमल कोठारी ने मिलकर रूपायन संस्थान की स्थापना की, जबकि डॉ. नारायण सिंह भाटी ने 1955 में जोधपुर में राजस्थानी शोध संस्थान व 'चौपासनी' की स्थापना की।