मुख्य सामग्री पर जाएं
🗣️
राजस्थान GK

राजस्थानी भाषा: उत्पत्ति, बोलियाँ व लिपि

Rajasthani Language, Dialects & Script

राजस्थानी भाषा के उद्गम, उसके विकास चरणों, मारवाड़ी-मेवाड़ी-ढूँढाड़ी-हाड़ौती जैसी प्रमुख बोलियों और राजस्थानी व देवनागरी लिपि की पूरी कहानी एक ही जगह जानिए।

24 टॉपिक30 फ्लैशकार्ड15 MCQ
🌱

उद्गम, विकास व विस्तार

Origin, Growth & Reach

जानिए कैसे राजस्थान के लोगों की मातृभाषा प्राचीन प्राकृत व अपभ्रंश की जड़ों से निकलकर आज करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली एक पूर्णतः स्वतंत्र भाषा बन गई।

📜उद्गम व नामकरण

  • राजस्थानी, भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के निवासियों की मातृभाषा है, जिसे भाषा वैज्ञानिकों ने आर्य (भारोपीय) भाषा परिवार में रखा है।
  • अधिकांश विद्वान इसकी उत्पत्ति शौरसेनी प्राकृत की गुर्जर अपभ्रंश से मानते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे नागर अपभ्रंश से उपजा हुआ बताते हैं।
  • उद्योतन सूरि के ग्रंथ 'कुवलयमाला' (विक्रम संवत् 835 / सन् 778) में ही पश्चिमी राजस्थान की भाषा को 18 देशी भाषाओं में 'मरुभाषा' कहा गया था; बाद में कवि कुशललाभ के 'पिंगल शिरोमणि' व अबुल फजल के 'आइने-अकबरी' में इसे 'मारवाड़ी' कहा गया।
  • जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 में अपने ग्रंथ 'Linguistic Survey of India' में 'राजस्थानी' नाम गढ़ा, जो अब मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी, मेवाती व हाड़ौती जैसी बोलियों का सामूहिक नाम बन चुका है; साहित्य अकादमी ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा मान्यता दे दी है, पर संविधान की आठवीं सूची में शामिल होना अभी बाकी है, जिस पर एक केंद्रीय समिति विचार कर रही है — और हर वर्ष 21 फरवरी को 'राजस्थानी भाषा दिवस' मनाया जाता है।

विकास के चरण

  • विद्वानों ने राजस्थानी के विकास को चार चरणों में बाँटा है: गुर्जर-अपभ्रंश (11वीं-13वीं सदी), प्राचीन राजस्थानी (13वीं-16वीं सदी), मध्य राजस्थानी (16वीं-18वीं सदी) व अर्वाचीन/आधुनिक राजस्थानी (18वीं सदी से अब तक)।
  • 13वीं सदी तक प्राचीन पश्चिमी राजस्थान की भाषा अपभ्रंश से पूरी तरह अलग हो चुकी थी, फिर भी राजस्थानी-गुजराती का मिला-जुला रूप 16वीं सदी के अंत तक साथ-साथ चलता रहा।
  • 16वीं सदी के बाद राजस्थानी स्वतंत्र भाषा के रूप में विकसित होने लगी और 17वीं सदी के अंत तक पूर्णतः स्वतंत्र रूप ले चुकी थी।
  • 1650 से 1850 ई. के काल को राजस्थानी भाषा का स्वर्णयुग कहा जाता है।

🌳वंश वृक्ष

  • राजस्थानी का वंश वृक्ष आर्य भाषाओं से वैदिक संस्कृत, फिर पालि व संस्कृत, और फिर शौरसेनी, मागधी व महाराष्ट्री प्राकृत तक जाता है।
  • शौरसेनी प्राकृत से गुर्जरी व नागर अपभ्रंश निकलीं, और इन्हीं दोनों अपभ्रंशों से अंततः राजस्थानी व हिंदी भाषाओं का जन्म हुआ।

🗺️भौगोलिक व संख्यात्मक विस्तार

  • वर्तमान में राजस्थानी भाषा बोलने वालों की संख्या 8 करोड़ से भी अधिक है।
  • राजस्थान के अतिरिक्त यह भाषा मध्यभारत के पश्चिमी भाग, सिंध, पंजाब तथा हरियाणा के राजस्थान से सटे इलाकों में भी बोली जाती है।
  • हिन्दी बोलने वालों की संख्या के मामले में राजस्थान भारत में दूसरे स्थान पर है, जिसके कारण इस रेगिस्तानी राज्य को 'हिन्दी पट्टी का हृदय' कहा जाता है।
🧭

वर्गीकरण व बोली विविधता

Classification & Dialect Diversity

जानिए कैसे ग्रियर्सन व टेस्सीटोरी जैसे भाषाविदों ने राजस्थानी की अनेक बोलियों को व्यवस्थित शाखाओं में बाँटा — और क्यों राज्य की बोली लगभग हर गाँव में बदल जाती है।

🔍ग्रियर्सन का वर्गीकरण

  • डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में वैज्ञानिक विश्लेषण दिया, जो उनके 11 खंडों व 20 भागों वाले ग्रंथ 'Linguistic Survey of India' की नौवीं जिल्द के दूसरे भाग में मिलता है।
  • उन्होंने पाँच उपशाखाएँ बताईं: पश्चिमी राजस्थानी; मध्य-पूर्वी राजस्थानी (ढूँढाड़ी व हाड़ौती); उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी (मेवाती व अहीरवाटी); दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी (मालवी व नीमाड़ी); तथा पाँचवीं, दक्षिणी राजस्थानी, उपशाखा।

🧭टेस्सीटोरी का वर्गीकरण

  • इतालवी विद्वान डॉ. एल.पी. टेस्सीटोरी के अनुसार राजस्थानी भाषा 12वीं सदी के आसपास ही अस्तित्व में आ चुकी थी, और उन्होंने इसकी बोलियों को केवल दो समूहों में बाँटा।
  • उनके पश्चिमी राजस्थानी समूह में शेखावाटी, जोधपुर की खड़ी राजस्थानी, ढटकी, थली, बीकानेरी, किशनगढ़ी, खैराड़ी तथा सिरोही की बोलियाँ - गौड़वाड़ी व देवड़ावाटी - शामिल हैं।
  • उनके पूर्वी राजस्थानी (ढूँढाड़ी) समूह में तोरावाटी, खड़ी जयपुरी, काठेड़ी, अजमेरी, राजावाटी, चौरासी, नागरचोल व हाड़ौती आदि शामिल हैं।

⚖️मोटा पूर्वी-पश्चिमी विभाजन

  • विभिन्न विद्वानों के अध्ययन के आधार पर राजस्थानी को मोटे तौर पर दो मुख्य वर्गों में बाँटा जा सकता है: पूर्वी राजस्थानी व पश्चिमी राजस्थानी।
  • पूर्वी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोलियाँ ढूँढाड़ी (जयपुरी), हाड़ौती, मेवाती व अहीरवाटी हैं, जबकि पश्चिमी राजस्थानी की मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी व शेखावाटी हैं।

🗣️राज्यभर में बोली परिवर्तन

  • राजस्थान में हर 9-10 किमी के फासले पर बोली बदल जाती है, जिसे इस पुरानी कहावत में पिरोया गया है - 'पाँच कोस पर पानी बदले, सात कोस पर बाणी।'
🐫

प्रमुख बोलियाँ

The Major Dialects

मिलिए राजस्थानी की पाँच प्रमुख बोलियों से - मारवाड़ी, मेवाड़ी, वागड़ी, ढूँढाड़ी व हाड़ौती - जिनमें से प्रत्येक का अपना क्षेत्र, साहित्य व उपबोलियाँ हैं।

🐫मारवाड़ी व डिंगल

  • 'कुवलयमाला' में जिसे 'मरुभाषा' कहा गया, वह वर्तमान मारवाड़ी ही है, जो पश्चिमी राजस्थान की प्रधान बोली है और जिसका आरम्भ काल लगभग 8वीं सदी माना जाता है; विस्तार व साहित्य दोनों दृष्टियों से यह राजस्थान की सबसे समृद्ध व महत्त्वपूर्ण बोली है।
  • यह जोधपुर, फलौदी, बीकानेर, जैसलमेर, पाली, ब्यावर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, बालोतरा, बाड़मेर, जालौर व सिरोही तथा शेखावाटी के कुछ भागों में बोली जाती है, पर इसका शुद्ध रूप केवल जोधपुर व आसपास के क्षेत्र में मिलता है; आर.सी. निगम की 'जनगणना में मातृभाषाओं पर भाषा पुस्तिका' में इसे पश्चिमी राजस्थान की व्यापक फैली प्रमुख बोली बताया गया है।
  • मारवाड़ी के साहित्यिक रूप को 'डिंगल' कहा जाता है, जिसकी उत्पत्ति शौरसेनी की गुर्जरी अपभ्रंश से मानी जाती है; सोरठा, छंद व माँड राग इसकी शिल्पगत पहचान हैं, और जैन साहित्य के साथ-साथ मीरा के अधिकांश पद भी इसी में हैं, जैसे राजिये रा सोरठा, वेलि किसन रुक्मणी री, ढोला मारवण व मूमल।
  • इसकी प्रमुख उपबोलियों में मेवाड़ी, बागड़ी (गंगानगर व हनुमानगढ़), शेखावाटी, बीकानेरी, ढटकी/थाती/ढाटी (बाड़मेर व बालोतरा), थली, खैराड़ी, नागौरी, देवड़ावाटी व गौड़वाड़ी शामिल हैं।

⛰️मेवाड़ी

  • उदयपुर व उसके आसपास का क्षेत्र मेवाड़ कहलाता है, अतः यहाँ की बोली मेवाड़ी है, जो उदयपुर, सलूम्बर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, बाँसवाड़ा व डूँगरपुर जिलों में बोली जाती है।
  • पहाड़ी क्षेत्रों की मेवाड़ी को 'पर्वती मेवाड़ी' व मैदानों की मेवाड़ी को 'मैदानी मेवाड़ी' कहा जाता है; मारवाड़ी के बाद यह राजस्थान की सबसे महत्त्वपूर्ण बोली है।
  • मेवाड़ी के विकसित व शिष्ट रूप 12वीं-13वीं सदी से ही दिखने लगते हैं, और इसका शुद्धतम रूप मेवाड़ के गाँवों में मिलता है; महाराणा कुंभा ने भी इसी बोली में कुछ नाटक रचे थे।
  • राजपूत संत कवि महाराज चतुरसिंह जी (बावजी चतुर सिंह) ने योगसूत्र, भगवद्गीता व सांख्यकारिका मेवाड़ी में ही रचे; उदयपुर क्षेत्र की धावड़ी इसकी एक उपबोली है।

🌾वागड़ी

  • डूँगरपुर व बाँसवाड़ा के संयुक्त राज्यों का प्राचीन नाम वागड़ था, इसलिए वहाँ की भाषा वागड़ी कहलाई, जिस पर गुजराती का गहरा प्रभाव है।
  • वागड़ी दक्षिणी मेवाड़, दक्षिणी अरावली प्रदेश तथा मालवा की पहाड़ियों तक बोली जाती है और भीलों में विशेष रूप से प्रचलित है, इसीलिए डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने इसे 'भीली' भी कहा।

🏰ढूँढाड़ी

  • पूर्वी राजस्थान की प्रमुख बोली ढूँढाड़ी जयपुर, किशनगढ़, टोंक, लावा तथा अजमेर-मेरवाड़ा के पूर्वी अंचलों में बोली जाती है, जिस पर गुजराती, मारवाड़ी व ब्रजभाषा का लगभग समान प्रभाव है।
  • इसकी सबसे बड़ी पहचान 'छे' शब्द का प्रयोग है; इसमें गद्य व पद्य दोनों में समृद्ध साहित्य रचा गया, और संत दादू व उनके शिष्यों ने इसी में रचनाएँ कीं।
  • इसे जयपुरी या झाड़शाही भी कहते हैं, और इसका सबसे पुराना उल्लेख 18वीं सदी की पुस्तक 'आठ देस गूजरी' में मिलता है।
  • इसकी उपबोलियों में तोरावाटी, राजावाटी, चौरासी, नागरचोल, किशनगढ़ी, अजमेरी, काठेड़ी, हाड़ौती व जगरौती (करौली) शामिल हैं - तोरावाटी झुंझुनूं के दक्षिणी भाग, सीकर के दक्षिण-पूर्वी भाग तथा जयपुर के उत्तरी व कोटपूतली-बहरोड़ के दक्षिणी भाग में; काठेड़ी जयपुर के दक्षिणी भाग में; चौरासी जयपुर के दक्षिण-पश्चिमी व टोंक के पश्चिमी भाग में; नागरचोल सवाईमाधोपुर के पश्चिमी व टोंक के दक्षिणी-पूर्वी भाग में; तथा राजावाटी जयपुर के पूर्वी भाग व दौसा में बोली जाती है।

🏯हाड़ौती

  • हाड़ा राजपूतों के शासन के कारण कोटा, बूँदी, बाराँ व झालावाड़ का क्षेत्र हाड़ौती कहलाया, और यहाँ की बोली भी हाड़ौती कही गई - जो ढूँढाड़ी की ही एक उपबोली है।
  • 'हाड़ौती' शब्द का भाषा के अर्थ में सर्वप्रथम प्रयोग केलॉग की हिन्दी ग्रामर (1875) में हुआ, और बाद में ग्रियर्सन ने भी इसे अपने ग्रंथ में एक बोली के रूप में मान्यता दी; सूर्यमल्ल मिश्रण की अधिकांश रचनाएँ हाड़ौती में ही हैं।
  • वर्तमान में यह कोटा, बूँदी (इन्द्रगढ़ व नैनवा तहसीलों के उत्तरी भाग को छोड़कर), बाराँ (किशनगंज व शाहबाद तहसीलों के पूर्वी भाग के अलावा) तथा झालावाड़ के उत्तरी भाग की प्रमुख बोली है, जिस पर कुछ गुजराती व मारवाड़ी प्रभाव भी है।
  • हाड़ौती के उत्तर में नागरचोल, उत्तर-पूर्व में स्यौपुरी, तथा पूर्व व दक्षिण में मालवी बोली जाती है।
🏞️

सीमावर्ती व क्षेत्रीय बोलियाँ तथा राजस्थानी सिनेमा

Frontier & Regional Dialects, and Rajasthani Cinema

जानिए वे सीमावर्ती बोलियाँ जो राजस्थानी को पड़ोसी भाषाओं से जोड़ती हैं, कुछ छोटी क्षेत्रीय बोलियाँ, और राजस्थानी भाषा में बनी ऐतिहासिक फिल्में।

🕌मेवाती

  • उत्तर-पूर्वी राजस्थान का अलवर, भर्तृहरि नगर (पूर्व में खैरथल-तिजारा) व डीग जिले का क्षेत्र मेव जाति की बहुलता के कारण मेवात कहलाता है, इसलिए यहाँ की बोली मेवाती कही जाती है।
  • यह भर्तृहरि नगर की किशनगढ़बास व तिजारा तहसीलों, अलवर की रामगढ़, गोविन्दगढ़ व लक्ष्मणगढ़ तहसीलों तथा डीग की कामां, डीग व नगर तहसीलों के पश्चिमोत्तर भाग में बोली जाती है और हरियाणा के गुड़गाँव व उ.प्र. के मथुरा जिले तक फैली है।
  • यह सीमावर्ती बोली उद्भव व विकास की दृष्टि से पश्चिमी हिन्दी व राजस्थानी के बीच सेतु का काम करती है, जिस पर ब्रजभाषा का गहरा प्रभाव है; डूँगरसिंह तथा लालदासी व चरणदासी संत सम्प्रदायों का साहित्य - चरणदास की शिष्याओं दयाबाई व सहजोबाई सहित - इसी बोली में रचा गया।
  • क्षेत्रीय भिन्नता के आधार पर इसके कई रूप हैं - खड़ी मेवाती, राठी मेवाती, कठेर मेवाती (प्रतापगढ़, अजबगढ़, थानागाजी व बलदेवगढ़ क्षेत्र में), भयाना मेवाती, बीघोता मेवाती, ब्राह्मण मेवाती, नेहड़ी व महेठा।

🐄अहीरवाटी

  • 'आभीर' जाति के क्षेत्र की बोली होने के कारण अहीरवाटी को हीरवाटी या हीरवाल भी कहा जाता है; इसका क्षेत्र 'राठ' कहलाता है, इसलिए इसे राठी भी कहते हैं।
  • यह मुख्यतः राजस्थान के अलवर, बहरोड़, मुंडावर व कोटपूतली के उत्तरी भाग, हरियाणा के गुड़गाँव, महेन्द्रगढ़, नारनौल व रोहतक जिलों तथा दिल्ली के दक्षिणी भाग में बोली जाती है, और भाषिक रूप से बाँगरू (हरियाणवी) व मेवाती के बीच स्थित है।
  • जोधराज का महाकाव्य 'हम्मीर रासो', शंकर राव का काव्य 'भीम विलास' तथा लोकनाट्य 'अलीबख्शी ख्याल' इसी बोली में रचे गए।

🌻मालवी व नीमाड़ी

  • मालवी मालवा क्षेत्र की भाषा है; राजस्थान में प्रतापगढ़ का क्षेत्र इसी बोली के अंतर्गत आता है, जिसमें मारवाड़ी व ढूँढाड़ी दोनों की कुछ विशेषताएँ मिलती हैं और कहीं-कहीं मराठी का असर भी झलकता है।
  • यह मध्यप्रदेश में भी बोली जाती है और एक कर्णप्रिय, कोमल भाषा मानी जाती है; इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी एकरूपता है - मालवी लगभग हर जगह एक जैसी सुनाई देती है। इसकी उपबोलियों में नीमाड़ी, रांगड़ी, सोंडवाड़ी (झालावाड़ की बोली), पाटवी, रतलामी व उमठवादी शामिल हैं।
  • नीमाड़ी को मालवी की उपबोली माना जाता है, जिसे दक्षिणी राजस्थानी भी कहा जाता है; इस पर गुजराती, भीली व खानदेशी का प्रभाव है।

🧵अन्य क्षेत्रीय व उपबोलियाँ

  • खैराड़ी भीलवाड़ा, बूँदी व आसपास के कुछ इलाकों में बोली जाती है, जो मेवाड़ी, ढूँढाड़ी व हाड़ौती का मिश्रण है।
  • मालवी व मारवाड़ी के मिश्रण से बनी रांगड़ी बोली मालवा के राजपूतों में प्रचलित है; इसका स्वर कुछ कर्कश है और यह धौलपुर व भरतपुर में बोली जाती है।
  • शेखावाटी, मारवाड़ी की उपबोली, जिसे 'राव शेखा' के नाम से जाना जाता है, शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, झुंझुनूं व चूरू जिले के कुछ भाग) तथा हनुमानगढ़, सूरतगढ़ व गंगापुर के कुछ भागों में बोली जाती है, जिस पर मारवाड़ी व ढूँढाड़ी का पर्याप्त प्रभाव है।
  • गौड़वाड़ी, मारवाड़ी की उपबोली, जालौर जिले की आहोर तहसील के पूर्वी भाग से बाली (पाली) तक बोली जाती है, जिसकी मुख्य रचना 'बीसलदेव रासो' है और बालवी, सिरोही, खैणी व महाहड़ी इसकी अपनी उपबोलियाँ हैं; देवड़ावाटी, मारवाड़ी की एक और उपबोली, सिरोही क्षेत्र में बोली जाती है, जिसे सिरोही नाम से भी जाना जाता है।

🎬राजस्थानी सिनेमा

  • पहली राजस्थानी फिल्म 'नजराना' (नजरानो, 1942) का निर्माण, निर्देशन व संगीत जी.पी. कपूर ने दिया; इसमें महीपाल पहले राजस्थानी नायक व सुनयना पहली नायिका बनीं।
  • 'बाबासा री लाडली' (1961) पहली लोकप्रिय राजस्थानी फिल्म बनी, और 'लाज राखो राणी सती' (1973) पहली रंगीन राजस्थानी फिल्म थी।
  • 'म्हारी प्यारी चनणा' (1983) पहली रजत जयंती मनाने वाली राजस्थानी फिल्म बनी, और 'डूँगर रो भेद' (1985) पहली राजस्थानी बाल फिल्म थी।
✍️

लिपि: राजस्थानी, मुड़िया व देवनागरी

Script: Rajasthani, Mudiya & Devanagari

क्षेत्र की अपनी घसीट लिपि और उसकी शॉर्टहैण्ड बहन मुड़िया से लेकर देवनागरी की वैज्ञानिक बनावट, खूबियों व खामियों तक - जानिए राजस्थानी बोली को लिपिबद्ध करने की पूरी कहानी।

🖋️लिपि क्या है?

  • भावों व विचारों को व्यक्त करने वाले चिह्नों, रेखाओं व चित्रों को सामूहिक रूप से 'लिपि' कहा जाता है; लिपिबद्ध वाणी चिरकाल तक सुरक्षित रह सकती है, और मानव सभ्यता की सबसे पुरानी लिपि भाव-चित्रात्मक प्रकृति की थी।
  • भारत की सबसे पुरानी लिपि ब्राह्मी थी - एक प्राचीन लिपि जो राजपूताने में प्रचलित रही - जिससे देश की अन्य लिपियाँ, आज की देवनागरी सहित, धीरे-धीरे विकसित हुईं।

📝राजस्थानी लिपि

  • राजस्थानी लिपि के अधिकांश अक्षर - स्वर व व्यंजन दोनों - देवनागरी लिपि से काफी मिलते-जुलते हैं, और हिन्दी के बढ़ते प्रभाव से बचे-खुचे मामूली अंतर भी धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं।
  • इसे परंपरागत रूप से तीन रूपों में लिखा जाता था - महाजनी, कामदारी व शास्त्री - और यह खींचकर घसीट रूप में लिखी जाती थी।
  • इस लिपि का शुद्धतम रूप मुख्यतः अदालतों व सरकारी दफ्तरों में प्रयुक्त होता था, जिसे 'कामदारी लिपि' कहा जाता था।

🖊️मुड़िया लिपि

  • व्यापारी व महाजन अपने बहीखातों में राजस्थानी लिपि का एक अशुद्ध रूप प्रयोग करते थे, जिसमें मात्राओं, विराम चिह्नों तथा शिरोरेखा का प्रयोग बहुत कम होता था।
  • इस अशुद्ध रूप को 'मुड़िया लिपि' या 'महाजनी/बाणियावाटी लिपि' कहा जाता है; यह शॉर्टहैण्ड की तरह काम करती है, पर मात्राओं व विराम चिह्नों के अभाव में कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।
  • बायीं से दायीं ओर लिखी जाने वाली इस लिपि के अक्षर - मुड़िया अक्षर - बिना मात्रा वाले शब्दों को मोड़कर लिखे जाते हैं, इसी से इसका नाम पड़ा; इसमें बिना कलम उठाये पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, और अक्षरों के नीचे नुक्ता लगाने का चलन नहीं है।
  • ब्राह्मी लिपि पर आधारित मुड़िया लिपि 16वीं सदी से 1950 ई. तक राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र में प्रचलन में रही, हालाँकि अब इसका प्रयोग काफी घट गया है; इसके आविष्कार का श्रेय परंपरागत रूप से मुगल सम्राट अकबर के राजस्व विभाग के मुखिया राजा टोडरमल को दिया जाता है, और लोक-मान्यता में उन्हीं का रचा एक दोहा प्रचलित है जो कठिन देवनागरी की तुलना में मुड़िया की सरलता की प्रशंसा करता है।

🔤राजस्थानी लिपि की विशेषताएँ

  • राजस्थानी लिपि में 'ळ' अक्षर की विशेष भूमिका है - यह व 'ल' अलग-अलग ध्वनियाँ हैं और इनके प्रयोग से अर्थ भी पूरी तरह बदल जाता है, जैसे 'गाल' (मुँह का हिस्सा) व 'गाळ' (गाली)।
  • राजस्थानी भाषा में तालव्य 'श' व मूर्धन्य 'ष' दोनों ध्वनियाँ हैं, पर लिपि में दोनों के लिए केवल दंत्य 'स' का प्रयोग होता है; और 'ज्ञ' के लिए कोई स्वतंत्र संकेत नहीं है, इसकी जगह 'ग्य' ही लिखा जाता है।
  • इसमें संयुक्ताक्षरों की ध्वनि भी नहीं दिखाई जाती - संयुक्ताक्षर 'क्ष' की जगह 'छ', 'क' या 'ख' लिखा जाता है, जैसे लक्षण का 'लखण', लक्ष्मण का 'लिछमण' व राक्षस का 'राकस'; और 'ऋ' की अलग ध्वनि के लिए कोई चिह्न नहीं है, इसकी जगह 'रि' लिखा जाता है, जैसे ऋतु के लिए 'रितु'।
  • इस लिपि में अर्द्धाक्षर, संयुक्ताक्षर व रेफ (र् चिह्न) का भी प्रचलन नहीं है - रेफ पूरा 'र' बन जाता है, इसलिए 'गर्म' को 'गरम' व 'वक्त' को 'बगत' या 'वकत' लिखा जाता है।

🕉️देवनागरी: उद्गम व नामकरण

  • देवनागरी आज उत्तर भारत की अधिकांश भाषाओं की लिपि है, जिसमें हिन्दी व संस्कृत भी शामिल हैं; यह नागरी लिपि से विकसित हुई, जो स्वयं सिद्धमातृका की कुटिल लिपि से उपजी थी, और इसके कुछ लक्षण बोधगया के महानाम शिलालेख व लेखमंडल की प्रशस्ति (588 ई.) में ही दिखने लगते हैं।
  • 7वीं सदी तक इसके लक्षण और स्पष्ट हो गए, 8वीं सदी तक यह लिपि पूर्णतः विकसित हो चुकी थी, और 10वीं सदी तक यह पूर्ण परिपक्वता को प्राप्त कर चुकी थी।
  • इसके नामकरण की कई कथाएँ हैं: इसका सबसे पहले प्रयोग गुजरात के नागर ब्राह्मणों ने किया (इसलिए 'नागरी'); संस्कृत को 'देवभाषा' कहा जाता था, अतः उसकी लिपि देवनागरी कहलाई; इस लिपि का नगरों में भी व्यापक प्रचार था; और बौद्ध ग्रंथों में मिलने वाली 'नाग लिपि' को भी इसके नामकरण का एक संभावित स्रोत माना जाता है।
  • इसका वंश वृक्ष उत्तरी ब्राह्मी से गुप्त लिपि व सिद्धमातृका होते हुए कुटिल लिपि तक जाता है, जो नागरी व शारदा में बँट गई; नागरी के पूर्वी रूप से कैथी, मैथिली, नेवारी, उड़िया, बंगला व असमिया जैसी लिपियाँ निकलीं, जबकि इसके पश्चिमी रूप से गुजराती, राजस्थानी, महाराष्ट्री व वर्तमान देवनागरी का विकास हुआ - वहीं दक्षिणी ब्राह्मी से तमिल, ग्रंथ व मलयालम लिपियाँ विकसित हुईं।

⚙️देवनागरी: गुण, दोष व सुधार

  • देवनागरी भारत की प्रधान लिपि है, जिसे संविधान में राजलिपि घोषित किया गया है; यह वर्णात्मक लिपि है और बायीं से दायीं ओर लिखी जाती है, और चूँकि हर व्यंजन में एक अंतर्निहित 'अ' या अन्य स्वर जुड़ा होता है, इसे अर्द्ध-अक्षरात्मक लिपि भी कहा जाता है।
  • इसकी खूबियों में लेखन व उच्चारण की एकरूपता, हर ध्वनि के लिए एक अलग चिह्न व कोई मूक वर्ण न होना, व्यंजन-संयोग दिखाने की पूर्ण पद्धति, ह्रस्व व दीर्घ स्वर के लिए स्वतंत्र चिह्न, तथा छपाई व लिखाई के लिए एक ही रूप शामिल हैं; आज यह लगभग 120 भाषाओं में प्रयुक्त होती है, जिनमें हिन्दी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, पाली, कोंकणी, बोडो, सिंधी व मैथिली शामिल हैं, और यह इकलौती लिपि है जो फारसी-प्रभावित विदेशी ध्वनियों (क़, ख़, ग़, ज़, फ़) के लिए वर्णों के नीचे नुक्ता जोड़ती है।
  • इसके दोषों में द्विरूप वर्ण, मिलते-जुलते समरूप वर्णों से भ्रम, अनुस्वार व अनुनासिकता के प्रयोग में एकरूपता का अभाव, बार-बार हाथ उठाने के कारण तेज लेखन का असंभव होना, 'इ' की मात्रा का वर्ण से पहले लिखा जाना पर बाद में उच्चरित होना, संयुक्ताक्षरों में 'र' को लेकर बना रहने वाला भ्रम, तथा लगभग 403 टाइप होने से टंकण व मुद्रण में आने वाली कठिनाई शामिल हैं।
  • सुधार के प्रयास दशकों तक चले: 1904 में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने अपने पत्र 'केसरी' के लिए 190 टाइपों का एक टाइप बनाया, जिसे 'तिलक फोंट' कहा गया; 1935 में इंदौर के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में काका कालेलकर की अध्यक्षता में नागरी लिपि सुधार समिति बनी; 1945 में काशी की नागरी प्रचारिणी सभा ने सुधार का प्रयास किया; 1947 में उत्तर प्रदेश सरकार ने नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई; और 1953 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन की अध्यक्षता में लिपि सुधार समिति गठित हुई।