राजस्थान के मेले
Fairs of Rajasthan
चैत्र की गणगौर से लेकर पुष्कर के ऊँट मेले और बेणेश्वर के आदिवासी कुंभ तक -- राजस्थान के प्रमुख मेलों, पशु मेलों और सांस्कृतिक उत्सवों की एक सचित्र यात्रा।
राजस्थान के सबसे बड़े व प्रसिद्ध मेले
पुष्कर के ऊँटों के काफिले से लेकर बेणेश्वर के आदिवासी कुंभ तक -- ये वे मेले हैं जो राज्यभर में सबसे बड़ी भीड़ जुटाते हैं और सांस्कृतिक दृष्टि से सबसे गहरा महत्व रखते हैं।
🐪पुष्कर मेला
- अजमेर जिले के पुष्कर में कार्तिक शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक (अक्टूबर-नवम्बर) भरने वाला यह मेला राजस्थान का सबसे बड़ा मेला माना जाता है और ऊँटों की खरीद-फरोख्त के लिए विख्यात है।
- इसी के साथ यहाँ गिर नस्ल के गौवंश का कार्तिक पशु मेला भी भरता है, जो राज्य का सबसे बड़ा राज्यस्तरीय पशु मेला और भारत का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है।
💃कैलादेवी मेला (लक्खी मेला)
- करौली के कैलादेवी में कालीसिल नदी के तट पर चैत्र शुक्ला एकम से दशमी तक भरने वाले इस मेले में अष्टमी का दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, और यह अपने ऊर्जावान लांगुरिया लोकनृत्य के लिए प्रसिद्ध है।
🐒मेहँदीपुर बालाजी व सालासर बालाजी मेला
- दोनों मेले हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर चैत्र पूर्णिमा को भरते हैं -- एक दौसा जिले के मेहँदीपुर बालाजी में और दूसरा चूरू के सुजानगढ़ तहसील स्थित सालासर में -- और दोनों ही स्थानों पर हनुमान भक्तों की विशाल भीड़ उमड़ती है।
🌳घोटिया अम्बा मेला
- बाँसवाड़ा के बारीगामा में स्थित घोटिया गाँव में चैत्र अमावस्या के आसपास (चैत्र कृष्णा त्रयोदशी से चैत्र शुक्ला द्वितीया तक) भरने वाला यह मेला बेणेश्वर के बाद आदिवासियों का दूसरा सबसे बड़ा जमावड़ा है और जिले का सबसे बड़ा ग्रामीण मेला भी है।
🕉️बेणेश्वर मेला (राष्ट्रीय जनजाति मेला)
- डूँगरपुर के साबला गाँव व नेवटापुरा के पास सोम, माही और जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसे बेणेश्वर में माघ शुक्ला एकादशी से माघ पूर्णिमा तक भरने वाले इस मेले को लोकप्रिय रूप से 'आदिवासियों का कुंभ' कहा जाता है।
- यहाँ पाँच अलग-अलग स्थानों से एकत्र किए गए खण्डित शिवलिंग की स्थापना है, जिसकी पूजा दिन में दो बार सेवक जाति के पुजारियों द्वारा की जाती है।
🛕श्री महावीरजी मेला
- करौली की हिण्डौन तहसील में गंभीरी नदी के तट पर बसे चंदनपुर गाँव में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी से बैसाख कृष्ण प्रतिपदा तक भरने वाला यह मेला राजस्थान में जैन समुदाय का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।
- बैसाख कृष्ण प्रतिपदा को महावीरजी की रथयात्रा मंदिर से गंभीरी नदी तट तक निकलती है, जिसका संचालन राज्य सरकार के प्रतिनिधि के रूप में हिण्डौन के उपजिला कलेक्टर करते हैं; रथ के आगे मीणा समुदाय के लोग गीत गाते हुए चलते हैं, जबकि लौटते समय यह स्थान गुर्जर समुदाय के लोग ले लेते हैं।
🪔भर्तृहरि मेला
- अलवर से लगभग 40 किमी दूर भर्तृहरि में बैसाख माह तथा भाद्रपद शुक्ला अष्टमी को भरने वाला यह नाथ संप्रदाय का प्रमुख मेला है, जहाँ माना जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के भाई महाराज भर्तृहरि (जो ईसा से लगभग 57 वर्ष पूर्व हुए) ने राजपाट त्यागकर गुरु गोरखनाथ से दीक्षा ली और तपस्या के बाद यहीं समाधि ली।
- यहाँ बड़ी संख्या में कनफटे साधु हाथों में चिमटा-कमण्डल लिए और शरीर पर राख लपेटे पहुँचते हैं, जिससे यह मेला एक छोटे कुंभ जैसा प्रतीत होता है; इसका मुख्य आकर्षण कालबेलिया नृत्य है।
🐄चंद्रभागा पशु मेला
- झालावाड़ के झालरापाटन में चंद्रभागा नदी के तट पर मालवी नस्ल के गौवंश के लिए कार्तिक शुक्ला एकादशी से मार्गशीर्ष कृष्णा पंचमी तक (नवम्बर) भरने वाला यह मेला, जिसका मुख्य दिन कार्तिक पूर्णिमा है, हाड़ौती क्षेत्र में सुरंगा मेला के नाम से भी जाना जाता है।
चैत्र से श्रावण मास के मेले
हिन्दू पंचांग जैसे-जैसे वसंत के चैत्र मास से वर्षा ऋतु के श्रावण मास की ओर बढ़ता है, वैसे-वैसे गाँव-गाँव में त्योहारों, फसलों और लोक-आस्था से जुड़े मेलों की एक शृंखला भरती चली जाती है।
🌸चैत्र मास के मेले
- होली के तुरंत बाद ब्यावर में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को बादशाह मेला भरता है, जो बादशाह की सवारी जैसे जुलूस के लिए प्रसिद्ध है, जबकि रामद्वारा (शाहपुरा, भीलवाड़ा) में प्रतिपदा से पंचमी तक फूलडोल मेला और चित्तौड़गढ़ दुर्ग में राजपूत बलिदान की स्मृति में एकादशी को जौहर मेला भरता है; सलूम्बर में अमावस्या को विक्रमादित्य मेला मनाया जाता है।
- इस माह के देवी-केंद्रित मेलों में चाकसू, जयपुर के शील डूँगरी में अष्टमी को भरने वाला शीतला माता मेला शामिल है, जिसे बैलगाड़ी मेले के नाम से जाना जाता है, तथा शाहपुरा, भीलवाड़ा के धनोप गाँव में नवरात्र के दौरान शुक्ला एकम से दशमी तक भरने वाला धनोप माता का मेला।
- उदयपुर के धुलेव में स्थित ऋषभदेव में अष्टमी-नवमी को मेला लगता है, भरतपुर में हुरंगा मेला पंचमी से अष्टमी तक अपनी विशिष्ट रंग-उत्सव परंपरा के साथ भरता है, और गणगौर पूरे जयपुर व उदयपुर में चैत्र शुक्ला तृतीया को बड़े स्तर पर मनाई जाती है।
- इसके अलावा चैत्र माह में पाली के देसूरी तहसील स्थित सोनाणा में शुक्ला एकम को सोनाणा खेतलाजी मेला और चित्तौड़गढ़ के बड़ीसादड़ी में शुक्ला दशमी को राम-रावण मेला भी भरता है।
🔆बैसाख मास के मेले
- जोधपुर में बैसाख कृष्णा तृतीया को धींगागवर बेंतमार मेला भरता है, जबकि सियावा (आबूरोड, सिरोही) में शुक्ला चतुर्थी को गौर मेला और सरिस्का (अलवर) में शुक्ला एकादशी को नारायणी माता का मेला भरता है।
- नृसिंह चौदस (शुक्ला चतुर्दशी) के अवसर पर पूरे मारवाड़ क्षेत्र (जोधपुर, पाली) में मलूका मेला मनाया जाता है।
- बैसाख पूर्णिमा को कई मेले एक साथ भरते हैं -- मैड़, विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़) का बाणगंगा मेला, राशमी (हरनाथपुरा, चित्तौड़गढ़) का मातृकुण्डिया मेला, अरनोद (प्रतापगढ़) का एक गौतमेश्वर मेला, तथा अम्बा, सिरोही का गरासिया मेला।
☀️ज्येष्ठ मास के मेले
- प्रतापगढ़ के सीतामाता में ज्येष्ठ अमावस्या को सीतामाता मेला भरता है, जबकि बाराँ के केलवाड़ा स्थित सीताबाड़ी में बैसाख पूर्णिमा से ज्येष्ठ अमावस्या तक चलने वाला सीताबाड़ी का मेला सहरिया जनजाति के कुंभ के नाम से जाना जाता है।
- हल्दीघाटी (राजसमंद) में ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया को प्रताप जयंती मनाई जाती है, तथा कामाँ-डीग में सुदी सप्तमी से द्वादशी (बारस) तक गंगा दशहरा मेला भरता है।
🌧️श्रावण मास के मेले
- हरियाली अमावस्या को अजमेर के माँगलियावास में कल्पवृक्ष मेला भरता है, तथा रायसिंहनगर (श्रीगंगानगर) में श्रावण अमावस्या को गुरुद्वारा बुड्ढा जोहड़ मेला भरता है।
- जयपुर में श्रावण शुक्ला तृतीया (जुलाई-अगस्त) को तीज मेला मनाया जाता है, मेड़ता सिटी (नागौर) में शुक्ला एकादशी से सात दिन तक चारभुजानाथ (मीराबाई) मेला भरता है, तथा मंडोर (जोधपुर) में श्रावण के अंतिम सोमवार को वीरपुरी मेला भरता है।
भाद्रपद से फाल्गुन मास के मेले
वर्ष के दूसरे भाग में भी मेलों की भरमार रहती है -- भाद्रपद के घने मेला-समूह से लेकर फाल्गुन की वसंती रौनक तक।
🎊भाद्रपद मास के मेले
- माह की शुरुआत बूँदी में कृष्णा तृतीया को कजली तीज, नाथद्वारा (राजसमंद) में कृष्णा अष्टमी को जन्माष्टमी, तथा गोगामेडी, नोहर (हनुमानगढ़) में कृष्णा नवमी को गोगाजी की गोगानवमी से होती है।
- शुक्ला द्वितीया के बाद कई प्रमुख तीर्थ-मेले भरते हैं -- मसूरिया (जोधपुर) का बाबा रामदेव मेला, तथा रूणेचा, पोकरण (जैसलमेर) का रामदेवरा मेला जो शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक भरता है, साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध है और यहाँ कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा तेरहताली नृत्य किया जाता है।
- शुक्ला चतुर्थी व पंचमी को कई मंदिर-मेले भरते हैं -- रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) में गणेशजी का मेला, जैसलमेर में चुंघी तीर्थ मेला, पांडुपोल (अलवर) में हनुमानजी का मेला, कामाँ-डीग में भोजन थाली मेला, तथा मंडोर (जोधपुर) में नागपंचमी मेला।
- माह के आगे के दिनों में मचकुण्ड (धौलपुर) में षष्ठी को तीर्थराज मेला, आसींद (भीलवाड़ा) के सवाई भोज में सप्तमी को सवाई भोज मेला, जालौर में नवमी को वीर फत्ताजी मेला, तथा जोधपुर में दशमी को खेजड़ली शहीद मेला भरता है, जो खेजड़ली वृक्ष-हत्याकांड के शहीदों की स्मृति में मनाया जाता है।
- एकादशी को सबसे अधिक भीड़ रहती है -- सिरोही का सारणेश्वरजी पशु मेला (रैबारी समुदाय का प्रमुख मेला), बाराँ के डोल तालाब का डोल मेला, गढ़बोर गाँव (राजसमंद) का देवझूलनी (चारभुजा) मेला, मण्डफिया (चित्तौड़गढ़) का साँवलिया जी का मेला, तथा डिग्गी, मालपुरा (टोंक) का डिग्गी कल्याणजी का मेला, जिनके आराध्य कल्याणजी को विष्णु का अवतार माना जाता है; माह का समापन झुंझुनूँ के राणी सती मेले (अमावस्या) से होता है।
🍂आश्विन मास के मेले
- कोटा का दशहरा मेला आश्विन शुक्ला दशमी को भरता है; इसकी शुरुआत 1895 ई. में महाराव उम्मेदसिंह ने की थी।
- चित्तौड़गढ़ में आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को मीरा महोत्सव मनाया जाता है, जो संत कवयित्री मीराबाई की भक्ति को समर्पित है।
🪈कार्तिक मास के अन्य मेले
- नाथद्वारा (राजसमंद) में शुक्ला एकम को अन्नकूट मेला भरता है, और बंशी पहाड़पुर (भरतपुर) में शुक्ला तृतीया को गरुड़ मेला भरता है।
- कार्तिक पूर्णिमा को बाराँ के सहरिया क्षेत्र में कपिल धारा का मेला भरता है, जबकि बीकानेर के कोलायत में कपिल मुनि का मेला भरता है।
🏞️मार्गशीर्ष मास का मेला
- मार्गशीर्ष पूर्णिमा को बाँसवाड़ा के मानगढ़ धाम में मानगढ़ धाम मेला भरता है, जो आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण मेला है।
❄️पौष मास के मेले
- पौष कृष्णा दशमी को नाकोड़ा तीर्थ (मेवानगर, बालोतरा) में नाकोड़ाजी का मेला भरता है, और पाली में पौष शुक्ला दशमी को वरकाणा का मेला भरता है।
🌾माघ मास के अन्य मेले
- सवाई माधोपुर के चौथ का बरवाड़ा में माघ कृष्णा चतुर्थी को श्री चौथ माता का मेला भरता है, तथा डीग में माघ कृष्णा 12 से माघ सुदी पंचमी तक ब्रज यात्रा मेला भरता है।
- जैसलमेर व निकटवर्ती सम में माघ शुक्ला 13 से 15 तक पर्यटन मरु मेला भरता है, जो एक पर्यटन-आधारित मरुस्थलीय मेला है।
🔥फाल्गुन मास के मेले
- कृष्णा त्रयोदशी को कई मेले भरते हैं -- ईसरदा गाँव (सवाई माधोपुर) का शिवाड़ मेला, कैलाशपुरी (उदयपुर) का एकलिंगजी मेला, तथा मेनाल (भीलवाड़ा) के त्रिवेणी संगम का सौरत (त्रिवेणी) मेला।
- रणकपुर (पाली) में शुक्ला चतुर्थी-पंचमी को मेला भरता है, देशनोक (बीकानेर) में सप्तमी को चनणी चेरी मेला भरता है, तथा खाटूश्याम जी (सीकर) में शुक्ला 11-12 को इनका प्रमुख मेला भरता है।
- पूर्णिमा को मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) के तिलस्वाँ में तिलस्वाँ महादेव मेला भरता है, और इस माह में विजयनगर (श्रीगंगानगर) का डाडा पम्पाराम का मेला भी शामिल है।
बहुवार्षिक मेले व राज्यस्तरीय पशु मेले
कुछ मेले वर्ष में एक से अधिक बार भरते हैं, वहीं राज्य के पशुपालन विभाग द्वारा आयोजित पशु मेलों की एक अलग शृंखला राजस्थान की प्रतिष्ठित गौवंश नस्लों का उत्सव मनाती है।
🙏वर्ष में दो बार भरने वाले देवी मेले
- कई मातृ-देवी मेले चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रों में भरते हैं -- देशनोक (बीकानेर) की करणी माता, बीकानेर की नागणेची माता, मोदरा (जालौर) की महोदरी माता, रेवासा गाँव (सीकर) की जीण माता, तथा शाकम्भरी (सांभर) की शाकम्भरी माता।
- नागौर के गोठ माँगलोद की दधिमति माता चैत्र व आश्विन दोनों की शुक्ला अष्टमी को पूजी जाती हैं, झुंझुनूँ की मनसा माता चैत्र बदी 8 व आश्विन सुदी 8 को, और बूँदी के इंद्रगढ़ की इंद्रगढ़/बीजासन माता दोनों नवरात्रों के साथ बैसाख पूर्णिमा को भी; वहीं बाड़मेर के चौहटन की वीरातरा माता का मेला वर्ष में तीन बार -- चैत्र, भाद्रपद व माघ शुक्ला चौदस को -- भरता है।
🔁अन्य बहुवार्षिक मेले
- लोहार्गल (झुंझुनूँ) में भाद्रपद कृष्णा नवमी से अमावस्या तक और चैत्र की सोमवती अमावस्या को भी मेला भरता है; अंजारी गाँव, सिरोही के मारकण्डेश्वर मेले (मुख्यतः गरासिया समुदाय का मेला) की तिथियाँ भाद्रपद शुक्ला ग्यारस व बैसाख पूर्णिमा हैं।
- तिजारा, भर्तृहरि नगर (खैरथल-तिजारा) का चंद्रप्रभु मेला फाल्गुन शुक्ला सप्तमी व श्रावण शुक्ला दशमी को भरता है, जबकि सैपऊ (धौलपुर) का सैपऊ महादेव मेला फाल्गुन व श्रावण दोनों माह की चतुर्दशी को भरता है।
🐮राज्यस्तरीय पशु मेले -- भाग 1
- बालोतरा के तिलवाड़ा में लूनी नदी के तट पर थारपारकर व काँकरेज गौवंश के लिए श्री मल्लीनाथ पशु मेला चैत्र कृष्णा 11 से चैत्र शुक्ला 11 (अप्रैल) तक भरता है; मेड़ता (नागौर) में नागौरी गौवंश के लिए श्री बलदेव पशु मेला चैत्र शुक्ला 1 से पूर्णिमा (अप्रैल) तक भरता है।
- परबतसर (डीडवाना-कुचामन) में नागौरी गौवंश के लिए श्री तेजाजी पशु मेला (मवेशी मेला) श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या तक भरता है, तथा मानासर (नागौर) में नागौरी गौवंश के लिए श्री रामदेव पशुमेला माघ शुक्ला 1 से पूर्णिमा (फरवरी) तक भरता है।
🐃राज्यस्तरीय पशु मेले -- भाग 2
- झालावाड़ के झालरापाटन में मालवी गौवंश के लिए श्री गोमतीसागर पशु मेला बैसाख शुक्ला 13 से ज्येष्ठ कृष्णा 5 (मई) तक भरता है; गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) में हरियाणवी गौवंश का पशु मेला श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद पूर्णिमा (अगस्त) तक भरता है।
- भरतपुर में हरियाणवी गौवंश के लिए जसवंत प्रदर्शनी एवं पशु मेला आश्विन शुक्ला 5 से 14 (अक्टूबर) तक भरता है, तथा करौली में हरियाणवी गौवंश के लिए महाशिवरात्रि पशु मेला माघ पूर्णिमा से फाल्गुन कृष्णा 7 तक भरता है।
विशेष मेले, लोक-कथाएँ व सांस्कृतिक उत्सव
पंचांग की सूची से आगे बढ़कर, कुछ मेलों की अपनी विशेष लोक-कथा या पृष्ठभूमि है, और इनके साथ ही राज्य के पर्यटन-आधारित उत्सवों की एक पूरी शृंखला भी है।
📖डोल मेला -- लोक कथा
- जब बूँदी के महाराव सुरजन हाड़ा ने रणथम्भौर का किला अकबर को सौंपा, तो वहाँ से रंगनाथ जी व कल्याणराय जी की दो देव-मूर्तियाँ बाहर लाई गईं; रंगनाथ जी की मूर्ति बूँदी में और कल्याणराय जी की मूर्ति बाराँ में स्थापित की गई, जहाँ तत्कालीन बूँदी रानी ने मंदिर बनवाया।
- इससे जुड़ा डोल मेला 18 दिनों तक चलता है और इसे श्रीकृष्ण का 'जलवा पूजन' भी कहा जाता है, जो जन्माष्टमी के 18वें दिन यशोदा जी के घाट-पूजन की स्मृति में मनाया जाता है।
🕯️राणी सती मेला
- झुंझुनूँ में माघ कृष्णा नवमी और भाद्रपद कृष्णा नवमी को भरने वाले इस मेले का आयोजन सबसे पहले 1912 ई. में हुआ था।
- 1988 से इस मेले पर सती प्रथा निषेध कानून के अंतर्गत प्रतिबंध लगा दिया गया है।
🕊️जांभेश्वर मेला
- बीकानेर के नोखा स्थित मुकाम में फाल्गुन कृष्णा अमावस्या तथा आश्विन कृष्णा अमावस्या को भरने वाला यह मेला बिश्नोई संप्रदाय के संस्थापक गुरु जांभोजी को समर्पित है।
🏔️केसरियाजी व गौतमेश्वर मेला
- केसरियाजी का मेला उदयपुर के धुलेव गाँव में चैत्र कृष्णा अष्टमी को भरता है, और आश्विन कृष्णा प्रतिपदा-द्वितीया को यहाँ रथयात्रा निकाली जाती है।
- गौतमेश्वर मेला (जिसका संबंध भूरिया बाबा से भी जोड़ा जाता है) सिरोही में पोसालिया नदी के तट पर चैत्र शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक भरता है और मुख्यतः मीणा समाज का मेला है; प्रतापगढ़ के अरनोद में सूकड़ी नदी तट पर बैसाख माह में एक अलग गौतमेश्वर मेला भी लगता है।
🌿कानन व चूहड़सिद्ध मेला
- बालोतरा के कानन गाँव का कानन मेला वसंत ऋतु में भरता है और इसका मुख्य आकर्षण गैर नृत्य है।
- चूहड़सिद्ध पीर का जन्म अलवर के घनेटा गाँव में हुआ था; घर त्यागने के बाद उनकी भेंट संत शाह मदार से हुई और वे चमत्कारिक कार्य करने लगे। उनका मेला अब कोटपूतली-बहरोड़ में फाल्गुन बदी चौदस को भरता है।
🎭भद्रकाली देवी मेला व नृसिंह-वराह लीला महोत्सव
- हनुमानगढ़ जिले का भद्रकाली देवी मेला चैत्र शुक्ला अष्टमी व नवमी को भरता है।
- नृसिंह जयंती बैसाख सुदी चतुर्दशी को और वराह जयंती भादवा सुदी तृतीया को मनाई जाती है; अजमेर में नृसिंह जयंती के अवसर पर लाल्या-काल्या मेला भी आयोजित होता है।
🌙चोटीला, चमत्कारजी व कपालेश्वर मेला
- पाली जिले में हजरत पीर ढुलेशाह की मजार पर दीपावली के अगले दिन मेला भरता है।
- चमत्कारजी का मेला सवाईमाधोपुर के आलनपुर में शरद पूर्णिमा को भरता है।
- बाड़मेर के चौहटन कस्बे का कपालेश्वर महादेव मेला 12 वर्ष में केवल एक बार भरता है, इसलिए इसे कुंभ मेले के छोटे मरुस्थलीय रूप की उपमा दी जाती है।
🛞अलवर के मेले -- जगन्नाथ रथयात्रा, श्याम बाबा व पांडुपोल
- उड़ीसा के पुरी की तरह अलवर जिले में भी जगन्नाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है, जो सुभाष चौक (पुराना कटला) स्थित जगन्नाथ मंदिर से रूपबास स्थित मंदिर तक पहुँचती है, जहाँ शहरवासी बाराती बनकर भगवान जगन्नाथ का विवाह जानकी माता से कराने ले जाते हैं; यह मेला आषाढ़ सुदी नवमी (बड़लिया नवमी) से तेरस तक चलता है और एकादशी को होने वाले वरमाला उत्सव के साथ पूर्ण माना जाता है।
- अलवर के जैतपुरा स्थित श्याम बाबा धाम -- जो सीकर स्थित खाटूश्यामजी न जा पाने वाले भक्तों में लोकप्रिय है -- फाल्गुन शुक्ला एकादशी को अपना मेला मनाता है, जहाँ पुजारी की परंपरा सेढ़ूराम परिवार निभाता आ रहा है।
- पांडुपोल का मेला भाद्रपद व बैसाख माह की अमावस्या के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को भरता है; कथा है कि हनुमानजी ने बाबा निर्भयदास को स्वप्न में दर्शन देकर मूर्ति को भूमि से निकालने को कहा, और निर्भयदास ने मूर्ति निकालकर उसी स्थान पर स्थापित कर दी।
🐟फूटा देवल, मत्स्य महोत्सव व संत लालदासजी का मेला
- राजसमंद का फूटा देवल मेला (परशुराम महादेव मेला) श्रावण मास में भरता है।
- मत्स्य महोत्सव अलवर जिला प्रशासन व राजस्थान पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में प्रतिवर्ष 25-26 नवम्बर को आयोजित होता है।
- संत लालदासजी का मेला अलवर के धौलीदूब में आश्विन माह में भरता है, तथा अलवर के ही रामगढ़ तहसील के शेरगढ़ गाँव में आषाढ़ व माघ माह में भी भरता है।
🌳कुंभलगढ़ महोत्सव व वृक्ष महोत्सव (खेजड़ली मेला)
- कुंभलगढ़ महोत्सव महाराणा कुंभा के सम्मान में राजसमंद जिले में आयोजित किया जाता है।
- वृक्ष महोत्सव (खेजड़ली मेला) प्रतिवर्ष 12 सितम्बर को जोधपुर के खेजड़ली गाँव में मनाया जाता है और राज्य का इस प्रकार का एकमात्र वृक्ष-मेला है।
🌶️नागौर, मूंडवा व पार्श्वनाथ मेला
- नागौर मेले की सबसे बड़ी पहचान यहाँ लगने वाला 'मिर्ची बाजार' है।
- मूंडवा का मेला भी नागौर जिले में ही आयोजित होता है।
- पार्श्वनाथ का मेला आश्विन मास में नागौर के मेड़ता सिटी स्थित फलौदी गाँव में आयोजित होता है।
🏜️मरु मेला, जैसलमेर
- राजस्थान पर्यटन विकास निगम द्वारा माघ माह में आयोजित इस मेले में 'मरुश्री' व साफा-बाँधने की प्रतियोगिताएँ होती हैं, साथ ही गैर व अग्नि नृत्य का प्रदर्शन भी होता है।
🎉पर्यटन विभाग के उत्सव
- मरुस्थल-केंद्रित उत्सवों में बीकानेर का ऊँट महोत्सव (जनवरी), जैसलमेर का मरु महोत्सव (जनवरी-फरवरी), जैसलमेर पतंग महोत्सव (जनवरी), 14 जनवरी को जयपुर का अपना पतंग उत्सव, और बाड़मेर का थार महोत्सव (मार्च) शामिल हैं, इनके साथ ही जयपुर का हाथी महोत्सव (मार्च) भी मनाया जाता है।
- क्षेत्र-केंद्रित उत्सवों में उदयपुर का मेवाड़ महोत्सव (अप्रैल), जोधपुर का मारवाड़ महोत्सव-मांड महोत्सव (अक्टूबर), डूँगरपुर का वागड़ मेला (नवम्बर), तथा पाली के गोडवाड़ समारोह (अप्रैल) व खांगड़ी मेला (मार्च-अप्रैल) शामिल हैं।
- ऋतु-केंद्रित उत्सवों में माउंट आबू व जयपुर का ग्रीष्म महोत्सव-समर फेस्टिवल (मई-जून), माउंट आबू का शरद महोत्सव (दिसम्बर), तथा बूँदी उत्सव (दिसम्बर) शामिल हैं।
- मौजूदा मेलों के पर्यटन-संस्करण भी विभाग के कैलेंडर में शामिल हैं -- जयपुर का गणगौर मेला (मार्च-अप्रैल), जयपुर का तीज मेला (जुलाई-अगस्त), अजमेर का पुष्कर मेला (नवम्बर), करौली का श्री महावीरजी मेला (अप्रैल), नागौर मेला (जनवरी-फरवरी), बूँदी की कजली तीज (अगस्त), झालरापाटन का चन्द्रभागा मेला (अक्टूबर-नवम्बर), करौली का कैलादेवी मेला (अप्रैल), तथा चित्तौड़गढ़ का मीरा महोत्सव (अक्टूबर)।
- अन्य उल्लेखनीय आयोजनों में कोटा का एडवेंचर स्पोर्ट्स (फरवरी), कोटा का दशहरा उत्सव (अक्टूबर), भरतपुर का ब्रज महोत्सव (फरवरी), डीग महोत्सव (अगस्त), बाड़मेर-बैलून महोत्सव (अप्रैल), अलवर महोत्सव (फरवरी), पाली का रणकपुर फेस्टिवल (नवम्बर), रणकपुर का योगा शिविर व शास्त्रीय नृत्य उत्सव (अगस्त), पाली का सिन्दरू मेला (अप्रैल), श्री डूँगरगढ़ के मोमासर गाँव का मोमासर उत्सव (अक्टूबर-नवम्बर), उदयपुर का शिल्पग्राम उत्सव (दिसम्बर), तथा प्रतापगढ़ का कांठल उत्सव शामिल हैं।